पेचीदा पहेली है, गुस्से से न सुलझेगी

रसांतर

पेचीदा पहेली है, गुस्से से सुलझेगी

- राजकिशोर



जब भी आतंकवादी हमले की कोई बड़ी घटना होती है, हमारा खून खौलने लगता है। सड़क पर, बाजार में, सिनेमा हॉल में या भीड़वाली जगह पर जब दर्जनों लोग मारे जाते हैं और उससे ज्यादा लोग घायल हो जाते हैं, तो जिसके भी दिल का जज्बा मरा नहीं है, उसकी नसें तड़कने लगती हैं। सरकार, पुलिस, खुफिया विभाग, अन्य सुरक्षा एजेंसियां सब कटघरे में खड़ी नजर आते हैं और हमें लगता है कि हमारी जान की परवाह किसी को नहीं है। मंत्री और नेता लोग हर आतंकवादी घटना की निन्दा करते हैं, मृतकों और घायलों के लिए मुआवजे की घोषणा करते हैं और प्राणहीन स्वर में यह घोषणा कर देते हैं कि हम आतंकवादियों के मनसूबों को सफल होने नहीं देंगे। यह और बात है कि आतंकवादियों के मनसूबे क्या हैं, यह हममें से कोई नहीं जानता। सरकार ने भी कभी यह बताया नहीं है कि किस इरादे से ये नृशंस हत्याएं हो रही हैं। कभी-कभी यह जरूर बताया जाता है कि अमुक घटना में अमुक संगठन का हाथ है या अमुक घटना की जिम्मेदारी अमुक संगठन ने ली है। लेकिन कुछ छोटी-मोटी गिरफ्तारियों के सिवायहम नहीं जानते कि आतंकवाद की लहर को रोकने के लिए सरकार कर क्या रही है।


जो लोग समझते हैं या दावा करते हैं कि गोली का जवाब गोली है और बम का जवाब तोप है, वे यह बताने में असमर्थ हैं कि गोली किस पर चलाई जाए या तोप का रुख किधर किया जाए। पिछले कुछ दिनों से यह जुमला काफी लोकप्रिय हो चला है कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, पर सभी आतंकवादी मुसलमान हैं। इस जुमले के पीछे छिपी भावना की निन्दा करने के हजार कारण हैं, पर इसके पीछे जो तथ्यात्मकता है, उससे कौन इनकार कर सकता है? जब भी संदिग्ध आतंकवादियों की अनुमानित तसवीरें पुलिस जारी करती है, वे तसवीरें आम तौर पर मुसलमानों की ही होती हैं। गुजरात की घटनाओं को यहां छोड़ दीजिए, क्योंकि वह सांप्रदायिक आतंक और हिंसा की एक दूसरी किस्म है। इसी किस्म की सांप्रदायिक आक्रामकता उड़ीसा, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में दिखाई पड़ी, जिसमें एक खास तरह से दीक्षित और प्रशिक्षित हिन्दुओं ने ईसाइयों और उनके चर्चों पर हमला किए। इन घटनाओं और आतंकवादी घटनाओं में फर्क यह है कि हमलावर हिन्दूवादियों ने अपने को छिपा कर हिंसा नहीं की। जब वे किसी मुसलमान या ईसाई पर हमला कर रहे थे, तो उन्होंने अपने चेहरों पर पट्टी नहीं बांधी हुई थी। वे दिखाना चाहते थे कि हम कौन हैं और क्यों हमला करने आए हैं। 1984 की सिख-विरोधी हिंसा में भी यही प्रवृत्ति दिखाई दी थी। इस तरह, यह आतंकवाद नहीं था, खुली हिंसा थी। यह गुंडागर्दी का ही एक अति हिंसक रूप है। यह भारतीय राज्य की गंभीर कमजोरी है कि जिन मामलों में हत्यारों को साफ-साफ पहचाना जा सकता था या पहचान लिया गया था, उनमें भी इनसाफ नहीं किया जा सका।


इसके विपरीत, आतंकवाद की घटनाओं में अपराधी तक पहुंचना बहुत मुश्किल होता है। वह खुले में नहीं, छिप कर हमला करता है। पुलिस और सुरक्षा बल चाहे जितने निष्ठावान, चुस्त और मेहनती हों, वे आतंकवादियों का सफाया नहीं कर सकते। इसलिए गोली के बदले गोली का सिद्धांत यहां कारगर नहीं हो सकता। तो क्या हमें असहाय और निरुपाय हो कर अपने भाई-बहनों की हत्या के नजारे देखते रहना चाहिए? इससे अधिक संवेदनहीनता और बेहयाई क्या हो सकती है?


बेशक सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद बनाने की गंभीर आवश्यकता है, पर आतंकवाद सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है। आतंकवादी ऐसे लोगों की हत्या करता है जिन्हें वह जानता तक नहीं है। ऐसे हमलों में हिन्दू, मुसलमान, सिख सभी समूहों के लोग मारे जा सकते हैं, इसकी भी उसे परवाह नहीं है। वह तो अंधाधुंध हिंसा कर कोई राजनीतिक संदेश देना चाहता है। क्या भारत के संचालकों ने कभी इस संदेश को सुनने की कोशिश की है? इस संदेश को सुने और समझे बगैर आतंकवाद को रोकने की कोई सक्षम रणनीति बनाई जा सकती है, इसमें गहरा संदेह है।


एक मजबूत उदाहरण लीजिए। बाबरी मस्जिद विध्वंस के सोलह साल हो रहे हैं। इस घटना से पूरा देश कांप गया था। देश की राजनीतिक धारा ही बदल गई। लेकिन इन सोलह वर्षों में आज तक बाबरी मस्जिद विध्वंस कांड के लिए जिम्मेदार किसी भी व्यक्ति को सजा नहीं मिल पाई है। इनमें से एक मध्य प्रदेश का मुख्य मंत्री बन गया और दूसरे ने देश के उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री का पद संभाला। अब वह अगला प्रधानमंत्री बनने का हसीन सपना देख रहा है। अतीत में जितने भी सांप्रदायिक दंगे हुए, उनके लिए जिम्मेदार लोगों तक कानून के तथाकथित लंबे हाथ नहीं पहुंच सके। एक आदमी किसी का खून करता है, तो उसे फांसी पर चढ़ा दिया जाता है या उम्र भर कैदी बना कर रखा जाता है। लेकिन सांप्रदायिक दंगे में कोई व्यक्ति दर्जनों हत्याएं करता है, तो वह कानून की सीमा से परे हो जाता है। क्या इस तरह के पूर्वाग्रह और एकांगिता से आतंकवाद की पीठिका मजबूत नहीं होती है? लोग कानून को अपने हाथ में तभी लेते हैं, जब कानून के रखवाले निकम्मे हो जाते हैं।


इस संदर्भ में कश्मीर का सवाल उठना लाजिमी है। वहां अरसे से अलगाववाद और आतंकवाद की लहर चल रही है। लेकिन कश्मीरी मुसलमान शुरू से ही हिंसक नहीं रहे हैं। 1990 से हिंसा का तांडव बढ़ा है। आज पूरा कश्मीर जल रहा है। असंतोष की आग इतने लंबे समय से लपटें फेंक रही है, लेकिन भारत सरकार ने कश्मीर समस्या का समाधान निकालने की कोशिश कभी नहीं की। यह कोशिश आज भी नहीं हो रही है, जब अरुंधति राय जैसे बुद्धिजीवी को लगता है कि कश्मीर आजादी के लिए छटपटा रहा है। अगर हम मान लें कि कश्मीर समस्या का कोई समाधान नहीं है या यह कोई समस्या ही नहीं है, तब हमें कोशिश करनी चाहिए कि वहां भारतीय सेना नागरिकों की मित्र सेना के रूप में काम करे। जैसे उत्तर-पूर्व के विकास के लिए विशेष कोष बनाया जाता है, वैसे ही कश्मीर के विकास के लिए अलग से प्रयत्न किए जाएं। राज्य सरकार को पैसा भेजना कोई समाधान नहीं है। जम्मू-कश्मीर राज्य देश के भ्रष्टतम राज्यों में एक है। इसलिए विकास कार्य के लिए कोई अलग एजेंसी बनाई जानी चाहिए जिसमें बहुसंख्या कश्मीर के स्थानीय लोगों की हो। जैसे-जैसे यह साबित होता जाएगा कि भारत सरकार कश्मीर की हितू है, शेष भारत के लोग कश्मीरियों को -- गुमराह कश्मीरियों को भी -- प्यार करते हैं और उनका सामान कुछ अधिक दाम दे कर भी खरीदते हैं और सेना वहां किसी का संहार करने या किसी को सताने के लिए नहीं, बल्कि नागरिक जीवन को सुरक्षित बनाने के लिए है, तो निश्चित है कि अलगाववादियों की राजनीतिक और सामुदायिक शक्ति क्षीण होती जाएगी। कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए हमें आतंकवादियों के पहले वहा की आम जनता का प्रेम और विश्वास जीतना चाहिए।


निवेदन है कि जिन राजनीतिक कारणों से भारत में आतंकवाद पैदा हुआ है, पहले उन्हें तो दूर कीजिए। फिर देखिए कि वह वातावरण बनता है या नहीं जिसमें आतंकवादी हिंसा क्रमश: बेमानी होती जाएगी। किसी भी समस्या को गुस्से से नहीं, प्रेम से ही सुलझाया जा सकता है।



(लेखक इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज,नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं।)

2 टिप्‍पणियां:

  1. कश्मीर के विकास के लिए अलग से व्यवस्था और प्रयास। यानि धारा-३७० अपर्याप्त है। कश्मीर को भ्रष्टतम राज्य बनाया किसने? वहाँ की आम जनता क्या इसमें शामिल नहीं?

    सच्चे विकास के लिए उसे मेहनत करनी पड़ेगी। अनुशासित होना पड़ेगा। कष्ट उठाने पड़ेंगे। आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा लेनी पड़ेगी। यानि रास्ता कठिन है। दूसरी ओर सीमा पार से आतंकवाद को जिन्दा रखने के लिए भारी आर्थिक मदद, कट्टरपंथी इस्लामी शिक्षा ग्रहण करने पर मुल्लाओं की वाह-वाह, विरोध की राजनीति करने पर अधिक केन्द्रीय मदद, वोट के लालच में नेताओं का साष्टांग प्रणाम, दंगे की मानसिकता से पड़ोसी (लाइन पार के) विरादर खुश!
    जब इतना कुछ ब्लैक मेल के द्वारा मिल रहा हो तो शान्ति की कोशिश क्यों की जाय। वाह कश्मीर, वाह रे कश्मीरियत...।

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  2. शायद हमारी यही मानसिकता इस देश का नासूर बन रही है। हमारे लेखक बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने की बात करते समय हमारे हज़ारों/लाखों मंदिरों के ध्वस्त होने की बात भूल जाते है। आज भी हमारे सोमनाथ और विश्वनाथ मन्दिर उस आक्रमकता की गाथा सुना रहे हैं। यदि देश का हर क्षेत्र अस्मिता का वास्ता देकर पृथकता का आंदोलन शुरू करें तो फिर देश कहां होगा?

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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