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क्या आप कैंसर से युद्ध में आलोक तोमर को सही राय दे सकते हैं?

क्या आप कैंसर से युद्ध में आलोक तोमर को सही राय दे सकते हैं? 
- (डॉ.)कविता वाचक्नवी  





Alok Tomar

हिन्दी पत्रकारिता व लेखन से जुड़े लोग आलोक तोमर जी से परिचित ही हैं, जो नए लोग इस नाम के पीछे छिपे व्यक्तित्व से परिचित न हों वे कृपया



दोनों लिंक्स द्वारा दो कड़ियों के उनके साक्षात्कार को पढ़ कर कुछ परिचय पा सकते है. राष्ट्र व राष्ट्रीय प्रश्नों के प्रति पागलपन की सीमा तक खोजी, लड़ाकू व दीवाने ये लेखनी के धनी जुझारू पत्रकार आलोक तोमर इन दिनों सी एन ई बी चैनल में कॉपी एडिटर के रूप में कार्य देखते हैं और डेटलाइन इंडिया का संचालन संयोजन करते हैं. हिन्दी भारत पर भी यदा कदा यहाँ उनका कुछ लेखकीय सहयोग ( जैसे - कारगिल  जो  सिर्फ  मुहावरा नहीं  है ) मिला. 



हिन्दी पत्रकारिता व लेखन से जुड़े अधिकाँश लोगों को यह दुखद वृत्त ज्ञात ही है कि गत दिनों उन्हें जाँच द्वारा प्रारंभिक अवस्था में कैंसर होने की पुष्टि की गई  ( कैंसर को हराने में जुटे हैं आलोक तोमर).

अब स्थिति यह है केवल जाँच में ही अब तक दो लाख रुपये से अधिक झोंका जा चुका है और कैंसर के मूल का पता तक नहीं चल रहा है. हिन्दी के पत्रकार के लिए ( और वह भी जो हर समय व्यवस्था और शातिरों से पग पग पर पंगे लेता आया हो) धनाभाव बहुत सामान्य बात है. उनका स्वाभिमानी व्यक्तित्व किसी आर्थिक सहयोग की अपेक्षा नहीं करता; केवल एक सहयोग किया जा सकता है कि कोई परिचित विशेषज्ञ चिकित्सक उनकी मेडिकल रिपोर्ट्स देख कर अपनी निर्णायक टिप्पणी द्वारा उनके अपव्यय को रोकने में सहयोगी हो सकें.



किसी प्रकार का
आर्थिक सहयोग नहीं अपितु विशुद्ध कायाविमर्श अपेक्षित है. यदि आप पाठकों में से कोई स्वयं अथवा आपका कोई परिचित मित्र ऐसा हो जो इस विषय का विशेषज्ञ हो व आलोक जी के इस आड़े समय में अपनी विशेषज्ञता का लाभ उन्हें दे कर अपने बड़प्पन से कृतार्थ कर सकता हो तो कृपया हमें सूचित करें. उन्हें आलोक जी की रिपोर्ट्स भेज दी जाएँगी ताकि सही मार्गदर्शन व निर्णायक मत का पता चल सके.


मैं निजी तौर से अपने मित्रों परिचितों से इस
मार्गदर्शन में सहयोग की आकांक्षी व प्रार्थी हूँ. यदि आप किसी ऐसे कैंसर विशेषज्ञ को जानते हों जो वास्तव में सही व निश्शुल्क मार्गदर्शन तथा निर्णय दे सकता है तो कृपया उनका अता पता दें.

  कृपया इस सन्देश को अधिकतम लोगों तक पहुँचा कर इस कठिन घड़ी में उन्हें ऊहापोह व अतिव्यय से उबरने में सहयोग दें.







पाठकों की अदालत में अपने दोषी या निर्दोष होने की अपील

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आतंकवादी ऐसे बनाती है पुलिस



मुझे इस बात के लिए माफ किया जाए कि मैं कई बार अपने खिलाफ चल रहे मामले की चर्चा कर चुका हूँ । मामला अब भी अदालत में हैं और वहाँ जो फैसला होगा सो होगा, मैं अपने पाठकों की अदालत में अपने दोषी या निर्दोष होने की यह अपील कर रहा हूँ ।


2005 के फरवरी महीने में दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी थाने में मेरे खिलाफ एक मामला दर्ज हुआ था एफआईआर कहती है कि हेड कांस्टेबल मोहम्मद लोनी और हेड कांस्टेबल सलीम डिफेंस कॉलोनी क्षेत्र का दौरा कर रहे थे। वहाँ एक सिंह न्यूज एजेंसी पर उनकी नजर सीनियर इंडिया नामक पत्रिका पर पड़ी जिसके मुख पृष्ठ पर बापू की वासना शीर्षक से एक लेख छपा था। सलीम और लोनी को एफआईआर के अनुसार बहुत उत्सुकता हुई और उन्होंने पत्रिका पढ़ना शुरू कर दिया। अंदर सातवें पन्ने पर नीचे एक तीन पैराग्राफ का लेख था जिसका शीर्षक था `अपने अपने भगवान', जिसमें एक छोटी-सी फोटो भी छपी थी जिसमें पगड़ी पर पटाखा  बना हुआ था।


एफआईआर के अनुसार फोटो बहुत छोटा था लेकिन फिर भी इन गुणी हवलदारों ने पढ़ लिया कि पगड़ी के माथे पर कुरान की पहली आयत ला इलाह इल्लिलाह, या रसूल अल्लाह अरबी भाषा में लिखा है। दिल्ली पुलिस में अरबी भाषा के इतने विद्वान को सिर्फ हवलदार बना कर रखा गया है। यह हैरत की बात है एफआईआर कहती है कि कार्टून छापना मुस्लिम समुदाय का अपमान करना है और लेख की भाषा भी मुस्लिम संप्रदाय के खिलाफ है। इसलिए यह धारा 295 के तहत किया गया गंभीर अपराध था। इसकी सूचना सब इंस्पेक्टर के पी सिंह को दी गई और के पी सिंह ने थाने से एक बजे रवानगी डाल कर 22 फरवरी 2006 को खुद डिफेंस कॉलोनी में यह पत्रिका देखी और अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी दी। वरिष्ठ अधिकारी यानी दिल्ली पुलिस के पुलिस आयुक्त डॉक्टर कृष्ण कांत पॉल तैयार बैठे थे। उन्होंने तुरंत दिल्ली के उप राज्यपाल के नाम एक संदेश बनाया जिसमें पत्रिकाएँ जब्त करने और संपादक यानी मुझे गिरफ्तार करने की अधिसूचना जारी करने का अनुरोध था। अधिसूचना फौरन जारी कर दी गई और इसे श्री पॉल ने गृह मंत्रालय से भी जारी करवा दिया। 


मेरे जिस लेख पर मुस्लिम भावनाएँ भड़कने वाली थीं, उसके तीन पैरे भी लगे हाथ पढ़ लीजिए। मैने लिखा था- हाल ही में पैगंबर हजरत मोहम्मद जो इस्लाम के संस्थापक हैं, के डेनमार्क में कार्टून प्रकाशित होने पर बहुत हंगामा और बहुत जुलूस निकले। इस अखबार ने इसके पहले जीसस क्राइस्ड के कार्टून छापने से इंकार कर दिया था क्योंकि उसकी राय में यह आपत्तिजनक हैं। 


इसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का बयान आया जिसमें कहा गया कि वे डेनमार्क के साथ है और यूरोप तथा अमेरिका मे रहने वाले सभी इस्लाम धर्म के अनुयायियों को स्थानीय जीवन शैली और रिवाज मानने पड़ेंगे। सिर्फ इस बयान से जाहिर हो जाता है कि अमेरिका के असली इरादे क्या है? अमेरिका अपने स्वंयभू बुद्विजीवियों की मदद से संस्कृतियों के टकराव का सिद्वांत प्रचारित करने में लगा हुआ है और इस तरह के बयानाें के बाद किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए कि और भी जगह चिंगारिया भड़के। तथ्य यह है कि धर्म का मूल प्रश्न तेल और जमीन के मामले से हट कर अब धर्म के मूल आधार का माखौल उड़ाने पर आ कर
टिक गया है और स्वाभाविक है इस्लामी शक्तियां इसे पसंद नहीं करेगी। यह ठीक है कि किसी भी धर्म की महानता इस बात में निहित है कि वह मजाक को कितना सहन कर सकता है मगर यदि कोई धर्म या उसके अनुयायी इसे मंजूर नहीं करते तो उन्हें अपने रास्ते छोड़ देना चाहिए। 


यह वह लेख था जिसे इस्लामी भावनाए आहत करने वाला बताया जा रहा था। रातों रात मुझे गिरफ्तार किया गया, रात को तीन बजे तक पूछताछ की गई। पूछा गया कि डेनमार्क वाला यह कार्टून कितने में और कहां से खरीदा था? पूछने वाले एक पढ़े लिखे आईपीएस अधिकारी थे जिन्हें पता था कि इंटरनेट पर चार बटन दबाने से सारे कार्टून सामने आ जाते हैं और इन पर कोई कॉपीराइट नहीं है। मगर साहब तो बड़े साहब यानी के के पॉल का हुक्म बजा रहे थे और पॉल इसलिए दुखी थे क्योंकि हमने उनके वकील बेटे को दिल्ली पुलिस द्वारा वांछित तमाम अभियुक्तों को अदालत में बचाते और औकात से कई गुनी ज्यादा फीस वसूलते पकड़ लिया था।


तिहाड़ जेल में बारह दिन बंद रहने के बाद जमानत मिली और जमानत के आदेश में एक एक पैरा पर टिप्पणी की गई थी कि इससे कोई मुस्लिम भावना आहत नहीं होती। मगर पॉल तब भी दिल्ली पुलिस के आयुक्त थे और उनके आदेश पर जमानत रद्द करने की अपील की गई जो अब भी चल रही है। दिलचस्प बात यह है कि एफआईआर लिखवाने के लिए भी के के पॉल दो मुस्लिम हवलदारों को ले कर आए। अदालत में कहा गया कि इस लेख पर दंगा हो सकता है इसलिए अभियुक्त यानी मुझे सीधे तिहाड़ जेल भेज दिया जाए। यह सब गृह मंत्री शिवराज पाटिल की जानकारी में हो रहा था और यह बात खुद पाटिल ने बहुत बाद में अपने घर मेरे सामने स्वीकार की। संसद में सवाल किया गया मगर कोई जवाब नहीं मिला। कई पेशियाँ  हो चुकी हैं। एक सीधे सपाट मामले में चौदह जाँच अधिकारी बदले जा चुके हैं। जो चार्ज शीट दाखिल की गई है उसे अदालत ने बहस के लायक नहीं समझा। सबसे गंभीर धारा 295 उच्च न्यायालय ने पाया कि इस मामले में लागू ही नहीं होती। मगर मामला चल रहा है। 


मकबूल फिदा हुसैन के खिलाफ बहुत सारे मामले इन्हीं धाराओं में चले और खारिज होते रहे। हुसैन का बहुत
नाम हैं और उनका एक दस्तखत लाखों में बिकता है। मगर निचली से ले कर उच्च न्यायालय तक अब तक लाखों रुपए मैं अदालती ताम झाम में खर्च कर चुका हूँ । अब तो उच्च न्यायालय ने उस मामले को जिसमें मेरी गिरफ्तारी इतनी अनिवार्य मानी गई थी, साधारण सूची में डाल दिया है जिसमें तारीख दस साल बाद भी पड़ सकती है। आप ही बताए कि भारत की न्याय प्रक्रिया में मेरा विश्वास क्यों कायम रह जाना चाहिए? अभी तक तो कायम हैं लेकिन न्याय के नाम पर सत्ता और प्रतिष्ठान जिस तरह की दादागीरी करते हैं उसी से आहत और  हताश हो कर लोग अपराधी बन जाते हैं। 


दिलचस्प बात यह भी है कि मुझ पर इस्लाम के खिलाफ मामला भड़काने का आरोप लगा था। फिर भी तिहाड़ जेल में मुझे उस हाई सिक्योरिटी हिस्से में रखा गया जहाँ जैश ए मोहम्मद और लश्कर ए तैयबा के खूंखार आतंकवादी भी मौजूद थे। ईमानदारी से कहे तो आतंकवाद के आरोप में बंद ये लोग पुलिस से ज्यादा इंसानियत बरतते नजर आए और उन्होंने बहुत गौर से मेरी बात सुनी और अपने साथ बिठा कर खाना खिलाया। फिर भी भारत सरकार का मैं अभियुक्त हूँ । उस सरकार का जो उस संविधान से चलती हैं जहाँ  अभिव्यक्ति की आजादी और न्याय नागरिक का मूल अधिकार है।

आलोक तोमर 

प्रभाष जी के आत्मा को भगवान कभी शांति नहीं दे।








 प्रभाष जी के आत्मा को भगवान कभी शांति नहीं दे



आलोक तोमर
प्रभाष जोशी चले गए। उनकी अस्थियाँ भी उस नर्मदा में विसर्जित हो गई जिस वे हमेशा माँ कहते थे और अक्सर नर्मदा को याद कर के इतने भावुक हो जाते थे कि गला भर आता था। इन दिनों हमारे प्रभाष जी को ले कर संवेदनाओं के

प्रभाष जोशी के न होने का अर्थ



प्रभाष जोशी के बिना पहला एक दिन




"कोई हरकत नहीं है पंडित"। किसी बात को हवा में उड़ा देने के लिए हमारे प्रभाष जी का यह प्रिय वाक्य था। फिर कहते थे "अपने को क्या फर्क पड़ता है'। अभी एक डेढ़ महीने पहले तक इंटरनेट के बहुत सारे ब्लॉगों और आधी अधूरी वेबसाइटों पर प्रभाष जी को ब्राह्मणवादी, कर्मकांडी, रूढ़िवादी और कुल मिला कर पतित पत्रकार साबित करने की प्रतियोगिता चल रही थी। मैंने जितनी हैसियत थी उसका जवाब दिया और फिर उनके खिलाफ लिखे गए लेखों और अपने जवाब की प्रति उनको भेजी तो उन्होंने फोन कर के यही कहा था।

अभी न होगा मेरा अंत




प्रभाष जोशी- एक युग का अवसान


 


गुरुवार की रात और रातों जैसी नहीं थी। इस रात जो हुआ उसके बाद आने वाली कोई भी रात अब वैसे नहीं हो पाएगी। रात एक बजे के कुछ बाद फोन बजा और दूसरी ओर से एक मित्र ने कहा, बल्कि पूछा कि प्रभाष जी के बारे में पता है?आम तौर पर इस तरह के सवाल रात के इतनी देर में, जिस मकसद से किए जाते हैं वह जाहिर होता है। मित्र ने कहा कि प्रभाष जी को दिल का दौरा पड़ा और वे नहीं रहे।



काफी देर तो यह बात मन में समाने में लग गई कि प्रभाष जी अतीत हो गए हैं। अभी तीन दिन पहले तो उन्हें स्टूडियो में बुलाने के लिए फोन किया था तो पता चला था कि वे पटना जा रहे हैं- जसवंत सिंह की किताब का उर्दू संस्करण लोकार्पित करने। पटना से वे कार से वाराणसी आए और कृष्णमूर्ति फाउंडेशन में रूके। वहाँ से हमारे मित्र और मूलत: वाराणसी वासी हेमंत शर्मा को फोन किया और कहा कि गेस्ट हाउस में अच्छा नहीं लग रहा। हेमंत ने गाड़ी भेज कर उन्हें घर बुला लिया। घर पर उन्हें इतना अच्छा लगा कि एक दिन और रूक गए। इसके बाद लखनऊ मे गोष्ठी थी। हिंद स्वराज को ले कर, उसमें भी गोविंदाचार्य के साथ कार से गए। वहाँ से जहाज से दिल्ली लौटे थे और बहुत थके हुए थे।




मेरे गुरु प्रभाष जोशी क्रिकेट के दीवाने थे। इतने दीवाने कि क्रिकेट के महापंडित भी कहते थे कि अगर पेशेवर क्रिकेट खेलते तो भारत की टीम तक जरूर पहुँच जाते। क्रिकेट का कोई महत्वपूर्ण मैच चल रहा हो तो प्रभाष जोशी को फोन करना अपनी आफत बुलाने जैसा था। गुरुवार की रात भी क्रिकेट का मैच ही था और भारत आस्ट्रेलिया से सीरीज छीनने के लिए खेल रहा था। सचिन तेंदुलकर ने वनडे क्रिकेट में 17000 रन का रिकॉर्ड बना लिया था और प्रभाष जी उत्साहित थे मगर तभी विकेट गिरने शुरू हो गए और भारत हार की ओर बढ़ने लगा। प्रभाष जी बेचैन हुए। ब्लड प्रेशर की गोली खाई। टीम हार गई तो बेचैनी और बढ़ी और आखिरकार और दवाई लेने से भी लाभ नहीं हुआ तो बेटा संदीप उन्हें पास में गाजियाबाद के नरेंद्र देव अस्पताल में ले गया। मगर वहां तक पहुँचते पहुँचते काया शांत हो चुकी थी। प्रभाष जी के प्रिय, कुमार गंधर्व के गाए निगुर्णी भजन से शब्द उधार लें तो हंस अकेला उड़ गया था।



प्रभाष जी के सारे प्रिय जन एक एक कर के संसार से जा रहे थे और प्रभाष जी हर बार उन पर रुला देने वाला लेख लिखते थे। सिर्फ एक बार रामनाथ गोयनका के निधन पर उनका लेख नहीं आया और जब पूछा तो उन्होंने कहा कि मेरे मन में अब तक समाया नहीं हैं कि आरएमजी नहीं रहे। उनके हर लेख में एक तरह का आत्मधिक्कार होता था कि सब जा रहे हैं तो मैं क्यों जिंदा हूँ। बार बार यह पढ़ कर जब आपत्ति का एक पत्र लिखा तो उन्होंने बाकायदा कागद कारे नाम के अपने कॉलम में इसका जवाब दिया और कहा कि राजेंद्र माथुर, राहुल बारपुते, शरद जोशी, कुमार गंधर्व और सगे छोटे भाई की मौत में मुझे अपना एक हिस्सा मरता दिखता है और जो प्रतीत होता है वही मैं लिखता हूँ।



प्रभाष जी के कई चेहरे थे। एक क्रिकेट को भीतर से / बाहर से जानने वाला और कपिल देव को देवीलाल से पहली बार दो लाख रुपए का इनाम दिलवाने वाला, कपिल, सचिन, अजहर, गावस्कर, विशन सिंह बेदी से दोस्ती के बावजूद रणजी और काउंटी खेल चुके बेटे संदीप को भारत की टीम में शामिल करने की सिफारिश नहीं करने वाला, एक्सप्रेस समूह की प्रधान संपादकी ठुकरा कर जनसत्ता निकालने वाला, जनसत्ता को समकालीन पत्रकारिता का चमत्कार बना देने वाला, सरोकारों के लिए लड़ने वाला, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी से दोस्ती के बावजूद उनकी धर्म ध्वजा छीनने वाला, कुमार गंधर्व के भजनो में डूबने वाला, अपने हाथ से दाल वाफले बना कर दावत देने वाला, पूरे देश में घूम कर पत्रकारिता में आई खोटों के खिलाफ अलख जगाने वाला, जय प्रकाश आंदोलन में शामिल होने वाला और उसके भी पहले बिनोवा भावे के भूदान आंदोलन में घूम घूम कर रिपोर्टिंग करने वाला, हाई स्कूल के बाद पढ़ाई बंद करने के बावजूद लंदन के एक बड़े अखबार में काम करने वाला, धोती कुर्ता से ले कर तीन पीस का सूट पहन कर खाटी ब्रिटिश उच्चारण में अंग्रेजी और शुद्व संस्कृत में गीता के श्लोक समझाने वाला, प्रधान संपादक होते हुए डेस्क पर सब एडिटर बन कर बैठ जाने वाला, अनवरत यात्रा करने वाला, एक्सप्रेस समूह के मालिक को पत्रकारिता की आचार संहिता याद दिलाने वाला और सबसे अलग घर परिवार वाला एक चेहरा जिसमें यह भी शामिल है कि मेरे लिए लड़की माँगने लड़की वालों के घर वे पत्नी के साथ मिठाई का डिब्बा ले कर खुद पहुँचे थे।



प्रभाष जी के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है और बहुत कुछ खुद उन्होंने लिखा है। लेकिन आदि सत्य यह है कि हिंदी पत्रकारिता के ऋषि कुल के वे आखिरी संपादक थे। संपादक और सफल संपादक अब भी हैं मगर अब प्रभाष जोशी कोई नहीं है। प्रभाष जी की माँ अभी हैं और कल्पना कर के कलेजा दहलता है कि अपने यशस्वी बेटे की देह को वे देखेंगी तो कैसा लगेगा? याद आता है कि कागद कारे कॉलम कभी स्थगित नहीं हुआ। याद यह भी आता है कि बांबे हास्पीटल में ऑपरेशन के बाद प्रभाष जी इंटेसिव केयर यूनिट से बाहर आए थे और डॉक्टरों के लाख विरोध के बावजूद बोल कर मुझसे अपना कॉलम लिखवाया था। उस कॉलम में उन्होंने निराला की पक्ति लिखवाई थी- अभी न होगा मेरा अंत। आज वह पक्तिं याद आ रही है।



प्रभाष जी का जाना एक युग का अवसान है। एक ऐसा युग जहाँ सरोकार पहले आते थे और बाकी सब बाद में। उनके सिखाए पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी हैं और बड़े बड़े पदों पर बैठी है। उनमें से ज्यादातर को प्रभाष जी के दीक्षा में मिले संस्कार और सरोकार याद हैं। तिहत्तर साल की उम्र बहुत होती है लेकिन बहुत ज्यादा भी नहीं होती। प्रभाष जी कहते थे कि वे गांधीवाद पर एक किताब लिखना चाहते हैं और एक और किताब भारत की समकालीन राजनीति के विरोधाभासों पर लिखना चाहते हैं। काल ने उन्हें इसका अवसर नहीं दिया।



लिखना प्रभाष जी का शौक नहीं था। शानदार हिंदी और शानदार अंग्रेजी लिखने वाले प्रभाष जी ने सरोकारो की पत्रकारिता की और कई बार ऐसा भी हुआ कि सरोकार आगे चले गए और पत्रकारिता पीछे रह गई। जनसत्ता के प्रभाव के कम होने की एक वजह यह भी थी कि प्रभाष जोशी का ज्यादातर समय विश्वनाथ प्रताप सिंह की तथाकथित गैर कांग्रेसी सरकार बनाने में लग रहा था और वे कभी देवीलाल तो कभी चंद्रशेखर तो कभी अटल बिहारी वाजपेयी को साधने में जुटे हुए थे।



प्रभाष जी जैसा अब कोई नहीं है। ईश्वर करे कि मेरा यह विश्वास गलत हो कि उन जैसा कोई और नहीं होगा। लेकिन प्रभाष जोशी बनने के लिए कलेजा चाहिए। घर फूँक कर निकलने की हिम्मत चाहिए। जो सच है उस पर अड़े रहने की जिद चाहिए। इससे भी बड़ी बात यह है कि प्रभाष जी ने हिंदी पत्रकारिता को भाषा के जो संस्कार दिए, एक नया व्याकरण दिया और सबसे आगे बढ़ कर पत्रकारिता की प्रतिष्ठा से कोई समझौता नहीं होने दिया। वैसा करने वाला फिलहाल कोई नजर नहीं आता। बहुत पहले प्रभाष जी के साठ साल पूरे होने पर राहुल देव और मैंने एक किताब संपादित की थी और उसके आखिरी वाक्य से यहाँ विराम देना चाहूँगा। मैंने लिखा था कि प्रभाष जी समुद्र थे और उन्होंने खुल कर रत्न बाँटे मगर मैं ही अंजुरी बटोर कर उन्हें समेट नहीं पाया।
- आलोक तोमर

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प्रभाषजी, आप समुद्र थे, हैं, रहेंगे

प्रभाषजी, आप समुद्र थे, हैं, रहेंगे

आलोक तोमर



फिराक गोरखपुरी के शेर को अगर थोड़ा सा मोड़ कर कहा जाय तो मै यह कहूँगा कि ''आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी, हम असरों, जब तुम उनसे जिक्र करोगे कि तुमने प्रभाष को देखा था।'' हमारी पीढ़ी इस मामले में सौभाग्य से भी दो कदम आगे है कि हममे से ज्यादातर ने इस और बीती हुई शताब्दी के सबसे बड़े संपादकों राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जी को देखा है और कई ने उनके साथ काम भी किया है। प्रभाष जोशी बहत्तर के हो गये, मगर मुझे चालीस पार के वे ही प्रभाष जी याद हैं जो दीवानों की तरह जनसत्ता निकाल रहे थे। वे हम बच्चों को सिखाते भी थे और करके दिखाते भी थे। संपादक जी कब समाचार डेस्क पर उप-संपादक बनकर बैठे हैं, कब प्रूफ पढ़ रहे हैं, कब संपादकीय लिख रहे हैं, कब प्रधानमंत्री के घर भोजन करके आ रहे हैं और कब देवीलालों और विश्वनाथ प्रताप सिंहों को हड़का रहे हैं कि अपनी राजनीति सुधार लो।




हर वक्त कभी न कभी ऐसा होता ही रहता था। लिखावट ऐसी जैसे मोती जड़े हों। आज भी कोई फर्क नहीं आया। अब अगर आपको ये बताया जाए कि एक बार फेल होकर मेट्रिक के आगे नहीं पढ़ने वाले प्रभाष जोशी भरी जवानी में लंदन के बड़े अखबारों में काम कर आये थे और इसके पहले इंदौर के चार पन्ने के नई दुनिया में संत बिनोवा भावे के साथ भूदान यात्रा में शामिल भी रहे थे और इस भूदान यात्रा की डायरी से ही नई दुनिया से उन्होंने पत्रकारिता शुरू की थी तो आप चाहें तो मुग्ध हो सकते हैं या स्तब्ध हो सकते हैं। प्रभाष जी दोनों कलाओं में माहिर हैं। लिख्खाड़ इतने कि चार पन्नों का अखबार अकेले निकाल दिया और घर जाकर कविताएँ लिखीं।



सर्वोदय के संसर्ग से जिंदगी शुरू की थी और जिंदगी के साथ जितने प्रयोग प्रभाष जोशी ने किए उतने तो शायद महात्मा गांधी ने भी नहीं किए होंगे। जन्म हुआ आष्टा में जो तब उस सीहोर जिले में आता था जिसमें तब भोपाल भी आता था। पढ़ाई छोड़ी और माता पिता जाहिर है कि दुखी हुए मगर प्रभाष जी बच्चों को पढ़ाने सुनवानी महाकाल नाम के गाँव में चले गये। वहाँ सुबह सुबह वे बच्चों के साथ पूरे गाँव की झाड़ू लगाया करते थे और खुद याद करते हैं कि खुद चक्की पर अपना अनाज पीसते थे। गाँव की कई औरतें भी अनाज रख देती थीं, उसे भी पीस देते थे। राजनैतिक लोगों को लगने लगा कि बंदा चुनाव क्षेत्र बना रहा है। मगर प्रभाष जी पत्रकारिता के लिए बने थे। यहाँ यह याद दिलाना जरुरी है कि संत बिनोवा भावे के सामने चंबल के डाकुओं ने पहली बार जो आत्मसमर्पण 1960 में किया था उसके सहयोगी कर्ताओं में से प्रभाष जी भी थे और हमारे समय के सबसे सरल लोगों में से एक अनुपम मिश्र भी।



प्रभाष जी इंदौर से निकले और दिल्ली आ गये और गाँधी शांति प्रतिष्ठान में काम करने लगे। एक पत्रिका निकलती थी सर्वोदय उसमें लगातार लिखते थे। गाँधी शांति प्रतिष्ठान के सामने गाँधी निधि के एक मकान में रहते थे। रामनाथ गोयनका खुद घर पर उन्हे बुलाने आये। प्रभाष जी ने उन्हे साफ कह दिया कि वे बँधने वाले आदमी नहीं हैं। मगर रामनाथ गोयनका भी बाँधने वाले लोगों में से नहीं थे । वे अपनाने वाले लोगों में से थे। प्रभाष जोशी और रामनाथ गोयनका ने एक दूसरे को अपनाया और सबसे पहले प्रजानीति नामक साप्ताहिक निकाला और फिर जब आपातकाल का टंटा हो गया तो आसपास नाम की एक फिल्मी पत्रिका भी निकाली। क्रिकेट के उनके दीवानेपन के बारे में तो खैर सभी जानते ही हैं । वे जब टीवी पर क्रिकेट देख रहे हों तो आदमी क्रिकेट देखना भूल जाता है। फिर तो प्रभाष जी की अदाएँ देखने वाली होती है। बालिंग कोई कर रहा है, हवा में हाथ प्रभाष जी का घूम रहा है। बैटिंग कोई कर रहा है और प्रभाष जी खड़े होकर बैट की पोजीशन बना रहे हैं। कई विश्वकप खुद भी कवर करने गये। कुमार गंधर्व जैसे कालजयी शास्त्रीय गायक से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक से दोस्ती रखने वाले प्रभाष जोशी के सामाजिक और वैचारिक सरोकार बहुत जबरदस्त हैं औऱ उनमें वे कभी कोई समझौता नहीं करते। जनसत्ता का कबाड़ा ही इसलिए हुआ कि प्रभाष जी उस पाखंडी कांग्रेसी विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकार बनाने में जुटे हुए थे। इसके पहले जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में शरीक थे और जे पी जिन लोगों पर सबसे ज्यादा भरोसा करते थे उनमें से एक हमारे प्रभाष जी थे।




प्रभाष जी ने जिंदगी भी आंदोलन की तर्ज पर जी। आखिर अपना वेतन बढ़ने पर शर्मिंदा होने वाले और विरोध करने वाले कितने लोग होंगे। जिस जमाने में दक्षिण दिल्ली और निजामुद्दीन में रहने के लिए पत्रकारों में होड़ मचती थी उन दिनों उन्हे भी किसी अभिजात इलाके में रहने के लिए कहा गया मगर वे जिंदगी भर यमुना पार रहे और अब तो गाजियाबाद जिले में घर बना लिया है। आष्टा से इंदौर होते हुए गाजियाबाद का ये सफर काफी दिलचस्प है। मगर जो आदमी भोपाल जाकर सिर्फ वायदों के भरोसे दैनिक अखबार निकाल सकता है और वहाँ खबर लाने वाले चपरासी का नाम पहले पन्ने पर संवाददाता के तौर पर दे सकता है और अखबार बंद न हो जाय इसलिए अपनी मोटरसाइकिल बेच सकता है, पत्नी के गहने गिरवी रख सकता है वह कुछ भी कर सकता है। लेकिन ऐसे लोग कम होते हैं। सब प्रभाष जोशी नहीं होते जो जिसे सही समझते हैं उसके लिए अपने आपको दाँव पर लगा देते हैं। यह उनकी चकित करने वाली विनम्रता है कि वे कहते हैं कि दिल्ली में आकर वे कपास ही ओटते रहे। यही उनकी प्रस्तावित आत्मकथा का नाम भी है। हिंदी पत्रकारिता का इतिहास दूसरे ढ़ंग से लिखा जाता अगर प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर और उनके बाद की पीढ़ी में उदयन शर्मा और सुरेंद्र प्रताप सिंह पैदा नहीं हुए होते ।



ये प्रभाष जी का ही कलेजा हो सकता है कि पत्रकारिता में सेठों की सत्ता पूरे तौर पर स्थापित हो जाने के बाद भी वे मूल्यों की बात करते हैं और डंके की चोट पर करते हैं। अखबार मालिक या संपादक दलाली करें, पैसे लेकर खबरें छापे ये सारा जीवन सायास अकिंचन रहने वाले प्रभाष जी को मंजूर नहीं। इसके लिए वे दंड लेकर सत्याग्रह करने को तैयार हैं और कर भी रहे हैं। इन दलालों में से कुछ नये प्रभाष जी की नीयत पर सवाल उठाया है लेकिन वे बेचारे यह नहीं जानते कि प्रभाष जी राजमार्ग पर चलने वाले लोगों में से नहीं हैं और बीहड़ों में से रास्ता निकालते हैं। उन्होने सरोकार को थामकर रखा है और जब सरकारें उन्हे नहीं रोक पायी तो सरकार से लाइसेंस पाने वाले अखबार मालिक और उनके दलाल क्या रोकेंगे।



आखिर में प्रभाष जी को जन्मदिन की बधाई के साथ याद दिलाना है कि आप समुद्र थे, समुद्र हैं लेकिन अपन जैसे लोगों की अंजुरी में जितना आपका आशीष समाया उसी की शक्ति पर जिंदा हूँ ।





प्रभाषजी, आपने तो 'बिगाड़' दिया था!

सुमंत भट्टाचार्य


मैं शायद प्रभाष जोशी जी की छौनों वाली टीम का हिस्सा था। पहली मुलाकात उनसे कलकत्ता (अब कोलकाता) के ताज बंगाल होटेल में हुई। जनसत्ता कोलकाता के लिए मुझे चुन लिया था और नियुक्ति पत्र देने वाले थे। ना तो प्रभाषजी के सहयोगी रामबाबूजी के पास टंकण सुविधा थी और ना ही प्रभाषजी ने कभी लेखन की इस आधुनिक कारीगरी का इस्तेमाल किया। तब लैपटॉप भी दूर की चीज थे, प्रभाष जी के लिए तो शायद आज भी है। बोले, भैया नियुक्ति पत्र कहां से दूँ? मैं बोला कि ताज होटेल के इसी लेटरहेड पर लिख कर दे दीजिए। सलाह पसंद आ गई और 3300 रुपए में जनसत्ता कोलकाता में उप संपादक पद पर काम करने का हुक्म दे दिया। सन 1991 की बात है यह। वह नियुक्ति पत्र आज भी मेरे पास सुरक्षित रखा है प्रभाषजी। एक धरोहर की तरह। एक और चीज है मेरे पास, बाद में बताऊँगा।



अखबार की लांचिंग के कुछ रोज पहले फिर कोलकाता आए और किसी काम से इंडियन एक्सप्रेस के अशोक रोड वाले गेस्ट हाउस तक अपनी गाड़ी में साथ ले गए। पता नहीं क्यों पहले ही दिन से प्रभाषजी के करीब पहुँच कर लगा ही नहीं कि देश के इतने बड़े संपादक हैं। मुझे तो हमेशा लगा कि इनके पास जो चाहे बतिया लीजिए, खुद ही छान कर काम का निकाल लेंगे, बकिया फेंक देंगे। ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं।



रास्ते में प्रभाष जी ने पूछा, और भैया कैसा काम चल रहा है? सर्तक होते हुए मैं बोला, ठीक-ठाक। थोड़ा गौर से मेरा चेहरा देखा और दूसरा सवाल फेंका, लोग ठीक से काम कर रहे हैं ना? और चौकन्ना हुआ, जवाब दिया, मैं कैसे बता सकता हूं, मैं तो सबसे नीचे वाली पायदान का चोबदार हूँ। मुझे लगा कि जासूसी करा रहे हैं। उस दिन पत्रकारिता का पहला सबक सीखा, एक संपादक को कैसा होना चाहिए। प्रभाषजी मेरे मन की संशय को ताड़ गए। बोले,,।भैया मेरे पूछने का मतलब है कि लोग मन लगा कर काम कर रहे हैं ना। फिर बोले देखो भैया, अपन तो एक चीज जानते हैं, बस आदमी सही होना चाहिए...पत्रकार तो संपादक बना लेता है। फिर एक अच्छे संपादक के एक और गुर को पेश किया पलथी मार कर बैठे प्रभाषजी ने। हम दोनों के बीच एक गाव तकिया था, सफेद कपड़े से ढका। उस पर धौल मार प्रभाषजी बोले, देखों भैया, हम तो एक बार जोड़ते हैं, छोड़ते कभी नहीं। पूछा, ऐसा क्यों? प्रभाषजी बोले, हम इतना बिगाड़ देते हैं कि कहीं जाने लायक नहीं रहता। तब नहीं समझा था प्रभाषजी, बाद में जब जनसत्ता से बाहर आया तो समझ में आया, वाकई कितना बिगाड़ दिया था आपने। कहीं का नहीं छोड़ा। जनसत्ता में मेरे पहले की पीढ़ी तो बेहतरीन उदाहरण हैं। सोच के एक नाम बताइए। प्रभाषजी के जनसत्ता से निकला एक भी शख्स बाहर किसी दूसरे अखबार में फिट हो पाया हो? आलोक भाई (तोमर), सुशील भाई (सुशील कुमार सिंह) दुरुस्त हूँ ना मैं? यह क्या दंभ था या एक संपादक का खुद पर विश्वास? यकीकन विश्वास। प्रभाषजी के साथ मेरी स्मृतियाँ टुकड़ों में हैं। पर इन सभी में एक अंतर्संबंध पाता हूँ । जो कुछ भी उनसे सीखा, गाँठ बांधी, उनसे भोगा ज्यादा पाया कम।



जनसत्ता में शायद ही किसी संवाददाता की खबर रुकी हो। बस तथ्यों के लिहाज से दुरुस्त होना चाहिए। सन 1996 में जब दिल्ली जनसत्ता में आया तो लगा, हर कोई हाँका लगा रहा है। सब्जी मंडी सरीखा माहौल। धीरे-धीरे समझ में आया, यहाँ हांके का नहीं, निथारने का शोर है। हर किसी को अपनी बात करने की बेलगाम आजादी। चाहे अभय भाई (अभय दुबे) से भिड़ लीजिए या फिर अपने मित्र संजय सिंह (अब अनुवाद कम्युनिकेशन वाले) से देर तक बहसिया लें। पर जो भी कहें, तथ्यों के साथ कहें। विरोध में एक तर्क हो। जनसत्ता में जब तक रहा, पीछे छूटे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दिनों की कमी नहीं महसूस की।



दिल्ली जनसत्ता में रात में श्रीशजी (श्रीश मिश्र) प्रभाषजी का हाथ का लिखा कागद कारे थमा दिया करते थे और कहते थे संपादित कर लो। मेरी औकात! प्रभाषजी के लिखे का संपादन करुँ। एक बार कुछ हो ही गया। रात को डेढ़ बजे थे प्रभाषजी का कागद कारे टाइप होकर आया। नीचे अभय भाई संस्करण निकलवा रहे थे। श्रीशजी ने कहा, पढ़ लो। पढ़ने लगा तो पाया कि प्रभाषजी ने हर जगह त्योहार को त्यौहार लिख रखा है। श्रीश जी से पूछा तो मुस्करा (बहुत साजिश वाली मुस्कराहट होती है श्रीश जी आपकी) बोले, बुढ़ऊ (प्रभाष जी के लिए दुलार वाला संबोधन था यह जनसत्ता के साथियों के बीच) को फोन कर लो। ताव में आकर मैंने भी फोन लगा दिया, रात डेढ़ बजे भी फोन प्रभाषजी ने फोन उठाया। आवाज में दिन वाली ताजगी। कहीं कोई खीज नहीं। बोले, हाँ भैया बोलो। मैं बोला, सर आपके कागद कारे में त्योहार की जगह त्यौहार लिखा है। उधर से आवाज आई, तो भैया होता क्या है? एक क्षण के लिए लगा, बुढऊ खींच रहे हैं। मैं बोला, जहाँ तक मैं जानता हूं त्योहार होता है, त्यौहार नहीं। साथ में नए मुल्ले की तरह दलील दी, फादर (कामिल बुल्के) में भी यही लिखा है। इस पर प्रभाषजी ने जो कहा, उस समय तो उनकी बात घर वाली बात लगी पर वक्त के साथ समझ में आया किस हिमालय के साथ हमने काम किया है। प्रभाष जी आप घर के बुढ़ऊ थे हम सब के लिए। इस जीवन में अब तक तो दूसरे प्रभाषजी नहीं मिले। प्रभाषजी बोले, भैया रात का संस्करण जो निकालता है वही संपादक होता है, अपन तो कल 11 बजे संपादक होंगे। अभी तो हमें भी अपना संवाददाता या कॉलम लिखने वाला समझो। मैंने त्यौहार को त्योहार कर दिया। दूसरे दिन प्रभाषजी कुछ नहीं बोले। उनकी चुप्पी को अपनी भारी जीत समझी मैंने। बहुत बाद में समझा, यह तो प्रभाषजी की अपनी मालवी शैली का लेखन था और कागद कारे उनका अपना स्थान था। और मैंने उनके घर में सेंध मारी थी। अब इस बात पर नहीं जाऊँगा कि आज का संपादक क्या करता इस पर।



बातें तो बहुत है प्रभाषजी पर एक बात जरूर कहना चाहूँगा। एक पूरी नस्ल को खराब कर दिया आपने। आपके बताए राह पर चला तो धकिआया गया। सुधरने की कोशिश कर रहा हूँ पर सुधरने की उम्मीद कम ही है। जयपुर में राजस्थान पत्रिका और मिड डे (मुंबई) का साझा दोपहर का अखबार न्यूज़ टुडे निकाला। मुख्यमंत्री वसुंधरा के खिलाफ दीन दयाल उपाध्याय ट्रस्ट में जमीन हड़पने की खबर हो या तिरंगा मुद्दा खड़ा कर आईपीएल चेयरमैन ललित मोदी के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी करवाने का मसला। आप की सीख पर चल 26 साल पुराने यूनिवर्सिटी के दोस्त राजेश्वर सिंह को नहीं छोड़ा, जो उस वक्त जयपुर के कलेक्टर थे। क्योंकि खबर रिपोर्टर लाया था। हर मुकाम पर जन को आगे रख सत्ता को ठोका। पर क्या हुआ, सत्ता और सत्ता में समझौता हुआ और अपन एक गैर दुनियादार संपादक करार दे बाहर कर दिए गए। यह दीगर है, इसमें मालिकों की कम बीच के लोगों की भूमिका ज्यादा रही। ऐसे लोगों की जो आपके सिपाहियों से सीधे टकराने की बजाय खाने में जहर मिलाकर मारने में यकीन रखते हैं। जहर मिलाने की यह कला आपने हमें क्यों नहीं सिखाई?



प्रभाषजी एक पूरी नस्ल खराब कर दी आपने, फिर भी आपसा कोई नहीं। आप शतायु हों। आपसे मिलूँ भले नहीं पर एकलव्य की तरह आपकी द्रोण प्रतिमा ही मेरे लिए प्रेरणा है।



हाँ, एक बात और। आपकी दी एक और चीज मेरे पास है। शादी के बाद जब मैं और सौम्या आपसे मिलने गए थे तो आपने बतौर आशीर्वाद पाँच सौ रुपए का नोट सौम्या के हाथों में थमाया था। आग्रह पर आपने लिखा था, पैसा हाथ का मैल है जो मिलाने से मिलता है, 15 जुलाई 1996, प्रभाष जोशी। इस नसीहत पर बढ़ा जा रहा हूँ । हाथ मिलाए जा रहा हूँ , पर पैसा है कि जमीन पर झरा जा रहा है। हाथ नहीं आ रहा है। यह भी आपकी ही सीख है ना?


यहीं हैं, यहीं कहीं हैं शैलेंद्र सिंह : आलोक तोमर





यहीं हैं, यहीं कहीं हैं शैलेंद्र सिंह

आलोक तोमर


अक्सर नोएडा में अपने टीवी चैनल सीएनईबी के दफ्तर जाते वक्त आम तौर पर यह संयोग होता ही था कि फोन बजे और दूसरी ओर से शैलेंद्र सिंह बोल रहे हो। पहले इधर उधर की बातें, फिर अपनी कोई ताजा कविता और आखिरकार टीवी चैनलों की दुनिया से हुआ मोहभंग, जिसका सार यह होता था कि कौन सी दुनिया में आ कर फँस गए?


शैलेंद्र सिंह से करीब बीस साल पहले मुलाकात हुई थी जब वे काम तलाशते हुए कनॉट प्लेस में शब्दार्थ फीचर एजेंसी के दफ्तर में आए थे। पतला दुबला लड़का और पतली आवाज। उन दिनों मैं अपराध का एक स्तंभ लिखता था वह उन्हें पढ़ने को दिया। अगले दिन शैलेंद्र प्रकट हुए और दो लेख लिख कर लाए थे और मेरे लेख का अंग्रेजी अनुवाद भी कर लाए थे। अंग्रेजी ऑक्सफोर्ड वाली नहीं थी मगर अच्छी थी। इसके बाद वे शब्दार्थ से जुड़े रहे और कहने में अटपटा लगता है लेकिन पाँच हजार रुपए महीने में काम करते रहे।


इसके बाद जब इंटरनेट प्रचलित हुआ तो डेटलाइन इंडिया की स्थापना की। शैलेंद्र वहाँ भी साथ थे और बहुत टटकी भाषा में बहुत जल्दी लेख और खबरें लिखते थे और मुझे याद है कि उन दिनों हमारे साथ काम कर रहे दीपक वाजपेयी से, जो अब एनडीटीवी में है, उनकी प्रतियोगिता चलती थी। दीपक की भी अंग्रेजी अच्छी है। दीपक कानपुर और शैलेंद्र बिहार के लहजे में अंग्रेजी बोलते थे।
फिर एक दिन शिद्वार्थ बसु के साथ तय हुआ कि अंग्रेजी के मशहूर कार्यक्रम हू विल वी दि मिलियनायर की तर्ज पर स्टार प्लस के लिए कार्यक्रम बनाया जाए। स्टार के तब के वाइस प्रेसीडेंट समीर नायर कार्यक्रम संचालक के तौर पर अमिताभ बच्चन को लेना चाहते थे। अमिताभ लिए भी गए और कौन बनेगा करोड़पति के नाम से इस कार्यक्रम ने इतिहास रच दिया। प्रश्न बनाने और पटकथा लिखने की टीम में शैलेंद्र फिर हमारे साथ थे। याद आता है कि मुंबई में स्टार की मास्टर पीस बिल्डिंग में रिहर्सल चल रही थी और फोटोग्राफर मौजूद था। मैने शैंलेद्र से कहा कि अमिताभ बच्चन के साथ फोटो खिंचवाने का ये अच्छा मौका है। शैलेंद्र का जवाब मुझे चकित कर गया। उसने कहा कि फोटो खिंचवा कर महान बनने से अच्छा है कि अपने फील्ड में ऐसा काम किया जाए अमिताभ बच्चन खुद हमारे साथ फोटो खिंचवाने आए।


वक्त की कमी और बार बार मुंबई जाने की असुविधा के कारण मैंने केबीसी छोड़ा और स्टार प्लस के लिए ही एनडीटीवी द्वारा बनाए गए कार्यक्रम जी मंत्री जी की पटकथा लिखने में जुट गया। शैंलेद्र केबीसी में बने रहे। इस बीच आज तक से बुलावा आया और कुछ महीनों के लिए मैं आज तक में था और शैलेंद्र रोज शाम को ऑफिस के रिसेप्शन पर मिलते थे कि उन्हें टीवी की पत्रकारिता करनी है। उदय शंकर से कह कर उनका इंटरव्यू हुआ और अपनी प्रतिभा के आधार पर ही वे आज तक में पहुंचे। उदय जब स्टार में गए तो शैलेंद्र को साथ ले गए। शैलेंद्र मुंबई में शायर बन गए। निदा फाजली जैसे बड़े लोगों के साथ उठने बैठने लगे। एक किताब भी उनकी आई। बाद में दूसरी भी आई।


शैलेंद्र बहुत भावुक और एक हद तक बात बात में रो पड़ने वाले इंसान थे। अपनी बेटी के जन्मदिन पर बुलाया और नहीं जा पाया तो रो पड़े। बेटे आयाम का नाम तय करने में देर लगा दी तो रो पड़े। जान लेने वाली इस दुर्घटना के पहले एक बार और गाड़ी ठोक ली थी और जब डाँट लगाई तो भी रो पड़े। अपने सरोकारों के प्रति जिद्दी इंसान इतना भावुक भी हो सकता है यह शैलेंद्र को देख कर ही जाना जा सकता है।


एक जमाने में होम टीवी हुआ करता था। उसके एक कार्यक्रम की पटकथा तो मैं लिखता था और फैक्स कर देता था लेकिन सेट पर भी एक लेखक चाहिए था तो शैलेंद्र को आजमाया और वे सफल हुए। जहाँ तक याद आता है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संसार से शैलेंद्र का यह पहला वास्ता था।


जैसा कि पहले कहा शैलेंद्र के फोन बहुत बेतुके और अकारण होते थे। आप बैठक में हैं, फोन नहीं उठा पा रहे मगर शैलेंद्र सिंह घंटी बजाते रहेंगे। आखिरकार आप जब फोन सुनेंगे तो वे कहेंगे कि भैया आपकी आवाज सुनने के लिए फोन किया था। आप ठीक तो है? जब राजदीप सरदेसाई शैलेंद्र को आईबीएन-7 में लाए तो लाख से ज्यादा वेतन की पर्ची ले कर उन्होंने मुझे इंडिया टीवी के बाहर बुलाया और कंपनी की ओर से मेरी स्विफ्ट कार भी गर्व से दिखाई। इसी कार ने आखिरकार उनकी जान ली।


मुझे अब तक समझ में नहीं आता कि शैलेंद्र इतने बेतुके काम क्यों करता था? उसके साथी बताते हैं कि रात साढ़े ग्यारह बजे का बुलेटिन प्रसारित होने के बाद अगले दिन का कार्यक्रम बनाते बनाते डेढ़ बज गए और दो बजे वे ऑफिस से निकले। घर गाजियाबाद के वैशाली में हैं मगर वैसे ही ठंडी हवा खाने के लिए वे एक्सप्रेस हाइवे पर मुड़ गए। उल्टी दिशा में। शराब वे इन दिनों नहीं पीते थे लेकिन जहाँ तक मुझे लगता है, पूरा दिन और सुबह तक काम करने के बाद शैलेंद्र को नींद का झोका आया होगा और उन्होंने एक खड़े ट्रक में गाड़ी घुसा दी। ये उनकी अंतिम यात्रा थी।


शैलेंद्र सिर्फ बयालीस साल के थे। इस बीच उन्होंने दो टीवी कार्यक्रमों और तीन चैनलों में काम किया। गजलों और कविताओं की दो किताबें लिख डालीं। गीता का अपनी तरफ से भाष्य कर डाला और उसे सुनाने के लिए वे बहुत उतावले थे, अक्सर फोन पर शुरू हो जाते थे और जैसा उनके साथ रिश्ता था, डाँट खा कर फोन बंद करते थे। आखिरी फोन मौत के दो दिन पहले आया था जिसमें उनका प्रस्ताव था कि मुंबई चल कर सीरियल और फिल्में मैं लिखूँ और उनमें गाना शैलेंद्र लिखेंगे। ऑफिस के गेट पर पहुँच चुका था इसलिए हाँ बोल कर फोन काट दिया। कमरे में पहुँचा तो फोन फिर बजा। शैलेंद्र ही थे और कह रहे थे कि भैया आप अपने आपको गंभीरता से नहीं लेते।


अगर शैलेंद्र आज होते तो मैं पूछता कि बेटा तुमने खुद अपने आपको गंभीरता से कहाँ लिया हैं? इतनी सारी प्रतिभा, काम के प्रति अनुशासन और मेहनत करने की अपार शक्ति के बावजूद अगर शैलेंद्र सिंह ने अपनी जिंदगी के साथ इतना बड़ा निर्णायक खिलवाड़ कर डाला तो वे सिर्फ अपने और हिंदी पत्रकारिता के नहीं, अपनी पत्नी, बेटे आयाम और बेटी आस्था के भी अपराधी है।


यह लिखने के ठीक बाद मैं शैलेंद्र की अंतिम क्रिया में निगमबोध घाट जाऊँगा और उस सपने को जलता हुआ देखूँगा जिसके एक बड़े हिस्से का साक्षी मैं भी रहा हूँ। शैलेंद्र सिंह का फोन नंबर अपने मोबाइल से डिलिट करने की मेरी हिम्मत नहीं है क्योंकि मेरे लिए शैलेंद्र यहीं है, यहीं कहीं हैं। पता नहीं कितने दिनों तक लगेगा कि फोन बजेगा और शैलेंद्र अपना कोई किस्सा कहानी सुनाने लगेगा। सपनों के भी कहीं अंत होते है?





आओ भाई घर घर खेलें



आओ भाई घर घर खेलें
-आलोक तोमर




आओ भाई घर घर खेलें
छोटा सा इक नीड़ बनाएँ
उसको मन से रचें,सजाएँ
खिड़की से आकाश दिखे औ'
रात को तारे घर में आएँ

एक
झोंपड़ी या कुछ कमरे
जो अब तक सपनों में ठहरे
उनको फिर से रचें -रचाएँ

आओ भाई घर घर खेलें
छोटा सा एक नीड़ बनाएँ


खलिहानों और दालानों में
सब आएँ और धूम मचाएँ
जिनका जीवन ठहर गया हो
वे भी मन की रस्म निभाएँ

काली आँखें, लाल बिन्दियाँ
खूब निहारें,खूब सँवारें
जिसमें सब कुछ अपना सा हो
ऐसा एक स्वयंवर खेलें
आओ भाई घर घर खेलें


करगिल, जो सिर्फ मुहावरा नहीं है (यात्रावृत्तांत ) : आलोक तोमर



(
यात्रावृत्तांत )



करगिल, जो सिर्फ मुहावरा नहीं है
आलोक तोमर




करगिल सिर्फ एक शहर का नाम या छोटी सी संज्ञा नही है। वैसे भी और 1999 के भारत-पाक युद्ध, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पता नहीं क्या सोच कर झगड़ा कहा था, के बाद करगिल का नाम लेते ही बोफर्स तोपों, सैनिकों की लाशों, नवाज शरीफ, परवेज मुशर्रफ और ओपरेशन विजय का नाम याद आ जाता है।



लेकिन यह बाद में। दुनिया के सबसे ऊँचे और संभवतः सबसे छोटे हवाई अड्डे पर जब आपका जहाज उतरता है, उसके पहले ही थकी हुई परिचालिकाएँ आपको याद दिला देती हैं कि यहाँ ऒक्सीजन का स्तर बहुत कम है और धीमी गति से चलिए और जितनी लंबी साँस ले सकते हैं, उतनी लीजिए। जहाँ आप ठहरते हैं, वहाँ के शुभचिंतक पूरे आठ घंटे तक सोने की सलाह देते हैं ताकि देह संसार की छत कहे जाने वाले इस इलाके से अच्छी तरह परिचित और अभ्यस्त हो सके।



लेह से करगिल का रास्ता काफी दूरी तक सिंधू नदी के किनारे चलता है और एक तरफ पहाड़ हैं और नीचे बहुत नीचे नदी बह रही है, जिसकी गति इतनी तेज है कि आवाज आप तक पहुँचती है। रास्ते में ढाबों और तिब्बती स्थानीय व्यंजनों के होटलों वाला एक बाजार आता है और उसके बाद सिर्फ ऒक्सीजन की कमी ही आपको दुखी नहीं करती। एक बहुत सँकरी सड़क पर लगातार आप ऊपर बढ़ते जाते हैं। पहाड़ का शिखर दिखाई पड़ता है और जब तक आप यह सोचे कि यह कितना ऊँचा होगा, तब तक आप इस पर होते हैं। फिर नीचे का सर्पित इलाका आपको समतल लगने वाले लेकिन लगभग उतनी ही ऊँचाई पर मौजूद गाँवों से होते हुए रास्ते के स्तूपों और कभी कभार दिखाई पड़ जाने वाली मस्जिदों वाले इलाकों में ले जाता है। बीच-बीच में बर्फ से पिघल कर आ रहे बने झरने आपको एकदम ठंडे और असली मिनिरल वाटर का स्वाद देते हैं और आगे जा कर लामा यारू गोंपा नाम का बौद्ध तीर्थ है, जहाँ आज के जमाने में भी डबल बैड का एक कमरा खाने के साथ दो सौ रुपए में मिल जाता है। लद्दाख की लोकल बीयर यानी छाँग पीना चाहें तो पच्चीस रुपए में एक पूरा जग प्लास्टिक वाला भर कर मिलता है। ठंडा करने की जरूरत नहीं क्योंकि दिन में भी मौसम दो या तीन डिग्री के आसपास होता है और रात में तो जून के महीने में भी दो मोटे कंबल ओढ़ कर सोना पड़ता है। प्रंसगवश लद्दाख ऐसा इलाका है, जहाँ अगर आपका सिर छाया में हो और पाँव धूप में तो पाँव झुलस जाएँगे और सिर ठंड पकड़ लेगा।



आगे आपकी मर्जी है कि बटालिक से होते हुए जाएँ या सीधे करगिल का पहाड़ी रास्ता पकड़ें। बटालिक से होते हुए जाने में लाभ यह है कि आप वे पहाडियाँ देख सकते है, जहाँ करगिल झगड़े के दौरान सबसे पहले चरवाहों की शक्ल में पाकिस्तानी सेना के घुसपैठियों को भारतीय चरवाहों ने पकड़ा था और इसी छावनी में खबर दी थी। यहाँ सिंध नदी पार करनी पड़ती है और वह भी एक झूलते हुए पुल से और जब तक यह हिंडोला खत्म नहीं हो जाता, तब तक बड़े-बड़े बहादुरों की साँस हलक में अटकी रहती है। चाहें जिस तरफ से जाएँ, पहाड़ से करगिल शहर बिछा हुआ दिखता है। एक लगभग नामालूम सा देहाती कस्बा, सिंध नदी जिसके किनारे से बह रही है और जिसके पार पाकिस्तान है। 1971 के युद्ध में भारत ने नदी के पार वाला इलाका भी जीत लिया था लेकिन रोते हुए जुल्फिकार अली भुट्टो को देख कर शिमला में इंदिरा गांधी का मन पसीज गया और यह हिस्सा उन्होंने पाकिस्तान को वापस कर दिया। तर्क समझ में नहीं आता। जब वह भी विवादित कश्मीर है तो उसे वापस करने की ऐसी क्या जल्दी आ पड़ी थी? दिलचस्प बात यह है कि सिंध नदी के पार जो करगिल है, वहाँ के लोग यहाँ के लोगों के लगातार संपर्क में रहते हैं और उन्होंने नदी पार करने के लिए बाँस के पुल बना रखे हैं। सेना के लोग कई बार आ कर इन पुलों को तोड़ जाते हैं लेकिन पुल नए सिरे से बन जाते हैं।



करगिल शहर में या उसे कस्बा कहिए, सबसे बड़ी मुसीबत शाकाहारी होना है। सड़क पर सरेआम बकरे और भेड़ की आंतों से बना हुआ कबाब बिकता है और लोगों की भीड़ लगी रहती है। उत्तर प्रदेश के जिला फर्रूखाबाद के एक भूतपूर्व फौजी की मेहरबानी है कि वह करगिल का एकमात्र शाकाहारी ढाबा चलाता है। इसके अलावा शहर के सबसे बड़े होटल सियाचिन में मिलने को शाही पनीर मिल जाता है लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं कि उसके अंदर से हड्डियाँ नहीं निकलेंगी। करगिल में एक डिग्री कॊलेज है और सुना है कि लेह की तरह दिल्ली पब्लिक स्कूल की शाखा भी खुलने वाली है। मगर जो शहर शुरू होने से पहले खत्म हो जाता है और जहाँ आधुनिकता का प्रतीक दुकानों में बिकते हुए डीवीडी प्लेयर और एयरटेल तथा बीएसएनएल के सिम कार्ड हैं, वहाँ इतने अभिजात स्कूल में पढ़ने कौन आएगा?



करगिल से द्रास गए बगैर न पर्यटन और न ज्ञान दोनों के हिसाब से यह यात्रा संपन्न नहीं होगी। करगिल की असली लड़ाई तो द्रास के पहाड़ों और मैदानों में हुई थी और क्योंकि जिला करगिल पड़ता है इसीलिए इसे करगिल युद्ध की संज्ञा दी गई थी। द्रास में टाइगर हिल के ठीक नीचे और थ्री पीमपल्स यानी तीन मुहाँसे के नाम से चर्चित पहाड़ियों की श्रृंखला की तलहटी में एक स्मारक उन शहीदों का बनाया गया है, जो इस पागलपन के दौर में शहीद हुए। 26 जुलाई को हर साल यहाँ विजय दिवस मनाया जाता है। इस स्मारक में काले पत्थर पर सुनहरे अक्षरों से उन शहीदों के नाम भी लिखे हैं, जिन्होंने अपनी जान गँवाई और एक पत्थर युवा शहीद बिजयेंद्र थापर के पिता के हाथ का भी लगाया हुआ है। अटपटा सिर्फ यह लगता है कि स्मारक चिन्ह के नाम पर बीयर के मग मिलते हैं, जिनमें एक तरफ तोलोलिंग पहाड़ का चित्र है और दूसरी ओर टाइगर हिल का। शहीदों के नाम पर लोग उनकी अंतिम स्थली के चित्रों के साथ बीयर पीएँ, यह कुछ समझ में नहीं आता।



करगिल पहुँचाने के लिए लेह ही एकमात्र रास्ता नहीं है। एक रास्ता श्रीनगर से सोनमर्ग होते हुए, जो-जिला दर्रे में से जाता है और सोलह किलोमीटर का यह इलाका इतना भयानक है कि वहाँ पहुँचते ही आप भगवान को याद करने लगेंगे। नीचे बहुत गहरी खाई और वह भी इतनी गहरी कि वहाँ से गिरे तो आप सीधे अमरनाथ के रास्ते में आने वाले उस बालटाल में गिरेंगे, जहाँ से अमरनाथ का रास्ता जाता है। गिरे तो हड्डियाँ भी नहीं मिलेंगी। लेकिन यह रास्ता भी खूब चलता है। जम्मू कश्मीर राज्य परिवहन की बसों से ले कर पर्यटकों की गाडियाँ लदी-फदी करगिल की ओर जाती हैं। करगिल, जो हमारा सामरिक तीर्थ है। चलते-चलते करगिल की संस्कृति के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि वहाँ एक ही दुकान पर दलाई लामा और सद्दाम हुसैन दोनों के फोटो लगे मिल जाएँगे। यह बौद्ध और शिया पंथ को मानने वाले लोगों का इलाका है।

पद्मश्री : नई दुनिया : अभय छजलानी : भाषायी(?) पत्रकारिता में हिंदी की भूमिका ?



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अभय
छजलानी की औ
कात क्या है?
- आलोक तोमर



बाबू लाभ चंद्र छजलानी गुजराती मूल के कारोबारी थे जो इंदौर आ कर बस गए थे। आजादी की लड़ाई में उन्होंने हिस्सा लिया और देश जब आजाद होने वाला ही था तो 1947 में अपने साथी बसंती लाल सेठिया के साथ मिल कर उन्होंने पहले साप्ताहिक और फिर दैनिक अखबार की शुरूआत की। नाम था नई दुनिया क्योंकि बाबूजी के अनुसार आजादी के बाद भारत एक नई दुनिया में प्रवेश कर गया था।


लाभ चंद्र छजलानी नई दुनिया निकालते थे लेकिन पुरानी दुनिया के इंसान थे। उन्हें अपना अखबार दुकानों तक साइकिल और बाद में स्कूटर के पीछे रख कर ले जाने में लाज नहीं आती थी। नई शैली थी और आजादी का सात्विक उन्माद था इसलिए नई दुनिया चल निकला। धीरे धीरे और सहयोगी जुड़े और नई दुनिया मालवा इलाके का एक सबसे बड़ा अखबार तो बन ही गया, पूरे देश के मानक हिंदी समाचार पत्र के तौर पर इसकी गिनती हुई।


सन सैतालीस में अखबार शुरू हुआ था और 1960 आते आते इसकी काफी प्रतिष्ठा हो गई थी। सर्वोदय की ओर जा चुके प्रभाष जोशी स्कूल की पढ़ाई छोड़ कर विनोबा भावे के काफिले में शामिल हो गए थे और रोज संत विनोबा की भूदान यात्रा का विवरण लिखते थे। अंग्रेजी में एमए कर रहे राजेंद्र माथुर नई दुनिया में हिंदी साहित्य का पन्ना देखते थे। शरद जोशी उस समय भी व्यंग लिखते थे और नई दुनिया के पाठकों के लिए आकर्षण का एक पात्र थे।


राहुल बारपुते के बारे में जितना सुना है, वे संत प्रवृत्ति के ज्ञानी थे और कुमार गंधर्व से ले कर उस्ताद आमीर खां और उस समय के क्रिकेट स्टार सीके नायडू के साथ उनका उठना बैठना था। नई दुनिया को प्रारंभिक भाषायी व्याकरण का संस्कार राहुल जी ने ही दिया।


अब नई दुनिया के पूरे देश से दर्जनों संस्करण हैं, रंगीन पन्नों पर छपता है और फिलहाल पत्रकारों को मोटी पगार दे रहा है। इसके संपादक आलोक मेहता ने पत्रकारिता का जीवन नई दुनिया से ही शुरू किया था और इसी साल उन्हें उनके व्यक्तिगत गुणों के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। प्रसंगवश पद्मश्री के प्रमाण पत्र पर जो भाषा लिखी होती है उस पर साफ शब्दों में लिखा होता है कि मैं भारत का राष्ट्रपति आपको आपके व्यक्तिगत गुणों के लिए पद्मश्री से अलंकृत करता हूं। आलोक जी के व्यक्तिगत गुण और प्रतिभा से सभी परिचित हैं लेकिन इस साल की पद्मश्री की सूची में किसी एक अभय छजलानी का भी नाम है जिनके व्यक्तिगत गुणों को भी भारत की महामहिम राष्ट्रपति ने अलंकृत करने लायक समझा है।


अभय छजलानी के व्यक्तिगत गुण क्या है यह या तो प्रतिभा पाटिल जानती हाेंगी या खुद छजलानी। लेकिन इतना जरूर है कि इस गुजराती लाला को पद्मश्री से विभूषित किया गया तो पूरे देश ने जय हो का नारा नहीं लगाया और इससे शायद लाला जी बहुत आहत हुए। उन्होंने पूरे देश के पत्रकारों को जिनमें बहुत सारे अल्लू पल्लू भी थे, हवाई जहाज का टिकट दे कर इंदौर बुलाया, बड़े होटलों में ठहराया, दावतें दी और बहाना बना रहे इसलिए इंदौर प्रेस क्लब को चंदा दे कर एक सेमिनार भी करवा डाला। लाला जी से भाषायी या पत्रकारिता के सरोकारों की उम्मीद करना व्यर्थ है मगर अपने जो साथी इस सेमिनार में उत्साहपूर्वक शामिल हुए थे और जिन्होंने नई दुनिया के बहाने अभय छजलानी की शान के झंडे गाढ़ दिए थे, उन्हें भी इस सेमिनार के विषय पर कोई ऐतराज नहीं हुआ। नई दुनिया जो अपने आपको अब भी देश का मानक हिंदी अखबार कहता है, ने विषय चुना था वह यह था भाषायी पत्रकारिता में हिंदी की भूमिका।




जिसने भी यह विषय चुना था उसको सूली पर चढ़ा देना चाहिए। जिन विद्वानों ने इस विषय पर अपनेउच्च विचार रखे थे उन्हें भी अपने आप से पूछना चाहिए कि अगर हिंदी सिर्फ एक भाषायी समाचारलिपि है तो फिर मैथिली और भोजपुरी क्या है? कायदे से तो इनका अपना व्याकरण है और इन्हें भाषाहोना चाहिए मगर वह बरस बाद में चलती रह सकती है। अपने को तो यह हजम नहीं हो रहा कि एक वहअखबार जो अपने को मानक सिद्व करने पर तुला हुआ है, हिंदी को राष्ट्रीय की बजाय भाषायी सिद्वकरने की कोशिश क्यों कर रहा है? राजभाषा और राष्ट्रभाषा के सरकारी विज्ञापन जब जारी होते हैं तोलेने में इन्हें शर्म नहीं आती। इनका एक मरियल सा वेब पोर्टल वेब दुनिया के नाम से चल रहा है औरहिंदी, अंग्रेजी के संकर नाम वाले इस पोर्टल के लिए विदेशों से पूंजी जुगाड़ते वक्त हिंदी का वर्णन देश कीसबसे बड़ी भाषा के तौर पर कारोबारी भीख मांगने वाले दस्तावेजों में किया जाता है। जब रोकड़ाचाहिए तो हिंदी महान वरना वह तो एक, जैसा इस प्रायोजित सेमिनार में कहा गया, हिंदी एकवर्नाक्युलर यानी देहाती और आदिवासी किस्म की भाषा है। भाषा भी नहीं वर्नाक्युलर का अनुवाद तोबोली होता है। जैसे अवधी है, बुंदेलखंडी हैं वैसे ही अभय छजलानी की राय में हिंदी भी हैं। इसी हिंदी कीकमाई से वे खुद को श्रध्दांजलि देने के लिए पूरे देश से पत्रकारों को जमा करते हैं, उनकी सेवा सत्कारकरते हैं और बुढ़ापे में पद्मश्री पा कर धन्य हो जाते हैं।


अभय छजलानी का दुस्साहस तो देखिए। वे कहते हैं कि नई दुनिया ने पत्रकारिता की कई पीढ़ियों कोबनाया। वे कहते हैं कि राजेंद्र माथुर को हमने बनाया। शरद जोशी को हमने बनाया। प्रभाष जोशी कोन वे याद करते हैं और न बुलाते हैं। इसलिए कि जब नई दुनिया कारोबार हो गया और अभय छजलानीडंडी मारने लगे तो इसका विरोध करने वालों में प्रभाष जोशी भी थे। नई दुनिया की यह औकात कभीनहीं थी कि वह राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी को बनाए। उल्टे इन लोगों ने नई दुनिया को आकारऔर सम्मान दिया है। राजेंद्र माथुर की विशाल दृष्टि और प्रभाष जोशी की भाषा ने नई दुनिया को रचाहै और लाला अभय छजलानी किराए पर बुलाई गई भीड़ की मौजूदगी में अगर यह बात मंजूर नहीं कररहे तो उनमें और एक परचूनिए में फर्क क्या रहा जाता है?


राजेंद्र माथुर ने तो लगभग जिंदगी भर इंदौर के गुजराती कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाई और अखबारों मेंहिंदी लिखी। रज्जू बाबू के बहुत सारे लिखे में ऐसे संदर्भ और इतनी प्रवाहमान कविता वाली भाषा होतीथी कि अभय छजलानी की समझ में भी नहीं आती होगी। लेकिन न राजेंद्र माथुर को पद्मश्री मिली औरन प्रभाष जोशी को। लाला अभय छजलानी को भी पद्मश्री इसलिए मिल गई क्योंकि उनके संपादकआलोक मेहता संपर्कशील प्राणी हैं और उनकी सरकार में इतनी चलती है कि वे अभय छजलानी तोक्या किसी मनोहर लिम्बूदिया को भी पद्मश्री दिलवा दें। पद्मश्री कैसे मिलती है ये सब जानते हैं। हमारेदोस्त सुधीर तैलंग को बयालीस साल की उम्र में पद्मश्री मिल गई थी और उन्होंने आज तक अपने कोदावत नहीं दी। उनके पास हराम का पैसा नहीं हैं।

Saturday, March 7, 2009

इन्दौर में हुआ दिग्गज पत्रकारों का जमावडा,प्रेस क्लबने किया सेमिनार का आयोजन, अभय छजलानी काहोगा सम्मान

इंदौर प्रेस क्लब की तरफ से आज इंदौर में एक सेमिनार और वर्कशॉप का आयोजन किया गया है । इस आयोजन में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली और मुंबई से कई दिग्गज पत्रकार इंदौर पहुंचे हैं । इन पत्रकारों में आईबीएन -7 के संपादक आशुतोष , शीघ्र प्रकाश्य अखबार चौथी दुनिया के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय , स्टार न्यूज के नेशनल अफेयर एडिटर दीपक चौरसिया , न्यूज 24 के मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम , दैनिक भास्कर के संपादक श्रवण गर्ग , वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ सचदेव , नई दुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहताअनिल सिंह समेत कई पत्रकार इंदौर में हो रहे इस भव्य समारोह और सेमिनार में हिस्सा लेने पहुंच चुके हैं ।
प्रेस क्लब द्वारा ये सेमिनार इनडोर हॉल अभय प्रसाल में किया गया है । सुबह से शाम तक चलने वाले समारोह में हजारो लोग हिस्सा लेंगे और शाम को नई दुनिया के संपादकीय बोर्ड के अध्यक्ष अभय छजलानी का सम्मान किया जाएगा । अभय छजलानी को हाल में पद्म पुरस्कार से नवाजा गया है। जितने बड़े पैमाने पर ये आयोजन किया गया है , उतना बड़ा आयोजन पहले कभी नहीं हुआ । आमतौर पर सेमिनारों में दो - चार सौ लोग होते हैं लेकिन इस समारोह में पांच से दस हजार लोगों के हिस्सा लेने की बात कही जा रही है ।
नोट - इस समारोह के बारे में विस्तार से हम आपको बताएंगे । आपमें से कोई अगरइस समारोह का चश्मदीद है तो आप हमें पूरा विवरण लिखकर भेज सकते हैं । हमआपके नाम के साथ पोस्ट करेंगे



अगर आप ये समझ रहे हैं कि अभय छजलानी से अपना कोई व्यक्तिगत बैर है तो आपकी जानकारी केलिए इस लाला की आज तक अपन ने छवि भी नहीं देखी। इंदौर सैकड़ों बार जाना हुआ है लेकिन नईदुनिया परिसर में घुसने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी। चलते चलते अभय छजलानी और उनके चमचोंको दो बातें कहनी हैं। एक तो हिंदी को वर्नाक्युलर यानी क्षेत्रीय भाषा मानने की भूल मत करना औरदूसरे मिल कर कामना करना कि अभय छजलानी को भारत रत्न मिल जाए। जो व्यक्ति पद्मश्री मिलनेपर इतना बड़ा तामझाम खड़ा कर सकता है वह भारत रत्न मिलने पर तो पूरे देश में इमरती बंटवाएगा।रही बात राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी को रचने की तो अभय छजलानी और नई दुनिया की येऔकात कभी नहीं रही कि वे हिंदी पत्रकारिता की किवदंतियों को रच सकें। वे ज्यादा से ज्यादा पंकजशर्मा और आलोक मेहता को रच सकते हैं।





अब अगर आलोक तोमर को यह कविता न लगे तो




अब अगर आलोक तोमर को यह कविता न लगे तो कोई क्या करे




आज कुछ घंटे पूर्व हिन्दी भारत याहू समूह पर आलोक तोमर जी ने अपनी एक कविता सदस्यों से बांटी और भेजते हुए अपनी विनम्रता में, ऊपर यह लिखा कि "अब अगर आलोक तोमर को यह कविता लगे तो कोई क्या करे " । मुझे आश्चर्य हुआ कि इतनी बढ़िया कविता लिख कर आलोक जी यह विनम्रता बरत कर ठीक नहीं कर रहे हैं। सो, उस कविता को यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ । आप सभी निश्चय करें कि आलोक जी वास्तव में कवि हैं ना!!

आलोक जी का परिचय तो राजनीति में रूचि रखने वाले सभी लोग बढ़िया से जानते ही होंगे , जो न जानते हों वे

परिचय यहाँ देखें

भाग -१

भाग -२








पराजय
का उत्सव गीत
( पता भी नहीं ये कविता है भी या नहीं)

- आलोक तोमर








मैं अचानक हार जाता हूँ
और तुमसे हारने का
एक, चुप
उत्सव मनाता हूँ



गुदगुदाता है यूँ तुमसे हारना
हार कर
खुद से उलझना
और फिर
भीगे पलों में
चंद्रमा की साक्षी में
किलक बतियाना
या तो सपना है
है या हकीकत
नहीं कोई दाम
न कोई कीमत



अपने अन्दर की नदी में
बिना तैरे
जिन तटों को कभी देखा ही नहीं
जिन द्वीप-टापू को नहीं जाना
हारने की ही शक्ति लेकर
नदी की हर लहर से सुलझ कर
तैरता हूँ
पार जाता हूँ
मैं अचानक हार जाता हूँ
और
तुमसे हारने का
एक, चुप
उत्सव मनाता हूँ






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