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प्रेम न हाट बिकाय










आज की चर्चा करने के लिए जी भर कोशिश करनी पड़ीं है| यात्रा पर निकलने से पूर्व चर्चा की मनःस्थिति बना पाना बड़ा ही दुष्कर होता है| पर आप तो जानते हैं कि कुछ चीजें दायित्वबोध के चलते भी निभाई जाती हैं, निभाई जानी चाहिएँ भी, जब जितना बन पड़े| सो, हम आप से गिने चुने कुछ लेखों की ही चर्चा करेंगे; वह इसलिए नहीं कि संकलक खंगालना समय माँगता है अपितु इसलिए भी कि कुछ मुद्दे गंभीर विमर्श की अपेक्षा करते हैं|




सब से पहले मैं चिट्ठाचर्चा परिवार और हिन्दी नेट समुदाय की ओर से स्वर्गीय कल्याण मल लोढ़ा जी को श्रद्धांजलि  अर्पित करती हूँ | हिन्दी के इन सुप्रतिष्ठित विद्वान का अतुल अमूल्य योगदान आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है|







Prof.Kalyanmal Lodha
हिंदी के सुविख्यात विद्वान तथा उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल आचार्य विष्णुकांत शास्त्री कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर लोढ़ा के शिष्य रहे. सन १९७९ से ८० तक आप राजस्थान के जोधपुर विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त किये गए. एक वर्ष के पश्चात आप पुनः कलकत्ता आ गए फिर सन १९८६ में आपने कलकत्ता विश्वविद्याला से अवकाश ग्रहण किया. प्रोफ़ेसर लोढ़ा ने ५० से अधिक शोध निबंध लिखे. आपने दर्जनों पुस्तकों की रचना की, जिनमे प्रमुख हैं- वाग्मिता, वाग्पथ, इतस्ततः, प्रसाद- सृष्टी व दृष्टी , वागविभा, वाग्द्वार, वाक्सिद्धि, वाकतत्व आदि. इनमे वाक्द्वार वह पुस्तक है, जिसमे हिंदी के स्वनामधन्य आठ साहित्यकारों - तुलसी, सूरदास, कबीर, निराला, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी के साहित्यिक अवदानों का सुचिंतित तरीके से मूल्याङ्कन किया गया है. प्रोफ़ेसर लोढ़ा ने प्रज्ञा चक्षु सूरदास , बालमुकुन्द गुप्त-पुनर्मूल्यांकन, भक्ति तत्त्व, मैथिलीशरण गुप्त अभिनन्दन ग्रन्थ का संपादन भी किया. प्रोफ़ेसर लोढ़ा को उनके साहित्यिक अवदानों के लिए मूर्ति देवी पुरस्कार, केंद्रीय हिंदी संसथान-आगरा से राष्ट्रपति द्वारा सुब्रमण्यम सम्मान, अमेरिकन बायोग्राफिकल सोसाइटी अदि ने सम्मानित किया. आप अपनी ओजपूर्ण वाक्शैली के लिए देश भर जाने जाते थे. विविध सम्मेलनों में आपने अपना ओजश्वी वक्तव्य देकर हिंदी का मान बढाया. आप के के बिरला फाउन्डेसन, भारतीय विद्या भवन, भारतीय भाषा परिषद्, भारतीय संस्कृति संसद सरीखी देश की सुप्रसिद्ध संस्थावों से जुड़े हुए थे. प्रोफ़ेसर लोढ़ा के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है. उनका अंतिम संस्कार रविवार २२ नवम्बर को जयपुर में किया जा रहा है.












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साहित्य अकादमी पुरस्कारों के सम्बन्ध में एक नई व अनोखी सूचना मिलने पर  हिन्दी-भारत याहू समूह  में जो परिचर्चा छिड़ी, उसे बाँचना स्वयं में दो विचारपक्षों में से किसी एक विचार की पक्षधरता मात्र नहीं है अपितु साहित्य से जुड़े ऐसे अति महत्व के प्रश्नों पर भविष्य में देश में क्या होने जा रहा है, क्या होना चाहिए और क्यों होना चाहिए की पक्षधरता भी है| दोनों ही मत-विमत अपनी अपनी जगह सही और सटीक हैं| परिचर्चा इतनी महत्वपूर्ण, रोचक, सामयिक व विचार- उर्वर है कि आप में से प्रत्येक भाषा और साहित्य से सम्बद्ध पाठक को एक बार अवश्य देखना पढ़ना और उस पर अपनी राय देनी चाहिए थी, किन्तु  हाय री आदान-प्रदान की श्रृंखला!! 



· यदि हम सैमसंग की सहायता से पुरुस्कार की राशि बढा सकें तो क्या यह लेखकों के लिये अच्छा नहीं होगा ? नोबल पुरुस्कार की महत्ता का एक कारण यह भी है कि उस के साथ एक बड़ी पुरुस्कार राशि जुड़ी होती है । · यदि एक ’अल्फ़्रेड नोबल’ अपने निजी धन से एक ऐसा पुरुस्कार स्थापित कर सकता है जिसे पूरी दुनिया सम्मान से देखे और वह पुरुस्कार आने वाले वर्षों में कभी किसी पर निर्भर न रहे तो ऐसा पुरुस्कार हमारे अम्बानी , बिरला या मित्तल क्यों नहीं स्थापित कर सकते ? हमें किसी विदेशी कम्पनी सैमसंग पर निर्भर नहीं रहना होगा । · इस दुनिया में कुछ भी मुफ़्त नहीं मिलता । हम मुफ़्त ’टेलीविज़न’ भी तभी देख पाते हैं जब प्रायोजक उस के लिये पैसा देते हैं । किसी भी पुरुस्कार को बनाये रखने के लिये धन की ज़रूरत होती है और वह कहीं न कहीं से आना ज़रूरी है । धन का स्त्रोत जो भी होगा कुछ सीमाएं और बंधन तो ले कर आयेगा ही । हमें देखना यह है कि किस में हम अपनी स्वतंत्रता को कम से कम खोते हैं ।


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गत सप्ताह  और मेरे हृदय की धक्-धक् पूछती है– वह कौन  पर एक टिप्पणी का यह अंश देखें -
ऋषभ  ने कहा…
महाराष्ट्र विधानसभा के चपत-समारोह को भावुकता के बजाय इस तरह भी देखने की ज़रुरत है कि इस बहाने एक उद्दंड नेता ने हिन्दी को जानबूझकर अपमानित कराया है..... उकसावा भी आपराधिक कृत्य है.


यह टिप्पणी बताती है कि हिन्दी के सम्मान के नाम पर  जिस प्रकार के दाँव पेंच खेले गए हैं, उनसे हिन्दी का  अपमान ही हुआ है| इसमें हिन्दी को दुत्कारने वाला जितना दोषी है, उस से बड़ा दोषी उसका सम्मान करने के नाम चाँटा खाने की सहानुभूति और महिमा मंडन पाने वाला है| उसके ऐसे कृत्य पर उसकी भर्त्सना के स्थान पर हिन्दी वालों ने यकायक पहली नज़र में उसे भले हिन्दी के लिए सार्वजनिक अपमान तक झेल जाने वाला नायक बना कर प्रस्तुत किया हो, मान  लिया हो; किन्तु उद्वेग उतरते ही उस आपराधिकता की पोल खुलते दीखने लगी है|



राजनीति की बजबजाती गंदगी को हिंदी की पैकिंग लगाकर उस बजबजाती राजनीति को सहेजने के लिए अपने-अपने पक्ष की सेना तैयार करने की कोशिश थी
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समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अबू आजमी के रिश्ते देश के दुश्मन दाऊद इब्राहिम से होने की खबरों के ठंडे हुए अभी बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ और न ही इसे ज्यादा समय बीता होगा जब मराठी संस्कृति के नाम पर भारतीय संस्कृति तक को चुनौती देने वाले राज ठाकरे गर्व से पॉप स्टार माइकल जैकसन की गंधाती देह के दर्शन के लिए आतुर थे।



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बन्दूकधारियों और हताहतों के अपने शब्दों के माध्यम द्वारा  मुम्बई आतंक की अकथ कथा के छिपे रहस्यों की जो वास्तविकता उजागर हुई है, उस कथा को उसके पूरे रूप में पहली बार पुरस्कृत  फिल्मकार  Dan Reed  ने कई अनजाने पक्षों के साथ खरा-खरा प्रस्तुत किया है,  ... एक ऐसी  कथा जिसे सुन देख कर आप सिहर उठेंगे .... अवाक हो जाएँगे ...





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गत दिनों मुझे एक अजीबोगारीब लेख देखने पढ़ने का अवसर मिला| लेख क्या था, मानो अपनी कुंठाओं की अभिव्यक्ति थी|  कृष्ण बिहारी जी के इस 5 नेट पन्नों में फैले लेख को आप भी स्वयं पढ़ें और विचारें|

लेखक लिखते हैं


प्रेम नहीं सेक्सप्रेम. यह शब्द जितना सम्मोहक है उतना ही भ्रामक भी. एक विचित्र-सी मनोदशा का नाम प्रेम है. यह कब होगा, किससे होगा और जीवन में कितनी बार होगा, इसका कोई अता-पता किसी को नहीं होता. जब-जब मुझसे किसी ने इसके बारे में सवाल किया है या मैंने खुद से पूछा है कि आख़िर यह मामला है क्या, तो मुझे केवल एक उत्तर ही देते बना है कि प्रेम वासना से उपजी मनोस्थिति है.
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असल में इस झूठ को वह इस तरह जीती है कि उसे यह सच लगता है कि किसी के साथ हमबिस्तर हो चुकने के बाद भी वह पाकीजा है. मैं नब्बे-पंचानबे प्रतिशत स्त्रियों की बात कर रहा हूं न कि उन पांच दस प्रतिशत की जिन्होंने समाज को ठेंगा दिखा दिया है. ये ठेंगा दिखाने वाली महिलाएं आर्थिक रूप से या तो स्वतंत्र हैं या फिर वेश्याएं हैं. वेश्या सबसे अधिक स्वतंत्र होती है.
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कहने का मतलब है कि रोज की दाल-रोटी है सेक्स, प्रेम का कहीं अता पता नहीं यह सच एक बड़ा सच है. मैं यदि देहधारी नहीं होता तो क्या कोई स्त्री मुझे प्रेम करती, यदि कोई अपने वज़ूद के साथ मुझे न बांधता तो क्या मैं उसके बारे में सोचकर अपना समय नष्ट करता. अशरीरी प्रेम को बहुत महत्व देने वालो, ऐसा कौन सा अशरीरी रिश्ता है जो तुम्हारे साथ ज़िंदा है
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इसका सीधा अर्थ है कि जिस्म है और पहुंच में है तो जहान है नहीं तो कुछ भी नहीं है.
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प्रेम एक ऐसा मर्ज़ है जो सबको जुकाम की तरह पकड़ता और छोड़ता है. कुछ लोगों को यह बार-बार पकड़ता और छोड़ता है. अगर यह उनकी आदत न बनी हो तो उन्हें हर बार पहले से ज्यादा दुखी करता है. प्रेम पहला हो या उसके बाद के किसी भी क्रम पर आए, होने पर पाने की छटपटाहट पहले से ज्यादा होती है और टूटने पर पहले से भी तगड़ा झटका लगता है. यह टूटना इनसान को बिखरा और छितरा देता है.जिनकी आदत ओछेपन की होती है और जो अवसर पाते ही अपना मतलब पूरा करने में लग जाते हैं उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. उनको ही क्रमश: लम्पट और छिनाल कहा जाता है. इस प्रवृत्ति के लोग प्रेम नहीं करते.ये एक किस्म की अलग लाइफ स्टाइल जीते हैं.
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प्रेम ईर्ष्यालु, शंकालु और हिंसक होता है. प्रेम ही एक मात्र ऐसा मानवीय व्यवहार है जिसमें सबसे अधिक अमानवीयता है. प्रेम बनाता नहीं, बरबाद करता है. यह अलग बात है कि बरबाद करने वाले की कोशिश कभी कभी नाकाम हो जाती है. मैं कभी नहीं मान सकता कि रत्नावली या विद्योत्तमा ने तुलसीदास या कालिदास को अमर कर दिया
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मैं जब इस लेख को लिखते हुए अपने परिवेश में इसकी चर्चा कर रहा हूं तो इस सभ्य समाज के लोग इसे मेरा व्यक्तिगत मत कहते हुए मुझे ख़ारिज करने में लगे हैं कि प्रेम कतई दैहिक नहीं है. प्रेम आत्मा की बात है. वासना का इससे कोई लेना-देना नहीं. प्रेम ही है कि दुनिया बची हुई है. मेरा मन इसे स्वीकार नहीं कर रहा. मैं समझता हूं कि करूणा है जिससे दुनिया बची हुई है. प्रेम और करूणा में अन्तर है .करूणा का जहां असीम विस्तार है, वहीं प्रेम एक संकरी गली है. प्रेम राजपथ नहीं है कि उस पर एक साथ और सबके साथ दुनिया चले. प्रेम में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है.




यदि प्रेम केवल देह से देह का सम्बन्ध ही होता और देह पाने तक,  पा चुकने तक की यात्रा तक ही प्रेम की यात्रा होती तो किसी से भी प्रेम करने के बाद उसे ही पाने की लालसा क्यों रहती| देह तो लुके छिपे किसी की भी पा लेने वाले लोग सदा इस समाज में रहे हैं ना !!


अर्थात्  a को यदि यदि b से प्रेम है और वह उस के लिए तड़प रहा / रही है तो उसे तड़पने की क्या आवश्यकता है? वह  b से इतर किसी अन्य के देह को माध्यम क्यों नहीं बना लेता ? उसी की देह की अनिवार्यता क्यों रहती है ( यदि देह ही मूल कारक है तो)| और  गृहस्थ के बुढापे में आपसी प्रेम को आप ऐसे ही ख़ारिज करते चले जाएँगे ?

आप खारिज कीजिए, क्योंकि आप के खारिज करने के अपने कारण हैं |


कहना शोभा तो नहीं देता किन्तु पूरे लेख से एक देह लोभी पुरुष की देह लोभी होने के कारण हुई दुर्गत से उपजी मानसिकता का दिग्दर्शन होता है| वैसे बूढ़े तोतों को पढ़ाने का लाभ  हम नहीं देखते, इसलिए लेख पर तर्क वितर्क करने तक से ऊब हुई| 



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इधर  हिन्दी  ब्लॉग  जगत्  में बच्चों के ब्लॉग बनाने का उत्साह भी दिखाई देता है, जो स्वागत योग्य है| ये ब्लॉग उन ब्लॉग से हट कर हैं जो बच्चों के विषयों पर अथवा उन्हें केंद्र में रख कर लिखे जा रहे हैं क्योंकि मैं उन ब्लॉग की बात कर रही हूँ जो बच्चों के नाम से उनके मातापिता अथवा परिवारीजनों द्वारा चलाए जा रहे हैं| अभी एक दो दिन पूर्व प्रवीण जाखड जी के ब्लॉग के माध्यम से हिन्दी में सबसे छोटी आयु की बच्ची का भी एक ब्लॉग देखा था|


 खैर, बच्चों के या किसी बच्चे विशेष के ब्लॉग का लिंक या उल्लेख करना यहाँ मेरा उद्देश्य नहीं है| मेरा उद्देश्य इस बात को यहाँ उठाने का दूसरा है| वह यह कि जब भी कोई रचना किसी पात्र - विशेष  के माध्यम से व्यक्त होती है तो वह उस पात्र की भाषा और उसी की भंगिमा लेकर आती है, आनी चाहिए| साहित्य इसका प्रमाण है| प्रेमचंद के हर पात्र की भाषा और भंगिमा उसके समाज, वय, लिंग, शिक्षा, अनुभव, स्तर, भाषिक पृष्ठभूमि आदि आदि आदि कई स्तरों का निर्वाह करती है| प्रेमचंद ही क्यों, सारा हिन्दी साहित्य, संस्कृत साहित्य, अन्य भाषाओं का साहित्य, पंचतंत्र..... जाने क्या क्या गिनाऊँ ! और तो और, बोलचाल में भी लोग जब बच्चे की भूमिका में कभी  संवाद करते हैं तो तुतला कर बोलना, ... आदि शैली को अपना लेते हैं| अभिप्राय यह कि  वाणी और शब्दों का चयन वक्ता अथवा पात्र के अनुसार होना भाषा की अनिवार्य शर्त है|


आज मुझे दुःख हुआ यह देख कर कि हम अपने बच्चों के मुँह में  कैसी भाषा आरोपित कर रहे हैं| स्वप्निल नाम की इस बच्ची का ब्लॉग यों तो सराहनीय है, प्यारा है किन्तु आज के संवाद में एक शब्द "चुड़ैल" के प्रयोग में ऐसी असावधानी हुई है कि लगा जैसे हम अपने बच्चों को अपनी  वान्छओं से आरोपित कर रहे हैं| उन पर  उनकी उम्र से बड़ी चतुराई और उस चतुराई की भाषा बोलना लाद रहे हैं| 


मुझे पक्का विश्वास है कि यह भाषा स्वप्निल कदापि नहीं बोलती होगी| बोलनी चाहिए भी नहीं| ऐसे में जो भी स्वप्निल बन कर इस ब्लॉग को लिख रहे हैं,  उन्हें चाहिए कि शब्द चयन में सावधानी बरतें| बच्चे की भाषा और भावना से सामंजस्य न रखने वाले एक शब्द के गलत चयन व प्रयोग से बच्चे की पूरी छवि धूमिल हो जाती है| बच्चों के पास उनका बचपन अधिकतम सुरक्षित रहने दें| मेरी इस बात को तर्क वितर्क का मुद्दा बना कर  मुझे खेद में न डालें| मैं किसी दुर्भावना वश ऐसा नहीं लिख रही हूँ| फिर भी यदि मेरी सलाह पर किसी को आपत्ति हो तो वह/ वे अपने बच्चों के लिए निर्णय लेने में स्वतन्त्र तो हैं ही |



स्वप्निल
My Photoअचानक पापा के कम्प्यूटर में मैंने एक फोटो देखी। फोटो में पापा एक लड़की के साथ शूट में खड़े हैं। मैंने सोचा मेरे पापा कब से फिल्मों में काम करने लग गए और ये चुडैल कौन है? जो मेरी मम्मी के स्थान पर पापा के साथ खड़ी है। पापा से पूछा तो पापा ने बताया कि बेटा ये तेरे पापा नहीं है, ये तो राजीव तनेजा अंकल के ब्लाग में किया गया कमाल है। यह जानकर मुझे अच्छा लगा कि चलो पापा न तो किसी फिल्म में काम कर रहे हैं और न ही मेरे मम्मी के स्थान पर कोई और है।  आप एक चित्र के साथ हुई चुहल में हमें पहचाने की कोशिश कीजिए तब तक हम आप से अगली बार मिलने के लिए विदा ले लेते हैं|




वैसे यह तो सच है कि राजीव तनेजा जी की तकनीकी चित्रकारी ने ब्लॉग जगत् के लोगों को क्या से क्या बना दिया है|

अब यही देखिए -

 हम आपसे  अगली बार मिलने से पूर्व आपके मंगलमय भविष्य की कामना करते हैं.


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यह खुला पत्र सिद्धार्थ के लिए



इक खुला पत्र : सिद्धार्थ के नाम



प्रिय सिद्धार्थ!

तुमने आसपास के परिवेश व परिस्थितियों की सामान्य घटनाओं में से विचारणीय बिन्दु तलाश कर उन्हें विमर्श हेतु लाने का प्रयास जो प्रारम्भ किया है, वह श्लाघनीय है. जनमानस के भीतर बसी मध्ययुगीन परम्पराओं को लोग आदिकाल से चली आई, सनातन, वैदिक, धार्मिक और जाने क्या क्या माने ढोए चले जाते/जा रहे हैं। धर्मभीरु जनता का ९९.९५ प्रतिशत यह भी यह भी नहीं जानता कि धर्म होता क्या है, उसका स्वरूप क्या है। न वह यह जानता है कि धर्म का पूजा पद्धति से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे मे रेगिस्तान में उगे अरण्डी के पौधे ही सबसे बड़े पेड़ होने का दावा मनवाते रहते हैं। जिन्हें एक भी बात भूले -भटके कोई सीधी-सच्ची कह दे तो उसकी तो मानो शामत ही हो गई। हाथ जोड़कर, क्षमापूर्वक सत्य कहने वाले तक को भी लोग बहुधा तो शत्रु बनकर लतियाते हैं, या फिर कुछेक सच बोलने का सहूर सिखाते हैं।



उधर अधजल गगरी लिए छलक-छलक पड़ने वाले अपनी दुकान को दूना-चौगुना करने की वितण्डा इस सारे आत्मानुशासनविरत समाज पर फैलाते रहे हैं, कभी धर्म के ठेकेदार और पहरुए बनकर या कभी स्त्री-पुरुष/ ये जाति-वो जाति/ यह भाषा-वह भाषा/ यह क्षेत्र-वह क्षेत्र/ आदि आदि के द्वन्द्व को एजेण्डा बनाकर लोकप्रियता, गु्रुडम (नेतागिरी) की रोटियाँ सेंकते हैं। इसमें महाभारत काल (लगभग ५००० वर्ष) से प्रमाद व पतन के मारे भारत के जन को ह्रासमान ही होते चले जाने से तब कौन रोक सकता है? इसमें स्त्रियाँ, आबाल-वृद्ध सब दारुण दशा में हैं। धन बल, देहबल, सत्ताबल आदि जिसके पास हैं, सब अधिकार भी उसी के ,सब निर्णय भी। वैसे, यहाँ परिवर्तन वस्तुत: चाहता ही कौन है? कोई नहीं। परिवर्तन होते हैं विचार व कर्म की क्रान्ति से। और क्रान्ति का अर्थ है अपने को आमूलचूल बदलना (न कि बाह्य युद्ध)। जब कोई स्त्री-पुरुष अपने को आत्मानुशासी के रूप में ढालने को, परिवर्तित करने को तैयार ही नहीं तो समाज को बदलने की कल्पना उन ठेकेदारों की जेब में अन्तिम साँसे ले कर दम तोड़गी ही।



बात लम्बी हो गई। तुम्हारी सद्भावना इन अर्थों में भी नेक है कि स्वयं को झंडाबदार बताए बिना स्त्री को (उसके सामान्य मानवी होने के अधिकार तक को छद्म व प्रपंच से घेरे आई धूर्त मानसिकता से बचाने की इच्छा के चलते) मानवीय दृष्टि से देखने का उपक्रम किया।



अजब संयोग यह है कि कल ही मैंने अपनी फ़ेसबुक प्रोफ़ाईल पर स्टेटस मैसेज के रूप में एक ऐसा ही सन्देश लिखा (जिस पर वहाँ कुछ मित्रों ने अपनी राय भी दी)। जो मैंने कल वहाँ लिखा, उसका अविकल पाठ यह है -

"ध्यातव्य है कि भारतीय भाषासमाज में सबके सब आशीर्वाद, दिए भले स्त्री को जाएँ, किन्तु लगते/होते पुरुष के लिए हैं और सबकी सब गालियाँ, दी भले जा रही हों पुरुष को, किन्तु लगती/होतीं सब स्त्री के लिए हैं। यह है हमारी सोशियो-साइकॉलॉजी, हमारे समाज का असली चरित्र और इस समाज में स्त्री होने व पुरुष होने का अन्तर।"


Hari Joshi
Hari Joshi
कविता जी, ये ऐसा सच है जिसे सब जानते हैं। सनातन है। ...शायद कभी इसमें परिवर्तन आए। स्त्री और पुरुष जिंदगी के रथ के दो पहिए हैं जिनमें से एक भी निकल जाए तो जीवनरथ चल नहीं सकता लेकिन फिर भी हर नियम/परंपरा स्त्री पर ही हमला करता है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष।



Nutan Gairola
Nutan Gairola
Aadi kaal se, samaaj kee sanrachna isee tarah se hoti aayi hai, Purush Pradhaan , sakti.. Sab purush dimaag se chala hai. . Bhojan , sringaar, shiksha , vicharo ke aur kaun sa chetr nahi jaha mahila purus aik jaise rahe ho. Sabi jagah. . .nari ko devi roop de kar us se opekhsha kee gai jyada. . . Kavita jee kee baat se mai sehmat hoon. . .Haan aaj ... Read Moreka purus vaise in sab baato ko samajh raha hai, par vo in sadiyo se chali aa rahi vyavastha ko aik jhatke mai tod nahi tor sakta hai. . Hame intjaar karna hoga. .


Pratibimba Barthwal
Pratibimba Barthwal
आज सुबह ही रिया जी ने "मेरे अपने"मे यही च्रचा शुरु की है। ,इस पर थोडा सुबह लिखा था, अभी इतना कहना चाहूंगा कि "घर" को बनाने मे महिला का योगदान उसकी प्रक्रति मे शामिल है. पुरुष और महिलाओ की प्रकृति भी जिम्मेदार है॥आप इसे पुरुष प्रधान कहे लेकिन ये भी सच है कि आज इसमे परिवर्तन आया है दोनो ही इसे समझ रहे है-कुछ महिलाओ ने इसे खुद ही अंजाम दिया या फिर पुरुष वर्ग ने इसमे सह्योग दिया......


Pratibimba Barthwal



Ashok Kumar
Ashok Kumar
Yah sach hai ki stree aur purush ke beech jo bhinnta hai usse samajh ne hamesha hee alag tareeke se paribhasit kiya aur ussiee wajah se kabhee stree ko toh kabhee purush ko jyada mahatva mila.Agar hum yah maan le ki samaj ko dono ki utanee hee jaroorat hai jitani ek bhasha ko shabdo ki jaroorat hotee hai toh shayed yah samasya hee samapt ho jaye.....



Parul Yadav
Parul Yadav
mam bilkul sahi kaha, aaj b desh k sabse badi post per mahilaye hai fir b aaj k samaj me aurto ki condition me change nahi hua hai. aaj tak sansad me 50% ka bill tak pass nahi ho paya hai, uske bad k kamo ka bill pass ho gaya bt ye nahi........ humko khud jagna hoga.




एक भले आदमी का......




एक भले आदमी का राज्यपाल न बन पाना

प्रभाष जोशी



धीरे धीरे वे दिल्ली के राजनीतिक, बौध्दिक और पत्रकारीय इलाकों में एक ट्रैजिक फिगर हो गये। मनमोहन सिंह के नव उदार राज के खुले खेल फर्रूखाबादी में राजनीति ऐसी बदली कि उद्योग व्यापार का ही बोलबाला हो गया। प्रमोद महाजन और अमर सिंह जैसे दलालों के हाथ में सत्ता की चाभी आ गयी।



बाजार और उद्योग की किसी लाबी के साथ आप नहीं हैं तो राजनीति में टिके रहना भी मुश्किल हो गया है। पैसा इतना हावी हो गया है कि लोक राजनीति की बात करनेवाले या तो शोहदे माने गये या फिर लोगों को पटाने वाले ठग। जाति, संप्रदाय और उद्योग व्यापार को तरकीब और करामात से साधनेवाली राजनेताओं की नयी पौध पनपी। उनके बीच देवेन्द्र द्विवेदी न तो राजनीति के थे और न वकालत के।



उनने हेमंत शर्मा से कहलवाया था कि जब वे 24 जुलाई को गांधीनगर में गुजरात के राज्यपाल की शपथ लेंगे तो मुझे वहां रहना है। मैं धर्म संकट में था। शताब्दी की ओर बढ़ती माताराम की तबीयत जब भी जब भी नाजुक होती है वे भाई बहनों से पूछती हैं कि दादो आने वालो थो, आयो को नी? मैंने घरवालों को बार बार आश्वस्त किया था कि जो भी मैं बाईस को वहां रहूंगा। पहुंच भी गया। पहले ही मालूम कर लिया था कि आजकल इंदौर से अहमदाबाद सीधी फ्लाईट जाती है। तय भी कर लिया था कि जब संदेश आयेगा तो 23 को सीधे गांधीनगर पहुंच जाऊंगा।



संदेश आया और सुनकर विचलित हो गया। राम बहादुर राय ने बताया कि अभी वे किसी से बात कर रहे थे तो उनने सुना कि देवेन्द्र जी के बेटे बहुत चिंतित अस्पताल की तरफ जा रहे थे। देवेन्द्र द्विवेदी को गंभीर हालत में गंगाराम अस्पताल में भर्ती कराया गया है। दिल्ली घर से मालूम किया तो पता चला कि हेमंत के कई फोन आये थे लेकिन आप तक कहां कोई फोन पहुंचता है।



इंदौर से काफी कोशिश करने के बाद ठीक ठीक पता नहीं चल पाया कि उन्हें हुआ क्या है। रायपुर होता हुआ दिल्ली आया तो पहली खबर ही यह मिली कि देवेन्द्र जी की हालत बहुत खराब है। वे अभी पंद्रह जुलाई (यह प्रभाष जी का जन्मदिन है) को आये थे तो फूल लेकर आये थे। थोड़े दुबले पर स्वस्थ और प्रसन्न लग रहे थे। पथ्य के कारण उस दिन खाना तो नहीं खाया लेकिन वैसे खाना पानी ठीक चल रहा था।



उनके राज्यपाल बनने की खबर आयी तो उनको तो नहीं लेकिन उनकी सबसे छोटी बहन वीणा को फोन करके बधाई दी। वीणा अपनी बहू और बेटी दोनो है। द्विवेदी जी को जानने के कोई पच्चीस साल बाद हेमंत के व्याह में गये तो मालूम हुआ कि वधू देवेन्द्र द्विवेदी की सबसे छोटी बहन है। और कहीं हो न हो, वीणा और हेमंत के घर तो उनसे मुलाकात होती ही थी। मैं चाहता था कि वीणा ही उनके राज्यपाल होने का भोज दे, जहां हम सब इकट्ठे होकर उनका अभिवादन करें। वीणा कह रही थी कि वे आने को मान ही नहीं रहे हैं। इक्कीस जुलाई को हम इंदौर के लिए रवाना हुए तब तक तो देवेन्द्र द्विवेदी बहन के घर नहीं जा पाये थे।



वीणा रोज उनके घर जाती थी। हम चाहकर भी नहीं जा पाये। जब गये तब 40, मीना बाग की बैठक में उनकी पार्थिव देह रखी हुई थी। गंगाराम के आईसीयू में देख सकते थे पर हिम्मत नहीं हुई। किस्मत की बात देखिए, टूटी कहां कमंद दो चार हाथ जबकि लबे बाम रह गया। या भेन जी ने पछताऊ कहा- फूटे भाग फकीर के भरी चिलम ढुल जाए। अठारह को उनकी नियुक्ति की घोषणा हुई थी और चौबीस को वे शपथ लेनेवाले थे। कोई पचास साल के राजनीतिक जीवन में यह पहली बार हुआ था कि उन्हें एक ऐसा सम्मानजनक पद मिला था जो दूसरों को सारे घाटों पर पानी पीने के बाद विश्राम के लिए दिया जाता है। देवेन्द्र द्विवेदी की सत्ता का राजनीतिक जीवन तो इससे शुरू हो रहा था।



और सुनता हूं यह पद भी उन्हें उन सोनिया गांधी के पौव्वे के कारण मिला था जिनका राज परिवार देवेन्द्र द्विवेदी को कोई कृपा की दृष्टि से नहीं देखता था। वे छात्र राजनीति करते हुए प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के दिनों से ही चले गये थे। जैसे नारायणदत्त तिवारी भी प्रसोपा से कांग्रेस में आये थे। समाजवादी संस्कारों ने द्विवेदी जी को इंदिरा गांधी की एकछत्र और चापलूसी को वफादारी समझनेवाली पार्टी में हाशिये पर ही रखा।



फिर राजनीति में संजय गांधी का उदय हुआ। और इंदिरा गांधी की शह पर उन्होंने कांग्रेस को लुंपन लोगों की पार्टी बनाया। तब कांग्रेस में पढ़े लिखे और लोकतांत्रिक स्वभाव के लोगों को लल्लू समझा जाने लगा। संजय गांधी के रोड रोलर रवैये से बहुत से लोग आक्रोशित हुए थे। देवेन्द्र द्विवेदी तब कोई तोप नहीं थे जो उनकी कोई सुनता और सम्मान की जगह देता। माना जाता था कि इमरजंसी में संजय गांधी भी उनसे नाराज थे।





संजय की अकाल मौत ने राजीव गांधी को राजनीति में धकेला और सिख आतंकवाद की शिकार हुई इंदिरा गांधी की मृत्यु ने उन्हें जबरन सत्ता में बैठा दिया। राजीव गांधी को लुंपन लोगों और राजनीतिक अड्डेबाजों से समान रूप से छड़क पड़ती थी। उनने नये किस्म के प्रोफेशनल लोगों को राजनीति और सत्ता में प्रतिष्ठित किया जो न भारत की जमीनी राजनीति में न पले पनपे थे न मध्यवर्ग के उस बौध्दिक वर्ग से आये थे जो जोरदार बहस के बिना कोई बात मानता नहीं था।



बनारस के हिन्दू विश्वविद्यालय की ठेठ छात्र राजनीति और समाजवादी पार्टी की अराजक बौध्दिकतावाद में से निकले देवेन्द्र द्विवेदी में वह नफासत नहीं थी जिसे अंग्रेजी स्नाबरी कहा जाता है। उनकी बौध्दिकता पश्चिम खासकर अमेरिकी छिछलेपन की नकल से इतराने वाले लोगों को बहुत कंटीली और कोनेवाली लगती थी। राजीव गांधी के जमाने में सफारी पहननेवाले स्मूद आपरेटरों में देवेन्द्र द्विवेदी कुछ देशी लाल बुझक्कड़ जैसे माने जाते थे।



अमेरिका के कारनेल लॉ स्कूल में कानून पढ़कर आये देवेन्द्र जी वकालत करने लगे थे और सन 74 से 80 तक राज्यसभा में भी रहे। लेकिन उनका असली समय सत्ता में नरसिंहराव के दुर्घटना उदय के साथ होना चाहिए था। नहीं हुआ। नरसिंहराव को लगता था कि कांग्रेसी सत्ता की सच्ची हकदार तो सोनिया गांधी को मानते हैं। मैं तो इंपोस्टर हूं। इसलिए वे ज्यादातर कांग्रेसियों पर भरोसा नहीं करते थे। उत्तर प्रदेश और बिहार के नेताओं के बारे में उन्हें लगता था कि सारे नेता मिलकर उनकी कुर्सी हिलाने में लगे हुए हैं।



फिर भी नरसिंहराव मानते थे कि मंडल ताकतों को अपनाए बिना भाजपा के हिन्दुत्व से निपटना मुश्किल है। भाजपा हिन्दी इलाकों में ही पनपी थी और कांग्रेस का पर्याय बन गयी थी। ऐसे में नरसिंहराव ने देवेन्द्र द्विवेदी को साथ लिया था जो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पहली पंक्ति के नेता नहीं थे। नरसिंहराव के लिए देवेन्द्र जी उपयोगी राजनीतिक आपरेटर थे। वे द्विवेदी के जरिए प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं को मैनुपुलेट करने की कोशिश करते थे। हिन्दी इलाके के लिए नरसिंहराव की कोई नयी राजनीति नहीं थी जिसकी हरकारी देवेन्द्र जी करते।



देवेन्द्र द्विवेदी के पास अपना कोई व्यापक और शक्तिशाली आधार भी नहीं था जिस पर वे नरसिंहराव की अध्यक्षता में कोई नयी राजनीति खड़ी करते। फिर कांशीराम, मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश को ऐसे राजनीतिक अखाड़े में उतार दिया था जहां देवेन्द्र द्विवेदी जैसे राजनेताओं को बल और दांव-पेंच के लिए गुंजाईश नहीं थी। नरसिंहराव चाहते तो देवेन्द्र द्विवेदी को महत्वपूर्ण राजनीतिक जिम्मेदारी सौंप सकते थे लेकिन वे शायद जानते थे कि वे तो स्टाप गैप की भूमिका में है और गोटियां बैठाकर उन्हें अपना काम निकाल लेना है।



सच पूछिये तो देवेन्द्र द्विवेदी उनके लिए कितने ही उपयोगी रहे हों लेकिन नरसिंहराव ने उन्हें कुछ नहीं बनाया। बनाया भी तो अतिरिक्त महाधिवक्ता। यानी वे दिल्ली में रहें, कानूनी लोगों में घूमें फिरें और नरसिंहराव के छोटे-मोटे संकट मोचक बने रहें। राजनीति में काम करनेवाले और सत्ता में भागीदारी चाहनेवाले लोग ही इन दिनों ज्यादा आते हैं। उन्हें सिध्दांतों, नीतियों और विमर्श से कुछ लेना देना नहीं होता है। ऐसे में देवेन्द्र जी कोई काम के नहीं थे। नरसिंहराव के विश्वासी वृत्त में होने के बावजूद राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों में अब भी बाहरी और हाशिये के आदमी बने रहे।



इन्हीं वर्षों में उन्हें लगने लगा कि उनके लिए चिलम तो भरती है लेकिन हथेलियों में दबाकर सुट्टा मारने के लिए मुंह तक लाने से पहले ही ढुल जाती है। धीरे धीरे वे दिल्ली के राजनीतिक, बौध्दिक और पत्रकारीय इलाकों में एक ट्रैजिक फिगर हो गये। मनमोहन सिंह के नव उदार राज के खुले खेल फर्रूखाबादी में राजनीति ऐसी बदली कि उद्योग व्यापार का ही बोलबाला हो गया। प्रमोद महाजन और अमर सिंह जैसे दलालों के हाथ में सत्ता की चाभी आ गयी।



बाजार और उद्योग की किसी लाबी के साथ आप नहीं हैं तो राजनीति में टिके रहना भी मुश्किल हो गया है। पैसा इतना हावी हो गया है कि लोक राजनीति की बात करने वाले या तो शोहदे माने गये या फिर लोगों को पटाने वाले ठग। जाति, संप्रदाय और उद्योग व्यापार को तरकीब और करामात से साधने वाली राजनेताओं की नयी पौध पनपी। उनके बीच देवेन्द्र द्विवेदी न तो राजनीति के थे और न वकालत के। राजनीति के लोगों को लगता था कि उनका समय कब का निकल गया है, अब या तो वे एक भग्नावशेष हैं या तो स्मारक।



तभी अचानक उन्हें गुजरात का राज्यपाल बना दिया गया। उन्हें क्या लगा मैं नहीं जानता। उन्हें बुखार था। क्रोसिन खा खा कर वे टिके रहे। न उनने और न किसी और ने उनकी सेहत का ख्याल नहीं रखा। इक्कीस जुलाई तक उनके लीवर में तगड़ा इन्फेक्शन हो गया। गंगाराम अस्पताल लीवर के इलाज में खासा नाम रखता है। वहां तीस जुलाई को उनकी किडनी ने काम करने से इंकार कर दिया। इतने प्रपंच कि शरीर जवाब दे गया। गांधीनगर में राज्यपाल पद की शपथ धरी रह गयी। भगवान ने चौहत्तर साल की उमर में उनकी चिलम ढोल दी। कुछ लोगों के साथ भगवान बहुत जालिम होता है। क्यों?



(आलोक तोमर के सौजन्य से )


१५० वर्ष की हिन्दी कविता का अनूठा पुनर्पाठ

पुस्तक -चर्चा



१५० वर्ष की हिन्दी कविता का अनूठा पुनर्पाठ








जाति क्या है? एक परिभाषा यह है कि ऐसे वृहत समाज कोजातिकहेंगे जिसे एक भाषा, पूर्वज, इतिहास, संस्कृति आदि के माध्यम से जोड़ा जा सकता है; और मोटे तौर पर कहा जाए तो वह समाज जो इन तत्त्वों के प्रति गौरव का अनुभव करे। जातीयता में भाषा की अहम भूमिका होती है, जो जाति को एक सूत्र में बाँधे रखती है। भाषा है तो साहित्य है और साहित्य है तो कविता भी। भारतीय कवियों ने जातीयता पर कई रचनाएँ रचीं, जिनका स्वरूप भी समय के साथ बदलता रहा। जातीयता और उससे जुड़ी कविताओं के साहित्यिक स्वरूप की पड़ताल करती है डॉ. कविता वाचक्नवी की शोधपूर्ण कृति- कविता की जातीयता



कविता की जातीयताको सात अध्यायों में बाँटा गया है। प्रथम अध्याय मेंभारतीय संस्कृति और जातीयता की संकल्पनाका परिचय मिलता है। जातीयता, भारतीय संस्कृति तथा आधुनिक हिंदी साहित्य में जातीयता जैसे विषयों को उद्धृत करेत हुए डॉ. कविता वाचक्नवी ने यह निष्कर्ष निकाला है कि "साहित्यानुशीलन की जातीय दृष्टि संस्कृति, भाषा, इतिहास, दर्शन, परम्परा, पूर्वज, भौगोलिक सीमा, संविधान, जनता, लोक सभ्यता उसकी मानवीय संवेदना और बंधुत्व इत्यादि तत्त्वों पर आधारित है।"


दूसरे अध्याय- आधुनिक हिंदी कविता में अभिव्यक्त देशानुराग की भावना में भौगोलिक परिवेश, राष्ट्रभक्ति, भारतीय लोक, भाषा-प्रेम तथा इनसे जुड़े राष्ट्रीय नायकों के संदर्भों पर चर्चा की गई है। समयानुसार साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से जनता तक संदेश पहुँचाते रहे हैं। इस संदर्भ में लेखिका ने ध्यान दिलाया कि " यह देखना महत्त्वपुर्ण है कि विविध कालखंडों में अपने समय को सम्बोधित करने के लिए, कभी वर्तमान की सम्भावना जगाने, कभी विचार का बीज वपन करने, कभी शौर्य और बल की उत्प्रेरक बनने के लिए वह [कविता] जिन माध्यमों का आश्रय लेती है, वे माध्यम वह कहाँ से परम्परा में कितने गहरे डूब-उतरा कर खोजती है।"[पृ. ९९]


तीसरे अध्याय - हिंदी कविता में अभिव्यक्त राष्ट्रीय हित की चिंतामें देश के स्वतंत्रता-संघर्ष से लेकर पुनर्निर्माण की चुनौतियों तक में कविता की भूमिका पर चिंतन-मनन किया गया है। स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान साहित्य ही ने तोवन्देमातरमऔरइन्क़िलाब ज़िंदाबादजैसे नारे दिए हैं। डॉ. कविता वाचक्नवी का विचार है कि "भारत का वर्तमान और भविष्य, उसकी सुरक्षा और सम्मान, उसके निवासियों के प्रति अपनी सन्नद्धता और इनके हित-अहित के प्रति सतर्क दृष्टि के कारण निषेध और स्वीकार के विवेक का आग्रह कविता के जातीय हित-चिंतन को अभिव्यक्त करता है।" [पृ.१२७]


कविता की जातीयता के चौथे अध्याय का शीर्षक है आधुनिक हिंदी कविता में अभिव्यक्त भारतीय जनभावना इस अध्याय में एक कृषिप्रधान देश के संघर्षशील जन की भावनाओं से प्रेरित कविताओं को संदर्भित किया गया है। कृति के पाँचवें अध्याय में आधुनिक हिंदी कविता के उन पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है जो भारतीय मानस तथा जीवन-मूल्यों से जुड़ी हैं। इस संदर्भ में डॉ. कविता वाचक्नवी कहती हैं कि "कविता ने मनुष्य में छिपी उन समस्त अच्छाइयों को उद्घाटित करने के अथक प्रयास किए, जिन्हें वातावरण, दृष्टिकोण, परिस्थितियाँ और स्वभाव आदि बीसियों परदे ढाँप-दबा देते हैं।" [पृ.२४५]


छठे अध्याय में आधुनिक हिंदी कविता में जातीयता और दर्शन पर प्रकाश डाला गया है। इस अध्याय में जीवन, आस्था, अध्यात्म और मिथक जैसे विषयों की पड़ताल करने के बाद डॉ. कविता वाचक्नवी इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि "कुल मिलाकर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पिछले लगभग डेढ़ सौ साल की काव्य-चेतना के मिथक सम्पूर्ण [इक्का-दुक्का को छोड़] भारतीय परम्परा से अधिगृहित आयत्त किए गए हैं।"[पृ.३११]


उपसंहार में डॉ. कविता वाचक्नवी ने हिंदी कविता की डेढ़ सौ वर्ष की यात्रा का निचोड़ यह निकाला कि "आधुनिक हिंदी कविता ने इस सामासिकता, बहुलता अथवा कुटुम्ब संस्कृति के सभी पहलुओं का भारतेंदु युग से लेकर आज तक परिवर्तनशील सामाजिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में सार्थक एवं सटीक चित्रण किया है।"[पृ.३३८] इस निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए लेखिका ने भारतेंदु, प्रतापनारायण मिश्र, रामनरेश त्रिपाठी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, निराला, नागार्जुन आदि से लेकर धर्मवीर भारती, कुँवर नारायण, धूमिल, देवराज, लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल, ऋषभदेव शर्मा, उदय प्रकाश, राजेश रेड्डी इत्यादि ५० रचनाकारों की कविताओं का विश्लेषण किया है।


पुस्तक के प्राक्कथन में डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय ने इस कृति की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा - "डॉ. कविता वाचक्नवी के इस ग्रंथ की विशेषता यह भी है कि उन्होंने साहित्य और जातीयता के पारम्परिक संबंधों को पहचानते हुए भी इस संबंध को गतिशीलता दी, उनका यह काम किसी हद तक नवीनतम जीन्स प्रौद्योगिकी के अनुरूप ही है जो जीन्स और डीएनए में वंश, जाति, देश आदि के तत्त्वों की उपस्थिति सिद्ध कर चुकी है।.....मैं डॉ. कविता वाचक्नवी को एक अनिवार्य विषय पर हिंदी पाठक का ध्यान आकर्षित करने के लिए धन्यवाद देता हूँ।" आशा है यह पुस्तक पाठकों और शोधार्थियों के लिए एक संदर्भ ग्रंथ के रूप में उपयोगी सिद्ध होगी।



पुस्तक विवरण


पुस्तक का नाम : कविता की जातीयता
लेखक : डॉ. कविता वाचक्नवी
प्रथम संस्करण : मई २००९ई.
पृष्ठ संख्या : ३६६
मूल्य : २२५ रुपये मात्र
प्रकाशक : सचिव, हिंदुस्तानी एकेडेमी
१२ डी, कमला नेहरू मार्ग
इलाहाबाद - २११ ००१
[.प्र.]


मेरे रोम- रोम से तुम्हारी कस्तूरी फूटती है




मेरे रोम- रोम से तुम्हारी कस्तूरी फूटती है
- कविता वाचक्नवी







आप
में से जो लोग कविता पढ़ने (लिखने-भर नहीं) में रुचि रखते हैं उन्होंने गहरी संवेदनात्मक से लेकर विचार-प्रखर तक और आग लगा देने वाली से लेकर नथुने फड़काने वाली तक कई प्रकार की कविताएँ सुनी - पढ़ी होंगीवैसे जो लोग साहित्य वालों को दोयम दर्जे का समझते हैं उन्होंने भी कम से कम अपने मिडिल स्कूल तक भाषा वाले विषयों में कविताएँ अवश्य पढ़ी ही होंगीइन अर्थों में प्रत्येक मिडिल क्लास तक पढ़ा व्यक्ति भी उसकी शक्ति से परिचित होता है, उसकी धार से परिचित होता है उसके स्वरूप से परिचित होता ही हैऔर, एक मजे की बात और है कि युवावस्था के कच्चे प्रेम में पड़ कर लगभग सभी ने कविता का आश्रय लिया होगा, भले ही अपनी लिखी हों या किसी दूसरे की शायरी, कविताई या कलाम से काम चलाया होगायहाँ एक रोचक तथ्य और है ( लिंग विभाजन वाले माफ़ करें) कि आयु के उस दौर में श्रृंगाररस ( संयोग और वियोग दोनों ही) में डूबे लोगों का यदि सर्वेक्षण किया जाए तो युवतियों से अधिक युवक कविता का सहारा लेते हैं, भले ही राज--दिल बयान करना हो या दर्द--दिलदिल के टुकड़े दिखाने हों या चाक--जिगरयह तथ्य जाने किस इंगित की ओर इशारा करता है कि लड़कियों की अपेक्षा ऐसी स्थिति में अकवि से अकवि युवक अधिक संख्या में कविताई को अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में प्रयोग करते है



यह तो रही प्रस्तावना, मुद्दा यह है कि आख़िर कविता की आवश्यकता है क्यों, क्या करती है कविता, कैसी होती है या क्या छिपा रहता है उसमें कि हर देश, हर भाषा में कवि को अत्यन्त श्रेष्ठ स्थान प्राप्त होता है, ...और भी सम्बद्ध कई तथ्य, ! आप भारत में हिन्दी के कवि की स्थिति का उदाहरण देकर मेरी बात काटने की दिशा में मत जाइए क्योंकि जो तर्क आप देने जा रहे हैं वही तर्क इसे प्रमाणित करता है कि हिन्दी के कवि की दुर्गत जैसी स्थिति के बावजूद भी यहाँ कवि वर्षा में कुकुरमुत्तों की मानिंद क्षण- क्षण और- और प्रकट होते रहते हैं, कुछ भी लिख कर कवि कहलाने के लोभ में त्रस्त होने ( `करने' पढ़ा जाए) की सीमा तक व्यस्त रहते हैं और दूसरों की रचनाओं पर हाथ साफ़ करने तक का परहेज भी वे नहीं मानते| ये सब तथ्य इसी बात का तो प्रमाण हैं कि कवि होना कोई बहुत ही बड़ी उपलब्धि की बात है, और कविता, वह कोई अत्यन्त विशिष्ट कौशलबात वहीं आती है कि कविता की आवश्यकता ही रहे तो ये सारे जंजाल मिटें। नित नए नए ज्ञान-विज्ञान के युग में क्या जरूरत है इसकी ?




झंडा और डंडा उठाने वाले लोग मेरी ओर लपकने को तैयार हो रहे होंगे कि अरे हमारी कुछ प्रविष्टियों को लिंकित करो और जाओ यहाँ सेलिंक को हायपर लिंक बना उसको दुहराते दिखाना भर ही तो चर्चाकार का काम है, इस से आगे वह यहाँ क्यों लिखने लगे हैं ? अपने मत देने का आपका अधिकार है, पर हमारा उस से विमत होने का भी अधिकार बना रहने की स्वतंत्रता का लाभ उठाते हुए मुझे आगे बढ़ना होगा




तो, फिर आते हैं कविता परमुझे लगभग वर्ष -भर पूर्व कि एक घटना याद रही ही । श्री उदय प्रताप सिंह, (वरिष्ठ साहित्यकार एवं राजनेता) के सान्निध्य में एक कवि गोष्ठी हुई, उनके साथ कुछ अरब देश के अधिकारी भी थे तो उर्दू हिन्दी के गिने - चुने कवियों को आमंत्रित किया गया था काव्यपाठ के लिएसंभवतः मैं अकेली महिला रचनाकार रही हूँगीउर्दू के कई बड़े शायर मुम्बई से भी आए थेमैंने उस दिन रिश्तों पर अपनी गज़लें पढींकार्यक्रम के अंत में जब उन राजनयिक के वक्तव्य का समय आया तो उन्होंने एक बहुत मार्के की बात की, जिस से कविता की आवश्यकता का सही सही अनुमान हो जाता हैउन्होंने कहा कि सायंस, गणित, भौतिकी, रसायन या अभियांत्रिकी के किसी भी विद्यार्थी को सारा ज्ञान -विज्ञान पा लेने के बाद भी साहित्य के अतिरिक्त कोई विषय ऐसा नहीं जो यह बताता हो कि, भले मानुष ! संसार में सम्बन्धों और रिश्तों की क्या जरूरत हैमनुष्य से मनुष्य के सम्बन्ध की सीख कोई नहीं देता, दे सकतारिश्ते वाली ग़ज़लों का उदाहरण देकर उन्होंने इसे इतने पारदर्शी तरीके से बताया कि रिश्तों की यह समझ और उनकी जरूरत केवल काव्य और साहित्य ही बयान कर सकता है, सिखला सकता है, समझा सकता हैसाहित्य में स्नातकोत्तर और उस से आगे शिक्षा पाने वाले विद्यार्थियों को भारतीय पाश्चात्य काव्यशास्त्र ( पोएटिक्स ) भी पढ़ाया जाता हैउसमें आरंभिक स्तर पर काव्य के तत्व से लेकर काव्य के प्रयोजन भी सम्मिलित होते हैंमुझे कई बार लगता है कि नैसर्गिक प्रतिभा से इतर कवि बनने के अभ्यासियों को कम से कम इतना तो अवश्य पढ़ना चाहिएताकि वे अपनी कविताओं का मूल्यांकन कर सकें और बेहतर योगदान दे सकें




जो लोग पाठकीय रुचि वाले कभी नहीं रहे, ब्लॉग प्रणाली ने उन्हें कुछ कुछ पढ़ने को विवश कर दिया है, भले ही इसलिए कि दूसरों का पढ़ कर टिप्पणी करेंगे तो बदले में टिप्पणी आएगी भीऔर साथ ही, पुस्तक को खरीद कर पढ़ना सभी के लिए उतना सुगम नहीं है, जितना नेट ने तात्क्षणिकता सुगमता से पाठकीयता को प्रसरित किया है। नेट पर कविताओं की संख्या में दिनों दिन, दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि हो रही है। बहुत अच्छी कविताएँ भी देखने पढ़ने को उपलब्ध हो रही हैं और बहुत दोयम दर्जे की भी। मुझे याद है, अपने विद्यार्थी जीवन के वे दिन जब एक कविता को इसलिए पढाया जाता था कि विद्यार्थियों को उदाहरण दिया जा सके कि ऐसी निरर्थक कविता भी क्या कविता। उस कविता को वर्षों पुरानी स्मृति से छाँट कर याद करुँ तो एकाध पंक्ति याद है -

" काश अगर मैं तोता होता
तोता होता तो क्या होता
........
.......
........
तो-तो-तो-तो
ता-ता-ता-ता
तोता होता
तो क्या होता "


तो अच्छी कविताओं और काव्य-भ्रष्ट कविताओं का अम्बार हिन्दी के सौभाग्य व दुर्भाग्य दोनों की कहानी कहता है। लोगों को यही नहीं पता कि कविता होती क्या है, उसके तत्त्व क्या हैं। उसकी देह क्या है व आत्मा क्या है। किसी ने देह को साध लिया तो किसी ने उसे भी साधने की जरूरत न समझी और अपने को कविराज मानते-मनवाते रहे।
इसी प्रकार का एक उदाहरण है, जहाँ एक ख्यातनाम कवि ( ...) ने अपनी माँ पर केंद्रित कविता में काफ़िया मिलाने के चक्कर में कमाल कर दिया। यह रचना भी पूरी मुझे स्मरण नहीं, किंतु उसमें संभवत: जीवन के द्वंद्वों की डोर पर संतुलन साधे चलने वाली माँ बताते हुए `नटनी' का काफ़िया प्रयोग किया गया था - "नटनी जैसी माँ" । इतने तक तो ठीक था, अब उसके आगे की पंक्ति में माँ की उपमा रोटी पर " चटनी जैसी माँ" कह कर बयान कर दी गयी। हद्द हो गयी भई यह तो। काव्यभाषा का संस्कार कहाँ से लाइयेगा?




माँ पर ऐसी ऐसी मार्मिक कवितायेँ लिखी गयी हैं कि संवेदना और श्रेष्ठता की दृष्टि से हिन्दी में इनका आँकड़ा सर्वाधिक होगा, इससे अगला स्थान संभवतः बेटियों पर केंद्रित कविताओं का निकलेगा। तो, सर्वाधिक सबल सम्बन्ध पर ऐसे चलताऊ ढंग से लिखना कभी कभी कितना घातक हो सकता है। यह ध्यान देने की बात है।अस्तु !




आज हिन्दी ब्लॉग जगत में इधर पढने को मिलीं माँ पर केंद्रित कविताओं में से कुछ को इस बार बाँटा जाए |




गत दिनों बोधिसत्व जी की माँ पर केंद्रित कविता माँ का नाच पढ़ने को मिली थी, कविता में माँ की पीड़ा का चित्र देखिए -



मटमैले वितान के नीचे
इस छोर से उस छोर तक नाच रही थी माँ
पैरों में बिवाइयां थीं गहरे तक फटी
टूट चुके थे घुटने कई बार
झुक चली थी कमर
पर जैसे भंवर घूमता है
जैसे बवंडर नाचता है
नाच रही थी माँ

आज बहुत दिनों बाद उसे
मिला था नाचने का मौका
और वह नाच रही थी बिना रुके
गा रही थी बहुत पुराना गीत
गहरे सुरों में

अचानक ही हुआ माँ का गाना बंद
पर नाचना जारी रहा
वह इतनी गति में थी कि परबस
घुमती जा रही थी
फिर गाने कि जगह उठा
विलाप का स्वर
और फैलता चला गया उसका वितान

वह नाचती रही बिलखते हुए
धरती के इस छोर से उस छोर तक
समुद्र की लहरों से लेकर जुते हुए खेत तक
सब भरे थे उसकी नाच की धमक से
सब में समाया था उसका बिलखता हुआ गान ।



आप ने किसी एक फ़िल्म के `मेरे पास माँ है' वाले संवाद की तो खूब चर्चा सुनी होगी, अब ज़रा इन पंक्तियों पर ध्यान दें -

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई,
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई




माँ के जीवन क्रम का एक चित्र यह, यहाँ भी देखें

माँ की डिग्रियाँ


घर के सबसे उपेक्षित कोने में
बरसों पुराना जंग खाया बक्सा है एक
जिसमें तमाम इतिहास बन चुकी चीजों के साथ
मथढक्की की साड़ी के नीचे
पैंतीस सालों से दबा पड़ा है
माँ की डिग्रियों का एक पुलिन्दा

बचपन में अक्सर देखा है माँ को
दोपहर के दुर्लभ एकांत में
बतियाते बक्से से
किसी पुरानी सखी की तरह
मरे हुए चूहे सी एक ओर कर देतीं
वह चटख पीली लेकिन उदास साड़ी
और फिर हमारे ज्वरग्रस्त माथों सा
देर तक सहलाती रहतीं वह पुलिंदा



माँ की डिग्रियों वाली कविता के बरक्स इस कविता को भी रख कर देखें कि माँ का मातृत्व इन औपचारिकताओं से कहीं परे की चीज है -

अनपढ़ माँ

चूल्हे-चौके में व्यस्त
और पाठशाला से
दूर रही माँ
नहीं बता सकती
कि ''नौ बाई चार'' की
कितनी ईंटें लगेंगी
दस फीट ऊँची दीवार में
...लेकिन अच्छी तरह जानती है
कि कब, कितना प्यार ज़रूरी है
एक हँसते-खेलते परिवार में।

त्रिभुज का क्षेत्रफल
और घन का घनत्व मापना
उसके लिए स्यापा है
...क्योंकि उसने मेरी छाती को
ऊनी धागे के फन्दों
और सिलाइयों की
मोटाई से नापा है

वह नहीं समझ सकती
कि 'ए' को 'सी' बनाने के लिए
क्या जोड़ना या घटाना होता है
...लेकिन अच्छी तरह समझती है
कि भाजी वाले से
आलू के दाम कम करवाने के लिए
कौन-सा फॉर्मूला अपनाना होता है।

मुद्दतों से खाना बनाती आई माँ ने
कभी पदार्थों का तापमान नहीं मापा
तरकारी के लिए सब्ज़ियाँ नहीं तौलीं
और नाप-तौल कर
ईंधन नहीं झोंका
चूल्हे या सिगड़ी में
...उसने तो बस ख़ुशबू सूंघकर बता दिया
कि कितनी क़सर बाकी है
बाजरे की खिचड़ी में।

घर की
कुल आमदनी के हिसाब से
उसने हर महीने राशन की लिस्ट बनाई है
ख़र्च और बचत के अनुपात निकाले हैं
रसोईघर के डिब्बों,
घर की आमदनी
और पन्सारी की रेट-लिस्ट में
हमेशा सामन्जस्य बैठाया है
...लेकिन अर्थशास्त्र का एक भी सिध्दान्त
कभी उसकी समझ में नहीं आया है।

वह नहीं जानती
सुर-ताल का संगम
कर्कश, मृदु और पंचम
सरगम के सात स्वर
स्थाई और अन्तरे का अन्तर
....स्वर साधना के लिए
वह संगीत का
कोई शास्त्री भी नहीं बुलाती थी
...लेकिन फिर भी मुझे
उसकी लल्ला-लल्ला लोरी सुनकर
बड़ी मीठी नींद आती थी।

नहीं मालूम उसे
कि भारत पर कब, किसने आक्रमण किया,
और कैसे ज़ुल्म ढाए थे
आर्य, मुगल और मंगोल कौन थे,
कहाँ से आए थे?
उसने नहीं जाना
कि कौन-सी जाति
भारत में अपने साथ क्या लाई थी
लेकिन हमेशा याद रखती है
कि नागपुर वाली बुआ
हमारे यहाँ कितना ख़र्चा करके आई थी।

वह कभी नहीं समझ पाई
कि चुनाव में
किस पार्टी के निशान पर मुहर लगानी है
लेकिन इसका निर्णय हमेशा वही करती है
कि जोधपुर वाली दीदी के यहाँ
दीवाली पर कौन-सी साड़ी जानी है।

मेरी अनपढ़ माँ
वास्तव में अनपढ़ नहीं है
वह बातचीत के दौरान
पिताजी का चेहरा पढ़ लेती है
झगड़े की सम्भावनाओं को भाँप कर
बात की दिशा मोड़ सकती है
काल-पात्र-स्थान के अनुरूप
कोई भी बात
ख़ूबसूरत मोड़ पर लाकर छोड़ सकती है

दर्द होने पर
हल्दी के साथ दूध पिला
पूरे देह का पीड़ा को मार देती है
और नज़र लगने पर
सरसों के तेल में
रूई की बाती भिगो
नज़र भी उतार देती है

अगरबत्ती की ख़ुशबू से
सुबह-शाम सारा घर महकाती है
बिना काम किए भी
परिवार तो रात को
थक कर सो जाता है
लेकिन वो सारा दिन काम करके भी
परिवार की चिन्ता में
सो नहीं पाती है।

सच!
कोई भी माँ अनपढ़ नहीं होती
सयानी होती है
क्योंकि
कई-कई डिग्रियाँ बटोरने के बावजूद
बेटियों को उसी से सीखना पड़ता है
कि गृहस्थी कैसे चलानी होती है।


माँ को तलाशती रतन चौहान की एक छोटी-सी कविता के मर्म तक पहुँच कर मौन के सिवा कुछ नहीं सूझेगा -


माँ के लगाए गए सहजन में
फूल आ गए हैं

उसकी नर्म टहनियाँ
वसन्त हो गई हैं

अब अब कुछ ज़्यादा काँपने
लग गए माँ के हाथों ने
इसे अपनी सहोदर धरती
की कोख में रोपा था दो एक ऋतु पहले

झुर्रियों से भरी माँ की उंगलियों को छूकर
धरती आर्द्र हो गई थी

सहजन बूढ़ी माँ का बेटा
है
ग्रीष्म की लू लपट में
माँ की स्मृतियों को छाँह देता हुआ

सहजन में फूल आ गए हैं
माँ नहीं है


समीरलाल जी की इस कविता में निहित वेदना को भी गत दिनों आप ने अवश्य अनुभव किया होगा -



मेरी माँ लुटेरी थी...

माँ!!

तेरा
सब कुछ तो दे दिया था तुझे
विदा करते वक्त
तेरा
शादी का जोड़ा
तेरे सब जेवर
कुंकुम,मेंहदी,सिन्दूर
ओढ़नी
नई
दुल्हन की तरह
साजो
सामान के साथ
बिदा
किया था...

और हाँ
तेरी छड़ी
तेरी एनक,
तेरे नकली दांत
पिता
जी ने
सब कुछ ही तो
रख दिये थे
अपने हाथों...
तेरी
चिता में

लेकिन
फिर भी
जब से लौटा हूँ घर
बिठा कर तुझे
अग्नि रथ पर
तेरी छाप क्यों नजर आती है?

वह धागा
जिसे तूने मंत्र फूंक
कर दिया था जादुई
और बांध दिया था
घर
मोहल्ला,
बस्ती
सभी को एक सूत्र में

आज
अचानक लगने लगा है
जैसे टूट गया वह धागा
सब कुछ
वही तो है
घर
मोहल्ला
बस्ती
और वही लोग
पर घर की छत
मोहल्ले का जुड़ाव
और
बस्ती का सम्बन्ध
कुछ ही तो नहीं
सब कुछ लुट गया है न!!

हाँ माँ!

सब कुछ
और ये सब कुछ
तू ही तो ले गई है लूट कर
मुझे पता है
जानता हूं न बचपन से
तेरा लुटेरा पन.
तू ही तो लूटा करती थी
मेरी पीड़ा
मेरे दुख
मेरे सर की धूप
और छोड़ जाती थी
अपनी लूट की निशानी
एक मुस्कान
एक रस भीगा स्पर्श
और स्नेह की फुहार
अब सब कुछ लुट गया है!!

स्तम्भित हैं
पिताजी तो
यह भी नहीं बताते
आखिर
कहां लिखवाऊँ
रपट अपने लुटने की
घर के लुटने की
बस्ती और मोहल्ले के लुटने की

और सबसे अधिक
अपने समय के लुट जाने की....





ऐसे ही माँ की कमी महसूसती एक पुकार यहाँ भी है -

माँ


माँ !
तुम्हारी लोरी नहीं सुनी मैंने,
कभी गाई होगी
याद नहीं
फिर भी जाने कैसे
मेरे कंठ से
तुम झरती हो।


तुम्हारी बंद आँखों के सपने
क्या रहे होंगे
नहीं पता
किंतु मैं
खुली आँखों
उन्हें देखती हूँ ।



मेरा मस्तक
सूँघा अवश्य होगा तुमने
मेरी माँ !
ध्यान नहीं पड़ता
परंतु
मेरे रोम- रोम से
तुम्हारी कस्तूरी फूटती है ।



तुम्हारा ममत्व
भरा होगा लबालब
मोह से,
मेरी जीवनासक्ति
यही बताती है ।




और
माँ !
तुमने कई बार छुपा-छुपी में
ढूँढ निकाला होगा मुझे
पर मुझे
सदा की
तुम्हारी छुपा-छुपी
बहुत रुलाती है;

बहुत-बहुत रुलाती है ;
माँ !!!





माँ की स्मृति में ऋषभदेव जी की लिखी इस कविता में संबंधों कि तरलता के साथ लोक में रमे माँ के चित्र विभोर कर देते हैं -


बनाया था माँ ने वह चूल्हा


चिकनी पीली मिट्टी को
कुएँ के मीठे पानी में गूँथ कर
बनाया था माँ ने वह चूल्हा
और पूरे पंद्रह दिन तक
तपाया था जेठ की धूप में
दिन - दिन भर



उस दिन
आषाढ़ का पहला दौंगड़ा गिरा,
हमारे घर का बगड़
बूँदों में नहा कर महक उठा था,
रसोई भी महक उठी थी -
नए चूल्हे पर खाना जो बन रहा था.



गाय के गोबर में
गेहूँ का भुस गूँथ कर
उपले थापती थी माँ बड़े मनोयोग से
और आषाढ़ के पहले
बिटौड़े में सजाती थी उन्हें
बड़ी सावधानी से .



बूँदाबाँदी के बीच बिटौड़े में से
बिना भिगोए उपले लाने में
जो सुख मिलता था ,
आज लॉकर से गहने लाने में भी नहीं मिलता.



सूखे उपले
भक्क से पकड़ लेते थे आग
और
उँगलियों को लपटों से बचाती माँ
गही में सेंकती थी हमारे लिए रोटी
- फूले फूले फुलके.



गेहूँ की रोटी सिंकने की गंध
बैठक तक ही नहीं , गली तक जाती थी.
हम सब खिंचे चले आते थे
रसोई की ओर.



जब महकता था बारिश में बगड़
और महमहाती थी गेहूँ की गंध से रसोई -
माँ गुनगुना उठती थी
कोई लोकगीत - पीहर की याद का.



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.



आग बढ़ती है
तो रोटी जलने लगती है.
तेरे बहनोई को जली रोटी पसंद नहीं रे!
रोटी को बचाती हूँ तो उँगली जल जाती है.



माँ की उँगलियाँ छालों से भर जाती थीं
पर पिताजी की रोटी पर एक भी काला निशान कभी नहीं दिखा!



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
बड़े बदमाश हैं ये झोंके ,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.



आग बुझती है
तो रोटी फूलती नहीं
तेरा भानजा अधफूली रोटी नहीं खाता रे!
बुझी आग जलाती हूँ तो आँखें धुएँ से भर जाती हैं.



माँ की आँखों में मोतियांबिंद उतर आया
पर मेरी थाली में कभी अधफूली रोटी नहीं आई!



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



रोटी बनाना सीखती मेरी बेटी
जब तवे पर हाथ जला लेती है,
आँखें मसलती
रसोई से निकलती है.
तो लगता है
माँ आज भी गुनगुना रही है .



मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न!
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी
.
गत दिनों आई माँ पर केंद्रित इन कुछ कविताओं के क्रम को विराम देते हुए मैं चर्चा परिवार की ओर से योगेन्द्र कृष्ण जी की माँ को भावांजली देती हूँ व उनकी आत्मा की सद्‍गति की प्रार्थना करती हूँ.

माह पूर्व एक संगोष्ठी में पटना जाने पर भाई योगेन्द्र कृष्ण से सपत्नीक मिलने का अवसर मिलाउनके सौजन्य ने प्रभावित कियागत दिनों उनकी माता जी का स्वर्गवास हो गया उन्होंने अपनी पीड़ा को सबसे बाँटते हुए जो लिखा उसके बाद कुछ कहने को नहीं रह जाता -


श्मशान में माँ

30 मार्च को मेरी माँ का निधन हो गया। दुःख इसलिए भी अधिक है कि माँ बहुत लंबे समय तक हमारे साथ रहीं और कभी यह मह्सूस करने का शायद अवसर ही नहीं दिया कि वे हमें छोड़कर चली भी जायेंगी। जबकि वे हम पांच भाइयों, एक बहन और दर्जनों पोता-पोतियों, नाती-नातिनों के बीच अंतिम समय तक अपने स्नेह और प्यार में बंटती रहीं। मृत्यु के समय उनकी आयु लगभग 95 वर्ष थी।
उसी दिन रात्रि में पटना के गुलबी घाट में उनका दाह-संस्कार कर दिया गया।

गंगा के इस श्मशान घाट के अपने कुछ ताज़ा ग़मग़ीन अनुभवों को भी आपसे साझा करने का मन है।

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उनका भी निष्काम देखो
जो तुम्हें नहीं जानतीं
फिर भी तुम्हारे लिए
तुम्हारे साथ जलकर राख हो रही हैं
वे ढेर सारी लकड़ियां
अंत तक तुम्हारी देह से
मिलकर एक हो रही हैं
राख में राख
क्या अलग कर पाएंगे हम
लकड़ी और देह की राख
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धू-धू कर जलती चिताएं हैं
आकाश में उठता काला धुआं
और रात्रि की भयावह नीरवता
को चीरती घाट की सीढियों से
नीचे उतरतीं कुछ आवाज़ें हैं

असमय एक युवा देह को
तलाश है मिट्टी की…

और फिर
सफ़ेद कपड़े में लपेटे
एक शिशु को दोनो हाथों मे उठाए
उतरता है एक युवक
साथ में और भी कई लोग
पर उतने भी नहीं
जितने कि होने चाहिए
दुःख की इस बीहड़ घड़ी में

और घाट की सीढियों से
उतरता है पीछे-पीछे
भारी पत्थर का एक बड़ा-सा टुकड़ा
बिलकुल अंधेरे में
गंगा तट की तरफ़…

पानी के बड़े बुलबुले छूटने-सी आवाज़
अर्द्ध-रात्रि की बीहड़ बेबस खामोशी को
हल्के से हिलाती है…

छोड़ दिए गए हैं
पत्थर और शिशु देह
कुछ दिनों के लिए
एक दूसरे के साथ
निबद्ध रहने के करार पर…
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श्मशान घाट तक आने में
कितना वजन था
हमारे कंधों पर
लेकिन नहीं था
फिर भी कोई भार

और अब जबकि लौट रहा हूं
लेकर मुट्ठी भर तुम्हारी राख
क्यों दब रहा है मन इसके भार से…

जैसे कि पत्थर हो कोई
बंधा हुआ मेरी ही देह से…

कल कई दिन बाद उन्होंने लिखा -

बारह दिनों के बाद आज ही सारे अनुष्ठान संपन्न कर वापस घर लौटा हूं। फ़र्श पर और सभी जगह धूल की मोटी परतें हैं पर उन परतों पर नहीं हैं कहीं अब उन नंगे पैरों के निशान……




और अंत में एक बात -

माँ के प्रति इतनी गहरी व इतनी सारी संवेदनाएँ हमारे भीतर विद्यमान रहती हैं, यदि ये संवेदनाएँ किसी भी जीवित माँ का वार्धक्य और जीवन संवार सकने में सफल हो जाएँ तो जाने कितनी माँओं को इन संवेदनाओं की पहुँच सुख दे सकती है। वरना तो ये कागद के लेखे बन कर रह जाती हैं बस.......




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