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अब से साहित्य अकादमी पुरस्कार के प्रायोजक हैं ......





अभी कुछ ही दिन पूर्व मुझे आलोक तोमर जी का एक अत्यंत सामयिक आलेख मिला जिसे मैंने अपने समूह हिन्दीभारत के साथियों को भी भेजा | लेख तो महत्वपूर्ण व विचारणीय था ही, आलेख पर जो प्रतिक्रियाएँ आईं वे भी बहुत सधी हुई व विमर्श की अपेक्षा करती हैं| इसलिए आज पहले उस आलेख को पढ़ें व नीचे क्रम से एक एक कर उस पर आए प्रतिलेखों को भी पढ़ें| विषय इतना जटिल व महत्वपूर्ण है कि अधिकाधिक कलमकारों की सहभागिता व विचारों की अपेक्षा करता है | अतः अपनी राय हमें देना ना भूलें कि आप क्या सोचते हैं इस विषय में | तो चलिए सर्वप्रथम सीधे पढ़ते हैं वह आलेख व फिर एक एक कर आए मान्य विचारकों की राय |
कविता वाचक्नवी




सैमसंग- साहित्य अकादमी पुरस्कार!
आलोक तोमर



साहित्य अकादमी पुरस्कार देश के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है। इस साल से इस पुरस्कार का नाम होगा सैमसंग साहित्य अकादमी पुरस्कार। अभी तक बड़ी और मल्टीनेशनल कंपनियां टीवी और सिनेमा के पुरस्कारों तक ही सीमित थी और क्रिकेट के मैच प्रायोजित करती थी, मगर अब कोरिया की इस कंपनी ने भारतीय साहित्य पर भी कब्जा कर लिया है। शुरूआत रवींद्र नाथ ठाकुर के नाम पर दिए जाने वाले पुरस्कार से हो रही है।


भारतीय शिक्षा और साहित्य जगत का लगभग सब कुछ बर्बाद कर देने वाले केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कोरिया की सैमसंग कंपनी के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है और सैमसंग के दक्षिण पश्चिमी एशिया के सीईओ जे जी छीन और एकेडमी सेक्रेटरी अग्रहरा कृष्णमूर्ति ने पिछले सप्ताह इस समझौते पर दस्तखत किए। अब सफाई में यह कहा जा रहा है कि पुरस्कार में सैमसंग का नाम नहीं जोड़ा जाएगा मगर पुरस्कार समारोह में साहित्य से ज्यादा सैमसंग के बैनर नजर आएंगे। टैगोर साहित्य सम्मान हर साल दिसंबर में घोषित किया जाता है और अभी साहित्य अकादमी के दूसरे पुरस्कार सैमसंग के घेरे से बचे हुए हैं। टैगोर पुरस्कार बांग्ला, हिंदी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, पंजाबी, तेलगु और वोडो भाषाओं में साहित्य के सम्मान के लिए दिए जाने है।


सैमसंग का कोई विद्वान निर्णायक मंडल में होगा या नहीं यह पता नहीं मगर सैमसंग के तरफ से कहा गया है कि कोरिया में साहित्य का बड़ा आदर होता है। सही बात तो यह है कि इस बात के भी कोई प्रमाण नहीं हैं कि कोरिया में कोई ठीक से हिंदी जानता है भी या नही। सैमसंग वालों के लिए, जैसे दूसरी कंपनियों के लिए भारत एक बड़ा बाजार है और इस बाजार में साहित्य में पूंजी निवेश उसके लिए बहुत बड़ा सौदा है। हम इस सौदे में शामिल हैं। सवाल है कि क्या हम इतने गरीब हो चुके हैं कि अपने साहित्यकारों को सम्मान और पुरस्कार देने के लिए हमें किसी विदेशी कंपनी की जरूरत पड़ती है? क्या भारतीय साहित्य में भी गरीबी की कोई सीमा रेखा है? अगर है तो साहित्य पर भी नरेगा कानून लागू क्यों नहीं किया जाता? भारत में साहित्य के नाम पर प्रकाशकों के गोरख धंधे से ले कर साहित्यिक शोध के नाम पर जो भयानक चोरी चकारी चलती है वह अपने आप में भयानक शर्मिंदगी का विषय है। लेकिन सैमसंग- साहित्य अकादमी संगम ने तो सबसे ज्यादा शर्मिंदा किया है। सैमसंग को अगर भारतीय साहित्य में इतनी ही रूचि थी तो अपना सैमसंग साहित्य पुरस्कार घोषित कर दिया होता। सैमसंग तो खैर धंधा कर रहा है मगर भारतीय साहित्य इतना बिकाऊ कैसे बन गया?


इस पर अनिल जनविजय जी ने लिखा 
                                                                        

हम भारतीय लेखकों को इस तरह के कुकृत्य का कड़ा विरोध करना चाहिए। साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएँ भी अब बेची और ख़रीदी जाने लगी हैं। मैं आलोक भाई से पूरी तरह सहमत हूँ कि साहित्य अकादमी को बाज़ार से न जोड़ा जाए। अगर ख़ुद लेखक विरोध करेंगे और यह पुरस्कार लेने से मना करेंगे तभी इस तरह की कार्रवाईयों पर रोक लगेगी। लेकिन विडम्बना तो यह है कि भारत में ज़्यादातर लेखक भी तो बिकाऊ हैं और गले में अपना मूल्य लटकाए बिकने के लिए तैयार बैठे हैं।



चन्द्रमौलेश्वर जी ने कहा
                                                                                            



अब तो हर क्षेत्र बाज़ारवादी हो गया है तो पुरस्कारों का क्षेत्र पीछे क्यों रहे। तो.... अब पुरस्कार भी मल्टीनेशनल हो गए



वरिष्ठ भाषाविद प्रो.सुरेश कुमार जी ने कहा

सीमित टिप्पणी : दक्षिण कोरिया से हिन्दी पढने के लिए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा में छात्र आते हैं. सोल (Seoul) स्थित वि.वि. में हिन्दी पढाने भारत से अध्यापक गये हैं और मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता हूं. परन्तु केवल इतने से सैमसंग का साहित्य अकादमी से इतनी गहराई से जुड जाने का औचित्य बन जाता है ? मैं भी कहूंगा नहीं. यह तो हमारे शेयर बाज़ार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जैसी बात हो गई. लेखक समुदाय चुप क्यॊं है ?


प्रो. ऋषभदेव शर्मा जी ने कहा

यह तो जी देखिए कोरी दुकानदारी लग रही है. अनुचित भी ,और अपमानजनक भी!
बेहतर शायद यह हो सकता था कि यदि संयुक्त या प्रायोजित पुरस्कार देने ही थे तो नया पुरस्कार खड़ा कर लिया होता.




अनूप भार्गव जी ने लिखा

इस विषय पर कई उन व्यक्तियों की टिप्पणियां पढने को मिली जिन का मैं बहुत आदर करता हूँ लेकिन फ़िर भी अपनी बात कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ जो शायद उन के विचारों से अलग हो । अग्रिम माफ़ी के साथ कुछ बिन्दु रखना चाहता हूँ :



· बात इस बात की नहीं होनी चाहिये कि सैमसंग का नाम पुरुस्कार के साथ हो या न हो , बात इस बात की होनी चाहिये कि हम पुरुस्कार की निष्पक्षता को बनाये रख सकते हैं या नहीं ?

· अभी तक इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि सैमसंग पुरुस्कार के निर्णय में कोई हाथ चाहता है ।

· सैमसंग का निहित स्वार्थ स्पष्ट है । वह भारतीय बाज़ार चाहता है । वह सिर्फ़ इस बात से खुश हो सकता है कि उस का नाम एक प्रतिष्टित कार्यक्रम/पुरुस्कार के साथ जुड़े और वह इस के लिये पैसा खर्च करने को तैयार है ।

· जहां तक मेरी समझ है , सैमसंग को कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि पुरुस्कार ’क’ को मिले या ’ख’ को । बल्कि यह सैमसंग के हित में ही होगा कि पुरुस्कार की निष्पक्षता बनी रहे क्यों कि पुरुस्कार की गरिमा और सम्मान के साथ ही उस के व्यापरिक हित भी जुड़े हैं ।

· यह ज़रूरी नहीं कि प्रायोजकों के रहते हुए पुरुस्कार निष्पक्ष नहीं बनाये जा सकते । अमेरिका के औस्कर (अकेडमी) पुरुस्कार के साथ दर्जनों प्रायोजक जुड़े होते हैं लेकिन फ़िर भी उन की निष्पक्षता पर शायद ही किसी नें कभी संदेह किया हो । उन की तुलना भारतीय फ़िल्म फ़ेयर या अन्य पुरुस्कारों से कर के देखें जहां विजेताओं के नाम पहले से तय होते हैं ।

· सरकारी तंत्र में रह कर साहित्यिक पुरुस्कारों की निष्पक्षता हम जानते हैं ।

· सिर्फ़ पुरुस्कार की चाह रखने से लेखक ’बिकाऊ’ नहीं हो जाता । हम सभी जानते हैं कि पुरुस्कारों के साथ किताब की खरीद जुड़ी होती है और अपनी किताब को बिकता कौन लेखक नहीं चाहता ? क्यों सिर्फ़ लेखकों से ही यह अपेक्षा की जाती है कि वह सिर्फ़ ’जन हित’ का सोच कर लिखें और कुछ नहीं । यह शायद हम लोगों के लिये कहना सरल होगा जिन का पूर्ण व्यवसाय लेखन नहीं है लेकिन जो अपने व्यवसाय के लिये लेखन से जुड़े हैं , उनका क्या ?

· जहां लेखको के बिकाऊ होने की बात की जाती है , उस से जुड़ी प्रकाशकों द्वारा लेखको के शोषण की भी चर्चा ज़रूरी है । दोनो विषय एक दूसरे से जुड़े हैं ।

· यदि हम सैमसंग की सहायता से पुरुस्कार की राशि बढा सकें तो क्या यह लेखकों के लिये अच्छा नहीं होगा ? नोबल पुरुस्कार की महत्ता का एक कारण यह भी है कि उस के साथ एक बड़ी पुरुस्कार राशि जुड़ी होती है ।

· यदि एक ’अल्फ़्रेड नोबल’ अपने निजी धन से एक ऐसा पुरुस्कार स्थापित कर सकता है जिसे पूरी दुनिया सम्मान से देखे और वह पुरुस्कार आने वाले वर्षों में कभी किसी पर निर्भर न रहे तो ऐसा पुरुस्कार हमारे अम्बानी , बिरला या मित्तल क्यों नहीं स्थापित कर सकते ? हमें किसी विदेशी कम्पनी सैमसंग पर निर्भर नहीं रहना होगा ।

· इस दुनिया में कुछ भी मुफ़्त नहीं मिलता । हम मुफ़्त ’टेलीविज़न’ भी तभी देख पाते हैं जब प्रायोजक उस के लिये पैसा देते हैं । किसी भी पुरुस्कार को बनाये रखने के लिये धन की ज़रूरत होती है और वह कहीं न कहीं से आना ज़रूरी है । धन का स्त्रोत जो भी होगा कुछ सीमाएं और बंधन तो ले कर आयेगा ही । हमें देखना यह है कि किस में हम अपनी स्वतंत्रता को कम से कम खोते हैं ।

· बाज़ारीकरण हर समस्या का समाधान नहीं है लेकिन बाज़ारीकरण से लड़ाई उन के ही हथियारों से लड़ी जा सकती है और तभी लड़ी जा सकती है जब हम एक बेहतर, व्यवहारिक विकल्प सुझा सकें ।

अभी बस इतना ही ...
सादर स्नेह के साथ



समीक्षक दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी ने लिखा                                                                                 


मित्रों,
मुझे लगता है कि श्री भार्गव जी की बात पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए. केवल एक विदेशी प्रायोजक के नाम को पढ कर भड़क उठना कोई समझदारी की बात नहीं है. असल् बात तो साहित्य और धन के रिश्ते की है. जब सरकार साहित्य के लिए धन देती है तो वह भी जाने-अनजाने में अपनी शर्तें जोड़ती है. भारत में केन्द्रीय और प्रदेशों की साहित्य अकादमियों की पक्षधरता किसी से छिपी नहीं है. क्या वह हमें स्वीकार्य है? अगर नहीं, तो हमने उसे भी बदलने के लिए क्या कर लिया?

किस लेखक को सम्मान, पुरस्कार और अपने साहित्य के प्रचार प्रसार की तमन्ना नहीं होती? जब मुझे पुरस्कार मिलता है तो मैं उसे निष्पक्ष मानता हूं लेकिन जब किसी और को मिलता है तो मुझे तमाम छल छद्म नज़र आने लगते हैं. असल में यो सोच की यही विसंगति सारी दिक्कतें पैदा करती है.
अब समय आ गया है कि खुल कर इस पर बात हो कि लेखक चाहता क्या है? क्या सिर्फ लिख कर और उसे समय के भरोसे छोड़ कर निशिंत हो जाना चाहता है? क्या वह केवल स्वांत: सुखाय लिखना चाहता है? या वह्चाहता है कि जो उसने रचा है वह अधिक से अधिक लोगों  तक पहुंचे? उसका व्यापक प्रचार प्रसार हो, और साथ ही एक रचनाकार के रूप में समाज में उसकी भी विशिष्ट जगह और हैसियत बने?

अगर उसका चयन यह दूसरा विकल्प है, तो मुझे लगता है कि बाज़ार से बच पाना असंभव प्राय: है. आप जो लिखते हैं, उसे कोई प्रकाशन (चाहे वह अखबार हो, पत्रिका हो या पुस्तक प्रकाशक हो) छापता है, या कोई अन्य संचार माध्यम जैसे रेडियो या टेलीविज़न या सिनेमा प्रसारित करता है. क्या इनसे बचा जा सकता है? अगर  आप सरकारों की भी बात करें तो उनकी राजनीतिक पक्षधरता के साथ ही  व्यावसायिक घरानों से उनकी  निकटता को भी नज़र अन्दाज़ नहीं किया जाना चाहिए. सरकारों के पास जो पैसा होता है वह बाज़ार का भी होता है, और यह सोचना कि बाज़ार सरकारों को नियंत्रित नहीं करते, मासूमियत की पराकाष्ठा ही होगा.

भार्गव जी ने सही कहा है कि आपत्ति तब होनी चाहिए जब कोई प्रायोजक कृति के चयन में हस्तक्षेप करे.

अन्यथा तो इस बात का स्वागत ही होना चाहिए कि बड़े औद्योगिक संस्थानों और घरानों की नज़र भी साहित्य की तरफ जाने लगी है. अन्यता अब तक तो वे खेल या मनोरंजन तक ही देख पाते थे.


इस पर सुरेश कुमार जी ने पुनः लिखा                                                              





श्री अनूप भार्गव ने बडी स्पष्टता से अपने विचार रखे हैं जिससे  स्थिति का दूसरा पक्ष सामने आया है. इसके लिए वे हमारे धन्यवाद के पात्र हैं. तथापि आलोक जी के लेख से जो बात सामने आई है उसमें केवल नामकरण का मुद्दा है, पुरस्कार निर्णय में निष्पक्षता आदि का नहीं. हम भारत में इस बात को लेकर संवेदनशील हैं कि केवल धन के बूते कोई विदेशी व्यापारी संगठन ’साहित्य’ जैसे सम्माननीय क्षेत्र में न घुसे. साहित्य के पुरस्कारों में धनराशि का आकार गौण है, सम्मान की बात मुख्य है. इसके नाम के साथ विदेशी नाम का जुडना हमॆं अपनी अस्मिता पर आघात-सा लगता है.



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मित्रो! यह खुला मंच अब आप के हवाले! 


आप क्या सोचते हैं, हिन्दी साहित्य के एक सम्मानित पुरस्कार के प्रायोजित स्वरूप में बदले जाने वाले  प्रकरण पर ?
आप की राय की प्रतीक्षा है !!





वह झुकें ना झुकें तुम सर झुकाते चलो.....




प्रभाष जोशी के लेख " अपने आप से पूछिए" पर एक प्रतिक्रिया

- कमल




शायद भारतीयों को एकता नाम से ही चिढ़ है | भोगोलिक, जातीय , भाषाई और कबीलाई बंटवारों के आन्दोलन हर प्रदेश में मुखर हैं, पर नेता प्रकट में एकता की दुहाई दे रहे हैं | हर प्रदेश सरकार स्वायत्तता चाहती है | इसमें संदेह है की भारत नाम की कोई चीज़ बचेगी भी ? चीन, अमरीका, पाकिस्तान तो पृथकतावादियों की मदद भर कर रहे हैं | अकेले चीन का क्या दोष अगर देश की मीडिया ही देश का हिस्सा नक्शों में देश के बाहर दिखाना शुरू कर दे |






प्रभाष जोशी जी का आलेख पढ़ा |

भारत के कई टुकड़े करने के नेक काम में चीन ही क्या स्वयं भारत सरकार और सभी अन्य राजनीतिक पार्टियाँ जुटी हैं | किसी भी देश के समाज को अगर टुकडों में बाँट दिया जाय तो राष्ट्र के टुकड़े होने में क्या देर लगती है ? समाज के टुकड़े करने वालों के हीरो पू० प्रधान मंत्री वी० पी० सिंह तो चले गए | खुद रोगी बने पर समाज को ऐसा रोग लगा गए जो खाज में कोढ़ कि तरह फैलता जा रहा है | भारत वास्तव में कई टुकडों में बाँट चुका है | महाराष्ट्र मराठो का, बंगाल बंगालियों का, तमिलनाडु तमिलों का और कश्मीर मुसलमानों का आदि आदि | असम, मणिपुर, मिजोरम आदि इसी प्रकार राष्ट्र से कटे हुए हैं | बंगलादेशी मुसलमानों को असम में बसा कर अगर बांग्लादेश के माध्यम से चीन भारत को ब्रह्मपुत्र के पश्चिमी तट तक फेंकने का षड़यंत्र कर रहा है तो भारत सरकार को क्या आपत्ति है | भारत-चीन भाई भाई, हिन्दू-मुस्लिम भाई भाई | देश बाँटना काँग्रेस कि पुरानी परंपरा है | देश का शेष भाग जातीय प्रांतीय टुकडों में बँटा है | सरकार क्या कोई भी राजनैतिक दल इन टुकडों को बटोर कर एक राष्ट्र बनाने में समर्थ नहीं| सब अपने स्वार्थ के लिए टुकड़े करो और राज करो ( Divide and rule ) की नीति पर चल रहे हैं | जो प्रक्रिया जिन्ना और काँग्रेस ने भारत का बँटवारा करके आरम्भ की थी, वह जारी है |



अपनी एकता खोने के बाद हम अब ऐसे अंतर्राष्ट्रीय भँवर में पड़ चुके हैं जहाँ पड़ोसियों के कुचक्रों से छुटकारा संभव नहीं रहा | अगर सरदार पटेल की चली होती तो आज कश्मीर समस्या न होती | यह समस्या तो तत्कालीन प्रधान-मंत्री की देन है | आगे के प्रधान-मंत्री चाहे भा० ज० पा० के हों चाहे कांग्रेस के किसी न किसी रूप में बँटवारे की राजनीति का ही पालन कर रहे हैं | भला हुआ जो भाजपा के हाथ सत्ता नहीं गई। दोनों ही जिन्ना के पदचिन्हों पर चल कर सहर्ष देश बाँट देते | अब काँग्रेस वही काम अप्रत्यक्ष रूप से कर रही है फर्क इतना ही की उसने इसका नाम बदल कर जिन्नावाद की जगह अल्पसंख्यकवाद कर दिया है |
अगर सरदार पटेल की चली होती तो आज कश्मीर समस्या न होती | यह समस्या तो तत्कालीन प्रधान-मंत्री की देन है | आगे के प्रधान-मंत्री चाहे भा० ज० पा० के हों चाहे कांग्रेस के किसी न किसी रूप में बँटवारे की राजनीति का ही पालन कर रहे हैं | भला हुआ जो भाजपा के हाथ सत्ता नहीं गई। दोनों ही जिन्ना के पदचिन्हों पर चल कर सहर्ष देश बाँट देते | अब काँग्रेस वही काम अप्रत्यक्ष रूप से कर रही है फर्क इतना ही की उसने इसका नाम बदल कर जिन्नावाद की जगह अल्पसंख्यकवाद कर दिया है |



शायद भारतीयों को एकता नाम से ही चिढ़ है | भोगोलिक, जातीय , भाषाई और कबीलाई बंटवारों के आन्दोलन हर प्रदेश में मुखर हैं, पर नेता प्रकट में एकता की दुहाई दे रहे हैं | हर प्रदेश सरकार स्वायत्तता चाहती है | इसमें संदेह है कि भारत नाम की कोई चीज़ बचेगी भी ? चीन, अमरीका, पाकिस्तान तो पृथकतावादियों की मददभर कर रहे हैं | अकेले चीन का क्या दोष अगर देश की मीडिया ही देश का हिस्सा नक्शों में देश के बाहर दिखाना शुरू कर दे |



अगर नेहरु जी कश्मीर विभाजन रेखा पर संयुक्त राष्ट्र में अपनी मुहर लगा आये है तो मनमोहन सिंह ने बिलोचिस्तान की समस्या में भारत को लपेटने का वादा कर दिया तो क्या बुरा किया ? अमरीका और पाकिस्तान के अनुसार अगर हम कश्मीर उन्हें सौंप दें तो विश्व में तालिबान और अलकायदा आतंकवाद की समस्या ही हल हो जाय | साथ ही अगर अपने यहाँ अमरीकी सैनिक अड्डे भी बनवा दें तो चीन के खतरे की समस्या भी हल हो जाय | |विश्व-शांति के ऐसे समाधान में कांग्रेस माहिर है | आखिर पाकिस्तान कश्मीर ही तो मांग रहा है, पंजाब या तमिलनाडु तो नहीं ?



अब अमरीका के होनहार राष्ट्रपति बिचारे ओबामा की समझ में पाकिस्तान और तालिबान/अलकायदा की नूरां कुश्ती समझ में नहीं आरही है तो भारत को क्या पड़ी है कि दोनों से मोर्चा ले | बातचीत के नाटक से काम चल जायगा | डींगें तो हम बड़ी बड़ी मार लेंगे पर लड़ने को सीमा पर फौजें भेज कर फिर वापस लौटा लाना और कुछ जीता है तो वापस कर देना हमें बखूबी आता है | सरकार के अनुसार अपनी भलाई इसी में है कि अकड़ते रहो फिर मोम कि तरह पिघल कर हर छूट देते रहो और माँगें मानते रहो, देश के टुकडें हों तो हुआ करें | आपकी सत्ता को ललकारने की स्थिति में कोई दल नहीं तो हर तरह का समझौता कर लेने की आपको पूरी छूट है |


"वह झुकें ना झुकें तुम सर झुकाते चलो दिल मिले ना मिले हाथ तो मिलते चलो "



सच्चे साहित्यकारों की कापियाँ डाक्साबों से चेक कराने के बजाय......




च्चे साहित्यकारों की कापियाँ डाक्साबों से चेक कराने के बजाय




प्रवासी हिन्दी साहित्य पर आरम्भ हुई परिचर्चा में आए विचारों की श्रृंखला में इस बा प्रस्तुत हैं, ललित जी के विचार। इस परिचर्चा के प्रसंग, प्रारम्भ आदि के विषय में पूरी जानकारी के लिए भा - तथा प्राप्त विचारों की प्रस्तुति की श्रृंखला में पहले भाग में व्यक्त विचारों को आप भाग - में पढ़ सकते हैं। आप के विचारों की भी प्रतीक्षा है।


प्रवासी हिन्दी साहित्य





कविता जी ने एक ऐसा विषय सामने ला दिया है कि बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। मैं हिन्दी साहित्य का एक अदना-सा पाठक हूँ। अभी-अभी ईमेल देखा और पहली प्रतिक्रिया लिख रहा हूँ। कविता जी ने "रचनाकार के स्थान के सरोकार" की बात की है। क्यों न प्रवासी की परिभाषा तय करने से पहले हिन्दी पट्टी की ही स्थिति देख ली जाए। महानगरों में रहते हुए अपने सुदूर गाँव, कस्बे, शहर की अतीत की स्मृतियों की सुंदर पैकेजिंग कर और विदेशी साहित्य से कुछ सुंदर चिप्पियाँ लेकर परोसे जाने वाले साहित्य को क्या कहेंगे। 'प्रवासी हिन्दी साहित्य' आदि आदि श्रेणीकरण करते हुए इसे किस श्रेणी में रखेंगे।


साहित्य में "स्थान के सरोकार" रचना में इस ढंग से प्रवेश कर सकते हैं यह नुस्ख़ा यदि तॉल्स्तॉय को पता होता तो उन्हें भेष बदलकर गरीब किसानों के बीच घूमना न पड़ता। या फिर महानगर की साहित्यिक चौपालों में पंचों द्वारा समय-समय पर घोषित प्रेमचंद के उत्तराधिकारियों में से किसी एक का नाम इस समय जेहन में कौंध रहा होता।


भाषा जन-जन की समझ में आने वाली ही हो यह आग्रह समझ से परे है, रचना देश में रची जाए या विदेश में। वह भी हिन्दी भाषा। हिन्दी हो कि हिन्दुस्तानी। उर्दू का प्रयोग। संस्कृत। (वैसे, आंकड़ों के अनुसार आम जन में सुरेन्द्र मोहन पाठक बहुत लोकप्रिय हैं।) निश्चित ही रचना आम जन के सरोकारों, इंसानियत के पक्ष में हो। मैं डाक्साबों, परोफेसरों के हिन्दीवाद का समर्थक नहीं हूँ। लेकिन भाषा की बात हल हो जायेगी। मूलतत्व की तो बात हो।


अब प्रवासी साहित्य पर नजर दौड़ाएँ। दुनिया के महानगरों और कस्बों में फ़र्क करना ही पड़ेगा। अमेरिका, ब्रिटेन आदि और सूरीनाम, फिजी, त्रिनिडाड, गयाना में एक समय ख़ूब चले गीत "चिट्ठी आयी है...वतन से चिट्ठी आयी है..." को एक ही रिस्पॉस मिला होगा, यह कहना कठिन है। बहरहाल...


"सरोकार", जी हाँ सरोकार। यही तय करेगा कि परिभाषा क्या हो। भाषा को निखारने और उसे मानक बनाने का महती कार्य तो हमारा हिन्दी अकादमिक जगत कर ही रहा है। फ़िलवक्त सच्चे साहित्यकारों की कापियाँ डाक्साबों से चेक कराने के बजाय उन्हें छूट दी जाये कि वे इंसानी जीवन की अभिव्यक्ति के लिए हिन्दी के किसी भी रूप को, माध्यम को अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं।

अभी इतना ही
ललित

Friday, 3 April, 2009 1:29 AM


प्रवासी साहित्य की परिभाषा क्या होनी चाहिए?




प्रवासी साहित्य की परिभाषा? भाषा?
क्षेत्र? सरोकार? ...?



मित्रो एवं साथियो !



अभी दिन पूर्व प्रो. कृष्णकुमार जी (यूके) ने अपने एक ईमेल सन्देश में बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है, बल्कि कहना चाहिए कि विचार करने की आवश्यकता बताई है. उन्होंने "प्रवासी हिन्दी साहित्य" की परिभाषा पर अपने विचार लिख भेजने, एक परिचर्चा आयोजित करने की आवश्यकता व इच्छा प्रकट की है । परस्पर विचार करने के लिए आप सभी अपने अपने मत को देवनागरी में टंकित कर भेजें ताकि आलेखात्मक विचारों को समूह से इतर पाठकों के लिए उपलब्ध करवाने की दृष्टि से पुन: समूह के ब्लॊग पर भी प्रकाशित किया जा सके।

प्रो. कृष्ण कुमार जी ने लिखा है कि -

" एक व्यापक परिभाषा की जरूरत है।

१) क्या जब तक प्रवासी रचनाओं में रचनाकार के स्थान के सरोकार न हों, तब तक वह प्रवासी साहित्य नहीं होगा?

२) क्या प्रवासी हिन्दी को तथाकथित मानक हिन्दी ही होना चाहिए ? या फिर जन-जन की हिन्दी?"

उन्होंने एक अन्य सन्देश में थोड़ा और स्पष्ट करते हुए यह प्रश्न भी उठाया है कि-

‘विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा भारत की आँचलिक बोलियों में लिखे गए साहित्य को क्या इसकी परिधि में रखा जाना चाहिए या उसे इसकी परिधि से निष्कासित रखा जाए?’


मैं आप सभी से प्रो. कृष्णकुमार जी द्वारा आहूत विषय पर अपने विचार प्रकट करने का आग्रह करती हूँ, कि कृपया उपर्युक्त बिन्दुओं को पढ़ें व हम से अपना मत बाँटें कि क्षेत्र, भाषा, सरोकार या कुछ अन्य वे तत्व क्या हैं, जो हिन्दी के प्रवासी साहित्य को परिभाषित कर सकते हैं।

आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी।


- कविता वाचक्नवी


पुनश्च-
इस सन्देश के जो पाठक हिन्दीभारत समूह के सदस्य नहीं हैं, वे सीधे मेरे आईडी पर( साईडबार में एकदम ऊपर बने contact me द्वारा ) भी अपने विचार लिख कर भेज सकते हैं, उनके आलेखात्मक विचारों को भी प्रकाशित किया जाएगा व चर्चा समूह पर सभी को पठनार्थ अग्रेषित किया जाएगा।
.वा.
Thursday, 2 April, 2009, 6:35 PM





From: Prof. Dr Krishna Kumar <.........>



Dear Kavita Jee
pata naheeN kyoN Hindi meiN type naheeN ho rahaa hai. Kyaa aap ek charcha praarambh karaa saktee haiN. pravasi Hindi Saahitya kee paribhaashaa kyaa honee chaahiye. Ek vyaapak definition kee zaroorat hai. Kyaa jab tak pravasi rachnaaoN meiN rachnaakar ke sthaan ke sarokaar naa hoN tab tak woh pravasi saahitya naheeN hogaa. Kyaa pravasi Hindi ko tathaa kathit Maanak Hindi hee honaa chaahiye yaa phir jan-jan kee Hindi. Time has come to look at it more seriously and academically.
with regards.
Krishna

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