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कविता कार्यशाला का आयोजन



मित्रो! 

जैसा कि आपको ज्ञात ही है कि कविता कार्यशाला का यह आयोजन आप सभी के अत्यन्त उत्साह व सार्थक सहयोग से सम्पूर्ण हुआ।


 मैं आप सभी भागीदारों को हार्दिक धन्यवाद देना चाहूँगी कि  आपने इसे जीवन्त, सक्रिय और सफल बनाया। अनेक रचनाकारों की रचनाएँ दिए गए चित्र व विषय को केन्द्र में रखकर समस्यापूर्ति  के रूप में उपलब्ध हुईं। समस्यापूर्ति के अन्य अनेक लाभों के अतिरिक्त एक लाभ आज के समय में यह भी है कि यह स्वयं में कॉपी पेस्ट ( किसी अन्य की तैयार रचना को लगा देना/लेना) को हतोत्साहित करती है व कुछ न कुछ नया लिखने, व सटीक लिखने को प्रेरित करती है। 


हमें अनेकानेक अर्थवत्ताओं को लेकर बुनी गई अलग अलग शैली की कविताएँ इस बहाने पढ़ने को मिलीं। आनन्द आया। यह कोई प्रतियोगिता नहीं थी कि किसी को श्रेष्ठ व किसी को कमतर आँका जाए। 


कुछ मित्रों ने प्रश्न किया कि क्या वे आयोजन के पश्चात् भी इन कविताओं को देख / पढ़ सकते हैं, तो उनसे निवेदन है कि समूह के आयोजन (EVENT) के रूप में इसका लिंक समूह पर स्थाई बना रहेगा, वहाँ से अथवा/ और सीधे भी कोई भी इसे देख पढ़ सकता है क्योंकि यह एक खुला (OPEN EVENT) आयोजन था। 


कुछ मित्र जानना चाह्ते थे कि क्या इसमें प्रस्तुत की गई कविताओं को वे पुनर्प्रयोग कर सकते हैं । उन्हें सूचनार्थ निवेदन है कि वे मूल रचनाकार के नाम/ लिंक सहित ( जो कि वहाँ स्वयं दिखाई दे ही रहा है ) कविताओं का प्रयोग, रचनाकार को सूचना देते हुए, यदि करें तो सम्भवत: किसी को भी आपत्ति न होगी। 


उदाहरणार्थ देखें कि श्री रेक्टर कथूरिया जी ने ( पंजाब स्क्रीन)  पर  इस कार्यशाला के विषय में एक बहुत अच्छा लेख लिखा है और कई मित्रों की कविताओं को उसमें सम्मिलित भी किया है ताकि फ़ेसबुक से इतर पाठक भी उसे पढ़ सकें। मैं समूह की ओर से कथूरिया जी का धन्यवाद करना चाह्ती हूँ कि उन्होंने इस आयोजन को प्रसारित करने में अपना अमूल्य योगदान दिया।


यों तो इस कार्यशाला में कैनेडा, यूके, भारत, अमेरिका आदि कई देशों के रचनाकारों ने उपस्थित हो कर आयोजन का मान बढ़ाया और कइयों ने स्वयं आकर वॉल पर अपनी शुभकामनाएँ भी व्यक्त कीं किन्तु इस का सबसे सुखद पक्ष था कि पाकिस्तान के वरिष्ठ रचनाकर/ गज़लकार/ पत्रकार श्री गुल खान (देहलवी) जी ने दिए गए विषय पर स्वयं अपनी एक रचना दे कर आयोजन को कृतार्थ किया। यह निस्सन्देह उनका बड़प्पन है। उनके इस स्नेह के लिए समूह उनका अतिशय आभारी है। उनकी यहाँ प्रस्तुत रचना को मैं पुन: आप सभी से बाँटना चाहूँगी -


शाम ढलने वाली है सोचते हैं घर जाएँ
फिर खयाल आता है किस तरफ़ किधर जाएँ

दूसरे किनारे प’ तीसरा न हो कोई

फिर तो हम भी दरिया में बे- खतर उतर जाएँ 


हिज़रती परिन्दों का कुछ यकीं नहीं होता
कब हवा का रुख बदले कब ये कूच कर जाएँ 

धूप के मुसाफ़िर भी क्या अजब मुसाफ़िर हैं
साए में ठहर कर ये साए से ही डर जाएँ


उनकी इस रचना ने कार्यशाला को मानो चार चाँद लगा दिए । उनके प्रति पुन: आभार व्यक्त करती हूँ।


 दूसरी ओर खेद के साथ कहना पड़ता है कि कई वरिष्ठ हिन्दी कवियों ने आना तो दूर अपनी शुभकामनाएँ देने/भेजने की औपचारिकता की आवश्यकता भी नहीं समझी;  यद्यपि यह हिन्दी कविता की कार्यशाला थी। 


अस्तु ! ऐसी चीजों से हमें हतोत्साहित होने की आवशयकता नहीं है। हम भविष्य  में भी समयानुसार ऐसे आयोजन करते रहेंगे। आपकी उपस्थिति उन्हें प्राण्वान् बना देगी। 



यदि आपका कोई सुझाव अथवा आदेश हो तो कृपया मुझे लिखिएगा। यह आयोजन फ़ेसबुक पर  Poetry : Hindi Kavita (हिन्दी-कविता) समूह का था और उसमें लगभग ४०० सदस्य हैं। समय समय पर उन्हें पढ़ने सराहने या समूह से जुड़ने के लिए उपर्युक्त लिंक को देखा जा सकता है।

पुन: आपकी सहभागिता के लिए आभार व्यक्त करते हुए आयोजन को विराम देती हूँ।


सद्‍भाव बनाए रखें
शुभकामनाओं सहित
(डॉ.) कविता वाचक्नवी

एक गीत `उनके' नाम : जी भर रोया

कुछ दिन की स्तब्ध कर देने वाली घटनाओं के क्रम में आज की सुबह हुई, एक और ऐसा समाचार आया कि सभी अवसन्न रह गएतभी मुझे निम्न संदेश के साथ एक गीत प्राप्त हुआआप भी पढ़ सकते हैं --
कविता वाचक्नवी




प्रिय कविता जी,
यह सप्ताह हिन्दी के हास्य कवियों के लिए बहुत घातक निकला. भोपाल वाली सड़क दुर्घटना के सदमे से उबरा नही था कि आज बड़े भाई श्री उदय प्रताप सिंह जी का sms मिला कि आज अल्हड़ बीकानेरी भी हमसे बिछड़ गए. एक गीत उन सभी दिवंगत कवि मित्रों के नाम , जिनका साथ मुझे 40 वर्षों से मिला था

बुद्धिनाथ



जी भर रोया
*********



रोज एक परिजन को खोया
पाकर लम्बी उमर आज मैं
जी भर रोया।


जिनके साथ उठा-बैठा
पर्वत-शिखरों पर
उनको आया सुला
दहकते अंगारों पर
जो था मुझे जगाता
सारी रात हँसा कर
वह है खुद लहरों पर सोया।


एक-एक कर तजे सभी
सम्मोहन घर का
रहा देखता मैं निरीह
सुग्गा पिंजर का
हुआ अचंभित फूल देखकर
टूट गया वह धागा
जिसमें हार पिरोया।


किसके-किसके नाम
दीप लहरों पर भेजूँ
टूटे-बिखरे शीशे
कितने चित्र सहेजूँ
जिसने चंदा बनने का
एहसास कराया
बादल बनकर वही भिगोया।


- डॉ. बुद्धिनाथ




कहानी और कविता पर मीरा स्मृति सम्मान : प्रविष्टियाँ आमंत्रित





कहानी और कविता पर मीरा स्मृति सम्मान



मीरा फाउन्डेशन, इलाहाबाद की ओर से हिन्दी की रचनात्मक मेधा को सम्मानित करने के लिए हर साल मीरा स्मृति सम्मान दिया जाएगा। सम्मान राशि २५ हज़ार रुपये होगी। फाउन्डेशन द्वारा जारी सूचना के अनुसार साहित्य भण्डार, इलाहाबाद के सहयोग से यह सम्मान एक वर्ष कहानी के लिए दूसरे वर्ष कविता के लिए प्रदान किया जाएगा


वर्ष २००९ का सम्मान कहानी विधा पर केंद्रित होगा तथा वर्ष २०१० का सम्मान कविता विधा पर प्रदान किया जाएगा


इस वर्ष के कथा सम्मान के लिए प्रविष्टि पहुँचने की अन्तिम तिथि ३० जून २००९ है जनवरी २००७ से ३१ दिसम्बर २००८ के बीच प्रकाशित कृतियाँ ही इस वर्ष के सम्मान के लिए विचारणीय होंगी

सम्मान के लिए कृतिकार की आयु सम्मान वर्ष से पूर्व के वर्ष के ३१ दिसम्बर को ५० वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए


कृतियाँ भेजने के लिए पता -

संयोजक : मीरा स्मृति सम्मान
साहित्य भण्डार
५०, चाहचंद,
इलाहाबाद - २११००३



चित्तौड़गढ़ में परिसंवाद




चित्तौड़गढ़ में परिसंवाद


समय की आवारा पूँजी ऐसे समाज की रचना कर रही है जिसमें भावना और विचार के लिए कोई स्था नहीं हैं। मनुष्य को पशु श्रेणी से अलग करने वाला तत्व साहित्य ही है जो गुण-दोष के विचार का विवेक देता है, यही कारण है कि इस आवारा पूँजी का साहित्य से बैर है। सुविख्यात हिन्दी आलोचक प्रो. रविभूषण नेसम्भावनाद्वारा आयोजितसाहित्य और समाज के नये सम्बन्धविषयक परिसंवाद में उक्त विचार व्यक्त किये। स्वैच्छिक संस्थान प्रयास के सहयोग से आयोजित परिसंवाद में प्रो. रविभूषण ने कहा कि एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य का जुड़ाव हो इसके लिए भूमण्डलीकरण की तमाम ताकतें सक्रिय हैं। परिवार जैसी मजबूत संस्था हमारे दौर में छिन्न-भिन्न होती नजर रही है। उन्होंने कहा कि साहित्य जोड़ने का काम करता है तथा धनवान होने और बेहतर मनुष्य होने का भेद समझाता है। प्रो. रविभूषण ने बढ़ रही व्यावसायिकता को मनुष्यता के लिए खतरनाक बताते हुए कहा कि जीवन व्यापार नहीं है। उन्होंने कहा कि समाज को ऐसी खास दिशा में ले जाने वाली शक्तियों के सामने साहित्य जबरदस्त प्रतिरोध करता है और मनुष्य को व्यापक बनाता है।


परिसंवाद में कवि-समालोचक डॉ. सत्यनारायण व्यास ने कहा कि जो साहित्य समाज के लिए उपयोगी हो उसे साहित्य मानना भूल होगी। प्रेमचन्द की अमर कहानीकफनको याद करते हुए उन्होंने कहा किकफनजैसी रचनाएँ साहित्य की शक्ति का असली परिचय देती हैं जिसे पढ़ने के बाद दलितों-वंचितों के प्रति हमारी दृष्टि ही बदल जाती है। डॉ. व्यास ने कहा कि साहित्य की प्रकृति कलात्मक होती है लेकिन उसकी परिणति सामाजिक ही हो सकती है। भागीदारी कर रहे डॉ. राजेन्द्र सिंघवी, गोविन्दराम शर्मा और माणिक सोनी के सवालों पर प्रो. रविभूषण ने विस्तृत चर्चा की। प्रयास के सचिव डॉ. नरेन्द्र गुप्ता ने कहा कि आवारा पूँजी हमारे आस-पास समृद्धि का छलावा जरूर पैदा कर रही है लेकिन विश्व बैंक की रिपोर्ट का सच है कि विश्व की अस्सी प्रतिशत पूँजी पर केवल पाँच प्रतिशत लोगों ने कब्जा जमा रखा है। उन्होंने इस छलावे को तोड़ने में साहित्य की भूमिका को रेखांकित किया।बनासके सम्पादक डॉ पल्लव ने शिक्षित समुदाय को सांस्कृतिक जागरूकता के लिए अपने दायित्व को तय करने की आवश्यकता बताई। परिसंवाद में सामाजिक कार्यकर्ता प्रीति ओझा, प्राध्यापक गुणमाला जैन, कन्हैयालाल सांवरिया, रामेश्वरलाल शर्मा ने भी भाग लिया।



इस अवसर पर चन्द्रकांता व्यास द्वारा सम्पादित राजस्थानी लोकगीतों के सद्य प्रकाशित संकलन `माँ के गीतका विमोचन प्रो. रविभूषण ने किया। श्रीमती व्यास ने पुस्तक के सम्पादन के अपने अनुभव बताते हुए कहा कि सांस्कृतिक प्रदूषण के दिनों में लोक की यह विरासत हमारे लिए प्रेरक सिद्ध होगी। आभार प्रदर्शित करते हुएसम्भावनाके अध्यक्ष डॉ. के.सी. शर्मा ने कहा कि साहित्य की भूमिका अब स्वान्तः सुखाय से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है।


माणिक सोनी,
सम्भावना, म-16, हाउसिंग बोर्ड, कुम्भानगर,
चित्तौड़गढ़-३१२००१



मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में -- डॉ. देवराज

गतांक से आगे


मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में
-- डॉ. देवराज
[२३]

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द्वितीय समरोत्तर मणिपुरी कविता: एक दृष्टि
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स्वतंत्रता के बाद पहली बार जब भारत और चीन के सम्बंध बिगड़ने लगे तो देश के अन्य भागों के साथ-साथ मणिपुर के साहित्य में भी बदलाव देखे जा सकते हैं जो उस समय की भारतीय मानसिकता को दर्शाता है। इसी परिप्रेक्ष्य में मणिपुरी कविता के बारे में बताते हैं डॉ. देवराज : "सन १९६० के काल में मणिपुरी भाषा की कविता ने एकदम नए दौर में प्रवेश किया। इसमें कविता की यात्रा यथार्थ से अतियथार्थ की ओर प्रारम्भ हुई। इस बडे़ परिवर्तन का मुख्य श्रेय मोहभंग, धार्मिक प्रतिक्रिया और पाश्चात्य कविता के प्रभाव को है। चीन के साथ युद्ध ने ऐतिहासिक मोहभंग को जन्म दिया, फिर मणिपुरी भाषा ही इससे कैसे बच सकती थी! वस्तुतः चीन के हाथों भारत की पराजय हमारे सैनिक साहस की पराजय नहीं थी, बल्कि वह हमारे राजनीतिक दिवालियेपन की आमन्त्रित पराजय थी। "इन्हीं दिनों बेरोज़गारी, आर्थिक भ्रष्टाचार, नौकरी पाने के लिए विभिन्न रूपों में रिश्वत का प्रचलन तथा पूँजी का केन्द्रीकरण जैसी बातें भी सामने आने लगीं। सरकारी योजनाओं का पैसा बडी़ चालाकी से नेताओं, बडे़ ठेकेदारों और पूँजीपतियों की जेबों में जाने लगा। "सन १९६० के आसपास मणिपुर में एकाएक ब्राह्मणवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया तीव्र हो गई और ‘मैतै मरूप’ आन्दोलन भड़क उठा। वस्तुतः यह आंदोलन सन १९३० में कछार निवासी ‘नाओरिया फुलो’ द्वारा शुरू किया गया था, किन्तु परिस्थितियाँ अनुकूल न होने के कारण यह उस समय फल-फूल नहीं सका। इसका विकास आश्चर्यजनक रूप में अपने जन्म के तीस वर्ष पश्चात हुआ। ‘मैतै मरूप’ आन्दोलन के मूल में यह भावना थी कि वैष्णव परम्परा पर आधरित ब्राह्मणवाद मणिपुरी समाज की हज़ारों वर्ष पुरानी पहचान का विनाशक है, क्योंकि यह मूल मैतै संस्कृति के प्रतीकों, आख्यानों, कथाओं, धार्मिक रीतियों और इतिहास की इस प्रकार प्रतीकधर्मी व्याख्या करता है कि सम्पूर्ण मैतै संस्कृति, हिन्दू संस्कृति के महासमुद्र में विलीन हो जाती है। "इस प्रतिक्रियावाद के पीछे एक ठोस कारण मैतै इतिहास की हिन्दूवादी व्याख्या भी है। आधुनिक ऋषि कहे जाने वाले अतोमबाबू शर्मा मणिपुरी संस्कृति के सम्बन्ध में विचार और शोध करने वाले सबसे पहले व्यक्ति थे। उन्होंने अपने लेखन में मैतै संस्कृति के प्रत्येक पक्ष को हिन्दू संस्कृति की प्रतीकात्मक व्याख्या दी है और व्यक्तियों तथा स्थानों के नामों को संस्कृत मूल से जोडा़ है। ‘मैतै-मरूप’ आन्दोलन इसके पूर्ण विरुद्ध है। इसके संचालकों का मानना है कि ऐसा करके हिन्दू संस्कृति के रक्षक उन्हें उनके पूर्वजों और मूल इतिहास से काट रहे हैं।"


....क्रमशः



प्रस्तुति: चंद्र मौलेश्वर प्रसाद

कविता की जातीयता* - प्रभाकर श्रोत्रिय -

पुस्तक चर्चा


'कविता की जातीयता'*
- प्रभाकर श्रोत्रिय -




'जातीय' यहाँ 'राष्ट्रीय' का पर्याय है, परंतु यह राष्ट्र ‘नेशन’ नहीं है। जातीय या राष्ट्रीय का गहरा सांस्कृतिक अर्थ है, जो भौगोलिक या राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक है। इस ग्रन्थ की लेखिका डॉ. कविता वाचक्नवी ने राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लिखा है- "जिसे हम भारतीय संस्कृति कहते हैं, उसके तत्त्वों का अन्वेषण भारतीय जातीयता की व्याख्या करने में समर्थ होगा। " डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने राष्ट्र के तीन घटक माने हैं- भूमि, जन और संस्कृति। इनमें से किसी एक की भी अनुपस्थिति में राष्ट्र की कल्पना संभव नहीं है। भारतीय राष्ट्र में ‘भूमि’ के अंतर्गत, वर्तमान राजनीतिक और भौगोलिक सीमा से बाहर ऐसे भूखण्डों का समावेश भी किया जाता है जो परंपरा से उसके अंग रहे हैं और उसके सांस्कृतिक परिसर में आते हैं, परंतु बाद के दौर में किन्हीं राजनीतिक-भौगोलिक या अन्य कारणों से अलग जा पडे़ हैं। यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि बृहत्तर भारत की अवधारणा उन भागों का अधिग्रहण करने की आकांक्षा नहीं है। [न दूर दूर तक इसकी कल्पना है] क्योंकि वृहत्तर अर्थ में ‘राष्ट्रीयता’ अधिकार का कोई दावा नहीं, वह सांस्कृतिक जुडा़वों की एक अमूर्त संहिति है।


संस्कृति हमारे लिए दार्शनिक, आध्यात्मिक, नैतिक, कलात्मक और प्रवृत्तिगत संसार की अनुगूँज है। वह मूलतः मनुष्य से, प्रकृति से, धर्म से, मूल्य से, आत्मा से, समाज से, विश्व से हमारे संबंधों की प्रकृति सूचित करती है। [इस सूची को बढा़या जा सकता है] अर्थात हमारे अन्तर्सम्बन्धात्मक -बोध और मूल्य-संकल्पना का स्वभाव या प्रकृति क्या है! इसे पहचान कर हम देशों, संस्कृतियों या राष्ट्रों को समझ सकते हैं।




उदाहरण के लिए पश्चिम प्रकृति से मनुष्य के संबंध द्वन्द्वात्मक मानता है। वह प्रकृति पर विजय पाने का लक्ष्य रखता है, जबकि भारत प्रकृति को चिति का स्वरूप मानते हुए प्रणत होता है। धर्म को वह किसी एक समुदाय या पूजा विधि में केन्द्रित न मानते हुए उसकी बहुलता को मान्यता देता है। वह धर्म का अर्थ अभ्युदय और कल्याण की प्राप्ति मानता है। मनुष्य और समाज के बीच द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों को मान्यता न देते हुए वह समूह या समाज से व्यक्ति की लयात्मकता को मान देता है। विश्व से उसके संबंध में आत्मविजय का भाव न होकर ग्रहण और सामंजस्य का भाव है। उसकी चाहत है-‘आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः -’संसार का जो भी श्रेष्ठ है, भद्र है उसे मैं अपना बना लूँ। यह ग्रहण है अधिग्रहण नहीं; जिसके कारण देव जाति नष्ट हो गई थी। जयशंकर प्रसाद ने लिखा है कि देवताओं को सब कुछ स्वायत्त था- ‘बल, वैभव, आनंद अपार’, परंतु परिणाम क्या हुआ? समूल विनाश। सब कुछ को स्वायत्त करने में नहीं, सब कुछ के श्रेष्ठ ग्रहण में ही कल्याण निहित है। आत्मा से भी भारतीय मनुष्य का संबंध अहम् भाव का अनुभव नहीं है, सर्वात्मवाद को वह अपनी शिराओं में पाता है - सबका विकास, सबका उन्नयन, सबका आनन्द भारतीय स्वभाव की मूल संस्कृति है।



भारत के भौगोलिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक चरित्र में सामासिकता है, जिसके केन्द्र में है सहिष्णुता, जिसे नरेश मेहता, ‘वैष्णवता’ कहते हैं | वैष्णवता का मूल करुणा है। गाँधी की प्रार्थना में था ‘वैष्णवजन तो तेणे कहिए जे पीर पराई जाणे रे’। वैष्णवी भारत एक सहिष्णु, संवेदनशील, सामासिक भारत है, संगम जिसका स्वभाव है। विश्वभर में क्या कहीं ‘संगम’ को पावन मान कर पूजा जाता है? संगम भारत की सामासिकता की बोध-भूमि है। संस्कृति प्रकारांतर से हमारी सर्जनात्मक चेतना है जिसमें सौन्दर्य, गतिशीलता, उर्वरता, संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता है। वह भारत के लिए जड़ प्रत्यय नहीं है और जिनके लिए है वे शायद भारत और भारतीय संस्कृति की आत्मा से परिचित नहीं हैं। भारत की संस्कृति का निर्माण, नीति के उपदेशों या धर्म ग्रंथों से नहीं, काव्य ग्रन्थों से हुआ है। रामायण महाभारत तो सांस्कृतिक अवबोधन के काव्य हैं ही, वेद भी एक अर्थ में महान काव्य है। इसलिए भारतीयता का संधान भारतीय काव्य में करना एक सार्थक कार्य है।




डॉ. कविता वाचक्नवी ने अपने पर्यालोचन के लिए जातीयता की संकल्पना की दृष्टि से आधुनिक हिन्दी कविता को चुना है। बीसवीं शती के प्रारम्भ से लगभग ९वें दशक तक के कवियों को इसमें सम्मिलित किया गया है। यह समयावधि निरंतर लंबी हुई है क्योंकि समय की गति निरंतर तीव्र होती गई है और इसी गति से कविता भी बढ़ी है। भारतेंदु से लेकर उदय प्रकाश तक के काव्य-समय ने कितने परिवर्तन देखे हैं। इसलिए कदाचित भारतीयता की अभिव्यक्ति को किसी एक ढांचे में ढालना संभव नहीं हुआ है। भारतेंदु के समय में भारतीयता किस सामयिकता और सांस्कृतिक अवधारणा में व्यक्त हुई है, फिर मैथिलीशरण गुप्त और अन्य राष्ट्रीय भावधारा के कवियों में भारतीयता का क्या स्वरूप रहा है? छायावादी युग, प्रगतिवादी युग, नई कविता और उत्तरकाव्य में भारतीयता किस रूप में उपस्थित है? यह सब देखना सरल काम नहीं है। इसके विवेचन में सर्वसमावेशिता का आग्रह प्रायः रहा है। आशय यह कि ऐसी समस्त बातें यदि हम भारतीयता के भीतर समाहित करते चले जाएँ जो युगानुरूप रचनाओं की विषय-वस्तु रही हैं तो स्वयं राष्ट्रीयता या भारतीयता के अपरिभाषेय होने का संकट बना रहता है। तब यह जानना दूभर हो जाता है कि हमारा आशय राष्ट्रीयता या जातीयता से क्या है और वह कौन-सा काव्य है जिसे हम इसके बाहर रखते हैं? कविता जी को इस समस्या का सामना करना पडा़ है। संभवतः इसीलिए उन्होंने भारतीयता का केनवास काफी विशाल रखा है।




आधुनिक युग की एक दूसरी समस्या यह है कि हम जैसे-जैसे आधुनिकता से उत्तर आधुनिकता और पराआधुनिकता की ओर बढ़ते जा रहे हैं, हमारे संबंध अपनी जातीय विरासत से खिसकते चले जा रहे हैं। ऐसे में यह अपरिहार्य लगता है कि हम नए सिरे से एक ओर तो विरासत की व्याख्या करें और दूसरी ओर अपने व्यवहार की समीक्षा भी करें। क्या कारण है कि नई पीढी़ अपनी विरासत से तो परायापन अनुभव करे जबकि पश्चिम से आती विचारधाराओं या विचारों को अपनाते हुए उसे ही आधुनिकता का पर्याय मानने लगे। यानी दूसरों की विरासत तो नई और अपनी विरासत पुरानी। इस अंतर्विरोध की गंभीर समीक्षा की जानी चाहिए। शायद इनके बीच से ही आधुनिकता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है और साहित्य और जातीयता के गतिशील संबंधों की सर्जनात्मकता पहचानी जा सकती है तथा समय की आँधियों में बह जाने वाले समूह से अलग साहित्य का एक नया रचनात्मक पाठ बनाने की पहल की जा सकती है।




डॉ. वाचक्नवी के इस ग्रन्थ की विशेषता यह भी है कि उन्होंने साहित्य और जातीयता के पारंपरिक संबंधों को पहचानते हुए भी इस संबंध को गतिशीलता दी, उनका यह काम किसी हद तक नवीनतम जीन्स प्रौद्योगिकी के अनुरूप ही है जो जीन्स और डीएनए में वंश, जाति, देश आदि के तत्वों की उपस्थिति सिद्ध कर चुकी है। इसी प्रक्रिया में वह विकास की पुष्टि करती है। यह ध्यातव्य है कि संसार में सब कुछ चलित है, यदि आधुनिकता की अवधारणा गतिशील है तो जातीयता की अवधारणा भी गतिशील है। इसी पारस्परिक गतिशीलता में जातीयता और आधुनिकता की प्रीतिकर सन्निधि पहचानने की कोशिश ही इस ग्रंथ का प्रयोजन भी है और चुनौती भी।




जैसे भाव की चिरंतन उपस्थिति होने पर भी भावात्मक संबंधों की प्रणालियाँ बदलती रहती हैं, वैसे ही राष्ट्रीयता की चेतना बनी रहने के बाद भी समयानुसार राष्ट्र से रचनाकार के संबंधों की प्रणालियाँ बदलती रहती हैं। इसका मोटा उदाहरण यह है कि स्वाधीनता-संग्राम के दौर में कवियों के लिए राष्ट्रीयता या भारतीयता से संबंध का अर्थ अलग था। उस समय व्यक्त राष्ट्रीयता मूर्त और सोद्देश्य थी, जबकि आज़ादी के बाद राष्ट्र से जनता की तरह कवि के संबंध भी बदल गए। इसलिए इस दौर में काव्य में राष्ट्रीयता की पहचान अलग ढंग से हो सकती है। यहाँ आकर राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक प्रश्नों को वह अपने केंद्र में रखती है। इस युग में राष्ट्रीयता की साहित्य में पहचान कठिन हुई है जो बाद के काल में निरंतर कठिनतर और कठिनतम होती चली गई है, इस हद तक कि लगने लगता है कि इन कवियों में राष्ट्रीयता या जातीयता की खोज एक दकियानूसी सोच है। परन्तु कविता के विन्यास के ऐसे अनेक पक्ष होते हैं, जैसे भाषा, प्रतीक, बिम्ब, रूपक आदि, जिनमें राष्ट्र झाँके बिना नहीं रहता। इसके अलावा राष्ट्रीय सोच बहुत कुछ समकालीन राष्ट्रीय प्रश्नों से जुड़ जाता है। यहीं राष्ट्रीयता और इसके इतर काव्य को पहचानना चुनौती बन जाता है। कभी-कभी यह सरलीकरण का शिकार हो जाता है जो मूल आशय तक पहुँचने की दिक्कतें हैं।




डॉ. वाचक्नवी ने यह बेहतर आँका है कि भारतेंदु युग, राष्ट्रीय काव्यधारा युग और छायावादी युग के स्वाधीनता पूर्व के प्रत्यय अलग प्रणाली और संज्ञा में ढले थे जबकि छायावादोत्तर और उसके भी उत्तर युग में अलग प्रत्यय अलग प्रणाली में ढले हैं। अतीत के आदर्श का स्मरण एक युग की जातीयता थी जिसमें प्रकृति और जीवन की अंतश्चेतना का उद्‌घाटन किया गया था। इसके बाद देश में पसरे शोषित पीड़ितों के अधिकार और स्थिति का संज्ञान लिया गया है। इसके बाद वरण कि स्वाधीनता और भिन्न-भिन्न सूक्ष्म मार्गों की तलाश में निहित अभिव्यक्ति में राष्ट्रीयता थी और वर्तमान में अपने समय, परिवेश, मनुष्यता के बाह्यान्तर में घटित परिवर्तनों को व्यक्त करना भारतीयता माना गया। नितांत आज में जो एक तरफ से भूमण्डलीकरण का दौर कहा जाता है, राष्ट्रीयता की खोज शायद राष्ट्र की ओर से खडे़ होकर प्रतिवाद के स्वर हैं या अन्य प्रकार की निष्पत्तियाँ हैं। समयानुसार बदलते साहित्यिक प्रत्ययों और मुहावरों में जातीयता को परिभाषित करने की इस कोशिश पर ध्यान दिया जाना चाहिए।


मैं डॉ. कविता वाचक्नवी को एक अनिवार्य विषय ['' कविता की जातीयता''] पर हिन्दी पाठक का ध्यान आकर्षित करने और दूर तक राष्ट्रीयता की गतिशीलता को कविता-धाराओं में पहचानने के दुस्तर कार्य को सम्पन्न करने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ। प्रवाहों के बीच एक निष्पक्ष धारणा से मूल्याँकन करने का एक कठिन काम उन्होंने किया है।


( लेखक प्रख्यात आलोचक व पूर्वग्रह के सम्पादक हैं तथा भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक नया ज्ञानोदय के संपादक रहे हैं । )


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कविता की जातीयता / डॉ. कविता वाचक्नवी / हिन्दुस्तानी एकेडेमी , १२ डी , कमला नेहरु मार्ग , इलाहाबाद - २११ ००१ / २००९ / २२५ रुपये / पृष्ठ
३६६[सजिल्द].

मेरे रोम- रोम से तुम्हारी कस्तूरी फूटती है




मेरे रोम- रोम से तुम्हारी कस्तूरी फूटती है
- कविता वाचक्नवी







आप
में से जो लोग कविता पढ़ने (लिखने-भर नहीं) में रुचि रखते हैं उन्होंने गहरी संवेदनात्मक से लेकर विचार-प्रखर तक और आग लगा देने वाली से लेकर नथुने फड़काने वाली तक कई प्रकार की कविताएँ सुनी - पढ़ी होंगीवैसे जो लोग साहित्य वालों को दोयम दर्जे का समझते हैं उन्होंने भी कम से कम अपने मिडिल स्कूल तक भाषा वाले विषयों में कविताएँ अवश्य पढ़ी ही होंगीइन अर्थों में प्रत्येक मिडिल क्लास तक पढ़ा व्यक्ति भी उसकी शक्ति से परिचित होता है, उसकी धार से परिचित होता है उसके स्वरूप से परिचित होता ही हैऔर, एक मजे की बात और है कि युवावस्था के कच्चे प्रेम में पड़ कर लगभग सभी ने कविता का आश्रय लिया होगा, भले ही अपनी लिखी हों या किसी दूसरे की शायरी, कविताई या कलाम से काम चलाया होगायहाँ एक रोचक तथ्य और है ( लिंग विभाजन वाले माफ़ करें) कि आयु के उस दौर में श्रृंगाररस ( संयोग और वियोग दोनों ही) में डूबे लोगों का यदि सर्वेक्षण किया जाए तो युवतियों से अधिक युवक कविता का सहारा लेते हैं, भले ही राज--दिल बयान करना हो या दर्द--दिलदिल के टुकड़े दिखाने हों या चाक--जिगरयह तथ्य जाने किस इंगित की ओर इशारा करता है कि लड़कियों की अपेक्षा ऐसी स्थिति में अकवि से अकवि युवक अधिक संख्या में कविताई को अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में प्रयोग करते है



यह तो रही प्रस्तावना, मुद्दा यह है कि आख़िर कविता की आवश्यकता है क्यों, क्या करती है कविता, कैसी होती है या क्या छिपा रहता है उसमें कि हर देश, हर भाषा में कवि को अत्यन्त श्रेष्ठ स्थान प्राप्त होता है, ...और भी सम्बद्ध कई तथ्य, ! आप भारत में हिन्दी के कवि की स्थिति का उदाहरण देकर मेरी बात काटने की दिशा में मत जाइए क्योंकि जो तर्क आप देने जा रहे हैं वही तर्क इसे प्रमाणित करता है कि हिन्दी के कवि की दुर्गत जैसी स्थिति के बावजूद भी यहाँ कवि वर्षा में कुकुरमुत्तों की मानिंद क्षण- क्षण और- और प्रकट होते रहते हैं, कुछ भी लिख कर कवि कहलाने के लोभ में त्रस्त होने ( `करने' पढ़ा जाए) की सीमा तक व्यस्त रहते हैं और दूसरों की रचनाओं पर हाथ साफ़ करने तक का परहेज भी वे नहीं मानते| ये सब तथ्य इसी बात का तो प्रमाण हैं कि कवि होना कोई बहुत ही बड़ी उपलब्धि की बात है, और कविता, वह कोई अत्यन्त विशिष्ट कौशलबात वहीं आती है कि कविता की आवश्यकता ही रहे तो ये सारे जंजाल मिटें। नित नए नए ज्ञान-विज्ञान के युग में क्या जरूरत है इसकी ?




झंडा और डंडा उठाने वाले लोग मेरी ओर लपकने को तैयार हो रहे होंगे कि अरे हमारी कुछ प्रविष्टियों को लिंकित करो और जाओ यहाँ सेलिंक को हायपर लिंक बना उसको दुहराते दिखाना भर ही तो चर्चाकार का काम है, इस से आगे वह यहाँ क्यों लिखने लगे हैं ? अपने मत देने का आपका अधिकार है, पर हमारा उस से विमत होने का भी अधिकार बना रहने की स्वतंत्रता का लाभ उठाते हुए मुझे आगे बढ़ना होगा




तो, फिर आते हैं कविता परमुझे लगभग वर्ष -भर पूर्व कि एक घटना याद रही ही । श्री उदय प्रताप सिंह, (वरिष्ठ साहित्यकार एवं राजनेता) के सान्निध्य में एक कवि गोष्ठी हुई, उनके साथ कुछ अरब देश के अधिकारी भी थे तो उर्दू हिन्दी के गिने - चुने कवियों को आमंत्रित किया गया था काव्यपाठ के लिएसंभवतः मैं अकेली महिला रचनाकार रही हूँगीउर्दू के कई बड़े शायर मुम्बई से भी आए थेमैंने उस दिन रिश्तों पर अपनी गज़लें पढींकार्यक्रम के अंत में जब उन राजनयिक के वक्तव्य का समय आया तो उन्होंने एक बहुत मार्के की बात की, जिस से कविता की आवश्यकता का सही सही अनुमान हो जाता हैउन्होंने कहा कि सायंस, गणित, भौतिकी, रसायन या अभियांत्रिकी के किसी भी विद्यार्थी को सारा ज्ञान -विज्ञान पा लेने के बाद भी साहित्य के अतिरिक्त कोई विषय ऐसा नहीं जो यह बताता हो कि, भले मानुष ! संसार में सम्बन्धों और रिश्तों की क्या जरूरत हैमनुष्य से मनुष्य के सम्बन्ध की सीख कोई नहीं देता, दे सकतारिश्ते वाली ग़ज़लों का उदाहरण देकर उन्होंने इसे इतने पारदर्शी तरीके से बताया कि रिश्तों की यह समझ और उनकी जरूरत केवल काव्य और साहित्य ही बयान कर सकता है, सिखला सकता है, समझा सकता हैसाहित्य में स्नातकोत्तर और उस से आगे शिक्षा पाने वाले विद्यार्थियों को भारतीय पाश्चात्य काव्यशास्त्र ( पोएटिक्स ) भी पढ़ाया जाता हैउसमें आरंभिक स्तर पर काव्य के तत्व से लेकर काव्य के प्रयोजन भी सम्मिलित होते हैंमुझे कई बार लगता है कि नैसर्गिक प्रतिभा से इतर कवि बनने के अभ्यासियों को कम से कम इतना तो अवश्य पढ़ना चाहिएताकि वे अपनी कविताओं का मूल्यांकन कर सकें और बेहतर योगदान दे सकें




जो लोग पाठकीय रुचि वाले कभी नहीं रहे, ब्लॉग प्रणाली ने उन्हें कुछ कुछ पढ़ने को विवश कर दिया है, भले ही इसलिए कि दूसरों का पढ़ कर टिप्पणी करेंगे तो बदले में टिप्पणी आएगी भीऔर साथ ही, पुस्तक को खरीद कर पढ़ना सभी के लिए उतना सुगम नहीं है, जितना नेट ने तात्क्षणिकता सुगमता से पाठकीयता को प्रसरित किया है। नेट पर कविताओं की संख्या में दिनों दिन, दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि हो रही है। बहुत अच्छी कविताएँ भी देखने पढ़ने को उपलब्ध हो रही हैं और बहुत दोयम दर्जे की भी। मुझे याद है, अपने विद्यार्थी जीवन के वे दिन जब एक कविता को इसलिए पढाया जाता था कि विद्यार्थियों को उदाहरण दिया जा सके कि ऐसी निरर्थक कविता भी क्या कविता। उस कविता को वर्षों पुरानी स्मृति से छाँट कर याद करुँ तो एकाध पंक्ति याद है -

" काश अगर मैं तोता होता
तोता होता तो क्या होता
........
.......
........
तो-तो-तो-तो
ता-ता-ता-ता
तोता होता
तो क्या होता "


तो अच्छी कविताओं और काव्य-भ्रष्ट कविताओं का अम्बार हिन्दी के सौभाग्य व दुर्भाग्य दोनों की कहानी कहता है। लोगों को यही नहीं पता कि कविता होती क्या है, उसके तत्त्व क्या हैं। उसकी देह क्या है व आत्मा क्या है। किसी ने देह को साध लिया तो किसी ने उसे भी साधने की जरूरत न समझी और अपने को कविराज मानते-मनवाते रहे।
इसी प्रकार का एक उदाहरण है, जहाँ एक ख्यातनाम कवि ( ...) ने अपनी माँ पर केंद्रित कविता में काफ़िया मिलाने के चक्कर में कमाल कर दिया। यह रचना भी पूरी मुझे स्मरण नहीं, किंतु उसमें संभवत: जीवन के द्वंद्वों की डोर पर संतुलन साधे चलने वाली माँ बताते हुए `नटनी' का काफ़िया प्रयोग किया गया था - "नटनी जैसी माँ" । इतने तक तो ठीक था, अब उसके आगे की पंक्ति में माँ की उपमा रोटी पर " चटनी जैसी माँ" कह कर बयान कर दी गयी। हद्द हो गयी भई यह तो। काव्यभाषा का संस्कार कहाँ से लाइयेगा?




माँ पर ऐसी ऐसी मार्मिक कवितायेँ लिखी गयी हैं कि संवेदना और श्रेष्ठता की दृष्टि से हिन्दी में इनका आँकड़ा सर्वाधिक होगा, इससे अगला स्थान संभवतः बेटियों पर केंद्रित कविताओं का निकलेगा। तो, सर्वाधिक सबल सम्बन्ध पर ऐसे चलताऊ ढंग से लिखना कभी कभी कितना घातक हो सकता है। यह ध्यान देने की बात है।अस्तु !




आज हिन्दी ब्लॉग जगत में इधर पढने को मिलीं माँ पर केंद्रित कविताओं में से कुछ को इस बार बाँटा जाए |




गत दिनों बोधिसत्व जी की माँ पर केंद्रित कविता माँ का नाच पढ़ने को मिली थी, कविता में माँ की पीड़ा का चित्र देखिए -



मटमैले वितान के नीचे
इस छोर से उस छोर तक नाच रही थी माँ
पैरों में बिवाइयां थीं गहरे तक फटी
टूट चुके थे घुटने कई बार
झुक चली थी कमर
पर जैसे भंवर घूमता है
जैसे बवंडर नाचता है
नाच रही थी माँ

आज बहुत दिनों बाद उसे
मिला था नाचने का मौका
और वह नाच रही थी बिना रुके
गा रही थी बहुत पुराना गीत
गहरे सुरों में

अचानक ही हुआ माँ का गाना बंद
पर नाचना जारी रहा
वह इतनी गति में थी कि परबस
घुमती जा रही थी
फिर गाने कि जगह उठा
विलाप का स्वर
और फैलता चला गया उसका वितान

वह नाचती रही बिलखते हुए
धरती के इस छोर से उस छोर तक
समुद्र की लहरों से लेकर जुते हुए खेत तक
सब भरे थे उसकी नाच की धमक से
सब में समाया था उसका बिलखता हुआ गान ।



आप ने किसी एक फ़िल्म के `मेरे पास माँ है' वाले संवाद की तो खूब चर्चा सुनी होगी, अब ज़रा इन पंक्तियों पर ध्यान दें -

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई,
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई




माँ के जीवन क्रम का एक चित्र यह, यहाँ भी देखें

माँ की डिग्रियाँ


घर के सबसे उपेक्षित कोने में
बरसों पुराना जंग खाया बक्सा है एक
जिसमें तमाम इतिहास बन चुकी चीजों के साथ
मथढक्की की साड़ी के नीचे
पैंतीस सालों से दबा पड़ा है
माँ की डिग्रियों का एक पुलिन्दा

बचपन में अक्सर देखा है माँ को
दोपहर के दुर्लभ एकांत में
बतियाते बक्से से
किसी पुरानी सखी की तरह
मरे हुए चूहे सी एक ओर कर देतीं
वह चटख पीली लेकिन उदास साड़ी
और फिर हमारे ज्वरग्रस्त माथों सा
देर तक सहलाती रहतीं वह पुलिंदा



माँ की डिग्रियों वाली कविता के बरक्स इस कविता को भी रख कर देखें कि माँ का मातृत्व इन औपचारिकताओं से कहीं परे की चीज है -

अनपढ़ माँ

चूल्हे-चौके में व्यस्त
और पाठशाला से
दूर रही माँ
नहीं बता सकती
कि ''नौ बाई चार'' की
कितनी ईंटें लगेंगी
दस फीट ऊँची दीवार में
...लेकिन अच्छी तरह जानती है
कि कब, कितना प्यार ज़रूरी है
एक हँसते-खेलते परिवार में।

त्रिभुज का क्षेत्रफल
और घन का घनत्व मापना
उसके लिए स्यापा है
...क्योंकि उसने मेरी छाती को
ऊनी धागे के फन्दों
और सिलाइयों की
मोटाई से नापा है

वह नहीं समझ सकती
कि 'ए' को 'सी' बनाने के लिए
क्या जोड़ना या घटाना होता है
...लेकिन अच्छी तरह समझती है
कि भाजी वाले से
आलू के दाम कम करवाने के लिए
कौन-सा फॉर्मूला अपनाना होता है।

मुद्दतों से खाना बनाती आई माँ ने
कभी पदार्थों का तापमान नहीं मापा
तरकारी के लिए सब्ज़ियाँ नहीं तौलीं
और नाप-तौल कर
ईंधन नहीं झोंका
चूल्हे या सिगड़ी में
...उसने तो बस ख़ुशबू सूंघकर बता दिया
कि कितनी क़सर बाकी है
बाजरे की खिचड़ी में।

घर की
कुल आमदनी के हिसाब से
उसने हर महीने राशन की लिस्ट बनाई है
ख़र्च और बचत के अनुपात निकाले हैं
रसोईघर के डिब्बों,
घर की आमदनी
और पन्सारी की रेट-लिस्ट में
हमेशा सामन्जस्य बैठाया है
...लेकिन अर्थशास्त्र का एक भी सिध्दान्त
कभी उसकी समझ में नहीं आया है।

वह नहीं जानती
सुर-ताल का संगम
कर्कश, मृदु और पंचम
सरगम के सात स्वर
स्थाई और अन्तरे का अन्तर
....स्वर साधना के लिए
वह संगीत का
कोई शास्त्री भी नहीं बुलाती थी
...लेकिन फिर भी मुझे
उसकी लल्ला-लल्ला लोरी सुनकर
बड़ी मीठी नींद आती थी।

नहीं मालूम उसे
कि भारत पर कब, किसने आक्रमण किया,
और कैसे ज़ुल्म ढाए थे
आर्य, मुगल और मंगोल कौन थे,
कहाँ से आए थे?
उसने नहीं जाना
कि कौन-सी जाति
भारत में अपने साथ क्या लाई थी
लेकिन हमेशा याद रखती है
कि नागपुर वाली बुआ
हमारे यहाँ कितना ख़र्चा करके आई थी।

वह कभी नहीं समझ पाई
कि चुनाव में
किस पार्टी के निशान पर मुहर लगानी है
लेकिन इसका निर्णय हमेशा वही करती है
कि जोधपुर वाली दीदी के यहाँ
दीवाली पर कौन-सी साड़ी जानी है।

मेरी अनपढ़ माँ
वास्तव में अनपढ़ नहीं है
वह बातचीत के दौरान
पिताजी का चेहरा पढ़ लेती है
झगड़े की सम्भावनाओं को भाँप कर
बात की दिशा मोड़ सकती है
काल-पात्र-स्थान के अनुरूप
कोई भी बात
ख़ूबसूरत मोड़ पर लाकर छोड़ सकती है

दर्द होने पर
हल्दी के साथ दूध पिला
पूरे देह का पीड़ा को मार देती है
और नज़र लगने पर
सरसों के तेल में
रूई की बाती भिगो
नज़र भी उतार देती है

अगरबत्ती की ख़ुशबू से
सुबह-शाम सारा घर महकाती है
बिना काम किए भी
परिवार तो रात को
थक कर सो जाता है
लेकिन वो सारा दिन काम करके भी
परिवार की चिन्ता में
सो नहीं पाती है।

सच!
कोई भी माँ अनपढ़ नहीं होती
सयानी होती है
क्योंकि
कई-कई डिग्रियाँ बटोरने के बावजूद
बेटियों को उसी से सीखना पड़ता है
कि गृहस्थी कैसे चलानी होती है।


माँ को तलाशती रतन चौहान की एक छोटी-सी कविता के मर्म तक पहुँच कर मौन के सिवा कुछ नहीं सूझेगा -


माँ के लगाए गए सहजन में
फूल आ गए हैं

उसकी नर्म टहनियाँ
वसन्त हो गई हैं

अब अब कुछ ज़्यादा काँपने
लग गए माँ के हाथों ने
इसे अपनी सहोदर धरती
की कोख में रोपा था दो एक ऋतु पहले

झुर्रियों से भरी माँ की उंगलियों को छूकर
धरती आर्द्र हो गई थी

सहजन बूढ़ी माँ का बेटा
है
ग्रीष्म की लू लपट में
माँ की स्मृतियों को छाँह देता हुआ

सहजन में फूल आ गए हैं
माँ नहीं है


समीरलाल जी की इस कविता में निहित वेदना को भी गत दिनों आप ने अवश्य अनुभव किया होगा -



मेरी माँ लुटेरी थी...

माँ!!

तेरा
सब कुछ तो दे दिया था तुझे
विदा करते वक्त
तेरा
शादी का जोड़ा
तेरे सब जेवर
कुंकुम,मेंहदी,सिन्दूर
ओढ़नी
नई
दुल्हन की तरह
साजो
सामान के साथ
बिदा
किया था...

और हाँ
तेरी छड़ी
तेरी एनक,
तेरे नकली दांत
पिता
जी ने
सब कुछ ही तो
रख दिये थे
अपने हाथों...
तेरी
चिता में

लेकिन
फिर भी
जब से लौटा हूँ घर
बिठा कर तुझे
अग्नि रथ पर
तेरी छाप क्यों नजर आती है?

वह धागा
जिसे तूने मंत्र फूंक
कर दिया था जादुई
और बांध दिया था
घर
मोहल्ला,
बस्ती
सभी को एक सूत्र में

आज
अचानक लगने लगा है
जैसे टूट गया वह धागा
सब कुछ
वही तो है
घर
मोहल्ला
बस्ती
और वही लोग
पर घर की छत
मोहल्ले का जुड़ाव
और
बस्ती का सम्बन्ध
कुछ ही तो नहीं
सब कुछ लुट गया है न!!

हाँ माँ!

सब कुछ
और ये सब कुछ
तू ही तो ले गई है लूट कर
मुझे पता है
जानता हूं न बचपन से
तेरा लुटेरा पन.
तू ही तो लूटा करती थी
मेरी पीड़ा
मेरे दुख
मेरे सर की धूप
और छोड़ जाती थी
अपनी लूट की निशानी
एक मुस्कान
एक रस भीगा स्पर्श
और स्नेह की फुहार
अब सब कुछ लुट गया है!!

स्तम्भित हैं
पिताजी तो
यह भी नहीं बताते
आखिर
कहां लिखवाऊँ
रपट अपने लुटने की
घर के लुटने की
बस्ती और मोहल्ले के लुटने की

और सबसे अधिक
अपने समय के लुट जाने की....





ऐसे ही माँ की कमी महसूसती एक पुकार यहाँ भी है -

माँ


माँ !
तुम्हारी लोरी नहीं सुनी मैंने,
कभी गाई होगी
याद नहीं
फिर भी जाने कैसे
मेरे कंठ से
तुम झरती हो।


तुम्हारी बंद आँखों के सपने
क्या रहे होंगे
नहीं पता
किंतु मैं
खुली आँखों
उन्हें देखती हूँ ।



मेरा मस्तक
सूँघा अवश्य होगा तुमने
मेरी माँ !
ध्यान नहीं पड़ता
परंतु
मेरे रोम- रोम से
तुम्हारी कस्तूरी फूटती है ।



तुम्हारा ममत्व
भरा होगा लबालब
मोह से,
मेरी जीवनासक्ति
यही बताती है ।




और
माँ !
तुमने कई बार छुपा-छुपी में
ढूँढ निकाला होगा मुझे
पर मुझे
सदा की
तुम्हारी छुपा-छुपी
बहुत रुलाती है;

बहुत-बहुत रुलाती है ;
माँ !!!





माँ की स्मृति में ऋषभदेव जी की लिखी इस कविता में संबंधों कि तरलता के साथ लोक में रमे माँ के चित्र विभोर कर देते हैं -


बनाया था माँ ने वह चूल्हा


चिकनी पीली मिट्टी को
कुएँ के मीठे पानी में गूँथ कर
बनाया था माँ ने वह चूल्हा
और पूरे पंद्रह दिन तक
तपाया था जेठ की धूप में
दिन - दिन भर



उस दिन
आषाढ़ का पहला दौंगड़ा गिरा,
हमारे घर का बगड़
बूँदों में नहा कर महक उठा था,
रसोई भी महक उठी थी -
नए चूल्हे पर खाना जो बन रहा था.



गाय के गोबर में
गेहूँ का भुस गूँथ कर
उपले थापती थी माँ बड़े मनोयोग से
और आषाढ़ के पहले
बिटौड़े में सजाती थी उन्हें
बड़ी सावधानी से .



बूँदाबाँदी के बीच बिटौड़े में से
बिना भिगोए उपले लाने में
जो सुख मिलता था ,
आज लॉकर से गहने लाने में भी नहीं मिलता.



सूखे उपले
भक्क से पकड़ लेते थे आग
और
उँगलियों को लपटों से बचाती माँ
गही में सेंकती थी हमारे लिए रोटी
- फूले फूले फुलके.



गेहूँ की रोटी सिंकने की गंध
बैठक तक ही नहीं , गली तक जाती थी.
हम सब खिंचे चले आते थे
रसोई की ओर.



जब महकता था बारिश में बगड़
और महमहाती थी गेहूँ की गंध से रसोई -
माँ गुनगुना उठती थी
कोई लोकगीत - पीहर की याद का.



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.



आग बढ़ती है
तो रोटी जलने लगती है.
तेरे बहनोई को जली रोटी पसंद नहीं रे!
रोटी को बचाती हूँ तो उँगली जल जाती है.



माँ की उँगलियाँ छालों से भर जाती थीं
पर पिताजी की रोटी पर एक भी काला निशान कभी नहीं दिखा!



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
बड़े बदमाश हैं ये झोंके ,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.



आग बुझती है
तो रोटी फूलती नहीं
तेरा भानजा अधफूली रोटी नहीं खाता रे!
बुझी आग जलाती हूँ तो आँखें धुएँ से भर जाती हैं.



माँ की आँखों में मोतियांबिंद उतर आया
पर मेरी थाली में कभी अधफूली रोटी नहीं आई!



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



रोटी बनाना सीखती मेरी बेटी
जब तवे पर हाथ जला लेती है,
आँखें मसलती
रसोई से निकलती है.
तो लगता है
माँ आज भी गुनगुना रही है .



मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न!
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी
.
गत दिनों आई माँ पर केंद्रित इन कुछ कविताओं के क्रम को विराम देते हुए मैं चर्चा परिवार की ओर से योगेन्द्र कृष्ण जी की माँ को भावांजली देती हूँ व उनकी आत्मा की सद्‍गति की प्रार्थना करती हूँ.

माह पूर्व एक संगोष्ठी में पटना जाने पर भाई योगेन्द्र कृष्ण से सपत्नीक मिलने का अवसर मिलाउनके सौजन्य ने प्रभावित कियागत दिनों उनकी माता जी का स्वर्गवास हो गया उन्होंने अपनी पीड़ा को सबसे बाँटते हुए जो लिखा उसके बाद कुछ कहने को नहीं रह जाता -


श्मशान में माँ

30 मार्च को मेरी माँ का निधन हो गया। दुःख इसलिए भी अधिक है कि माँ बहुत लंबे समय तक हमारे साथ रहीं और कभी यह मह्सूस करने का शायद अवसर ही नहीं दिया कि वे हमें छोड़कर चली भी जायेंगी। जबकि वे हम पांच भाइयों, एक बहन और दर्जनों पोता-पोतियों, नाती-नातिनों के बीच अंतिम समय तक अपने स्नेह और प्यार में बंटती रहीं। मृत्यु के समय उनकी आयु लगभग 95 वर्ष थी।
उसी दिन रात्रि में पटना के गुलबी घाट में उनका दाह-संस्कार कर दिया गया।

गंगा के इस श्मशान घाट के अपने कुछ ताज़ा ग़मग़ीन अनुभवों को भी आपसे साझा करने का मन है।

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उनका भी निष्काम देखो
जो तुम्हें नहीं जानतीं
फिर भी तुम्हारे लिए
तुम्हारे साथ जलकर राख हो रही हैं
वे ढेर सारी लकड़ियां
अंत तक तुम्हारी देह से
मिलकर एक हो रही हैं
राख में राख
क्या अलग कर पाएंगे हम
लकड़ी और देह की राख
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धू-धू कर जलती चिताएं हैं
आकाश में उठता काला धुआं
और रात्रि की भयावह नीरवता
को चीरती घाट की सीढियों से
नीचे उतरतीं कुछ आवाज़ें हैं

असमय एक युवा देह को
तलाश है मिट्टी की…

और फिर
सफ़ेद कपड़े में लपेटे
एक शिशु को दोनो हाथों मे उठाए
उतरता है एक युवक
साथ में और भी कई लोग
पर उतने भी नहीं
जितने कि होने चाहिए
दुःख की इस बीहड़ घड़ी में

और घाट की सीढियों से
उतरता है पीछे-पीछे
भारी पत्थर का एक बड़ा-सा टुकड़ा
बिलकुल अंधेरे में
गंगा तट की तरफ़…

पानी के बड़े बुलबुले छूटने-सी आवाज़
अर्द्ध-रात्रि की बीहड़ बेबस खामोशी को
हल्के से हिलाती है…

छोड़ दिए गए हैं
पत्थर और शिशु देह
कुछ दिनों के लिए
एक दूसरे के साथ
निबद्ध रहने के करार पर…
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श्मशान घाट तक आने में
कितना वजन था
हमारे कंधों पर
लेकिन नहीं था
फिर भी कोई भार

और अब जबकि लौट रहा हूं
लेकर मुट्ठी भर तुम्हारी राख
क्यों दब रहा है मन इसके भार से…

जैसे कि पत्थर हो कोई
बंधा हुआ मेरी ही देह से…

कल कई दिन बाद उन्होंने लिखा -

बारह दिनों के बाद आज ही सारे अनुष्ठान संपन्न कर वापस घर लौटा हूं। फ़र्श पर और सभी जगह धूल की मोटी परतें हैं पर उन परतों पर नहीं हैं कहीं अब उन नंगे पैरों के निशान……




और अंत में एक बात -

माँ के प्रति इतनी गहरी व इतनी सारी संवेदनाएँ हमारे भीतर विद्यमान रहती हैं, यदि ये संवेदनाएँ किसी भी जीवित माँ का वार्धक्य और जीवन संवार सकने में सफल हो जाएँ तो जाने कितनी माँओं को इन संवेदनाओं की पहुँच सुख दे सकती है। वरना तो ये कागद के लेखे बन कर रह जाती हैं बस.......




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