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इसलिए बिदा करना चाहते हैं, हिन्दी को हिन्दी के अख़बार --- (४)

आलेख का अन्तिम भाग

आलेख के इस चौथे व अन्तिम भाग के साथ ही यह लेखमाला समाप्त हो रही है। जिन भी प्रकार के भ्रमों अथवा दिलासों में आम भारतीय, चाहे वह विश्व के किसी भी कोने में रहता हो, किसी न किसी प्रकार आश्वस्त रहता है, वे सारे कितने भोथरे व युक्तिहीन हो सकते हैं, यह विचार का विषय है। यह आशंका केवल भाषा के प्रश्नों तक ही सीमित नहीं है, अपितु भारत व भारतीयों के अस्तित्व के अनेकविध पक्ष इस हमले की परिधि में आते हैं। उन पर भी गहराई से विचार कर वातावरण निर्मित किए जाने की तीव्र आवश्यकता है।

इस प्रकार के लेखों द्वारा भय, नारेबाजी अथवा निरर्थक हल्ला मचाने की मानसिकता को प्रश्रय देना हमारा उद्देश्य नहीं है, अपितु वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुए आँख खोलने वाले सत्यों का उद्घाटन कर उनकी प्रतिक्रिया स्वरूप किसी सार्थक पहल का वातावरण निर्मित करना है।

समाज के बौद्धिक वर्ग की भूमिका शरीर में मस्तिष्क की भूमिका के तुल्य होती है। जिस प्रकार मस्तिष्क सभी चेतनाओं का केन्द्र है व उसके द्वारा ही शरीर की क्रिया-प्रतिक्रिया पर नियन्त्रण होता है, उसी प्रकार समाज के बौद्धिक वर्ग तक सन्देश पहुँचने से पूरे समाज तक इसके पहुँचने की प्रबल संभावना बनती है।

इन्हीं प्रकार के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए ‘हिन्दी भारत’ समूह अपने प्रत्येक सदस्य से अपनी विशेषज्ञता के लाभ व सक्रिय सहयोग की अपेक्षा करता है। लेखकों को आपकी टिप्पणियों से निश्चय ही बल तो मिलता ही है, परस्पर संवाद का वातावरण भी निर्मित होता है,जो मनुष्य व मनुष्यता के प्रश्नों के निदान की प्रथम शर्त है। विश्व के कोने- कोने में बसे भारतीयों के मध्य सम्वाद स्थापित कर उन्हें निकट लाना व आपसी सद्भाव बना कर बातचीत का वातावरण निर्मित कर विचार-विमर्श की स्थितियाँ बनना एक बड़ी व सार्थक पहल ही होगी। ऐसे प्रत्येक यत्न का समूह स्वागत करता है।

भविष्य में भी प्रभु जोशी जी के अन्य विषयों पर लिखे सुचिन्तित लेख हमें प्राप्त होंगे, ऐसा आश्वासन उन्होंने हमें दिया है। आप सभी की प्रतिक्रियाएँ भी उन तक पहुँचा दी जाएँगी। सभी का प्रतिक्रियाओं के लिए भी आभार।
सादर
~ कविता वाचक्नवी
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इसलिए बिदा करना चाहते हैं, हिन्दी को हिन्दी के अख़बार --- (४)
~प्रभु जोशी


यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि आज जिस हिन्दी को हम देख रहे हैं - उसे `पत्रकारिता´ ने ही विकसित किया था । क्योंकि, तब की उस पत्रकारिता के खून में राष्ट्र का नमक और लौहतत्व था जो बोलता था । अब तो खून में लौह तत्व की तरह एफडीआई (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेन्ट) बहने लगा है । अत: वही तो बोलेगा । उसी लौहतत्व की धार होगी जो हिन्दी की गर्दन उतारने के काम में आयेगी । हालांकि अखबार जनता में मुगालता पैदा करने के लिए कहते हैं, पूंजी उनकी जरूर है, लेकिन चिन्तन की धार हमारी है । अर्थात् सारा लोहा उनका, हमारी होगी धार । अर्थात् भैया हमें भी पता है कि धार को निराधार बनाने में वक्त नहीं लगेगा । तुम्हीं बताओ उन टायगर इकनॉमियों का क्या हुआ, जिनसे डरकर लोग कहने लगे थे कि पिछली सदी यूरोप या पश्चिम की रही होगी, यह सदी तो इन टायगरों की होगी, कहां गये वे टायगर ? उनके तो तीखे दांत और मजबूत पंजे थे । नई नस्ल के ये कार्पोरेटी चिन्तक रोज-रोज बताते हैं - हिन्दुस्तान विल बी टायगर ऑफ टुमॉरो ।

भैया, ये जुमले सुनते-सुनते हमारे कान पक गये हमें टुमॉरो का कुछ नहीं बनना, बल्कि जो कुछ बनना है आज का बनना है । हम कल के टायगर होने के बजाय आज की गाय होने और बने रहने में संतुष्ट हो लेंगे । गाय घास खायेगी तथा दूध और गोबर देगी और उससे हमारी खेतियों की सेहत ठीकठाक बनी रहेगी । लेकिन तुम हो कि थोड़े से चमड़े के लिए पूरी की पूरी गाय मार रहे हो ।

तब की पत्रिकारिता में अपने देश और समाज को गढ़ने-रचने का साहस था, संकल्प था, समझ और स्वप्न भी था (बेशक उसमें राष्ट्रीय पूंजीवाद की भूमिका भी थी।)। वह जख्मी कलम के साथ बारूद और बंदूक की बर्वरता के खिलाफ लड़ी थी । इस कारण वह भाषा के मसले को गहरे ऐतिहासिक विवेक के साथ देख रही थी । यहाँ गांधी का प्रसंग उल्लेखनीय लगता है । वे भी पत्रकार थे । आजादी की घोषणा के बाद जब बी.बी.सी. ने उन्हें बुलाया तो उन्होंने प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा था `संसार को कह दो गांधी को अंग्रेजी नहीं आती । गांधी अंग्रेजी भूल गया है।´ यह एक नवस्वतंत्र राष्ट्र के निर्माण के बड़े स्वप्न का उत्तर था । उन्हें यह अहसास था कि अपनी भाषा के अभाव में राष्ट्र फिर से गुलामी के नीचे चला जाएगा । उन्होंने स्वयं को वर्गच्युत करके, जिस तरह भारतीय समाज के आखिरी आदमी के बीच खुद को नाथ लिया था, उसने उन्हें इस बात के लिए और अधिक दृढ़ कर लिया था कि अंग्रेजी की औपनिवेशिक दासता से मुक्त नहीं हुए तो इतनी लम्बी लड़ाई के बाद हासिल की गई आजादी का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा । उन्होंने ये बात कई-कई जगह और अपनी चिटि्ठयों तथा पर्चों में भी बार-बार लिखी और छापी ।

मगर आज सबसे बड़ी त्रासदी तथा विसंगति यही है कि हमारी पत्रकारिता नई गुलामी खोलने का रास्ता सिर्फ अपनी धंधई बुद्धि की व्यावसायिक अधीरता के कारण कर रहा है । इस पत्रकारिता में, जो `माल´ की तरह उत्पादित और वितरित हो रहा है । कहीं कहीं तो छापकर प्रेस से सीधे गोदामों में भरी जा रही है । क्योंकि अब सर्कुलेशन नहीं केवल प्रिंट आर्डर को देखना है । क्योंकि वह विज्ञापनों की दर तय करता है । उसमें न तो अतीत के आकलन का गहरा विवेक रहा है - और, न ही `भविष्य में झाँक सकने वाली दृष्टि´। एक किस्म का धंधई उन्माद है, जिसे पूंजी का प्रवाह पैदा कर रहा है । इसलिए, वह केवल अपने व्यावसायिक साम्राज्य के लिए अराजक होने की हद तक, भाषा, संस्कृति और समाज को विखण्डित करने से भी संकोच नहीं करेगी। यों भी उसके लिए अब समाज को मात्र एक उपभोक्तावर्ग की तरह देखने की लत पड़ गई है । अब उसके लिए देश की जनता राष्ट्र की नागरिक नहीं बल्कि उसके प्रॉडक्ट (?) की ग्राहक है । इसके साथ विडम्बना यह भी है कि सम्पूर्ण हिन्दी भाषाभाषी समाज भी, भाषा के साथ किए जा रहे ऐसे विराट छल को गूँगा बन कर देख रहा है ।

यहाँ यह पुनर्स्मरण कराना जरूरी है कि हिन्दी का समकालीन भाषारूप आज विकास की जिस सीढ़ी तक पहुँचा है, उसे गढ़ने और विकसित करने में नि:संदेह हमारी हिन्दी पत्रकारिता की भूमिका बहुत बड़ी रही है, लेकिन दुर्भाग्यवश वही पत्रकारिता जिसे भाषा अभी तक का अपना सबसे अधिक विश्वसनीय माध्यम मानते आ रही थी, कि सबसे बड़ा धोखा उसी से खा रही है । उसके लिए सर्वाधिक संदिग्ध वही बन गया है । आज दैनिक पत्रकारिता उस मादा श्वान की तरह है, जो अपने ही जन्मे को भी खा जाती है ।
यह भ्रम हमें दूर कर लेना चाहिए कि अब भाषा बोले जाने वाले लोगों की संख्या से बड़ी नहीं होती । बोला जाना `कामचलाऊ संप्रेषण´ का संवादात्मक रूप है, चिन्तनात्मक नहीं । वह हमेशा ही आज अभी ताबड़तोड़ बनाम अनियंत्रित अधीरता से भरा होता है । नतीजतन उसे इस बात की कोई जरूरत और फुरसत नहीं होती कि वह अंग्रेजी के किसी नये शब्द का पर्याय ढूंढे या उसके लिए नया शब्द गढ़े । जैसे कि पिछली पीढ़ी ने मेम्बर ऑफ पार्लियामेंट के लिए पहले संसद सदस्य शब्द गढ़ा फिर अन्त में सांसद शब्द बनाया । लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अंग्रेजी को जस का तस उठाकर अपनी फोरी जरूरत पूरी कर लेता है । इसी आदत ने हिन्दी में शेयर्ड वॉकुबेलेरी को बढ़ाया और अखबारों ने लगे हाथ उसे एक अभियान की तरह उठा लिया । इसलिए भाषा के इस खिचड़ी रूप का जयघोष करते हुए, जो लोग भाषा की सुंदर सेहत का प्रचार कर रहे हैं, या तो वे इस खतरनाक मुहिम का हिस्सा हैं, या फिर उनकी समझ का कांकड़ ही छोटा है ।

इसके साथ ही ऐसे महामूर्खो या फिर चालाकों की कमी नहीं है जो हर समय इस बात की डूंडी पीटते रहते हैं कि लो अब तो तुम्हारी हिंग्लिश ब्रिटेन में भी लोकप्रिय हो गई है । यह बात ऐसे महातथ्य की तरह प्रचारित की जा रही है जैसे हमारी हिन्दी ने अंग्रेजी की सदियों की कुलीनता की कलाई झटक कर उसे सिंहासन से उतारकर सड़क पर ला दिया है । गौरांग प्रभु ने कुलीनता के कवच को खदेड़कर तुम्हारी हिंग्लिश का झगला धारण कर लिया है । यह हिन्दी की उपलब्धि नहीं सिर्फ भारतीयों की गुलाम मानसिकता की सूचना है । यह दासी का क्वीन के करीब पहुंच जाने का मूर्ख और मिथ्या रोमांच है, जो हिंग्लिशियाते अखबारों की प्रथम पृष्ठों की खबर बनाता है ।

पिछले ही दिनों ऐसी ही पगला डालने वाली एक खबर और रही कि हिन्दी के कुछेक शब्दों को ऑक्सफर्ड डिक्शनरी ने ले लिया । ऑक्सफर्ड डिक्शनरी हिन्दी गर्भित हो गई है । ये वे शब्द थे जिनके लिए अंग्रेजी में उपयुक्त या पर्याय असम्भव था क्योंकि वे अपना विकल्प खुद थे । उनको अंग्रेजी में उलथाया जाता तो वे अपना अर्थ ही खो देते । बस....क्या था ? अखबार बताने लगे कि ये लो हिन्दी छाने लगी अंग्रजी पर । एक अपढ़ महान ने तो यह तक कह दिया कि आज हमने डिक्शनरी पर विजय पाई है, एक दिन ब्रिटेन पर पा लेंगे । बहरहाल यह वैसी ही विदूषकीय प्रसन्नता थी जो मालवी की एक कहावत को चरितार्थ करती है कि एक नदीदे को किसी ने दे दी कटोरी तो उसने उससे पानी पी-पीकर ही अपना पेट फोड़ लिया । जबकि यह ऑक्सफर्ड डिक्शनरी की ज्ञानात्मक उदारता नहीं बल्कि नव उपनिवेशवादी बिरादरी का पूरा सुनिश्चित अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान है, जो भारतीयों को तैयार करता है कि जब अंग्रेजी जैसी महाभाषा उदार होकर हिन्दी के शब्दों को अपना रही है तो हिन्दी को भी चाहिए कि वह अंग्रेजी के शब्दों को इसी उदारता से अपनाये । अंग्रेजी के शब्दकोष में हिन्दी के शब्दों का दाखिला बमुश्किल एक प्रतिशत होगा । अर्थात् दाल में नमक के बराबर भी नहीं । लेकिन हमारे अखबार तो नमक में दाल मिला रहे हैं । हिन्दी को विशाल हत्या और समावेशी बनाने और बताने का कैसा उदाहरण है ।

जब भी अंग्रेजी द्वारा हिन्दी को हिंग्लिश बनाये जाने की चिंता प्रकट की जाती है, तो कुछ लोग अपनी अज्ञानता में और चालाक लोग अपनी धूर्तता में एक कविताई सच के जरिए हमें समझाने के लिए आगे आ जाते हैं कि कुछ है हस्ती मिटती नहीं हमारी । जबकि हकीकत ये है कि हमारी हस्ती कभी भी पस्ती में बदल चुकी है । हमारी भाषा हमारी संस्कृति कभी के घुटने टेक चुकी है । हमारा पूरा व्यक्तित्व (परसोना) पिछले दशकों में पश्चिमी हो चुका है, जो अब अमेरिकाना होने की तरफ बढ़ रहा है । किसी ने कहा था- आज लोग अमेरिका जाकर अमेरिकाना बन रहे हैं, लेकिन शीघ्र ही वह समय आयेगा जबकि अमेरिका आपके घर में घुसकर आपको अमेरिकन बना दिया जायेगा । यह मिथ्या कथन सी लगने वाली बात धीरे-धीरे सत्य का रूप धारण कर रही है । इसलिए अब मॉडिर्नज्म एक पुराना और बासी शब्द है, जिसे छिलके की तरह उतारकर उसकी जगह नया अमेरिकाना शब्द जगह ले चुका है । यहां तक कि विज्ञापनों में अब अमेरिकी मॉडलों का उपयोग इस तरह किया जाता है गालिबन भारतवंशियों! ये तुम्हारे नये देव पुरूष हैं और तुम्हें इन्हीं के सम्मुख दण्डवत होना है ।

दरअसल, अस्मिता की इन दिनों एक नई और माध्यम निर्मित अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए उसका प्रचार और वकालत की जा रही है । यूं भी अब वही सबको परिभाषित करता है और तमाम जीवन और समाज के तमाम मूल्यों का प्रतिमानीकरण करने का औजार बन चुका है । दूसरी तरफ हम अपनी सनातन रूढ़ सांस्कृतिक आत्मछवि से इतने मोहासक्त है कि प्रत्यक्ष और प्रकट पराजय को स्वीकारना नहीं चाहते हैं । बर्बर उपनिवेश के विरूद्ध लड़ने की निरन्तरता को जीवित बनाये रखने के लिए ऐसी अपराजय का अस्वीकार पराधीनता के दौर में राष्ट्रवाद की नब्जों में प्राण फूंकने के काम आता था । कुछ है कि हस्ती मिटती ही नहीं - तब यह दम्भोक्ति अचूक और अमोघ बनकर काम करती थी । जन-जन को जोड़ने और जगाने का जुमला था ये कि लगे रहो भैया । निश्चय ही उस दम्भोक्ति ने ब्रिटिश उपनिवेश के विरूद्ध संघर्ष में समूचे राष्ट्र को लगाये रक्खा और हमने अंग्रेजों को हकालकर बाहर कर दिया । लेकिन वह अपने दंश का जहर खून में इस कदर शामिल कर चुका था कि हम आज हिन्दी को हिन्दी से हिंग्लिश बनाते देख रहे हैं कि कहते हैं कि कुछ नहीं होगा, वह हर हाल में बची रहेगी । हस्ती है कि मिटती नहीं ।

कहने की जरूरत नहीं कि युद्धातुर उतावली से गुरूचरा दास जैसे लोग अपने तर्कों में बार-बार डेविड क्रिस्टल की पुस्तक लेंग्वज डेथ का हवाला इस तरह देते हैं, जैसे वह भाषा की भृगु संहिता है, जिसमें भाषा की मृत्यु की स्पष्ट भविष्योक्ति है - अत: आप हिन्दी की मृत्यु को लेकर छाती माथा मत कूटो । जबकि इससे ठीक उलट बुनियादी रूप से वह पुस्तक भाषाओं के धीरे-धीरे क्षयग्रस्त होने को लेकर गहरी चिंता प्रकट करती है। भाषाई उपनिवेशवाद (लिंग्विस्टक इम्पेरेजिज्म) के खिलाफ सारी दुनिया के भाषाशास्त्री को सचेत करती है पर हिन्दी वाले हैं कि सुन्न पड़े हैं । हिन्दी साहित्य संसार में विचरण करने वाले साहित्यकार तो ‘तेरी कविता से मेरी कविता ज्यादा लाल’ में लगे हुए हैं या हिन्दी की वर्तनी को दुरूस्त कर रहे हैं । जबकि इस समय सबको मिलजुलकर इस सुनियोजित कूटनीति के खिलाफ कारगर कदम उठाने की तैयारी करनी चाहिए ।

बहरहाल, इस सारे मसले पर एक व्यापक राष्ट्रीय विमर्श की जरूरत है । हमें याद रखना चाहिए कि कई नव स्वतंत्र राष्ट्रों ने अपनी भाषा को अपनी शिक्षा और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनाया । इसलिए आज उनके पास उनका सब कुछ सुरक्षित है। हमने अपनी राजनीतिक भीरूता के चलते भाषा के मसले पर पुरूषार्थ नहीं दिखाया । इसी की वजह है कि हमसे आज का ये धोखादेह समय हमारे सर्वस्व को जिबह के लिए मांग रहा है । आज हमारी आजादी वयस्क होते ही राजनीति के ऐसे छिनाले में फंस गई है कि सारा देश मीडिया में चल रहे व्यवस्था का मुजरा देख रहा है । पूरा समाज मीडिया और माफिया आपरेटेड बन गया है । अब मीडिया ही आरोप तय करता है, वही मुकदमा चलाता है और अंत में अपनी तरह से अपनी तरह का फैसला भी सुनाता रहता है और विडम्बना यह कि वह यह सब जनतंत्र की दुहाई देकर करता है, जबकि अपनी आलोचना का हक वह किसी को नहीं देता और अपने आत्मालोचन के लिए तो उसके पास समय ही नहीं है ।

राजनीति ने तो भाषा, शिक्षा, संस्कृति जैसे प्रश्नों पर विचार करना बहुत पहले ही स्थगित कर रखा है । वह तो देश को बाजार तथा एजीओ के भरोसे छोड़कर मुक्त हो गई है । यों भी उसमें प्रविष्टि की अर्हता हत्या और घूस लेकर कानून के शिकंजे से सुरक्षित बाहर आ जाना हो गया है - और जो इन अर्हताओं से रहित हैं, वे देश को एक प्रबंध संस्थान की तरह चलाने को भूमण्डलीकरण की वैश्विक दृष्टि मानते हैं और वे उसके राजनीतिक प्रबंधक का काम कर रहे हैं । यह राजनीतिक संस्कृति की समाज से विदाई की घड़ी है, जिसने संस्थागत अपंगता को असाध्य बन जाने की तरफ हांक दिया है । हम क्या थे ? हम क्या हैं और क्या होंगे अभी ? जैसे प्रश्नों पर बहस करना मूर्खों का चिंतन हो गया है । जबकि ये प्रश्न शाश्वत रहे हैं और हमेशा ही उत्तरों की मांग करते रहेंगे । इसलिए हमें अपने इतिहास को जीवित बचाकर रखना जरूरी है, क्योंकि भविष्य का जब सौदा होगा उसमें हमारी कम हमारे अतीत की भूमिका बहुत बड़ी होती है । वरना यह भाषा की मृत्यु के साथ दफ्न हो जायेगा। वे हमें हालीवुड की तरह भविष्यवादी फंसातियों में जीने के लिए तैयार किये दे रहे हैं।

कुछ दिनों में विश्व हिन्दी सम्मेलन होने जा रहा है, उसमें तालियां कूटने के बजाय इस प्रश्न पर बहुत शिद्दत से सोचा जाना चाहिए कि क्या हम शेष संसार से मुल्क बोस्निया, जाना, चीन, आिस्ट्रया, बल्गारिया, डेनमार्क, पुर्तगाल, जर्मनी, ग्रीक, इटली, नार्वे, स्पेन, बेिल्जमय, क्रोएशिया, फिनलैण्ड, फ्रांस, हंग्री, नीदरलैण्ड, पौलेण्ड या स्वीडन की तरह अपनी ही मूल भाषा में शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र के लिए जगह बनाने के लिए क्या कर सकते हैं । क्योंकि बकौल सेम पित्रोदा सिर्फ एक प्रतिशत ही है जो लोग अंग्रेजी जानते हैं । या कि हमें अफ्रीकी उपमहाद्वीप बन जाने की तैयारी करना है । अंत में अफ्रीका महाद्वीप में स्वाहिली लेखक की पीड़ा को भारतीय उपमहाद्वीप की पीड़ा का पर्याय बनाना है । उसने कहा कि जब ये नहीं आए थे तो हमारे पास हमारी कृषि, हमारा खानपान, हमारी वेशभूषा, हमारा संगीत और हमारी अपनी कहे जाने वाली संस्कृति थे - इन्होंने हमें अंग्रेजी दी और हमारे पास हमारा अपने कहे जाने जैसा कुछ नहीं बचा है । हम एक त्रासद आत्महीनता के बीच जी रहे हैं ।

हमारी हिन्दी पत्रकारिता को सोचना चाहिए कि विदेशी धन और खुद को मीडिया मुगल बनाने के बजाय वह सोचें कि अन्तत: भारतीय भाषाओं को आमतौर पर और हिन्दी को खासतौर पर हटाकर वह देश को आत्महीनता के किस मोड़ की तरफ घेरने जा रही है । साथ यह भी सोचें कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की आरती उतारने वाले भर रह जायें और देवपुरूष कोई अन्य हो जाये । बाहर की लक्ष्मी जायेगी तो वह विष्णु भी अपना ही लायेगी । आपके क्षीरसागर के विष्णु सोए ही रह जायेंगे।।

क्या हमारे हिंग्लिशियाते अखबार इस पर कभी सोचते है कि पाओलो फ्रेरे से लेकर पाल गुडमेन तक सभी ने प्राथमिक शिक्षा के सर्वश्रेष्ठ माध्यम को मातृभाषा ही माना है और हम हिन्दुस्तानी है कि हमारे रक्त में रची बसी भाषा को उसके मास मज्जा सहित उखाड़कर फेंकने का संकल्प कर चुके हैं । दरअसल औपनिवेशक दासत्व से ठूंस-ठूंसकर भरे हमारे दिमागों ने हिन्दी के बल पर पेट भर सकने की स्थिति को कभी बनने ही नहीं दिया, उल्टे धीरे-धीरे शिक्षा में निजीकरण के नाम पर शहरों में गली-गली केवल अंग्रेजी सिखाने की दुकानें खोलने के लिए लायसेंस उदारता के साथ बांटे गये । उन्हें इस बात का कतई इल्हाम नहीं रहा कि वे समाज और राष्ट्र के भविष्य के साथ कैसा और कौन सा सलूक करने की तैयारी करने जा रहे हैं । पूंजीवादी भूमण्डलीकरण से देश स्वर्ग बन जायेगा, ऐसी अवधारणाएं हिन्दी में अधकचरे ग्लोबलिस्टों की इतनी भरमार है कि वे एक अरब लोगों के भविष्य का मानचित्र मनमाने ढंग से बनाना चाहते हैं - और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि पूरा देश गूंगों की नहीं अंधों की शैली में आंख मीचकर गुड़ का स्वाद लेने में लगा हुआ है, उनकी व्याख्याओं में भाषा की चिंता एक तरह का देसीवाद है जो भूमण्डलीकरण के सांस्कृतिक अनुकूलन को हजम नहीं कर पा रहा है । वे इसे मरणासन्न देसीवाद का छाती-माथा कूटना कहकर उससे अलग होने के लिए उकसाने का काम करते हैं ।

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के अवतार पुरूष होने का जो डंका पीटा जाता है, उसके बारे में एक अमेरिकी विशेषज्ञ ने एक वाक्य की टिप्पणी में हमारी औकात का आकलन करते हुए कहा कि भारत के आई.टी. आर्टिजंस तो आभूषणों की दुकानों के बाहर गहनों को पालिश करके चमकाने वाले लोग भर हैं । माइक्रोसाफ्ट उत्पाद बनाता है और भारतीय उसे केवल अपडेट करते हैं । यह वाक्य हमारे सूचना सम्राट होने के गुब्बारे की क्षणभर में हवा निकाल देता है और दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक बात यह है कि हम इसी के लिए (आई.टी. आर्टिजंस) के लिए अपनी भाषाओं को मार रहे हैं । हम चमड़े के लिए भैंस मारने पर आमादा है ।

यदि हमें हिन्दी को आमतौर पर और तमाम भारतीय अन्य भाषाओं को खासतौर पर बचाना है तो पहले हमको प्राथमिक शिक्षा पर एकाग्र करना होगा और विराट छद्म को नेस्तानबूत करना होगा, जो बार-बार ये बता रहा है कि अगर प्राथमिक शिक्षा पहली कक्षा से ही अंग्रेजी अनिवार्य कर दी जाये, तो देश फिर से सोने की चििड़या बन जायेगा । जहां तक भाषा में महारत का प्रश्न है, संसार भर में हिन्दुतान के ढेरों प्रतिभाशाली वैज्ञानिक उद्योगपति और रचना लेखक रहे हैं, जिन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा अंग्रेजी में पूरी नहीं की । इसके साथ सबसे महत्वपूर्ण और अविलम्ब ध्यान देने वाली बात यह है कि प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में निरन्तर बढ़कर विकराल होते निजीकरण पर भी सफल नियंत्रण पाना होगा । तभी हम अपना जैसा कहे जा सकने वाला थोड़ा बहुत सुरक्षित रख पाने की स्थिति में होंगे । भारतीय भाषाओं को रोमन लिपि में बदलने का परिणाम यह होगा कि आने वाले 25 वर्ष बाद हमारी हजारों सालों की भारतीय भाषाएं बच्चों के लिए केवल जादुई लिपियां होंगी ।

इसलिए बिदा करना चाहते हैं, हिन्दी को हिन्दी के अख़बार ------ (३)

इसलिए बिदा करना चाहते हैं---(3)

इसलिए बिदा करना चाहते हैं, हिन्दी को हिन्दी के अख़बार ------ (३)
~प्रभु जोशी


पिछले दिनों अमेरिका में गरीब मुल्कों की आँखें खोल देने वाली एक पुस्तक छप कर आयी है, जिसे न लिखने के लिए सी.आई.ए. ने एक मिलियन डॉलर रिश्वत देने की पेश की थी - लेकिन, लेखक ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और साहस जुटा कर प्रायश्चित के रूप में लिख ही डाली यह पुस्तक : कन्फेशन ऑव एन इकोनोमिक हिटमैन´ । नोम चोमस्की और डेविड सी. कोर्टन जैसे बुिद्धजीवियों ने लेखक को उत्साहित करते हुए कहा कि इसका प्रकाशन शेष संसार का तो हित करेगा ही, बल्कि, इससे अमेरिका का भी हित ही होगा । इसलिए इसका छपना जरूरी है ।

बहरहाल, पुस्तक के लेखक जॉन पार्किन्स ने उसमें विस्तार से बताया कि किस तरह बहुराष्ट्रीय निगमों के जरिए अमेरिका ने तीसरी दुनिया के गरीब मुल्कों के आर्थिक ढांचे को तहस-नहस कर दिया कि नतीजतन वे सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर भी विपन्न हो गए । कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे ही बहुराष्ट्रीय निगमों और विश्व बैंक के पूर्व कर्मचारी हिन्दी के अखबारों के `तथाकथित-सम्पादकीय पृष्ठों´ पर कब्जा करते जा रहे हैं । वे ही हमारे भूमण्डलीय युग के चिंतक और राष्ट्र निर्माता बन गये हैं । भारत में अंग्रेजी के अश्वमेध में भिड़े ये लोग अंग्रेजी की अपराजेयता का इतना बखान करते हैं कि सामान्यजन ही नहीं कई राजनेताओं और शिक्षाविदों को लगता है, जैसे आर्थिक प्रलय की घड़ी सामने है और उसमें अब केवल अंग्रेजी ही मत्स्यावतार हैं । अत: हमें लगे हाथ उसकी पीठ पर इस आर्यभूमि को चढ़ा देना चाहिए, वर्ना यह रसातल में डूब जायेगी । ये सब देश को बचाने वाले लोग हैं । वे कहते हैं एक ईस्ट इंडिया कम्पनी ने तुम्हें सभ्य बनाया । अब जो आ रही हैं वे तुम्हें सम्पन्न बनायेगी । माँ तो मांगने पर ही रोटी देती है, ये तुम्हें बिना मांगे माल देंगे । तुम्हें मालामाल कर देंगी । फिर भी तुम मांगोगे मोर । इसलिए हिन्दी को छोड़ो और अंग्रेजी का दामन थामो ।

अंग्रेजी की विरुदावली गा-गाकर गला फाड़ते ये किराये के कोरस गायक, यह क्यों भूल जाते हैं कि चीनी (जिसमें ढाई हजार चिह्ननुमा अक्षर हैं)- जापानी जैसी चित्रात्मक लिपियों वाली भाषाओं ने अंग्रेजी की वैसाखी के बगैर ही बीसवीं सदी के सारे ज्ञान-विज्ञान को अपनी उन्हीं चित्रात्मक लिपियों वाली भाषा में ही विकसित किया और आज जब संसार में व्यापार, तकनॉलाजी या आर्थिक क्षेत्रों के संदर्भ खुलते हैं तो कहा जाता है, लिंचपिन आव वल्र्ड-इकोनॉमी एण्ड टेकनोलॉजी हेज शिफ्टेड फ्रॉम अमेरिका टू जापान । हालांकि कुछ लोग अब जापान के साथ चीन का भी नाम लेने लगे हैं और यह किसी से छुपा नहीं है कि अब अमेरिका चीन से भी चमकने लगा है । क्योंकि वह शीघ्र ही सूचना प्रौद्योगिकी पर कब्जा करने वाला है । क्योंकि, अमेरिका में पढ़ रहा एक चीनी छात्र, यदि वहाँ रहकर कोई कम्प्यूटर सॉफ्टवेअर विकसित करता है तो साथ ही साथ उसे वह अपनी चीनी भाषा में विकसित करता है और अपने देश में पहुंचते ही वह उसे स्थापित कर देता है । जबकि, हिन्दी की नागरी लिपि, जो संसार भर की तमाम भाषाओं की लिपियों में श्रेष्ठ और वैज्ञानिक है, को अंग्रेजी का रास्ता साफ करने के लिए निर्दयता के साथ मारा जा रहा है । वे अपने धूर्त मुहावरे में बताते हैं कि अखबार इस तरह हिन्दी को नष्ट नहीं कर रहे हैं, बल्कि ग्लोबल बना रहे हैं । वे हिन्दी को एक फ्रेश लिंग्विस्टक लाइफ दे रहे हैं । हम जानना चाहते हैं कि भैया आप किसे मूर्ख बना रहे हैं - जिस हिन्दी को राष्ट्र संघ की भाषा सूची में शामिल नहीं करवा सके, उसे `हिंग्लिश´ बनाकर ग्लोबल बनायेंगे ? और हिंग्लिश बन कर, हिन्दी ग्लोबल होगी कि वह अंग्रेजी के `महामत्स्य´ के पेट में पहुंच जाएगी ।

श्रीमान् आप आग लगा कर उस पर आग के आगे पर्दा खींच रहे हैं और हमें समझा रहे हैं कि `बेवकूफो ! हिन्दी सकुशल है और वह जिंदा बची रहेगी ।´ अंग्रेजी की लपट में स्वाहा नहीं होगी । यदि हो भी गई तो बाद उसके वह राख के रूप में रहेगी, पर रहेगी जरूर । भाषा की भस्म को कपाल पर पोत कर तुम प्रसन्न रहना । ठीक है, हिन्दी तुम्हारी जबान पर रहे न रहे पर वह तुम्हारे ललाट पर तो रहेगी ही । पहले हिन्दी `ललाट की बिंदी´ भर थी, अब तो तुम उससे पूरा ललाट लीप लेना । फिर तुम तो आत्मावादी हो । वासांसि जीर्णानि यथा विहाय वाले हो इसलिए भलीभांति जानते हो कि आत्मा अमर होती है । हिन्दी की आत्मा अमर है और रहेगी । वो सिर्फ पुराने कपड़े बदल रही है । उसके पुराने कपड़ों की हालत ‘नौ गज साड़ी फिर भी जाँघ उघाड़ी’ वाली उक्ति की तरह हो चुकी थी (शब्द का बहुत बड़ा जखीरा अर्थात् मोटे-मोटे शब्दकोश), लेकिन फिर भी लफ्जों के लाले । हिन्दुस्तान की एक बुकराई हुई एक अंग्रेजी लेखिका ने कहा -`बताइये हिन्दी के पास एटम के लिए कोई शब्द ही नहीं है फिर भला उसमें विज्ञान की शिक्षा कैसे संभव है।´) बहरहाल तुम्हारी हिन्दी जींस पहन रही है । उसे स्मार्टनेस की तरफ जाना है । वह फिलहाल ग्रीन रूम में है । लद्धड़ता छोड़कर एक फ्रेश लिग्विस्टिक लाईफ को हासिल करने की तरफ बढ़ रही है ।

थामस फ्रीडमेन ने वैश्वीकरण की हकीकत उजागर करते हुए ठीक ही कहा है कि ग्लोबलाइजेशन का अर्थ सरकारों और बहुराष्ट्रीय नियमों का पारस्परिक संबंध भर है । वह कहता है कि इसीलिए ग्लोबलाइजेशन की प्राथमिक कार्रवाई यही होती है कि जिस किसी चीज से भी `राष्ट्रीयता´ की बू आये, उसे अविलम्ब हटाइये । इस `सैद्धान्तिकी´ के मुताबिक निश्चय ही `हिन्दी´ ग्लोबलाइजेशन के पहले निशाने पर है, चूंकि इससे राष्ट्रीयता की बहुत तीखी और बरदाश्त बाहर गंध आती है । वजह यह कि हिन्दी का रिश्ता राष्ट्रभाषा के रूप में नाथ देने से यह भारत के कुछ प्रदेशों की जनता की नजर में राष्ट्रीय अस्मिता का पर्याय बन गयी है । नतीजतन इस पर चढ़े राष्ट्रीयता के इस कवच को हटाना जरूरी है, वर्ना यह मारे जाने में काफी समय लेगी । बहुत मुमकिन है कि लोग इसकी हत्या के प्रकट पैंतरों को देख कर हो-हल्ला करते हुए एकमत होने लगें । लेकिन भूमण्डलीकरण की सफलता तभी है जब लोग भाषा और भूगोल को लेकर एकमत होना छोड़ दें ।

इसी संभावित संकट को भाँप कर दलाल लोग यह कहते फिरते हैं कि हिन्दी को राजभाषा या राष्ट्रभाषा के पाखण्ड से मुक्त करके `जनता की गाढ़ी कमाई से खींचे गए´ पैसों का बहाया जाना अविलम्ब रोका जाये । क्योंकि इससे उसे अकारण ही ऑक्सीजन मिलती रहती है । जबकि उसकी ब्रेन डेथ हो चुकी है । उसमें सोचने समझने की क्षमता ही नहीं है । राजभाषा के नाम पर धन उड़ेलने से एक और समस्या पैदा हो जाती है, जिस पुराने रूप को अखबार नष्ट करने में मेहनत करते हैं, दूसरी ओर राजभाषा वाले सरकारी प्रयासों से भाषा का वह पुराना रूप एक मानक के रूप में जिंदा बना रहता है । अंग्रेजी इस बात में तो आरंभ से सतर्क रही और उसने हिन्दी का अन्य नाम भारतीय भाषाओं से सहोदरा संबंध बनाने ही नहीं दिया, उलटे वैमनस्य और अदम्य वैरभाव को बढ़ाये रखा- लेकिन, हिन्दी की, अपनी बोलियों से जड़ें इतनी गहरी बनी और रही आयीं कि उसको वहां से उखाड़ना मुश्किल रहा । बहरहाल, ये काम अब मीडिया ने अपने हाथ में ले लिया है । बोलियों का संहार करने में जो काम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कर रहा है, उसे दस कदम आगे जाकर हिन्दी के अखबार कर रहे हैं । जो अखबार साढ़े तीन रूपये में बिकते हुए जानलेवा आर्थिक कठिनाई का रोना रो रहे थे, वे अब डेढ़ रूपये में चौबीस पृष्ठों के साथ अपनी चिकनाई और रंगीनी बेच रहे हैं । स्पष्ट है, यह वह विदेशी चंचला धनलक्ष्मी है । क्या ये लोग नहीं जानते कि यह पूंजी `अस्मिताओं´ का `विनिमय´ नहीं, बल्कि अस्मिताओं का सीधा-सीधा `अपहरण´ करती हैं । यह अखबारों को अपनी `हवाई सेना´ बनाकर, `विचारों का विस्फोट´ करती है, और विस्फोट वाली जगह पर थल-सेना कब्जा कर लेती है । इसी के चलते अखबार `बाजारवाद´ के लिए जगह बनाने का काम कर रहे हैं । वे पहले `विचार´ परोसते थे, अब `वस्तु´ परोस रहे हैं - अलबत्ता, खुद `वस्तु´ बन गये हैं । इसी के चलते अखबारों में संपादक नहीं, ब्राण्ड मैनेजर बरामद होते हैं । अखबारों की इस नई प्रथा ने, `मच्छरदानी´ की `सैद्धान्तिकी´ का वरण कर लिया है । कहने को वह `मच्छर-दानी´ होती है परन्तु उसमें मच्छर नहीं होता । वह बाहर ही बाहर रहता है । ठीक इसी तरह अखबार में अखबारनवीस को छोड़कर सारे विभागों के भीतर सब वाजिब लोग होते हैं । बस संपादकीय विभाग में सम्पादक नहीं होता । इसीलिए आपस में पत्रकार बिरादरी एडिटोरियल को एडव्हरटोरियल विभाग कहती है । सम्पादकीय विभाग विज्ञापन विभाग का मातहत है । यहाँ तक कि प्रकाशन योग्य सामग्री भी वही तय करता है । यों भी सम्पादकीय पृष्ठ दैनिक अखबारों में अब बुद्धिजीवियों के वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए नहीं, राजनीतिक दलों के `व्यू-पाइण्ट´ (?) के लिए आरक्षित होते जा रहे हैं । वे राजनीतिक जनसंपर्क हेतु सुरक्षित पृष्ठ हैं । यह उसी पूंजी के प्रताप का प्रपात है, जो बाहर से आ रही है ।

ऐसे में वे पूछना चाहें कि बताइए भला यह कैसे हो सकता है कि आप पूंजी तो हमारी लें और `भाषा और संस्कृति´ आप अपनी विकसित करें । यह नहीं हो सकता । हमें अपने साम्राज्य की सहूलियत के लिए `एकरुपता´ चाहिए । सब एक-सा खायें । एक-सा पीयें । एक-सा बोलें । एक-सा लिखें-लिखायें । एक-सा सोचें। एक-सा देखें। एक-सा दिखायें । तुम अच्छी तरह से जान लो कि यही संसार के एक ध्रुवीय होने का अटल सत्य है । हमारे पास महामिक्सर है - हम सबको फेंट कर `एकरूप´ कर देंगे । बहरहाल, उन्होंने भारत के मीडिया को अपना महामिक्सर बना लिया । इसलिए, अब अखबार और अखबार के बीच की पहले वाली यह स्पर्धा जो धीरे-धीरे गला काट हो रही थी अब क्षीण हो गयी है । चूंकि अब वे सब एक ही अभियान में शामिल, सहयात्री हैं । उनका अभीष्ट भी एक है और वह है, `वैश्वीकरण´ के लिए बनाये जा रहे मार्ग का प्रशस्तीकरण । सो आपस में बैर कैसा ? हम तो आपस में कमर्शियल कजिन्स हैं । आओ हम सब मिलकर मारें हिन्दी को, अब भारत की असली हिन्दी पत्रकारिता यही है ।
[ क्रमश: ]

इसलिए बिदा करना चाहते हैं, हिन्दी को हिन्दी के अख़बार --- (2)



इसलिए बिदा करना चाहते हैं, हिन्दी को हिन्दी के अख़बार --- (2)
~ प्रभु जोशी


बहरहाल, अब ऐसी हिंसा सुनियोजित और तेजगति के साथ हिन्दी के खिलाफ शुरू हो चुकी है । इस हिंसा के जरिए भाषा की हत्या की सुपारी आपके अखबार ने ले ली है । वह भाषा के खामोश हत्यारे की भूमिका में बिना किसी तरह का नैतिक-संकोच अनुभव किए खासी अच्छी उतावली के साथ उतर चुका हैं । उसे इस बात की कोई चिंता नहीं कि एक भाषा अपने को विकसित करने में कितने युग लेती है । (डविड क्रिस्टल तो एक शब्द की मृत्यु को एक व्यक्ति की मृत्यु के समान मानते हैं । ऑडेन तो बोली के शब्दों को इरादतन अपनी कविता में शामिल करते थे कि कहीं वे शब्द मर न जायें - और टी.एस. इलियट प्राचीन शब्द, जो शब्दकोष में निश्चेष्ट पड़े रहते थे, को उठाकर समकालीन बनाते थे कि वे फिर से सांस लेकर हमारे साथ जीने लगे।) आपको शब्द की तो छोड़िये, भाषा तक की परवाह नहीं है, लगता है आप हिन्दी के लिए हिन्दी का अखबार नहीं चला रहे हैं, बल्कि अंगेजी के पाठकों की नर्सरी का काम कर रहे हैं । आप हिन्दी के डेढ़ करोड़ पाठकों का समुदाय बनाने का नहीं, बल्कि हिन्दी के होकर हिन्दी को खत्म करने का इतिहास रचने जा रहे हैं । आप धन्धे में धुत्त होकर जो करने जा रहे हैं, उसके लिए आपको आने वाली पीढ़ी कभी माफ नहीं करेगी । आपका अखबार उस सर्प की तरह है, जो बड़ा होकर अपनी ही पूंछ अपने मुंह में ले लेता है और खुद को ही निगलने लगता है । आपका अखबार हिन्दी का अखबार होकर हिन्दी को निगलने का काम करने जा रहा है, जो कारण जिलाने के थे वे ही कारण मारने के बन जाएँ इससे बड़ी विडम्बना भला क्या हो सकती है । यह आशीर्वाद देने वाले हाथों द्वारा बढ़कर गरदन दबा दिये जाने वाली जैसी कार्यवाही है । कारण कि हिन्दी के पालने-पोसने और या कहें कि उसकी पूरी परवरिश करने में हिन्दी पत्रकारिता की बहुत बड़ी भूमिका रही आई है ।

जबकि, आपको याद होना चाहिए कि सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से उपजी `भाषा-चेतना´ ने इतिहास में कई-कई लम्बी लड़ाइयाँ लड़ी हैं । इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो आप पायेंगे कि आयरिश लोगों ने अंग्रेजी के खिलाफ बाकायदा एक निर्णायक लड़ाई लड़ी, जबकि उनकी तो लिपि में भी भिन्नता नहीं थी । फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश आदि भाषाएं अंग्रेजी के साम्राज्यवादी वर्चस्व के विरूद्ध न केवल इतिहास में अपितु इस `इंटरनेट युग´ में भी फिर नए सिरे से लड़ना शुरू कर चुकी हैं । इन्होंने कभी अंग्रेजी के सामने समर्पण नहीं किया ।

बहरहाल मेरे इस पत्र का उत्तर अखबार मालिक ने तो नहीं ही दिया, और वे भला देते क्या ? और देते भी क्यों ? सिर्फ़ उनके सम्पादक और मेरे अग्रज ने कहा कि हिन्दी में कुछ जनेऊधारी तालिबान पैदा हो गये हैं, जिससे हिन्दी के विकास को बहुत बड़ा खतरा हो गया है । यह सम्पादकीय चिंतन नहीं अखबार के कर्मचारी की विवश टिप्पणी थी । कयोंकि उनसे तुरंत कहा जायेगा कि श्रीमान अपनी भाषा प्रेम और नौकरी में से कोई एक चुन लो ।
बहरहाल, अखबार ने इस अभियान को एक निर्लज्ज अनसुनी के साथ जारी रखा और पिछले चार सालों से वे अपने संकल्प में जुटे हुए हैं । और अब तो हिन्दी में अंग्रेजी की अपराजेयता का बिगुल बजाते बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दलालों ने, विदेशी पूंजी को पचा कर मोटे होते जा रहे हिन्दी के लगभग सभी अखबारों को यह स्वीकारने के लिए राजी कर लिया है कि इसकी नागरी-लिपि को बदल कर, रोमन करने का अभियान छेड़ दीजिए और वे अब इस तरफ कूच कर रहे हैं । उन्होंने इस अभियान को अपना प्राथमिक एजेण्डा बना लिया है । क्योंकि बहुराष्ट्रीय निगमों की महाविजय इस सायबर युग में रोमन लिपि की पीठ पर सवार होकर ही बहुत जल्दी संभव हो सकती है । यह विजय अश्वों नहीं, चूहों की पीठ पर चढ़कर की जानी है । जी हाँ, कम्प्यूटर माऊस की पीठ पर चढ़कर ।

अंग्रेजों की बौद्धिक चालाकियों का बखान करते हुए एक लेखक ने लिखा था - `अंग्रेजों की विशेषता ही यही होती है कि वे आपको बहुत अच्छी तरह से यह बात गले उतार सकते हैं कि आपके हित में आप स्वयं का मरना बहुत जरूरी है । और, वे धीरे-धीरे आपको मौत की तरफ ढकेल देते हैं ।’ ठीक इसी युक्ति से हिन्दी के अखबारों के चिकने और चमकीले पन्नों पर नई नस्ल के ये चिंतक यही बता रहे हैं कि हिन्दी का मरना, हिन्दुस्तान के हित में बहुत जरूरी हो गया है । यह काम देश सेवा समझकर जितना जल्दी हो सके करो, वर्ना, तुम्हारा देश ऊपर उठ ही नहीं पाएगा । परिणाम स्वरूप वे हिन्दी को बिदा कर देश को ऊपर उठाने के लिए कटिबद्ध हो गये हैं ।
ये हत्या की अचूक युक्तियाँ भी बताते हैं, जिससे भाषा का बिना किसी हल्ला-गुल्ला किए `बाआसानी संहार´ किया जा सकता है।

वे कहते हैं कि हिन्दी का हमेशा-हमेशा के लिए खात्मा करने के लिए आप अपनाइये- `प्रॉसेस ऑफ कॉण्ट्रा-ग्रेज्युअलिज़म´ । अर्थात्, बाहर पता ही नहीं चले कि भाषा को `सायास´ बदला जा रहा है । बल्कि, `बोलने वालों´ को लगे कि यह तो एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है और म.प्र. के कुछ अखबारों की भाषा में, यह परिवर्तन उसी प्रक्रिया के तहत हो रहा है । बहरहाल, इसका एक ही तरीका है कि अपने अखबार की भाषा में आप हिन्दी के मूल दैनंदिनी शब्दों को हटाकर, उनकी जगह अंग्रेजी के उन शब्दों को छापना शुरू कर दो, जो बोलचाल की भाषा में शेयर्ड - वॉकेबलरी की श्रेणी में आते हैं । जैसे कि रेल, पोस्ट कार्ड, मोटर आदि-आदि ।

इसके पश्चात धीरे-धीरे इस शेयर्ड वकैब्युलरि में रोज-रोज अंग्रेजी के नये शब्दों को शामिल करते जाइये । जैसे पिता-पिता की जगह छापिये पेरेंट्स, छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेंट्स, विश्वविद्यालय की जगह युनिवर्सिटी, रविवार की जगह संडे, यातायात की जगह ट्रेफिक आदि-आदि । अंतत: उनकी तादाद इतनी बढ़ा दो कि मूल भाषा के केवल कारक भर रह जायें ।

यह चरण, `प्रोसेस ऑव डिलोकेशन´ कहा जाता है । यानी की हिन्दी के शब्दों को धीरे-धीरे बोलचाल के जीवन से उखाड़ते जाने का काम ।

ऐसा करने से इसके बाद भाषा के भीतर धीरे-धीरे `स्नोबॉल थियरी´ काम करना शुरू कर देगी - अर्थात् बर्फ के दो गोलों को एक दूसरे के निकट रख दीजिए, कुछ देर बाद वे घुलमिलकर इतने जुड़ जाएँगे कि उनको एक दूसरे से अलग करना संभव नहीं हो सकेगा । यह थियरी भाषा में सफलता के साथ काम करेगी और अंग्रेजी के शब्द हिन्दी से ऐसे जुड़ जायेंगे कि उनको अलग करना मुश्किल होगा ।

इसके पश्चात शब्दों के बजाय पूरे के पूरे अंग्रेजी के वाक्यांश छापना शुरू कर दीजिए। अर्थात इनक्रीज द चंक ऑफ इंग्लिश फ्रेज़ेज़ । मसलन `आऊट ऑफ रीच/बियाण्ड डाउट/नन अदर देन/ आदि आदि । कुछ समय के बाद लोग हिन्दी के उन शब्दों को बोलना ही भूल जायेंगे । उदाहरण के लिए हिन्दी में गिनती स्कूल में बंद किये जाने से हुआ यह है कि यदि आप बच्चे को कहें कि अड़सठ रूपये दे दो, तो वह अड़सठ का अर्थ ही नहीं समझ पायेगा, जब तक कि उसे अंग्रेजी में सिक्सटी एट नहीं कहा जायेगा । इस रणनीति के तहत बनते भाषा रूप का उदाहरण एक स्थानीय अखबार से उठाकर दे रहा हूं ।

´मार्निंग अवर्स के ट्रेफिक को देखते हुए, डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन ने जो ट्रेफिक रूल्स अपने ढंग से इम्प्लीमेंट करने के लिए जो जेनुइन एफ़र्टस् किये हैं, वो रोड को प्रोन टू एक्सीडेंट बना रहे हैं । क्योंकि, सारे व्हीकल्स लेफ्ट टर्न लेकर यूनिवर्सिटी की रोड को ब्लॉक कर देते हैं । इन प्रॉब्लम का इमीडिएट सोल्यूशन मस्ट है ।´

इस तरह की भाषा को लगातार पांच-दस वर्ष तक प्रिंट माध्यम से पढ़ते रहने के बाद अखबार के पाठक की यह स्थिति होगी कि उसे कहा जाय कि वह हिन्दी में बोले तो वह गूँगा हो जायेगा । उनकी इस युक्ति को वे कहते हैं `इल्यूज़न ऑफ स्मूथ ट्रांजिशन´। अर्थात् हिन्दी की जगह अंग्रेजी को निर्विघ्न ढंग से स्थापित करने का सफल छद्म ।

हिन्दी को इसी तरीके से हिन्दी के अखबारों में `हिंग्लिश´ बनाया जा रहा है। समझ के अभाव में लोग इस सारे सुनियोजित एजेण्डे को भाषा के परिवर्तन की ऐतिहासिक प्रकिया ही मानने लगे हैं और हिन्दी में यह होने लगा है । गाहे-ब-गाहे लोग बाकायदा इस तरह इसकी व्याख्या भी करते हैं । अपनी दर्पस्फीत मुद्रा में वे बताते हैं जैसे कि वे अपनी एक गहरी सार्वभौम प्रज्ञा के सहारे ही इस सचाई को सामने रख रहे हों कि हिन्दी को हिंग्लिश बनना अनिवार्य है। उनको तो पहले से ही इसका इल्हाम हो चुका है और ये तो होना ही है ।

एक भली चंगी भाषा से उसके रोजमर्रा के सांस लेते शब्दों को हटाने और उसके व्याकरण को छीन कर उसे बोली में बदल दिये जाने को क्रियोल कहते हैं । अर्थात् हिन्दी का हिंग्लिश बनाना एक तरह का उसका क्रियोलीकरण है । और कांट्रा ग्रेजुअलिज्म के हथकंडों से बाद में उसे डि-क्रियोल किया जायेगा ।

भाषा की हत्या के एक योजनाकार ने अगले चरण को कहा है कि फायनल असाल्ट ऑन हिन्दी । बनाम हिन्दी को नागरी लिपि के बजाय रोमन लिपि में छापने की शुरूआत करना । अर्थात् हिन्दी पर अंतिम प्राणघातक प्रहार । बस हिन्दी की हो गई अन्त्येष्टि । चूंकि हिन्दी को रोमन में लिख पढ़कर बड़ी होने वाली पीढ़ी में वह नितांत अपठनीय हो जायेगी । हिंग्लिश को रोमन लिपि में छाप देने का श्रीगणेश करना । इसी युक्ति से गुयाना में जहाँ 43 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते थे, को फ्रेंच द्वारा डि-क्रियोल कर दिया गया और अब वहां देवनागरीइसी की जगह रोमन लिपि को चला दिया गया है । यही काम त्रिनिदाद में इस षड्यंत्र के जरिए किया गया है

जबकि, विडम्बना यह है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के धूर्त दलालों के दिशा निर्देश में संसार की इस दूसरी बड़ी बोले जाने वाली भाषा से उसकी लिपि छीन कर, उसे रोमन लिपि थमाने की दिशा में हिन्दी के कई अखबार जुट गए हैं । उन्होंने यह स्पष्ट धारणा बना ली है कि वे अब हिन्दी के लिए हिन्दी का अखबार निकाल रहे हैं, बल्कि अंग्रेजी के अखबार की नर्सरी का काम कर रहे हैं । क्योंकि, देर सबेर इसी को ही तो भारत की राष्ट्रभाषा बनाना है । प्राथमिक शिक्षा के लिए विश्व बैंक द्वारा प्राप्त धन का यही तो आखरी सुफल है, क्योंकि आगे जाकर समूची आरंभिक शिक्षा के कायान्तरण के कर्मकाण्ड को पूरा किया जाना एक अघोषित शर्त है, जिसमें हिन्दी के कई अखबार मिल-जुलकर आहुतियाँ दे रहे हैं । वे स्वाहा-स्वाहा करते हुए हिन्दी की आहुति चढ़ा रहे हैं ।

वे आजादी मिलने के साथ ही गांधी-नेहरू की पीढ़ी द्वारा कर दी गयी महाभूल को वे दुरूस्त करने में लगे हैं, जिसके चलते अंधराष्ट्रवादी उन्माद में हिन्दी को राष्ट्रभाषा की जगह बिठा दिया था - जबकि, यह तो सत्ता की भाषा बनने के लायक ही नहीं थी। यह तो अपढ़ गुलामों और मातहतों और अज्ञानियों की भाषा थी और उसे वैसा ही बने रहना चाहिए । इसी किस्म की इच्छा और संकल्प की अनुगूँज गुरूरणदास जैसे लोगों के प्रायोजित लेखों से सुनाई देती है, जो इन अखबारों के सम्पादकीय पृष्ठों पर छपते रहते हैं । वे बार-बार कहते हैं कि जल्द ही हिन्दुस्तान दुनिया की आने वाले दो सौ वर्षों के लिए `भाषाशक्ति´ बनने वाला है - जबकि वे जानते हैं कि इससे बड़ा धोखा और कोई हो ही नहीं सकता । वास्तव में वे भारत को 2000 बरस के लिए गुलाम बनाने के लिए ठेके का काम ले चुके हैं । वे उसे उस दिशा में घेरने की निविदा हाथिया चुके हैं । इस घेरने के काम में अखबार सबसे सुंदर और सुविधाजनक लाठी है ।
-----क्रमश:


इसलिए बिदा करना चाहते हैं हिन्दी को ....(१)


इसलिए बिदा करना चाहते हैं...... 


कुछ समय पूर्व (डेढ़ वर्ष ) ‘हिन्दी के हत्यारे’ शीर्षक से २ भागों में एक आलेख अपने चर्चा समूह पर प्रस्तुत किया था। भाँति -भाँति की प्रतिक्रियाएँ आईं। किसी को लगा कि भाषा के नाम पर बेकार व निरर्थक भय पैदा किया जा हिंदी है, किसी को लगता रहा कि ऐसे यत्नों का कोई औचित्य ही नहीं है, किसी ने कहा इंटरनेट पर हिन्दी आ गई, तो हिंदी खूब सुरक्षित है, किसी ने फ़िल्मों व टी.वी. से होने वाली आय-व्यय आदि का मुद्दा भी किसी प्रसंग में उठाया; और हद तो तब हो गई जब किसी ने यहाँ तक कह डाला कि भाषाओं का मरण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, मरना ही भारत इसे तो, मर रही है, काहे की हाय तौबा..; क्या देवनागरी लिपि से भारतीय भाषाओं को ऐसा ही खतरा नहीं हिंदी....आदि आदि। इन सब के अलग अलग उत्तर कुछ दिए भी गए, चर्चा हुई। ठीक रहा। ऐसी जिज्ञासाएँ व प्रश्न अपने हिंदी परिपूर्ण करने की दिशा में निश्चित ही सहायक व मार्गदर्शक का कार्य करते हैं यदि वास्तव में हमें उनके भारत उत्तरों की व निदान की अपेक्षा हो व हम उन्हें खुले मन से स्वीकारने , समझने व अपनाने के उत्सुक उत्सुक हों तो ।

उन सब की चर्चा को पुन: उठाने का प्रयोजन यह भी है कि उन सब तर्कों के सटीक व समायोजित उत्तर के लिए इस बार प्रभु जोशी जी के मूल आलेख का सम्पूर्ण पाठ ‘हिन्दी भारत’ / हिंदी-भारत के पाठकों के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है।

लेखमाला कुल चार(४) भागों की है। आज प्रस्तुत है इसका प्रथम भाग । आगामी भाग आप आने वाले समय में पढ़ पाएँगे।
(- कविता वाचक्नवी)

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बिदा करना चाहते हैं, हिन्दी को हिन्दी के अख़बार
(१)
प्रभु जोशी



भारत इन दिनों दुनिया के ऐसे समाजों की सूची के शीर्ष पर हैं, जिस पर बहुराष्ट्रीय निगमों की आसक्त और अपलक आँख निरन्तर लगी हुई है । यह उसी का परिणाम है कि चिकने और चमकीले पन्नों के साथ लगातार मोटे होते जा रहे हिन्दी के दैनिक समाचार पत्रों के पृष्ठों पर, एकाएक भविष्यवादी चिन्तकों की एक नई नस्ल अंग्रेजी की माँद से निकलकर, बिला नागा, अपने साप्ताहिक स्तम्भों में आशावादी मुस्कान से भरे अपने छायाचित्रों के साथ आती है - और हिन्दी के मूढ़ पाठकों को गरेबान पकड़कर समझाती है कि तुम्हारे यहां हिन्दी में अतीतजीवी अंधों की बूढ़ी आबादी इतनी अधिक हो चुकी है कि उनकी बौद्धिक-अंत्येष्टि कर देने में ही तुम्हारी बिरादरी का मोक्ष है । कारण यह कि वह अपने आप्तवाक्यों में हर समय इतिहास का जाप करती रहती है और इसी के कारण तुम आगे नहीं बढ़ पा रहे हो। इतिहास ठिठककर तुम्हें पीछे मुड़कर देखना सिखाता है, इसलिए वह गति अवरोधक है । जबकि भविष्यातुर रहनेवाले लोगों के लिए गरदन मोड़कर पीछे देखना तक वर्ज्य है । एकदम निषिद्ध है। ऐसे में बार-बार इतिहास के पन्नों में रामशलाका की तरह आज के प्रश्नों के भविष्यवादी उत्तर बरामद कर सकना असम्भव है । हमारी सुनो, और जान लो कि इतिहास एक रतौंध है, तुमको उससे बचना है । हिस्ट्री इज बंक । वह बकवास है । उसे भूल जाओ ।


बहरहाल-- `अगर मगर मत कर । इधर उधर मत तक । बस सरपट चल।´ भविष्यवाद यह नया सार्थक और अग्रगामी पाठ है ।


जबकि इस वक्त की हकीकत यह है कि हमारे भविष्य में हमारा इतिहास एक घुसपैठिये की तरह हरदम मौजूद रहता है । उससे विलग, असंपृक्त और मुक्त होकर रहा ही नहीं जा सकता । इतिहास से मुक्त होने का अर्थ स्मृति-विहीन हो जाना है-- सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अनाथ हो जाना है ।


लेकिन वे हैं कि बार-बार बताये चले जा रहे हैं कि तुम्हारे पास तुम्हारा इतिहास बोध तो कभी रहा ही नहीं है । और जो है, वह तो इतिहास का बोझ है । तुम लदे हुए हो। तुम अतीत के कुली हो और फटे-पुराने कपड़ों में लिपटे हुए अपना पेट भर पालने की जद्दोजहद में हो, जबकि ग्लोबलाइजेशन की फ्यूचर एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर खड़ी है और सीटी बजा चुकी है । इसलिए तुम इतिहास के बोझ को अविलम्ब फेंको और उस पर लगे हाथ चढ़ जाओ । जी हाँ, अधीरता पैदा करने वाली नव उपनिवेशवाद की यही वह मोहक और मारक भाषा है जो कहती है कि अब आगे और पीछे सोचने का समय नहीं है । अलबत्ता, हम तो कहते हैं कि अब तो सोचने का काम तुम्हारा है ही नहीं, वह तो हमारा है । हम ही सोचेंगे तुम्हारे बारे में । अब हमें ही तो सब कुछ तय करना है तुम्हारे बारे में। याद रखो हमारे पास वह छैनी है, जिस के सामने पत्थर को भी तय करना पड़ता कि वह क्या होना चाहता है -- घोड़ा या कि साँड । उस छैनी से यदि हम तुम्हें घोड़ा बनायेंगे तो निश्चय ही रेस का घोड़ा बनायेंगे । यदि हमें सांड बनाना होगा तो तुम्हें वो सांड बनायेंगे जो अर्थव्यवस्था को सींग पर उछालता हुआ सेंसेक्स के ग्राफ में सबसे ऊपर डुंकारता हुआ दिखाई पड़ेगा ।


इन्हीं चिन्तकों की इसी नई नस्ल ने हिन्दी के अख़बारों के पन्नों पर रोज़-रोज़ लिख लिखकर सारे देश की आंख उस तरफ लगा दी है, जहां विकास दर का ग्राफ बना हुआ है और उसमें दर-दर की ठोंकरे खाता आम आदमी देख रहा है कि येल्लो, उसने छ:, सात और आठ के अंक को छू लिया है । इसी दर के लिए ही तमाम दरों-दीवारों को तोड़कर महाद्वार बनाया जा रहा है । इसे ही ओपन डोअर पॉलिसी कहते हैं । और, कहने की ज़रूरत नहीं कि चिन्तकों की ये फौज, इसी ओपन डोअर से दाखिल हुई है । यही उसकी द्वारपाल है, जो घोषणा कर रही है कि तुम्हारे यहाँ मही (पृथ्वी) पाल आ रहे हैं । तुम्हारे यहाँ विश्वेश्वर आ रहे हैं । दौड़ो और उनका स्वागत करो । तुमने आपात्काल का स्वागत किया था, तो इसका स्वागत करने में क्या हर्ज है ! मजेदार बात यह कि इसके स्वागत में, इसकी अगवानी में, सबसे पहले शामिल हैं, हिन्दी के अख़बार । वे बाजा फूँक रहे हैं और फूँकते-फूँकते बाजारवाद का बाजा बन गये हैं । ये अख़बार पहले विचार देते थे । विचार की पूँजी देते थे, लेकिन अब पूँजी का विचार देने में जुट गये हैं । एक अल्प उपभोगवादी भारतीय प्रवृत्ति को पूरी तरह उपभोक्तावादी बनाने की व्यग्रता से भरने में जी-जान से जुट गये हैं, ताकि भूमण्डलीकरण के कर्णधारों तथा अर्थव्यवस्था के महाबलीश्वरों के आगमन में आने वाली अड़चनें ही खत्म हो जाये और इन अड़चनों की फेहरिस्त में वे तमाम चीजें आती है, जिनसे राष्ट्रीयता की गंध आती हो ।


कहना न होगा कि इसमें इतिहास, संस्कृति और भाषा शीर्ष पर है । फिर हिन्दी से तो राष्ट्रीयता की सबसे तीखी गंध आती है । नतीजतन भूमण्डलीकरण की विश्व-विजय में सबसे पहले निशाने पर हिन्दी ही है । इसका एक कारण तो यह भी है कि यह हिन्दुस्तान में संवाद, संचार और व्यापार की सबसे बड़ी भाषा बन चुकी है। दूसरे इसको राजभाषा या राष्ट्रभाषा का पर्याय बना डालने की संवैधानिक भूल गांधी की उस सीढ़ी को पार दी, जो यह सोचती थी कि कोई भी मुल्क अपनी राष्ट्रभाषा के अभाव में स्वाधीन बना नहीं रह सकता । चूंकि भाषा सम्प्रेषण का माध्यम भर नहीं, बल्कि चिन्तन-प्रक्रिया एवं ज्ञान के विकास और विस्तार का भी हिस्सा होती है । उसके नष्ट होने का अर्थ एक समाज, एक संस्कृति और एक राष्ट्र का नष्ट हो जाना है । वह प्रकारान्तर से राष्ट्रीय एवं जातीय अस्मिता का प्रतिरूप भी है । इस अर्थ में भाषा उस देश और समाज की एक विराट ऐतिहासिक धरोहर भी है । अत: उसका संवर्धन और संरक्षण एक अनिवार्य दायित्व है ।


जब देश में सबसे पहले मध्यप्रदेश के एक स्थानीय अख़बार ने विज्ञापनों को हड़पने की होड़ में बाकायदा सुनिश्चित व्यावसायिक रणनीति के तहत अपने अख़बार के कर्मचारियों को हिन्दी में 40 प्रतिशत अंग्रेजी के शब्दों को मिलाकर ही किसी खबर के छापे जाने के आदेश दिये और इस प्रकार हिन्दी को समाचार पत्र में हिंग्लिश के रूप में चलाने की शुरूआत की तो मैं अपने पर लगने वाले सम्भव अरोप मसलन प्रतिगामी, अतीतजीवी अंधे, राष्ट्रवादी और फासिस्ट आदि जैसे लांछनों से डरे बिना एक पत्र लिखा । जिसमें मैंने हिन्दी को हिंग्लिश बना कर दैनिक अखबार में छापे जाने से खड़े होने वाले भावी खतरों की तरफ इशारा करते हुए लिखा -- `प्रिय भाई, हमने अपनी नई पीढ़ी को बार-बार बताया और पूरी तरह उसके गले भी उतारा कि अंग्रजों की साम्राज्यवादी नीति ने ही हमें ढाई सौ साल तक गुलाम बनाये रक्खा । दरअसल ऐसा कहकर हमने एक धूर्त - चतुराई के साथ अपनी कौम के दोगलेपन को इस झूठ के पीछे छुपा लिया । जबकि, इतिहास की सचाई तो यही है कि गुलामी के विरूद्ध आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले नायकों को, अंग्रेजों ने नहीं, बल्कि हमीं ने मारा था । आज़ादी के लिए `आग्रह´ या `सत्याग्रह´ करने वाले भारतीयों पर क्रूरता के साथ लाठियाँ बरसाने वाले बर्बर हाथ, अंग्रेजों के नहीं, हम हिन्दुस्तानी दारोगाओं के ही होते थे । अपने ही देश के वासियों के ललाटों को लाठियों से लहू-लुहान करते हुए हमारे हाथ ज़रा भी नहीं काँपते थे । कारण यह कि हम चाकरी बहुत वफादारी से करते हैं और यदि वह गोरी चमड़ी वालों की हुई तो फिर कहने ही क्या ?


पूछा जा सकता है कि इतने निर्मम और निष्करूण साहस की वजह क्या थी ? तो कहना न होगा कि दुनिया भर के मुल्कों के दरमियान `सारे जहां से अच्छा´ ये हमारा ही वो मुल्क है, जिसके वाशिन्दों को बहुत आसानी से और सस्ते में खरीदा जा सकता है । देश में जगह-जगह घटती आतंकवादी गतिविधियों की घटनाएं, हमारे ऐसे चरित्र का असंदिग्ध प्रमाणीकरण करती हैं । दूसरे शब्दों में हम आत्मस्वीकृति कर लें कि `भारतीय´, सबसे पहले `बिकने´ और `बेचने´ के लिए तैयार हो जाता है और, यदि वह संयोग से व्यवसायी और व्यापारी हुआ तो सबसे पहले जिस चीज़ का सौदा वह करता है, वह होता है उसका ज़मीर । बाद इस सौदे के, उसमें किसी भी किस्म की नैतिक-दुविधा शेष नहीं रह जाती है और `भाषा, संस्कृति और अस्मिता´ आदि चीजों को तो वह खरीददार को यों ही मुफ्त में बतौर भेंट के दे देता है । ऐसे में यदि कोई हिंसा के लिए भी सौदा करे तो उसे कोई अड़चन अनुभव नहीं होती है । फिर वह हिंसा अपने ही `शहर´, `समाज´, या `राष्ट्र´ के खिलाफ ही क्यों न होने जा रही हो ।

- क्रमश:








पद्मश्री : नई दुनिया : अभय छजलानी : भाषायी(?) पत्रकारिता में हिंदी की भूमिका ?



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अभय
छजलानी की औ
कात क्या है?
- आलोक तोमर



बाबू लाभ चंद्र छजलानी गुजराती मूल के कारोबारी थे जो इंदौर आ कर बस गए थे। आजादी की लड़ाई में उन्होंने हिस्सा लिया और देश जब आजाद होने वाला ही था तो 1947 में अपने साथी बसंती लाल सेठिया के साथ मिल कर उन्होंने पहले साप्ताहिक और फिर दैनिक अखबार की शुरूआत की। नाम था नई दुनिया क्योंकि बाबूजी के अनुसार आजादी के बाद भारत एक नई दुनिया में प्रवेश कर गया था।


लाभ चंद्र छजलानी नई दुनिया निकालते थे लेकिन पुरानी दुनिया के इंसान थे। उन्हें अपना अखबार दुकानों तक साइकिल और बाद में स्कूटर के पीछे रख कर ले जाने में लाज नहीं आती थी। नई शैली थी और आजादी का सात्विक उन्माद था इसलिए नई दुनिया चल निकला। धीरे धीरे और सहयोगी जुड़े और नई दुनिया मालवा इलाके का एक सबसे बड़ा अखबार तो बन ही गया, पूरे देश के मानक हिंदी समाचार पत्र के तौर पर इसकी गिनती हुई।


सन सैतालीस में अखबार शुरू हुआ था और 1960 आते आते इसकी काफी प्रतिष्ठा हो गई थी। सर्वोदय की ओर जा चुके प्रभाष जोशी स्कूल की पढ़ाई छोड़ कर विनोबा भावे के काफिले में शामिल हो गए थे और रोज संत विनोबा की भूदान यात्रा का विवरण लिखते थे। अंग्रेजी में एमए कर रहे राजेंद्र माथुर नई दुनिया में हिंदी साहित्य का पन्ना देखते थे। शरद जोशी उस समय भी व्यंग लिखते थे और नई दुनिया के पाठकों के लिए आकर्षण का एक पात्र थे।


राहुल बारपुते के बारे में जितना सुना है, वे संत प्रवृत्ति के ज्ञानी थे और कुमार गंधर्व से ले कर उस्ताद आमीर खां और उस समय के क्रिकेट स्टार सीके नायडू के साथ उनका उठना बैठना था। नई दुनिया को प्रारंभिक भाषायी व्याकरण का संस्कार राहुल जी ने ही दिया।


अब नई दुनिया के पूरे देश से दर्जनों संस्करण हैं, रंगीन पन्नों पर छपता है और फिलहाल पत्रकारों को मोटी पगार दे रहा है। इसके संपादक आलोक मेहता ने पत्रकारिता का जीवन नई दुनिया से ही शुरू किया था और इसी साल उन्हें उनके व्यक्तिगत गुणों के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। प्रसंगवश पद्मश्री के प्रमाण पत्र पर जो भाषा लिखी होती है उस पर साफ शब्दों में लिखा होता है कि मैं भारत का राष्ट्रपति आपको आपके व्यक्तिगत गुणों के लिए पद्मश्री से अलंकृत करता हूं। आलोक जी के व्यक्तिगत गुण और प्रतिभा से सभी परिचित हैं लेकिन इस साल की पद्मश्री की सूची में किसी एक अभय छजलानी का भी नाम है जिनके व्यक्तिगत गुणों को भी भारत की महामहिम राष्ट्रपति ने अलंकृत करने लायक समझा है।


अभय छजलानी के व्यक्तिगत गुण क्या है यह या तो प्रतिभा पाटिल जानती हाेंगी या खुद छजलानी। लेकिन इतना जरूर है कि इस गुजराती लाला को पद्मश्री से विभूषित किया गया तो पूरे देश ने जय हो का नारा नहीं लगाया और इससे शायद लाला जी बहुत आहत हुए। उन्होंने पूरे देश के पत्रकारों को जिनमें बहुत सारे अल्लू पल्लू भी थे, हवाई जहाज का टिकट दे कर इंदौर बुलाया, बड़े होटलों में ठहराया, दावतें दी और बहाना बना रहे इसलिए इंदौर प्रेस क्लब को चंदा दे कर एक सेमिनार भी करवा डाला। लाला जी से भाषायी या पत्रकारिता के सरोकारों की उम्मीद करना व्यर्थ है मगर अपने जो साथी इस सेमिनार में उत्साहपूर्वक शामिल हुए थे और जिन्होंने नई दुनिया के बहाने अभय छजलानी की शान के झंडे गाढ़ दिए थे, उन्हें भी इस सेमिनार के विषय पर कोई ऐतराज नहीं हुआ। नई दुनिया जो अपने आपको अब भी देश का मानक हिंदी अखबार कहता है, ने विषय चुना था वह यह था भाषायी पत्रकारिता में हिंदी की भूमिका।




जिसने भी यह विषय चुना था उसको सूली पर चढ़ा देना चाहिए। जिन विद्वानों ने इस विषय पर अपनेउच्च विचार रखे थे उन्हें भी अपने आप से पूछना चाहिए कि अगर हिंदी सिर्फ एक भाषायी समाचारलिपि है तो फिर मैथिली और भोजपुरी क्या है? कायदे से तो इनका अपना व्याकरण है और इन्हें भाषाहोना चाहिए मगर वह बरस बाद में चलती रह सकती है। अपने को तो यह हजम नहीं हो रहा कि एक वहअखबार जो अपने को मानक सिद्व करने पर तुला हुआ है, हिंदी को राष्ट्रीय की बजाय भाषायी सिद्वकरने की कोशिश क्यों कर रहा है? राजभाषा और राष्ट्रभाषा के सरकारी विज्ञापन जब जारी होते हैं तोलेने में इन्हें शर्म नहीं आती। इनका एक मरियल सा वेब पोर्टल वेब दुनिया के नाम से चल रहा है औरहिंदी, अंग्रेजी के संकर नाम वाले इस पोर्टल के लिए विदेशों से पूंजी जुगाड़ते वक्त हिंदी का वर्णन देश कीसबसे बड़ी भाषा के तौर पर कारोबारी भीख मांगने वाले दस्तावेजों में किया जाता है। जब रोकड़ाचाहिए तो हिंदी महान वरना वह तो एक, जैसा इस प्रायोजित सेमिनार में कहा गया, हिंदी एकवर्नाक्युलर यानी देहाती और आदिवासी किस्म की भाषा है। भाषा भी नहीं वर्नाक्युलर का अनुवाद तोबोली होता है। जैसे अवधी है, बुंदेलखंडी हैं वैसे ही अभय छजलानी की राय में हिंदी भी हैं। इसी हिंदी कीकमाई से वे खुद को श्रध्दांजलि देने के लिए पूरे देश से पत्रकारों को जमा करते हैं, उनकी सेवा सत्कारकरते हैं और बुढ़ापे में पद्मश्री पा कर धन्य हो जाते हैं।


अभय छजलानी का दुस्साहस तो देखिए। वे कहते हैं कि नई दुनिया ने पत्रकारिता की कई पीढ़ियों कोबनाया। वे कहते हैं कि राजेंद्र माथुर को हमने बनाया। शरद जोशी को हमने बनाया। प्रभाष जोशी कोन वे याद करते हैं और न बुलाते हैं। इसलिए कि जब नई दुनिया कारोबार हो गया और अभय छजलानीडंडी मारने लगे तो इसका विरोध करने वालों में प्रभाष जोशी भी थे। नई दुनिया की यह औकात कभीनहीं थी कि वह राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी को बनाए। उल्टे इन लोगों ने नई दुनिया को आकारऔर सम्मान दिया है। राजेंद्र माथुर की विशाल दृष्टि और प्रभाष जोशी की भाषा ने नई दुनिया को रचाहै और लाला अभय छजलानी किराए पर बुलाई गई भीड़ की मौजूदगी में अगर यह बात मंजूर नहीं कररहे तो उनमें और एक परचूनिए में फर्क क्या रहा जाता है?


राजेंद्र माथुर ने तो लगभग जिंदगी भर इंदौर के गुजराती कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाई और अखबारों मेंहिंदी लिखी। रज्जू बाबू के बहुत सारे लिखे में ऐसे संदर्भ और इतनी प्रवाहमान कविता वाली भाषा होतीथी कि अभय छजलानी की समझ में भी नहीं आती होगी। लेकिन न राजेंद्र माथुर को पद्मश्री मिली औरन प्रभाष जोशी को। लाला अभय छजलानी को भी पद्मश्री इसलिए मिल गई क्योंकि उनके संपादकआलोक मेहता संपर्कशील प्राणी हैं और उनकी सरकार में इतनी चलती है कि वे अभय छजलानी तोक्या किसी मनोहर लिम्बूदिया को भी पद्मश्री दिलवा दें। पद्मश्री कैसे मिलती है ये सब जानते हैं। हमारेदोस्त सुधीर तैलंग को बयालीस साल की उम्र में पद्मश्री मिल गई थी और उन्होंने आज तक अपने कोदावत नहीं दी। उनके पास हराम का पैसा नहीं हैं।

Saturday, March 7, 2009

इन्दौर में हुआ दिग्गज पत्रकारों का जमावडा,प्रेस क्लबने किया सेमिनार का आयोजन, अभय छजलानी काहोगा सम्मान

इंदौर प्रेस क्लब की तरफ से आज इंदौर में एक सेमिनार और वर्कशॉप का आयोजन किया गया है इस आयोजन में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली और मुंबई से कई दिग्गज पत्रकार इंदौर पहुंचे हैं इन पत्रकारों में आईबीएन -7 के संपादक आशुतोष , शीघ्र प्रकाश्य अखबार चौथी दुनिया के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय , स्टार न्यूज के नेशनल अफेयर एडिटर दीपक चौरसिया , न्यूज 24 के मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम , दैनिक भास्कर के संपादक श्रवण गर्ग , वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ सचदेव , नई दुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहताअनिल सिंह समेत कई पत्रकार इंदौर में हो रहे इस भव्य समारोह और सेमिनार में हिस्सा लेने पहुंच चुके हैं
प्रेस क्लब द्वारा ये सेमिनार इनडोर हॉल अभय प्रसाल में किया गया है सुबह से शाम तक चलने वाले समारोह में हजारो लोग हिस्सा लेंगे और शाम को नई दुनिया के संपादकीय बोर्ड के अध्यक्ष अभय छजलानी का सम्मान किया जाएगा । अभय छजलानी को हाल में पद्म पुरस्कार से नवाजा गया है। जितने बड़े पैमाने पर ये आयोजन किया गया है , उतना बड़ा आयोजन पहले कभी नहीं हुआ आमतौर पर सेमिनारों में दो - चार सौ लोग होते हैं लेकिन इस समारोह में पांच से दस हजार लोगों के हिस्सा लेने की बात कही जा रही है
नोट - इस समारोह के बारे में विस्तार से हम आपको बताएंगे । आपमें से कोई अगरइस समारोह का चश्मदीद है तो आप हमें पूरा विवरण लिखकर भेज सकते हैं । हमआपके नाम के साथ पोस्ट करेंगे



अगर आप ये समझ रहे हैं कि अभय छजलानी से अपना कोई व्यक्तिगत बैर है तो आपकी जानकारी केलिए इस लाला की आज तक अपन ने छवि भी नहीं देखी। इंदौर सैकड़ों बार जाना हुआ है लेकिन नईदुनिया परिसर में घुसने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी। चलते चलते अभय छजलानी और उनके चमचोंको दो बातें कहनी हैं। एक तो हिंदी को वर्नाक्युलर यानी क्षेत्रीय भाषा मानने की भूल मत करना औरदूसरे मिल कर कामना करना कि अभय छजलानी को भारत रत्न मिल जाए। जो व्यक्ति पद्मश्री मिलनेपर इतना बड़ा तामझाम खड़ा कर सकता है वह भारत रत्न मिलने पर तो पूरे देश में इमरती बंटवाएगा।रही बात राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी को रचने की तो अभय छजलानी और नई दुनिया की येऔकात कभी नहीं रही कि वे हिंदी पत्रकारिता की किवदंतियों को रच सकें। वे ज्यादा से ज्यादा पंकजशर्मा और आलोक मेहता को रच सकते हैं।





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