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लंबे जूते में चौड़े पाँव


राग
दरबारी



लंबे जूते में चौड़े पाँव







माना जाता है कि जो एक बार कम्युनिस्ट हो गया, वह जीवन भर के लिए कम्युनिस्ट हो गया। भारत के समाजवादियों के बारे में भी यह सच है। फर्क यह है कि कम्युनिस्ट चरित्र में धारावाहिकता होती है। वह उलटा-पुलटा बोलता भी है, तो अकेले नहीं -- अपनी पूरी बिरादरी के साथ। समाजवादी में यह गुण नहीं पाया जाता। वह अपने मूल विचारों का दमन करना जानता है। यही कारण है कि एक जमाने में राममनोहर लोहिया के अनुयायी इस समय अनेक दलों में पाए जाते हैं और कहीं भी कसमसाते दिखाई नहीं देते। मुलायम सिंह यादव ने दल तो नहीं बदला, वे अपने को ही बदलते रहे। इसीलिए कई प्रसंगों में वे उससे ज्यादा हँसी के पात्र नजर आते हैं जितने वे वास्तव में हैं।



सार्वजनिक जीवन में अंग्रेजी के प्रयोग पर पाबंदी के पक्ष में मुलायम सिंह का चुनाव घोषणा पत्र एक ऐसा दस्तावेज है जो अपने आपमें तो सही है, पर उस पर धूल की इतनी परतें चढ़ चुकी हैं कि उसकी मूल भावना कहीं दिखाई नहीं देती। मुलायम सिंह जब पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे, तब उनकी राजनीतिक चेतना आज की तुलना में कम प्रदूषित यानी बेहतर थी। तब उन्होंने अंग्रेजी के इस्तेमाल के प्रति अपना जो लोहियाई अनुराग दिखाया था, वह उनके तब के निकटवर्ती समाजवादी अतीत की प्रतिध्वनि और कुछ हद तक सुहावनी थी। कम से कम हम जैसे लोगों के लिए, जिनकी आंख लोहिया साहित्य पढ़ कर और लोहिया के भाषण सुन कर खुली थी।



उन दिनों मुलायम सिंह हिन्दी तथा अन्य लोक भाषाओं के प्रयोग पर जोर दे रहे थे। वे चाहते थे कि केंद्र उत्तर प्रदेश सरकार से हिन्दी में पत्र व्यवहार करे। उन्होंने अपनी यह इच्छा भी जताई थी कि गैर-हिन्दी भाषी राज्यों से उनकी सरकार उनकी भाषा में ही पत्र व्यवहार करेगी। यह एक क्रांतिकारी प्रस्ताव था। लोहिया का मानना था कि भारत में सत्ता हासिल करने के लिए इन तीनों में किन्हीं दो घटकों का योग आवश्यक है -- जाति, संपत्ति और अंग्रेजी। मुलायम सिंह ने जाति पर हमला किया। पर संपत्ति पर हमला करने में उनकी थोड़ी भी दिलचस्पी नहीं थी। आज मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश के अमीरतम नेताओं में हैं, जबकि लोहिया की मृत्यु के समय उनके पास कुछ हजार रुपए भी नहीं थे। मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने अपने दिवंगत राजनीतिक गुरु की स्मृति में अंग्रेजी पर धावा बोलने की कोशिश जरूर की, पर इस विस्फोट से जो बवाल पैदा हुआ, उससे वे खुद दहल गए और उन्होंने अपने इस प्रयोग को आगे बढ़ाने से हाथ खींच लिया। पर दूसरी आदतों की तरह समाजवादी आदतें भी जल्दी नहीं मरतीं। वर्तमान लोक सभा चुनाव के कोलाहल में अंग्रेजी विरोध का उनका भूत फिर जाग उठा है और देश के सारे बुद्धिजीवी उन पर हो-हो कर हँस रहे हैं।



इन बुद्धिजीवियों की संकीर्णता पर अफसोस होता है। ये बौद्धिक नहीं, बुद्धिकर्मी हैं। अगर इन्हें देश और समाज की सच्ची चिंता होती, तब भी ये मुलायम सिंह के अंग्रेजी विरोध पर हँसते पर उस हँसी की अंतर्वस्तु कुछ और होती। तब वे कहते कि अंग्रेजी हटाने की बात तो सही है, क्योंकि अंग्रेजी का वर्चस्व बनाए रख कर और उस वर्चस्व को बढ़ाते हुए भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता। देश के हर आदमी को अंग्रेजी में सिद्ध बनाने की कोशिश केवल कभी सफल नहीं हो सकती, बल्कि ऐसी कोशिश देश के लिए अहितकर भी है। दुनिया भर में किसी भी देश ने पराई भाषा में विकास नहीं किया है। सच्चा विकास तो अपनी भाषा में ही होता है। इसके बाद वे बौद्धिक लोग मुलायम सिंह से पूछते कि सर, अन्य सभी नीतियों को यथावत रख कर आप अंग्रेजी के बहिष्कार के प्रयत्न में कैसे सफल हो सकते हैं? अंग्रेजी की विदाई तो समाजवाद की ओर कदम बढ़ाते हुए समाज में ही सकती है, पूंजीवादी व्यवस्था तो पूर्व-उपनिवेशों में उसी भाषा को आगे बढ़ाएगी जिस भाषा की गुलामी उन पर थोपी गई थी। भारत पर अगर जर्मन आधिपत्य होता, तो आज हमारा भद्रलोक अंग्रेजी नहीं, जर्मन बोलता होता। इसलिए भारत के सार्वजनिक जीवन, शिक्षा और संस्कृति में अंग्रेजी का बढ़ता हुआ उपयोग पूर्व गुलामी का ही नया संस्करण है। हर गुलामी विषमता से पैदा होती है और फिर बदले में विषमता को दृढ़ करती है। इसलिए अन्य विषमताओं को स्वीकार करते हुए सिर्फ एक विषमता से लोहा ले पाना असंभव है। मुलायम सिंह यही करते हुए दिखाई पड़ रहे हैं, सो अंग्रेजी विरोध का उनका यह अभियान कभी सफल नहीं हो सकता।



असल में, मुलायम सिंह ने जब समाजवाद की दीक्षा ली थी, तब से आज के बीच दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई है। जूता लंबा होता गया है और मुलायम सिंह का पैर चौड़ा होता गया है। पहले उनके दोस्त और साथी साधारण लोग हुआ करते थे। आज वे अमर सिंह जैसी विभूतियों से घिरे हुए हैं। इसलिए तर्क की माँग तो यही है कि उन्हें अपनी फाइव स्टार चौकड़ी के राजनीतिक और समाजिक चरित्र के अनुसार ही बोलना चाहिए। छद्म ही करना हो, तो आडवाणी और राहुल की तरह करना चाहिए। तभी उनकी आवाज में प्रामाणिकता आएगी। तमाम तरह के पाखंडों के बीच अगर वे एक सच का उच्चारण करेंगे, तो मुसीबत में फँस जाएँगे लंबे जूते में चौड़ा पैर नहीं समा सकता।



यह देख कर बहुत तकलीफ होती है कि भारत में भाषा का सवाल इस कदर उलझ और बिगड़ चुका है कि निकट भविष्य में उसका कोई संतोषजनक समाधान नहीं दिखाई देता। राष्ट्रभाषा की तो अब कोई जिक्र ही नहीं करता। यहां तक कि वे भी नहीं, जो अपने को राष्ट्रवाद का कट्टर प्रहरी बताते हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि राष्ट्रभाषा का सवाल जो उठाएगा, उसे पागल करार दिया जाएगा, जबकि असली पागल वे हैं जो भारत को एक राष्ट्र के रूप में तो देखते हैं, पर उसकी कोई कॉमन भाषा हो, ताकि भारत के एक कोने की जनता दूसरे कोने की जनता से संवाद कर सके, इसका विरोध करते हैं। एक जमाने में सोचा जाता था कि अंतत: हिन्दी का विकास संपर्क भाषा के रूप में होगा। हिन्दी अभी भी गरीब और निम्न मध्य वर्ग के लोगों की संपर्क भाषा है। पर देश का शिष्ट वर्ग, जो असल में विशिष्ट वर्ग है, बड़ी तेजी से अंग्रेजी को अपना रहा है। देश रिक्शे की रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, पर इस विशिष्ट वर्ग के सदस्य मोटरगाड़ी की रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं। आज कोई भी अच्छी नौकरी पाने के लिए अंग्रेजी की जानकारी अनिवार्य है। हालत ऐसी हो चुकी है कि आप अंग्रेजी नहीं जानते, तो आपको पहली नजर में मूर्ख या अविकसित मान लिया जाएगा। भारतीय समाज का निर्णायक वर्ग अंग्रेजी को अपना दिलो-दिमाग दे चुका है। ऐसे माहौल में मुलायम सिंह अगर अंग्रेजी के विरोध में अपनी जबान फड़फड़ाते हैं, तो सभी वर्चस्वशाली लोग उन्हें जनता का दुश्मन करार देंगे। यही हो भी रहा है। यह इस बात का एक मजबूत उदाहरण है कि पॉप गाते-गाते अगर आप अचानक बिरहा की धुन छेड़ दें, तो क्या होगा।

- राजकिशोर


माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही

राग दरबारी


माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही





वरुण गांधी की गिरफ्तारी के बाद मायावती और मेनका गांधी के वाग्युद्ध के बारे में पढ़ने के बाद से ही मैथिलीशरण गुप्त के प्रबंध काव्य 'साकेत' की यह पंक्ति बार-बार याद आ रही है -- माता न कुमाता पुत्र कुपुत्र भले ही। यह पंक्ति कैकेयी ने राम को अयोध्या वापस लौट आने की मनुहार करते हुए कही थी। कैकेयी भी उ अयोध्या वासियों में थीं जो राम के वन गमन को रोकने के लिए उनके पीछे-पीछे गए थे। कैकेयी ने आत्मभर्त्सना करते हुए कहा कि 'माता न कुमाता' की मान्यता सदा से ही चली आई है, पर मेरे मामले में उलटा हो गया है। कुमाता मैं हूँ, भरत तो सुपुत्र है। जाहिर है, भरत को गद्दीनशीन करने की जिद के कुपरिणाम कैकेयी ने देख लिए था। सबसे पहले तो वह दो अन्य रानियों के साथ विधवा हुईं, फिर भरत ने उन्हें ऐसा झाड़ा कि उनके होश उड़ गए। इस तरह, पति गए, पुत्र हाथ में न रहा और पूरी अयोध्या में कैकेयी की ऐसी बदनामी हुई जैसी रघुकुल में किसी और स्त्री की कभी नहीं हुई थी। लालच का शिकार हो कर मूर्खता सभी करते हैं, विपत्ति सब पर आती है, लेकिन बुद्धिमान उन्हें कहते हैं जो विपत्ति से सीख लेते हैं। कैकेयी को स्वयं द्वारा आमंत्रित विपत्ति से सबक लेते हुए दिखा कर मैथिलीशरण गुप्त ने बड़ा काम किया है, वरना पूरी रामकथा में न तो कोई अपने किए पर पछताता है और न अपना परिमार्जन करता है। समुद्र का मामला अलग है, क्योंकि वह राम को लंका तक जाने का उपाय तब बताता है जब क्रुद्ध राम उसे सुखाने के लिए तीर उठा लेते हैं।


मेनका गांधी कुछ वर्षों से उस पार्टी में हैं जो हिन्दू धर्म और संस्कृति का नाम लेते हुए नहीं थकती। इस पार्टी ने अपने इस बार के चुनाव घोषणापत्र में फिर दावा किया है कि हम अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर बनाने के लिए कृतसंकल्प हैं। मेरे मन में सवाल उठता है कि भाजपा और उसकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सिर्फ राम का मंदिर चाहिए या राम के चरित्र जैसे व्यक्ति भी। राम को मर्यादा इतनी प्रिय थी कि उनके लिए अयोध्या का सिंहासन संभालने और वनवास करने में कोई फर्क नहीं जान पड़ा। यहाँ भाजपा के वयोवृद्ध नेता कई महीनों से चीख रहे हैं कि मुझे प्रधानमंत्री बनाओ। प्रधानमंत्री बनने की अपनी इच्छा को इतने बलवान ढंग से प्रगट करनेवाली दूसरी नेता उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती हैं। मायावती को राम की कथा या राम की परंपरा में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनकी सहानुभूति होगी तो रावण के साथ होगी, राम के साथ नहीं। फिर भी उन्होंने मातृत्व की परिभाषा को व्यापक कर कई महीनों में पहला अच्छा काम किया है। मगर अफसोस, माता और पुत्र के रिश्ते पर उनकी टिप्पणी भूल भरी और अवैज्ञानिक है।


सबसे पहले वरुण की माँ मेनका गांधी की मानसिकता पर विचार करना चाहिए। मेनका को भारतीय संस्कृति का ज्ञान नहीं तो कुछ जानकारी होनी चाहिए। वे मायावती पर लांछन लगाती हैं कि मायावती माँ होती, तो उन्हें माँ की वेदना का पता होता। एक मायने में यह सच है। कहा गया है, जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई। लेकिन बिवाई फटना एक बात है और विपथगामी पुत्र द्वारा किए गए गलत कार्य के परिणामस्वरूप पुत्र को और उसके नतीजे में माँ को मिलनेवाला कष्ट दूसरी बात। मेनका अच्छी माँ होतीं, तो वे सबसे पहले अपने बेटे को ही डांटतीं कि वरुण, यह तुमने क्या कह डाला? हम लोग एक पढ़े-लिखे परिवार के हैं, मैं संजय गांधी की पत्नी और इंदिरा गांधी की बहू हूँ। जवाहरलाल नेहरू का वंश वृक्ष बनाया गया, तो उसमें मेरा और तुम्हारा दोनों का नाम होगा। चुनाव जीतने के लोभ में तुमने यह सब भुला दिया और मुसलमानों के लिए ऐसे अपशब्द कह डाले जो हत्यारी मानसिकता का आदमी ही कह सकता है! वरुण बेटे, मुझे तुमसे इसकी कतई उम्मीद न थी।


मेनका गांधी के मन में ये अथवा इस तरह के विचार आए होते, तो आज उनकी जयजयकार हो रही होती। इन दिनों लोगों में पुत्र या पुत्री मोह इतना ज्यादा दिखाई देता है कि लोग अपने हत्यारे और बलात्कारी बेटे तथा पति या प्रेमी की हत्या करनेवाली बेटी को अपराध-मुक्त कराने के लिए बड़े-बड़े वकीलों को नियुक्त करते हैं। यह हो रहा है उस देश में जहाँ रानी कैकेयी सबके सामने अपना अपराध स्वीकार करते हुए अपने बेटों भरत और राम से करुणा की भीख माँगती हैं। फिर भी भारत की जनता ने कैकेयी को उसके अंध पुत्र प्रेम के लिए माफ नहीं किया है। वरुण के प्रति मेनका का प्रेम ऐसा ही है। पुत्र प्रेम में अंधी हो कर वे अपनी वेदना तो प्रगट करती हैं, पर अपने पुत्र का कोई दोष नहीं देख पातीं।


पर मायावती का यह कहना भी पूरा तरह सही नहीं है कि मेनका ने वरुण को अच्छे संस्कार दिए होते, तो वरुण गांधी ने पीलीभीत में ऐसे विनाशकारी बयान नहीं दिए होते। दुनिया में कौन-सी माँ अपने पुत्र को विपथगामी बनाना चाहती है? फिर भी बेटे कुपथगामी हो जाते हैं तो इसलिए कि उनके व्यक्तित्व पर और भी अनेक चीजों का असर पड़ता है। इसका सबसे ज्यादा चर्चित उदाहरण हरिलाल थे, जो महात्मा गांधी जैसे पिता और कस्तूरबा जैसी माँ के बेटे थे। हरिलाल ने क्या नहीं किया -- वे लोगों से रुपया उधार ले कर लौटाते नहीं थे, जीविकोपार्जन नहीं करते थे, शराब पीते थे, वेश्यागमन करते थे, एक बार तो अपना धर्म छोड़ कर वे मुसलमान भी हो गए! क्या इस सबके लिए उनकी माँ कस्तूरबा ही जिम्मेदार थीं? अगर ऐसा था, तो उनका कुप्रभाव उनके अन्य बेटों पर क्यों नहीं पड़ा? उनका एक ही बेटा नालायक क्यों निकला? इसलिए पुत्र या पुत्री के विपथगामी हो जाने की सारी जिम्मेदारी उसकी माँ पर थोप देना सही नहीं है।


मायावती का यह कहना वाजिब है कि किसी का दर्द समझने को लिए उसकी माँ होना जरूरी नहीं है। मदर टेरेसा कभी माँ नहीं बनीं, पर उनके लिए सभी उनकी संतान की तरह थे। बहुत ठीक। इस तर्क से मायावती को चाहिए कि वे वरुण गांधी को अपने बेटे के समान ही मानें। अगर वे वरुण गांधी की माँ होतीं और वरुण ने वैसा अपराध किया होता जैसा उन्होंने किया, क्या तब भी वे वरुण को रासुका में गिरफ्तार करवा कर जेल में डाल देतीं? अभी तक तो किसी राजनेता ने ऐसा किया नहीं है। इसका उलटा जरूर होता रहा है। मायावती में मदर टेरेसा के व्यक्तित्व का जर्रा भर भी अंश होता, तो वे सबसे पहले वरुण से मिलतीं और उसे प्रेम से समझातीं कि बेटे, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। उसके बाद कहतीं कि राजधर्म निभाने के लिए तुम्हें गिरफ्तार करवाना मेरा फर्ज है, पर तुम्हें इसका बुरा नहीं मानना चाहिए, बल्कि इस बात पर गर्व करना चाहिए कि तुम्हारी माँ निष्पक्ष प्रशासक है। तुम्हें भी एक दिन ऐसा ही बनना है।


जाहिर है, यह सब मेरी खुशखयाली है। लेकिन यथार्थ और खुशखयाली के बीच मीलों की दूरी होने लगे, तो यह दुनिया कितने दिन चल सकती है?

- राजकिशोर

चाटुकारिता के बदले : अपील? सर, एव्रीबॉडी इज हैप्पी.....

राग दरबारी


चाटुकारिता के बदले





काँग्रेस के केंद्रीय कार्यालय में राहुल गाँधी पार्टी के काम-काज में मशगूल थे। बायीं ओर की दीवार पर तरह-तरह के रंग-बिरंगे चार्ट लग हुए थे। एक चार्ट में लोक सभा के चुनाव क्षेत्रों का नक्शा था। दूसरे चार्ट में पिछले दो चुनावों में काँग्रेस पार्टी के हारने-जीतने का ब्यौरा था। तीसरे चार्ट पर कुछ नारे लिखे हुए थे, जैसे झोपड़ियों में जाएँगे, भारत नया बनाएँगे; दलित जगेगा देश जगेगा, बेशक इसमें वक्त लगेगा; काम करेंगे, नाम करेंगे, चाटुकार आराम करेंगे आदि-आदि। सामने तीन लैपटॉप खुले हुए थे। राहुल गाँधी कभी इस लैपटॉप पर, कभी उस लैपटॉप पर काम करने लगते। मेज पर दो मोबाइल फोन रखे हुए थे। तीसरा उनकी जेब में था। हर चार-पाँच मिनट पर कोई न कोई मोबाइल बज उठता। काम करते-करते राहुल गाँधी मोबाइल पर बात भी करते जाते थे। वे सुनते ज्यादा थे, बोलने के नाम पर हाँ, हूँ, क्यों, कैसे, कब, अच्छा कहते जाते थे। चेहरे पर मुसकराहट कभी आती, कभी चली जाती।

तभी इंटरकॉम बज उठा। उधर से आवाज आई -- सर, एक नौजवान आपसे मिलना चाहता है।

राहुल गाँधी – कह दो, इस समय मैं किसी से नहीं मिल सकता।

उधर से -- सर, मैं कई बार कह चुका हूँ। पर मानता ही नहीं है।

राहुल गाँधी – नो वे। इस वक्त बहुत बिजी हूँ।

उधर से -- सर, इसे दो मिनट टाइम दे दें। नहीं तो यह यहीं पर सत्याग्रह पर बैठ जाएगा। प्रेसवाले इधर-उधर घूमते ही रहते हैं ....

राहुल गाँधी -- ओके, ओके, भेज दो। पर दो मिनट से ज्यादा नहीं।


दरवाजा खटखटा कर नौजवान ने कमरे में प्रवेश किया। देखने से ही छँटा हुआ गुंडा लग रहा था। झक्क सफेद खादी का कुरता-पाजामा। गले में सोने की चेन। कलाई पर मँहगी घड़ी। चप्पलें ऐसी मानो अभी-अभी कारखाने से आई हों। नौजवान ने पहले राहुल गाँधी को सैल्यूट जैसा किया और मेज पर फूलों का गुलदस्ता रख दिया। राहुल गांधी सिर उठा कर एकटक देखे जा रहे थे।

नौजवान कुछ बोल नहीं रहा था। उसकी नजर राहुल के सौम्य चेहरे पर टँगी हुई थी, जैसे वह आह्लाद के आधिक्य से चित्र-खचित हो गया हो। इसके पहले उसने किसी बड़े नेता को इतनी नजदीकी से नहीं देखा था। एक मिनट इसी में बीत गया।

राहुल ने मुसकरा कर पूछा – टिकट चाहिए? कहाँ के हो?

नौजवान -- अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। आपके दर्शन पाने के बाद मेरी हर इच्छा पूरी हो गई।

राहुल – चापलूसी कहाँ से सीखी? क्या तुम्हारा परिवार पुराना काँग्रेसी है?

नौजवान -- सर, हम लोग तीन पुश्तों से काँग्रेसी है। मेरे दादा ने साल्ट मार्च में हिस्सा लिया था।

राहुल -- साल्ट मार्च? यह कब की बात है?

नौजवान -- सर, द फेमस दांडी मार्च...

राहुल -- ओह। अब तुम जा सकते हो। दो मिनट हो गए।

नौजवान – थैंक्यू सर। लेकिन असली बात तो रह ही गई।

राहुल – तीस सेकंड में बोलो और चलते बनो। मैं बहुत बिजी हूँ।

नौजवान -- सर, मैं अपने क्षेत्र की तरफ से आपको बधाई देने आया हूँ कि...

राहुल – किस बात की बधाई?

नौजवान – कि आपने चापलूसी कल्चर के खिलाफ आह्वान कर एक क्रांतिकारी काम किया है। यह तो महात्मा गाँधी भी नहीं कर सके।

राहुल – तो तुम्हें यह बात पसंद आई?

नौजवान -- बहुत, बहुत पसंद आई। मैं तो शुरू से ही आपकी रिस्पेक्ट करता आया हूँ। लोक सभा में आपका भाषण सुनने के बाद तो मैं आपका मुरीद हो गया। सर, आपका भाषण सबसे डिफरेंट रहा। मैंने तो उसका वीडियो बनवा कर रख लिया है।

राहुल -- हूँ...

नौजवान -- सर, आप एकदम नई लाइन पर जा रहे हैं। दलितों की झोपड़ियों में जाना, वहाँ खाना खाना, रात भर सोना... काँग्रेस में नई जान फूँक दी है आपने।

राहुल गाँधी असमंजस में पड़ जाते हैं। कभी दीवार पर लगे चार्टों को देखते हैं कभी सामने पड़े लैपटॉप पर।

नौजवान -- सर, चापलूसी खत्म करने की आपकी बात तो एकदम निराली है। आज तक किसी भी दल के नेता ने इतनी ओरिजिनल बात नहीं कही है। देश से चापलूसी का कल्चर खत्म हो जाए तो हम देखते-देखते अमेरिका और जापान से कंपीट कर सकते हैं।

राहुल – तुम्हारा मतलब है, आम जनता को मेरा यह मेसेज अपील कर रहा है?

नौजवान -- अपील? सर, एव्रीबॉडी इज हैप्पी। चापलूसी के चलते ही हमारा देश आगे नहीं बढ़ पा रहा है। जैसे खोटा सिक्का अच्छे सिक्के को चलन से बाहर कर देता है, वैसे ही चापलूस लोग योग्य आदमियों को पीछे धकेल देते हैं। ऐसे में तरक्की कैसे होगी?

राहुल -- अच्छा, ठीक है। अब तुम...

नौजवान – नो सर, इस मामले में आपको लीड लेना ही होगा। आप ही काँग्रेस से चापलूसी का कल्चर खत्म कर सकते हैं। देश का यूथ आपके साथ है। आप सिर्फ नेतृत्व दीजिए। काम करने के लिए हम लोग हैं न।

राहुल – यू आर राइट। यूथ को एक्टिव किए बिना कुछ नहीं होगा।

नौजवान -- सर...

राहुल -- ओके, योर टाइम इज ओवर।

नौजवान राहुल के पाँवों की धूल लेने के लिए गुजाइश खोजता है। पर राहुल जहाँ बैठे हैं, उसे देखते हुए यह मुश्किल लगता है। सो वह प्रणाम-सा करते हुए दरवाजे की ओर मुड़ता है।

राहुल -- बाइ द वे, तुम अपना सीवी सेक्रेटरी के पास छोड़ते जाना। देखता हूँ...

नौजवान पहले से अधिक आत्म-विभोर हो जाता है। कार्यालय के बाहर उसके दोस्त-यार उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। नौजवान अपनी दो उँगलियों को वी की शक्ल में उन्हें प्रदर्शित करता है। सभी एक बड़ी गाड़ी में बैठते हैं। नौजवान ड्राइवर को आदेश देता है -- होटल अशोका।


- राजकिशोर


मेरी दिल्ली : मेरी शर्म

राग दरबारी





"दिल्ली में कभी तवायफें अच्छी संख्या में रहती होंगी। दिल्ली ने तय किया है कि अब वह खु तवायफ बनेगी। उसके इस सजने-संवरने में कोई सौंदर्य चेतना नहीं है। शील के बिना सौंदर्य कहाँ! जब भी मैं दिल्ली में कोई नई चमचमाती चीज देखता हूँ, मेरी आँखें शर्म से झुक जाती हैं। मुझे लगता है, करोड़ों पुरुषों और स्त्रियों को आधे अनाज और आधे कपड़ों में रख कर यह मुटल्ली अब कुछ ज्यादा ही इतराने की तैयारी में है"




मेरी दिल्ली मेरी शर्म

राजकिशोर


दिल्ली में रहनेवाला कोई भी हिन्दी लेखक दिल्ली से खुश नहीं रहा। मेरी पढ़ाई कम है, इसलिए इस समय तीन ही लेखक याद आ रहे हैं। पहले हैं, रामधारी सिंह दिनकर। दिल्ली ने उन्हें मंत्री पद छोड़ कर सब कुछ दिया। अपने संस्मरणों में उन्होंने कई जगह अफसोस जताया है कि वे किस तरह शिक्षा मंत्री बनते-बनते रह गए। मेरे अपने अनुमान से, उनके मंत्री न बन पाने का जो भी कारण रहा हो, शिक्षा मंत्री न बन पाने का यह कारण जरूर रहा होगा कि उन दिनों किसी हिन्दी भाषी को यह पद नहीं दिया जाता था। पता नहीं डर किससे था -- हिन्दीवालों से, जो जवाहरलाल नेहरू को शायद धोतीप्रसाद लगते थे, या गैर-हिन्दी भाषियों से, जिनसे भारत के पहले प्रधानमंत्री का लगाव कुछ ज्यादा ही था। बहरहाल, दिल्ली से दिनकर को घोर सैद्धांतिक असंतोष था। उनकी एक बहुत अच्छी कविता है -- भारत का यह रेशमी नगर। इसमें उन्होंने दिल्ली के रेशमी चरित्र पर बहुविधि प्रकाश डाला है -- दिल्ली फूलों में बसी, ओस-कण से भीगी /दिल्ली सुहाग है, सुषमा है, रंगीनी है/प्रेमिका-कंठ में पड़ी मालती की माला/दिल्ली सपनों की सेज मधुर रस-भीनी है। दिल्ली की यह सुषमा दिनकर को आक्रांत करती थी। उन्हें लगता था कि 'कुछ नई आधियाँ' इस जादू को तोड़ कर रहेंगी। उनकी भविष्यवाणी थी -- ऐसा टूटेगा मोह, एक दिन के भीतर/इस राग-रंग की पूरी बर्बादी होगी/जब तक न देश के घर-घर में रेशम होगा/तब तक दिल्ली के भी तन पर खादी होगी।


ऐसा लगता है कि तीसरी दुनिया के गरीब देशों का राशिफल कवि और दार्शनिक नहीं लिखते। सो श्रीकांत वर्मा तक आते-आते दिल्ली का चरित्र 'मगध' जैसा हो गया। श्रीकांत जी ने अपने मगध का चित्रण एक ऐसे राज्य के रूप में किया है, जहां वैभव के साथ कुचक्र है तो सत्ता के साथ विचारों की कमी। इसे उस दिल्ली का पतन काल कहा जा सकता है, जिससे आकर्षित हो कर श्रीकांत वर्मा मध्य प्रदेश के एक छोटे-से शहर से यहां आए थे। दिल्ली ने उन्हें भी खूब दिया। जितना दिया, उससे कहीं ज्यादा उन्होंने वसूल कर लिया। आखिर कांग्रेस में थे वे। जब दिल्ली कवि से नाराज हो गई, तो कवि ने बगावत कर दी और अंतिम दिनों की अपनी कविताओं में दिल्ली का सारा हाल खोल कर लिख दिया।


रघुवीर सहाय में दिनकर की उदात्तता और श्रीकांत की तुर्शी, दोनों की झांकी दिखाई पड़ती है। वे दिल्ली में रहते हुए 'धर्मयुग' में 'दिल्ली मेरा परदेस' कॉलम लिखते थे। इस स्तंभ में छपी सामग्री इसी नाम की एक किताब में संकलित है। इस शीर्षक से ही आप समझ सकते हैं कि एक कवि की जगह के रूप में दिल्ली को सहाय जी ने सबसे सटीक ढंग से समझा था। दिल्ली वाकई सभी का परदेस है। यहाँ की ज्यादातर आबादी उनकी है जो बाहर से आए हैं। दिल्ली पर कभी मुसलमानों का प्रभुत्व रहा होगा। वह खत्म हो गया। फिर पंजाबी हावी हुए। अब वे भी अल्पसंख्यक हैं। लेकिन दिल्ली को रघुवीर सहाय ने अपना परदेस बताया, तो वह एक बड़े अर्थ में था। इस मायने में दिल्ली सभी संवेदनशील लोगों के लिए परदेस है। लेकिन परदेस होते हुए भी यह इतनी मोहक है कि कोई अपने देस नहीं जाना चाहता। बड़े से बड़े कलावादी और बड़े से बड़ा प्रगतिशील, सभी यहीं से देश को दिशा दे रहे हैं। कवियों, लेखको और पत्रकारों की दिल्ली-अभिमुखता इतनी बढ़ गई है कि कुछ दिनों के बाद यह कहावत आम हो जाएगी -- जो जा न सका दिल्ली, उसकी उड़ेगी खिल्ली।


दिनकर के शब्दों में मैं भी कह सकता हूँ कि 'मैं भारत के रेशमी नगर में रहता हूँ ।' लेकिन मैं यहाँ यह नहीं लिखना चाहता कि दिल्ली से मुझे क्या मिला और क्या नहीं मिला। बताना मैं यह चाहता हूँ कि दिल्ली आजकल 'मेरे लिए' बड़ी तेजी से सँवर रही है। जिधर से भी गुजरो, एक सुंदर-सा बोर्ड बताता है, इतनी हरियाली और कहाँ है मेरी दिल्ली के सिवा, मेरी दिल्ली सँवर रही है, दिल्ली मेट्रो मेरी शान, कितनी खुशहाल है मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली कितनी साफ-सुथरी है आदि-आदि। यह सिर्फ विज्ञापन नहीं है, दिल्ली को वाकई सजाया-सँवारा जा रहा है। पता नहीं कितने फ्लाईओवर बन गए है तथा कितने और बनाए जाएँगे। दिल्ली मेट्रो का विस्तार बहुत तेजी से हो रहा है। हवाई अड्डे को नया रूप मिलेगा। रेलवे स्टेशनों का पुनर्निर्माण किया जा रहा है। सड़कों को चौड़ा और सुचिक्कन बनाया जा रहा है। एयरकंडीशंड बसें चलने लग गई हैं। सभी जानते हैं, इस सबकी वजह क्या है। सन 2010 में दिल्ली में राष्ट्रमंडलीय खेल जो होनेवाले हैं! किसी उपन्यास में पढ़ा था कि जिस दिन नवाब साहब आनेवाले होते हैं, उस दिन लखनऊ की सबसे खूबसूरत तवायफ कितनी बेताबी से अपना श्रृंगार करने लगती है और उसके रईसखाने को सजाने-सँवारने में कितनी जद्दो-जहद की जाती है।


दिल्ली में कभी तवायफें अच्छी संख्या में रहती होंगी। दिल्ली ने तय किया है कि अब वह खुद तवायफ बनेगी। उसके इस सजने-संवरने में कोई सौंदर्य चेतना नहीं है। शील के बिना सौंदर्य कहाँ! जब भी मैं दिल्ली में कोई नई चमचमाती चीज देखता हूँ, मेरी आँखें शर्म से झुक जाती हैं। मुझे लगता है, करोड़ों पुरुषों और स्त्रियों को आधे अनाज और आधे कपड़ों में रख कर यह मुटल्ली अब कुछ ज्यादा ही इतराने की तैयारी में है।


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आतंकवाद : मुस्लिम, क्रिश्चियन, तालिबान, सिख, हिन्दू ?






राजकिशोर जी का यह लेख वर्तमान परिस्थितयों में विचार को मथने पर बल देता है| जब बार बार आतंकवाद को सम्प्रदाय से अलग रखने की बात की जाती रही है, उसे अलग रखा भी/ही गया, फिर वे क्या कारण हैं कि यकायक महीने भर की कवायद में आतंकवाद को नाम दे दिए गए, सम्प्रदाय से जोड़ कर अभिहित किया जाने लगा? व्यक्ति को ऐसे खानों में देखने की मानसिकता का जो विरोध सदा से होता आया है, उसे क्यों नहीं बनाए रखे जाने की आवश्यकता को दुहराया जाता? क्या कारण हैं कि इस देश में हर चीज को साम्प्रदायिक रंग दे दिया जाता है, सांप्रदायिक बदले चुकाए निबाहे जाते हैं? कब मुक्ति मिलेगी देश को ? क्या तब जब पूरा देश आतंकवादियों के सर्वग्रासी पेट का निवाला बन चुका होगा? प्रश्न बहुत -से हैं, उनका बार बार उठाया जाना आत्ममन्थन के लिए जागृति के लिए बहुत आवश्यक है ; वरना सोए हुए स्वार्थ लिप्त देश का जन-जन ऐसा आत्मकेंद्रित सुषुप्ति में चला जाएगा कि लुटेरे घर लूट कर ले जाएँगे| ऐसे ही आत्ममंथन को प्रेरित करते इस लेख को पढ़ें अपनी राय से अवगत कराएँ कि सभ्यता की 3 कसौटियों पर पिछडे इस देश की ऐसी पातक दशा का दायित्व कौन लेगा ? किस किस का है ? व्यक्ति-विशेष का? वर्ग- विशेष का ? मेरा ? आपका ? या फिर किसी और का ?
- कविता वाचक्नवी



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राग दरबारी


हिन्दू और आतंकवाद
राजकिशोर



कोई भी देश कितना सभ्य है, यह जानने की तीन साधारण कसौटियाँ हैं -- रेलगाड़ी रुकने पर चढ़नेवाले और उतरनेवाले एक-दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, सड़कों पर गाड़ियों का आचरण कैसा है और सार्वजनिक शौचालयों की हालत कैसी है। हाल ही में पहले और तीसरे अनुभव से मेरा पाला पड़ा। अब मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि हमने अभी तक सभ्य होने का सामूहिक फैसला नहीं किया है।


पिछले हफ्ते की बात है। जब मैं किसी तरह अपने डिब्बे में चढ़ गया और अपनी सीट पर कब्जा करने के लिए विशेष संघर्ष नहीं करना पड़ा, तो मैंने महसूस किया कि आज मेरी किस्मत अच्छी है। आमने-सामने की तीनों सीटें भरी हुई थीं। रेलगाड़ी के चलते ही सामने की सीट पर बैठे एक सज्जन ने एक दैनिक पत्र निकाल कर अपने सामने फैला दिया, जैसे हम सिर पर छाता तानते हैं। एंकर की जगह पर एक बड़ा-सा शीर्षक चीख रहा था : हिन्दू आतंकवादी नहीं हो सकता - राजनाथ सिंह। मेरे बाईं ओर बैठे सज्जन खिल उठे। पता नहीं किसे संबोधित करते हुए वे बोले, ‘एकदम ठीक लिखा है। हिन्दू को आतंकवादी होने की जरूरत क्या है? यह पूरा देश तो उसी का है। वह क्यों छिप कर हमला करेगा? यह तो अल्पसंख्यक करते हैं। पहले सिख करते थे। अब मुसलमान कर रहे हैं।’


अखबार के स्वामी को लगा कि उन्हें ही संबोधित किया जा रहा है। उन्होंने लाल-पीला किए गए न्यूजप्रिट के पीछे से अपना सिर निकाला, ‘तो क्या साध्वी प्रज्ञा सिंह और उनके सहयोगियों के बारे में पुलिस जो कुछ कह रही है, वह गलत है? साध्वी ने तो अपना बयान मजिस्ट्रेट के सामने दिया है। अब वह इससे मुकर भी नहीं सकती।’


बाईं और वाले सज्जन का मुंह जैसे कड़वा हो आया। फिर कोशिश करके हंसते हुए वे बोले, ‘अजी, यह सब मनगढ़ंत बातें हैं। पुलिस पर यकीन कौन करता है? उससे जो चाहो, साबित करा लो।’


सामनेवाले सज्जन, ‘चलिए फिलहाल आपकी बात मान लेते हैं। क्या आप मेरे एक सवाल का जवाब देंगे?’
‘जरूर। क्यों नहीं। कुछ वर्षों से सबसे ज्यादा सवाल हिन्दुओं से ही किए जा रहे हैं। मुसलमानों और ईसाइयों से कोई कुछ नहीं कहता।’

‘अच्छा, यह बताइए कि हिन्दू गुंडा हो सकता है या नहीं?’

कुछ क्षण रुक कर, ‘हिन्दू गुंडा क्यों नहीं हो सकता? गुंडों की भी कोई जात होती है?’

‘तो यह भी बताइए कि हिन्दू शराबी-कबाबी हो सकता है कि नहीं?’

बगलवाले सज्जन मुसकराने लगे, ‘आपने कहा था कि आप सिर्फ एक सवाल पूछेंगे।’

सामनेवाले सज्जन, ‘अजी, ये सारे सवाल एक ही सवाल हैं। तो, हिन्दू शराबी-कबाबी हो सकता है या नहीं?’

‘हो सकता है, बल्कि हैं। इसीलिए तो हिन्दू समाज को संगठित करने की जरूरत है, ताकि वह मुसलमानों और अंग्रेजों से ली गई बुराइयों को रोक सके।’

अखबारवाले सज्जन के दाई ओर बैठे सज्जन ने मुसकराते हुए हस्तक्षेप किया, ‘सुना है, अटल बिहारी वाजपेयी को शराब पीना अच्छा लगता है। वे मांस-मछली भी खूब पसंद करते हैं।’

मेरे बाईं ओर वाले सज्जन, ‘इस बहस में व्यक्तियों को क्यों ला रहे हैं? खाना-पीना हर आदमी का व्यक्तिगत मामला है।’

अखबारवाले सज्जन, खैर, ‘इसे छोड़िए। यह बताइए कि हिन्दू चोर या डकैत हो सकता है या नहीं?’
‘हो सकता है।’

‘क्या वह वेश्यागामी भी हो सकता है?’

‘......................................’

‘क्या वह बलात्कार भी कर सकता है?’

‘.....................................’



‘जब हिन्दू यह सब कर सकता है, तस्करी कर सकता है, लड़कियों को भगा कर दलालों को बेच सकता है, बच्चों के हाथ-पांव कटवा कर उनसे भीख मंगवा सकता है, किडनी खरीदने-बेचने का बिजनेस कर सकता है, हत्या कर सकता है, दहेज की मांग पूरी न होने पर अपनी नवब्याहता की जान ले सकता है, तो वह आतंकवादी क्यों नहीं हो सकता?’


यह सुन कर मेरे पड़ोसी हिन्दूवादी मित्र तमतमा उठे, ‘आप कहीं कम्युनिस्ट या सोशलिस्ट तो नहीं हैं? या दलित? यही लोग हिन्दुओं की बुराई करते रहते हैं। जिस पत्तल में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं। आप जो बुराइयां गिनवा रहे हैं, वे दुनिया में कहां नहीं है? हमारा कहना यह है कि भारत में हिन्दू बहुसंख्यक हैं। फिर भी उनकी उपेक्षा की जा रही है। उन्हें वेद-शास्त्र के अनुसार देश को चलाने से रोका जा रहा है। इसलिए हिन्दू अगर अपना वर्चस्व कायम करने के लिए हथियार भी उठाता है, तो इसमें हर्ज क्या है? लातों के देवता बातों से नहीं मानते।’


अब अखबारवाले सज्जन के बाईं ओर बैठे सज्जन तमतमा उठे, ‘हर्ज कैसे नहीं है? हर्ज है। अगर देश के सभी धर्मों के लोग, सभी जातियों के लोग, सभी वर्गों के लोग, सभी राज्यों के लोग देश में अपना-अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए हथियार उठा लें, तो गली-गली में खून नहीं बहने लगेगा? उसके बाद क्या भारत भारत रह जाएगा? फिर कौन कहां अपना वर्चस्व कायम करेगा?’

‘आप लोग हिन्दू-विरोधी हैं। आप लोगों से कोई बहस नहीं की जा सकती।’

तभी मुझे लघुशंका लग गई। ट्वायलेट में घुसा, तो भीतर का दृश्य सुलभ शौचालय के प्रणेता बिंदेश्वरी पाठक को चीख-चीख कर पुकार रहा था। मेरे मन में सवाल उठा, जब हम रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों का खयाल नहीं रख सकते, तो बड़ी-बड़ी समस्याओं का हल कैसे निकालेंगे?

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