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हिंदी विदेशी भाषा की तरह है





हिंदी विदेशी भाषा की तरह है
डॉ. वेदप्रताप वैदिक 



गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले पर किसी भी हिंदीभाषी को जबरदस्त गुस्सा आ सकता है। उसने अपने एक निर्णय में कह दिया कि हिंदी तो किसी भी विदेशी भाषा की तरह है। गुस्सा करने से पहले जरा सोचें कि उसने ऐसा क्यों कहा? उसने ऐसा इसलिए कहा कि गुजरात के एक सुदूर गाँव के लोगों ने शिकायत की कि राष्ट्रीय राजमार्ग पर जो नामपट लगे हुए हैं, वे सिर्फ अंग्रेजी और हिंदी में हैं। वे गुजराती भाषा में क्यों नहीं हैं ?


गाँववालों का यह सवाल बिल्कुल वाजिब है। उनमें से ज्यादातर लोग अनपढ़ या अल्पशिक्षित होंगे। वे न रोमन लिपि पढ़ सकते होंगे और न ही देवनागरी। उनमें से कई तो गुजराती लिपि भी नहीं पढ़ पाते होंगे। अपनी समस्या लेकर वे अदालत में गए, यह उन्होंने ठीक किया। यदि कोई नागरिक अनपढ़ है, तो क्या उसके मानव अधिकार का हनन करने की छूट सरकार को दी जा सकती है? क्या वह नागरिक नहीं है? क्या वह मनुष्य नहीं हैं?


गुजरात में लगा हर सरकारी नामपट गुजराती में होना चाहिए। हर सरकारी काम-काज भी गुजराती में होना चाहिए। इस सिद्धांत का पालन हर प्रांत में होना चाहिए लेकिन होता क्या है? प्रांतों में प्रांतीय भाषाओं की उपेक्षा होती है और उनकी जगह अंग्रेजी और हिंदी लाद दी जाती है। खासतौर से केंद्र सरकार के दफ्तरों और कामकाज में! हिंदी तो राजभाषा है। राष्ट्रभाषा और संपर्क भाषा है। जोड़ भाषा है। जनभाषा है, लेकिन अंग्रेजी किसलिए थोपी जाती है? अंग्रेजी के कारण प्रांतीय भाषाओं का हक मारा जाता है। 


यदि गुजरात के गांवों के नामपटों पर गुजराती के साथ-साथ हिंदी होती तो क्या अदालत वे शब्द बोलती, जो उसने हिंदी के बारे में बोले? कभी नहीं। उसे जो अंग्रेजी के बारे में बोलना चाहिए था, वह उसने हिंदी के बारे में बोल दिया। जरा जुबान फिसल गई। वरना, इस देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का श्रेय जिन दो महापुरूषों को है, वे गुजराती ही थे। महर्षि दयानंद और महात्मा गांधी


गुजराती और देवनागरी लिपियों में जितना साम्य है, दुनिया की किन्हीं दो लिपियों में नहीं है। गुजराती और हिंदी के असंख्य शब्द और मुहावरे एक जैसे है। इसीलिए गुजरातियों के लिए हिंदी को विदेशी भाषा का दर्जा दे देना अत्यंत अतिरंजनापूर्ण है। कुछ गाँव वालों के लिए देवनागरी अजनबीपन सही, हो सकता है लेकिन उसको विदेशीपन तक खींच ले जाना उपमा का गलत प्रयोग है। लड़ाई हिंदी और गुजराती के बीच नहीं है। गुजराती का हक मारने वाली अंग्रेजी के साथ है। सर्वत्र प्रांतीय भाषाओं और हिंदी का प्रयोग होना चाहिए और अंग्रेजी के प्रयोग पर सामान्यता कानूनी प्रतिबंध होना चाहिए।



आदिवासी विमर्श पर खोजपूर्ण सामग्री


पुस्तक-चर्चा 






आदिवासी विमर्श पर खोजपूर्ण सामग्री : 
‘संकल्य’ का 
जनजातीय भाषा, साहित्य और संस्कृति विशेषांक

-  गुर्रमकोंडा नीरजा




भारत का समाज संभवतः दुनिया के सबसे पुराने समाजों में से एक है. यहाँ समय पर अनेक सभ्यताएँ आईं और धीरे धीरे यह देश एक संगम समाज के रूप में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक जाने कितने परिवर्तन लंबी यात्रा के दौरान घटित हुए होंगे. इतने बड़े देश में कोई भी ऐसा परिवर्तन संभव नहीं जो इसके हर कोने अँतरे को आमूल चूल बदल डाले. इस महादेश में व्यापक से व्यापक परिवर्तन में भी कुछ-न-कुछ अन-छुआ, अन-पलटा रह जाना स्वाभाविक है. और जो इस तरह अन-छुआ, अन-पलटा रह जाता है वह विकास की दौड़ में, सभ्यता के सफर में पीछे छूट जाता है. समाज के इस तरह पीछे छूटे हुए समुदाय आज की भूमंडलीय दुनिया में कहीं खो न जाए इसीलिए अनकी पहचान करना, उनकी समस्याओं से रू-ब-रू होना, उनकी सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करना और विकास के लाभ उन तक पहुँचना किसी भी चेतनाशील साहित्यकार के सरोकारों में शामिल होना चाहिए. 

बने चट्टान हिंदी, दीवार नहीं : UK REGIONAL HINDI CONFERENCE - 2011



गत दिनों बर्मिंघम में आयोजित UK REGIONAL HINDI CONFERENCE - 2011   में प्रस्तुत एक आलेख 




बने चट्टान हिंदी, दीवार नहीं
ऐश्वर्ज कुमार
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय


सम्मेलन की तैयारी के लिए आयोजित की गई पहली बैठक में एक सदस्य ने पूछा कि क्या यह सम्मेलन हिंदी में होगा? जवाब में कहा गया कि जी हाँ। यह सुनकर सदस्य ने कहा कि “हमें इस बात का पूरा ख्य़ाल रखना चाहिए की सभी पेपरों की भाषा आसान और बोलचाल की भाषा हो। अगर इन पेपरों की भाषा ऐसी नहीं होगी तो संभव है कि यह सभी वक्ता आएँ  और अपनी बात कहकर चले जाएँ और उनकी बात सभी के सिर के ऊपर से चली जाए”। यह सबकुछ सुनकर मुझे बेहद तकलीफ हुई। क्योंकि उनका यह तर्क कोई नया नहीं था। मैं तुरंत इसका जवाब देने के लिए उद्वेलित हुआ लेकिन अपने आप को यह समझाते हुए काबू कर लिया कि ऐसे गुरूमंत्र आगे भी आते रहेंगे। बेहतर है कि इनका जवाब सही अवसर पर दिया जाए। मुझे लगता है कि वह सही अवसर आज और अभी है। इसलिए मैं प्रश्न पर फिर से लौटता हूँ। मैं सबसे पहले यह पूछना चाहता हूँ कि जब कोई सम्मेलन अंग्रेज़ी भाषा में होता है तब क्या आप में से कोई यह बात कहता है कि जो अंग्रेज़ी बोली जा रही है वह बहुत कठिन अंग्रेज़ी भाषा है और थोड़ी आसान अंग्रेज़ी बोली जाए? जब हम कभी अंग्रेज़ी पर यह सवाल नहीं उठाते तब क्यों हिंदी को आसान बनाने के पीछे लग जाते हैं? यह मानसिकता कि हिंदी का स्तर बोलचाल का रहे, हिंदी सरल और सहज हो, उसमें कठिन शब्द न हों इत्यादि हिंदी के प्रति और भारतीय भाषाओं को सीमित व्यवहार की भाषा बनाए रखना ही है। क्योंकि ऐसे गुरूमंत्र दर्शाते हैं कि वह अंग्रेज़ी भाषा की अंतर्राष्ट्रीय उपयोगिता को आत्मसात कर चुके हैं। वह मान चुके हैं कि हिंदी या भारतीय भाषाओं का स्थान घरेलू उपयोग या गिने चुने कामों के लिए ही संभव है।


खबरों के आगे खिंचता नेपथ्य



खबरों के आगे खिंचता नेपथ्य
-प्रभु जोशी




दुनिया भर में, ‘विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र‘ की तरह ख्यात भारत ने, जब एक ‘नव-स्वतंत्र राष्ट्र‘ की तरह, विश्व-‘राजनीति में जन्म लिया, तब निश्चय ही न केवल ‘पराजित‘ बल्कि, लगभग हकाल कर बाहर कर दी गयी ‘औपनिवेशिक-सत्ता‘ के कर्णधारों की आँखें, इसकी ‘असफलता‘ को देखने के लिए बहुत आतुर थीं। चर्चिल की बौखलाहटों को व्यक्त करती हुई, तब की कई उक्तियाँ इतिहास के सफों पर आज भी दर्ज हैं। अलबत्ता, उनकी ‘अपशगुनी उम्मीदों‘ के बार-खिलाफ, जब-जब इस ‘महादेश‘ में संसदीय चुनाव हुए, तब-तब इस बात की पुष्टि काफी दृढ़ता के साथ हुई कि बावजूद ‘सदियों की पराधीनता‘ के, भारतीय-जनमानस में एक अदम्य ‘लोकतांत्रिक-आस्था‘ है, जो केवल उसके सोच भर में स्पंदित नहीं है, बल्कि, उसकी तमाम संस्थाओं में, वह लगभग ‘दहाड़ती‘ हुई उपस्थित है। कहने की जरूरत नहीं कि उसके ‘चौथे खंभे‘ में तो ‘नृसिंह‘ की-सी शक्ति है, जो सत्ता के पेट को चीर सकती है। आपातकाल में तो उसने यह पूरी शिद्दत से प्रमाणित कर दिया था कि न केवल ‘लिख कर‘ बल्कि इसके विपरीत ‘न लिखकर‘ भी वह अपनी आवाज को इस तरह बुलन्द कर सकती है, जो हजारों-हजार लिखे गए लफ्जों से कहीं ज्यादा प्रखर प्रतिरोध का रूप रख सकती है। सम्पादकीय की जगह खाली छोड़ने से ‘मौन की तीखी अनुगूँज‘ राष्ट्रव्यापी बन गयी थी।





बहरहाल, इन्दौर नगर में पिछले सप्ताह ‘गाँधी-प्रतिमा स्थल‘ पर कतिपय बुद्धिजीवियों ने देश भर के कोई बीस-बाईस हिन्दी समाचार पत्रों की एक-एक प्रति जुटाकर, तमाम अखबारों के द्वारा ‘अकारण‘ ही तेजी से किये जा रहे हिन्दी के हिंग्लिशीकरण बनाम ‘क्रिओलीकरण’ के जरिए, जिस ‘बखड़ैली भाषा‘ को जन्म देने में लगे है, उसके प्रति हिन्दी भाषाभाषी पाठकों की पीड़ा और प्रतिकार को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए, उनकी होली जलायी। निश्चय ही प्रतिकार की इस ‘प्रतीकात्मकता‘ से जो लोग असहमत थे, वे इसमें शामिल नहीं हुए। उनके पास अपने तर्क और अपनी स्पष्ट मान्यताएँ थीं, जबकि अखबारों की ‘होली‘ जलाने वालों के पास अपनी सिद्धान्तिकी थी। दोनों के पक्ष-विपक्ष में एक गंभीर विमर्श भी बन सकता था। 





बहरहाल, घटना छोटी-सी और निर्विघ्न सी थी, लेकिन भारतीय पत्रकारिता के विगत तिरेसठ साल के इतिहास में पहली बार घट रही थी। लेकिन देश के किसी भी हिन्दी अखबार ने (नईदुनिया को छोड़कर। हालांकि, जनसत्ता ने खबर तो नहीं, लेकिन, राजकिशोर के लेख में इस खबर को यथावत और विस्तार से दिया है।) यह खबर प्रकाशित नहीं की। इण्टरनेट के ब्लागों और ‘फेस बुक‘ पर अवश्य इस पर बहस के लिए अवकाश (स्पेस) निकला, लेकिन, आरंभ में उसका रूप जिस तरह की गंभीरता लिए हुए शुरू हुआ था, दूसरे दिन वह ‘भर्त्सना‘ और ‘भड़ास‘ की शक्ल अख्तियार कर चुका था। उसमें मनोरंजन और मसखरी भी शामिल हो चुकी थी। अतः पूरी बात विचार के दायरे से ही लगभग बाहर हो गयी। यहाँ यह बात गौर करने लायक है कि कदाचित् सम्पूर्ण हिन्दी समाचार-पत्रों ने, इस कार्यवाही को अपनी सत्ता के प्रति एक ‘बदअखलाक चुनौती‘ की तरह लिया है। हो सकता है समाचार-पत्रों ने, चूंकि वे समय और समाज में विचार के लिए वाजिब जगह बनाने की जिम्मेदारी अपने ही हिस्से में समझते हैं, अतः वे इस कार्यवाही के खिलाफ निस्संदेह ठोस बौद्धिक-असहमति रखते हैं। लेकिन प्रश्न उठता है कि जो समाचार पत्र, वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन, ’समय और समाज’ की खाल खींच कर उसमें नैतिकता का नमक डालने पर तत्पर रहता है, क्या वह तिरेसठ वर्ष के अपने जीवनकाल में मात्र एक दिन किसी एक शहर में अपने पाठक की असहमति और उसका प्रतीकात्मक प्रदर्शन तक बरदाश्त नहीं कर सकता? जबकि, वह इस महाकाय जनतंत्र की रक्षा का एक सर्वाधिक शक्तिशाली कवच है? क्या समूचा समाचार-जगत ’विचार’ के स्तर पर, व्यक्ति की सी स्वभावगत ’एकरूपता’ रखता है ? जबकि, वह व्यक्ति नहीं संस्था है। मुझे यहाँ याद आता है कि नेहरू के विषय में कहा जाता रहा है कि उनका अहम् काफी अदम्य था और वे अमूमन अपनी असहमति की अवमानना पर तिक्त हो जाते थे। एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है। ’टाइम्स आॅफ इण्डिया’ के तब के ख्यात सम्पादक मुलगांवकर प्रधानमंत्री आवास पर स्वल्पाहार हेतु आमंत्रित थे और जिस सुबह वे आमंत्रित थे, ठीक उसी दिन उन्होंने नेहरू तथा ’नेहरू-सरकार’ के विरूद्ध अपने अखबार में बहुत तीखी सम्पादकीय टिप्पणी छाप दी। लगभग आठ बजे प्रधानमंत्री-आवास से दूरभाष पर सूचना दी गयी कि किन्हीं अपरिहार्य कारणों से पूर्व में स्वल्पाहार के समय प्रधानमंत्री के साथ निर्धारित भेंट निरस्त की जा रही है। यह सूचना पाते ही श्री मुलगांवकर ने नेहरू को फोन किया कि ठीक है कि आज का सम्पादकीय आपके तथा आपकी सरकार के खिलाफ है, लेकिन इसका हमारे नाश्ते से क्या लेना-देना है ? 





बहरहाल, नेहरू ऐसे थे कि सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर रहते हुए भी ठिठक कर बुद्धिजीवियों द्वारा की गई अपनी आलोचना सुन सकते थे। कदाचित् उनके इसी जनतांत्रिक धैर्य को ध्यान में रखकर दुनिया भर की प्रेस उन्हें ’डेमोक्रेटिक प्राॅफेट’ के विशेषण से सम्बोधित भी करती थी।



बहरहाल, इन्दौर नगर में भारतीय समाचार पत्रों को उनकी भाषागत नीति को केन्द्र में रखकर उसके प्रतिरोध में होली जलाने वाली कार्यवाही को लेकर इतना आहत और क्रोधित नहीं होना चाहिए कि उनके द्वारा अकारण किये जा रहे क्रिओलीकरण के खिलाफ शुद्ध गाँधीवादी प्रतिकार की खबर को वे अपने पृष्ठों पर तिल भर भी जगह न दें। यह काम निश्चय ही सम्पादक का नहीं हो सकता। तो क्या हमारे समाचार-पत्रों में एक किस्म की ‘काॅरपोरेट सेंसरशिप‘ अघोषित रूप से आरंभ है ? जबकि, ठीक उसी दिन ‘दैनिक भास्कर‘ ने क्रिओलीकरण के विरूद्ध लिखी गयी मेरी तीखी टिप्पणी ससम्मान और प्रमुखता से छापी और ‘नईदुनिया‘ ने इसके दो दिन पूर्व ही ‘भाषा के खिलाफ हो रही साजिश को समझो‘ शीर्षक से हिन्दी के ‘क्रिओलीकरण‘ के खतरे की तरफ पाठकों नहीं, सम्पूर्ण हिन्दी भाषा-भाषियों को सचेत करने वाली उस टिप्पणी को एक ऐसी सम्पादकीय टीप के साथ प्रकाशित किया, जो ‘जन-आह्वान‘ के स्वर में थी। यह तथ्य दोनों ही अखबारों के ‘खुलेपन‘ और ‘जनतांत्रिक उदारता‘ के स्पष्ट प्रमाण हैं। तो अब प्रश्न यह उठता है कि क्या उनकी यह ‘उदारता‘ इतनी ज्वलनशील है कि प्रदर्शन की आँच की खबर से भस्म हो सकती है ? हाँ, राजनीतिक सत्ताएँ ‘विचार‘ को खतरा मानती हैं और उससे डरती भी हैं, लेकिन अखबर की ताकत तो ‘विचार‘ ही है। ‘विचार‘ तो उसके लगभग प्राण हैं ? फिर चाहे वे ‘सहमति‘ के रूप में हों, या ‘असहमति‘ के रूप में। मैं मानता हूँ कि आज हमारा समाज जितना ‘सूचना-सम्पन्न‘ हुआ है, उसके पीछे प्रमुख रूप से ‘लिखे-छपे शब्द‘ की बहुत बड़ी भूमिका है, ‘बोले गये‘ शब्द वाले माध्यम की तो प्राथमिकताएँ और प्रतिबद्धताएँ केवल मनोरंजन ही है। अतः मुझे उस माध्यम से कुछ नहीं कहना। वह अभी तक परिपक्व ही नहीं हो पाया है। अधिकांश का ‘समाचार-विवेक‘ तो साध्यकालीनों की सनसनी के समांतर ही है। वे ‘सचाई‘ के साथ फ्लर्ट (!) करते हैं। उनका ‘रिमोट‘ सच के किसी दूसरे ‘सनसनाते संस्करण‘ को बदलने का उपकरण है। लेकिन सुबह के दैनिक अखबार यह मानते हैं कि वह मालिकों का कम पाठकों का ज्यादा है। इसीलिए, यदि पाठकों का एक छोटा-समूह ‘संवादपरक प्रतिरोध‘ की संभावना के पूरी तरह निशेष हो जाने के बाद, यदि निहायत ही गाँधीवादी तरीके से अपना विरोध होली जलाकर प्रकट कर रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि समाचार-पत्रों में हो रही आयी उसकी आस्था का पूर्णतः से लोप हो गया है। गाँधीजी ने, जब विदेशी वस्त्रों की होली जलायी थी तो वे ‘वस्त्रोत्पादन‘ के विरूद्ध कतई नहीं थे। ना ही वस्त्र धारण करने के काम से उनकी आस्था उठ गयी थी। वे तो प्रतीकात्मक रूप से एक अचूक सूचना दे रहे थे कि हमें ‘औपनिवेशिक विचार‘ का विरोध करना है, जो वस्तुओं में शामिल है।





अंत में इन दिनों जिस ‘शक्ति-त्रयी‘ की बात की जा रही है, उसमें ‘सूचना‘ भी राज्य सत्ता के समानान्तर मानी जा रही है। ‘सूचना‘ का निर्माण और वितरण करने वाली दुनिया की चार पाँच संस्थाओं को ‘सत्ता‘ का सर्वोपरि रूप माना जा रहा है, क्योंकि वे ही ‘विश्वमत‘ गढ़ती या बनाती हैं। उनमें किसी भी मुल्क या उसकी सरकार को ध्वस्त करने की भी अथाह कुव्वत है, लेकिन वे अपने मुल्क के ‘प्रतिरोध की आवाजों‘ की अनसुनी नहीं करती वर्ना, नोम चाॅमस्की जैसे लोगों के विचारों की आहटें शेष संसार को सुनाई ही नहीं देती।




मुझे ब्रिटिश प्रधानमंत्री चेम्बर लेन के आक्सफर्ड विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में दिये गये उनके भाषण की याद आती है। उन्होंने कहा था, ‘आक्सफर्ड‘ ने हमें जब जब जैसा-जैसा करने को कहा हमने हमेशा ही ठीक वैसा-वैसा किया; लेकिन जब आक्सफर्ड को हमने अपने जैसा करने को कहा, उसने वैसा कभी नहीं किया और एक ब्रिटिशर की तरह मुझे इन दोनों बातों पर अपार गर्व है।




कुल मिलाकर चेम्बरलेन ने यही कहना चाहा हम ब्रिटिशर्स विचार के स्तर पर इतने उदार हैं हम अपनी प्रखरतम आलोचना का सम्मान करते हैं, लेकिन, हमें अपने मुल्क की बुद्धिजीवी बिरादरी पर भी गर्व है, जो असहमतियों को व्यक्त करने में भीरू नहीं है। किसी भी देश और समाज में भीरूता का वर्चस्व बौद्धिकों में व्याप्त होने लगे, तब शायद यह मान लेना चाहिए कि वह फिर से पराधीन होने के लिए तैयार हैं।




अंत में कुल जमा मकसद यही है कि लोहिया की विचारधारा में गहन आस्था रखने वाले श्री अनिल त्रिवेदी, तपन भट्टाचार्य और जीवनसिंह ठाकुर ने भारतीय भाषाओं के आमतौर पर तथा हिन्दी के क्रिओलीकरण (हिंग्लिशीकरण) को लेकर खासतौर पर एक शांत और नितान्त निर्विघ्न प्रदर्शन किया तो वस्तुतः वे निश्चय ही इसके दूरगामी खतरों की तरफ पूरे देश और समाज को चेतस करना चाहते हैं। वे ठीक ही कह रहे हैं ‘भाषा का प्रश्न‘ महज भाषा भर का नहीं होता, वह समूचे समाज को सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था का भी अनिवार्य अंग होता है। क्या हमें यह नहीं दिखाई दे रहा कि अमेरिका और ब्रिटेन ‘ज्ञान समाज‘ के नाम पर, मात्र अपने सांस्कृतिक उद्योग की जड़ें गहरी करने में लगे हैं। ‘कल्चरल इकोनॉमी‘ उनकी अर्थव्यवस्था का तीसरा घटक है, जो अँग्रेजी सीखने-सिखाने के नाम पर अरबों डाॅलर की पूंजी कमाना चाहते हैं। हिन्दी, यदि संसार की दूसरी सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा की चुनौतीपूर्ण सीमा लांघने को है, तब उसे एक धीमी मौत मारने के लिए उसका क्रिओलीकरण क्यों किया जा रहा है ? अभी षड्यंत्र की यह पहली अवस्था है, ‘स्मूथ डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि‘। अर्थात हिन्दी के शब्दों का चुपचाप अँग्रेजी के शब्दों द्वारा विस्थापन इसे सर्वग्रासी हो जाने दिया गया तो अंत में आखिरी प्रहार की अवस्था आ जाएगी और वह होगा, देवनागरी लिपि को बदलकर उसके स्थान पर रोमनलिपि को चला देना। यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि 5 जुलाई 1928 को ‘यंग इंडिया‘ में जब गाँधीजी ने लिखा कि ’अँग्रेजी साम्राज्यवादी भाषा है और इसे हम हटा कर रहेंगे’, तब गोरी हुकूमत अँग्रेजी के प्रसार प्रचार पर छः हजार पाऊण्ड खर्च करती थी (तब भी यह राशि बहुत ज्यादा थी)। गाँधीजी की इस घोषणा को सुनते ही उन्होंने लगे हाथ अँग्रेजी के प्रचार-प्रसार का बजट बढ़ा दिया। 1938 में बजट की राशि थी तीन लाख छियासी हजार पाऊण्ड। यदि अखबारों की होली जलाकर प्रकट किये गये इस विरोध के बाद हिन्दी के समाचार पत्रों मे भाषा के ‘क्रिओलीकरण‘ की गति तेज हो जाये तो यह स्पष्ट सूचना जायेगी कि भाषा संबंधी नीतियों के पीछे अँग्रेजी की ‘नवसाम्राज्यवादी‘ शक्तियाँ दृढ़ता के साथ काम कर रही हैं। 


4, संवाद नगर
इन्दौर



शनैः शनैः की जा रही है, जिसकी बिदाई




शनैः शनैः की जा रही है, जिसकी बिदाई
-प्रभु जोशी 






जिस चिन्ता को केन्द्र में रख कर यह लेख लिखा जा रहा है, उसकी पूर्व-पीठिका के रूप में यह थोड़ा ज़रूरी हो गया है कि हम पहले अपने समय के ‘निकट अतीत’ की तरफ, तनिक गरदन मोड़ कर देख लें, क्योंकि, हम सब जानते ही हैं कि हमारे ‘वर्तमान-समय‘ में हरदम हमारा ‘अतीत-समय’ भी मौजूद रहता है और वही हमारे ‘भविष्य के जन्म’ का जिम्मेदार भी होता है।




बहरहाल, बीसवीं सदी निश्चय ही मनुष्य की त्रासद पीड़ाओं और उसके स्वप्नों की बेछोर उड़ानों की थी, इसीलिए उसके बिदा होने के सिर्फ कुछ वर्षों पूर्व, समूचे मानव-जगत और उसके ‘भविष्य’ को प्रभावित करने वाली घटनाएँ, लगभग श्रृंखलाबद्ध ढंग से घटीं, जिनमें सबसे दुर्भाग्यशाली घटना थी, ‘विचारधारा का लोप’। उसी में उसके ‘पतन की पटकथा’ और ‘संभावनाओं का भाष्य’ मौजूद था, जो अब हमारे सामने बेलिहाज होकर आ रहा है, जबकि इक्कीसवीं सदी ने अभी अपनी उम्र के दस वर्ष भी पूरे नहीं किये हैं।





कहना न होगा कि अब सबसे बड़ी दिक्कत यही होती जा रही है कि हमारे ‘वर्तमान’ में, जिस भंगिमा के साथ ‘भविष्य’ प्रवेश करता चला जा रहा है, ‘विचारधारा के लोप’ के चलते हमारे लिए उसकी पुख्ता परख और पहचान ही काफी जटिल हो गयी है। ‘बाजार-निर्मित आशावाद’ का एक ऐसा विचित्र दुष्चक्र चल रहा है, जिसमें अब हमारा ‘सर्वस्व’ फँस चुका है। समय की ‘पारस्परिक‘संबद्धता’ दम तोड़ रही है। वह अवसान के निकट है। भूमण्डलीकरण की जन्मपत्री बनाने वालों के द्वारा लगातार यह सिद्ध किया जा रहा है कि यह युग ‘अनिश्चितताओं का है। इसलिए ’विचारधारा’ की बात फूहड़ और फिजूल है। यह ‘पैराडाइम-शिफ्ट’ है।



भूमण्डलीकरण के इस दौर में, पूँजी की ‘वक्र-गति’ से जन्मे ‘अनिश्चय’ के चलते, आज हर संस्था, व्यक्ति और अनुशासन के समक्ष एक निष्करूण संदेह खड़ा हो गया है कि कब वह किधर या कहाँ चला जायेगा, ‘निश्चित’ नहीं है। अभी-अभी जो ‘विराट’ बन कर सामने खड़ा है, वह कभी भी ‘वामन’ बन कर भीड़ में खो सकता है। उसकी तमाम शिनाख्तें यक-ब-यक गायब हो सकती हैं। अब सारे ‘यूटोपिया’, ‘डिस-टोपिया’ में बदल गये हैं। सारे ‘इज्मों’ को ‘वाज्मों’ में अवघटित कर दिया गया है। ‘विचार' और ‘आदर्श’ के भग्नावशेष में, एक निहायत ही विलम्बित रुदन है, जो उस प्रौढ़ पीढ़ी के रुँधे हुए गले से निकल रहा है, जिसे ‘माध्यम-निर्मित नियतिवाद’ ने पहले अपमानित और अंत में अपदस्थ कर दिया है।



दरअस्ल यह ‘सर्वसत्तावाद’ और ‘केन्द्रीय नियोजन’ की मिली-भगत से रची गयी, वह त्रयी है, जो ‘सूचना’, ‘समृद्धि’ और ‘हिंसा’ का नया समीकरण गढ़ रही है। जाहिर है कि अब यह किसी से छुपा नहीं रह गया है कि अब समूची सूचना-प्रौद्योगिकी इन्हीं के चाकरी या टहल में पूरे मनोयोग से लगी हुई है। यह त्रयी ही उसका एकमात्र एजेण्डा बन गया है।



बहरहाल, विडम्बना यही है कि आज हमारा समाचार-पत्र उद्योग इसी के बर्बर-बवण्डर के हवाले हो गया है। इसीलिए, उसके ‘रूप‘, ‘स्वरूप' और ‘अन्तर्वस्तु’ में अराजक उलट-पुलट तथा तोड़-फोड़ चल रही है। वह समाज को सूचना सम्पन्न बनाने की आड़ में ‘विचार‘ और ‘बोध’ के नये संकट की तरफ धकेल रहा है, जिसके परिणाम आने में अब अधिक समय नहीं रह गया है। अब अखबार पूरी तरह से महानगरीय सांस्कृतिक अभिजन को ही सम्बोधित है- उन्हीं के रहन-सहन, जीवन-मरण के प्रश्न ही अखबारों के पृष्ठों की अन्तर्वस्तु पर छाये हुए हैं।



बहुत स्पष्ट बात यही है कि बुनियादी रूप से पश्चिम की आवारा पूँजी, वहाँ की ‘कल्चर-इंडस्ट्री‘ (संस्कृति-उद्योग) को भारत के परम्परागत समाज और सांस्कृतिक स्वरूप को निगलने के लिए तैयार कर रही है। क्योंकि इसी में ही भूमण्डलीकरण की सफलता निहित है। यह कल्चर-इकोनामी का कार्यभार है कि उसने ‘सूचना’ और ‘संस्कृति’ को गड्डमड्ड करके चौतरफा एक ऐसे विचार भ्रम का निर्माण कर दिया है कि किसी को ‘सम्पट’ नहीं बैठ पा रही है कि वस्तुतः ये सब हो क्या रहा है? वे ‘तकनीकीवाद’ को ‘सांस्कृतिक-नियतिवाद’ में बदल रहे हैं। इसीलिए, हमारे तमाम भाषायी अखबार अपने को ऐसी सामग्री से अंधाधुंध तरीके से कूट-कूट कर भरे जा रहे हैं, जो अब ‘विचार’ नहीं, ‘वस्तुओं’ के लिए जगह बनाने के काम में इमदाद करती हैं। वह ‘युवा‘ और ‘जीवनशैली के महिमा-मण्डन’ पर एकाग्र है। भूमण्डलीकरण को लागू करने के काम में जुते होने के कारण इनके लिए अर्थशास्त्र अनालोच्य बन गया है। वह उम्मीदों का पर्याय है। जनतंत्र निवेश है और वह सबसे ऊँची बोली लगाने वाली के जेब में है। समाचार-उद्योग इस सारे तह-ओ-बाल में एक शक्तिशाली घटक की हैसियत से शामिल हो चुका है। वह भी पूँजी के प्रवाह पर नौकायन करना चाहता है।



निश्चय ही ऐसे में उनके लिए अखबार में लगभग ‘आत्मा‘ की तरह मौजूद ‘सम्पादकीय संस्था’ को धीरे-धीरे अवसान की तरफ धकेलना जरूरी हो गया है। क्योंकि, अखबार के पृष्ठ पर कोने में छोटी-सी जगह में बैठा हुआ, वह गाहे-ब-गाहे अड़ जाता था कि मैं यह नहीं होने दूँगा । मैं वो नहीं होने दूँगा। वह उसी जगह खड़े हो कर रोज-रोज सम्पादक की आवाज में बोलता था, उसे सुन कर लगता था, वहाँ से राष्ट्र बोल रहा है, वहाँ से हजारों-हजार लोगों की आवाजें उठ रही हैं। वहाँ से ‘मूल्य’ और ‘आदर्श’ बोल रहे हैं। वहाँ से एक निर्भीक दहाड़ उठा करती थी, जो ‘विचार‘ या ‘विचारधारा’ के साहचर्य से उस सबको भयभीत करती थी, जो ‘अनैतिक’ या ‘मूल्यहीन’ और जनकल्याण से दूर था। उसकी दहाड़ की अनुगूंज अखबार के हर पन्ने पर बरामद होती थी। उस जगह की दहाड़ से ‘भय’ उपजता था। एक दिन यह तक हुआ कि उसके वहाँ से चुप हो जाने से भी सत्ता ‘भयभीत’ हो उठी। सम्पादकीय पृष्ठ की वह जगह खाली छोड़ देने से भी ‘विचार‘ की भय पैदा करती अनुगूँज देखी गयी। उस चुप्पी पर भी तलवारें खिंची। क्योंकि, तब अखबार का कागज, छपाई, स्याही मशीनें सब मालिक के थे, लेकिन अखबार जितना सम्पादक का था, उतना मालिक का नहीं। मालिक ने अपने अखबार को हिन्दी का अखबार नहीं, बल्कि अंग्रेजी के पाठकों की नर्सरी में बदलने के लिए उसमें भाषा का खतरनाक घालमेल शुरू कर दिया है।




कहना न होगा कि अब अखबार, सम्पादक का नहीं रहा गया है। उसके बौद्धिक वर्चस्व से मुक्त वह सिर्फ पाठक का है। ‘पाठक’ का भी नहीं, बल्कि उस ‘उपभोक्ता’ का जिसने ग्राहक बनते समय कुर्सी, टी-सेट, सिनेमा के टिकट या कोई अन्य सामान मुफ्त में पाया है। इसलिए फूल की पुड़िया के साथ सुबह-सुबह घर के दरवाजे से भीतर फेंक दिये गये इस ‘दैनंदिन-उत्पाद’ की उत्तरजीविता उसके छपने के साथ ही समाप्त हो चुकती है और कहने की जरूरत नहीं कि सम्पादक की हत्या इसी ‘पाठक बनाम ग्राहक’ ने की है। अब अखबार को भी सम्पादक नहीं चाहिए। उसे अब उत्पादन और वितरण के साथ ‘रेवेन्यू-जेनरेट’ करने वाला करिश्माई कारिन्दा चाहिए, जिसे पाठक नहीं ‘उपभोक्ता’ की रूचि को बदलते हुए, ऐसी रूचि का निर्माण करना है, जो पश्चिम के सांस्कृतिक मालों व जीवनशैली को स्वीकार ले। वे उन सूचना सम्राटों के अनुयायी बन रहे हैं, जो ‘सूचना‘ और ‘संस्कृति’ का घालमेल करके, तीसरी दुनिया में अपनी जीवन शैली बेचने के कारोबार में लगे हैं, जो ‘रिंग-काम्बीनेशन’ की तरह ख्यात हैं। ये हैं जर्मनी की ‘वुल्फ’, ‘ब्रिटेन की ‘रायटर’, अमेरिका की ‘न्यूज कार्पोरेशन’। वे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भेज कर हमारे समाचार उद्योग को ‘वैचारिक विकलांग’ बना रही हैं। वे सामाजिक आर्थिक और राजनीति के क्षेत्र की ऐसी सूचनाएँ देती हैं, जो न सच होती हैं, न झूठ-बल्कि, सिर्फ विश्वसनीय होती हैं। जिन पर तीसरी दुनिया के लोगों के पास विश्वास करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता।




तो कुल जमा मकसद यह कि अखबार से सम्पादक की बिदाई ऐसे ही नहीं हो रही है। यह शनैः शनैः एक चतुर प्रविधि के जरिये हुआ है। पहले सम्पादक को विदीर्ण करके दो टुकड़े किये। सम्पादक इकाई नहीं रह गया। वह ‘समाचार-सम्पादक’ और ‘विचार-सम्पादक’ में बँटा। वे दोनों टुकड़े एक-दूसरे के विरोधी हो गया। यह नयी ‘डायकाटमी’ (द्वैत) बनी, जिससे एक के जरिये सत्ता या व्यवस्था पर चोट की जाती, दूसरे से प्राथमिक चिकित्सा। यह दायें और बायें हाथ की पृथक-पृथक मुद्रा थी। अब अखबार के लिए अभीष्ट ‘सत्य‘ नहीं ,संतुलन था। वह वर्ग और वर्ग, सम्प्रदाय और सम्प्रदाय तथा अंत में राजा और प्रजा के बीच बनाने का काम करने लगा। ‘सम्पर्क’ और ‘विनिमय’ उसके दो नये दायित्व हुए। बाद इसके ‘सम्पादक’ चुनाव के मौसम में पन्ना-पन्ना पैसा-पैसा हुआ। हर पृष्ठ यानी अलग-अलग जोतदारों का रकबा। वे उपजायें और फसल मालिक को दें। कुछ, ‘वे‘ खुद भी रख लें। अब जमींदार वाली कृपण और क्रूरता के बजाय सेठ की उदारता। पन्ना-पन्ना पैसा बरसा।




नतीजतन, अब अखबार के पास सम्पादक नहीं है, अखबारी कर्मचारियों की एक बेचेहरा फौज है, जो सूचना के निर्माण, वितरण और प्रबंधन में सुंदर, सुखद और मनोरंजन के कारोबार को बढ़ाने में जोत दी गयी है। वे सूचना के प्रवाह नहीं, पूँजी के प्रवाह को लाने और बनाने के लिए अनुबंधित श्रमजीवी हैं। वे सचाई के साथ कितना फ्लर्ट कर सकते हैं, यही उनकी सम्पादकीय (?) कुव्वत को आँकने का असली पैमाना है। वहाँ, वही योग्य है, जो तुक्कड़ बुद्धि से हुए एक भयानक खबर का शीर्षक ऐसे बनायें कि वह खबर मनोरंजन में बदल जाये। खबर ठहाका बन जाये, मजा बन जाये, फन बन जाये। जरूरी और जायज गुस्से को मसखरी से नाथ सके। जिस तरह कहा गया कि गाँव के कल्याण के लिए कुल का त्याग जरूरी है, उसी तरह अब जरूरी है, अखबार के कल्याण के लिए सम्पादक का त्याग।




हकीकतन, अब वहाँ सम्पादक नहीं है और ना ही उसकी दहाड़। वहाँ से अब कोई दहाड़ सुनायी नहीं देती। वहाँ स्वर नहीं, दृश्य है। एक अदृश्य हो चुकी नस्ल का भाँय-भाँय करता दृश्य। वहाँ अब कोई शेर नहीं, किन्तु शेर की भूसा भरी खालें हैं। यह क्षेत्रीय ‘प्रेस‘ नहीं, सिर्फ ‘रेस‘ है। व्यावसायिक-स्पर्धा के बजाय, एक-दूसरे को मरने या मिटाने के लिए लपलपाती ईर्ष्या।





मच्छरदानी, जिस तरह मच्छर बाहर और दूर रखती है, ठीक उसी तरह अखबार सम्पादक को दूर और बाहर रखने के लिए है। बावजूद इसके यदि वह अंदर आने की आकांक्षा का शिकार है- तो अब वहाँ सम्पादक के चोले में प्रवेश निषेध है। वह स्तंभकार के गणवेश में आ सकता है। कभी-कभार, हफ्ते-पन्द्रह दिन में। उनके लिए उसका ‘प्रतिष्ठा मूल्य’ काम का है, ‘प्रतिबद्धता मूल्य’ नहीं। उन्हें सिद्धान्त बघारने वाले किसी समाजशास्त्री की तरह पेश आने पर आपत्ति होगी। क्योंकि, सिद्धान्त अखबार के पेट के लिए अपाच्य हैं। सिद्धान्त की मूलियों की डकारें उठाती हैं। स्पष्ट है कि उन्हें सिद्धान्त नहीं चाहिये। फण्डे चाहिये। फण्डे प्रबंधन के। अध्यात्म के। राजनीति के। दुनियादार किस्म की सफलता हासिल करने के। सफलता भी समाज की नहीं, सिर्फ व्यक्ति की।




नहीं जानता कि देश में सम्पादकों की नई-पुरानी नस्ल इस हकीकत को कैसे लेती और देखती है, लेकिन यह तो वह चाह ही रही होगी कि उनकी नस्ल को उन्होंने अपने सामने दम तोड़ते देखा और कुछ भी नहीं किया, इस लांछन से बचने की कोशिश करती हुई वह दूर और मूक बनी टकटकी लगाकर देखती हुई असहाय खड़ी है। पता नहीं उसके हाथ उठना चाहते हैं, प्रार्थना में, पीड़ा में या कि असहाय हो जाने की निराशा में।


4, संवाद नगर, इन्दौर




पाठकों की अदालत में अपने दोषी या निर्दोष होने की अपील

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आतंकवादी ऐसे बनाती है पुलिस



मुझे इस बात के लिए माफ किया जाए कि मैं कई बार अपने खिलाफ चल रहे मामले की चर्चा कर चुका हूँ । मामला अब भी अदालत में हैं और वहाँ जो फैसला होगा सो होगा, मैं अपने पाठकों की अदालत में अपने दोषी या निर्दोष होने की यह अपील कर रहा हूँ ।


2005 के फरवरी महीने में दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी थाने में मेरे खिलाफ एक मामला दर्ज हुआ था एफआईआर कहती है कि हेड कांस्टेबल मोहम्मद लोनी और हेड कांस्टेबल सलीम डिफेंस कॉलोनी क्षेत्र का दौरा कर रहे थे। वहाँ एक सिंह न्यूज एजेंसी पर उनकी नजर सीनियर इंडिया नामक पत्रिका पर पड़ी जिसके मुख पृष्ठ पर बापू की वासना शीर्षक से एक लेख छपा था। सलीम और लोनी को एफआईआर के अनुसार बहुत उत्सुकता हुई और उन्होंने पत्रिका पढ़ना शुरू कर दिया। अंदर सातवें पन्ने पर नीचे एक तीन पैराग्राफ का लेख था जिसका शीर्षक था `अपने अपने भगवान', जिसमें एक छोटी-सी फोटो भी छपी थी जिसमें पगड़ी पर पटाखा  बना हुआ था।


एफआईआर के अनुसार फोटो बहुत छोटा था लेकिन फिर भी इन गुणी हवलदारों ने पढ़ लिया कि पगड़ी के माथे पर कुरान की पहली आयत ला इलाह इल्लिलाह, या रसूल अल्लाह अरबी भाषा में लिखा है। दिल्ली पुलिस में अरबी भाषा के इतने विद्वान को सिर्फ हवलदार बना कर रखा गया है। यह हैरत की बात है एफआईआर कहती है कि कार्टून छापना मुस्लिम समुदाय का अपमान करना है और लेख की भाषा भी मुस्लिम संप्रदाय के खिलाफ है। इसलिए यह धारा 295 के तहत किया गया गंभीर अपराध था। इसकी सूचना सब इंस्पेक्टर के पी सिंह को दी गई और के पी सिंह ने थाने से एक बजे रवानगी डाल कर 22 फरवरी 2006 को खुद डिफेंस कॉलोनी में यह पत्रिका देखी और अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी दी। वरिष्ठ अधिकारी यानी दिल्ली पुलिस के पुलिस आयुक्त डॉक्टर कृष्ण कांत पॉल तैयार बैठे थे। उन्होंने तुरंत दिल्ली के उप राज्यपाल के नाम एक संदेश बनाया जिसमें पत्रिकाएँ जब्त करने और संपादक यानी मुझे गिरफ्तार करने की अधिसूचना जारी करने का अनुरोध था। अधिसूचना फौरन जारी कर दी गई और इसे श्री पॉल ने गृह मंत्रालय से भी जारी करवा दिया। 


मेरे जिस लेख पर मुस्लिम भावनाएँ भड़कने वाली थीं, उसके तीन पैरे भी लगे हाथ पढ़ लीजिए। मैने लिखा था- हाल ही में पैगंबर हजरत मोहम्मद जो इस्लाम के संस्थापक हैं, के डेनमार्क में कार्टून प्रकाशित होने पर बहुत हंगामा और बहुत जुलूस निकले। इस अखबार ने इसके पहले जीसस क्राइस्ड के कार्टून छापने से इंकार कर दिया था क्योंकि उसकी राय में यह आपत्तिजनक हैं। 


इसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का बयान आया जिसमें कहा गया कि वे डेनमार्क के साथ है और यूरोप तथा अमेरिका मे रहने वाले सभी इस्लाम धर्म के अनुयायियों को स्थानीय जीवन शैली और रिवाज मानने पड़ेंगे। सिर्फ इस बयान से जाहिर हो जाता है कि अमेरिका के असली इरादे क्या है? अमेरिका अपने स्वंयभू बुद्विजीवियों की मदद से संस्कृतियों के टकराव का सिद्वांत प्रचारित करने में लगा हुआ है और इस तरह के बयानाें के बाद किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए कि और भी जगह चिंगारिया भड़के। तथ्य यह है कि धर्म का मूल प्रश्न तेल और जमीन के मामले से हट कर अब धर्म के मूल आधार का माखौल उड़ाने पर आ कर
टिक गया है और स्वाभाविक है इस्लामी शक्तियां इसे पसंद नहीं करेगी। यह ठीक है कि किसी भी धर्म की महानता इस बात में निहित है कि वह मजाक को कितना सहन कर सकता है मगर यदि कोई धर्म या उसके अनुयायी इसे मंजूर नहीं करते तो उन्हें अपने रास्ते छोड़ देना चाहिए। 


यह वह लेख था जिसे इस्लामी भावनाए आहत करने वाला बताया जा रहा था। रातों रात मुझे गिरफ्तार किया गया, रात को तीन बजे तक पूछताछ की गई। पूछा गया कि डेनमार्क वाला यह कार्टून कितने में और कहां से खरीदा था? पूछने वाले एक पढ़े लिखे आईपीएस अधिकारी थे जिन्हें पता था कि इंटरनेट पर चार बटन दबाने से सारे कार्टून सामने आ जाते हैं और इन पर कोई कॉपीराइट नहीं है। मगर साहब तो बड़े साहब यानी के के पॉल का हुक्म बजा रहे थे और पॉल इसलिए दुखी थे क्योंकि हमने उनके वकील बेटे को दिल्ली पुलिस द्वारा वांछित तमाम अभियुक्तों को अदालत में बचाते और औकात से कई गुनी ज्यादा फीस वसूलते पकड़ लिया था।


तिहाड़ जेल में बारह दिन बंद रहने के बाद जमानत मिली और जमानत के आदेश में एक एक पैरा पर टिप्पणी की गई थी कि इससे कोई मुस्लिम भावना आहत नहीं होती। मगर पॉल तब भी दिल्ली पुलिस के आयुक्त थे और उनके आदेश पर जमानत रद्द करने की अपील की गई जो अब भी चल रही है। दिलचस्प बात यह है कि एफआईआर लिखवाने के लिए भी के के पॉल दो मुस्लिम हवलदारों को ले कर आए। अदालत में कहा गया कि इस लेख पर दंगा हो सकता है इसलिए अभियुक्त यानी मुझे सीधे तिहाड़ जेल भेज दिया जाए। यह सब गृह मंत्री शिवराज पाटिल की जानकारी में हो रहा था और यह बात खुद पाटिल ने बहुत बाद में अपने घर मेरे सामने स्वीकार की। संसद में सवाल किया गया मगर कोई जवाब नहीं मिला। कई पेशियाँ  हो चुकी हैं। एक सीधे सपाट मामले में चौदह जाँच अधिकारी बदले जा चुके हैं। जो चार्ज शीट दाखिल की गई है उसे अदालत ने बहस के लायक नहीं समझा। सबसे गंभीर धारा 295 उच्च न्यायालय ने पाया कि इस मामले में लागू ही नहीं होती। मगर मामला चल रहा है। 


मकबूल फिदा हुसैन के खिलाफ बहुत सारे मामले इन्हीं धाराओं में चले और खारिज होते रहे। हुसैन का बहुत
नाम हैं और उनका एक दस्तखत लाखों में बिकता है। मगर निचली से ले कर उच्च न्यायालय तक अब तक लाखों रुपए मैं अदालती ताम झाम में खर्च कर चुका हूँ । अब तो उच्च न्यायालय ने उस मामले को जिसमें मेरी गिरफ्तारी इतनी अनिवार्य मानी गई थी, साधारण सूची में डाल दिया है जिसमें तारीख दस साल बाद भी पड़ सकती है। आप ही बताए कि भारत की न्याय प्रक्रिया में मेरा विश्वास क्यों कायम रह जाना चाहिए? अभी तक तो कायम हैं लेकिन न्याय के नाम पर सत्ता और प्रतिष्ठान जिस तरह की दादागीरी करते हैं उसी से आहत और  हताश हो कर लोग अपराधी बन जाते हैं। 


दिलचस्प बात यह भी है कि मुझ पर इस्लाम के खिलाफ मामला भड़काने का आरोप लगा था। फिर भी तिहाड़ जेल में मुझे उस हाई सिक्योरिटी हिस्से में रखा गया जहाँ जैश ए मोहम्मद और लश्कर ए तैयबा के खूंखार आतंकवादी भी मौजूद थे। ईमानदारी से कहे तो आतंकवाद के आरोप में बंद ये लोग पुलिस से ज्यादा इंसानियत बरतते नजर आए और उन्होंने बहुत गौर से मेरी बात सुनी और अपने साथ बिठा कर खाना खिलाया। फिर भी भारत सरकार का मैं अभियुक्त हूँ । उस सरकार का जो उस संविधान से चलती हैं जहाँ  अभिव्यक्ति की आजादी और न्याय नागरिक का मूल अधिकार है।

आलोक तोमर 

आस्ट्रेलिया में हिन्दी पत्रकारिता


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साभार - मीडिया स्कैन

श्रद्धेय प्रभाष जोशी : भस्‍म और अस्थिरूप में : हरिद्वार





भस्‍म की रस्‍म और पुनर्जन्‍म की आस
कमलकांत बुधकर




आज आख़िरी रस्‍म हो गई,
सबके मन में टीस बो गई ।
आज आख़िरी रस्‍म हो गई ।


भस्‍मरूप में शेष बची जो देह,
वह भी गंगाजल में बहकर
शेष हो गई।

आज आख़िरी रस्‍म हो गई।

किन्‍तु मुझे विश्‍वास,
लौट वे फिर आएँगे।
पुनर्जन्‍म के बाद
पखेरू उस आत्‍मा के
धरा गगन के बीच उड़ेंगे
नवजीवन ले,
फिर नाचेंगे, फिर गाएँगे,
हम सबके प्रिय
श्रीप्रभाष जी फिर आएँगे
नवल रूप में ।।




श्रद्धेय प्रभाष जोशी आज भस्‍म और अस्थिरूप में हरिद्वार के पावन हरकी पौड़ी गंगाघाट पर लाए गए। उनके दो अस्थिकलश प्रभाष जी के छोटे भाई सुभाष जोशी और पुत्र सन्‍दीप जोशी के हाथों में थे।


साथ में थे उदास और निढाल परिजन जिनमें आदरणीया भाभीश्री उषा प्रभाष और प्रभाष जी के छोटे पुत्र सोपान, पौत्र माधव, पौ्त्री मूमल और छोटे भाई गोपाल जोशी सहित अनेक परिजन तथा वरिष्‍ठ पत्रकार श्री रामबहादुर राय भी थे।


हरिद्वार के गंगाघाट पर प्रभाष जी के सैकड़ों प्रशंसक भी उपस्थित थे।















कमलकांत बुधकर 

हरिद्वार से 






















धरती पर भगवान्


धरती पर भगवान्



गत दिनों देवबंद में फतवे की घटना के साथ जोड़ कर  रामदेव जी की आलोचना करने वालों को एक आधार मिल गया था|  पहले भी कुछ लोग आलोचना, निंदा और दुष्प्रचारात्मक गतिविधियाँ करते रहें हैं, जिन्हें इस रूप में देखा जाना चाहिए कि व्यक्ति जितना व जैसे जैसे आगे बढ़ता है,  ऊर्ध्वगति से लोकप्रिय होता जाता है, विशिष्ट होता चला जाता है अथवा जिसे "पब्लिक फिगर" बनना भी  कहा जाता है, उतनी ही गति व प्रमाण से (बल्कि कई बार तो उससे अधिक तीव्रता व अनुपात में ) उसके शत्रु, यशहन्ता, निंदक, गतिरोधी, दुष्प्रचारक,  ईर्ष्या करने वालों में वृद्धि होती चली जाती है| यह एक सामान्य सर्वमान्य, लौकिक परिपाटी और रीत-सी ही है|  अस्तु |


लेखक व प्रख्यात भाषावैज्ञानिक प्रोफ़ेसर सुरेश कुमार जी की कलम से प्रसूत यह लेख  पढ़ने और विचारने की दिशा देता है कि  हम अपने लिखते बोलते समय कब व कहाँ  सतर्क  रहें और  कब क्या परखें देखें | लेख  १३ नवम्बर २००९ के जनसत्ता से साभार लिया गया |


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अपने आपसे पूछिए : कुछ दिन बाद ही सही (How dare China...)

एक दिन बाद ही सही
प्रभाष जोशी



पंद्रह अगस्त के दिन मैं अपने से पूछता रहा कि अपना देश और अपनी आज़ादी क्या इतनी भुरभुरी और रेतीली है कि चीन जैसा पडोसी देश चाहे तो हमें तीस-पैंतीस टुकड़ों में तोड़ के रख दे? हम क्या सचमुच मिट्टी के माधो हैं कि जो चाहे हमें बनाए-बिगाड़े और हम उसके हाथों में लोंदे बने पड़े रहें? बहुत चाहकर भी अपने को ऐसा दयनीय मैंने तो नहीं पाया। फिर क्यों मान लेते हैं कि हमारी एकता-अखंडता में कोई दम नहीं है। हम यों ही सवा सौ करोड़ लोग एक भौगोलिक परिस्थितियों में साथ रह रहे हैं। भूमि,संस्कृति,इतिहास और परंपराएँ हमें बाँधती नहीं। जैसे हम निरीह पशुओं के समूह हों और जिसके पास ताक़त हो हमें हंकाल कर ले जाए। अपने बाड़े में बाँधे या चरने को छुट्टा छोड़ दे। इधर-उधर हुए भी तो हम फिर एक रेवड़ में आ खड़े होंगे।



हम राष्ट्र नहीं हैं और हमारे पास ऐसा कुछ नहीं है जो हमें एक बनाकर रखे, ऐसा कभी अँग्रेज़ माना करते थे। अपने मानने को सही साबित करने के लिए हमारे अंदर के भेदों को वे तिल का ताड़ बनाकर दिखाते थे। इससे कुछ तो उनका संतोष होता था और कुछ यूरोपीय दंभ का कि उनके सवाय सभ्यता और संगठित-व्यवस्थित मानव समाज संभव नहीं है। यूरोप के इन देशों ने दूसरों को सभ्य करने के नाम पर एशिया, अफ्रीका और लेटिन अमेरिका में अपने साम्राज्य कायम किए और उन्हें लूटकर विकसित और समृद्ध देश बने। फिर भारत में एक नंगा फकीर खड़ा हुआ और निहत्थे ही उसने बलशाली साम्राज्यों को यूरोप में सिमटने को मजबूर कर दिया। वे फिर भी मानते रहे कि कब तक भारत आज़ाद और एक रहेगा। बिखरेगा और हमें फिर बुलाया जाएगा। और हम फिर उसके लोगों का उद्धार करेंगे।


बासठ साल हो गए उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई। अब चीन की इच्छा जगी है कि वह पुराने साम्राज्यवादियों की जगह ले। भारत को खंड-खंड करने में सहायक हो और इतिहास को क्रम पूरा करते देखे। चीन बेचारा साम्यवादी देश है। यूरोप के पूँजीवादी-साम्राज्यवादी देशों की तरह विस्तारवादी नहीं है। लेकिन ऐतिहासिक प्रक्रिया के अनवरत् और अटूट चलते रहने के मार्क्सवादी सिद्धांत को मानता है। हमेशा ही इतिहास का निमित्त बनने के लिए तैयार रहता है। अब उसे लग रहा है कि भारत तीस से पैंतीस टुकड़ों में बिखरने को बेताब है। हिमालय के पार से उसे धक्का भर देना है। इतिहास अपना काम करेगा। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, बर्मा, श्रीलंका आदि से भी छोटा हो जाएगा। तब फिर पूरे एशिया और फिर संसार में इतिहास चीन की इच्छा पूरी करेगा। जो इतिहास की इच्छा पूरी करता है उस देश की मनोकामना पूरी करने का जिम्मा खुद इतिहास लेता है। महाकाल अपने सेवक को कभी निराश नहीं करता।


चीन ने सन बासठ में जब भारत से लगी अपनी सीमाओं को ठीक करने की शांतिपूर्ण कार्रवाई की थी तो अपने यहाँ ऐसे सच्चे कम्युनिस्ट हुआ करते थे जिनके लिए अंतरराष्ट्रीय साम्यवाद भारत नामक राष्ट्र से ज़्यादा ज़रूरी और महत्वपूर्ण था। वे मानने को तैयार थे कि आक्रामक तो भारत है जिसने चीन की पवित्र लाल पुण्यभू पर नाजायज़ कब्ज़ा कर लिया है। साम्राज्यवादी अँग्रेज़ों ने जो सीमाएं मनमाने ढंग से खींच रखी थीं उन्हें आज़ाद होते ही भारत को खुद ठीक कर देना चाहिए था। नहीं की तो चीन ने उन्हें सुधारकर भारत पर उपकार ही किया है। वे सच्चे कम्युनिस्ट सोवियत संघ के विघटन और चीन के नवउदार पूँजीवादी कम्युनिस्ट तानाशाही के साथ इतिहास की शरण में चले गए हैं। इसलिए वेबसाइट पर प्रकट हूई चीन की मनोकामना का स्वागत करने वाला भारत में कोई नहीं है। माओवादी अब भी भारत के आदिवासी इलाकों में सशस्त्र क्रांति करने में लगे हुए हैं, पर उन्हें विश्वास नहीं है कि चीन में माओ को मानने वाला कोई बचा है या नहीं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का राज पश्चिम बंगाल में अब भी चल रहा है और वे अब भी चीन को अपना चेयरमैन नहीं तो सहोदर तो मानते ही हैं. लेकिन अकेली ममता बनर्जी ने उनकी नाक में दम कर रखा है इसलिए विदेशी मामलों पर ध्यान देने की उन्हें फुरसत नहीं है। चीन की मनोकामना इसलिए बिना समर्थन के भारत के दरवाज़े पर भय की तरह लटकी हुई है।


लेकिन अब दूसरे किस्म के भयवादी भारत में सक्रिय हैं। इन लोगों को तालिबान भारत के माथे पर चढ़े हुए दिख रहे हैं। श्रीलंका की क्रिकेट टीम पर लाहौर में हमला हुआ तो ये लोग बताने लगे कि अमृतसर से लाहौर कितनी दूर है। तालिबान जब लाहौर पहुँच गए तो वाघा सीमा पार करने में उन्हें कितना वक्त लगेगा? जैसे जिस तरह पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजंसी आईएसआई तालिबान और अलकायदा की मददगार है वैसे ही भारत की सेना और उसके लोग तालिबान का स्वागत करने को उठ खड़े होंगे। तब भारत को कौन बचाएगा? अमेरिका बचाएगा और कौन? उसी ने इराक की जनता को सद्दाम हुसैन से बचाया और अफगानिस्तान को तालिबान से। वही पाकिस्तान को तालिबान और अल कायदा से बचा रहा है। भारत को भी सबसे बड़ा ख़तरा पाकिस्तान और उसके बनाए आतंकवादी संगठनों से नहीं, तालिबान से है। वही पाकिस्तान को एक राष्ट्र के नाते नष्ट करने पर तुले हुए हैं। पाकिस्तान के बाद वे भारत को पाकिस्तान का साथ देकर तालिबान को ख़त्म करने में अमेरिका के साथ होना चाहिए।


यानी हमारे देखते-देखते और हमारे अणुशक्ति संपन्न देश होते हुए भी तालिबान हमारा सबसे बड़ा शत्रु हो गया। वह हमारे माथे पर पाकिस्तानी पंजाब और सिंध में आकर बैठ गया है। उसे रोकने में हम अगर पाकिस्तान की मदद नहीं करेंगे तो वह हमें भी लील जाएगा। जैसे हम अफगानिस्तान और पाकिस्तान से भी गए गुज़रे हों। किसने हमें समझा दिया कि हम पाकिस्तान से निपट नहीं सकते? पाकिस्तान ने? वह हमें क्या समझाएगा? हम उसे तीन बार समझा चुके हैं। फिर किसने हमें समझा दिया कि तालिबान हम पर पाकिस्तान से भी बड़ा ख़तरा है? अमेरिका ने? वही कमज़ोर देशों का रक्षक है और आतंकवाद से उसने विश्वयुद्ध छेड़ रखा है। तालिबान अल कायदा के बाद सबसे बड़ा और आतंकवादी संगठन है। भारत पर लगातार हमले करने वाले आतंकवादी संगठन पाकिस्तान के किए में नहीं हैं। वे तालिबान और अल कायदा के कहे भारत पर हमले करते हैं। पाकिस्तान तो खुद इन आतंकवादियों का शिकार है। भारत से भी बड़ा शिकार। इसलिए भारत को आतंकवादी हमलों के लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार मानने के बजाय तालिबान और अल कायदा को मानना चाहिए। जिस तरह पाकिस्तान इन आतंकवादियों से निपटने में अमेरिका की मदद कर रहा है, वैसे ही भारत को भी करनी चाहिए। आतंकवादी हमलों से उसे छुटकारा अमेरिका ही दिलवाएगा।


जैसे सन बासठ में सच्चे भारतीय कम्युनिस्ट चीन के साथ थे वैसे ही आतंकवाद के सच्चे शत्रु भारतीय अमेरिका के साथ हैं। दूसरे महायुद्ध में फासीवाद के विरुद्ध असली लड़ाई स्तालिन का रूस लड़ रहा था इसलिए भारतीय कम्युनिस्ट-भारत छोड़ो-आंदोलन के खिलाफ़ अँग्रेंज़ो की मदद कर रहे थे। तब फासीवाद से यूरोप की लड़ाई उनके लिए भारतीयों की अँग्रेज़ों से लड़ाई से ज़्यादा बड़ी और महत्वपूर्ण थी। आज अपने देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो आतंकवाद से अमेरिका के विश्वयुद्ध को भारत की पाकिस्तान प्रेरित आतंकवादी लड़ाई से ज़्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं। चूँकि अमेरिका को पाकिस्तान का पूरा सहयोग चाहिए, ये लोग भारत को कहते हैं कि पाकिस्तान से फालतू का झगड़ा छोड़ो और दोनों मिलकर अमेरिका की मदद करो। अमेरिका की नज़र में और हित में तालिबान से लड़ाई सबसे महत्वपूर्ण है इसलिए वह चाहता है कि भारत पाकिस्तान आपस में लड़ने के बजाय एक होकर अमेरिका के साथ तालिबान से लड़ें। इसलिए भारत ने भले ही घोषणा कर रखी हो कि जब तक पाकिस्तान मुंबई पर हमला करने और करवाने वालों को सज़ा नहीं देता, हम उससे बात नहीं करेंगे। अमेरिका भारत से कहता है कि मुंबई के हमलावरों को हम सज़ा दिलवाएंगे, आप पाकिस्तान से बात करो।


भारत ने न सिर्फ पाकिस्तान से बात करना शुरू किया, अमेरिका के पाकिस्तान को मनाने की कोशिशों में मददगार होना भी मान लिया है। शर्म-अल-शेख़ में बलूचिस्तान पर बात करने को भी भारत राज़ी हो गया, क्योंकि पाकिस्तान कह रहा था कि मुंबई के हमलों में हमारा हाथ होना आपने मनवाया है तो बलूचिस्तान में भारत का हाथ मनवाइए ताकि हम अपनी जनता को कह सकें कि वहाँ भारत उपद्रव करवा रहा है। भारत बलूचिस्तान में उपद्रव करवा रहा है कि नहीं इसे भारतवासी नहीं जानते। लेकिन अमेरिका के दबाव में उसने बलूचिस्तान का जिक्र करना मान लिया। तीन दिन संसद में हंगामा होता रहा. मनमोहन सिंह बार-बार बयान देते रहे। लेकिन वे देश के गले नहीं उतार सके कि शर्म-अल-शेख़ में उनने बलूचिस्तान का ज़िक्र साझा बयान में क्यों आ जाने दिया। भारत का अगर बलूचिस्तान में कोई हाथ नहीं है तो वहाँ के उपद्रव पर पाकिस्तान से हम बात क्यों करेंगे? सरकार की एक भी बात देश के गले नहीं उतरी। सब मानते हैं कि बलूचिस्तान का पत्थर अमेरिका ने नाहक भारत के गले में लटकवा दिया है क्योंकि वह भारत से बराबरी के पाकिस्तानी आग्रह को मानता है।


बलूचिस्तान का ज़िक्र तो खुद मनमोहन सिंह ने होने दिया,जो आपके-मेरे सामूहिक सौभाग्य से भारत के प्रधानमंत्री हैं। मनमोहन सिंह अमेरिकी हितों और रवैये की अनदेखी नहीं कर सकते। अमेरिका से अणु सहयोग संधि करते हुए उनने अमेरिका का स्ट्रेटजिक पार्टनर भारत को बना दिया है। अमेरिकी अफ-पाक रणनीति में पाकिस्तान अमेरिका के लिए भारत से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। अमेरिका उसे तालिबान के विरूद्ध लड़ाए रखना चाहता है और पाकिस्तान इसकी कीमत भारत से बराबरी करने में वसूल कर रहा है। बलूचिस्तान का जिक्र इसी का परिणाम है। अमेरिकी हित के लिए मनमोहन सिंह भारत के हित की अनदेखी नहीं कर सकते हैं। कम्युनिस्टों ने रूस के लिए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अंतिम लड़ाई से दगा किया और सन बासठ में चीनी हमले को भारत के हमले का जवाब मान लिया। कम्युनिस्टों को हम भारतीय इनके लिए माफ नहीं करते। अमेरिकी हितों के लिए भारत के स्वायत्त हितों को कुरबान करने वालों को आप कैसे माफ कर सकते हैं।


चीन को क्यों लगता है कि वह कोशिश करे तो भारत के तीस से पैंतीस टुकड़े किए जा सकते हैं? क्या इसलिए कि उस मालूम है कि भारत में अंतरराष्ट्रीय हितों के लिए भारतीय हितों को कुरबान करने वाले उदार चरित लोगों की कमी नहीं है। आज के दिन अपने आपसे पूछिए।

(देशकाल )




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