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सिविल सेवा परीक्षा : कुछ और सुझाव


सिविल सेवा परीक्षा : कुछ और सुझाव
मृणालिनी शर्मा



इसे भारतीय लोकतंत्र की हालिया ऐतिहासिक उपलब्धि ही कहा जाएगा जब एक सप्‍ताह के अंदर सरकार ने संसद में की गई घोषणा के अनुरूप अपना फैसला वापिस ले लिया । यानि सिविल सेवा की मुख्‍य परीक्षा में अंग्रेजी आगे नहीं रहेगी, बल्कि बराबर रहेगी । अच्‍छा होता यदि सरकार एक कदम और आगे जाकर प्रथम चरण की प्रिलिमिनरी परीक्षा से भी अंग्रेजी का हिस्‍सा हटा देती । अखबारों में छनकर आ रही सूचनाओं के अनुसार संक्षेप में सिविल सेवा परीक्षा की जिन अधिसूचनाओं को रद्द किया गया है, वे हैं :-

Nathuram Godse's defense speech in court


2nd October 1869- 30th January 1948 .


More than six decades after his assassination Mohandas Karamchand Gandhi still remains,  the most iconic figure of modern India. He was one of the most widely photographed men of his time; an entire industry of nationalist prints extolled his life; and his statues abound throughout India and, increasingly, the rest of the world .

On 30 January 1948, Gandhi was shot while he was walking to a platform from which he was to address a prayer meeting. The assassin, Nathuram Godse, was a Hindu nationalist with links to the extremist Hindu Mahasabha, who held Gandhi guilty of favouring Pakistan and strongly opposed the doctrine of nonviolence.



SOME FACTS ABOUT NATHURAM GHODSE.

Nathuram Ghodse was often a misunderstood character. He was referred to as a Hindu fanatic. It was often hard to understand Godse because the Government of India had suppressed information about him. His court statements, letters etc. were all banned from the public until recently. Judging from his writings one thing becomes very clear – He was no fanatic. His court statements were very well read out and indicated a calm and collected mental disposition. He never even once speaks ill about Gandhi as a person, but only attacks Gandhi’s policies which caused ruin and untold misery to Hindus. Another interesting point to note was that Godse had been working with the Hindu refugees fleeing from Pakistan. He had seen the horrible atrocities committed on them. Despite this Godse did not harm even single Muslim in India which he could easily have. So it would be a grave mistake to call him a Hindu fanatic.


Nathu Ram Godse, touched his feet to pay respect to the Father of Nation prior to shooting Gandhi.  He was agitated over partition of India which Mahatma had agreed. Moreover, Gandhi was adamant to give Pakistan a sum of Rs 550 Million as compensation. Prime Minister Nehru and his cabinet had passed a resolution not to give Pakistan the said amount as the latter has waged tribal war against India in Kashmir. Gandhi went on fast to oppose this and ultimately cabinet had to revert its decision. This agitated Godse more.

The final remains (ashes) of Godse are still kept in his house according to his will which he wrote prior to being hanged.  Godse presented historic arguments during his case though he did not defend himself.


The judge was moved by his knowledge and commented "Though he was bound by the provisions of law to write death sentence for Godse, but if the public present in the court room was to pass a judgement, the decision would probably have gone in favor of the accused". According to the will of Godse, his ashes to be flown into Sindhu river, if ever and when India and Pakistan become one nation again. Until then they are to be preserved.


Nathuram Godse's defense speech in court

भारतीय साहित्य का भविष्य



भारतीय साहित्य का भविष्य
-- डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय




असम साहित्य सभा ने जब मुझे अपने विराट सम्मेलन में आमंत्रित किया और व्याख्यान के लिए किसी विषय में न बाँधा, तब मुझे लगा कि स्वाधीन होना कितना बड़ा दायित्व है ! कई विय मन में आए-गए , अंत में मैंने सोचा कि यदि भारतीय साहित्य अनेक भाषाओं में लिखा एक साहित्य है तो किसी भी काल में विभिन्न भाषाओं की समस्याओं, चुनौतियों और संभावनाओं में कुछ समानताएँ तो जरूर होंगी।


प्रायश्चित करें किरण बेदी


 प्रायश्चित करें किरण बेदी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक



किरण  बेदी पर उंगली कौन उठा सकता है? क्या कोई नेता? बिल्कुल नहीं। देश में कोई ऐसा नेता नहीं होगा, जो सार्वजनिक या सरकारी पैसे का सही-सही हिसाब देता होगा। हर चुनाव लड़नेवाला नेता चुनाव आयोग को खर्च का जो हिसाब देता है, क्या वह सही होता है? किरण बेदी का दोष इतना ही है न, कि वह साधारण श्रेणी में यात्रा करती थीं और उच्च श्रेणी का किराया ले लेती थीं लेकिन हमारे नेता, मंत्री और मुख्यमंत्रीगण आदि क्या करते हैं? वे यात्रा किए बिना ही यात्रा का किराया (और भत्ता भी) वसूल लेते हैं। सड़क बनी ही नहीं और उसके नाम पर करोड़ों रु. डकार जाते हैं। इसलिए किरण बेदी के मामले में हमारे नेतागण अपनी जुबान ज़रा सम्हालकर चला रहे हैं।

‘उदारीकरण का उन्माद और आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन : सरलता के सहारे हत्या की हिकमत


आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन


सरलता के सहारे हत्या 




पिछले दिनों राजभाषा के नीति-निर्देशों को लेकर गृह मंत्रालय का एक जो नया ‘ परिपत्र ' प्रकाश में आया है (क्लिक - "हिन्दी पर सरकारी हमले का आखिरी हथौड़ा" ) , उसने भाषा के संबंध में निश्चय ही एक नये ‘विमर्श‘ को जन्म दे दिया है। क्योंकि, भाषा केवल ‘सम्प्रेषणीयता‘ का माध्यम भर नहीं है, बल्कि वह मनुष्य का सामाजिक-सांस्कृतिक आविष्कार भी है। फिर क्या किसी भी राष्ट्र की भाषा की संरचना में मनमाने ढंग से छेड़छाड़ की जा सकती है ? क्या वह मात्र एक सचिव और समिति के सहारे हाँकी जा सकती है ? निश्चय ही इस प्रश्न पर समाजशास्त्री, शिक्षा-शास्त्री, संस्कृतिकर्मी और राजनीतिक विद्वानों को बहस के लिए आगे आना चाहिए। यहाँ प्रस्तुत है , इस प्रसंग में एक बौध्दिक-जिरह को जन्म देने वाली कथाकार प्रभु जोशी की टिप्पणी


सरलता के सहारे हत्या की हिकमत
प्रभु जोशी 



भारत-सरकार के गृह-मंत्रालय की सेवा-निवृत्त होने जा रही एक सचिव सुश्री वीणा उपाध्याय ने जाते-जाते राजभाषा संबंध नीति-निर्देशों के बारे में एक ताजा-परिपत्र जारी किया कि बस अंग्रेजी अखबारों की तो पौ-बारह हो गयी। उनसे उनकी खुशी संभाले नहीं संभल पा रही है। क्योंकि, वे बखूबी जानते हैं कि बाद ऐसे फरमानों के लागू होते ही हिन्दी, अंग्रेजी के पेट में समा जायेगी। दूसरी तरफ हिन्दी के वे समाचार-पत्र, जिन्होंने स्वयं को ‘अंग्रेजी-अखबारों के भावी पाठकों की नर्सरी‘ बनाने का संकल्प ले रखा है, उनकी भी बांछें खिल गयीं और उन्होंने धड़ाधड़ परिपत्र का स्वागत करने वाले सम्पादकीय लिख डाले। वे खुद उदारीकरण के बाद से आमतौर पर और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हासिल करने के बाद से खासतौर पर अंग्रेजी की भूख बढ़ाने का ही काम करते चले आ रहे हैं।


षडयंत्र है या अनभिज्ञता


 षडयंत्र है या अनभिज्ञता

 - प्रो. सुरेन्द्र गंभीर








मान्यवर प्रभु जोशी जी और राहुलदेव जी ने एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर हमारा ध्यान खींचा है।
भारत में हिन्दी की और न्यूनाधिक दूसरी भारतीय भाषाओं की स्थिति गिरावट के रास्ते पर है। ऐसी आशा थी कि समाज के नायक भारतीय भाषाओं को विकसित करने के लिए स्वतंत्र भारत में क्रान्तिकारी कदम उठाएँगे परंतु जो देखने में आ रहा है वह ठीक इसके विपरीत है। यह षडयंत्र है या अनभिज्ञता इसका फ़ैसला समय ही करेगा।




भाषा के सरलीकरण की प्रक्रिया स्वाभाविक है परंतु वह अपनी ही भाषा की सीमा में होनी चाहिए। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आज अंग्रेज़ी और उर्दू के बहुत से शब्द ऐसे हैं जिसके बिना हिन्दी में हमारा काम सहज रूप से नहीं चल सकता। ऐसे शब्दों का हिन्दी में प्रयोग सहज और स्वाभाविक होने की सीमा तक पहच चुका है और ऐसे शब्दों के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए किसी को कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। यह भी ठीक है कि हिन्दी में भी कई बातों को अपेक्षाकृत सरल तरीके से कहा जा सकता है। परंतु यह सब व्यक्तिगत या प्रयोग-शैली का हिस्सा है। विभिन्न शैलियों का समावेश ही भाषा के कलेवर को बढ़ाता है और उसमें सर्जनात्मकता को प्रोत्साहित करता है।

अधर में लटकी अन्ना टीम



अधर में लटकी अन्ना टीम
डॉ. वेदप्रताप वैदिक



अन्ना आंदोलन के दो सशक्त स्तंभ तो ढह ही चुके हैं और एक पहले से ही हिल रहा है। स्वामी अग्निवेश ने अपने विरोध और मोहभंग को मोबाइल फोन से निकालकर अब लाउडस्पीकर पर चढ़ा दिया है। प्रशांत भूषण ने कश्मीर पर मुँह खोलकर अपने लिए दरवाजा बंद कर लिया है। अन्ना की टिप्पणी के बावजूद अगर वे इस आंदोलन का हिस्सा बने रहते हैं तो उनकी इज्जत कितनी बची रह पाएगी, यह वे स्वयं समझ सकते हैं। जस्टिस हेगड़े पहले दिन से ही अपनी बीन अलग बजाते रहे हैं। यहाँ अगर इस बहस में न पड़ा जाए कि कौन सही और कौन गलत तो भी यह मूल प्रश्न तो उठना ही चाहिए कि अभी इस आंदोलन को शुरू हुए छह माह ही हुए हैं और इसमें इतनी दरारें क्यों पड़ती जा रही हैं?

1962 में हमारी पराजय क्यों : सच्चाई से साक्षात्कार कराती पुस्तक : चर्चा


Why we lost 1962 War:A book Review of true story


Book Review: Himalayan Blunder

Preface
Oct 20, 1959, Ladakh:

Havaldar Karam Singh and his 20-strong troop, doing their routine border patrolling rounds amid heavy snowfall. In an eyewink nine men in the patrol are buried dead under a hailstorm of bullets, and the rest including Karam Singh are taken prisoners. Courtesy the Chinese army. What stuns the Havaldar is not so much the unexpected onslaught as where it occurred: 40 kilometres right on this side of the border .



The Army Chief, General Thimmayya’s worst fears about China stood confirmed. When he confronted the powers that be and requested an immediate modernisation of the Armed Forces, and special attention to Chinese designs, V.K. Krishna Menon, the Defence Minister, analysed the problem differently. In his view, General Thimmayya was a soldier of the Raj era who was alarmed easily. Pakistan, not China was India’s “number one” enemy, he opined. The General’s response was interesting: I understand our Defence Minister’s perspective. I have regards for his ability but I’m aggrieved at his foolishness. One does not rank enemies as first, second and the rest. Perhaps, it is done in Communist politics; as an Army Chief, I do not rank enemies.



The General submitted his resignation when Menon’s interference breached tolerance. But a panic-stricken Nehru’s emotional entreaty charmed the General into withdrawing it. In Parliament however, Nehru rose in defence of Menon: I’ve spoken to General Thimmayya. He blows issues out of proportion. He has unnecessarily created a misunderstanding with Krishna Menon, a veteran diplomat. It is ridiculous to blame Menon for interference in the issue of promotions in the Armed Forces. Silly! I totally reject General Thimmayya’s allegations.




Himalayan Blunder

This rather lengthy recount is one of the several significant botches recorded in John P Dalvi’s Himalayan Blunder. The book is a Manual of War Failure, recommended reading for everybody who wants to know why exactly India lost the 1962 war with China.



It was banned almost immediately on its release, in 1969. I read the abridged Kannada translation by Ravi Belagere. Which kind of struck me as funny. And unfortunate that I had to read a translated version because the original in English is banned. The excerpts I’ve quoted in this post are my (re)translatations from Kannada. Funny, isn’t it? Happens only in India.



John Parashuram Dalvi was the Brigadier of the 7th Infantry formed to “fight” at the North-East Frontier Agency (NEFA), which is today’s Arunachal Pradesh and parts of Nagaland. His eyewitness account of the war, events that led to it, as well as his wonderful insights into the 1962 humiliation form Himalayan Blunder.



Dalvi recounts a chilling precursor to 1962. During his days in the Wellington Defence Services Staff College in 1950, he quotes a colleague and army veteran, Joe of British origin: Friends, leaders of your country have no foresight. They are mum about the Chinese invasion of Tibet. They don’t understand the reality that India’s backdoor has been broken down…. Boys! Take it from me. Some of you folks sitting here will fight with the Chinese army before you retire.



Foresight was least expected from Nehru who in those days hallucinated as the champion of world peace. Nehru’s stand on the invasion of Tibet was but a minor testimony to this: we don’t have any right to put our forces in Tibet irrespective of whether it is independent, or is part of China.



Starting around 1951, China began its silent preparations: it laid roads capable of transporting army vehicles (supporting something like 4 tonnes), made airstrips to land its combat aircraft, set up telephones and communication networks… In parallel, it began marching its troops into the region and even gobbled up parts of Aksai Chin territory belonging to India.



Meanwhile, Jawaharlal Nehru’s Hindi-Chini bhai bhai symphony had reached a crescendo. China played along–it had recently concluded a war with Korea and badly needed time and resources for what it had in mind.



Brigadier Dalvi narrates with heart-rending precision the betrayal of the political leadership at every step. However, the principal culprits responsible for our defeat stand out clearly: Jawaharlal Nehru, Krishna Menon, and General B.M. Kaul who Nehru had handpicked to lead the war efforts against China.



B.M. Kaul sitting in Delhi had no clue about the situation on the ground in Arunachal Pradesh. He had allowed himself to believe what–a mere month before the actual Chinese invasion–Nehru said: China is not a warmonger. They have a “minor border dispute” with us. Dhola Post was an unncessary outpost created at B.M. Kaul’s behest: it was an invitation to attack. Yet, on September 8 1962, when the first sparks of war flew, he was holidaying in Srinagar with his family. And he didn’t think it was important to cancel his vacation: after all, Pandit Nehru was abroad. B.M. Kaul finally landed at the spot on Oct 10, 1962. Says Dalvi,

We watched the platoon of Punjabis under Major Chaudary’s leadership march towards Yum Sola….General Kaul stood next to me, weighing the success of his first stratagem. The platoon’s strength including Major Chaudary was 51. They’d barely covered a few feet when the sky came apart. Around 800 Chinese, positioned at the bank of Nam ka Chu [river] and atop the Thagla mountain began showering bullets. The first round hurt Major Chaudary’s legs. The Punjabi Platoon retaliated furiously, and dismembered and wounded a few hundred Chinese. Six of our men died in the first round. But General Kaul’s enthusiasm didn’t wither. As our men readied themselves for the second round of assault, a huge swarm of Chinese troops descended. Major Chaudary yelled to General Kaul to save his men. Never the men to turn their back from battle, our Punjabi Platoon looked at us, helplessly. All of us, including General Kaul understood what that meant. Our men had run out of ammunition.



The courageous General who had roared reassuringly to the Indian public about teaching China a lesson, couldn’t stomach the reality he saw before him. Dalvi recounts Kaul’s true character.



My God! You’re right. China has prepared itself for a full-scale war. It’s each man for himself from now on. You’re in charge of your Brigade. This is not in my reach. Only a Brigadier can execute this kind of war.



And he turned and left, leaving Dalvi to helplessly watch the massacre of the whole platoon. Dalvi records several similar incidents where a grossly underprepared Indian army faced the Chinese who were superior to them in every single aspect. A most telling instance:

…. a soldier saluted me as I stepped into the bunker and said, “Sahib, look there! the enemy is on the opposite slope. They’re burning firewood to beat the cold.” I felt a slap of humiliation. This was one of the rare instances this happened in thousands of wars throughout history. Burning a fire at night is a sure invitation for the enemy to attack. But then, this enemy on the slopes of the Thagla mountain was confident: both of his strength and our sorry state. He knew for certain that we would not attack: we could not.



In his “final journey,” Dalvi pays pages of homage to every footsoldier, Major, signaller, Havaldar…small and big, who died defending the indefensible. And the reason? You can’t read this with a straight face:



The Chinese used the same war strategies in vogue for centuries but…. their guns were more modern, and their clothes were warmer than ours…. out there, away from the warm world, the October chill doesn’t descend from the skies; it climbs from the depths of the spinal cord. All our men had to wear were cotton clothes suited for summer, shoes which slide on snow… the only colour my men could see was the ash-white colour of death. A flash of sunlight was enough to blind them. This blindness caused several men to walk directly into the waiting arms of the enemy. My request for snow glasses was granted, all right, but when they arrived, the air-dropped bag dropped somewhere in the abyss-like crevices…



You need to read this book to believe the shamelessless of Nehru’s government, which failed to supply these unfortunate men with food. Towards the end, Dalvi and those that remained went without food for more than 48 hours.



We descended the Dhola mountain after the Chinese disappeared from sight. We gave up the final hope of even sighting a small tukdi (regiment) of our men. I descended rapidly out of a sheer will to live. The slope ended in a forest…the path was even tougher to navigate. Meanwhile, I had lost four of the eleven men following me. I reached a clearing, which then led to a small mud road. It was all over.



Dalvi had walked right into a full-fledged Chinese army camp. On October 22 1962, 9:22 A.M, John P. Dalvi was taken prisoner of war. He remained in Chinese custody from October 22 1962 till about May 1963. What’s more interesting is the aftermath.

We landed in Dum Dum airport in Calcutta on May 4 1963. We were received cordially, appropriately. But the silence there was disquieting. I realized later. We had to prove we weren’t brainwashed by Chinese ideology. We had to prove we were still loyal to India. My own army maintained a suspicious distance. The irony cannot be harsher: this treatment from a country, which for more than a decade had brainwashed itself into holding the Chinese baton wherever it went.

It is more apt to call the Indo-China War as the Battle of Thagla, the altar where Pandit Nehru sacrificed hundreds of unprepared, ill-equipped, and underfed Indian soldiers as the price of his ineptitude.

Small wonder, the book is banned in India. I wager that even if it was not banned, we’d never learn because Himalayan Blunder has simply proven its contemporary relevance in the sense of history repeating itself: notice today’s Chinese cheerleaders who occupy disproportionate clout in the UPA government. Yet none of us seem to pay heed to their misdeeds–from escalated Naxalism/Maoism to their shenanigans in Nepal.

By the way, the Battle of Thagla began on October 20, 1962 and lasted just over 3 hours, between 5 A.M and 8 A.M. An entire brigade was massacred.




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एफ.एम. प्रसारण बनाम भूमण्डलीकरण का भक्तिगीत




एफ.एम. प्रसारण बनाम भूमण्डलीकरण का भक्तिगीत
-प्रभु जोशी




ये आठवें दशक के ‘पूर्वार्द्ध' के आरम्भिक वर्ष थे और श्रीमती इंदिरा गांधी गहरी ‘राजनीति-शिकस्त' के बाद अपनी ऐतिहासिक विजय की पताकाएँ फहराती हुईं, फिर से सत्ता में लौटी थीं। इस बार वे शहरी मध्यम-वर्ग के ‘धोखादेह’ चरित्र को पहचान कर, ‘ग्रामीण-भारत’ की तरफ मुँह कर के, अपने ‘राजनीतिक-भविष्य’ का नया ‘मानचित्र’ गढ़ना चाह रहीं थीं। इसीलिए, वे बार-बार एक जुमला बोल रहीं थीं-‘टेक्नालॉजी इज़ टु बी ट्रांसफर्ड टू रूरल इण्डिया।’ कदाचित्, तब तकनॉलॉजी को गाँवों की तरफ पहुँचाने के मंसूबे के साथ ही साथ उन्होंने ‘डिस्ट्रिक्ट ब्रॉडकास्ट’ की बात भी करना शुरू कर दी थी, जिसका अंतिम अभिप्राय यह था कि ‘ज़िला-प्रसारण‘ की शुरूआत से, ‘ग्रामीण भारत‘ को सूचना-सम्पन्न बनाने की सक्रिय तथा पर्याप्त पहल की जा सकेगी।




कहने की जरूरत नहीं कि तब ‘प्रसारण‘ से जुड़े लोग, इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि उनके इस ‘कथन‘ के पीछे भारत में भी एफ.एम. रेडियो के शुरूआत करने की मंशा ही है। चूँकि, तब तक अफ्रीकी महाद्वीप के छोटे-छोटे देशों में, वे आ चुके थे। मुझे याद है, आकाशवाणी की कार्यशालाओं में ‘प्रशासनिक’ क्षेत्र तथा ‘इंजीनियरिंग’ के उच्चाधिकारी गाहे-ब-गाहे इस बात पर अफसोस प्रकट किया करते थे, कि ‘देखिए, भला अफ्रीका के नाइजीरिया जैसे तमाम अन्य पिछड़े हुए मुल्कों में एफ.एम. आ चुके हैं और एक हम हैं कि अभी भी उसी पुरानी और ‘लगभग चलन से बाहर हो चुकी’ तकनॉलॉजी से काम चला रहे हैं।’




बहरहाल, पता नहीं तब, ‘सत्ता के गलियारों’ में क्या कुछ घटा और वह योजना फाइलों के अम्बार में अचानक कहीं ‘दफ्न’ हो गई। निश्चय ही इसकी वजह जानने की कोशिश, उस समय की ‘नीतिगत-उलझनों’ को रौशनी में ला सकती है। क्योंकि, ‘सूचना’ स्वयं धीरे-धीरे एक ‘सत्ता’  बन जाती है - और वह ‘राजनीतिक‘सत्ता‘ को ही सबसे पहले आघात पहुँचाती है।




दरअस्ल, अफ्रीकी महाद्वीप में ‘सूचना’ और ‘संचार’ के क्षेत्र में अपना वर्चस्व बनाने वाले, ‘सूचना-सम्राटों’ के समक्ष, यह अत्यन्त स्पष्ट था कि वहाँ की भाषाएँ, इतनी विकसित नहीं है कि पहले वहाँ के प्रिण्ट-मीडिया में घुस कर, उन पर अपना आधिपत्य जमाने की कोशिश की जाये। वहाँ ‘प्रिमिटव-कल्चर‘ और ‘सोसायटी’ के चलते ‘लिखे-छपे’ के बजाय ‘बोले जाने’ वाले माध्यमों के जरिए ही वांछित काम निपटाया जा सकता है, जो ‘नव-औपनिवेशिक‘ एजेण्डे के लिए बहुत जरूरी है। अलबत्ता, उनके लिए, अफ्रीकी महाद्वीप में स्थानीय भाषाओं का ‘कम विकसित’ होना, सर्वाधिक सहूलियत की बात थी। चूँकि, वह (हॉफ लिविंग एण्ड हाफ फ़ॉरगॉटन’) अर्द्ध-जीवित और अर्द्ध-विस्मृत अवस्था में थी। नतीजतन, वे तो कहा ही करते थे, ‘दे आर बार्बेरिअन्स विथ डायलैक्ट, वी आर सिविलाइज्ड विथ लैंग्विज’। वे अपनी ‘भावी-रणनीति‘ के तहत अफ्रीकी जनता को सभ्य बनाने के लिए, उनकी भाषाओं का ‘रि-लिंग्विफिकेशन‘ पहले ही शुरू कर चुके थे। लेकिन, एफ.एम. के आगमन ने, उनके एजेण्डे को तेजी से पूरा करने में, उनके लिए एक अप्रत्याशित सफलता अर्जित कर दी। चूँकि एफ.एम. रेडियो के आते ही उन्होंने फ्रेंच द्वारा अपने प्रचार-प्रसार के लिए अपनाई गई रणनीति के तर्ज पर अघोषित रूप से लगभग ‘लैंग्विज-विलेज‘ अर्थात् ‘भाषा-ग्रामों’ के निर्माण जैसा काम करना शुरू कर दिया।




इसके अन्तर्गत उन्होंने किया यह कि ‘प्रसारण क्षेत्र‘ में आने वाली आबादी को, ‘स्थानीय भाषा में अंग्रेजी की शब्दावली के मिश्रण से तैयार एक ऐसे भाषा रूप का दीवाना बनाना ‘ कि वह ‘पूरा प्रसारण’, उस आबादी के लिए एक ‘मेनीपुलेटेड-प्लेजर’ (छलयोजित आनंद) का पर्याय बन जाये। इसके साथ ही उसके अनवरत उपयोग से उस ‘भाषा रूप’ को ‘यूथ-कल्चर’ का शक्तिशाली प्रतीक बना दिया जाये। इसे ‘आनन्द के द्वारा दमन’ की सैद्धान्तिकी कहा जाता है। वस्तुतः, इसमें लोग, अपने ‘समय और समाज’ के अन्तर्विरोधों को ठीक से पहचान पाने की शक्ति ही खो देते हैं और तमाम सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ‘घटनाओं-परिघटनाओं’ में आनंद की खोज ही उनका अंतिम अभीष्ट बन जाता है। ‘यूथ-कल्चर’ से नाथ देने के कारण यह ‘अविवेकवाद’ समाज के भीतर, निर्विघ्न रूप से काम करने लगता है। बौद्धिक रूप से विपन्न बना दिये जाने की यह अचूक युक्ति मानी जाती है।




बहरहाल, तब वहाँ बार-बार यह कहा जाने लगा कि सम्पूर्ण अफ्रीकी समाज में अपने ‘प्रिमिटव कल्चर’ और उसके ‘पिछड़ेपन’ से बाहर आने की एक ‘नई-इच्छाशक्ति’ पैदा हो रही है और अपने समाज के विकास के लिए, ‘दे आर वॉलेन्टॅरिली गिविंग अप देअर मदरटंग्स’ उनके भीतर लैंग्विज-शिफ्ट की स्वेच्छया ‘सामाजिक-आकुलता’  उठ चुकी है।




बहुत साफ था कि ये औपनिवेशक ताकतों की तमाम ‘धूर्त-व्याख्याएँ’ थीं, जो उनके भाषागत षड्यंत्र को बहुत कौशल के साथ छुपा ले जाती थीं। इन एफ.एम. के कार्यक्रम संचालकों को कहा जाता था कि इसे भूल जाइये कि ‘जनता माध्यम के साथ क्या करती है’, बस यह याद रखिए कि ‘माध्यम के जरिये आप जनता के साथ’ क्या कर सकते हैं।’  नतीजतन, उन्होंने रेडियो के प्रसारण के जरिए, ‘अर्थवान-प्रसारण’ देने के बजाय ‘अर्थहीन-प्रसन्नता’  बाँटने का अंधाधुंध काम, बड़े पैमाने पर किया और यह सब उसी समाज के ‘टोटम्स’ का इस्तेमाल करते हुए कुछ ऐसी चतुराई के साथ किया कि एक बार तो उन्हें लगा, उनकी संस्कृति और भाषाओं के आगे अंग्रेज और अंग्रेजी झुक गयी है। उसे उन्होंने अपनी विजय माना।




निश्चय ही इसका अभिप्राय ये कि वे एक विराट ‘भ्रम’ तैयार करने में सफल हो रहे थे। बाद में प्रसारण से वह ‘भाषा रूप’ जिसे ‘लिंग्विस्टिक-सिन्थेसिस’ के जरिए तैयार किया गया था और उसे ‘बोलचाल का नैसर्गिक रूप’ कहा गया था, धीरे-धीरे अंग्रेजी के द्वारा विस्थापित कर दिया गया। इसे बाद में स्वाहिली और जूलू के लेखकों ने ‘मॉस-डिसेप्शन’ कहा। क्योंकि, अब अफ्रीकी महाद्वीप के देशों में, समाज की ‘प्रथम भाषा’ अंग्रेजी ही बना दी गयी। उन्होंने कहा कि ‘अश्वेतों ने भाषा नहीं, अपना भाग्यलेख बदल लिया है।’




भूमण्डलीकरण के पदार्पण के साथ बर्कली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर गेल ओमवेत जो भारत आती-जाती रहती हैं, और गुरूचरणदास जैसे लोग, यहाँ भारत के लोगों को इसी तरह अपना ‘भाग्य-लेख‘ बदलने के लिए, भारतीय भाषाएँ छोड़ कर अंग्रेजी को अपनाने की राय बड़े जोर-शोर से दिये चले आ रहे हैं।




बहरहाल, अब अफ्रीका में अफ्रीकी भाषाएँ रोज़मर्रा का पारस्परिक कामकाज निबटाने की ऐसी भाषाएँ भर रह गयी हैं, जिनका काम चिंतन के क्षेत्र से हट कर, केवल ‘मनोरंजन’ और ‘कामकाजी-सम्पर्क’ भर का है। कहने की जरूरत नहीं कि हमारे यहाँ भी कुकुरमुत्तों की तरह दिन-ब-दिन हर छोटे-बड़े महानगर में, आवारा- पूँजी के सहारे खुलते जा रहे, इन एफ.एम. से एक ऐसी ‘प्रसारण-संस्कृति’ को जन्म दिया जा रहा है, जो ‘यूरो-अमेरिकी एजेण्डों’ को उसकी पूर्णता तक पहुँचाने के काम को निबटाने में लगी हुई है। इसी के चलते देश का सबसे पहला निजी एफ.एम. प्रसारण मुम्बई में ‘हिग्लिश‘ में शुरू होता है और बाद में जितने भी एफ.एम. आये हैं - यही उनकी भाषा नीति हो गई। वहाँ अच्छी हिन्दी बोलना अयोग्यता की निशानी है।




अब यह बहुत साफ हो चुका है कि इनका श्रीमती गाँधी की उस ‘डिस्ट्रिक्ट-ब्रॉडकास्ट’ की अवधारणा से कोई लेना-देना नहीं है, जो मूलतः ‘ग्रामीण-भारत’ के लिए थी और जिसकी प्रतिबद्धता ‘विल्बर श्राम’ के ‘विकासमूलक-प्रसारण’ की थी। यह सिर्फ ‘महानगरीय सांस्कृतिक अभिजन‘ की ‘जीवन शैली’, ‘रहन-सहन’, ‘बोलचाल’ को ‘समग्र’ समाज के लिए ‘मानकीकरण’ करने का काम कर रहे हैं, जिसने यह स्वीकार लिया है कि जल्दी से जल्दी, बस एक ही पीढ़ी के ‘कालखण्ड’ में, इस देश से तमाम स्थानीय भाषाओं की विदाई हो। यही वजह है कि ‘अंग्रेजी लाओ देश बचाओ ’ का ‘हल्लाबोल’  इस दोगले मीडिया ने शुरू कर दिया है।




आप हम साफ-साफ देख सुन रहे हैं कि जिस तेजी से ‘आर्थिक’ क्षेत्र में भूमण्डलीकरण की शुरूआत की गयी, ठीक उसी और उतनी ही तेजी से, ‘सामाजिक क्षेत्रों’ में, ‘स्थानीयता’ और ‘क्षेत्रीयताओं के प्रश्न, ‘अस्मिता की रक्षा के प्रश्न’  बना दिये गये। मराठी या कन्नड़ में उठे विवादों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। वे परस्पर नये वैमनस्य में जुत चुकी है। हिन्दी को एक ‘साम्प्रदायिक’  भाषा करार दिया जा रहा है। अलबत्ता, उसे नये ढंग से ‘विखण्डित’ किया जा रहा है। बोलियों को हिन्दी से ‘स्वायत्त’  करने का अभियान आरंभ है, जिसमें बहुत संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ छुपे हैं। जल्द ही आठ हिन्दीभाषी प्रान्तों में जन्मे लोगों से कहा जायेगा कि वे अपनी ‘मातृभाषा’, ‘मालवी‘, ‘निमाड़ी’, ‘छत्तीसगढ़ी’, ‘हरियाणवी’, ‘भोजपुरी’ आदि-आदि लिखवायें। संख्या के आधार पर डराने वाले आंकड़ों वाली हिन्दी, किसी की भी मातृभाषा नहीं रह जायेगी। यह नया और निस्संदेह एक अन्तर्घाती ‘देसीवाद’ है, जो अंदरूनी स्तर पर अंग्रेजी के लिए एक नितान्त निरापद राजमार्ग बनाने का काम करने वाला है।




इस सारे तह-ओ-बाल के बीच, अंत में देश के महानगरों में ‘उधार की चंचला लक्ष्मी’ से खुल रहे, इन तमाम निजी एफ.एमों की ‘प्रसारण-सामग्री’ का आकलन किया जाये तो पायेंगे कि ये केवल मनोरंजन के आधार को मजबूत करती हुई, ‘मसखरी के कारोबार’ में जुटी टुकड़ियाँ हैं, जिनका मकसद उस ‘पापुलर-कल्चर’ के लिए जगह बनाना है, जो पश्चिम के सांस्कृतिक-उद्योग के फूहड़ अनुकरण से हमारे यहाँ जन्म ले रहा है। इनका ‘विचार’ नहीं, ‘वाचालता’ आधार है। उन्हें ‘बोलना’ और ‘बिना रूके बोलते रहना’, बनाम बक-बक चाहिए। इनके लिए ‘विचार’ एक गरिष्ठ और अपाच्य शब्द है। वहाँ वे ‘फण्डे’ चाहते हैं। रोट्टी कमाने के। पोट्टी पटाने के। यानी डेटिंग के। बॉस को खुश रखने के। सक्सेस के। जी हाँ, ‘सफलता’, ‘समाज’ या ‘समूह’ की नहीं, केवल ‘व्यक्तिगत-सफलता’ को हासिल करने के लिए मेन्युप्लेशन सीखिये। इनके लिए स्थानीय संस्कृति और संस्कार से दूरी पैदा करना इनका नया ‘मूल्य’। इनका वर्गीय समझ क्या है ? इन्हें कैसी और कौनसी पीढ़ी गढ़ना है? इनकी ‘प्रसारण-संस्कृति’ क्या है ? इनकी ‘वैचारिकी’ क्या है ? ये किसके प्रति ‘जवाबदेह’ हैं ? इन सारे प्रश्नों के उत्तर खोजे जायें तो, ‘ये उसी खतरनाक ‘रेडियो कल्चर’ के भारतीय उदाहरण है’, जिन्होंने अफ्रीकी महाद्वीप को सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से विपन्न बनाने में बहुत कारगर भूमिका निभाई थी। इनकी कारगुजारियों का बहुत वस्तुगत विवेचन ई-काट्ज तथा जी-बेबेल की पुस्तक ‘ब्रॉडकास्टिंग इन थर्डवल्र्ड में बहुत सूक्ष्मता के साथ मिलता है कि किस तरह से जन-संचार में ‘सूचना-साम्राज्यवादियों’ ने घुस कर उनकी धूर्त सांस्कृतिक राजनीति की कुटिलता से कैसे तीसरी दुनिया के गरीब मुल्कों की ‘भाषा’ और ‘संस्कृति’  को तहस-नहस किया।




इनकी बदअखलाक वर्ग-दृष्टि और भाषाई चतुराई का देश के सामने एक शर्मनाक उदाहरण तब सामने आया, जब एक एफ.एम. रेडियो के प्रतिभाशाली आर.जे. ने ‘इण्डियन आयडल’ बने, प्रशान्त तमांग के बारे में टिप्पणी की थी, जिसका कुलजमा अर्थ यह था कि ‘चैकीदारी से गायकी तक गया, गोरखा। यह पूरे गोरखा समाज पर अभद्र टिप्पणी थी। यानी गोरखा जन्म से चौकीदार ‘होने’ और ‘बने रहने’ के लिए होते हैं, लेकिन प्रशान्त तमांग संयोग से ऐसा ‘बिन्दास बंदा’ निकला, जिसने ‘गायकी’ में गुल खिला दिये। यह भाषा की वही भर्त्स्ना  योग्य ‘वर्गीय-दृष्टि’  है, जो बताती है कि ‘रामू गरीब लेकिन ईमानदार लड़का था।’ अर्थात्, गरीब मूलतः बेईमान होते हैं, यह रामू संयोग से एक ऐसा निकला जो बावजूद गरीब होने के ‘ईमानदार’ बन गया। वास्तव में इन्हें कार्यक्रम प्रस्तुतकर्ता नहीं, बस ‘वाचाल कारिन्दे‘ चाहिए, जो हर चीज को ‘मस्ती’, ‘मजा’, या ‘फन’ बना दे या फिर उसे कामुकता से जोड़ दे। एक कमजोर बौद्धिक आधार के बावले समाज का, ‘आनन्दवादी हथियारों द्वारा सफल दमन’ कार्यक्रम चल रहा है। फासीवादी दौर में जर्मन समाज के पतन की पृष्ठभूमि में, तब रेडियो ने यही किया था। जो आज ये कर रहे हैं। अपने प्रसारण से ये एक ऐसा ‘सांस्कृतिक-उत्पाद’ बनाते हैं, जो देशकाल से परे रहता हुआ, केवल ‘उपभोगोन्मुख’ हो और उसका कोई अन्य ‘मूल्य’ न हो। ये ‘मुक्त भारत’ के नये शिल्पियों की दिमागी उपज है। वे ‘भारत की मुक्ति’ के शिल्पी नहीं। क्योंकि वे तो कब्रों में दफ्न हैं और आकाशवाणियाँ, तीस जनवरी को रूंधे हुए गले से रामधुन गाते हुए, उनकी ‘खामखाह’ याद दिलाती रहती हैं। ठीक उस वक्त भी इनके यहाँ कोई धमाकेदार या ‘फोन इन’ प्रोग्राम चलता रहता है।




समाज को सूचना-सम्पन्न बनाते हुए, किसी एफ.एम. का रेडियो जॉकी अपने किसी एक कालर (!) से पूछ रहा होता है: ‘तो बताइये, आप अपने लिए गॉरमेण्ट्स का कौन-सा ब्रॉण्ड चुनती हैं ? (उधर से किसी ब्रॉण्ड का नाम) और हाँ, तो आप अपने अण्डर गॉरमेण्ट्स के लिए कौन-सा ब्रॉण्ड चुनती हैं ? (उधर से संकोच और शर्म को व्यक्त करते कुछ अस्पष्ट शब्द) अरेऽ रेऽऽ रेऽऽ आप तो शर्मा गयीं.... आपका नाम नेहा नहीं, लगता है ‘शर्मिला’ है। ओह! यू आर सो शॉय ? आई थिंक यू आर अ विक्टिम आॅफ एन ओल्ड कल्चरल फोबिया !..... वेल लेट इट बी सो..... कोई बात नहीं... कोई बात नहीं, वह आपका सीक्रेट है, वह शायद आपके फ़्रेण्ड को पता होगा.... शॉपिंग उन्हीं के साथ करती हैं- कौन से मॉल में ?’




प्रसंग दूसरा....... हाय, हैलो.... आपकी आवाज से लग रहा है, यू आर बोल्ड एण्ड ब्यूटीफुल टू.... तो बताइये, आप लड़कों से डरती हैं या सवालों से....? दोनों से नहीं डरती.......? वेरी गुड.... यू आर ब्यूटिफुल एण्ड नॉट कावर्ड...... नाम बताइये आपके कोई खास क्लासमेट्स का....? ओ.के...... ऐनी सेक्समेट.... नॉट यट.... (उधर से फोन कट) प्रतिभाशाली आर.जे. की बकबक जारी....... चलिए आपने लाईन काट दी..... लेकिन, हम आपको, लाइन मारने वालों की तरफ से एक खास गीत पेश कर रहे हैं...... गीत शुरू.... (नहीं नहीं अभी नहीं, थोड़ा करो इंतजार.............। )




जी हाँ, ये है इनका ‘पीपुल्स-पार्टिसिपेशन’ (!) है। ये है इनकी ‘सूचना-सम्पन्नता’ है। रेडियो जॉकी की सबसे बड़ी योग्यता है कि वह हर बात को कितनी लम्पटई के साथ ‘कामुकता’ (सैक्चुअल्टी) से जोड़ सकने में पारंगत है ? ये नया ‘यूथ-कल्चर’ गढ़ा जा रहा है ? जिसमें लम्पटई को ‘ग्लैमराइज’ (!) किया जाता है। बाहर की लम्पटई, एफ.एम. प्रसारण में ‘बिन्दास है’, ‘बैलौंस है’ और ‘बोल्ड है।‘




दरअस्ल, देखा जाये तो उसका सब कुछ ‘बोल्ड’ नहीं, ‘सोल्ड’ है। उसकी ‘जबान’, उसकी ‘भाषा’, उसका ‘समय’, उसकी ‘वफादारी’, यहाँ तक कि उसकी ‘आत्मा’ भी। वह सामाजिक-सांस्कृतिक ध्वंस लिये ‘वेतन’ नहीं ‘सुपारी’ लिए हुए है। वह पैकेज पर है।




अंत में कहना यही है कि, जिस तरह ‘उदारवाद’ की अगुवाई के लिए ‘आनन-फानन’ में बगैर कोई आचार-संहिता के निर्धारण किये, निजी एफ.एम. के लिए, जो प्रसारण क्षेत्र में जगह बनाई गई, वह सत्ता की ‘नियमहीनता’ का लाभ लेकर, एक किस्म की सांस्कृतिक अराजकता के खतरनाक खेल में बदल गयी है-‘क्योंकि, उसके सामने ‘प्रतिबद्धता’ या ‘जवाबदेही’ का कोई प्रश्न ही नहीं है। ये कोई लोक-प्रसारण नहीं है। ना उसे ‘लोक’ की चिंता है, ना ‘शास्त्र’ की। ‘लोक-नियंत्रण के अभाव में, वे उदग्र और उद्दण्ड हो गये हैं। एक निजी मनमानापन ही प्रसारण का विषयवस्तु है। और अब दुर्भाग्यवश इन्हीं का विकृत अनुकरण करने में आकाशवाणी को भी ‘दरिद्र समझ’ के नौकरशाहों द्वारा, जोत दिया गया है। सारी आचार-संहिता को ताक में रखते हुए, रेवन्यू जेनरेट करने के लिए, वे कुछ भी करने को तैयार है। वहाँ भी तमाम कार्यक्रमों के नाम जो हिन्दी में थे, हटाकर अंग्रेजी के कर दिये गये हैं’ - वे अब एफ.एम. की होड़ में हैं। ‘बाजार-निर्मित’ फण्डों के घोड़ों पर सवार होकर वे ‘पापुलर कल्चर’ के पीछे बगटुक भाग रहे हैं। जनतांत्रिक राजनीति के कोड़े से पिटा हुआ ‘प्रसारण-बिल’, वापस किसी ऐसे बिल में घुस गया है, जहाँ से उसका बाहर निकलना मुमकिन नहीं रह गया है। वक्त के चूहे उसे कुतर-कुतर कर खत्म कर देंगे। क्योंकि, अब प्रसार-माध्यमों को कोई ‘निषेध’ पसंद नहीं। अब इन्हें हर ‘निषेध’, ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन’ लगता है। ‘उदारवाद’ के (जन)तांत्रिकों ने उनके कानों में यह मंत्र फूँक दिया है-कि ‘राष्ट्र’, कुछ नहीं सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक ‘स्थानीयता’ की ‘वर्चस्ववादी’ एवम् ‘दमनकारी’ व्यवस्था है- नेशन इज एन इमेजिण्ड कम्युनिटी। भारत एक राष्ट्र नहीं, बल्कि सैकड़ों राष्ट्रीयता का समुच्चय है, इसलिए, भारत की नक्शे में फैली भिन्न-भिन्न ‘राष्ट्रीयताएँ’ जितनी जल्दी मुक्त हों, उतना ही श्रेयस्कर है। राष्ट्र-राष्ट्र सिर्फ बौड़मों की चीख है। उसकी अनसुनी अनिवार्य है। ये उसके विखण्डन के हवन में अपनी तरफ से आहुति दे रहे हैं। इस हवन में अंतिम पूर्णाहुति के लिए उन्हें सिर्फ अब एफ.एम. को केवल ‘समाचार-प्रसारण’ की अनुमति की जरूरत भर है। फिर देखिए, सैकण्ड-दर-सैकेण्ड कैसे पैसा बरसता है। उनका पल-पल होगा पैसे के पास। नोम चोमस्की ने तो ठीक ही कहा है कि ‘डेमोक्रेसी हेज गान टू द हाईएस्ट बिडर।’ जो जितनी ऊँची बोली लगायेगा, राजनीतिक सत्ता उसकी ही जेब में होगी।




निश्चय ही बहुराष्ट्रीय निगमों की एक लम्बी कतार भारत में खड़ी हो गयी है और उनकी जेबें लम्बी हैं। उनमें सारे मीडिया की कटी हुई जबानें भरी पड़ी हैं। इसलिए, वे बोल नहीं रहे हैं, बस लगातार गुनगुना रहे हैं- ‘भूमण्डलीकरण भक्तिगीत’। 




4, सम्वाद नगर,
नवलखा, इन्दौर


FM Radio : Language/Cultural crisis & So-called Globalization



तेलुगु साहित्य का परिवर्तनशील परिदृश्‍य


पुस्तक समीक्षा 


तेलुगु साहित्य का परिवर्तनशील परिदृश्‍य
ऋषभदेव शर्मा







निखिलेश्‍वर (1938) तेलुगु साहित्य के दिगंबर कविता (अकविता) आंदोलन के छह प्रवर्तकों में से एक हैं. वे विप्‍लव रचयितल संघम (क्रांतिकारी लेखक संघ) के सक्रिय संस्थापक के रूप में भी जाने जाते हैं तथा मानवाधिकार संस्थाओं से जुडे़ रहे हैं. उनके सात कविता संकलन और पाँच गद्‍य रचनाएँ प्रकाशित हैं. निखिलेश्‍वर ने अन्य भाषाओं से तेलुगु में पाँच पुस्तकों का अनुवाद भी किया है. लंबे समय तक अंग्रेज़ी के अध्यापक रहे. निखिलेश्‍वर का मानना है कि भारतीय भाषाओं के आदान-प्रदान से ही भारतीय साहित्य सुसंपन्न हो सकेगा तथा अंग्रेज़ी द्वारा जो अनुवाद का कार्य चलता रहा, यदि वह हिंदी के माध्यम से फैलता जाए तो, आसानी से हम अपने आपको अधिक पहचान सकेंगे. उन्होंने इसी आशय से समकालीन तेलुगु साहित्य से विभिन्न विधाओं की रचनाओं का समय समय पर हिंदी में अनुवाद किया है. यही नहीं उन्होंने हिंदी की भी अनेक रचनाओं का तेलुगु में अनुवाद किया है. इस प्रकार वे सही अर्थों में अनुवादक के सेतु धर्म का निर्वाह कर रहे हैं. 




‘विविधा’ (2009) में निखिलेश्‍वर ने बीसवीं शताब्दी के तेलुगु साहित्य से चुनकर कतिपय प्रतिनिधि कविताओं और कहानियों के साथ एक एक नाटक और साक्षात्कार का अनुवाद हिंदी जगत्‌ के समक्ष प्रस्तुत किया है. इस चयन की उत्कृष्‍टता स्वतः प्रमाणित है क्योंकि अनुवादक ने तेलुगु के श्रेष्‍ठ और सुंदर प्रदेय से हिंदी पाठकों को परिचित कराना चाहा है. यह सारी सामग्री समय समय पर हिंदी की प्रतिष्‍ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हो चुकी है. इस चयन को परिपूर्णता प्रदान करता है स्वयं निखिलेश्‍वर द्वारा लिखित अठारह पृष्‍ठ का प्राक्कथन - "बीसवीं सदी का तेलुगु साहित्य". विगत शती के तेलुगु साहित्य की विकास प्रक्रिया और समृद्धि को समझने के लिए यह प्राक्कथन अत्यंत उपादेय है. इसमें लेखक ने निरंतर आलोचनात्मक दृष्‍टिकोण बनाए रखा है जिस कारण यह चयन तुलनात्मक भारतीय साहित्य के अध्‍येताओं के लिए संग्रह और चिंतन मनन के योग्य बन गया है. 




निखिलेश्‍वर का मत है कि तेलुगु साहित्यकार सामाजिक यथार्थ के प्रति अत्यंत सजग रहे हैं तथा पश्‍चिमी साहित्य में जो परिवर्तन 300 वर्षों में हुए, तेलुगु में वे 100 वर्ष में संपन्न हो गए. अभिप्राय यह है कि बीसवीं शती का तेलुगु साहित्य परिदृश्‍य अत्यंत तीव्र गति से परिवर्तित होता दिखाई देता है. समाज सुधारक कंदुकूरी वीरेशलिंगम्‌ ने तेलुगु साहित्यभाषा को सरल बनाने का अभियान चलाया तो कालजयी नाटक ‘कन्याशुल्‍कम्‌’ के रचनाकार गुरजाडा अप्पाराव ने विधिवत व्‍यावहारिक भाषाशैली को साहित्य में प्रतिष्‍ठित किया. दूसरी ओर विश्‍वनाथ सत्यनारायण ने ‘वेयिपडगलु’ (सहस्रफण) जैसे उपन्यास के माध्यम से पुराने समाज का सशक्‍त दस्तावेज पेश किया तो भाव (छाया) वादी कविता ने प्रकृति प्रेम, अमलिन शृंगार और स्वदेशी चिंतन की धार बहायी. महाकवि श्रीरंगम श्रीनिवास राव (श्री श्री) ने ‘महाप्रस्थानम’ द्वारा साम्यवादी विचारधारा और जन आंदोलन से कविता को जोड़ा तो त्रिपुरनेनि ने पौराणिक प्रसंगों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य प्रदान किया. इसी प्रकार समालोचना के शिल्प और रसविधान के विश्‍लेषण के आधुनिक प्रतिमान कट्टमंचि रामलिंगा रेड्डी ने स्थापित किए और लगभग तीस वर्ष तक अभ्युदय साहित्य (प्रगतिवाद) तथा साम्यवादी सौंदर्यशास्त्र का बोलबाला रहा. इसके बाद आए विद्रोह को अभिव्यक्‍त करनेवाले दिगंबर कवि और सशस्त्र क्रांति के समर्थक विप्लव [विरसम] कवि. परिवर्तन की तीव्रता को आत्मसात करते हुए तेलुगु साहित्य ने हाशियाकृत समुदायों के स्वर को स्त्री लेखन, दलित लेखन और अल्पसंख्यक मुस्लिम लेखन के माध्यम से बुलंद किया. 




भारतीय साहित्य के संदर्भ में तेलुगु की क्रांतिकारी कविता का अपना महत्व है. निखिलेश्‍वर याद दिलाते हैं कि जन संघर्ष से जुडी़ क्रांतिकारी कविता का सिलसिला ऐतिहासिक तेलंगाना किसान सशस्त्र आंदोलन से लेकर सातवें दशक के नक्‍सलवादी और श्रीकाकुलम आदिवासी आंदोलनों के साथ जुड़कर नए प्रतिमानों को कायम करता रहा. उन्होंने आगे बताया है कि जहाँ 'चेतनावर्तनम्‌' ने पुनरुथान की प्रवृत्ति अपनाई वहीं कवि सेना मेनिफेस्टो के साथ प्रकट हुए गुंटूर शेषेंद्र शर्मा ने चमत्कार और क्रांतिकारी आभास की कृत्रिम शैली को स्थापित किया, जबकि सी.नारायण रेड्डी नियोक्लासिकल धारा लेकर आए. 




कविता की ही भाँति कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में भी ऊपर वर्णित सारी प्रवृत्तियाँ जोरदार ढ़ंग से अभिव्यक्‍त हुईं. ‘मालापल्ली’ (चमारों का गाँव) उन्नव लक्ष्मीनारायण का ऐसा उपन्यास रहा जिसे उसी प्रकार मील का पत्थर माना जाता है जिस प्रकार हिंदी में प्रेमचंद और बंगला में शरत के उपन्यासों को. मनोवैज्ञानिक शिल्प के उपन्यासों में अल्पजीवी (रा वि शास्त्री), ‘असमर्थ की जीवन यात्रा’ (गोपीचंद), ‘अंतिम शेष’ (बुच्चिबाबु), ‘अंपशय्या’ (नवीन) तथा ‘हिमज्वाला’ (चंडीदास) उल्लेखनीय माने गए. परंतु सामाजिक उद्‍देश्‍यपरक उपन्यासों में विशेष रूप से चर्चित हैं - डॉ.केशव रेड्डी रचित ‘अतडु अडविनि जयिंचाडु’ (उसने जंगल को जीता), रामुडुन्नाडु-राज्यमुंडादी (राम है और राज्य भी है), बीनादेवी रचित ‘हैंग मी क्विक’ (मुझे तुरंत फाँसी दो) और अल्लम्‌ राजय्या रचित ‘कमला’ (उपन्यासिका). इन उपन्यासों की खास बात यह है कि इनमें तेलुगु भाषा की आंचलिक बोलियों का प्रयोग किया गया है. केशव रेड्डी रायलसीमा के चित्तूर जिले की बोली का इस्तेमाल करते हैं, बीनादेवी ने तटीय आंध्र की बोली का साहित्य में व्यवहार किया है तो अल्लम्‌ राजय्या ने तेलंगाना की बोली का. राजय्या की उपन्यासिका ‘कमला’ तेलंगाना के सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तनों को लेखबद्ध करती है. इसमें दर्शाया गया है कि किस तरह एक बुद्धू सा नौकर किष्‍टय्या सारे रीति रिवाज तोड़कर दमित दलित से क्रांतिकारी में बदल जाता है. तेलंगाना प्रांत के जीवन और भाषा को इस उपन्यास में पढ़ा जा सकता है.




निखिलेश्‍वर ने तेलुगु साहित्य की दलित धारा के शीर्ष पर गुर्रम्‌ जाषुवा को स्थापित किया है जिन्होंने मेघदूत की भाँति उल्लू के माध्यम से संदेश भिजवाया है. उनके काव्य ‘गब्बिलम्‌’ (चमगादड) में निहित यह संदेश किसी यक्षिणी का प्रेमसंदेश नहीं है बल्कि दलितों की दुर्गति का शोकसंदेश है जो संदेशकाव्य में अपनी तरह का इकलौता प्रयोग है. तेलुगु के दलित साहित्यकार विगत इतिहास के साहित्य में निहित तथाकथित ब्राह्‍मणवाद को उखाड़कर दलित जातियों की मौलिक संस्कृति को आधार बनाने के लिए संकल्‍पित हैं. उनका यह संकल्प सभी विधाओं में प्रकट हो रहा है. स्त्री लेखन और अल्पसंख्यक मुस्लिम लेखन ने भी बीसवीं शती के तेलुगु साहित्य में अपनी अलग पहचान कायम की हैं. स्त्री लेखन जहाँ पुरुष घमंड को छेदने में कामयाब रहा है वहीं मुस्लिम लेखन ने मुस्लिम समाज के भीतरी अंतर्विरोध और शेष समाज के साथ अपने संबंधों का खुलासा किया है. अन्य विधाओं की तुलना में निखिलेश्‍वर को तेलुगु की आलोचना विधा कमजोर प्रतीत होती है. 




निखिलेश्‍वर ने एक बेहद जरूरी सवाल उठाया है कि उत्तर आधुनिक कहे जानेवाले पिछले तीस वर्षों के साहित्यिक आंदोलनों में राष्‍ट्रीयता की अभिव्यक्‍ति किस हद तक है ? उन्हें लगता है कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में उभरे इन विद्रोही आंदोलनों से जुडे़ साहित्यकार राष्‍ट्रीयता के प्रश्‍न को प्रायः नगण्य मानकर चलते हैं और मानवता को अपने अक्षरों द्वारा खोजना चाहते हैं. यदि ऐसा है तो यह सचमुच चिंता का विषय है क्योंकि राष्‍ट्र की उपेक्षा करके जिस मानवता का हित साधन ऐसा साहित्य करना चाहता है उसके राष्‍ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्य क्या होंगे , यह स्पष्‍ट नहीं है. क्या ढेर सारे उछलते हुए मेंढ़कों को एक टोकरी में भर देने भर से भारतीयता सिद्ध हो जाती है ? लेकिन फिलहाल यहाँ यह प्रश्‍न उपस्थित नहीं है. उपस्थित है तेलुगु की विभिन्न विधाओं का प्रतिनिधि चयन ‘विविधा’ जिसमें 24 कविताएँ, 4 कहानियाँ, 1 नाटक और 1 साक्षात्कार शामिल हैं. 



अंततः जिंबो की एक कविता ‘हमारी नहर’ पाठकों के आत्म विमर्श हेतु प्रस्तुत है जो यह दर्शाती है कि कैसे एक हँसता गाता गाँव अपनी अस्मिता की तलाश में रणक्षेत्र बनने के लिए बाध्य हो जाता है  -



 "हमारी नहर -

अध्यापक की बेंत की मार से / 
आँख से टपक कर गालों पर फिसल कर, /
 सूखने वाले आँसुओं की धार जैसी, / 
बंजर बने खेत जैसे /
 गन्ने की मशीन के पास पडे़ निचोडे़ गए कचरे / 
बेजान सूखे साँप जैसी / 
आज हमारी नहर है. / 
पता नहीं कैसी अजीब बात है /
 इस पुल के बनने के पहले /
 हमारी नहर सोलहवें साल जवानी जैसी / 
तेज़ बह जाती थी / 
हमारे बतकम्मा फूलों को सिर पर सँवारे निकलती थी / 
तैरने के लिए अ आ ई सिखाती थी / 
हमारी गंदी नालियों को फिल्टर करती बह जाती थी / 
अब हमारी नहर की साँस में गूंगापन / 
हमारी  नहर की चाल में लंगडा़पन /  
पोखर की चारपाई के आधार पर / 
लटके बूढे़पन की भाँति / 
रह गई है हमारी नहर."
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* विविधा  (समकालीन तेलुगु साहित्य की विभिन्न विधाओं का विशिष्‍ट संकलन) /

 चयन एवं अनुवाद निखिलेश्‍वर /  2009 /

 क्षितिज प्रकाशन,
 वी - 8, नवीन शाहदरा, दिल्ली - 110 032 / 
पृष्‍ठ - 144 / 
मूल्य - रु.220 /-


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की १२५ वीं जयन्ती पर संगोष्ठी


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की १२५ वीं जयन्ती पर संगोष्ठी






आज दिनांक १३ दिसम्बर २००९ को महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद स्थित क्षेत्रीय केन्द्र में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के १२५ वीं जयन्ती के अवसर पर, ’आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और आलोचना का वर्तमान’ विषय पर एक संगोष्टी का आयोजन किया गया था। संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रख्यात कथाकार एवं इलाहाबाद विवि के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष दूधनाथ सिंह ने की और म.गा.अ.हि.वि.वि. के कुलपति प्रसिद्ध साहित्यकार विभूति नारायण राय इसके मुख्य अतिथि रहे। प्रमुख वक्ताओं में अध्यक्ष एवं मुख्यअतिथि के अतिरिक्त गोपेश्वर सिंह, भारत भारद्वाज, मुश्ताक़ अली, राकेश, उपेन्द्र कुमार एवं महेश कटारे थे। इसका संयोजन संतोष भदौरिया ने किया|


विषय प्रवर्तन करते हुये दिल्ली से पधारे हुये गोपेश्वर सिंह ने शुक्ल जी के आलोचना की आलोचनाओं पर विशेष प्रकाश डाला और बहुत सीमा तक शुक्ल जी के पक्ष की रक्षा करते हुये भी दिखे। उन्होने शुक्ल जी पर लगने वाले ब्राह्मणवाद एवं साम्प्रदायिकता के आरोपों का भी शुक्ल-साहित्य के अन्तःसाक्ष्यों के आधार पर खण्डन किया। उन्होने जब शुक्ल जी के अन्तर्विरोधों का उल्लेख किया तो वर्तमान आलोचना के सबसे बड़े नाम के भी अन्तर्विरोधों का संकेत देने में नहीं चूके। नामवर जी ने मलयज जी और नीलकान्त जी के आचार्य शुक्ल सम्बन्धी अलग विवेचनाओं में परस्पर विरोधी मन्तव्य व्यक्त किया है इसे उन्होने उद्धरण सहित प्रदर्शित किया। संयोग से नीलकान्त जी वहाँ उपस्थित थे और मुख्य अतिथि महोदय के विशेष आग्रह पर उन्होने अपना पक्ष संक्षेप में रखा लेकिन वे भी गोपेश्वर जी के विचारों के प्रति सहिष्णु रहे। गोपेश्वर जी ने कहा कि बहुत से दलित चिंतक और अतिउत्साही मार्क्सवादी उनपर इतिहास दृष्टि से हीन होने तथा ब्राह्मणवाद और साम्प्रदायिकता का आरोप लगाते हैं। ब्राह्मणवाद को परिभाषित करते हुये गोपेश्वर जी का कहना था कि जो वर्णाश्रम, पुनर्जन्म, अवतार और वेदान्त को मानता हो वह ब्राह्मणवादी है और इस दृष्टि से वे महात्मा गांधी, विवेकानन्द आदि को भी ब्राह्मणवादी बताकर शुक्ल जी के विचारों का रक्षा करते दिखे। उन्होने शुक्ल जी के अवदानो को रेखांकित करते हुये उनके काव्य-विवेक का विशेष उल्लेख किया। हिन्दी ’साहित्य का इतिहास’ लिख कर जो कार्य शुक्ल जी ने किया वह बाद के लोगों के लिये मार्ग दर्शक बना। शुक्ल जी द्वारा सिद्धों और नाथों की परम्परा तथा कबीर की उपेक्षा का कारण वे उनकी शुद्धतावादी सोच को बताते हैं। वे रहस्यवादिता के पक्षधर नहीं हैं। शुक्ल जी के अनुसार जगत एक ब्रह्म की अभिव्यक्ति है और कविता जगत की अभिव्यक्ति है। शुक्ल जी ने आलोचना के जो मानदण्ड स्थापित किये उसकी उपेक्षा परवर्ती काल के आलोचक उनकी आलोचना करते हुये भी नहीं कर सके। गोपेश्वर जी ने राम विलास शर्मा का भी सन्दर्भ देते हुये बताया कि किस प्रकार शर्मा जी ने शुक्ल जी पर लगने वाले ब्राह्मणवाद के आरोप का खन्डन किया था।


गोपेश्वर जी के बाद मुख्य अतिथि महोदय को आमंत्रित किया गया। विभूति जी ने एक प्रकार से शुक्ल जी पर ब्राह्मणवादी होने और साम्प्रदायिक होने के वामपन्थी आरोपों की रक्षा की लेकिन दबे स्वर में। इसके लिये उन्होने समय के दबाव को कारण माना। परन्तु एक बात उन्होने मुक्त कंठ से स्वीकार की कि साहित्य के इतिहास का वैज्ञानिक लेखन शुक्ल जी की ही देन है। बाद के जितने भी आलोचक या साहित्येतिहाकार आये उन्होने या तो उससे बड़ी लकीर खींचने की कोशिश की या छोटी लेकिन वे मूल लकीर को प्रतिस्थापित नहीं कर पाये। इसीलिये आज १२५ वर्ष बाद भी हम उन्हे याद कर रहे हैं।


इसके बाद ग्वालियर के महेश कटारे जी ने वातावरण को हल्का करने का प्रयत्न किया कि आलोचना वही सही है जो समझ में आये। आलोचना में गूढ़ता की उन्होने आलोचना की। उनके वक्तव्य की दो बाते प्रमुख थीं एक तो वर्तमान आलोचना में ग़ज़लों को कोई स्थान नहीं दिया जाता और दूसरा कि आलोचनायें रचनाओं के प्रमोशन के उद्देश्य से हो रही हैं उनके मूल्यांकन के लिये नहीं।


इसके बाद विवि के विशेष कार्याधिकारी राकेश जी का क्रम था। राकेश जी मुख्यरूप से रंगमच से जुड़े हैं। उन्होने भी अपनी पीड़ा व्यक्त की कि नाटकों को साहित्य की मुख्यविधा नहीं माना जाता और इस पर गम्भीर आलोचना नहीं होती। इसी क्रम में उन्होने आलोचना को अनवश्यक भी बता दिया।


राकेश जी के बाद उपेन्द्र कुमार एवं मुश्ताक़ अली का भी वक्तव्य हुआ जिसे मैं कतिपय कारणों से नहीं सुन पाया। जब मैं दुबारा सभागार में पहुँचा तो मुश्ताक़ जी अपना वक्तव्य समाप्त कर रहे थे जो सम्भवतः लम्बा खिंच गया था। ऐसा सचालक के बाद में दिये गये संकेतों से पता चला।


अब बारी थी भारत भारद्वाज की। भारत जी वर्धा विवि से प्रकाशित द्वैमासिक पत्रिका पुस्तक वार्ता के सम्पादक भी हैं। उन्होने इसके नवीनतम अंक(सितम्बर-अक्तूबर) में ’हिन्दी आलोचना के हिमालय : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल’ के नाम से सम्पादकीय लिखा है जो रोचक व पठनीय है। भारत जी अपने उद्बोधन में भावुक और किंचित विचलित से दिखे। सम्भवतः वे शुक्ल जी पर हो रही आलोचनात्मक टिप्पणियों से आहत थे। अपने वक्तव्य में उन्होने लगभग वही बातें कहीं जो उन्होने अपने संपादकीय में लिखी हैं अतः उन्हे यहाँ दुहराना उचित नहीं होगा(भारत जी से सम्पर्क का पता दे रहा हूँ इच्छुक जन उनसे सम्पर्क करके शायद सामग्री प्राप्त कर सकें)। अन्त में उन्होने यह कह कर अपनी बात समाप्त की कि शुक्ल जी के हिमालय पर चढ़ने का यत्न तो बहुतों ने किया लेकिन लौट कर कोई नहीं आया।
(इंटरनेट पर सार्वजनिक रूप में संपर्क सूत्र सदा के लिए टाँक देना सुरक्षा कारणों से उचित न होने के कारण उन्हें हटा दिया है| क.वा.)


अन्त में अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में दूधनाथ जी ने आरम्भ में ही स्थापना दी कि शुक्ल जी के निश्कर्षों का दायरा अन्तर्विरोधी है। उन्होने शुक्ल जी के उस विचार के बारे में भी बताया कि कविता के आस्वाद और विश्लेषण में अन्तर है। अच्छा लगना ही अच्छी कविता का मानदण्ड नहीं है।


दूधनाथ जी ने साहित्य के क्रमबद्ध इतिहास का श्रेय शुक्ल जी को ही दिया। उनके इतिहास लेखन पर प्रकाश डालते हुये उन्होने कहा कि रासो साहित्य को शुक्ल जी ने इतिहास में इसलिये शामिल किया क्योंकि उनका मानना था कि प्रसिद्धि भी किसी काल के लोकप्रवृत्ति की प्रतिध्वनि है। जो प्रासंगिक नहीं है वह महत्त्वपूर्ण नहीं होता तथा साहित्य इतिहास के अन्दर का इतिहास है जैसी उक्तियाँ भी दूधनाथ जी से सुनने को मिलीं।


दूधनाथ जी का यह भी कहना था कि उनके अनुसार विषय था ’आचार्य शुक्ल और आलोचना का वर्तमान’ लेकिन चर्चा शुक्ल जी को लेकर ज्यादा हुई आलोचना को लेकर कम। उनके अनुसार शुक्ल जी के पूर्व हिन्दी साहित्य में आलोचना थी ही नहीं। किसी वक्ता के द्वारा एक नाम याद दिलाने पर उन्होने उसे महत्त्व नहीं दिया। शुक्ल जी के कुछ पूर्वाग्रहों की चर्चा करते हुये उन्होने कहा कि शुक्ल जी सिद्धों के रहस्यवादी वचनों को साहित्य नहीं मानते लेकिन गोरखनाथ को वे एक हिन्दू योगी मानते हैं। यहाँ वे गोरखनाथ को वज्रयानियों या तंत्रमार्गियों से अलग करते हैं। शुक्ल जी के ब्राह्मणवाद की रक्षा तो दूधनाथ जी नहीं करते लेकिन साम्प्रदायिकता के आरोप से बहुत विद्वतापूर्ण ढंग से उन्हे निकालने का प्रयत्न करते हैं। इसके लिये वे मुस्लिम शासकों के समय शासन में जन की भागीदारी के अभाव को कारण मानते हैं। इसीलिये वे भक्तिकाल के साहित्य को जन के मौन को भंग करने का साहित्य मानते हैं। भक्ति को शुक्ल जी धर्म की भावात्मक अनुभूति कहते हैं। दूधनाथ जी के अनुसार सारा मध्यकालीन साहित्य वेदान्त के त्रिकोण (प्रस्थानत्रयी) पर टिका है। अतः भक्तिकालीन इतिहास लिखते समय शुक्ल जी ने तत्कालीन प्रवृत्तियों को प्रदर्शित किया है। अध्यक्ष महोदय ने छायावादी कवियों के बारे में शुक्ल जी के दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुये बताया वे पन्त को चित्रभाषा का कवि कहते हैं। महादेवी के बारे में उन्होने इतिहास के पहले लेखन में स्थान नहीं दिया था लेकिन बाद में उन्होने उनके दो उल्लेख किये हैं एक बार उन्होने कहा है कि ’लगता है महादेवी को पीड़ा का चस्का लग गया है।’और दूसरी बार कहा है कि ’यह बताना मुश्किल है कि यह पीड़ा वास्तविक है या पीड़ा की रमणीय कल्पना’। दूधनाथ जी दूसरी बात से इसलिए असमत हैं कि केवल अनुभव से लिखना तो अनुभववाद हो जायेगा। यदि कल्पना नहीं होगी तो कविता ही सम्भव नहीं होगी। उन्होने छायावाद के दो प्रमुख लक्षण बताये एक - चित्रछवि, दो - रहस्यानुभूति। इसी आधार पर दूधनाथ जी के अनुसार शुक्ल जी ने बाद मे महादेवी को सर्वश्रेष्ठ छायावादी कवि माना है। (दूधनाथ जी ने महादेवी वर्मा पर अभी एक पुस्तक लिखी है) लेकिन वे कहते हैं कि यदि शुक्ल जी को ’निराला’ की बाद की कवितायें पढ़ने का अवसर मिला होता तो वे निश्चित ही ’निराला’ को श्रेष्ठ छायावादी कवि बताते। यहाँ जो कारण दूधनाथ जी ने बताया वह चौंकाने वाला था। उन्होने कहा कि शुक्ल जी वेदान्तवादी और ब्राह्मणवादी थे, तुलसीदास भी थे और मुझे अब लगने लगा है कि निराला भी अपने अन्तिम दिनो में ब्राह्मणवादी हो गये थे। अतः निराला भी तुलसीदास की तरह प्रिय कवि होते। इसके पूर्व उन्होने निराला के उन दो लेखों की भी चर्चा की थी जिसके द्वारा उन्होने शुक्ल जी के आलोचना की खबर ली थी और उन्हे खूब खरी-खोटी सुनाई थी।


शुक्ल जी के अलोचना की पुनः चर्चा करते हुये उन्होने समय की कठिनाइयों का वर्णन भी किया कि उन्हे किस प्रकार तत्कालीन साहित्यकारों की मुखर आलोचना से बचना होता था और किस प्रकार बाबू श्याम सुन्दरदास चाहते थे कि हिन्दी साहित्य का इतिहास उन्ही के(श्याम सुन्दर दास) के नाम से छपे (इस सम्बन्ध में भारत भारद्वाज का सम्पादकीय पठनीय है) आदि। तत्कालीन परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनो के आधार पर उन्होने हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन का जो कार्य किया उसे बाद के इतिहास लेखकों ने भी अपनाया। बहुत से लोगों ने नया लिखने का दम भरते हुये भी शुक्ल जी की ही नकल की, वे कोई मौलिक कार्य नहीं कर सके।


और भी बहुत कुछ कहा गया इस अवसर पर परन्तु स्मृति, समय एवं स्थान की सीमा के कारण इतना ही।


सबसे अन्त में संयोजक और संचालक संतोष भदौरिया जी ने धन्यवाद ज्ञापन किया और स्वल्पाहार के बाद यह गोष्ठी सम्पन्न हुई। यह अनुभव किया गया कि गोष्ठी लम्बी हो गयी। कई आमंत्रित श्रोता अन्त तक धैर्य धारण नहीं कर सके। कुछ के पास वापस जाने सही जुगाड़ नहीं था इसलिये देर होती देख किसी के साथ लटक कर निकल लिये।


मेरे लिये यह अनुभव लाभकारी रहा। मैं विशेष रूप से भारत भारद्वाज और दूधनाथ जी को सुनने आया था परन्तु गोपेश्वर जी को भी सुनना एक सुखद अनुभव था। किसी साहित्यकार को यदि उसके जन्म के १२५ वर्ष बाद भी याद किया जाता है तो लगता है कि बन्दे में था दम। हिन्दी आलोचना और इतिहास की जब भी चर्चा होगी तो उसके आदिपुरुष के रूप में उन्हे याद किया जायेगा।

वर्धा विवि को मैं ऐसे कार्यक्रम के लिये धन्यवाद देता हूँ।


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