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देश, जनादेश और केजरीवाल - कविता वाचक्नवी

देश,जनादेश और केजरीवाल
- कविता वाचक्नवी 


जो व्यक्ति काश्मीर पाकिस्तान को देना चाहता है, जो देश के संविधान को पैर की जूती समझता है (कि विधानसभा भंग करने का आवेदन सौंपने के बाद अब पलटी मार रहा है), जो पदलोभ में अंधा है कि त्यागपत्र देने के बाद पुनः गद्दी की लालच में कल कॉंग्रेस से समर्थन माँगने गया था और संविधान व जनता के निर्णय को कुचल कर मुख्यमंत्री दुबारा होने की जुगत करता रहा, जो जनता द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के बाद छल से पुनः जनता पर शासन करना चाहता है, जिसके देशद्रोहिता के प्रमाण वीडियो में इसके साथियों ने स्वयं दिए हैं, उस व्यक्ति के प्रति अपनी आस्था रखने वाले अपने मित्रों से मैं खेद पूर्वक कहना चाहूँगी कि मुझे उनकी समझ व निष्पक्षता और विवेक पर संदेह होने लगे हैं।


इस व्यक्ति ने देश और संविधान के साथ तो भीषण गद्दारियाँ की ही हैं, जनता के साथ भी भयंकर छल किया है। मुझे सुदर्शन जी की 'हार की जीत' कहानी बार बार याद आती है। जनता के मन से भ्रष्टाचार हटाओ का विश्वास ही इस धूर्त ने समाप्त कर दिया।कानून को, जनता को और देश को और ईमान को अपनी जेब में रखी इकन्नी समझ रखा है इस व्यक्ति ने। प्रधानमंत्री तक को कानून के डायरे में लाने की बात करने वाले ने कानून का मज़ाक उड़ा रखा है। आज यदि वह जेल गया है तो यह कोई महानता या बलिदान नहीं अपितु देश की संवैधानिक प्रक्रिया है। संविधान के साथ खेलने का अधिकार किसी को नहीं। .... और कौन नहीं जानता कि जमानत को स्वयं ठुकरा कर इसने कोर्ट को जेल भेजे जाने को बाध्य किया है। जिसका परिवार दुबई में छुट्टियाँ मनाने जाता है, जो चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद वाराणसी से फ्लाईट लेकर दिल्ली आता है, जो प्रायोजित धन से भाड़े के कार्यकर्ता 25000 प्रतिमाह का भुगतान कर खरीदता है, उसके पास मामूली जमानतराशि भी नहीं है भला? यह नीतीश कुमार की तरह जनता की सहानुभूति लेने की नौटंकी है जो यह समझता है कि जनता इसे उसका बलिदान व त्याग समझेगी और उसके पक्ष में हो जाएगी। यदि यह इतना ही ईमानदार व जनता के प्रति प्रतिबद्ध होता तो स्वयं कहता कि जनता ने इस बार दिल्ली से एक भी आप प्रतिनिधि को न जिता कर जो जनादेश दिया है मैं उसका सम्मान करता हूँ। और स्वयं को इस कुर्सी की दौड़ से अलग ही रखूँगा। पर वह यह कभी नहीं कर सकता। यह एक तरह से जनादेश द्वारा बाहर का रास्ता दिखा दिए जाने के बावजूद जनता पर छल कपट और तिकड़म से शासन करने की मंशा के चलते अब खेला जा रहा नाटक है इसका कि संविधान का दुरुपयोग कर पुनः मुख्यमंत्री बन जाए।   


मुझे आश्चर्य होता है उन बुद्धिजीवी मित्रों पर जो कॉंग्रेस से मोह भंग हो जाने पर अब भाजपा विरोधी होने की कारण मोदी जी का समर्थन न कर पाने की अपनी विवशता में इतना बंधे हैं कि उन्हें कजरी बाबू के काले कारनामों नजर ही नहीं आते। कजरी के अपने सभी साथी, यहाँ तक कि किरण बेदी और अन्ना जी जैसों ने उसे निष्कासित कर उसका साथ छोड़ दिया, उन पर तो भरोसा रखिए। या कजरीभक्ति में सच भी देखना नहीं चाहते ! वस्तुतः यह आप लोगों की आस्था के संकट की घड़ी है, कॉंग्रेस के बाद अब कजरी के अतिरिक्त कोई आधार ही नहीं बचा इसलिए कजरी को महान सिद्ध करना आपकी मजबूरी है। यही समझ आता है।


60 बरस से अधिक समय से साहित्य, पत्रकारिता, अध्यापन, राजनीति शिक्षा और अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों पर कब्जा कर जनता और देश विदेश को छला गया, सच्चाई के गले घोंटे गए, जिसे चाहा हत्यारा, बर्बर और जाने शब्दकोश की किन किन गालियों से नवाजा गया, केवल और केवल कॉंग्रेस और देशद्रोहिता की राजनीति हुई है, हो रही है, भीषण और गंदी से गंदी राजनीति। हम चुप रहे। अब देश के ऐसे संक्रमण काल में भी यदि चुप रहेंगे और जनाधार का निर्माण करने में सहयोगी न बनेंगे तो अपने देशधर्म का निर्वाह न करने का अपराध करूँगी। इसलिए जनता को जिस भाषा और जिस लहजे में समझ आता है उसी भाषा और लहजे में अपना देशधर्म निभाना अनिवार्य है। निभाना चाहिए। निभा रही हूँ।


जिनकी विचारधारा चीन से और अरब देशों के पैसों द्वारा पोषित विचारधारा के हाथों गिरवी है, उन्हें मेरे देशधर्म के निर्वाह पर आपत्ति होना स्वाभाविक है क्योंकि उनकी आस्थाओं की जड़ें कहीं अन्यत्र हैं। मैंने कभी उनके यहाँ जाकर उनकी विचारधारा का गला घोटने का काम नहीं किया, ऐसी ही अपेक्षा मैं भी उनसे करती हूँ।

 जिनकी आँखें न खुली हों, उनकी सहायतार्थ यह वीडियो - 




और यह भी - 


यह लोकतंत्र की अपूर्व विजय है

यह लोकतंत्र की अपूर्व विजय है
डॉ. वेदप्रताप वैदिक


यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की अपूर्व विजय है। टीवी चैनलों के कुछ एंकरों ने पूछा कि 2014 की विजय, 1971 और 1984 की विजय से भी बड़ी कैसे है? 1971 में इंदिरा गांधी को 352 सीटें मिली थीं और 1984 में राजीव गांधी को 410 सीटें मिली थीं। भाजपा और मोदी को तो अभी 350 सीटें भी नहीं मिलीं हैं और आप इस जीत को अपूर्व कह रहे हैं? इसका कारण क्या है?

ज़रा याद करें कि 1971 में क्या हुआ था? इंदिराजी पाँच साल तक भारत की प्रधानमंत्री रह चुकी थीं। नेहरु की बेटी थीं। कांग्रेस अध्यक्ष होने का भी उनका अनुभव था। इसके अलावा उन्होंने कांग्रेस के सारे खुर्राट नेताओं को पटकनी मारकर इंदिरा कांग्रेस खड़ी कर दी थी। बैंकों के राष्ट्रीयकरण और उसके बाद गरीबी हटाओ के नारे ने देश का ध्यान खींचा था। 1971 के चुनाव में क्या हुआ? वे कम सत्ता से ज्यादा सत्ता में आ गईं लेकिन मोदी मात्र मुख्यमंत्री थे। वे किसी प्रधानमंत्री के बेटे भी नहीं थे। वे पार्टी अध्यक्ष भी नहीं रहे। उनका अखिल भारतीय अनुभव भी अत्यंत सीमित था। वे एक ऐसी पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे, जो दस साल से सत्ता से बाहर थी और जिसका नेतृत्व भी एकजुट नहीं था। लेकिन 2014 के चुनाव में क्या हुआ? पहली बार एक प्रांतीय नेता ने देश का दौरा किया। कोई प्रांत नहीं छोड़ा। करोड़ों लोगों को साक्षात् संबोधित किया। लाखों कि.मी. यात्राएं कीं। दस साल प्रधानमंत्री रहने पर भी जितना देश को मनमोहनसिंह ने देखा, उससे भी ज्यादा देश को साल भर में जाना और पहचाना मोदी ने। मोदी की वजह से मतदान का जो प्रतिशत बढ़ा, वह अपूर्व था। मोदी की सभाओं में जैसा उत्साह का ज्वार उमड़ता था, वैसे मैंने 1952 से अब तक के किसी चुनाव में नहीं देखा। इसीलिए पिछले दो माह से मैं कहता रहा कि भाजपा-गठबंधन को 300 से ज्यादा सीटें मिलेंगी। सारे लोकमत और लगभग सभी मतदानों के अंदाजी घोड़े गलत साबित हुए। विपक्ष पहले भी हारा है लेकिन कांग्रेस जैसी महान पार्टी का आकार हाथी से सिकुड़कर बकरी का रह जाए, क्या यह अपूर्व नहीं है?

जहाँ तक 1984 की विजय का प्रश्न है, वह राजीव की नहीं, शहीद इंदिरा गांधी की विजय थी। शहीद इंदिराजी को विरोधी दलों के समर्थकों ने भी वोट दिए थे। वह चुनाव नहीं था। वह एक महान शहीद को राष्ट्र की श्रद्धांजलि थी। 2014 के वोट ने फिरोज गांधी-परिवार को राजनीतिक श्रद्धांजलि दे दी है। इंदिराजी चुनाव के पहले शहीद हुई थीं और फिरोज गांधी-परिवार चुनाव के बाद शहीद हो गया है। 2014 के चुनाव में लोगों को 1984 की तरह गुस्सा नहीं था। निराशा थी। देश को लगा कि वह ठगा गया है। उसने अपना देश अ-नेताओं को थमा दिया है। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे सज्जन में प्रधानमंत्री की कोई भी कुव्वत नहीं है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का श्रेय सबसे ज्यादा मैं किसी को देता हूँ तो वह सोनियाजी और मनमोहनसिंहजी को देता हूँ। राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो ज्ञानी जैलसिंह की कृपा से बने लेकिन नरेंद्र मोदी बन रहे हैं तो वे अपने पुरुषार्थ से बन रहे हैं। कांग्रेस को अपने किए और अनकिए का फल भुगतना ही था। उसे तो हारना ही था। नरेंद्र मोदी की खूबी यह है कि उन्होंने इस हार को अपूर्व और एतिहासिक बना दिया। कहा भी है कि ‘आशिक का जनाजा है, जरा धूम से निकले’।

इस चुनाव की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें 1971 की तरह कोई नाटकीयता नहीं थी और इसमें 1984 की तरह खौलता हुआ गुस्सा नहीं था। एक ठंडी समझ थी। इस गंभीर समझ के कारण भारत के लोगों ने भारतीय राजनीति के जातिवादी और सांप्रदायिक चरित्र को बदल दिया। प्रांतों के जातिवादी दिग्गजों ने जैसी पटकनी इस चुनाव में खाई, क्या इससे पहले किसी चुनाव में खाई? लालू, नीतिश, मुलायम, मायावती, देवेगौड़ा आदि कहाँ हैं? क्या हुआ, उनके जातीय वोट-बैंकों का? भारत के नागरिकों को मवेशियों की तरह थोकबंद वोट डालने से इस बार मुक्ति मिली हैं जहाँ तक वोटों के सांप्रदायिक बँटवारे का सवाल है, वह अपरिहार्य था। उसे टाला नहीं जा सकता था। लेकिन उसे ठीक से समझा जाना चाहिए। अल्पसंख्यकों ने मोदी को जिस वजह से वोट नहीं दिए, वह समझ में आती है लेकिन देश के अन्य सभी लोगों ने मोदी को जो वोट दिए, उसकी वजह अल्पसंख्यक नहीं थे। याने वास्तव में वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को वोट नहीं है। वह विकास का वोट था। आशा का वोट था। वह ठगी के विरुद्ध वोट था। उसके पीछे किसी प्रकार की सांप्रदायिक संकीर्णता या घृणा नहीं थी। सच पूछा जाए तो 2014 के चुनाव में सांप्रदायिकता कोई मुद्दा ही नहीं था। जाहिर है कि प्रधानमंत्री मोदी ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की राह पर निष्ठापूर्वक चलेंगे तो जो वोट उन्हें 2014 में नहीं मिले हैं, वे भी 2019 में उन्हें मिलेंगे।

इस चुनाव में भारतीय राजनीति की शक्ल को एक और ढंग से बदला है। इसने भाजपा को अखिल भारतीय दल और कॉंग्रेस को प्रांतीय दल बना दिया है। एकाध राज्य को छोड़कर सभी राज्यों में भाजपा का खाता खुल गया है जबकि कई राज्यों में कांग्रेस का सूंपड़ा ही साफ है। जहाँ वह बची है, वहाँ भी एकदम लहूलुहान होकर! महान से लहूलुहान, ऐसी दुर्गति पहली बार हुई है।

पहली बार ऐसा व्यक्ति भारत का प्रधानमंत्री बना है, जिसकी माँ घरेलू सेविका का काम करके अपने बच्चों का पोषण और शिक्षण करती रही है। वह स्वयं स्टेशन पर चाय बेचकर अपना गुजारा करता था। यह देश के 100 करोड़ गरीब और मजलूमों से तदाकार होना नहीं है तो क्या है? ला.ब. शास्त्रीजी के अलावा नरेंद्र मोदी ऐसे एकमात्र प्रधानमंत्री बने हैं, जिनकी अपनी माँ के चरणस्पर्श करके आशीर्वाद प्राप्त किया है। ऐसे प्रधानमंत्री को तो वर्ग-चेतना के हामी कम्युनिस्टों को भी क्या सलाम नहीं करना चाहिए?



हिन्दी दिवस से पहले हिन्दी के लिए एक विजय





देश का संविधान चीख-२ कर कहता है कि हिन्दी भारत की राजभाषा है और कामकाज हिन्दी में होना चाहिए पर यह बात भारत सरकार के विभिन्न विभागों और मंत्रालयों में बैठे अधिकारी हिन्दी के नाम पर पिछले ६६ वर्षों से खानापूर्ति करते आ रहे हैं और अंग्रेजी का वर्चस्व जस का तस है.


नवी मुंबई में निवासरत एक युवा हिन्दीप्रेमी ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत 'पत्र सूचना कार्यालय' [पसूका] में राजभाषा की घोर उपेक्षा का प्रकरण अपने हाथ लिया, ६ फरवरी २०१३ से निरंतर उन्होंने पत्र सूचना कार्यालय के अधिकारियों को ईमेल भेजना आरम्भ किया, कई अनुसमारक भेजे, पर उत्तर ना आया. राजभाषा अधिनियम के उल्लंघन की शिकायत राजभाषा विभाग को भेजी गई. पर बात आगे नहीं बढ़ी. शिकायत पर राजभाषा विभाग द्वारा कोई कार्यवाही ना होने से हताश होकर अंतिम हथियार के रूप में शिकायतकर्ता 'सूचना का अधिकार अधिनियम' का सहारा लिया और एक आवेदन लगाया और पसूका से राजभाषा के अनुपालन से जुड़े ढेरों प्रश्न पूछ डाले जिन पर पसूका के केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारियों को अपनी गलती का भान हुआ और कार्यालय को १९९२ के उस निर्देश का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया है कि जहाँ-२ हिन्दी अंग्रेजी का एकसाथ प्रयोग होगा, वहाँ -२ हिन्दी को अंग्रेजी के ऊपर प्राथमिकता दी जाएगी क्योंकि राजभाषा हिन्दी है ना कि अंग्रेजी. आरटीआई आवेदन के कई प्रश्नों के ठीक-२ उत्तर नहीं दिए, तब आवेदक ने प्रथम अपील लगा दी. 


अपील के उत्तर में पसूका ने स्पष्ट किया कि वे पसूका की वेबसाइट की सभी सेवाओं में हिन्दी को प्राथमिकता देंगे एवं हिन्दी की सम्पूर्ण सामग्री को अंग्रेजी की सामग्री के पहले/ऊपर/आगे प्रकाशित किया जाएगा.


और कल का दिन 'इतिहास' बन गया है. कल से पसूका की वेबसाइट http://pib.nic.in/newsite/mainpage.aspx पर भारत की राजभाषा को उसका उचित स्थान मिल गया, वेबसाइट पर कई सेवाओं जो पहले केवल अंग्रेजी में थी, अब हिन्दी में उपलब्ध हैं. हिन्दी की विज्ञप्तियों को अंग्रेजी से ऊपर कर दिया गया है, सभी टैब द्विभाषी बना दिए गए हैं. पहले हिन्दी में उन्नत खोज का विकल्प नहीं था, उसे आरम्भ कर दिया गया है, इस तरह दस्तावेज, आलेख आदि को अंग्रेजी सामग्री से नीचे प्रकाशित किया जाता था, उसे भी हिन्दी में ऊपर लगा दिया गया है.


शीघ्र ही फोटो का विवरण भी द्विभाषी रूप में उपलब्ध होगा आज तक उसे केवल अंग्रेजी में डाला जा रहा है. पसूका के ट्विटर एवं यू-ट्यूब पर भी नवीन जानकारी द्विभाषी रूप में शुरू की जा रही है.


सरबजीतों को यों मरने न दें


- डॉ. वेद प्रताप वैदिक 


'दो से ज्यादा रहे होंगे सरबजीत सिंह के हत्यारे'सरबजीत सिंह अगर भारतीय जासूस होता या आतंकवादी होता तो क्या हमारी सरकार को पता नहीं होता? सरकार को सरबजीत के बारे में सब कुछ पता था| पता ही नहीं था, उसे गहरा विश्वास था कि वह जासूस नहीं था और लाहौर में हुए बम विस्फोट से उसका कुछ लेना-देना नहीं था| यह तथ्य सरबजीत की हत्या के बाद आए प्रधानमंत्री और विदेश सचिव के बयानों से भी सिद्घ होता है तो फिर क्या वजह है कि सरबजीत की रिहाई और रक्षा के प्रति हमारी सरकार ने इतना ढुल-मुल रवैया अपना रखा था? पहचान की गड़बड़ी के कारण असली अपराधी मंजीतसिंह छूट गया और उसकी जगह सरबजीत फंस गया| उसने 22 साल कोट लखपत की जेल में काट दिए और अब उसकी हत्या भी हो गई| इस नृशंस कांड के लिए आखिर किसे जिम्मेदार ठहराया जाए?

चीन की अशोभनीय पैंतरेबाजियाँ



- डॉ. वेदप्रताप वैदिक 



चीन गज़ब का पैंतरेबाज मुल्क है| एक ओर वह भव्य और गरिमामय महाशक्ति का आचरण करते हुए दिखाई देना चाहता है और दूसरी ओर वह ओछी छेड़खानियों से बाज नहीं आता| अभी 15 अप्रैल को उसकी फौज ने सीमांत के दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में घुसकर अपने तंबू खड़े कर दिए हैं| वे ​नियंत्रण-रेखा के पार भारतीय सीमा में 10 किमी तक अंदर घुस आए हैं| लगभग ऐसा ही उन्होंने जून 1986 में सोमदोरोंग चू में किया था|वहाँ से उन्होंने 1995 में अपने आप वापसी करके भारत को प्रसन्न कर दिया था|

हिन्दी को टूटने से बचाएँ


    हिन्दी को टूटने से बचाएँ : संदर्भ आठवीं अनुसूची
   डॉ. अमरनाथ



संसद का आगामी मॉनसून सत्र हमारी राजभाषा हिन्दी के लिए सुनामी का कहर बनकर आएगा और उसे चन्द मिनटों मे टुकड़े-टुकड़े करके छिन्न-भिन्न कर देगा। चन्द मिनटों में इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने विगत 17 मई 2012 को लोक सभा के सांसदों को आश्वासन दे रखा है कि इसी सत्र में भोजपुरी सहित हिन्दी की कई बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने वाला बिल संसद में पेश होगा। यदि हमने समय रहते इस बिल के पीछे छिपी साम्राज्यवाद और उसके दलालों की साजिश का पर्दाफाश नहीं किया तो हमें उम्मीद है कि यह बिल बिना किसी बहस के कुछ मिनटों में ही पारित हो जाएगा और हिन्दी टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाएगी। इस देश के गृहमंत्री की जबान से इस देश की राजभाषा हिन्दी के शब्द सुनने के लिए जो कान तरसते रह गए उसी गृहमंत्री ने हम रउआ सबके भावना समझतानीं जैसा भोजपुरी का वाक्य बोलकर भोजपुरी भाषियों का दिल जीत लिया। सच है भोजपुरी भाषी आज भी दिल से ही काम लेते हैं, दिमाग से नहीं, वर्ना, अपनी अप्रतिम ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक समृद्धि, श्रम की क्षमता, उर्वर भूमि और गंगा यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियों के रहते हुए यह हिन्दी भाषी क्षेत्र आज भी सबसे पिछड़ा क्यों रहता ? यहाँ के लोगों को तो अपने हित- अनहित की भी समझ नहीं है। वैश्वीकरण के इस युग में जहाँ दुनिया के देशों की सरहदें टूट रही हैं,  टुकड़े टुकड़े होकर बिखरना हिन्दी भाषियों की नियति बन चुकी है।

अपनी भाषा से भेद क्यों ?



अपनी भाषा से भेद क्यों ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
               
                आस्ट्रेलियाई सरकार ने कहा है कि भारत जानेवाले उसके राजनयिकों को हिंदी सीखने की जरूरत नहीं हैक्योंकि वहाँ सारा काम-काज अंग्रेजी में होता हैप्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने तो यहाँ तक कहा है कि ''भारत एक अंग्रेजीभाषी लोकतंत्र है|'' आस्ट्रेलिया के विदेशी मामलों के एक प्रमुख विशेषज्ञ इयान हाल ने अपनी सरकार को सलाह दी थी कि भारत में नियुक्ति किए जानेवाले राजनयिकों को हिंदी इसलिए भी सिखाई जाए कि ऐसा करने से भारत का सम्मान होगाजब जापानचीनकोरियाइंडोनेशियाईरान और तुर्की जैसे देशों में भेजे जानेवाले राजनयिकों को उन देशों की भाषा सीखना अनिवार्य है तो भारत की उपेक्षा क्योंइस पर आस्ट्रेलिया के विदेश व्यापार सचिव का कहना था कि जब भारत ही अपना सारा काम-काज अंग्रेजी में करता है तो आस्ट्रेलियाई राजनयिकों को क्या पड़ी है कि वे हिंदी सीखें?

आईसीयू में पड़ी भारतीय भाषाएँ



आईसीयू में पड़ी भारतीय भाषाएँ
किंशुक पाठक, प्राध्यापक, बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, पटना





तीन सौ से अधिक भारतीय भाषाओं के अकाल मृत्यु के द्वार पर पहुँचने की खबर से कोई खलबली नहीं मची। यह चिंता का विषय होना चाहिए। मानव संचार का मूल आधार है भाषा। प्रतीकों की भाषा, बिंदु-रेखाओं से बनी भाषा, आंगिक भाषा जैसे अनेक भाषायी रूपों को सभ्य समाज ने खूब पहचाना है और महत्व दिया है। फिर भारत की भाषाओं की मृत्यु की आशंकाओं का समाचार और आंकड़े हमें क्यों नहीं कुरेदते? इन्हें बचाने, सजाने-संवारने को हम क्यों नहीं उद्वेलित होते?

पुलिस अफसर हत्या : दूसरा पहलू

पुलिस अफसर हत्या : दूसरा पहलू
- डॉ वेदप्रताप  वैदिक 




मुरैना में होली के दिन हुई पुलिस अफसर नरेंद्र कुमार की हत्या ने सारे देश में सनसनी-सी फैला दी थीमाना यह जा रहा था कि वह किसी खनन-माफिया की करतूत है और यह नहीं हो सकता कि इस माफिया के मप्र सरकार के साथ सूत्र न जुड़े होंयह कैसे हो सकता है कि एक मामूली ट्रैक्टर ड्राइवर एक पुलिस अफसर को कुचल कर मार डालेकांग्रेस के कुछ प्रांतीय नेताओं ने टीवी चैनलों पर यह तक कह डाला कि खनन माफिया के तार सीधे मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी के साथ जुड़े हैंलेकिन अब अखबारों में जो तथ्य आ रहे हैंउनसे सारे निष्कर्ष उल्टे पड़ते दिखाई पड़ रहे हैंट्रैक्टर चलाने वाले किसान मनोज गूजर ने माना कि नरेंद्र कुमार को उसी के ट्रैक्टर ने कुचला है लेकिन यह जान-बूझकर नहीं हुआ हैपुलिस अफसर नरेंद्र कुमार ने मनोज पर पिस्तौल तानी और उसे रुकने के लिए कहालेकिन मनोज ने डर के मारे ट्रैक्टर तेजी से भगा लियाइस पर नरेंद्र ने ऊपर कूदकर ट्रैक्टर का स्टीयरिंग व्हील पकड़ने की कोशिश की और वे फिसलकर नीचे गिर पड़ेइस हड़बड़ में वे कुचले गएमनोज के भाइयों का कहना है कि वह अच्छे पुलिस अफसर थे और उनके उनके परिवार का कोई झगड़ा नहीं थालोग अपना ट्रैक्टर इसलिए अंधाधुंध भगा ले जाते है कि पकड़े जाने पर पुलिस मोटी रिश्वत माँगती है|

"हिन्दी सीखो और प्रांतीयता का त्याग करो" : बंगालियों को सुभाष चन्द्र बोस की सलाह

 "हिन्दी सीखो और प्रांतीयता का त्याग करो"
बंगालियों को सुभाष चन्द्र बोस की सलाह 





8 जुलाई 1939 के "हिंदुस्तान" समाचार पत्र में बाबू सुभाष चन्द्र बोस के विषय में एक समाचार छपा था जिसमें अन्य कई विषयों सहित सुभाष बाबू ने जबलपुर के बाङ्ला समाज को हिन्दी सीखने व प्रांतीयता का त्याग करने की सलाह दी।

आज सुभाष बाबू के जन्मदिवस (23 जनवरी) पर, अमर सेनानी को प्रणाम सहित, प्रस्तुत है उस ऐतिहासिक समाचार की रिपोर्ट - 







षडयंत्र है या अनभिज्ञता


 षडयंत्र है या अनभिज्ञता

 - प्रो. सुरेन्द्र गंभीर








मान्यवर प्रभु जोशी जी और राहुलदेव जी ने एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर हमारा ध्यान खींचा है।
भारत में हिन्दी की और न्यूनाधिक दूसरी भारतीय भाषाओं की स्थिति गिरावट के रास्ते पर है। ऐसी आशा थी कि समाज के नायक भारतीय भाषाओं को विकसित करने के लिए स्वतंत्र भारत में क्रान्तिकारी कदम उठाएँगे परंतु जो देखने में आ रहा है वह ठीक इसके विपरीत है। यह षडयंत्र है या अनभिज्ञता इसका फ़ैसला समय ही करेगा।




भाषा के सरलीकरण की प्रक्रिया स्वाभाविक है परंतु वह अपनी ही भाषा की सीमा में होनी चाहिए। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आज अंग्रेज़ी और उर्दू के बहुत से शब्द ऐसे हैं जिसके बिना हिन्दी में हमारा काम सहज रूप से नहीं चल सकता। ऐसे शब्दों का हिन्दी में प्रयोग सहज और स्वाभाविक होने की सीमा तक पहच चुका है और ऐसे शब्दों के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए किसी को कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। यह भी ठीक है कि हिन्दी में भी कई बातों को अपेक्षाकृत सरल तरीके से कहा जा सकता है। परंतु यह सब व्यक्तिगत या प्रयोग-शैली का हिस्सा है। विभिन्न शैलियों का समावेश ही भाषा के कलेवर को बढ़ाता है और उसमें सर्जनात्मकता को प्रोत्साहित करता है।

संभव है आप भी मेरी तरह भावुक हो कर फूट फूट कर रो पड़ें

आप को अत्यंत सुखद आश्चर्य हो सकता है अथवा संभव है कि आप भी मेरी तरह भावुक हो कर फूट फूट कर रो पड़ें कि इस पाकिस्तानी चैनल के प्रस्तोता ने लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की सादगी, ईमानदारी, त्याग, आदर्शों और जीवन पर एक समूचा कार्यक्रम ही समर्पित कर दिया ( आगे स्वयं देखें )।

भारतीय भाषाओं की अस्मिता की रक्षा के लिए : भोपाल घोषणा-पत्र


भारतीय भाषाओं की अस्मिता की रक्षा के लिए
भोपाल घोषणा-पत्र

(नीचे के प्रारूप से जो भी मित्र सहमत हों वे अपने हस्ताक्षर करते चलें ताकि शीघ्रातिशीघ्र केंद्र सरकार को भेजा जा सके।

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भोपाल में 24 और 25 सितम्बर 2011 को `भूमण्डलीकरण और भाषा की अस्मिता' विषय पर आयोजित परिसंवाद के हम सभी सहभागी महसूस करते हैं कि हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की अस्मिता ही नहीं, अस्तित्व तक खतरे में हैं। 


स्वतन्त्र भारत को एक सम्पन्न, समतामूलक तथा स्वाभिमानी देश के रूप में विकसित होना चाहिए था। यह जीवन के सभी क्षेत्रों में भारतीय भाषाओं के उपयोग से ही सम्भव था, किन्तु न केवल हमारी अपनी भाषाओं की उपेक्षा की गयी, बल्कि इनकी कीमत पर अंग्रेजी को अनुचित बढ़ावा दिया गया। इसके पीछे जो वर्गीय नज़रिया था, उसने हमें एक औद्योगिक राष्ट्र बनने से रोका, हमारी खेती को चौपट किया, आम जनता से सरकारी तन्त्र की दूरी बढ़ाई और शिक्षा तथा पूँजी के वर्चस्व ने इस प्रकिया की रफ्तार को खतरनाक ढ़ंग से बढ़ाया है।


हम मानते है कि वर्तमान भूमण्डलीकृत निजाम में भारत की जो हैसियत, भूमिका और दिशा है उसमें ज़्यादातर हिन्दुस्तानियों की भौतिक खुशहाली तथा सांस्कृतिक उन्नति की कोई गारन्टी नही है। उनकी अपनी भाषाओं का दमन, उनकी भौतिक विपन्नता और लोकतान्त्रिक व्यवस्था में उनकी समुचित हिस्सेदारी के अभाव के लिए जिम्मेदार है। इसलिए हमारी नजर में जन-भाषाओं की रक्षा, तरक्की और फैलाव का सुनिश्चित कार्यक्रम अपना कर तथा इस पर अमल की प्रक्रिया में शिक्षा, प्रशासन, न्याय तथा जीवन के सभी अहम पहलुओं से जुड़ी व्यवस्थाओं में गहरे परिवर्तन ला कर हम भारत के संविधान के आदर्शों एवं लक्ष्यों को हासिल कर सकते है।


अंगे्रजी से हमारा कोई दुराव नही है हम इसकी शक्ति, दक्षता और खूबसूरती के कायल है। हम चाहते है कि हमारे लोग दुनिया की अन्य समृद्ध भाषाओं के साथ-साथ अंगे्रजी से भी लाभान्वित हो, लेकिन हम नही चाहते कि अंग्रेजी या कोई भी विदेशी भाषा सम्पूर्ण भारत के समग्र विकास में रोड़े खड़े करे तथा हिन्दुस्तानियों की एक बहुत बड़ी जमात को अपने ही घर में पराया बना दे। हमें यकीन है कि अंग्रेजी के सच्चे प्रेमी अंग्रेजी को शोषण, अन्याय, विषमता तथा अविकास का औजार बनते देखकर खुश नही हो सकते। इसलिए हम इस भोपाल घोषणा-पत्र को अंगीकार करते हुए यह चाहते है और माँग करते हैं कि -


1. भारत के सार्वजनिक में यथासंभव भारतीय भाषाओं का प्रयोग हो। 


2. नीचे से लेकर ऊपर तक समस्त शिक्षा भारतीय भाषाओं में दी जाये। इसकी तुरन्त शुरुआत प्राथमिक शिक्षा से की जाये। जिन विषयों की बेहतरीन किताबें भारतीय भाषाओं में नहीं है, उन्हें तैयार करने का काम विद्वानों की टोलियों को सौंपा जाए। यह काम ज्यादा से ज्यादा दस वर्ष की मियाद मंे पूरा किया जाना चाहिए। इसके चार चरण हो सकते हैं-पहले माध्यमिक शिक्षा स्तर तक, उसके बाद स्नातक स्तरप तक, फिर उत्तर-स्नातक और शोध तक और अन्त में तकनीकी विषयों की शिक्षा।


3. किसी भी भारतीय को अंग्रेज या कोई विदेशी भाषा सीखने के लिए बाध्य न किया जाये। प्रत्येक भारतीय को संविधान-मान्य भाषा में उच्चतम स्थान तथा पद तक जानेका अधिकार होना चाहिए। 


4. सभी तरह की औद्योगिक प्रक्रियाओं तथा जन माध्यमों से अंग्रेजी को रुखसत करते हुए देशी भाषाओं को उनका हक दिया जाये।


5. धारा सभाओं, प्रशासन एवं अदालतों से अंग्रेजी को हटाने के लिए एक मियाद तय की जाये और किसी भी हालत में उस मियाद को न बढ़ाया जाये।


6. राज्यों की भाषा क्या हो, इस पर विवाद नहीं है। पर केन्द्र का मामला उलझा हुआ है। हम महसूस करते हैं कि बहुभाषी केन्द्र चलाना व्यावहारिक नहीं है। इसलिए, जैसा कि संविधान कहता है, केन्द्र की भाषा हिन्दी ही रहे, लेकिन केन्द्रीय नौकरियों की संख्या और नौकरशाहों की शक्ति को देखते हुए केन्द्र की राजभाषा के रूप में हिन्दी को ऐसे अतिरिक्त अवसर नहीं मिलने चाहिए, जिससे अन्य भाषा-भाषियों को अनुभव हो कि उनके साथ अन्याय हो रहा है। इसलिए हम चाहते हैं कि केन्द्र के पास सेना, मुद्रा, विदेश नीति तथा अन्तरराज्यीय संसाधन जैसे विषय ही रहें और बाकी सभी अधिकार राज्यों, जिलों एवं स्थानीय निकायों के बीच बांट दिये जाएं। इससे कई राज्यों में हिन्दी के प्रति जो आक्रोश दिखाई पड़ता है, वह खत्म हो सकता है और भारतीय भाषाओं की पारिवारक एकता मजबूत हो सकती है। 


7. जनसंचार माध्यमों पर पूंजी के नियंत्रण को हम खतरनाक मानते हैं। अतः जनसंचार के किसी भी माध्यम से भाषा नीति का फैसला उस माध्यम से मालिकों तथा उसमें काम करने वालों की बराबरी पूर्ण सहमति और ऐसी सहमति न बन पाने पर ‘एक व्यक्ति: एक वोट‘ के आधार पर होना चाहिए।


8. हमारे देश का नाम भारत है। अपने ही देशवासियों के मुँह से ‘इण्डिया‘ सुनकर हमें अच्छा नहीं लगता। इसलिए ‘इण्डिया, दैट इज भारत‘ को हटाकर सिर्फ भारत रखा जाये। इसी तरह, भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय रेल, आकशवाणी आदि जैसे सभी राष्ट्रीय संस्थानों के अंग्रेजी नामों कोक हटाकर उनके भारतीय नामों को ही मान्य करना होगा। ‘इण्डियन आॅयल‘ तथा ‘एअर इण्डिया‘ जैसे सभी अंग्रेजी नामों को हटा कर उनकी जगह भारतीय नाम देने का काम तुरन्त हो।


भोपाल घोषणा-पत्र किसी प्रकार के ‘शुद्धतावाद‘ या इकहरेपन का आग्रही नहीं है, न ही यह भारत को बाकी दुनिया से काट कर रखने की हिमायत करता है। घोषणा-पत्र की समझ यह है कि भौतिक रूप से सम्पन्न तथा मजबूत और सांस्कृतिक दृष्टि से प्रौढ़ एवं प्रगतिशील भारत ही विश्व बिरादरी में अपना उचित तथा गौरवपूर्ण स्थान बना सकता है। इसकी शुरुआत भारत की भाषाई अस्मिता की रक्षा के संघर्ष से ही हो सकती है। हमारी भाषाएं बचेंगी, तभी हम भी बचेंगे। अर्थात् हमें पूरे आदमी और पूरे समाज की तरह जीवित रहना है, तो अपनी भाषाओं की अस्मिता को बचाने तथा समृद्ध करने की लड़ाई उसकी तार्किक परिणति तक लड़नी ही होगी। भोपाल घोषणा-पत्र निष्ठा, दृढ़ता और विनम्रता के साथ इस लड़ाई के लिए सभी का आवाहन करता है। 


  सौजन्य :  कथाकार प्रभु जोशी 

मेरा दोस्त शहर ‘लैंसडाउन’



मेरा दोस्त शहर ‘लैंसडाउन’ 
- दीप्ति गुप्ता







  शान्त और  सुरम्य  वादियों में कायनात की  कुदरती  तिलस्म ओढ़े एक छोटा सा शहर,  कोमल घास से भरे  पहाडी ढलान, एक तरह की खास खुशबू से भरे खुद-ब-खुद उग आनेवाले जंगली फूल, झूमते दरख़्त, परस्पर सटे-सटे, छोटे-छोटे पहाडी घरों का घनछत, हरियाली के बीच में आने जाने वालों की आवा-जाही से बन जाने वाली प्राकृतिक बटिया, सर्पीली सड़कें, इधर उधर लगभग हर आधा किलोमीटर की  दूरी पर  बने अंग्रेजों के ज़माने के भव्य बंगलें जिनकी लाल टीन की छत चिमनियों सहित दूर से ही अपनी झलक दिखाती वहाँ की सघन वनस्पतियों में अपनी उपस्थिति को दर्ज करती, मन को लुभाती पहाडी फलों की मीठी महक, खुले विशाल मैदान में ट्रेनिंग लेते  रंगरूटो की परेड, शहर से ऊपर पहाडी पर स्थित आर्मी हैडक्वार्टर  से बिगुल की उठती एक खास धुन, अक्सर सड़क और बटिया पर ‘लैफ्ट-राईट - लैफ्ट-राईट’ करते सैनिकों के भारी फ़ौजी बूटों की तालबध्द ध्वनि, शाखों पर पंछियों की चहचहाहट, जून माह की सुबह - शाम के सर्द झोको से भरी गरमी, धुंध से भरी ना थमने वाली जुलाई-अगस्त की बरसात, सितम्बर माह का धुले सफ़ेद बादलों वाला नीला आकाश, सर्दियों में सफ़ेद नाजुक फूलों सी झरती बर्फ और अपनी आगोश में लेता कोहरा, इस सब का नाम है ‘लैंसडाउन’ I उत्तराखंड  में ६०००फ़ीट की ऊंचाई पर, प्रकृति की गोद में बसा  मन को मोह लेने वाला यही  ‘लैंसडाउन’ आज भी मेरे मानस पटल पर अपने भरपूर सौंदर्य के साथ अंकित है I अँग्रेज़ो के समय से ही  अपनी प्राकृतिक  सुंदरता के कारण लैंसडाउन, एक लोकप्रिय ‘हिल स्टेशन’ के रूप में स्थापित हो  चुका था I घने देवदार और चीड के जंगलों व चारों ओर पहाड़ों से घिरा यह अनूठा रम्य स्थान, अब से ५० वर्ष पहले तो और भी अधिक प्राकृतिक संपदा व सौंदर्य से भरा था I

अफगानिस्तान में भारत की भूमिका


अफगानिस्तान में भारत की भूमिका
- डॉ. वेदप्रताप वैदिक



 बराक ओबामा ने घोषणा की है कि जुलाई 2011 यानी अगले महीने से अमेरिकी फौजों की अफगानिस्तान से वापसी शुरू हो जाएगी। इसका अर्थ यह हुआ कि पिछले दस वर्षों से दक्षिण एशिया में जो राजनीति चल रही है, उसमें कुछ बुनियादी बदलाव आने शुरू हो जाएँगे। ये बदलाव क्या-क्या हो सकते हैं? 


महारानी झाँसी के चित्र से छेड़छाड़ : पत्रकारिता की शर्म





आज १७ जून को महारानी लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस पर विशेष


झाँसी की रानी के नकली चित्र का प्रचार  




आजकल झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के असली चित्र के नाम पर नेट पर एक अजीबोगरीब चित्र का प्रचार प्रसार किया जा रहा है | यह चित्र प्रथम दृष्टि से देखते ही उक्त महिला के झाँसी की रानी न होने की पुष्टि करता है | थोड़ी भी समझबूझ वाला व्यक्ति जो इतिहास, तत्संबंधी पहरावे, चित्र और चरित्र का तादात्म्य आदि  ..... जैसी कुछ मौलिक बातों की सूझ रखता होगा वह बिना एक भी क्षण गँवाए पहचान जाएगा कि महारानी  झाँसी का वास्तविक चित्र वह हो ही नहीं सकता |  

Citizens’ Silent Protest March





Citizens’ Silent Protest March
From Rajghat on 18 June at 5 pm



Please join in large numbers to register our strong protest against the government’s clampdown on peaceful demonstrators in the wee hours of 5 June. It reminded of the Jallianwala Bagh incident of 13 April 1919 when British troops opened fire on innocent citizens. The difference this time was that instead of bullets the state used batons. There was no provocation.


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