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वसंत पंचमी और हरसिंगार के फूलों का केसरिया रंग


वसंत पंचमी और हरसिंगार के फूलों का केसरिया रंग 
- सुधा अरोड़ा






बसंत पंचमी के नाम से मन पचास साल पहले के बसंत के आने की धमक पर लौट लौट जाता है | बसंत पंचमी यानी पीले और केसरिया रंग के गेंदे के फूलों का मौसम ! बसंत पंचमी यानी कई किस्मों के बेर के फल आने का मौसम ! बसंत पंचमी यानी देवी सरस्वती की सुनहली और रुपहली, धवल सफेद और रंग बिरंगी कलात्मक प्रतिमाओं से कलकत्ता के फुटपाथों के अटे होने का मौसम ! बसंत पंचमी यानी सरस्वती पूजा के अनोखा स्वादिष्‍ट प्रसाद का दोना - शंखालू, केला, अमरूद, बेर यानी मौसमी सभी फलों का प्रसाद और इसके साथ ही खाकी कागज के एक अलग ठोंगे में मीठी केसरिया बूँदी में मिली हुई हल्दी रंग की नमकीन सेव । पूरे साल में इस मिश्रण का जो स्वाद सरस्वती पूजा पर आता, दूसरे किसी दिन नहीं । 


सरस्वती पूजा से पहले देवी सरस्वती की सुनहली, रुपहली और रंग बिरंगी कलात्मक प्रतिमाओं से कलकत्ता के फुटपाथ अंट जाते थे। हम दोनों बहनें अपने घर के लिये सरस्‍वती की एक प्रतिमा खरीदने जाते. प्रतिमाओं के सफेद, तांबई, बहुरंगी आकार प्रकार को निहार निहार कर अपनी पसंद की मूर्ति छाँटने में बड़ी परेशानी आती. मन होता कि सभी को उठा कर ले जायें। एक उठाते, एक रखते। आखिर अपनी जेब में रखे पैसों में समाती एक प्रतिमा पसंद कर उसकी कीमत कारीगर को देते. दूकानदार सरस्वती की प्रतिमा को अखबार के कागज में लपेट कर साथ साथ गणेश और लक्ष्मी की दो छोटी छोटी मूर्तियाँ हमें थमा देता. हम कहते - हमने तो देवी की एक ही प्रतिमा के पैसे दिये हैं. वह कहता - ए टा ओ निये जाओ माँ , पॉयशा दिते हबे ना ( ये भी ले जाओ, इसके लिये पैसे नहीं देने हैं ) ऐसा क्यों ? हमारी जिज्ञासा होती तो कहता - जहाँ ज्ञान की देवी जायेगी वहाँ विवेक और धन तो अपने आप रहने के लिये आ जाते हैं. इन विघ्न विनाशक और लक्ष्मी को भी रख लो. हम दोनों बहनें खुश खुश लौटते। आज का समय होता तो कहते -'' बाय वन, गेट टू फ्री ! '' 


सरस्‍वती पूजा से दो-चार दिन पहले से केसरिया रंग की फ्रॉक की तैयारी शुरु हो जाती . बसंत पंचमी यानी एक दिन के लिये स्कूल की सफेद पोशाक के बदले केसरिया, पीले रंग की फ्रॉक या सलवार कुरता और दुपट्टा पहनने का दिन ! हमारे पास स्कूल के लिये जो सफेद फ्रॉक होती, उसमें से थोड़ी सी घिसी हुई फ्रॉक को रंगने के लिये अलग कर लिया जाता. अपने घर के बगल में एक बंगाली सेन महाशय के बागान से हम दोनों बहनें सुबह सुबह जाकर हरसिंगार के झरे हुए फूल - पूरे बागान की हरी घास पर जिसकी चादर बिछी होती - चुन कर अपनी फूलों की डलिया भर लेते, तब भी फूल अगर कम लगते तो पेड़ के तने को दोनों हाथों से थामकर थोड़ा हिला भर देते और डालियों से हरसिंगार के फूल झमाझम बारिश की बूँदों की तरह झरने लगते - हमारे सिर माथे पर, हमारी डलिया में, हमारे कपड़ों पर. इतने ढेर सारे फूल लेकर फिर उन्हें आधी बाल्टी पानी में भिगोया जाता और उनके केसरिया रंग में फ्रॉक रंगी जाती. यह रंग एकसार होता - कहीं गहरा, कहीं हल्का नहीं जैसा आमतौर पर कपड़ों के रंगों में रंगने से हो जाता था. फिर फूलों की खुशबू भी फ्रॉक में रच-बस जाती .   


घर में भी हर साल सरस्वती की प्रतिमा आती और साल भर रहती, स्कूल में तो स्थायी प्रतिमा थी जिसका भव्य साज शृंगार सरस्वती पूजा के दिन किया जाता और विद्यार्थियों के रंगारंग कार्यक्रमों और गायन से पूरा वातावरण झंकृत हो उठता। वे 1955 से 1962 के बीच के साल थे जब मैं कक्षा पाँच से ग्यारहवीं तक कलकत्ता के श्री शिक्षायतन स्कूल में पढ़ रही थी. यह उस इलाके का हिन्दी माध्यम का सिर्फ लड़कियों का सबसे बेहतरीन स्कूल माना जाता था. सरस्वती पूजा हमारे स्कूल का एक बड़ा उत्सव था क्योंकि इस दिन विद्या की देवी की पूजा की जाती थी। महीने पहले से उत्सव की तैयारियाँ शुरु हो जातीं - नृत्य नाटिकाएँ, गायन-वाचन प्रतियोगिताएँ। 'वर दे वीणा वादिनी वर दे' से लेकर कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर का गीत '' आगुनेर परस दिए छोआओ प्राणे, ए जीबन पूर्ण करो दहन दाने '' सस्वर गाया जाता । पीले केसरिया गेंदे के फूलों से अल्पना का सुंदर गोलाकार वृत्त बनाया जाता और भीतर चावल के आटे से रंगोली आँकी जाती . नवीं और दसवीं कक्षा की लड़कियाँ अपने उस विषय की किताबें सरस्वती की प्रतिमा के पीछे रखतीं जो विषय उनको सबसे मुश्किल लगता और जिसको समझने के लिये देवी सरस्वती की विशेष अनुकंपा की ज़रूरत होती । 


नये नये स्कूलों का उद्घाटन वसंत पंचमी के दिन ही होता। हाथ में नयी स्लेट और नयी चॉक देकर सरस्वती पूजा के दिन ही बच्चों का विद्यारंभ करवाया जाता । उन दिनों ज्ञान और विद्या की देवी सरस्‍वती थी, इस देवी को नेट, गूगल और आइ पॉड ने रिप्‍लेस नहीं किया था । 


वसंत के आने की धमक के साथ बेर फल के आने का मौसम होता । स्कूल के बाहर बेर के खोमचे वाला बैठता जो आम तौर पर आमड़ा, इमली और अनारदाने के चूरन की गोलियाँ  रखता । माना जाता था कि लड़कियाँ इमली जैसी खट्रटी मीठी और चूरन जैसी चटपटी चीजें ही पसंद करती हैं। साल-भर के लिये यह स्थायी खोमचा था पर मौसमी फलों के आने के साथ वह अपने खोमचे पर तरह तरह के बेर सजाने लगता । हम उन बेरों को ललचाई नज़रों से देखते और चटखारे लेती जीभ को होंठों के भीतर कैद कर लेते कि बेर का पहला भोग सरस्वती मैया की प्रतिमा को लगेगा, तब जाकर हम मौसम का पहला बेर चखेंगे । अगर भोग से पहले चख लिया तो सरस्वती मैया नाराज़ हो जाएगी, फिर हम अच्छे नंबरों से पास नहीं होंगे, इसलिये प्रसाद के दोने का हाथ में आना मानो अब रोज़ बेर खाने का प्रवेश पत्र होता सो पहली बार फलों के प्रसाद के दोने में शंखालू, केले और अमरूद के साथ बेर चखने का मज़ा ही कुछ और था। सरस्वती पूजा के प्रसाद में मीठी बूँदी में नमकीन भुजिया मिले प्रसाद का पुड़ा भी हमें मिलता था । वह स्वाद याद कर आज भी मुँह में स्वादेन्द्रियाँ रस छलका रही हैं । 


कितना इंतजार करते थे हम इस सरस्वती पूजा का ! कैसा जुनून था किताबों का ! उन किताबों को सरस्वती की प्रतिमा के पीछे रखकर देवी से वरदान माँगने का ! और उत्साह से छलकते घर लौटते हुए, प्रसाद का थोड़ा सा हिस्सा बचाकर, माँ और पापा को देने का ! आज यह समय ही खो गया है । नहीं मालूम कोलकाता के स्कूलों में अब सरस्वती पूजा होती है या नहीं पर मुंबई में तो नहीं होती । बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा की जगह वेलेंटाइन डे होता है, जिसमें लड़कियाँ थोक में मित्रों को मित्रता की डोरी बाँधती हैं । यह रिवाज़ बुरा नहीं पर अपने पुराने उत्सवों को स्थगित कर इनका आना मन में अब एक टीस-सी पैदा करता है । क्या हमारे सारे त्यौहार, सारे जुड़ाव, किताबों के लिये ऐसा उछाह, गेंदे के फूलों की अल्‍पना और केसरिया बूँदी और नमकीन भुजिया का अनोखा प्रसाद, अब अतीत की चीज़ बनकर रह जायेगा ? 

 - सुधा अरोड़ा
1702 , सॉलिटेअर , डेल्‍फी के सामने,
हीरानंदानी गार्डेन्स, पवई,
मुंबई - 400 076 
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505

आमंत्रण

प्रभु जोशी जी के लेखक रूप से हिन्दी के पाठक अच्छी प्रकार परिचित हैं हिन्दी भारत के पाठकों के लिए उनकी कहानी ( एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी ) लेखमाला (इसलिए बिदा करना चाहते हैं हिन्दी को हिन्दी के अखबार , , ) तथा एक महत्त्वपूर्ण आलेखक्रम ( कंडोम प्रोमोशन कार्यक्रम ) को यहाँ प्रस्तुत किया गया थाजो मित्र उनकी कहानी आलेख किन्हीं कारणों से नहीं पढ़ पाए वे इस पूरी सामग्री को यहाँ पढ़ सकते हैं

जोशी जी लंबे समय तक नई दुनिया के सम्पादक भी रहेआजकल वे इंदौर दूरदर्शन का दायित्व सम्हाले हुए हैं

इन सब उत्तरदायित्वों विविध पक्षों के बीच उनके व्यक्तित्व में निहित रंगों के चितेरे चित्रकार होने का एक ऐसा अद्भुत रूप है, जिसे देश - दुनिया में बड़े सम्मान से देखा माना जाता हैरंग-प्रयोग में विरलता उनकी विशेषता है. गत दिनों जयपुर में हुई उनकी चित्र प्रदर्शनी मीडिया में बहुत चर्चा का विषय रही चित्रकला के मर्मज्ञों द्वारा अत्यन्त सराही गयी

जोशी जी के चित्रों की एक प्रदर्शनी मुम्बई की जहांगीर आर्ट गैलरी में (१५ एप्रिल से २१ एप्रिल तक ) आयोजित होने जा रही है, जिसका उद्घाटन १५ एप्रिल की सायं .३० बजे प्रसिद्ध पत्रकार प्रीतीश नंदी करेंगेसभी सादर आमंत्रित हैं

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कार्यक्रम : आमंत्रण


परिचय

रस ही जीवन / जीवन रस है






रस
ही जीवन / जीवन रस है






निष्प्रयास स्वीकृति प्रेम को आलसी बना देती है। इसीलिए अनेक समझदार लोगों ने सलाह दी है कि स्त्री-पुरुष को एक साथ नहीं रहना चाहिए और साथ रहने की मजबूरी हो तो रोज एक साथ एक ही बिछावन पर सोना नहीं चाहिए। पूरी तरह स्वकीय और पूरी तरह परकीय, दोनों बुरे हैं। हर स्त्री और हर पुरुष को थोड़ा स्वकीय और थोड़ा परकीय बने रहना चाहिए। नहीं तो आकर्षण की डोरी अतिशय तनाव से टूट कर गिर सकती है और बहुत ज्यादा ढीली हो जाने पर लुंज-पुंज हो जा सकती है। दोनों ही संस्करण घातक हैं। वे डोरी के गुण-धर्म को नष्ट कर डालते hain





भारत में होली सबसे सरस पर्व है। दशहरा और दीपावली से भी ज्यादा। दूसरे त्योहारों में कोई न कोई वांछा है। या वांछा की पूर्ति का सुख। होली दोनों से परे है। यह बस है, जैसे प्रकृति है। अस्तित्व के आनंद का उत्सव। वांछा और वांछा की पूर्ति, दोनों में द्वंद्व है। यह जय-पराजय से जुड़ा हुआ है। दोनों ही एक अधूरी दास्तान हैं। सच यह है कि दूसरा हारे, तब भी हमारी पराजय है। कोई भी सज्जन किसी और को दुखी देखना नहीं चाहता। किसी का वध करके उसे खुशी नहीं होती। करुणानिधान राम ने जब रावण पर अंतिम प्राणहंता तीर चलाया होगा, तो उनका हृदय विषाद से भर गया होगा। उनके दिल में हूक उठी होगी कि काश, रावण ने ऐसा कुछ न किया होता जो उसके लिए मृत्यु का आह्वान बन जाए; काश, उसने अंगद के माध्यम से भेजे गए संधि प्रस्ताव को मंजूर कर लिया होता; काश, उसने विभीषण की सत सलाह का तिरस्कार नहीं किया होता। अर्जुन का विषाद तो बहुत ही प्रसिद्ध है। युद्ध छिड़ने के ऐन पहले उसे अपने तीर-तूरीण भारी लगने लगे। उसके मन में उचित ही यह भाव पैदा हुआ कि अपने संगे-संबंधियों को मार कर सुख पाना एकदम अनैतिक है। यह भावना जितनी ज्यादा फैले, दुनिया के लिए उतना ही अच्छा है। श्मशान में सभ्यता का विकास नहीं होता। फिर भी महाभारत इसीलिए हो पाया, क्योंकि कृष्ण अपने सखा को यह समझा सके कि अन्याय का प्रतिरोध करना अगर जीवन-मरण का प्रश्न बन जाए, तब भी संघर्ष से भागना नहीं चाहिए। नतीजा यह हुआ कि कुरुवंश के लोग दिन में एक-दूसरे की जान लेते थे और रात को उनकी याद कर आँसू बहाते थे। इस तरह, द्वंद्व और उनका शमन जीवन प्रक्रिया को आगे बढ़ाता था। होली की विशेषता यह है कि यहाँ किसी प्रकार का द्वंद्व नहीं है; सामाजिक नैतिकता के नाम पर लादी हुई अनैतिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप द्वंद्व है भी, तो उसका शमन नहीं, समाहार है। हृदय की मुक्तावस्था को क्या कहते हैं, मुझे नहीं मालूम, पर यह अनुभव जरूर है कि होली को मन से मनाया जाए, तो कुछ ऐसी ही अवस्था पैदा होती है।


श्वसुर साल भर श्वसुर रहता है, पर होली के दिन वह देवर बन जाता है। (फागुन में ससुर जी देवर लगें) इसका मतलब यही है कि उसमें देवरपन हमेशा मौजूद था, पर वह उभरता तब है जब उसे आवश्यक उद्दीपन मिलता है। यह उद्दीपन बहू देती है। इसका मतलब यह भी है कि बहू में भी सनातन नारी साल भर जीवित रहती है, पर बाहर आने के लिए वह उचित मौसम का इंतजार करती है। यह मौसम फागुन के अलावा और क्या हो सकता है?



होली का त्यौहार मनाने के लिए वसंत ऋतु को चुना गया, तो इसके ठोस कारण हैं। इन कारणों से हर कोई अवगत है। ये कारण मुख्यत: बाहर से आते हैं। लेकिन वे प्रभावी तभी होते हैं जब भीतर संचित कोई अद्भुत चीज अंगड़ाई ले कर जाग उठती है। कामना, विचार, हर्ष. विषाद सब कुछ हमारे भीतर ही है। लेकिन जागते वे तब हैं जब बाहर से उन्हें उद्दीपन और आलंबन मिलता है। बाहर और भीतर का विभाजन वास्तविक से ज्यादा कृत्रिम है। तभी तो यह विभाजन अकसर चिटख जाता है। श्वसुर साल भर श्वसुर रहता है, पर होली के दिन वह देवर बन जाता है। (फागुन में ससुर जी देवर लगें) इसका मतलब यही है कि उसमें देवरपन हमेशा मौजूद था, पर वह उभरता तब है जब उसे आवश्यक उद्दीपन मिलता है। यह उद्दीपन बहू देती है। इसका मतलब यह भी है कि बहू में भी सनातन नारी साल भर जीवित रहती है, पर बाहर आने के लिए वह उचित मौसम का इंतजार करती है। यह मौसम फागुन के अलावा और क्या हो सकता है?



बताते हैं, प्रकृति हर्ष और विषाद से परे हैं। उसे न दुख होता है न सुख होता है। लेकिन क्या पता। प्रकृति के बारे में हमारी जानकारी इतनी संक्षिप्त है कि उसके आधार पर कोई बड़ा फैसला नहीं किया जा सकता। हम यह तो जान गए हैं कि कीट-पतंगों को, पेड़-पौधों को भी दुख-सुख होता है, वे हर परिवर्तन से संवेदित होते हैं। लेकिन सभी प्राणी, जिनमें उद्भिज भी शामिल हैं, अगर प्रकृति की कोख से ही जन्म लेते हैं, तो यह कोख किसी भी स्तर पर इतनी बाँझ नहीं हो सकती कि वह बिलकुल संवेदनहीन हो जाए। मार्क्स ने ठीक पहचाना था कि पदार्थ से ही चेतना पैदा होती है। तो फिर पदार्थ खुद अचेतन कैसे हो सकता है?



प्रकृति की यह सचेतनता वसंत ऋतु में पूरे शबाब में होती है। अन्य सभी ऋतुओं में कुछ न कुछ द्वंद्व होता है। गरमी, बारिश, जाड़ा -- सभी आवश्यक हैं और इस नाते प्रिय भी, पर अतिरेक में वे कष्ट भी देते हैं। वसंत ही एकमात्र ऋतु है जिसका कोई अतिरेक नहीं हो सकता। सभी चीजों का उत्कर्ष होता है, पर उत्कर्ष का उत्कर्ष क्या होगा? सागरमाथा (एवरेस्ट) अपनी ऊँचाई को कैसे लांघ सकता है? वसंत ऋतु परिवर्तन के पूरे चक्र का उत्कर्ष है। इसी के लिए प्रकृति साल भर तैयारी करती है, जैसे मानवी का शरीर सोलह साल तक साधना करता है ताकि उस पर यौवन का फूल खिल सके या जैसे जननी नौ महीने तक हर रंग से गुजरती है तब कोई शिशु धरती पर प्रगट होता है और सभी के दिलों पर छा जाता है। वसंत प्रकृति का यौवन भी है और उसकी रचनात्मकता का चरम उभार बिंदु भी। उसमें कोई द्वंद्व नहीं है। आनंद ही आनंद है। रस ही रस है। जीवन ही जीवन है। इसीलिए मनुष्य ही नहीं, संपूर्ण जीव जगत के साथ उसकी अनुकूलता है। वसंत में जैसे प्रकृति खुलती है, उसकी कंचुकियाँ छोटी पड़ जाती हैं, वैसे ही हम भी खुलते हैं, हमारे लिए हमारा परिवेश छोटा लगने लगता है। यह वह सर्वश्रेष्ठ उपहार है जो सृष्टि अपने आपको देती है। वरना तो बाकी सृष्टि में आँखों को जला देनेवाली रोशनी है -- जहाँ-जहाँ तारे हैं, या फिर उनके बीच का ठोस सघन अँधेरा, जिसमें कोई अपने आपको भी देख नहीं सकता। हम धरतीवालों को अपनी किस्मत पर इतराना चाहिए।


लेकिन सिर्फ अपनी पत्नी से होली खेल कर कौन उल्लास में डूब सकता है? सिर्फ अपने पति से होली खेल कर कौन बीरबहूटी बन सकती है? अतिशय निकटता नए आविष्कार करने की क्षमता को कुंद कर देती है। निष्प्रयास स्वीकृति प्रेम को आलसी बना देती है। इसीलिए अनेक समझदार लोगों ने सलाह दी है कि स्त्री-पुरुष को एक साथ नहीं रहना चाहिए और साथ रहने की मजबूरी हो तो रोज एक साथ एक ही बिछावन पर सोना नहीं चाहिए। पूरी तरह स्वकीय और पूरी तरह परकीय, दोनों बुरे हैं। हर स्त्री और हर पुरुष को थोड़ा स्वकीय और थोड़ा परकीय बने रहना चाहिए। नहीं तो आकर्षण की डोरी अतिशय तनाव से टूट कर गिर सकती है और बहुत ज्यादा ढीली हो जाने पर लुंज-पुंज हो जा सकती है। दोनों ही संस्करण घातक हैं।





धरती इसलिए अनोखी है, क्योंकि सृष्टि भर में यहीं जीवन है। यहीं रस है। यह रस सबसे ज्यादा नर-नारी के बीच पैदा होता है, क्योंकि प्रकृति की अभी तक की योजना यही है। उसने पशु-पक्षियों में भी, पेड़-पौधों में भी युग्म बनाए हैं, पर इन युग्मों में वह आकर्षण, वह ताकत, वह निरंतरता नहीं है, जो मानव युग्म में दिखाई देता है। हो सकता है, लाखों-करोड़ों वर्ष पहले हमारे पूर्वज स्त्री-पुरुष भी जब-तब ही एक-दूसरे की ओर प्यार और लालसा की निगाहों से देखते रहे हों, पर वह संस्कृति के ककहरे का युग था। संस्कृति के निरंतर विकास ने न केवल शरीर को कोमल और सुंदर बनाया है, बल्कि दो शरीरों के बीच कला का इतना बड़ा सागर पैदा किया है जिसमें हम निरंतर ऊभ-चूभ होते रहते हैं। इसीलिए हमारे एक पूर्वज ने आह भरते हुए कहा था कि जो मनुष्य साहित्य, संगीत और कला से विहीन है, वह सींग-पूँछ रहित जानवर की तरह है। होली इसी सांस्कृतिकता का उत्सव है। जो होली के दिन सूखे पेड़ की तरह अपना और दूसरों का मूड खराब किए रहता है, उसे नरक का अनुभव करने के लिए जीवनोत्तर जीवन की प्रतीक्षा नहीं करनी होती। वह आँख वाला हो कर भी अंधा है, कानवाला हो कर भी बहरा है और हृदय होते हुए भी पत्थर है। वह समाज में होते हुए भी समाज से बाहर है, अपने भीतर होते हुए भी अपने को नहीं पहचानता। खुदा ऐसे लोगों को माफ करे -- ये नहीं जानते कि ये क्या खो रहे हैं।



नर-नारी का आकर्षण एक विशिष्ट प्रकार का आकर्षण है, जिसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। इसीलिए सभी भक्त ईश्वर को अपना माशूक मान कर उसकी मादक अनुभूति से घिरे रहते हैं। कबीर को लगता था कि राम उनके प्रियतम हैं और वे राम की बहुरिया हैं। कृष्ण को तो पति मान कर ही भजने की प्रथा है। ईसाई संतों को ईश्वर की वधू होने का अनुभव होता था। ये सभी अभिव्यक्तियाँ प्रगाढ़तम संबंध की जानी-पहचानी अनुभूति हैं। लेकिन सिर्फ अपनी पत्नी से होली खेल कर कौन उल्लास में डूब सकता है? सिर्फ अपने पति से होली खेल कर कौन बीरबहूटी बन सकती है? अतिशय निकटता नए आविष्कार करने की क्षमता को कुंद कर देती है। निष्प्रयास स्वीकृति प्रेम को आलसी बना देती है। इसीलिए अनेक समझदार लोगों ने सलाह दी है कि स्त्री-पुरुष को एक साथ नहीं रहना चाहिए और साथ रहने की मजबूरी हो तो रोज एक साथ एक ही बिछावन पर सोना नहीं चाहिए। पूरी तरह स्वकीय और पूरी तरह परकीय, दोनों बुरे हैं। हर स्त्री और हर पुरुष को थोड़ा स्वकीय और थोड़ा परकीय बने रहना चाहिए। नहीं तो आकर्षण की डोरी अतिशय तनाव से टूट कर गिर सकती है और बहुत ज्यादा ढीली हो जाने पर लुंज-पुंज हो जा सकती है। दोनों ही संस्करण घातक हैं। वे डोरी के गुण-धर्म को नष्ट कर डालते हैं। जब स्वकीयता के साथ परकीयता होगी और परकीयता के साथ स्वकीयता, तब हमें होली जैसे अद्भुत त्यौहार की महत्ता समझ में आएगी, जो स्वकीय और परकीय के विभाजन की दीवार को अपने रंग-गीले हाथों से गिरा देता है। फागुन के नशे में कौन स्वकीय रह जाता है या रह जाती है और कौन इस बोध से घिरा रहता है या घिरी रहती है कि वह परकीय है? जैसे प्रकृति की व्यवस्था अभिन्न है, हर जर्रा हर जर्रे का मायका या ससुराल है, वैसे ही सभी स्त्री-पुरुष एक नैसर्गिक व्याकरण की संज्ञाएँ, विशेषण और क्रियापद बन जाते हैं। अब इससे आगे क्या कहूँ, तू मुझमें है, मैं तुझमें हूँ। अगर यह प्रेम है, तो अध्यात्म भी यही है।

रस ध्वनि में है, स्पर्श में है, रंग में है। होली में हम तीनों का मधुर उत्तान देखते हैं। होली गाई जाती है, होली खेली जाती है और होली पर हम गले भी मिलते हैं। कुछ लोग होली के रंग में खुशबू भी मिला देते हैं। होली पर पकवान तो गरीब से गरीब के घर भी बनते हैं, जो हमारी स्वादेंद्रिय को तृप्त करते हैं। इस तरह होली ऐंद्रिय जगत की संपूर्णता का उत्सव बन जाता है। लेकिन इन तीनों में रंग का स्थान अन्यतम है।


रस ध्वनि में है, स्पर्श में है, रंग में है। होली में हम तीनों का मधुर उत्तान देखते हैं। होली गाई जाती है, होली खेली जाती है और होली पर हम गले भी मिलते हैं। कुछ लोग होली के रंग में खुशबू भी मिला देते हैं। होली पर पकवान तो गरीब से गरीब के घर भी बनते हैं, जो हमारी स्वादेंद्रिय को तृप्त करते हैं। इस तरह होली ऐंद्रिय जगत की संपूर्णता का उत्सव बन जाता है। लेकिन इन तीनों में रंग का स्थान अन्यतम है। इंद्रियों के सभी विषयों में रंग ही दूर से चमकता है। सूर्य की लालिमा हमें कितनी दूर से दिखाई पड़ती है। चंद्रमा का प्रकाश निकटतर है, लेकिन वह भी कम दूर नहीं है। यह गुण किसी और तत्व में नहीं है। शायद इसीलिए रंग को होली का मुख्य दूत माना गया। प्रकृति भी इस मौसम में अपने रंगों का पूरा खजाना खोल देती है। एक-दूसरे के शरीर और उसके जरिए आत्मा पर गीला रंग फेंक कर हम मानो इस रंगीनियत का ही इजहार करते हैं। यही वह रस है जो हमारे तन-मन को आह्लादित कर देता है और हमारी भौगोलिक तथा मानसिक दूरियों को पाट देता है। हर कोई फूल और हर कोई भौंरा बन जाता है।


स्त्री-पुरुष का आकर्षण बारहों महीने चौबीसों घंटे बना रहता है, पर पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच प्रगाढ़ता में तरह-तरह के अवरोध पैदा होते रहते हैं और जीवन रस को सोखते रहते हैं। कहा जा सकता है कि हमने जो सभ्यता गढ़ी हुई है, वह हमारे सहज सुखों का सोख्ता है। यह सोख्ता स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक संबंधों के रस को भी सोखता रहता है और जीवन को उतना रसमय नहीं होने देता जितना वह वास्तव में है और आज भी हो सकता है। विषमता की तरह-तरह की दीवारें खड़ी कर हमने अपनी जिंदगियों को दुखपूर्ण बना डाला है।



मेरी उलझन यह है कि जो रस स्त्री-पुरुष के बीच पैदा होता है, उसका कुछ हिस्सा पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच क्यों नहीं पैदा होता? स्त्रियाँ भी स्त्रियों के साथ होली खेलती हैं और पुरुष भी पुरुषों के साथ होली खेलते हैं। पुरुषों की बनिस्बत स्त्रियों की अपनी होली ज्यादा मजेदार, ज्यादा चुहल भरी होती है, क्योंकि उनमें प्राकृतिक लालित्य होता है और उनकी आपस की प्रतिस्पर्धा उतनी तीव्र और बहुआयामी नहीं होती जितनी पुरुषों के आपसी संबंधों में। इसीलिए युवाओं की होली ज्यादा खुली हुई होती है : वे इतने परिपक्व नहीं हुए होते हैं कि जिंदगी के द्वंद्वों को कुछ घड़ी के लिए भुला न सकें और अपने को रंगीनी के हाथों निश्शर्त सुपुर्द न कर सकें। शोक की बात यह है कि होली का यह सहज उल्लास साल भर हमारा साथ नहीं देता। स्त्री-पुरुष का आकर्षण बारहों महीने चौबीसों घंटे बना रहता है, पर पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच प्रगाढ़ता में तरह-तरह के अवरोध पैदा होते रहते हैं और जीवन रस को सोखते रहते हैं। कहा जा सकता है कि हमने जो सभ्यता गढ़ी हुई है, वह हमारे सहज सुखों का सोख्ता है। यह सोख्ता स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक संबंधों के रस को भी सोखता रहता है और जीवन को उतना रसमय नहीं होने देता जितना वह वास्तव में है और आज भी हो सकता है। विषमता की तरह-तरह की दीवारें खड़ी कर हमने अपनी जिंदगियों को दुखपूर्ण बना डाला है। होली हर साल हमें यह याद दिलाने आती है कि यारो, यह जीना भी कोई जीना है जिसमें जीवन का रस द्वंद्वों की आँच में भाप बन कर उड़ता रहता है और हम जितना दूसरों से, उतना ही अपने आपसे बेगाना होते जाते हैं।



इस विसंगति में ही हम पहचान सकते हैं कि होली का दिन मजाक और हास-परिहास का दिन क्यों बन जाता है। जब हिरण्यकश्यप की बहन उसके संतनुमा बेटे प्रह्लाद को ले कर आग के कुंड में बैठ गई थी और बालक प्रह्लाद जल कर भस्म हो जाने के बजाय उससे पूरी तरह अक्षत और साबुत निकल आए, तो उसके तुतलाते होंठों पर एक ऐसी मुसकान जरूर होगी जिसने उस क्रूर-कपटी राजा का दिल तार-तार कर दिया होगा। यह मुसकान अन्याय और जुल्म के विरुद्ध विजय की शाश्वत मुसकान है। बाद की पीढियाँ इतनी किस्मतवाली नहीं रहीं कि वे इस विध्वंसक आग से अपने को भस्म न होने दें। पर ऐसी हर आग के खिलाफ गाने तो गाए ही जा सकते हैं, प्रहसन तो किया ही जा सकता है, उसका मजाक तो उड़ाया ही जा सकता है। यह भी एक प्रकार की विमुक्ति है : साल भर हमारे कोमल मनों में जो तनाव जमा होते रहते हैं, उनसे उल्लासपूर्ण विमुक्ति का दुर्लभ मौका, जब आप कोयले को कोयला और कीचड़ को कीचड़ कह सकते हैं। होली के दिन कोई किसी का गुसैयाँ नहीं रह जाता। किसी से भी प्यार किया जा सकता है और किसी पर भी छींटाकशी की जा सकती है। लेकिन यह छींटाकशी भी विनोद भाव के परिणामस्वरूप मृदु और सहनीय हो जाती है। बल्कि जिसका परिहास किया जाता है, वह भी बुरा न मानने का अभिनय करते हुए बरबस हँस पड़ता है। शायद यही 'बुरा न मानो होली है' के हर्ष-विनोद घोष का उद्गम स्थल है।



होली एक ऐसा स्वच्छ दर्पण है जिसके हम, हमारा समाज, हमारी तथाकथित संस्कृति सब निर्वस्त्र हो कर खड़े हो जाते हैं और अपने पर जितना इतराते हैं उतना ही सकुचाते भी हैं। क्या ही अच्छा हो कि हम रोज एक घंटा होली के मूड में आ जाया करें और दिन भर के गर्दो-गुबार को झटक कर साफ चित्त से प्रकृति की उस नियामत की सुरमई गोद में बच्चों की तरह लेट जाया करें जिसे नींद कहते हैं



होली वह अनोखा दिन है जब जिसे बहुमत से बुरा समझा जाता है, वह भी बुरा नहीं रह जाता। जिसे बहुमत से अच्छा माना जाता है, उसकी सार्वजनिक ऐसी-तैसी की जाती है। कह सकते हैं कि होली एक ऐसा स्वच्छ दर्पण है जिसके हम, हमारा समाज, हमारी तथाकथित संस्कृति सब निर्वस्त्र हो कर खड़े हो जाते हैं और अपने पर जितना इतराते हैं उतना ही सकुचाते भी हैं। क्या ही अच्छा हो कि हम रोज एक घंटा होली के मूड में आ जाया करें और दिन भर के गर्दो-गुबार को झटक कर साफ चित्त से प्रकृति की उस नियामत की सुरमई गोद में बच्चों की तरह लेट जाया करें जिसे नींद कहते हैं और जो मृत्यु का एक लघु संस्करण है, ताकि अगली सुबह के बाल सूर्य की तरह हम भी ताजादम हो कर जीवन में वापसी का सुख अनुभव करते हुए अपने दिन भर के कामकाज में लग सकें।

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-राजकिशोर




समाज-भाषाविज्ञान : रंग-शब्दावली : निराला-काव्य




हिन्दुस्तानी
एकेडेमी का साहित्यकार सम्मान समारोह आयोजित



समाज-भाषाविज्ञान : रंग-शब्दावली : निराला-काव्य




इलाहाबाद, 6 फ़रवरी 2009 । (प्रेस विज्ञप्ति)।

"साहित्य से दिन-ब-दिन लोग विमुख होते जा रहे हैं। अध्यापक व छात्र, दोनों में लेखनी से लगाव कम हो रहा है। नए नए शोधकार्यों के लिए सहित्य जगत् में व्याप्त यह स्थिति अत्यन्त चिन्ताजनक है।" उक्त विचार उत्तर प्रदेश के उच्च शिक्षा मन्त्री डॊ.राकेश धर त्रिपाठी ने हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा आयोजित सम्मान व लोकार्पण समारोह के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए। उत्तर प्रदेश भाषा विभाग द्वारा संचालित हिन्दी व उर्दू भाषा के संवर्धन हेतु सन् 1927 में स्थापित हिन्दुस्तानी एकेडेमी की श्रेष्ठ पुस्तकों के प्रकाशन की श्रृंखला में इस अवसर पर अन्य पुस्तकों के साथ एकेडेमी द्वारा प्रकाशित डॊ. कविता वाचक्नवी की शोधकृति "समाज-भाषाविज्ञान : रंग-शब्दावली : निराला-काव्य" को लोकार्पित करते हुए उन्होंने आगे कहा कि यह पुस्तक अत्यन्त चुनौतीपूर्ण विषय पर केन्द्रित तथा शोधकर्ताओं के लिए मार्गदर्शक है। इस अवसर पर एकेडेमी के सचिव डॉ. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय द्वारा सम्पादित 'सूर्य विमर्श' तथा एकेडेमी द्वारा वर्ष १९३३ ई. में प्रकाशित की गयी पुस्तक 'भारतीय चित्रकला' का द्वितीय संस्करण (पुनर्मुद्रण) भी लोकार्पित किया गया। किन्तु जिस पुस्तक ने एकेडेमी के प्रकाशन इतिहास में एक मील का पत्थर बनकर सबको अचम्भित कर दिया है वह है डॉ. कवितावाचक्नवी द्वारा एक शोध-प्रबन्ध के रूप में अत्यन्त परिश्रम से तैयार की गयी कृति "समाज-भाषाविज्ञान : रंग-शब्दावली : निराला-काव्य"। इस सामग्री को पुस्तक का आकार देने के सम्बन्ध में एक माह पूर्व तक किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। स्वयं लेखिका के मन में भी ऐसा विचार नहीं आया था। लेकिन एकेडेमी के सचिव ने संयोगवश इस प्रकार की दुर्लभ और अद्‌भुत सामग्री देखते ही इसके पुस्तक के रूप में प्रकाशन का प्रस्ताव रखा जिसे सकुचाते हुए ही सही इस विदुषी लेखिका द्वारा स्वीकार करना पड़ा। कदाचित्‌ संकोच इसलि था कि दोनो का एक-दूसरे से परिचय मुश्किल से दस-पन्द्रह मिनट पहले ही हुआ था। यह नितान्त औपचारिक मुलाकात अचानक एक मिशन में बदल गयी और देखते ही देखते मात्र पन्द्रह दिनों के भीतर न सिर्फ़ बेहद आकर्षक रूप-रंग में पुस्तक का मुद्रण करा लिया गया अपितु एक गरिमापूर्ण समारोह में इसका लोकार्पण भी कर दिया गया। रंग शब्दों को लेकर हिन्दी में अपनी तरह का यह पहला शोधकार्य है। इसके साथ ही साथ महाप्राण निराला के कालजयी काव्य का रंगशब्दों के आलोक में किया गया समाज-भाषावैज्ञानिक अध्ययन भावी शोधार्थियों के लिए एक नया क्षितिज खोलता है। निश्चय ही यह पुस्तक हिदी साहित्य के अध्येताओं के लिए नयी विचारभूमि उपलब्ध कराएगी।



इस समारोह में एकेडेमी की ओर से हिन्दी, संस्कृ एवम उर्दू के दस लब्धप्रतिष्ठ विद्वानों प्रो. चण्डिकाप्रसाद शुक्ल, डॉ. मोहन अवस्थी, प्रो. मृदुला त्रिपाठी, डॉ. विभुराम मिश्र, डॉ. किशोरी लाल, डॉ. कविता वाचक्नवी, डॉ. दूधनाथ सिंह, डॉ. राजलक्ष्मी वर्मा, डॉ. अली अहमद फ़ातमी और श्री ए.ए.कदीर को सम्मानित भी किया गया। यद्यपि इनमें से डॉ. दूधनाथ सिंह, डॉ. राजलक्ष्मी वर्मा, डॉ. अली अहमद फ़ातमी और श्री एम.ए.कदीर अलग-अलग व्यक्तिगत, पारिवारिक या स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से उपस्थित नहीं हो सके, तथापि सभागार में उपस्थित विशा विद्वत्‌ समाज के बीच छः विद्वानों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए शाल, नारियल, व सरस्वती की अष्टधातु की प्रतिमा भेंट कर सम्मानित किया गया। प्रशस्ति पत्र भी प्रदान किए गए। एकेडेमी द्वारा अन्य अनुपस्थित विद्वानों के निवास स्थान पर जाकर उन्हें सम्मान-भेंट व प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर दिया जाएगा।


सम्मान स्वीकार करते हुए अपने आभार प्रदर्शन में डॊ. कविता वाचक्नवी ने कहा कि इस लिप्सापूर्ण समय में कृति की गुणवता के आधार पर प्रकाशन का निर्णय लेना और रचनाकार को सम्मानित करना हिन्दुस्तानी एकेडेमी की समृद्ध परम्परा का प्रमाण है, जिसके लिए संस्था व गुणग्राही पदाधिकारी निश्चय ही साधुवाद के पात्र हैं।


आरम्भ में हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सचिव डॊ. एस. के. पाण्डेय ने अतिथियों का स्वागत किया। उल्लेखनीय है कि वे स्वयं संस्कृत के विद्वान हैं , उनके कार्यकाल में एकेडेमी का सारस्वत कायाकल्प हो गया है। इस अवसर पर समारोह के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त ने सरस्वती दीप प्रज्वलित किया और सौदामिनी संस्कृत विद्यालय के छात्रों ने वैदिक मंगलाचरण प्रस्तुत किया। एकेडेमी के ही अधिकारी सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने खचाखच भरे सभागार में उपस्थित गण्यमान्य साहित्यप्रेमियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। *














देवी सरस्वती के चरणों में

परत-दर-परत


देवी सरस्वती के चरणों में
- राजकिशोर









बंगाल में सरस्वती पूजा के दिन जो खास बात देखने में आती है, उसका संबंध छात्राओं के उत्साह से है।
दिल्ली में रहते हुए वसंत का तो कभी-कभी पता चलता है, पर वसंत पंचमी का बिलकुल नहीं। इस दिन पश्चिम बंगाल में देवी सरस्वती की पूजा होती है। यह विद्यार्थियों के लिए खास दिन होता है। वे सरस्वती की मिट्टी की मूर्ति खरीद कर लाते हैं और पूजा करते हैं। पूजा के समय मूर्ति के समय अपनी किताबें -- ज्यादातर टेक्स्ट बुक्स -- रखते हैं। मैं भी बचपन में अपने घर की गली में सरस्वती पूजा का छोटा-सा निजी आयोजन किया करता था। मेरे बेटे ने भी कई वर्षों तक किया। लेकिन बेटी को इसकी कोई याद नहीं है, क्योंकि जब तक वह समझने-बूझने लायक हुई, हम दिल्ली आ चुके थे। यहाँ सरस्वती का वास है, पर सरस्वती की पूजा कोई नहीं करता।


बंगाल में सरस्वती पूजा के दिन जो खास बात देखने में आती है, उसका संबंध छात्राओं के उत्साह से है। सबेरे से ही पढ़नेवाली लड़कियाँ नहा-धो कर पीली साड़ी में और मुक्त केशराशि लहराते हुए सड़कों पर चलते हुए दिखाई पड़ने लगती हैं। उनका सौंदर्य अद्भुत होता है। इस कोमल और अवयस्क सुंदरता के आगे रमणियों का सौंदर्य साल भर पानी भरता रहता है। ये ही लड़कियाँ जब दुर्गा पूजा के अवसर पर सज-धज कर पूजा देखने निकलती हैं, तो उनका रूप बदल जाता है। तब वे सेक्सी दिखाई पड़ने की कोशिश करती हैं। पर सरस्वती पूजा के दिन उनके अस्तित्व के हर आयाम से पवित्रता छलकती रहती है। वे स्वयं छोटी-छोटी सरस्वतियाँ नजर आती हैं। मुझे लगता है, देवी सरस्वती का साहचर्य उन्हें कुछ पवित्र बना जाता है। इससे पता चलता है कि दुनिया में कोई भी चीज निरपेक्ष नहीं है -- हमारा आसंग तय करता है कि हम क्या होंगे और कैसा दिखेंगे। इस दृष्टि से सरस्वती पूजा की निर्मलता और पवित्रता अनोखी है। ऐसी ऊँचाई किसी और पर्व में दिखाई नहीं देती।


पर्व-त्यौहारों में अब मुझे कुछ खास आनंद नहीं आता। शायद यह उम्र का असर है। लेकिन पहले भी कुछ विशेष आनंद आता था, ऐसा याद नहीं पड़ता। इसका एक कारण शायद यह है कि पर्वों के साथ जो भावनाएँ जुड़ी हुई होनी चाहिए, वे नदारद हो चुकी हैं। सिर्फ होली अपने समस्त रंगों के साथ जारी है। हालाँकि उसे निरंतर अश्लील बनाने का सिलसिला जारी है। वसंतोत्सव या रंगोत्सव के रूप में उसकी जो मधुर सांस्कृतिक कल्पना की जा सकती है, उसके लिए समाज में कोई जगह नहीं देती। बहरहाल, अगर किसी एक हिन्दू त्यौहार को बचाए रखने के मामले में मेरी राय माँगी जाए, तो मैं सरस्वती पूजा के पक्ष में वोट दूँगा।


सरस्वती सिर्फ ज्ञान की देवी नहीं हैं। वे साहित्य और कला की भी देवी हैं। वे वाग्देवी भी हैं। इस तरह वे रचनात्मकता के सभी पहलुओं का प्रतिबिंबन करती हैं। हमें ज्ञान चाहिए, क्योंकि अज्ञानी रह कर न अपना भला कर सकते हैं न किसी और का। पर ज्ञान को शुष्क नहीं होना चाहिए -- उसके साथ भावना भी जुड़ी होनी चाहिए। इससे साहित्य तथा विभिन्न कलाओं की नदियाँ फूटती हैं। अंत में, सरस्वती का वाहन कहीं कमल का फूल और कहीं हंस दिखाई देता है। दोनों ही इस बात के प्रतीक हैं कि जो ज्ञान की आराधना करता है, वह धीरे-धीरे धवलबुद्धि, नीर-क्षीर विवेकी तथा नि:संग होता जाता है। इस प्रशांत अवस्था को हासिल किए बिना ज्ञान-कला-साहित्य की उपासना व्यर्थ है। इस लक्ष्य तक पहुंचने का एक रास्ता अध्यात्म से भी हो कर जाता है, पर जीवन के इस गुह्र आयाम तक सबकी गति नहीं हो सकती। इसलिए इसे आपवादिक मान कर चलना ही उचित और सुरक्षित है।


कहा जा सकता है कि यह ज्ञान का युग है। भक्ति मार्ग बहुत पीछे छूट चुका है। ज्ञान मार्ग प्रशस्त हो रहा है। हर आधुनिक व्यक्ति के पास जो न्यूनतम ज्ञान होता है, वह पहले बड़े-बड़े ज्ञानियों को नसीब नहीं होता था। यह आपत्ति आधारहीन नहीं है कि यह ज्ञान नहीं, सूचना है। इस युग को भी सूचना युग ही कहा जाना चाहिए। बात काफी हद तक सही है। लेकिन ज्ञान वह फूल है जो सूचनाओं के पेड़ पर ही खिलता है। वह जमाना चला गया जब लोग आँख बंद करके साधना करते थे और सहसा एक दिन ज्ञानी हो जाया करते थे। ऐसे ज्ञान से आज हमारा काम नहीं चल सकता। आज हमें वह ज्ञान चाहिए जो खुली आँखों से देखने पर हासिल होता है। बल्कि सिर्फ देखने से ही नहीं, बल्कि प्रयोगशाला में परीक्षण करके, क्योंकि आँखों को धोखा हो सकता है। सामाजिक विज्ञानों की अपनी प्रयोगशालाएँ हैं।


दुःख की बात यह है कि ज्ञान या सूचना जो कहिए, उसके विस्फोट ने हमारे जीवन बोध को किसी उल्लेखनीय पैमाने पर नहीं बदला है। हमारी जीवन शैली मोटे तौर पर वैसी ही है जैसी तब थी जब हम अपेक्षाकृत कम जानकार थे। शोषण, अन्याय, युद्ध, हिंसा आदि की समस्याएँ बनी हुई हैं। स्त्रियों और बच्चों का जीवन अभी भी असुरक्षित है। तरह-तरह के भेदभाव कायम हैं। पर्यावरण पर खतरा रोज बढ़ता जाता है। हम आज जिस पृथ्वी को जानते हैं, वह सौ साल बाद भी इसी रूप में मिलेगी? कोई नहीं जानता। नदियाँ, भूजल, वायु -- सब प्रदूषण का शिकार होते जा रहे हैं। इसी तरह हमारी भावनाएँ और व्यवस्थाएँ भी। समाजवाद अब फिर एक स्वप्न हो गया है। सुबह का अखबार पढ़ कर कहीं से क्या ऐसा लगता है कि यह ज्ञानी या जानकार लोगों की सभ्यता है?

इसका एक कारण शायद यह है कि पर्वों के साथ जो भावनाएँ जुड़ी हुई होनी चाहिए, वे नदारद हो चुकी हैं।



ऐसी सभ्यता में ही वह चीज फूल-फल सकती है जिसे ज्ञान का उद्योग (नॉलेज इंडस्ट्री) कहा जाता है। यह एक नया उद्योग है जिसका आधार सूचनाओं का आदान-प्रदान है। वैसे तो हर उद्योग का आधार ज्ञान ही है, पर इस उद्योग में ज्ञान स्वयं ही खरीद-बिक्री की चीज बन जाता है। ज्ञान का यह व्यापारीकरण हमारी सभ्यता के बुनियादी चरित्र की ओर संकेत करता है। यहाँ कोई भी चीज तुरंत व्यापार बना दी जाती है - कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे? यह ज्ञान की उपासना नहीं, ज्ञान का भक्षण है। ऐसे माहौल में ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा और ज्यादा उपयोगी तथा मूल्यवान हो जाती है। आराधक में विनम्रता होती है। ज्ञान की खोज में लगे लोगों में भी विनम्रता होनी चाहिए -- अहंकार नहीं। आराधक सभी के कल्याण की कामना करता है। ज्ञान के क्षेत्र में काम करनेवालों को भी नहीं भूलना चाहिए कि उनका लक्ष्य निजी या राष्ट्रीय लाभ नहीं, बल्कि मानव मात्र का कल्याण है। देवी सरस्वती निश्चय ही एक मिथक हैं -- पर एक ऐसा मिथक, जो हमारे समस्त यथार्थ बोध का मानदंड बन सकता है।

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बंगाल की सरस्वती पूजा (कर्मकांड पद्धति)



रंगों की सीपी से निकला यह प्यार-भरा झिलमिल मोती (रंग परिशिष्ट)




भारत सदा से ही कृषिप्रधान व धरती पुत्रों का देश रहा है, जिसकी अपनी एक विराट् गौरवशाली व समृद्ध आदि-संस्कृति है। नवान्न आने पर नवसस्येष्टियज्ञ की परिपाटी व इसके साथ साथ ऋतु परिवर्तन का काल, उत्साह, उल्लास, उमंगों को दोलायमान करने को काफ़ी होता है। बहुत सारी कथाएँ समानांतर चलती आई हैं।

साहित्य की धारा में रंगों की गुनगुन-रुनझुन कई लहरों पर गीत गाती चलती आई है। उनमें से होली के बहाने कुछ रंग हम सभी के, मानवमात्र के ललाट पर शुभकामनाओं की भाग्य रेखा बन दमकें,इस शुभकामना के साथ प्रस्तुत हैं कुछ रंगों के झिलमिलाते मोती. निराला के कुछ रंग-चित्र टुकड़ों -टुकड़ों में बाँटने का लोभ इस अवसर पर सम्वरण नहीं करना चाहिए, सो उनकी कविता के रंगो की छटा के साथ कुछ अन्य कविताओं का आनन्द भी बाँट रही हूँ।
-------------------------------------------------------(कविता वाचक्नवी)









निराला : कुछ रंग-चित्र


१)

तिल नीलिमा को रहे स्नेह से भर
जग कर नई ज्योति उतरी धरा पर
रंग से भरी हैं, हरी हो उठी हर
तरु की, तरुण-तान शाखें

२)
खिली चमेली देह-गन्ध मृदु
अम्धकार शुचि केश कुटिल ऋजु
सहन-शीत-सित यौवन अविचल
मानव के मन की चिर कारा

३)
हँसता हुआ कभी आया जब
वन में ललित वसन्त
तरुण विटप सब हुए, लताएँ तरुणी
और पुरातन पल्लव-दल का
शाखाओं से अन्त

४)
पत्तों से लदी डाल
कहीं हरी, कहीं लाल
कहीं पड़ी है उर में
मंद-गंध-पुष्प-माल
पाट-पाट शोभा श्री
पट नहीं रही है

५)
फिर नवल-कमल-वन फूलें
फिर नयन वहाँ पथ भूलें
फिर फूलों नव वृन्तों पर
अनुकूलें अलि अनूकूलें





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होली: रंग और दिशाएँ
[एक एब्स्ट्रेक्ट पेंटिंग]


=========== ...(शमशेर बहादुर सिंह)


१.
जँगले जालियाँ,
स्तम्भ
धूप के संगमर्मर के,
ठोस तम के।
कँटीले तार हैं
गुलाबी बाडि़याँ।
दूर से आती हुई
एक चौपड़ की सड़क
अंतस में
खोई जा रही।

धूप केसर आरसी
......बाहें।
आँख अनझिप
खुलीं
वक्ष में।
स्तन
पुलक बन
उड़ते और
मुँदते।

पीले चाँद
खिड़कियाँ
आत्मा की।

गुलाल
धूल में
फैली
सुबहें।
मुख
सूर्य के टुकडे़
सघन घन में खुले-से,
या ढके
मौन,
अथवा
प्रखर
किरणों से।

जल
आइना।
सड़कें
विविध वर्ण:
बहुत गहरी।
पाट चारों ओर
दर्पण-
समय के अगणित चरण को।

घूमता जाता हुआ-सा कहीं, चारों ओर
वह
दिशाओं का हमारा
अनंत
दर्पण।



२.
चौखटे
द्वार
खिड़कियां:
सघन
पर्दे
गगन के-से:
हमीं हैं वो
हिल रहे हैं
एक विस्मय से:
अलग
हर एक
अपने आप:
[हँस रहे हैं
चौखटे द्वार
खिड़कियाँ जँगले
हम आप।]
केश
लहराते हैं दूर तक
हवा में:
थिरकती है रात
हम खो गए हैं
अलग-अलग
हरेक।


३.
कई धाराएं
खडी़ है स्तंभवत
गति में:
छुआ उनको,
गए।
कई दृश्य
मूर्त्त द्वापर
और सतयुग
झांकते हैं हमें
मध्ययुग से
खिल-खिलाकर
माँगते हैं हमें:
हमने सर निकाला खिड़कियों से
और हम
गए।
सौंदर्य
प्रकाश है।

पर्व
प्रकाश है
अपना।
हम मिल नहीं सकते:
मिले कि
खो गए।
आँच है रंग
तोड़ना उनका
बुझाना है
कहीं अपनी चेतना को।
लपट
फ़ूल हैं
कोमल
बर्फ़ से:
हृदय से उनको लगाना
सींझ देना है
वसंत बयार को
सांस में:
वो हृदय है स्वयं।
़ ़
एक ही ऋतु हम
जी सकेंगे,
एक ही सिल बर्फ़ की
धो सकेंगे
प्राण अपने।
[कौन कहता है?]

यहीं सब कुछ है।
इसी ऋतु में
इसी युग में
इसी
हम में। [१९५८]

********************


फिर लौट आया है बसन्त
( नरेन्द्र पुण्डरीक)


तुम्हें मालूम हो या न हो
लेकिन कलियों के जिस्म में
रंगों की धकापेल मचाता हुआ
फिर लौट आया है बसन्त,
पहले से कहीं ज्यादा !
गदराकर साफ़ हो गई है नदी,
धुल गया है आकाश,
हर तरफ़ पड़ रही है -
गुदगुदा रही है सूरज की रोशनी
जाड़े की सर्द,मादक
थपकियों से
धरती को धीरे-धीरे
गर्म करती हुई,
भरती हुई उसके जिस्म में एक चमक,
और हमारे खूनों में
वक्त के खिलाफ़ एक बेचैनी !

फिर लौट आया है बसन्त
पूरे साल की रोटी के सवाल को
अपनी गर्माहट से पकाता हुआ,
हमारी बेकल इच्छाओं की ओर,
हमारे सपनों के राग में
फिर लौट आया है बसन्त ।

****************************


रंगों की परिभाषा

(डॊ. देवराज)


मुझ से मेरे मन ने पूछा
होली की क्या परिभाषा है
मैं बोला - केवल मादकता
बस इतना अर्थ जरा-सा है।


रंगों की सीपी से निकला
यह प्यार-भरा झिलमिल मोती
हम ज्यों ही गले मिले हँस दी
वह आँख अभी थी जो रोती
छंदों की भाषा मौन यहाँ
पलकों की मधुमय भाषा है।


गेहूँ की बाली का यौवन
सरसों के पग की बन पायल
लय- ताल साधता बेसुध हो
सबका अन्तर करता घायल
दीवारें सब बह जाती हैं
रंगों का अजब तमाशा है ।।

***************************

धुआँ और गुलाल

( डॊ.ऋषभदेव शर्मा)



सिर पर धरे धुएँ की गठरी
मुँह पर मले गुलाल
चले हम
धोने रंज मलाल !



होली है पर्याय खुशी का
खुलें
और
खिल जाएँ हम;
होली है पर्याय नशे का -
पिएँ
और
भर जाएँ हम;
होली है पर्याय रंग का -
रँगें
और
रंग जाएँ हम;
होली है पर्याय प्रेम का -
मिलें
और
खो जाएँ हम;
होली है पर्याय क्षमा का -
घुलें
और
धुल जाएँ गम !

मन के घाव
सभी भर जाएँ,
मिटें द्वेष जंजाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !




होली है उल्लास
हास से भरी ठिठोली,
होली ही है रास
और है वंशी होली
होली स्वयम् मिठास
प्रेम की गाली है,
पके चने के खेत
गेहुँ की बाली है
सरसों के पीले सर में
लहरी हरियाली है,
यह रात पूर्णिमा वाली
पगली
मतवाली है।

मादकता में सब डूबें
नाचें
गलबहियाँ डालें;
तुम रहो न राजा
राजा
मैं आज नहीं कंगाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !




गाली दे तुम हँसो
और मैं तुमको गले लगाऊँ,
अभी कृष्ण मैं बनूँ
और फिर राधा भी बन जाऊँ;
पल में शिव-शंकर बन जाएँ
पल में भूत मंडली हो।


ढोल बजें,
थिरकें नट-नागर,
जनगण करें धमाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !

******************************

होली के दो छंद
( योगेन्द्र मौदगिल )


)
होली के बहाने करें गोरियों के गाल लाल
अंग पे अनंग की तरंग आज छाई सी
बसंत की उमंग मन होली के बहाने चढी
भंग की तरंग रंग ढंग बल खाई सी
सजना मलंग हुए सजनी मॄदंग हुई
रास रति रंग रत हवा लहराई सी
दंग हुए देख लोग प्रेम के प्रसंग आज
छुइ मुइ जोडियां भी कैसी मस्ताई सी

२)
मीठी मीठी बोलियों के भीगी भीगी चोलियों के
होली के नजारे सब आंखों को सुहाते हैं
रस रंग भाव रंग लय रंग ताल रंग
देख के उमंग को अनंग मुस्काते हैं
सारे मगरूर हुए भंग के नशे में चूर
प्रेम के पुजारी हो मलंग इठलाते हैं
लाग ना लपेट कोई ईर्ष्या ना द्वेष कोई
प्रेम के त्यौहार ही प्रसंग सुलझाते हैं




आगमन वसन्त का
( येव्गेनी येव्तुशंको )
सहयात्रा, मास्को हिन्दी महोत्सव-स्मारिका-२००७



धूप खिली थी
और रिमझिम वर्षा
छत पर ढोलकी-सी
बज रही थी
लगातार
सूर्य ने फैला रखी थी बाँहें अपनी
वह जीवन को आलिंगन में भरे
कर रहा था प्यार



नव अरुण की
ऊष्मा से
हिम सब पिघल गया था
जमा हुआ
जीवन सारा तब
जल में बदल गया था
बसन्त कहार बन
बहँगी लेकर
हिलत-डुलता आया ऐसे
दो बाल्टियों में
भर लाया हो
दो कम्पित सूरज जैसे ।

***********************

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