- डॉ. वेद प्रताप वैदिक
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सरबजीतों को यों मरने न दें
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स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते
स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु
ते
- डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र
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Ramnagar, Uttarakhand, India
स्वतन्त्रतादिवस पर कोई बधाई नहीं
पुलिस अफसर हत्या : दूसरा पहलू
पुलिस अफसर हत्या : दूसरा पहलू
- डॉ वेदप्रताप वैदिक
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भारत भवन की 30वीं वर्षगाँठ का समारोह
भारत भवन की 30वीं वर्षगाँठ का समारोह गरिमापूर्ण ढंग से सम्पन्न
बहुकला केंद्र, भारत भवन की 30वीं वर्षगाँठ का समारोह 13 से 19 फरवरी 2012 तक आयोजित किया गया। इस समारोह में वैविध्य से परिपूर्ण कलात्मक आयोजन सम्पन्न हुए।
मेरा दोस्त शहर ‘लैंसडाउन’
मेरा दोस्त शहर ‘लैंसडाउन’
- दीप्ति गुप्ता
शान्त और सुरम्य वादियों में
कायनात की कुदरती तिलस्म ओढ़े एक छोटा सा शहर, कोमल घास से भरे पहाडी ढलान, एक तरह की खास खुशबू से भरे
खुद-ब-खुद उग आनेवाले जंगली फूल, झूमते दरख़्त, परस्पर सटे-सटे, छोटे-छोटे पहाडी घरों का घनछत, हरियाली के बीच में
आने जाने वालों की आवा-जाही से बन जाने वाली प्राकृतिक बटिया, सर्पीली सड़कें, इधर
उधर लगभग हर आधा किलोमीटर की दूरी पर बने अंग्रेजों के ज़माने के भव्य बंगलें जिनकी
लाल टीन की छत चिमनियों सहित दूर से ही अपनी झलक दिखाती वहाँ की सघन वनस्पतियों
में अपनी उपस्थिति को दर्ज करती, मन को लुभाती पहाडी फलों की मीठी महक, खुले विशाल
मैदान में ट्रेनिंग लेते रंगरूटो की परेड,
शहर से ऊपर पहाडी पर स्थित आर्मी हैडक्वार्टर
से बिगुल की उठती एक खास धुन, अक्सर सड़क और बटिया पर ‘लैफ्ट-राईट -
लैफ्ट-राईट’ करते सैनिकों के भारी फ़ौजी बूटों की तालबध्द ध्वनि, शाखों पर पंछियों
की चहचहाहट, जून माह की सुबह - शाम के सर्द झोको से भरी गरमी, धुंध से भरी ना थमने
वाली जुलाई-अगस्त की बरसात, सितम्बर माह का धुले सफ़ेद बादलों वाला नीला आकाश,
सर्दियों में सफ़ेद नाजुक फूलों सी झरती बर्फ और अपनी आगोश में लेता कोहरा, इस सब
का नाम है ‘लैंसडाउन’ I उत्तराखंड में ६०००फ़ीट की ऊंचाई पर,
प्रकृति की गोद में बसा मन को मोह लेने
वाला यही ‘लैंसडाउन’ आज भी मेरे मानस पटल
पर अपने भरपूर सौंदर्य के साथ अंकित है I अँग्रेज़ो के समय से ही अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण लैंसडाउन, एक लोकप्रिय ‘हिल
स्टेशन’ के रूप में स्थापित हो चुका था I घने देवदार और
चीड के जंगलों व चारों ओर पहाड़ों से घिरा यह अनूठा रम्य स्थान, अब से ५० वर्ष पहले
तो और भी अधिक प्राकृतिक संपदा व सौंदर्य से भरा था Iहिंदी विवि में त्रि-दिवसीय फिल्म समारोह का उद्घाटन
हिंदी विवि में फिरोज अब्बास खान ने किया त्रिदिवसीय फिल्म समारोह का उद्घाटन
फिल्मोत्सव में कई फिल्मी हस्तियाँ थीं मौजूद, `गांधी माई फादर' रही उद्घाटन फिल्म
वर्धा, 06 सितम्बर, 2011;
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में पहली बार आयोजित त्रिदिवसीय (6-8 सितम्बर, 2011) महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का उद्घाटन कई फिल्मी हस्तियों की मौजूदगी में सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक फिरोज अब्बास खान ने किया। फिरोज अब्बास खान की फिल्म गांधी माई फादर उद्घाटन फिल्म रही। फिल्म समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने की।
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२०११ का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार अनुज लुगुन को
२०११ का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार हर वर्ष किसी युवा कवि की श्रेष्ठ कविता को दिया जाता है. निर्णायक मंडल में अशोक वाजपेयी, अरुण कमल, उदय प्रकाश, अनामिका, और पुरषोत्तम अग्रवाल हैं. बारी-बारी से हर वर्ष एक निर्णायक पुरस्कार के लिए कविता का चुनाव करता है. इस बार के निर्णायक श्री उदय प्रकाश के शब्दों में "अनुज लुगुन की कविता "अघोषित उलगुलान" को वर्ष २०११ का प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार देते हुए मुझे गर्व और सार्थकता दोनों की अनुभूति हो रही है."
निर्णायक का वक्तव्य
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वस्तानवी को हटाने का वास्तविक अर्थ
वस्तानवी को हटाने का वास्तविक अर्थ
- डॉ. वेदप्रताप वैदिक
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रामलीला मैदान में रावणलीला पर कवि श्री उदय प्रताप सिंह : ना तीर न तलवार से मरती है सचाई
कल रात रामलीला मैदान में जो रावणलीला हुई उस पर श्रेष्ठ बुजुर्ग कवि श्री उदय प्रताप सिंह जी की आज ही लिखी ग़ज़ल -
ना तीर न तलवार से मरती है सचाई
जितना दबाओ उतना उभरती है सचाई
ऊंची उड़ान भर भी ले कुछ देर को फरेब
आखिर में उसके पंख कतरती है सचाई
बनता है लोह जिस तरह फौलाद उस तरह
शोलों के बीच में से गुजरती है सचाई
सर पर उसे बैठाते हैं जन्नत के फ़रिश्ते
ऊपर से जिसके दिल में उतरती है सचाई
जो धूल में मिल जाय, वज़ाहिर ,तो इक रोज़
बाग़े-बहार बन के सँवरती है सचाई
रावण क़ी बुद्धि बल से न जो काम हो सके
वो राम क़ी मुस्कान से करती ही सचाई
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बिनायक पर हंगामा क्यों ?
बिनायक पर हंगामा क्यों ?
डॉ वेदप्रताप वैदिक
डॉ वेदप्रताप वैदिक
डॉ. बिनायक सेन को लेकर देश का अंग्रेजी मीडिया और हमारे कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी जिस तरह आपा खो रहे हैं, उसे देखकर देश के लोग दंग हैं। इतना हंगामा तो प्रज्ञा ठाकुर वगैरह को लेकर हमारे तथाकथित राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी तत्वों ने भी नहीं मचाया। वामपंथियों ने आरएसएस को भी मात कर दिया। आरएसएस ने जरा भी देर नहीं लगाई और ‘भगवा आतंकवाद’ की भर्त्सना कर दी। अपने आपको हिंसक गतिविधियों का घोर विरोधी घोषित कर दिया। ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द ही मीडिया से गायब हो गया। लेकिन बिनायक सेन का झंडा उठाने वाले एक भी संगठन या व्यक्ति ने अभी तक माओवादी हिंसा के खिलाफ अपना मुँह तक नहीं खोला। क्या यह माना जाए कि माओवादियों द्वारा मारे जा रहे सैकड़ों निहत्थे और बेकसूर लोगों से उनका कोई लेना-देना नहीं है? क्या वे भोले आदिवासी भारत के नागरिक नहीं हैं? उनकी हत्या क्या इसलिए उचित है कि उसे माओवादी कर रहे हैं? माओवादियों द्वारा की जा रही लूटपाट क्या इसीलिए उचित है कि आपकी नजर में वे किसी विचारधारा से प्रेरित होकर लड़ रहे हैं? मैं पूछता हूँ कि क्या जिहादी आतंकवादी और साधु-संन्यासी आतंकवादी चोर-लुटेरे हैं? वे भी तो किसी न किसी ‘विचार’ से प्रेरित हैं। विचारधारा की ओट लेकर क्या किसी को भी देश के कानून-कायदों की धज्जियाँ उड़ाने का अधिकार दिया जा सकता है? क्या यही मानव अधिकार की रक्षा है?
यदि नहीं तो फिर प्रश्न उठता है कि छत्तीसगढ़ में जो लोग पकड़े गए हैं, उन्हें दंडित क्यों न किया जाए? जो भी दंड उन्हें दिया गया है, उसे वे खुशी-खुशी स्वीकार क्यों नहीं करते? यदि वे सचमुच माओवादी हैं या माओवाद के समर्थक हैं, तो उन्हें वैसी घोषणा खम ठोककर करनी चाहिए थी, देश के सामने और अदालत के सामने भी। जरा पढ़ें, 1921 में अहमदाबाद की अदालत में महात्मा गांधी ने अपनी सफाई में क्या कहा था। यदि वे लोग माओवादी नहीं हैं और उन्होंने छत्तीसगढ़ के खूनी माओवादियों की कोई मदद नहीं की है, तो वे वैसा साफ-साफ क्यों नहीं कहते? वे सरकारी हिंसा के साथ-साथ माओवादी हिंसा की निंदा क्यों नहीं करते? यदि वे ऐसा नहीं करते, तो जो अदालत कहती है, उस पर ही आम आदमी भरोसा करेगा। छत्तीसगढ़ की अदालत के फैसले पर जिस तरह का आक्रमण हमारे छद्म वामपंथी कॉमरेड लोग कर रहे हैं, वैसी न्यायालय की अवमानना भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुई।
यदि बिनायक सेन और उनके साथी सचमुच बहादुर होते या सचमुच आदर्शवादी होते तो सच बोलने का नतीजा यही होता न कि उन्हें फांसी पर लटका दिया जाता। जिसने अपने सिर पर कफन बांध रखा है, वह एक क्या, हजार फांसियों से भी नहीं डरेगा। आदर्श के आगे प्राण क्या चीज है? अपने प्राणों की रक्षा के लिए बहादुर लोग क्या झूठ बोलते हैं? क्या कायरों की तरह अपनी पहचान छुपाते हैं? भारत जैसे लोकतांत्रिक और खुले देश में जो ऐसा करते हैं, वे अपने प्रशंसकों को मूर्ख और मसखरा बनने के लिए मजबूर करते हैं। माओवादियों की दलाली कर रहे लोगों को कहीं उनके प्रशंसक भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद और बिस्मिल के उच्चासन पर बिठाने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं?
डॉ बिनायक सेन और उनकी पत्नी यदि सचमुच आदिवासियों की सेवा के लिए अपनी मलाईदार नौकरियाँ छोड़कर छत्तीसगढ़ के जंगलों में भटक रहे हैं तो वे निश्चय ही वंदनीय हैं, लेकिन उनके बारे में आग उगल रहे अंग्रेजी अखबार यह क्यों नहीं बताते कि उन्होंने किन-किन क्षेत्रों के कितने आदिवासियों की किन-किन बीमारियों को ठीक किया? यदि सचमुच उन्होंने शुद्ध सेवा का कार्य किया होता तो अब तक काफी तथ्य सामने आ जाते। लोग मदर टेरेसा को भूल जाते हैं। पहला प्रश्न तो यही है कि कोलकाता या दिल्ली छोड़कर वे छत्तीसगढ़ ही क्यों गए? कोई दूसरा इलाका उन्होंने क्यों नहीं चुना? क्या यह किसी माओवादी पूर्व योजना का हिस्सा था या कोई स्वत:स्फूर्त माओवादी प्रेरणा थी? जेल में फंसे माओवादियों से मिलने वे क्यों जाते थे? क्या वे उनका इलाज करने जाते थे? क्या वे सरकारी डॉक्टर थे? जाहिर है कि ऐसा नहीं था।
इसीलिए चिट्ठियाँ आर-पार करने का आरोप निराधार नहीं मालूम पड़ता। मैंने खुद कई बार आंदोलन चलाए और जेल काटी है। जो लोग जेल में रहे हैं, उन्हें पता है कि गुप्त संदेश आदि कैसे भेजे और मंगाए जाते हैं। पीयूसीएल के अधिकारी के नाते बिनायक का कैदियों से मिलना डॉक्टरी कम, वकालत ज्यादा थी। यदि कॉमरेड पीयूष गुहा के थैले से वे तीन चिट्ठियां पकड़ी गईं, जो कॉमरेड नारायण सान्याल ने बिनायक सेन को जेल में दी थीं, तो गुहा की कही हुई इस बात को झुठलाने के लिए वकीलों को खड़ा करने की जरूरत क्या थी? भारत को शोषकों से मुक्त करवाने वाला क्रांतिकारी इतना छोटा-सा ‘गुनाह’ करने से भी क्यों डरता है? पकड़े गए कॉमरेडों को किराए पर मकान दिलवाने और बैंक खाता खुलवाने की बात खुद बिनायक ने स्वीकार की है। अदालत को बिनायक की सांठ-गाँठ के बारे में अब तक जितनी बातें मालूम पड़ी हैं, वे सब ऊँट के मुँह में जीरे के समान हो सकती हैं। असली बातों तक वे बेचारे पुलिसवाले क्या पहुंच पाएंगे, जो इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट को आईएसआई (पाकिस्तानी जासूसी संगठन) समझ लेते हैं। पुलिसवालों का दिल गुस्से से लबालब हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि माओवादी हिंसा में वे ही थोक में मारे जाते हैं। वे नेता हैं, न धन्ना सेठ। उनके लिए कौन रोएगा? हमारे गालबजाऊ और आरामफरमाऊ बुद्धिजीवी तो उन्हें मच्छर के बराबर भी नहीं समझते। एक माओवादी के लिए जो आसमान सिर पर उठाने को तैयार है, वे सैकड़ों पुलिसवालों की हत्या पर मौनी बाबा का बाना धारण कर लेते हैं।
कौन हैं ये लोग? असल में ये ही ‘बाबा लोग’ हैं। अंग्रेजीवाले बाबा! इनकी पहचान क्या है? शहरी हैं, ऊँची जात हैं, मालदार हैं और अंग्रेजीदाँ हैं। आम लोगों से कटे हुए, लेकिन देश और विदेश के अंग्रेजी अखबारों और चैनलों से जुड़े हुए। इन्हें महान बौद्धिक और देश का ठेकेदार कहकर प्रचारित किया जाता है। ये देखने में भारतीय लगते हैं, लेकिन इनके दिलो-दिमाग विदेशों में ढले हुए होते हैं। इनकी बानी भी विदेशी ही होती है। भारतीय रोगों के लिए ये विदेशी नुस्खे खोज लाने में बड़े प्रवीण होते हैं। इसीलिए शोषण और अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए गांधी, लोहिया और जयप्रकाश इन्हें बेकार लगते हैं। ये अपना समाधान लेनिन, माओ, चे ग्वारा और हो ची मिन्ह में देखते हैं। अहिंसा को ये नपुंसकता समझते हैं, लेकिन इनकी हिंसा जब प्रतिहिंसा के जबड़े में फंसती है तो वह कायरता में बदल जाती है। इसी मृग-मरीचिका में बिनायक, सान्याल, गुहा, चारु मजूमदार, कोबाद गांधी – जैसे समझदार लोग भी फंस जाते हैं। ऐसे लोगों के प्रति मूल रूप से सहानुभूति रखने के बावजूद मैं उनसे बहादुरी और सत्यनिष्ठा की आशा करता हूं। ऐसे लोगों को अगर अदालतें छोड़ भी दें तो यह छूटना उनके जीवन-भर के करे-कराए पर पानी फेरना ही है। क्या वामपंथी बुद्धिजीवी यही करने पर उतारू हैं?
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यह चुस्ती .....
यह चुस्ती फिर कब दिखाई देगी?
- राजकिशोर
दूसरे सभी बुखारों की तरह आखिरकार कॉमनवेल्थ खेलों का बुखार उतर गया। दिल्ली के राजा लोग अपनी पीठ थपथपा सकते हैं कि वे एक कठिन परीक्षा में खरे उतरे हैं। जैसे ज्यादातर छात्र साल भर मौज-मस्ती करते हैं और आखिरी दिनों में परीक्षा की तैयारी जोर-शोर से करने लगते हैं, वैसे ही भारत सरकार शुरू में तो इस उम्मीद पर लगभग हाथ पर हाथ धरे बैठी रही कि ईश्वर की कृपा से सब कुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन जब परीक्षा की तारीखें नजदीक आने लगीं और सब कुछ गलत ही गलत होता नजर आने लगा, तब आला वजीर को खुद हस्तक्षेप करना पड़ा और तैयारी की गाड़ी टॉप स्पीड से चलने लगी। अब हम संतोष की सांस ले सकते हैं और यह दावा कर सकते हैं कि हम उतने जाहिल या काहिल नहीं हैं जितना अखबारों में काम करने वाले, जो व्यवस्था के जन्मजात आलोचक हैं, हमें बता रहे थे। अखबार हार गए, सरकार जीत गई।
क्या यह प्रधानमंत्री की अचानक पैदा हुई नाराजगी का नतीजा था कि कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी समय पर पूरी हो गई और हम अपनी ही आंखों में गिरने से बच गए? विचार करने की बात यह है कि विशेषज्ञ वही थे, अमलाशाही वही थी, ठेकेदार और मजदूर वही थे, लेकिन वे तब तक कछुए की चाल से चलते रहे जब तक इन सभी पर ऊपर से एक अदृश्य मुक्का पड़ा। क्या इस मुक्के की थाप न लगने तक वे अपना-अपना काम संतोषप्रद रफ्तार से नहीं कर सकते थे? मुक्का खाने के बाद इन सब की कार्य कुशलता अचानक बढ़ गई और जो समय पर होता हुआ नहीं दिख रहा था, वह अचानक रास्ते पर आ गया। इससे क्या पता चलता है?
पता यह चलता है कि भारत की अमलाशाही वास्तव में उतनी काहिल या कामचोर नहीं है जितनी आम तौर पर समझी जाती है। वह चाहे तो अपनी हर ड्यूटी को ठीक से और समय पर निपटा सकती है। लेकिन इसके लिए उसे चाबुक की फटकार चाहिए। चाबुक का डर न हो, तो सब कुछ बिखरा-बिखरा-सा पड़ा रहता है – फर्श की धूल, सड़कों के गड्ढे, शौचालयों की गंदगी, पेशाबखानों के दाग और दफ्तर की उद्देश्यहीन अस्तव्यस्तता। जब पता चलता है कि साहब दौरा करने वाले हैं, तब अचानक सभी अधीनस्थों की इंद्रियां – छठी इंद्रिय सहित - जाग उठती हैं और साहब जहां-जहां से गुजर सकते हैं, वहां-वहां सुंदरीकरण का अभियान शुरू हो जाता है। यह चुस्ती अचानक आसमान से टपक नहीं पड़ती, बल्कि भीतर सोई रहती है। जागती वह तब है जब निलंबित या बरखास्त होने का डर पैदा हो जाता है। शायद हमारा राष्ट्रीय चरित्र यही है।
बेशक सरकारी दफ्तरों और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों की तुलना में निजी क्षेत्र के काम-काज में मजबूरी होने पर ही काम करने की प्रवृति बहुत कम दिखाई पड़ती है। इसका मुख्य कारण यह है कि सरकारी कर्मचारियों को नौकरी की सुरक्षा का अभेद्य कवच मिला हुआ है। उन्हें स्थानांतरित या मुअत्तल तो कभी भी किया जा सकता है, पर बरखास्त करना नाकों तले चने चबाना है। मंत्री आते-जाते रहते हैं, संत्री बने रहते हैं। दूसरी तरफ, निजी क्षेत्र में एक मिनट में छुट्टी हो जा सकती है – कर्मचारी की गलती हो चाहे न हो। यहां हर कर्मचारी अपनी पीठ पर चाबुक की छाया महसूस करता है और चाबुक की मार से नहीं, बल्कि मार के भय से सरपट दौड़ता रहता है - उसके पेट में पूरे दाने हों या नहीं।
निश्चय ही, यह कोई अच्छी हालत नहीं है। इसी आधार पर निजी क्षेत्र को सार्वजनिक क्षेत्र से ज्यादा चुस्त और कार्यकुशल बताया जाता है। प्रतिद्वंद्विता को सहकार से ज्यादा कारगर भावना माना जाता है। सवाल उठता है कि मनुष्य क्या हमेशा डर से ही परिचालित होता रहेगा? क्या लोभ ही उसकी कार्यकुशलता का स्तर ऊंचा रख सकता है? बेशक साधारण आदमी के लिए संत होना कठिन है (सच तो यह है कि संतों के लिए भी संत होना कम कठिन नहीं है)। बेहतर से बेहतर संस्कृति में भी डर और लोभ की कुछ न कुछ भूमिका बनी रहेगी। इसके बावजूद उत्पादन के पूरे तंत्र की परिचालिका शक्ति अगर यही तत्व बने रहते हैं, तो ऐसे समाज को कोई सभ्य समाज नहीं कहा जा सकता। यह तो एक तरह से दास प्रथा की वापसी है।
कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी का पूरापन एक और तथ्य की याद दिलाता है। वह तथ्य यह है कि भारत सरकार आम तौर पर भले ही लद्धड़ और सुस्त दिखाई देती हो, किसी बड़ी चुनौती का सामना करना हो, तो वह चीते की-सी फुर्ती के साथ टूट पड़ती है। कुछ ऐसी ही घटनाओं को याद कीजिए। तेलंगाना में सशस्त्र क्रांति के प्रयास को कितना जल्द कुचल गया था। इमरजेंसी में सरकारी तंत्र कितना चुस्त और कार्यकुशल हो गया था। बाबू दफ्तर में समय पर पहुंचने लगे थे और रेलें एकदम समय पर चलने लगी थीं। जब पंजाब में आतंकवाद पर निर्णायक चोट करनी थी और भिंडरांवाले को खत्म करना था, तब अकाल तख्त पर कितनी त्वरित कार्रवाई की गई थी। जब करगिल में भारतीय जमीन को पाकिस्तानी घुसपैठियों से आजाद कराना था, तो इस काम को कितनी जल्द और कितनी बहादुरी के साथ अंजाम दे दिया गया था। लेकिन यही फुर्ती माओवादियों का सफाया करने में (यह उचित है या नहीं, यह अलग सवाल है), दिखाई नहीं पड़ रही है। इसका प्रमुख कारण यही है कि सरकार ने घोषणा भले ही कर दी हो, पर वह अपनी पूरी ऊर्जा के साथ इस अजेंडा पर काम नहीं कर पा रही है। अगर सरकार सचमुच ठान ले, तो यह काम दो-तीन महीने से ज्यादा का नहीं है।
इसीलिए यह प्रश्न करना जायज है कि कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन में जिस तरह की सक्रियता दिखाई दी, क्या वैसी ही सक्रियता अन्य सरकारी परियोजनाओं के क्रियावन्यन में क्यों दिखाई नहीं दे सकती? गरीबों के लिए सरकारी अनाज देर से पहुंचता है, बीपीएल कार्ड जारी करने में महीनों लग जाते हैं, सड़कें मरम्मत के इंतजार में बरसों बिलखती रहती हैं, बिजली के खंबे लग जाते हैं, पर बिजली को पहुंचने में कई साल लग जाते हैं, आदमी आज रिटायर होता है और उसकी पेंशन अगले या अगले के अगले साल शुरू हो पाती है आदि-आदि। स्पष्ट है कि सरकार ने खेलों के आयोजन में जैसी चुस्ती दिखाई, क्या वैसी ही चुस्ती वह अन्यत्र क्यों नहीं दिखा सकती है। लेकिन किसी को इसकी जरूरत ही क्या है? क्या इसके बिना भी देश ठीकठाक नहीं चल रहा है और दुनिया भारत में लोकतंत्र की सफलता के गीत नहीं गा रही है?
खबरों के आगे खिंचता नेपथ्य
खबरों के आगे खिंचता नेपथ्य
-प्रभु जोशी
दुनिया भर में, ‘विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र‘ की तरह ख्यात भारत ने, जब एक ‘नव-स्वतंत्र राष्ट्र‘ की तरह, विश्व-‘राजनीति में जन्म लिया, तब निश्चय ही न केवल ‘पराजित‘ बल्कि, लगभग हकाल कर बाहर कर दी गयी ‘औपनिवेशिक-सत्ता‘ के कर्णधारों की आँखें, इसकी ‘असफलता‘ को देखने के लिए बहुत आतुर थीं। चर्चिल की बौखलाहटों को व्यक्त करती हुई, तब की कई उक्तियाँ इतिहास के सफों पर आज भी दर्ज हैं। अलबत्ता, उनकी ‘अपशगुनी उम्मीदों‘ के बार-खिलाफ, जब-जब इस ‘महादेश‘ में संसदीय चुनाव हुए, तब-तब इस बात की पुष्टि काफी दृढ़ता के साथ हुई कि बावजूद ‘सदियों की पराधीनता‘ के, भारतीय-जनमानस में एक अदम्य ‘लोकतांत्रिक-आस्था‘ है, जो केवल उसके सोच भर में स्पंदित नहीं है, बल्कि, उसकी तमाम संस्थाओं में, वह लगभग ‘दहाड़ती‘ हुई उपस्थित है। कहने की जरूरत नहीं कि उसके ‘चौथे खंभे‘ में तो ‘नृसिंह‘ की-सी शक्ति है, जो सत्ता के पेट को चीर सकती है। आपातकाल में तो उसने यह पूरी शिद्दत से प्रमाणित कर दिया था कि न केवल ‘लिख कर‘ बल्कि इसके विपरीत ‘न लिखकर‘ भी वह अपनी आवाज को इस तरह बुलन्द कर सकती है, जो हजारों-हजार लिखे गए लफ्जों से कहीं ज्यादा प्रखर प्रतिरोध का रूप रख सकती है। सम्पादकीय की जगह खाली छोड़ने से ‘मौन की तीखी अनुगूँज‘ राष्ट्रव्यापी बन गयी थी।
बहरहाल, इन्दौर नगर में पिछले सप्ताह ‘गाँधी-प्रतिमा स्थल‘ पर कतिपय बुद्धिजीवियों ने देश भर के कोई बीस-बाईस हिन्दी समाचार पत्रों की एक-एक प्रति जुटाकर, तमाम अखबारों के द्वारा ‘अकारण‘ ही तेजी से किये जा रहे हिन्दी के हिंग्लिशीकरण बनाम ‘क्रिओलीकरण’ के जरिए, जिस ‘बखड़ैली भाषा‘ को जन्म देने में लगे है, उसके प्रति हिन्दी भाषाभाषी पाठकों की पीड़ा और प्रतिकार को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए, उनकी होली जलायी। निश्चय ही प्रतिकार की इस ‘प्रतीकात्मकता‘ से जो लोग असहमत थे, वे इसमें शामिल नहीं हुए। उनके पास अपने तर्क और अपनी स्पष्ट मान्यताएँ थीं, जबकि अखबारों की ‘होली‘ जलाने वालों के पास अपनी सिद्धान्तिकी थी। दोनों के पक्ष-विपक्ष में एक गंभीर विमर्श भी बन सकता था।
बहरहाल, घटना छोटी-सी और निर्विघ्न सी थी, लेकिन भारतीय पत्रकारिता के विगत तिरेसठ साल के इतिहास में पहली बार घट रही थी। लेकिन देश के किसी भी हिन्दी अखबार ने (नईदुनिया को छोड़कर। हालांकि, जनसत्ता ने खबर तो नहीं, लेकिन, राजकिशोर के लेख में इस खबर को यथावत और विस्तार से दिया है।) यह खबर प्रकाशित नहीं की। इण्टरनेट के ब्लागों और ‘फेस बुक‘ पर अवश्य इस पर बहस के लिए अवकाश (स्पेस) निकला, लेकिन, आरंभ में उसका रूप जिस तरह की गंभीरता लिए हुए शुरू हुआ था, दूसरे दिन वह ‘भर्त्सना‘ और ‘भड़ास‘ की शक्ल अख्तियार कर चुका था। उसमें मनोरंजन और मसखरी भी शामिल हो चुकी थी। अतः पूरी बात विचार के दायरे से ही लगभग बाहर हो गयी। यहाँ यह बात गौर करने लायक है कि कदाचित् सम्पूर्ण हिन्दी समाचार-पत्रों ने, इस कार्यवाही को अपनी सत्ता के प्रति एक ‘बदअखलाक चुनौती‘ की तरह लिया है। हो सकता है समाचार-पत्रों ने, चूंकि वे समय और समाज में विचार के लिए वाजिब जगह बनाने की जिम्मेदारी अपने ही हिस्से में समझते हैं, अतः वे इस कार्यवाही के खिलाफ निस्संदेह ठोस बौद्धिक-असहमति रखते हैं। लेकिन प्रश्न उठता है कि जो समाचार पत्र, वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन, ’समय और समाज’ की खाल खींच कर उसमें नैतिकता का नमक डालने पर तत्पर रहता है, क्या वह तिरेसठ वर्ष के अपने जीवनकाल में मात्र एक दिन किसी एक शहर में अपने पाठक की असहमति और उसका प्रतीकात्मक प्रदर्शन तक बरदाश्त नहीं कर सकता? जबकि, वह इस महाकाय जनतंत्र की रक्षा का एक सर्वाधिक शक्तिशाली कवच है? क्या समूचा समाचार-जगत ’विचार’ के स्तर पर, व्यक्ति की सी स्वभावगत ’एकरूपता’ रखता है ? जबकि, वह व्यक्ति नहीं संस्था है। मुझे यहाँ याद आता है कि नेहरू के विषय में कहा जाता रहा है कि उनका अहम् काफी अदम्य था और वे अमूमन अपनी असहमति की अवमानना पर तिक्त हो जाते थे। एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है। ’टाइम्स आॅफ इण्डिया’ के तब के ख्यात सम्पादक मुलगांवकर प्रधानमंत्री आवास पर स्वल्पाहार हेतु आमंत्रित थे और जिस सुबह वे आमंत्रित थे, ठीक उसी दिन उन्होंने नेहरू तथा ’नेहरू-सरकार’ के विरूद्ध अपने अखबार में बहुत तीखी सम्पादकीय टिप्पणी छाप दी। लगभग आठ बजे प्रधानमंत्री-आवास से दूरभाष पर सूचना दी गयी कि किन्हीं अपरिहार्य कारणों से पूर्व में स्वल्पाहार के समय प्रधानमंत्री के साथ निर्धारित भेंट निरस्त की जा रही है। यह सूचना पाते ही श्री मुलगांवकर ने नेहरू को फोन किया कि ठीक है कि आज का सम्पादकीय आपके तथा आपकी सरकार के खिलाफ है, लेकिन इसका हमारे नाश्ते से क्या लेना-देना है ?
बहरहाल, नेहरू ऐसे थे कि सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर रहते हुए भी ठिठक कर बुद्धिजीवियों द्वारा की गई अपनी आलोचना सुन सकते थे। कदाचित् उनके इसी जनतांत्रिक धैर्य को ध्यान में रखकर दुनिया भर की प्रेस उन्हें ’डेमोक्रेटिक प्राॅफेट’ के विशेषण से सम्बोधित भी करती थी।
बहरहाल, इन्दौर नगर में भारतीय समाचार पत्रों को उनकी भाषागत नीति को केन्द्र में रखकर उसके प्रतिरोध में होली जलाने वाली कार्यवाही को लेकर इतना आहत और क्रोधित नहीं होना चाहिए कि उनके द्वारा अकारण किये जा रहे क्रिओलीकरण के खिलाफ शुद्ध गाँधीवादी प्रतिकार की खबर को वे अपने पृष्ठों पर तिल भर भी जगह न दें। यह काम निश्चय ही सम्पादक का नहीं हो सकता। तो क्या हमारे समाचार-पत्रों में एक किस्म की ‘काॅरपोरेट सेंसरशिप‘ अघोषित रूप से आरंभ है ? जबकि, ठीक उसी दिन ‘दैनिक भास्कर‘ ने क्रिओलीकरण के विरूद्ध लिखी गयी मेरी तीखी टिप्पणी ससम्मान और प्रमुखता से छापी और ‘नईदुनिया‘ ने इसके दो दिन पूर्व ही ‘भाषा के खिलाफ हो रही साजिश को समझो‘ शीर्षक से हिन्दी के ‘क्रिओलीकरण‘ के खतरे की तरफ पाठकों नहीं, सम्पूर्ण हिन्दी भाषा-भाषियों को सचेत करने वाली उस टिप्पणी को एक ऐसी सम्पादकीय टीप के साथ प्रकाशित किया, जो ‘जन-आह्वान‘ के स्वर में थी। यह तथ्य दोनों ही अखबारों के ‘खुलेपन‘ और ‘जनतांत्रिक उदारता‘ के स्पष्ट प्रमाण हैं। तो अब प्रश्न यह उठता है कि क्या उनकी यह ‘उदारता‘ इतनी ज्वलनशील है कि प्रदर्शन की आँच की खबर से भस्म हो सकती है ? हाँ, राजनीतिक सत्ताएँ ‘विचार‘ को खतरा मानती हैं और उससे डरती भी हैं, लेकिन अखबर की ताकत तो ‘विचार‘ ही है। ‘विचार‘ तो उसके लगभग प्राण हैं ? फिर चाहे वे ‘सहमति‘ के रूप में हों, या ‘असहमति‘ के रूप में। मैं मानता हूँ कि आज हमारा समाज जितना ‘सूचना-सम्पन्न‘ हुआ है, उसके पीछे प्रमुख रूप से ‘लिखे-छपे शब्द‘ की बहुत बड़ी भूमिका है, ‘बोले गये‘ शब्द वाले माध्यम की तो प्राथमिकताएँ और प्रतिबद्धताएँ केवल मनोरंजन ही है। अतः मुझे उस माध्यम से कुछ नहीं कहना। वह अभी तक परिपक्व ही नहीं हो पाया है। अधिकांश का ‘समाचार-विवेक‘ तो साध्यकालीनों की सनसनी के समांतर ही है। वे ‘सचाई‘ के साथ फ्लर्ट (!) करते हैं। उनका ‘रिमोट‘ सच के किसी दूसरे ‘सनसनाते संस्करण‘ को बदलने का उपकरण है। लेकिन सुबह के दैनिक अखबार यह मानते हैं कि वह मालिकों का कम पाठकों का ज्यादा है। इसीलिए, यदि पाठकों का एक छोटा-समूह ‘संवादपरक प्रतिरोध‘ की संभावना के पूरी तरह निशेष हो जाने के बाद, यदि निहायत ही गाँधीवादी तरीके से अपना विरोध होली जलाकर प्रकट कर रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि समाचार-पत्रों में हो रही आयी उसकी आस्था का पूर्णतः से लोप हो गया है। गाँधीजी ने, जब विदेशी वस्त्रों की होली जलायी थी तो वे ‘वस्त्रोत्पादन‘ के विरूद्ध कतई नहीं थे। ना ही वस्त्र धारण करने के काम से उनकी आस्था उठ गयी थी। वे तो प्रतीकात्मक रूप से एक अचूक सूचना दे रहे थे कि हमें ‘औपनिवेशिक विचार‘ का विरोध करना है, जो वस्तुओं में शामिल है।
अंत में इन दिनों जिस ‘शक्ति-त्रयी‘ की बात की जा रही है, उसमें ‘सूचना‘ भी राज्य सत्ता के समानान्तर मानी जा रही है। ‘सूचना‘ का निर्माण और वितरण करने वाली दुनिया की चार पाँच संस्थाओं को ‘सत्ता‘ का सर्वोपरि रूप माना जा रहा है, क्योंकि वे ही ‘विश्वमत‘ गढ़ती या बनाती हैं। उनमें किसी भी मुल्क या उसकी सरकार को ध्वस्त करने की भी अथाह कुव्वत है, लेकिन वे अपने मुल्क के ‘प्रतिरोध की आवाजों‘ की अनसुनी नहीं करती वर्ना, नोम चाॅमस्की जैसे लोगों के विचारों की आहटें शेष संसार को सुनाई ही नहीं देती।
मुझे ब्रिटिश प्रधानमंत्री चेम्बर लेन के आक्सफर्ड विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में दिये गये उनके भाषण की याद आती है। उन्होंने कहा था, ‘आक्सफर्ड‘ ने हमें जब जब जैसा-जैसा करने को कहा हमने हमेशा ही ठीक वैसा-वैसा किया; लेकिन जब आक्सफर्ड को हमने अपने जैसा करने को कहा, उसने वैसा कभी नहीं किया और एक ब्रिटिशर की तरह मुझे इन दोनों बातों पर अपार गर्व है।
कुल मिलाकर चेम्बरलेन ने यही कहना चाहा हम ब्रिटिशर्स विचार के स्तर पर इतने उदार हैं हम अपनी प्रखरतम आलोचना का सम्मान करते हैं, लेकिन, हमें अपने मुल्क की बुद्धिजीवी बिरादरी पर भी गर्व है, जो असहमतियों को व्यक्त करने में भीरू नहीं है। किसी भी देश और समाज में भीरूता का वर्चस्व बौद्धिकों में व्याप्त होने लगे, तब शायद यह मान लेना चाहिए कि वह फिर से पराधीन होने के लिए तैयार हैं।
अंत में कुल जमा मकसद यही है कि लोहिया की विचारधारा में गहन आस्था रखने वाले श्री अनिल त्रिवेदी, तपन भट्टाचार्य और जीवनसिंह ठाकुर ने भारतीय भाषाओं के आमतौर पर तथा हिन्दी के क्रिओलीकरण (हिंग्लिशीकरण) को लेकर खासतौर पर एक शांत और नितान्त निर्विघ्न प्रदर्शन किया तो वस्तुतः वे निश्चय ही इसके दूरगामी खतरों की तरफ पूरे देश और समाज को चेतस करना चाहते हैं। वे ठीक ही कह रहे हैं ‘भाषा का प्रश्न‘ महज भाषा भर का नहीं होता, वह समूचे समाज को सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था का भी अनिवार्य अंग होता है। क्या हमें यह नहीं दिखाई दे रहा कि अमेरिका और ब्रिटेन ‘ज्ञान समाज‘ के नाम पर, मात्र अपने सांस्कृतिक उद्योग की जड़ें गहरी करने में लगे हैं। ‘कल्चरल इकोनॉमी‘ उनकी अर्थव्यवस्था का तीसरा घटक है, जो अँग्रेजी सीखने-सिखाने के नाम पर अरबों डाॅलर की पूंजी कमाना चाहते हैं। हिन्दी, यदि संसार की दूसरी सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा की चुनौतीपूर्ण सीमा लांघने को है, तब उसे एक धीमी मौत मारने के लिए उसका क्रिओलीकरण क्यों किया जा रहा है ? अभी षड्यंत्र की यह पहली अवस्था है, ‘स्मूथ डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि‘। अर्थात हिन्दी के शब्दों का चुपचाप अँग्रेजी के शब्दों द्वारा विस्थापन इसे सर्वग्रासी हो जाने दिया गया तो अंत में आखिरी प्रहार की अवस्था आ जाएगी और वह होगा, देवनागरी लिपि को बदलकर उसके स्थान पर रोमनलिपि को चला देना। यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि 5 जुलाई 1928 को ‘यंग इंडिया‘ में जब गाँधीजी ने लिखा कि ’अँग्रेजी साम्राज्यवादी भाषा है और इसे हम हटा कर रहेंगे’, तब गोरी हुकूमत अँग्रेजी के प्रसार प्रचार पर छः हजार पाऊण्ड खर्च करती थी (तब भी यह राशि बहुत ज्यादा थी)। गाँधीजी की इस घोषणा को सुनते ही उन्होंने लगे हाथ अँग्रेजी के प्रचार-प्रसार का बजट बढ़ा दिया। 1938 में बजट की राशि थी तीन लाख छियासी हजार पाऊण्ड। यदि अखबारों की होली जलाकर प्रकट किये गये इस विरोध के बाद हिन्दी के समाचार पत्रों मे भाषा के ‘क्रिओलीकरण‘ की गति तेज हो जाये तो यह स्पष्ट सूचना जायेगी कि भाषा संबंधी नीतियों के पीछे अँग्रेजी की ‘नवसाम्राज्यवादी‘ शक्तियाँ दृढ़ता के साथ काम कर रही हैं।
4, संवाद नगर
इन्दौर
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"जिसमें जितना लोकपक्ष अधिक होगा, वह उतने अर्थों में जनकवि होने की ओर होता है"
“जनकविता व जनकवि के निर्माण में लोक सहभागी होता है”
:
केदारनाथ अग्रवाल पर एकाग्र
२ अक्तूबर के अन्तिम कार्यक्रम के रूप में नागार्जुन की कविताओं के रोमांचक नाट्यमंचन को खचाखच भरे सभागार ने खूब सराहा. देर रात तक चले २ अक्तूबर के समस्त कार्यक्रमों में दर्शकों, श्रोताओं व अध्येताओं का उत्साह देखते ही बनता था. वैचारिक सत्रों में श्रोताओं की भारी उपस्थिति ने विश्वविद्यालय की गरिमा बढ़ाई. मध्य रात्रि तक खुले प्रांगण में लेखकों की आत्मीय बैठक ने इस द्विदिवसीय संगोष्ठी को पारिवारिकता का-सा संस्पर्श प्रदान किया.
- डॉ. कविता वाचक्नवी
२-३ अक्तूबर २०१० को महात्मा गान्धी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि. वर्धा में आयोजित संगोष्ठी “बीसवीं सदी का अर्थ और जन्मशती का सन्दर्भ” के पहले दिन तीसरे सत्र के रूप में कवि केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित परिचर्चा का आयोजन किया गया. सत्र की अध्यक्षता प्रो. नित्यानन्द तिवारी ने एवम् संचालन अरुणेश शुक्ला द्वारा किया गया.
प्रथम वक्ता के रूप में प्रो. खगेन्द्र ठाकुर ने केदार की कविताओं की आलोचना के सन्दर्भ की चर्चा में कलावादी आलोचना की मीमांसा करते हुए कालिदास, भारवि, माघ व दण्डी के साहित्य के टीकाकारों का उल्लेख किया. पिछड़े, वंचित व उपेक्षित वर्ग के प्रति केदार की कविता की पक्षधरता, सामाजिकता व उनकी राजनीतिपरक कविताओं के अनेकानेक उदाहरणों से उन्होंने अपनी बात पुष्ट की.
प्रो. अजय तिवारी ने प्रगतिशील आलोचना पर पक्षपात के आरोपों का खण्डन करते हुए अज्ञेय व केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित मौलिक पुस्तकों का प्रश्न उठाया. साथ ही रामविलास शर्मा द्वारा दी गई प्रगतिशीलता की ‘जनता की तरफ़दारी’ की परिभाषा को रेखांकित किया. स्त्री की अस्मिता का प्रश्न, परम्परा, परंपरा के पलायनवादी पक्ष आदि को अज्ञेय, नागार्जुन, केदार आदि के सन्दर्भ में उन्होंने व्याख्यायित किया और कहा कि इतिहास में जिसकी जो भूमिका व स्थान है, उसे वही दिया जाना चाहिए. उस से कम देना भी अन्याय होगा व उस से अधिक देना भी अन्याय. साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन में इस यथार्थ का बोध बहुत आवश्यक है. प्रगतिशील आलोचना पर लगाए जाते आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि जिनमें यथोचित बल नहीं वे पंजा लड़ाने क्यों चले. अजय तिवारी ने जोड़ा कि नागार्जुन, केदार व शमशेर प्रतिबद्धता व संघर्ष के कवि हैं. जिस कवि में परम्परा अमरता का रूप पाती है, वही कवि अमर होता है. केदार इस अर्थ में अद्वितीय हैं.
“तद्भव” के सम्पादक अखिलेश का वक्तव्य केदार की कविताओं के स्त्री पक्ष, स्वकीय प्रेम, स्त्रीचेतना को आज इक्कीसवीं सदी के स्त्री विमर्श के समक्ष तुलनात्मक दृष्टि से मूल्यांकित करने से प्रारम्भ हुआ. विवाह और परिवार, संयुक्त परिवार का परिवेश, सौभाग्य के चिह्न आदि सन्दर्भों व उनके द्वन्द्व पर केन्द्रित उनके आलेख में केदार जी की कई बहुत सुन्दर कविताओं को आज के परिप्रेक्ष्य में पुनर्मूल्यांकित किया गया. केवल देह के शोषण के विरुद्ध या उसी की मुक्ति के अर्थ-मात्र में नहीं अपितु समग्र स्त्रीचेतना और स्त्री मुक्ति के रचनाकार के रूप में केदार के काव्य के उक्त पक्ष को उन्होंने सुचिन्तित ढंग से उद्घाटित किया.
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. नित्यानन्द तिवारी ने अज्ञेय से सम्बन्धित कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण संस्मरण सुनाते हुए कई ऐतिहासिक तथ्यों का उद्घाटन किया. केदार व नागार्जुन के जनकवि होने व जनकवि होने की पक्षधरता के लिए उठाए खतरों का उल्लेख भी उन्होंने किया. उन्होंने कहा कि कविता यदि कवि की कार्यशाला में जाकर रची जाती है व एक रचनात्मक उत्पाद बनती है तो आप जनकवि नहीं हो सकते. भावबोध की अपेक्षा मनुष्यबोध व जनबोध इसकी प्राथमिक शर्तें हैं. जिसमें जितना लोकपक्ष अधिक होगा, वह उतने अर्थों में जनकवि होने की ओर होता है, इन अर्थों में अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल व नागार्जुन की कविताओं को देखा जाए तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है.
धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र को संक्षेप में समेट देना पड़ा. रात्रि में नागार्जुन की कविताओं की नाट्यप्रस्तुति के अत्यन्त्त रोचक व भावन कार्यक्रम के उत्साह व तैयारी को ध्यान में रखते हुए सत्र में होते विलम्ब को टालने की दॄष्टि से केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित सत्र के कुछ अन्य वक्ताओं को आगामी दिन के सत्रों में सम्मिलित करने का निर्णय लेना पड़ा.
२ अक्तूबर के अन्तिम कार्यक्रम के रूप में नागार्जुन की कविताओं के रोमांचक नाट्यमंचन को खचाखच भरे सभागार ने खूब सराहा. देर रात तक चले २ अक्तूबर के समस्त कार्यक्रमों में दर्शकों, श्रोताओं व अध्येताओं का उत्साह देखते ही बनता था. वैचारिक सत्रों में श्रोताओं की भारी उपस्थिति ने विश्वविद्यालय की गरिमा बढ़ाई. मध्य रात्रि तक खुले प्रांगण में लेखकों की आत्मीय बैठक ने इस द्विदिवसीय संगोष्ठी को पारिवारिकता का-सा संस्पर्श प्रदान किया.
"हमारे साहित्य समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है"
"हमारे साहित्य समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है"
अज्ञेय पर एकाग्र
अज्ञेय पर एकाग्र
- डॉ. कविता वाचक्नवी
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि. में २ व ३ अक्टूबर २०१० को आयोजित संगोष्ठी (बीसवीं सदी का अर्थ और जन्मशती का सन्दर्भ ) के उद्घाटन सत्र के पश्चात आयोजित प्रथम सत्र दोपहर ३ बजे से "अज्ञेय पर एकाग्र" के रूप में संपन्न हुआ. कार्यक्रम की अध्यक्षता गंगा प्रसाद विमल ने व संचालन डॉ शम्भु गुप्त ने किया.
पटना से आए प्रो. बलराम तिवारी ने अज्ञेय पर केन्द्रित अपने संबोधन में जिन तथ्यों को रेखांकित किया, वे हैं -
- " अज्ञेय जिस रोमांटिक प्रवृत्ति के लिए बदनाम हैं, वह वस्तुतः उन में है ही नहीं उलटे वे तो एंटी रोमांटिक प्रवृत्ति से ग्रस्त हैं.
अपनी बात की पुष्टि के लिए उन्होंने कुछ उद्धरण भी दिए
- "यथास्थिति के प्रति विद्रोह ही अज्ञेय को अमर बनाता है"
- "हमारे समाज में भाई बहन सम्बन्ध को लेकर जो टैबूज़ हैं शेखर भी उन टैबूज़ को तोड़ नहीं पाते..यह नैतिकतामूलक ग्रंथि का ही अवबोध है"
- "अगर शिल्प व शास्त्र पर मार्क्सवादी विचारक ध्यान देते हैं तो यह अज्ञेय की देन है"
आगामी वक्ता के रूप में युवा कथाकार शशिभूषण ने अपने वक्तव्य में कहा कि -
- लेखक अपने कृतित्व द्वारा समाज को कितना आगे ले जाने का साहस रखता है यह उस लेखक की प्रतिबद्धता से ही प्रकट होता है.
......प्रश्न यह उठता है कि अज्ञेय अपनी प्रतिबद्धता पर अंतिम समय तक स्थिर क्यों नहीं रह पाए.
ओम् थानवी को उद्धृत करते हुए शशि ने अज्ञेय पर हर समय लगाए जाते आरोपों का उल्लेख किया व एक पुत्र के पिता होने के आरोप को भी उद्दृत करते हुए समाज व आलोचना की विसंगतियों पर प्रहार किए. वक्तव्य के अंत में शशि ने खरे शब्दों में कहा कि सीमाएँ अज्ञेय में हैं, परन्तु उस मार्क्सवादी आलोचना में भी तो हैं, जो अज्ञेय को देखती हैं.
आगामी वक्तव्य मनोज कुमार पाण्डेय ने दिया
जमशेदपुर से पधारीं विजय शर्मा ने प्रारम्भ में ही यह स्पष्ट किया कि मैं अज्ञेय को सबसे महान रचनाकार के रूप में स्थापित करने के लिए नहीं खडी हूँ.
- "अज्ञेय कान्तिकारी थे, जो बहुत प्रभावित करने वाला तथ्य था किन्तु स्वयं अज्ञेय ने इस पर बहुत चुप्पी बनाए रखी है. एक समकालीन लेखक के सद्य : प्रकाशित लेख में उनकी क्रांतिकारिता के अनेक विस्तार जानकर अज्ञेय पर बहुत गुस्सा आया कि वे स्वय चुप क्यों रहे".
गाँधीवादी चिन्तक राजकिशोर ने अज्ञेय की पत्रकारिता वाले पक्ष पर अब तक हिन्दी में किसी महत्वपूर्ण कार्य के न होने पर अत्यंत खेद प्रकट किया. उन्होंने व्यंग्यपूर्ण ढंग से चुटकी लेते हुए कहा कि हमारे साहित्य समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है. दूसरी ओर इस पर क्षोभ जताया कि हमारे पत्रकारिता क्षेत्र में काम करने वालों से स्वयं जाकर पूछ लीजिए उनमें से बहुमत अज्ञेय को जानता तक न होगा. स्थिति इतनी शोचनीय है कि कोई अज्ञेय के पत्रकारितावंश को आगे बढ़ाने वाला तक नहीं है.
-"अज्ञेय जी की विचारधारा में अन्तर्विरोध सदा बने रहे किन्तु ये अन्तर्विरोध विचारधारा के अभाव में नहीं थे".
अज्ञेय की पत्रकारिता की भाषा पर केन्द्रित अपने सम्बोधन में कृपाशंकर चौबे ने राजकिशोर के वक्तव्य के कई तथ्यों का विरोध करते हुए पत्रकारिता के कुछ स्तम्भों के उल्लेख के साथ अज्ञेय की परम्परा के जीवित रहने के प्रमाण दिए. भाषा व लिपि सम्बन्धी कई नियमों को उन्होंने क्रमवार दोहराया.
अन्तिम वक्ता के रूप में प्रो. सुरेन्द्र वर्मा की उपस्थिति ने सभा को गरिमा प्रदान की.
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में गंगाप्रसाद विमल ने कहा कि -
"अज्ञेय के समक्ष हिन्दी आलोचना बौनी रही,आलोचना के पास वे औजार नहीं थे जो अज्ञेय की रचनाधर्मिता को माप सकती".
- "अज्ञेय अपने समय के सबसे विरल व प्रतिभाशाली रचनाकार थे. हिन्दी आलोचना उनके बिना आगे बढ़ ही नहीं सकती" .
- "अज्ञेय ने पश्चिम के समक्ष भारतीय मनीषा व भाषा को अत्यन्त सम्मानजनक स्थान दिलाया".
धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र समाप्त हुआ.
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फादर कामिल बुल्के : प्रतिमा का अनावरण
फादर कामिल बुल्के : प्रतिमा का अनावरण
विश्व प्रसिद्ध हिंदीसेवी व रामकथा के विशेषज्ञ और शब्दकोषनिर्माता फादर कामिल बुल्के के जन्मशताब्दी वर्ष में उनकी प्रतिमा का आज यहाँ अनावरण किया गया तथा उनके नाम पर एक अंतरराष्ट्रीय छात्रावास का उद्घाटन भी किया गया. महात्मा गाँधी अन्तराष्ट्रीय हिन्दी वि. वि. के कुलाधिपति एवं प्रख्यात आलोचक डॉ नामवर सिंह ने वि.वि. परिसर में निर्मित फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास का उद्घाटन किया और उनकी आवक्ष प्रतिमा का भी अनावरण किया.
१ सितम्बर १९०९ में बेल्जियम के रामस्कापले गाँव में जन्मे कामिल बुल्के ने इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद कोलकाता से संस्कृत में एम ए किया तथा इलाहाबाद से हिन्दी में एम ए किया और रामकथा उत्पत्ति एवं विकास पर इलाहाबाद वि वि से पीएच डी की उपाधि प्राप्त की और राँची में रहकर अपना सम्पूर्ण जीवन हिन्दी की सेवा में लगा दिया. १९७४ में पद्मभूषण से अलंकृत श्री बुल्के भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में रामकथा के विषय-विशेषज्ञ के रूप में जाने गए और कामिल बुल्के हिन्दी- अंग्रेजी शब्दकोष निर्माता के रूप में वे अमर हो गए.
प्रो. नामवर सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि यीशु के महान उपासक होने के बावजूद कामिल बुल्के ने रामकथा की सारी परम्पराओं के ज़रिए भारत की आत्मा को पहचाना था, उनके लिए राम का अर्थ किसी मंदिर-मस्जिद का विध्वंस या निर्माण नहीं, अपितु ज्ञान की सृजनात्मकता को रेखांकित करना था. पूरे भारत में पहली बार कामिल बुल्के की स्मृति में किसी भवन का उद्घाटन किया गया.
कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय वि. वि. में विदेशों से आने वाले छात्रों के लिए छात्रावास का नामकरण कामिलबुल्के के नाम पर होना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है.
वि. वि. में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा का अनावरण पिछले दिनों सिक्किम के राज्यपाल महामहिम बीपी सिंह के द्वारा किया गया था. इसी क्रम में समाजसेविका सावित्रीबाई फुले व प्रसिद्ध कवि गोरख पांडे की प्रतिमा का भी अनावरण होना है. इसके अतिरिक्त मुशी प्रेमचंद, भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाम पर सड़कों का नामकरण भी किया गया और वि.वि. की पाँच पहाड़ियों में से दो का नामकरण गाँधी हिल तथा कबीर हिल के नाम से रखा गया.
फादर कामिल बुल्के के स्मृति समारोह में वि. वि. के कुलपति विभूति नारायण राय, प्रतिकुलपति प्रो. ए अरविन्दाक्षन, कुलसचिव कैलाश खामारे, प्रो निर्मला जैन, प्रो. नित्यानंद तिवारी, प्रो. खगेन्द्र ठाकुर, प्रो. विजेंद्र नारायण सिंह, प्रो. सुरेन्द्र वर्मा, कवि आलोक धन्वा, अरुण कमल, प्रो.गंगाप्रसाद विमल, उषाकिरण खान, राजकिशोर, प्रो. सूरज पालीवाल,प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव, डॉ. शम्भू गुप्त व डॉ.अनिल पांडे सहित अन्य अनेकानेक गण्यमान्य लेखक विचारक व साहित्यकार उपस्थित थे.
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कवि-गोष्ठी के बहाने...
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शब्द-शब्द सहेजी गयीं संवेदनाएँ, बयाँ हुआ सच
हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर म.गा.अं.हिं.वि.वि. के इलाहाबाद स्थित क्षेत्रीय विस्तार केंद्र में इलाहाबाद शहर के ख्यातिनाम शब्दशिल्पी जब एकत्र हुए तो इस अवसर पर सच बयाँ हुआ और शब्द-शब्द सहेजी गयीं संवेदनाएँ । इस अनूठे कविता पाठ के आयोजन में रचनाकारों ने अपनी कविताओं के जरिए समय और समाज के सच सहित जिंदगी की कड़ुआहटों और खिलखिलाहटों के अर्थ बयाँ किए।
सोमवार १३ सितंबर की शाम आयोजित इस कविता पाठ कार्यक्रम की अध्यक्षता उर्दू के जाने माने रचनाकार एवं प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के साथी प्रो. अकील रिज़वी ने कहा कि विभिन्न भाव बोध की पढ़ी गयी कविताएं निश्चित रूप से हिंदी कविता के एक समृद्ध संसार को रूपायित करती हैं। इस अवसर पर नया ज्ञानोदय के संपादक एवं वरिष्ठ कथाकार व भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया मुख्य अतिथि थे। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि आज इस कार्यक्रम में पढ़ी गयी सभी रचनाएं हिंदी कविता के भविष्य के प्रति आश्वस्त करती हैं।
आयोजन में विशिष्ट अतिथि के तौर पर म.गा.हि.वि.वि. की अंग्रेजी पत्रिका Hindi Discourse की संपादिका एवं वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया ने काव्य पाठ को पूर्णतः सार्थक बताते हुए कहा कि एक अरसे बाद इतनी समृद्ध काव्य गोष्ठी में सिरकत करने का अवसर मुझे मिला।
लखनऊ से पधारे तद्भव के संपादक अखिलेश ने इलाहाबाद की समृद्ध साहित्यिक परम्परा के लिए इस गोष्ठी के महत्व को रेखांकित किया।
काव्यपाठ के लिए शहर के युवा एवं वरिष्ठ रचनाकारों ने भागीदारी की जिनमें हरिश्चन्द्र पांडे, बद्रीनारायण (प्रलेस), एहतराम इस्लाम (अध्यक्ष-प्रलेस, इलाहाबाद), यश मालवीय़ (नवगीतकार), अंशु मालवीय, सुरेश कुमार शेष (प्रलेस), नंदल हितैषी (इप्टा), जयकृष्ण तुषार, श्रीरंग पांडेय, संतोष चतुर्वेदी (जनवादी लेखक संघ), अजामिल (इलेक्ट्रॊनिक मीडियाकर्मी) अंशुल त्रिपाठी, संध्या निवेदिता आदि प्रमुख हैं।
गोष्ठी मे शेखर जोशी (जलेस) अनिता गोपेश (कथाकार एवं प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य-प्रलेस) ए.ए. फ़ातमी (प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य-प्रलेस), असरार गांधी (प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य-प्रलेस), सुरेन्द्र राही- सचिव प्रलेस, इलाहाबाद, अनिल रंजन भौमिक (नाट्य कर्मी- समानांतर-इलाहाबाद), अनुपम आनंद- नाट्य कर्मी, सुभाष गांगुली-कथाकार, डॉ कविता वाचक्नवी- कवयित्री व प्रतिष्ठित ब्लॉगर, प्रेमशंकर- जन संस्कृति मंच, रामायन राम (प्रदेश सचिव – आइसा), प्रकाश त्रिपाठी (सह संपादक-बहु वचन), रेनू सिंह, अल्का प्रकाश, हितेश कुमार सिंह, गोपालरंजन (वरिष्ठ पत्रकार), फखरुल करीम (उर्दू रचनाकार), शलभ भारती, श्लेष गौतम आदि के अतिरिक्त बड़ी संख्या में इलाहाबाद के साहित्यप्रेमी, संस्कृतिकर्मी एवं छात्र उपस्थित थे।
- (सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
क्या आप कैंसर से युद्ध में आलोक तोमर को सही राय दे सकते हैं?
क्या आप कैंसर से युद्ध में आलोक तोमर को सही राय दे सकते हैं?
- (डॉ.)कविता वाचक्नवी
दोनों लिंक्स द्वारा दो कड़ियों के उनके साक्षात्कार को पढ़ कर कुछ परिचय पा सकते है. राष्ट्र व राष्ट्रीय प्रश्नों के प्रति पागलपन की सीमा तक खोजी, लड़ाकू व दीवाने ये लेखनी के धनी जुझारू पत्रकार आलोक तोमर इन दिनों सी एन ई बी चैनल में कॉपी एडिटर के रूप में कार्य देखते हैं और डेटलाइन इंडिया का संचालन संयोजन करते हैं. हिन्दी भारत पर भी यदा कदा यहाँ उनका कुछ लेखकीय सहयोग ( जैसे - कारगिल जो सिर्फ मुहावरा नहीं है ) मिला.
हिन्दी पत्रकारिता व लेखन से जुड़े अधिकाँश लोगों को यह दुखद वृत्त ज्ञात ही है कि गत दिनों उन्हें जाँच द्वारा प्रारंभिक अवस्था में कैंसर होने की पुष्टि की गई ( कैंसर को हराने में जुटे हैं आलोक तोमर).
अब स्थिति यह है केवल जाँच में ही अब तक दो लाख रुपये से अधिक झोंका जा चुका है और कैंसर के मूल का पता तक नहीं चल रहा है. हिन्दी के पत्रकार के लिए ( और वह भी जो हर समय व्यवस्था और शातिरों से पग पग पर पंगे लेता आया हो) धनाभाव बहुत सामान्य बात है. उनका स्वाभिमानी व्यक्तित्व किसी आर्थिक सहयोग की अपेक्षा नहीं करता; केवल एक सहयोग किया जा सकता है कि कोई परिचित विशेषज्ञ चिकित्सक उनकी मेडिकल रिपोर्ट्स देख कर अपनी निर्णायक टिप्पणी द्वारा उनके अपव्यय को रोकने में सहयोगी हो सकें.
किसी प्रकार का आर्थिक सहयोग नहीं अपितु विशुद्ध कायाविमर्श अपेक्षित है. यदि आप पाठकों में से कोई स्वयं अथवा आपका कोई परिचित मित्र ऐसा हो जो इस विषय का विशेषज्ञ हो व आलोक जी के इस आड़े समय में अपनी विशेषज्ञता का लाभ उन्हें दे कर अपने बड़प्पन से कृतार्थ कर सकता हो तो कृपया हमें सूचित करें. उन्हें आलोक जी की रिपोर्ट्स भेज दी जाएँगी ताकि सही मार्गदर्शन व निर्णायक मत का पता चल सके.
मैं निजी तौर से अपने मित्रों परिचितों से इस मार्गदर्शन में सहयोग की आकांक्षी व प्रार्थी हूँ. यदि आप किसी ऐसे कैंसर विशेषज्ञ को जानते हों जो वास्तव में सही व निश्शुल्क मार्गदर्शन तथा निर्णय दे सकता है तो कृपया उनका अता पता दें.
किसी प्रकार का आर्थिक सहयोग नहीं अपितु विशुद्ध कायाविमर्श अपेक्षित है. यदि आप पाठकों में से कोई स्वयं अथवा आपका कोई परिचित मित्र ऐसा हो जो इस विषय का विशेषज्ञ हो व आलोक जी के इस आड़े समय में अपनी विशेषज्ञता का लाभ उन्हें दे कर अपने बड़प्पन से कृतार्थ कर सकता हो तो कृपया हमें सूचित करें. उन्हें आलोक जी की रिपोर्ट्स भेज दी जाएँगी ताकि सही मार्गदर्शन व निर्णायक मत का पता चल सके.
मैं निजी तौर से अपने मित्रों परिचितों से इस मार्गदर्शन में सहयोग की आकांक्षी व प्रार्थी हूँ. यदि आप किसी ऐसे कैंसर विशेषज्ञ को जानते हों जो वास्तव में सही व निश्शुल्क मार्गदर्शन तथा निर्णय दे सकता है तो कृपया उनका अता पता दें.
कृपया इस सन्देश को अधिकतम लोगों तक पहुँचा कर इस कठिन घड़ी में उन्हें ऊहापोह व अतिव्यय से उबरने में सहयोग दें.
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जातिवाद फैलाना शुद्ध देशद्रोह
जातीय जनगणना के विरूद्घ विशाल मार्च
नई दिल्ली, 27 जुलाई 2010 |
जनगणना में जाति को सम्मिलित करने के विरोध में "सबल भारत" द्वारा संचालित "मेरी जाति हिंदुस्तानी आंदोलन" ने आज एक विशाल मार्च का आयोजन किया| सैकड़ों, छात्र , लेखकों, पत्र्कारों, बुद्घिजीवियों, उद्योगपतियों एवं किसानों ने 13, बाराखंबा रोड से जंतर-मंतर तक मार्च किया| इस मार्च का नेतृत्व आंदोलन के सूत्रधार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने किया|
मार्च में भाग लेनेवाले अनेक राष्ट्रीय ख्याति के लोग नारे लगाते जा रहे थे कि "सौ बातों की बात यहीं, जनगणना में जात नहीं", "जनगणना में जात नहीं, भारत को तू बाँट नहीं", "भारतमाता की यह बानी, मेरी जाति हिंदुस्तानी" आदि|
मार्च का समापन जंतर-मंतर पर हुआ| जंतर-मंतर पर एक विराट सभा हुई| सभा में विशेष रूप से भाजपा के वरिष्ठ नेता, जाने-माने अधिवक्ता तथा राज्यसभा सांसद श्री राम जेठमलानी, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष तथा पूर्व राज्यपाल श्री बलराम जाखड़, प्रसिद्घ पत्रकार टाइम्स आफ इंडिया के पूर्व मुख्य संपादक डॉ. दिलीप पडगाँवकर, पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री आरिफ मो. खान, भारत के पूर्व जाइंट चीफ आफ इंटेलिजेंस श्री आर के खंडेलवाल, राजस्थान भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तथा पूर्व राज्यसभा सांसद श्री महेशचंद्र शर्मा, पूर्व राजदूत श्री जगदीश शर्मा, प्रसिद्घ नृत्यागंना सुश्री उमा शर्मा, प्रसिद्घ समाजसेवी श्रीमती अलका मधोक एवं फिल्म निर्माता डॉ. लवलीन थडानी, जैन मुनि डॉ. लोकेशचंद्र, ईसाई नेता श्री फ्रांसिस आदि वक्ताओं ने सभा को संबोधित किया| सभा की अध्यक्षता आंदोलन के सूत्रधार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने की|
सभा को संबोधित करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता तथा भाजपा के सांसद श्री राम जेठमलानी ने कहा कि मैं इस आंदोलन का पुरजोर समर्थन करता हूँ तथा इस आंदोलन के लिए मैं अपने रक्त की अंतिम बूँद तक बहाने को तैयार हूँ| हमारे देश को गुलाम बनाए रखने के लिए जाति का आधार ही अंग्रेजों का मुख्य हथियार था| उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि राबर्ट क्लाइव ने ईस्ट इंडिया कंपनी को लिखे अपने पत्र में कहा था कि हम भारत में खुश हैं, हमारी ताकत तथा व्यापार दिन प्रतिदिन मजबूती से बढ़ रहा है, क्योंकि भारत के लोग जाति के नाम पर बँटे हुए हैं|
श्री बलराम जाखड़ ने कहा कि जनतंत्र में हम सभी को अपनी बात कहने का हक है| भारत की अखंडता एवं एकता की रक्षा हमारा धर्म है| हमें ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे देश बंटे| जनगणना में जाति को शामिल करना देशद्रोह के समान है| यह सबसे बड़ा कुकर्म है| इससे बड़ा बुरा काम कोई और नहीं हो सकता|
जुलूस में भाग ले रहे वरिष्ठ पत्रकार डॉ. दिलीप पडगाँवकर ने कहा कि जातिगत बातें मात्र वोट बैंक की राजनीति के लिए है| हमारे लिए देश का संविधान सबसे प्रमुख है और गणतंत्र को बचाने के लिए जातीय जनगणना का विरोध करना आवश्यक है| संविधान में स्पष्ट कहा गया है कि जाति, धर्म के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं होना चाहिए| आंबेडकर का अंतिम भाषण सभी को पढ़ाया जाना चाहिए, जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा था कि कोई भी जातीय-भेदभाव नहीं होना चाहिए|
देश के पूर्व राजदूत जगदीश शर्मा ने कहा कि जातीय आधार पर देश को बाँटने की कोशिश भारत को सारी दुनिया में बदनाम कर देगी| भारत की सेना इसीलिए महान मानी जाती है कि उसका आधार जाति नहीं, राष्ट्र है|
भारत के पूर्व जाइंट चीफ आफ इंटेलिजेंस आर. के. खंडेलवाल ने कहा कि देश को जोड़ने के लिए गांधीजी ने हिन्दु-मुस्लिम एकता का काम किया था| आज हम जातिगत बँटवारा कर के देश को कहाँ ले जा रहे है ?
पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री आरिफ मो. खान ने कहा कि जातीय गणना बिल्कुल अवैज्ञानिक है| इसके आधार पर गरीबों का नहीं, कुछ जातियों की मलाईदार परतों का ही भला हो सकता है|
रैली को संबोधित करते हुए जैन मुनि लोकेशजी ने कहा कि जाति से बड़ा हमारा राष्ट्र है| यदि राष्ट्र एक और अखंड रहा तो हम रहेंगे, वर्ना हम ही कहाँ रह पाएँगे| दलित ईसाई नेता फ्रांसिस ने कहा कि जाति एक घातक बीमारी है| हम सब एक हैं| जातिगत आधार पर कोई भेदभव नहीं होना चाहिए|
इस अवसर पर प्रसिद्घ कलाकार उमा शर्मा, समाजिक कार्यकर्ता श्रीमती अलका मधोक और श्रीमती लवलीन थडानी ने भी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया| कार्यक्रम का संचालन आंदोलन के सूत्रधार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने किया| श्री अशोक कावडि़या ने मुख्य अतिथियों और जुलूस में भाग लेनेवाले साथियों को धन्यवाद दिया|
INTELLECTUALS MARCH AGAINST CASTE CENSUS
JAKAHR, JETHMALANI & PADGAONKAR ADDRESS THE RALLY
New Delhi, 28 July 2010. Hundreds of intellectuals, writers, arists, students and leaders representing various walks of the civil society took out an impressive march from Barakhamba Road to Jantar Mantar led by Dr.V.P Vaidik the founder and National Convener of Meri Jati Hindustani Movement. They opposed the inclusion of Caste in the Census (2011).
The March and Meeting at Jantar Mantar were joined by former Cabinet Ministers Balram Jakhar, Ram Jethmalani, Arif M. Khan, eminent journalist Dr. Dilip Padgaonkar, Ambassador J.C Sharma, former Chief of Joint Intelligence R.K Khandelwal, famous dancer Uma Sharma, leader of poor Christians R.L Francis, Dr. Lavlin Thadani, Alka Madhok and many other intellectuals, diplomats, industrialists and academics. Former Speaker Mr. Somnath Chatterjee and Former Cabinet Minister Mr. K.C. Pant sent their good wishes for the rally.
The Marchers were raising very interesting slogans. ‘Meri Jati’ – Hindustani. ‘Sau Baton ki ek baat yahee, Janganana me Jaat nahi’. ‘Janganana mei jaat nahi, Bhart ko tu baant nahi’. ‘Bharat Mata ki yah Baani, Hum Sab Hai Hindustani’.
While addressing the gathering after the March, Mr. Ram Jethmalani said that he is ready to shed the last drop of his blood to fight for this noble cause. He quoted from a letter of Lord Clive, who had said that as long as the caste – system is alive in India, there is no threat to the British Empire. The caste in the census will create a new monster which will demolish the modern India. Every right thinking Indian must oppose this regressive idea.
Mr. Balram Jakhar said that the inclusion of caste in census is the dirtiest trick to destroy the Indian unity. What we have achieved in the last 63 years shall disappear in a single stroke. The revival of caste is akin to treason. Every Indian must oppose this anti-national idea.
Mr. Dilip Padgaonkar minced no words to condemn the vote bank politics which is least concerned with the welfare of the poor. The caste enumeration will sap the foundation of our Republic, he opined. It goes against the spirit of the Constitution and the ideals of Baba Ambedkar.
Ambassador J.C Sharma said that to divide India on the basis of caste would be a big embarrassment for an emerging world power like India. Former Cabinet Minister Arif M Khan said the caste enumeration is a case of bad mathematics. It is very unscientific. It will not benefit the poor people. It will serve the narrow purpose of the creamy layers of the backward people.
The meeting was addressed by many others including R. K. Khandelwal, R.L Francis, Lokesh Muni, Dr. Lavlin Thadani, Alka Madhok and Uma Sharma. Dr. Vaidik presided over the meeting.
Mr. Ashok Kavaria, the organizer, thanked everybody at the end.
मीडिया प्रभारी
अशोक कावड़िया
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