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'भारत की बर्बादी' की आज़ादी का शोक

                                      

- कविता वाचक्नवी 





गत चार-छह दिन में कई मित्रों व परिचितों ने फ़ोन, मैसेज, व्हाट्सएप, मैसेंजरचैट व बातचीत आदि में देश की स्थितियों पर अपनी #व्यथा से अवगत करवाया है. स्वयं मैं भी इनसे बहुत #दु:खी और व्यथित हूँ. मित्रो ! यह भले ही भीषण उथल-पुथल का समय है किन्तु इस उथल-पुथल के कारण ही अब देश में जबरदस्त ध्रुवीकरण होगा. जिन राष्ट्रविरोधी दलों  ('शक्तियों' कहना उचित नहीं क्योंकि उनकी हरकतें कायराना हैं) ने देश में हाहाकार मचाने के षड्यंत्र रचे हैं, यह उनका विनाशकाल है और उन्होंने इस बार जो दाँव खेला है, वह उन पर ही भारी पड़ने वाला है. 


#लेनिनग्राद में ही दफ्न हो चुके वामपंथ सहित कई दीमकों की भारत में सफाई का समय है, इसीलिए राष्ट्र के शत्रुओं के साथ मिल उन्होंने सत्ताच्युत और अपने काले कारनामों के खुलने से भयभीत राजनैतिक दल के साथ मिल #देश के विनाश का यह #खेल खेला है. यह सारा षड्यंत्र असल में बजट काल के लिए सुरक्षित था किंतु #MakeInIndia को विफल करने और #हेडली द्वारा #इशरत वाला षड्यंत्र खुल जाने के कारण इस सारे षड्यंत्र को उन्हें तुरन्त अंजाम देना पड़ा. परिणाम आपके सामने हैं कि #प्रधानमन्त्री (PMO India) को बदनाम करने और काम न करने देने के लिए ये लोग आतंकवादियों का साथ देने व देश का संहार करने तक को उतारु हैं. इनकी तथाकथित विचारलॉबी बिके हुए बुद्धिजीवियों का षड्यन्त्रकारी गैंग ही है. वह #पुरस्कार लौटाऊ गैंग और असहिष्णुता के नाम पर देश को बदनाम करने वाले सब-के-सब अब सिरे से गायब हैं, मौन हैं. उनकी बला से देश भले तबाह हो जाए. असल में ये सब लोग भी देश को लूटने आने वाले हमलावरों का ही नया रूप हैं, जिनका उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण देश को अधिकाधिक लूटना ही है और जो भी इनकी लूट में बाधा बनेगा उसे ये कुछ भी कर समाप्त कर देंगे, इन्हें देशहित या देश की जनता से कुछ लेना-देना नहीं, इन्हें तो बस अपनी लूट को अनवरत रखने से मतलब है. 


पर अब देश की जनता इनके गन्दे खेल देख इनके चेहरे पहचानने लगी है और इनके विरुद्ध एकीकृत होने लगी है. #भारत का साधारण-जन देश की बर्बादी कदापि नहीं माफ़ कर सकता, करोड़ों घरों के बेटे, पति और भाई सेना में हैं भले ही वह #हिन्दू हो या #मुसलमान, बराबर जान जोखिम में डाल देश की सुरक्षा करते आए हैं; इसलिए देश के शत्रुओं के हाथ का खिलौना बन "भारत की बर्बादी" के इन सबके दूषित संकल्प और कारनामों को कभी माफ़ नहीं कर सकते. देश के करोड़ों परिवार सेना के साथ गद्दारी नहीं कर सकते, सुरक्षा के साथ गद्दारी नहीं कर सकते। वे देश के साथ हैं, देशहित के साथ हैं. 


देश अब इनके असली चेहरे देख पा रहा है, इसलिए ध्रुवीकृत भी होगा ही. शायद यही देशहित में भी है. इसलिए मित्रो, इस तमाम वितण्डावाद से घबराइये और दु:खी मत होइए. यह घबराने का समय नहीं अपितु सामना कर देश को जगाने और इनके पोल खोलने का समय है. #KavitaVachaknavee

लन्दन में 'जो चढ़ गए पुण्यवेदी पर' ....



लन्दन में 'जो चढ़ गए पुण्यवेदी पर' .... 
- कविता वाचक्नवी

प्रथम चित्र को बहुत ध्यान से देखिए। 
यह अमर शहीद ऊधम सिंह (26 दिसंबर 1899 - 31 जुलाई 1940) का चित्र है, जिनका आज बलिदान-दिवस है। 

यह चित्र लन्दन में लिया गया था। जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड का बदला लेने के लिए 13 मार्च 1940 को उन्होंने 10 कैक्स्टन हाल में सभा के मध्य मंच पर स्थित पंजाब के तत्कालीन (जलियाँवाला बाग काण्ड के समय) गवर्नर Michael O'Dwyer को सिर में दो गोलियाँ मार कर उसकी हत्या कर दी थी व पुलिस उन्हें गिरफ़्तार कर ले गई थी। अपनी गिरफ्तारी (और सुनिश्चित मृत्युदण्ड) के अवसर पर भी उनके चेहरे पर हँसी इस चित्र में साफ देखी जा सकती है;  जबकि तीन अंग्रेज़ अधिकारियों के मुख पर बहुत तनाव दीख रहा है। 


यहाँ पाठकों की जानकारी के लिए जोड़ना चाहूँगी कि गोलियाँ चलाने का आदेश देने वाला जनरल डायर (General Reginald Dyer)  था और जब यह हत्याकाण्ड हुआ था उस समय पंजाब के गवर्नर Michael O'Dwyer, ये दोनों अलग-अलग व्यक्ति थे। हिन्दी में दोनों के नाम का उच्चारण 'डायर' कर देते हैं, तो अब तक यह भ्रांति चली आई है कि उधम सिंह जी ने जनरल डायर को मारा था। जबकि उधम सिंह जी ने जलियाँवाला काण्ड के समय पंजाब के गवर्नर के रूप में आदेश देने वाले Michael O'Dwyer की हत्या की थी।

लन्दन के न्यायालय में अपने वक्तव्य में न्यायाधीश द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि "मैंने उन्हें इसलिए मारा क्योंकि वे इसी योग्य थे और उनके साथ यही होना चाहिए था"। अतः 31 जुलाई 1940 को आज ही के दिन उन्हें लन्दन की Pentonville Prison में फाँसी दे दी गई। उसी जेल परिसर में उनका शव गाड़ दिया गया क्योंकि तब यहाँ भारतीय विधि से अन्तिम संस्कार की अनुमति नहीं थी। लम्बे अरसे बाद वर्ष 1974 में उनकी अस्थियाँ भारत लाई गईं ।

मेरे साथ यह सौभाग्य जुड़ा है कि वर्ष 1974 में जब उनकी अस्थियाँ भारत पहुँचीं थी, तब हमारे पिताजी मुझे व मेरे भाई को उनके दर्शन करवाने स्वयं ले गए थे। दूसरा सौभाग्य यह लन्दन में भारतीय क्रांतिकारियों व नायकों से जुड़े स्थलों के हमने स्वयं जाकर दर्शन किए हैं। अपनी उस चित्रावली से '10 कैक्स्टन हाल' (जहाँ उन्होने गोली चलाई थी) तथा 'Pentonville जेल' (जहाँ उन्हें फाँसी दी गई और जहाँ 1940 से 1974 तक उनका शव रखा था) पर जा निजी कैमरा से स्वयं लिए गए वे चित्र भी यहाँ दे रही हूँ -






10 कैक्स्टन हॉल, लन्दन ©KV

10 कैक्स्टन हॉल, लन्दन ©KV


10 कैक्स्टन हॉल, लन्दन ©KV


10 कैक्स्टन हॉल, लन्दन ©KV


10 कैक्स्टन हॉल, लन्दन ©KV


Pentonville जेल, लन्दन ©KV


Pentonville जेल, लन्दन ©KV

Pentonville जेल, लन्दन ©KV























देश, जनादेश और केजरीवाल - कविता वाचक्नवी

देश,जनादेश और केजरीवाल
- कविता वाचक्नवी 


जो व्यक्ति काश्मीर पाकिस्तान को देना चाहता है, जो देश के संविधान को पैर की जूती समझता है (कि विधानसभा भंग करने का आवेदन सौंपने के बाद अब पलटी मार रहा है), जो पदलोभ में अंधा है कि त्यागपत्र देने के बाद पुनः गद्दी की लालच में कल कॉंग्रेस से समर्थन माँगने गया था और संविधान व जनता के निर्णय को कुचल कर मुख्यमंत्री दुबारा होने की जुगत करता रहा, जो जनता द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के बाद छल से पुनः जनता पर शासन करना चाहता है, जिसके देशद्रोहिता के प्रमाण वीडियो में इसके साथियों ने स्वयं दिए हैं, उस व्यक्ति के प्रति अपनी आस्था रखने वाले अपने मित्रों से मैं खेद पूर्वक कहना चाहूँगी कि मुझे उनकी समझ व निष्पक्षता और विवेक पर संदेह होने लगे हैं।


इस व्यक्ति ने देश और संविधान के साथ तो भीषण गद्दारियाँ की ही हैं, जनता के साथ भी भयंकर छल किया है। मुझे सुदर्शन जी की 'हार की जीत' कहानी बार बार याद आती है। जनता के मन से भ्रष्टाचार हटाओ का विश्वास ही इस धूर्त ने समाप्त कर दिया।कानून को, जनता को और देश को और ईमान को अपनी जेब में रखी इकन्नी समझ रखा है इस व्यक्ति ने। प्रधानमंत्री तक को कानून के डायरे में लाने की बात करने वाले ने कानून का मज़ाक उड़ा रखा है। आज यदि वह जेल गया है तो यह कोई महानता या बलिदान नहीं अपितु देश की संवैधानिक प्रक्रिया है। संविधान के साथ खेलने का अधिकार किसी को नहीं। .... और कौन नहीं जानता कि जमानत को स्वयं ठुकरा कर इसने कोर्ट को जेल भेजे जाने को बाध्य किया है। जिसका परिवार दुबई में छुट्टियाँ मनाने जाता है, जो चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद वाराणसी से फ्लाईट लेकर दिल्ली आता है, जो प्रायोजित धन से भाड़े के कार्यकर्ता 25000 प्रतिमाह का भुगतान कर खरीदता है, उसके पास मामूली जमानतराशि भी नहीं है भला? यह नीतीश कुमार की तरह जनता की सहानुभूति लेने की नौटंकी है जो यह समझता है कि जनता इसे उसका बलिदान व त्याग समझेगी और उसके पक्ष में हो जाएगी। यदि यह इतना ही ईमानदार व जनता के प्रति प्रतिबद्ध होता तो स्वयं कहता कि जनता ने इस बार दिल्ली से एक भी आप प्रतिनिधि को न जिता कर जो जनादेश दिया है मैं उसका सम्मान करता हूँ। और स्वयं को इस कुर्सी की दौड़ से अलग ही रखूँगा। पर वह यह कभी नहीं कर सकता। यह एक तरह से जनादेश द्वारा बाहर का रास्ता दिखा दिए जाने के बावजूद जनता पर छल कपट और तिकड़म से शासन करने की मंशा के चलते अब खेला जा रहा नाटक है इसका कि संविधान का दुरुपयोग कर पुनः मुख्यमंत्री बन जाए।   


मुझे आश्चर्य होता है उन बुद्धिजीवी मित्रों पर जो कॉंग्रेस से मोह भंग हो जाने पर अब भाजपा विरोधी होने की कारण मोदी जी का समर्थन न कर पाने की अपनी विवशता में इतना बंधे हैं कि उन्हें कजरी बाबू के काले कारनामों नजर ही नहीं आते। कजरी के अपने सभी साथी, यहाँ तक कि किरण बेदी और अन्ना जी जैसों ने उसे निष्कासित कर उसका साथ छोड़ दिया, उन पर तो भरोसा रखिए। या कजरीभक्ति में सच भी देखना नहीं चाहते ! वस्तुतः यह आप लोगों की आस्था के संकट की घड़ी है, कॉंग्रेस के बाद अब कजरी के अतिरिक्त कोई आधार ही नहीं बचा इसलिए कजरी को महान सिद्ध करना आपकी मजबूरी है। यही समझ आता है।


60 बरस से अधिक समय से साहित्य, पत्रकारिता, अध्यापन, राजनीति शिक्षा और अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों पर कब्जा कर जनता और देश विदेश को छला गया, सच्चाई के गले घोंटे गए, जिसे चाहा हत्यारा, बर्बर और जाने शब्दकोश की किन किन गालियों से नवाजा गया, केवल और केवल कॉंग्रेस और देशद्रोहिता की राजनीति हुई है, हो रही है, भीषण और गंदी से गंदी राजनीति। हम चुप रहे। अब देश के ऐसे संक्रमण काल में भी यदि चुप रहेंगे और जनाधार का निर्माण करने में सहयोगी न बनेंगे तो अपने देशधर्म का निर्वाह न करने का अपराध करूँगी। इसलिए जनता को जिस भाषा और जिस लहजे में समझ आता है उसी भाषा और लहजे में अपना देशधर्म निभाना अनिवार्य है। निभाना चाहिए। निभा रही हूँ।


जिनकी विचारधारा चीन से और अरब देशों के पैसों द्वारा पोषित विचारधारा के हाथों गिरवी है, उन्हें मेरे देशधर्म के निर्वाह पर आपत्ति होना स्वाभाविक है क्योंकि उनकी आस्थाओं की जड़ें कहीं अन्यत्र हैं। मैंने कभी उनके यहाँ जाकर उनकी विचारधारा का गला घोटने का काम नहीं किया, ऐसी ही अपेक्षा मैं भी उनसे करती हूँ।

 जिनकी आँखें न खुली हों, उनकी सहायतार्थ यह वीडियो - 




और यह भी - 


यह लोकतंत्र की अपूर्व विजय है

यह लोकतंत्र की अपूर्व विजय है
डॉ. वेदप्रताप वैदिक


यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की अपूर्व विजय है। टीवी चैनलों के कुछ एंकरों ने पूछा कि 2014 की विजय, 1971 और 1984 की विजय से भी बड़ी कैसे है? 1971 में इंदिरा गांधी को 352 सीटें मिली थीं और 1984 में राजीव गांधी को 410 सीटें मिली थीं। भाजपा और मोदी को तो अभी 350 सीटें भी नहीं मिलीं हैं और आप इस जीत को अपूर्व कह रहे हैं? इसका कारण क्या है?

ज़रा याद करें कि 1971 में क्या हुआ था? इंदिराजी पाँच साल तक भारत की प्रधानमंत्री रह चुकी थीं। नेहरु की बेटी थीं। कांग्रेस अध्यक्ष होने का भी उनका अनुभव था। इसके अलावा उन्होंने कांग्रेस के सारे खुर्राट नेताओं को पटकनी मारकर इंदिरा कांग्रेस खड़ी कर दी थी। बैंकों के राष्ट्रीयकरण और उसके बाद गरीबी हटाओ के नारे ने देश का ध्यान खींचा था। 1971 के चुनाव में क्या हुआ? वे कम सत्ता से ज्यादा सत्ता में आ गईं लेकिन मोदी मात्र मुख्यमंत्री थे। वे किसी प्रधानमंत्री के बेटे भी नहीं थे। वे पार्टी अध्यक्ष भी नहीं रहे। उनका अखिल भारतीय अनुभव भी अत्यंत सीमित था। वे एक ऐसी पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे, जो दस साल से सत्ता से बाहर थी और जिसका नेतृत्व भी एकजुट नहीं था। लेकिन 2014 के चुनाव में क्या हुआ? पहली बार एक प्रांतीय नेता ने देश का दौरा किया। कोई प्रांत नहीं छोड़ा। करोड़ों लोगों को साक्षात् संबोधित किया। लाखों कि.मी. यात्राएं कीं। दस साल प्रधानमंत्री रहने पर भी जितना देश को मनमोहनसिंह ने देखा, उससे भी ज्यादा देश को साल भर में जाना और पहचाना मोदी ने। मोदी की वजह से मतदान का जो प्रतिशत बढ़ा, वह अपूर्व था। मोदी की सभाओं में जैसा उत्साह का ज्वार उमड़ता था, वैसे मैंने 1952 से अब तक के किसी चुनाव में नहीं देखा। इसीलिए पिछले दो माह से मैं कहता रहा कि भाजपा-गठबंधन को 300 से ज्यादा सीटें मिलेंगी। सारे लोकमत और लगभग सभी मतदानों के अंदाजी घोड़े गलत साबित हुए। विपक्ष पहले भी हारा है लेकिन कांग्रेस जैसी महान पार्टी का आकार हाथी से सिकुड़कर बकरी का रह जाए, क्या यह अपूर्व नहीं है?

जहाँ तक 1984 की विजय का प्रश्न है, वह राजीव की नहीं, शहीद इंदिरा गांधी की विजय थी। शहीद इंदिराजी को विरोधी दलों के समर्थकों ने भी वोट दिए थे। वह चुनाव नहीं था। वह एक महान शहीद को राष्ट्र की श्रद्धांजलि थी। 2014 के वोट ने फिरोज गांधी-परिवार को राजनीतिक श्रद्धांजलि दे दी है। इंदिराजी चुनाव के पहले शहीद हुई थीं और फिरोज गांधी-परिवार चुनाव के बाद शहीद हो गया है। 2014 के चुनाव में लोगों को 1984 की तरह गुस्सा नहीं था। निराशा थी। देश को लगा कि वह ठगा गया है। उसने अपना देश अ-नेताओं को थमा दिया है। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे सज्जन में प्रधानमंत्री की कोई भी कुव्वत नहीं है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का श्रेय सबसे ज्यादा मैं किसी को देता हूँ तो वह सोनियाजी और मनमोहनसिंहजी को देता हूँ। राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो ज्ञानी जैलसिंह की कृपा से बने लेकिन नरेंद्र मोदी बन रहे हैं तो वे अपने पुरुषार्थ से बन रहे हैं। कांग्रेस को अपने किए और अनकिए का फल भुगतना ही था। उसे तो हारना ही था। नरेंद्र मोदी की खूबी यह है कि उन्होंने इस हार को अपूर्व और एतिहासिक बना दिया। कहा भी है कि ‘आशिक का जनाजा है, जरा धूम से निकले’।

इस चुनाव की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें 1971 की तरह कोई नाटकीयता नहीं थी और इसमें 1984 की तरह खौलता हुआ गुस्सा नहीं था। एक ठंडी समझ थी। इस गंभीर समझ के कारण भारत के लोगों ने भारतीय राजनीति के जातिवादी और सांप्रदायिक चरित्र को बदल दिया। प्रांतों के जातिवादी दिग्गजों ने जैसी पटकनी इस चुनाव में खाई, क्या इससे पहले किसी चुनाव में खाई? लालू, नीतिश, मुलायम, मायावती, देवेगौड़ा आदि कहाँ हैं? क्या हुआ, उनके जातीय वोट-बैंकों का? भारत के नागरिकों को मवेशियों की तरह थोकबंद वोट डालने से इस बार मुक्ति मिली हैं जहाँ तक वोटों के सांप्रदायिक बँटवारे का सवाल है, वह अपरिहार्य था। उसे टाला नहीं जा सकता था। लेकिन उसे ठीक से समझा जाना चाहिए। अल्पसंख्यकों ने मोदी को जिस वजह से वोट नहीं दिए, वह समझ में आती है लेकिन देश के अन्य सभी लोगों ने मोदी को जो वोट दिए, उसकी वजह अल्पसंख्यक नहीं थे। याने वास्तव में वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को वोट नहीं है। वह विकास का वोट था। आशा का वोट था। वह ठगी के विरुद्ध वोट था। उसके पीछे किसी प्रकार की सांप्रदायिक संकीर्णता या घृणा नहीं थी। सच पूछा जाए तो 2014 के चुनाव में सांप्रदायिकता कोई मुद्दा ही नहीं था। जाहिर है कि प्रधानमंत्री मोदी ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की राह पर निष्ठापूर्वक चलेंगे तो जो वोट उन्हें 2014 में नहीं मिले हैं, वे भी 2019 में उन्हें मिलेंगे।

इस चुनाव में भारतीय राजनीति की शक्ल को एक और ढंग से बदला है। इसने भाजपा को अखिल भारतीय दल और कॉंग्रेस को प्रांतीय दल बना दिया है। एकाध राज्य को छोड़कर सभी राज्यों में भाजपा का खाता खुल गया है जबकि कई राज्यों में कांग्रेस का सूंपड़ा ही साफ है। जहाँ वह बची है, वहाँ भी एकदम लहूलुहान होकर! महान से लहूलुहान, ऐसी दुर्गति पहली बार हुई है।

पहली बार ऐसा व्यक्ति भारत का प्रधानमंत्री बना है, जिसकी माँ घरेलू सेविका का काम करके अपने बच्चों का पोषण और शिक्षण करती रही है। वह स्वयं स्टेशन पर चाय बेचकर अपना गुजारा करता था। यह देश के 100 करोड़ गरीब और मजलूमों से तदाकार होना नहीं है तो क्या है? ला.ब. शास्त्रीजी के अलावा नरेंद्र मोदी ऐसे एकमात्र प्रधानमंत्री बने हैं, जिनकी अपनी माँ के चरणस्पर्श करके आशीर्वाद प्राप्त किया है। ऐसे प्रधानमंत्री को तो वर्ग-चेतना के हामी कम्युनिस्टों को भी क्या सलाम नहीं करना चाहिए?



सरबजीतों को यों मरने न दें


- डॉ. वेद प्रताप वैदिक 


'दो से ज्यादा रहे होंगे सरबजीत सिंह के हत्यारे'सरबजीत सिंह अगर भारतीय जासूस होता या आतंकवादी होता तो क्या हमारी सरकार को पता नहीं होता? सरकार को सरबजीत के बारे में सब कुछ पता था| पता ही नहीं था, उसे गहरा विश्वास था कि वह जासूस नहीं था और लाहौर में हुए बम विस्फोट से उसका कुछ लेना-देना नहीं था| यह तथ्य सरबजीत की हत्या के बाद आए प्रधानमंत्री और विदेश सचिव के बयानों से भी सिद्घ होता है तो फिर क्या वजह है कि सरबजीत की रिहाई और रक्षा के प्रति हमारी सरकार ने इतना ढुल-मुल रवैया अपना रखा था? पहचान की गड़बड़ी के कारण असली अपराधी मंजीतसिंह छूट गया और उसकी जगह सरबजीत फंस गया| उसने 22 साल कोट लखपत की जेल में काट दिए और अब उसकी हत्या भी हो गई| इस नृशंस कांड के लिए आखिर किसे जिम्मेदार ठहराया जाए?

हत्या और मृत्युदंड : शहीद सरबजीत और आतंकी कसाब

- कविता वाचक्नवी


सरबजीत की पाकिस्तान की जेल में कर दी गई हत्या के बाद  देश और देश की सरकार के कारिन्दे पहले से तैयार कर रखे गए बयान पढ़ने में मशगूल हैं। जो लोग कसाब को संवैधानिक ढंग से दिए गए दण्ड पर विलाप कर रहे थे, भारत को कोस रहे थे, वे कविता-कहानी और अपनी पुस्तकों और प्रकाशन के आयोजन की चर्चाओं में मस्त व्यस्त हैं। 



माखनलाल चतुर्वेदी और अज्ञेय


माखनलाल चतुर्वेदी और अज्ञेय 
- कविता वाचक्नवी

बच्चे-बच्चे द्वारा पहचानी जाने वाली कविता 'पुष्प की अभिलाषा' के प्रणेता राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी (4 अप्रैल 1889-30 जनवरी 1968) का आज जन्मदिवस है और आज ही भारतीय परम्परा, संस्कृति व आधुनिकता के सम्मिश्रण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" (7 मार्च, 1911- 4 अप्रैल, 1987) जैसे रचनाकार का प्रयाण दिवस भी। 

दोनों की कविता के साथ उनका पुण्य-स्मरण -

पुष्प की अभिलाषा
- माखनलाल चतुर्वेदी 
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चाह नहीं मैं सुर बाला के गहनों में गूँथा जाऊँ 
चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ

चाह नहीं सम्राटों के शव पर, हे हरि डाला जाऊँ
चाह नहीं देवों के शिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ 

मुझे तोड़ लेना वन माली ! उस पथ पर देना तुम फेंक 
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक 







वर्षा ने आज विदाई ली
('बीजुरी काजल आँज रही')

- माखनलाल चतुर्वेदी 


वर्षा ने आज विदाई ली जाड़े ने कुछ अंगड़ाई ली
प्रकृति ने पावस बूँदो से रक्षण की नव भरपाई ली।

सूरज की किरणों के पथ से काले काले आवरण हटे
डूबे टीले महकन उठ्ठी दिन की रातों के चरण हटे।

पहले उदार थी गगन वृष्टि अब तो उदार हो उठे खेत
यह ऊग ऊग आई बहार वह लहराने लग गई रेत।

ऊपर से नीचे गिरने के दिन रात गए छवियाँ छायीं
नीचे से ऊपर उठने की हरियाली पुन: लौट आई।

अब पुन: बाँसुरी बजा उठे ब्रज के यमुना वाले कछार
धुल गए किनारे नदियों के धुल गए गगन में घन अपार।

अब सहज हो गए गति के वृत जाना नदियों के आर पार
अब खेतों के घर अन्नों की बंदनवारें हैं द्वार द्वार।

नालों नदियों सागरो सरों ने नभ से नीलांबर पाए
खेतों की मिटी कालिमा उठ वे हरे हरे सब हो आए।

मलयानिल खेल रही छवि से पंखिनियों ने कल गान किए
कलियाँ उठ आईं वृन्तों पर फूलों को नव मेहमान किए।

घिरने गिरने के तरल रहस्यों का सहसा अवसान हुआ
दाएँ बाएँ से उठी पवन उठते पौधों का मान हुआ।

आने लग गई धरा पर भी मौसमी हवा छवि प्यारी की
यादों में लौट रही निधियाँ मनमोहन कुंज विहारी की।




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भारत में कभी मेरे बगीचे में कनकचंपा का एक पेड़ हुआ करता था । कमरे में उसके फूल रख दिए जाते तो सूखने के कई दिन बाद तक घर में सुगंध आती रहती थी और अज्ञेय की एक कविता की पंक्तियाँ बार बार अनायास गूँजती थीं .... "...दूर से ही स्वप्न में भी गंध देती है.... "
लगभग तीन बरस पूर्व ऐसे ही अमूर्त बिंबों वाले कवि अज्ञेय के साथ बनी 'सन्नाटे का छंद' नामक डॉक्यूमेंटरी यहाँ प्रस्तुत की थी, वह सच में देखने लायक है, आज उसे अवश्य देखें - 


                            "सन्नाटे का छंद" : दुर्लभ डॉक्यूमेंट्री (अज्ञेय) : पहली बार नेट पर
                          (http://photochain.blogspot.in/2010/03/blog-post_16.html)



नई कविता : एक संभाव्य भूमिका 

  - अज्ञेय

आप ने दस वर्ष हमें और दिये
बड़ी आप ने अनुकम्पा की। हम नत-शिर हैं।
हम में तो आस्था है : कृतज्ञ होते
हमें डर नहीं लगता कि उखड़ न जावें कहीं।
दस वर्ष और! पूरी एक पीढ़ी!
कौन सत्य अविकल रूप में जी सका है अधिक?

अवश्य आप हँस लें :
हँस कर देखें फिर साक्ष्य इतिहास का जिस की दुहाई आप देते हैं।
बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण को कितने हुए थे दिन
थेर महासभा जब जुटी यह खोजने कि सत्य तथागत का
कौन-कौन मत-सम्प्रदायों में बिला गया!

और ईसा-(जिन का कि एक पट्ट शिष्य ने
मरने से कुछ क्षण पूर्व ही था कर दिया प्रत्याख्यान)
जिस मनुपुत्र के लिए थे शूल पर चढ़े-
उसे जब होश हुआ सत्य उन का खोजने का
तब कोई चारा ही बचा न था
इस के सिवा कि वह खड्गहस्त दसियों शताब्दियों तक
अपने पड़ोसियों के गले काटता चले!
('प्यार करो अपने पड़ोसियों को आत्मवत्'-कहा था मसीहा ने!)

'सत्य क्या है?' बेसिनी में पानी मँगा लीजिए :
सूली का सुना के हुक्म हाथ धोये जाएँगे!
बुद्ध : ईसा : दूर हैं।

जिस का थपेड़ा स्वयं हम को न लगे वह कैसा इतिहास है?
ठीक है। आप का जो 'गाँधीयन' सत्य है
उस को क्या यही सात-आठ वर्ष पहले
गाँधी पहचानते थे?

तुलना नहीं है यह। हम को चर्राया नहीं शौक मसीहाई का।
सत्य का सुरभि-पूत स्पर्श हमें मिल जाय क्षण-भर :
एक क्षण उस के आलोक से सम्पृक्त हो विभोर हम हो सकें-
और हम जीना नहीं चाहते :
हमारे पाये सत्य के मसीहा तो
हमारे मरते ही, बन्धु, आप बन जाएँगे!
दस वर्ष! दस वर्ष और! वह बहुत है।

हमें किसी कल्पित अमरता का मोह नहीं।
आज के विविक्त अद्वितीय इस क्षण को
पूरा हम जी लें, पी लें, आत्मसात् कर लें-
उस की विविक्त अद्वितीयता आप को, कमपि को, कखग को
अपनी-सी पहचनवा सकें, रसमय कर के दिखा सकें-
शाश्वत हमारे लिए वही है। अजर अमर है
वेदितव्य अक्षर है।

एक क्षण : क्षण में प्रवहमान व्याप्त सम्पूर्णता।
इस से कदापि बड़ा नहीं था महाम्बुधि जो पिया था अगस्त्य ने।
एक क्षण। होने का, अस्तित्व का अजस्र अद्वितीय क्षण!
होने के सत्य का, सत्य के साक्षात् का, साक्षात् के क्षण का-
क्षण के अखंड पारावार का
आज हम आचमन करते हैं। और मसीहाई?
संकल्प हम उस का करते हैं आप को :
'जम्बूद्वीपे भरतखंडे अमुक शर्मणा मया।'

इलाहाबाद, 6 फरवरी, 1955

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जनसत्ता के सम्पादक श्री ओम थानवी के अज्ञेय सम्बन्धी संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें - "छायारूप"


अज्ञेय की अमर रचना 'असाध्य वीणा' का पाठ उनके अपने ही स्वर में सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें - 

अज्ञेय जी के स्वर में उनकी अमर रचना "असाध्य वीणा" का पाठ 
http://photochain.blogspot.co.uk/2010/03/blog-post.html


भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा “सम्मान-समारोह" संपन्न


भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा “सम्मान-समारोह" संपन्न
डॉ.कविता वाचक्नवी को ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान’ प्रदत्त

लन्दन स्थित भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान प्राप्त करते हुए डॉ. कविता वाचक्नवी.

ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के प्रतिष्ठित अतिथिगण. 


डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रदत्त स्मृतिचिह्न और प्रशस्तिपत्र

 डॉ. कविता वाचक्नवी को  स्मृतिचिह्न भेंट करते हुए भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती. 

 “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” प्राप्त करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा

डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रदत्त प्रशस्ति-पत्र 

भारतीय उच्चायोग, लंदन द्वारा
“ सम्मान-समारोह"
सम्पन्न

24 मार्च 2013

भारतीय जीवन मूल्यों के वैश्विक प्रचार-प्रसार की संस्था “विश्वम्भरा” की संस्थापक-महासचिव डॉ.कविता वाचक्नवी को विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में भारतीय उच्चायोग, लंदन द्वारा इण्डिया हाउस में आयोजित समारोह में “आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान” किया गया। इस अवसर पर भारत के उच्चायुक्त महामहिम डा. जे॰ भगवती ने उन्हें नकद राशि, स्मृति चिह्न, शॉल और प्रशस्ति पत्र प्रदान किए। उन्हें यह सम्मान मुख्यतः इन्टरनेट व प्रिंट मीडिया द्वारा भाषा, साहित्य, संस्कृति व पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है.


उल्लेखनीय है कि अमृतसर में जन्मीं कविता वाचक्नवी समाज-भाषा-विज्ञान तथा काव्यसमीक्षा जैसे विषयों में 'दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद' से एमफिल और पीएचडी अर्जित करने के बाद सपरिवार लन्दन में रह रही हैं. भारतीय उच्चायोग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि "आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान" ग्रहण करते हुए डॉ कविता वाचक्नवी ने अपने दादाश्री व पिताश्री का विशेष उल्लेख किया व लाहौर से हिमाचल और पंजाब तक उनके किए कार्यों व बलिदानों को उपस्थितों के साथ बाँटते हुए बताया कि कैसे हिन्दी सत्याग्रह में जेल में रहने से लेकर हिमाचल को हिन्दीभाषी राज्य का दर्जा दिलाने तक के लिए उनके परिवार ने कष्ट सहे। वाचक्नवी ने अपना सम्मान उन्हीं को समर्पित करते हुए कहा कि वे यह सम्मान उनके प्रतिनिधि के रूप में ग्रहण कर रही हैं। उन्होंने राजदूत व उच्चायोग से अनुरोध किया कि ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग की वेबसाईट को द्विभाषी बनाया जाना चाहिए व उसे अंग्रेजी के साथ साथ हिन्दी में भी उपलब्ध होना चाहिए।


विज्ञप्ति के अनुसार इस समारोह में दो अन्य विशिष्ट हिंदी सेवियों तथा एक हिंदी संस्था को भी सम्मान प्रदान किए गए. “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” से यॉर्क विश्वविद्यालय के विख्यात भाषाविद प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा को तथा “डा॰ हरिवंश राय बच्चन हिन्दी साहित्य सम्मान” से बर्मिंघम के हिंदी लेखक डॉ॰ कृष्ण कुमार को सम्मानित किया गया जबकि नाटिङ्घम की संस्था “काव्य रंग” को “फ़्रेडरिक पिनकोट हिन्दी प्रचार सम्मान” प्रदान किया गया.


इस अवसर पर सम्मानितों को बधाई देते हुए सभा को संबोधित अपना वक्तव्य हिन्दी में देते हुए उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती ने कहा कि वे स्वयं असमिया भाषी होते हुए दिल्ली में रहने के कारण हिन्दी में व्यवहार करते रहे हैं व उनकी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी रही है। उन्होने ज़ोर देकर कहा कि निजी रूप से वे त्रिभाषा नीति को भारत के लिए श्रेयस्कर समझते हैं। विश्व पटल पर भारत से बाहर के लोगों के लिए अंग्रेजी, समस्त भारतीय कार्यकलापों के लिए हिन्दी व अपनी मातृभाषा अथवा एक प्रांतीय भाषा प्रत्येक भारतीय को अवश्य सीखनी पढ़नी चाहिए। 


“जॉन गिलक्रिस्ट यू.के.हिन्दी शिक्षण सम्मान” स्वीकार करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा ने अपने वक्तव्य में यॉर्क विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम हिन्दी अध्यापन प्रारम्भ होने सम्बन्धी अपने संस्मरण सुनाए और यूके में हिन्दी अध्यापन से जुड़ी स्थितियों का उल्लेख करते हुए 35 वर्ष के अध्यापन का उल्लेख किया। इसी प्रकार "डॉ. हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य सम्मान" ग्रहण करते हुए डॉ. कृष्ण कुमार ने भारत में संस्कृत, हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए भावपूर्ण अपील करते हुए चेतावनी दी कि ऐसा नहीं करने पर आने वाले दिनों में भारत को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।


समारोह में “डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी प्रकाशन अनुदान योजना” के अंतर्गत श्रीमती उषा वर्मा को उनकी पुस्तक 'सिम कार्ड तथा अन्य कहानियाँ’ और डा॰ कृष्ण कन्हैया को उनके काव्य संग्रह 'किताब जिंदगी की’ के प्रकाशन हेतु नकद राशि और मानपत्र दिया गया।


लंदन स्थित इंडिया हाउस में हुए इस पुरस्कार समारोह में उप उच्चायुक्त डॉ. वीरेंद्र पाल और उच्चायोग में मंत्री (समन्वय) एसएस सिद्धू भी उपस्थित थे। सिद्धू जी ने अपना स्वागत वक्तव्य हिन्दी में दिया व धन्यवाद वक्तव्य भी डॉ वीरेंद्र पॉल द्वारा हिन्दी में ही दिया गया। कार्यक्रम का संचालन उच्चायोग के हिन्दी व संस्कृति अताशे श्री बिनोद कुमार ने सफलतापूर्वक किया। ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में समारोह में उपस्थित थे ।

चित्र परिचय –

1. लन्दन स्थित भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान प्राप्त करते हुए डॉ. कविता वाचक्नवी.

2. ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के प्रतिष्ठित अतिथिगण.

3. डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रशस्तिपत्र और स्मृतिचिह्न भेंट करते हुए भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती.

4. “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” प्राप्त करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा.


[प्रेषक – डॉ. ऋषभदेव शर्मा (संवीक्षक – ‘विश्वम्भरा’), प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, खैरताबाद, हैदराबाद-500004; मोबाइल – 08121435033]  

वसंत पंचमी और हरसिंगार के फूलों का केसरिया रंग


वसंत पंचमी और हरसिंगार के फूलों का केसरिया रंग 
- सुधा अरोड़ा






बसंत पंचमी के नाम से मन पचास साल पहले के बसंत के आने की धमक पर लौट लौट जाता है | बसंत पंचमी यानी पीले और केसरिया रंग के गेंदे के फूलों का मौसम ! बसंत पंचमी यानी कई किस्मों के बेर के फल आने का मौसम ! बसंत पंचमी यानी देवी सरस्वती की सुनहली और रुपहली, धवल सफेद और रंग बिरंगी कलात्मक प्रतिमाओं से कलकत्ता के फुटपाथों के अटे होने का मौसम ! बसंत पंचमी यानी सरस्वती पूजा के अनोखा स्वादिष्‍ट प्रसाद का दोना - शंखालू, केला, अमरूद, बेर यानी मौसमी सभी फलों का प्रसाद और इसके साथ ही खाकी कागज के एक अलग ठोंगे में मीठी केसरिया बूँदी में मिली हुई हल्दी रंग की नमकीन सेव । पूरे साल में इस मिश्रण का जो स्वाद सरस्वती पूजा पर आता, दूसरे किसी दिन नहीं । 


सरस्वती पूजा से पहले देवी सरस्वती की सुनहली, रुपहली और रंग बिरंगी कलात्मक प्रतिमाओं से कलकत्ता के फुटपाथ अंट जाते थे। हम दोनों बहनें अपने घर के लिये सरस्‍वती की एक प्रतिमा खरीदने जाते. प्रतिमाओं के सफेद, तांबई, बहुरंगी आकार प्रकार को निहार निहार कर अपनी पसंद की मूर्ति छाँटने में बड़ी परेशानी आती. मन होता कि सभी को उठा कर ले जायें। एक उठाते, एक रखते। आखिर अपनी जेब में रखे पैसों में समाती एक प्रतिमा पसंद कर उसकी कीमत कारीगर को देते. दूकानदार सरस्वती की प्रतिमा को अखबार के कागज में लपेट कर साथ साथ गणेश और लक्ष्मी की दो छोटी छोटी मूर्तियाँ हमें थमा देता. हम कहते - हमने तो देवी की एक ही प्रतिमा के पैसे दिये हैं. वह कहता - ए टा ओ निये जाओ माँ , पॉयशा दिते हबे ना ( ये भी ले जाओ, इसके लिये पैसे नहीं देने हैं ) ऐसा क्यों ? हमारी जिज्ञासा होती तो कहता - जहाँ ज्ञान की देवी जायेगी वहाँ विवेक और धन तो अपने आप रहने के लिये आ जाते हैं. इन विघ्न विनाशक और लक्ष्मी को भी रख लो. हम दोनों बहनें खुश खुश लौटते। आज का समय होता तो कहते -'' बाय वन, गेट टू फ्री ! '' 


सरस्‍वती पूजा से दो-चार दिन पहले से केसरिया रंग की फ्रॉक की तैयारी शुरु हो जाती . बसंत पंचमी यानी एक दिन के लिये स्कूल की सफेद पोशाक के बदले केसरिया, पीले रंग की फ्रॉक या सलवार कुरता और दुपट्टा पहनने का दिन ! हमारे पास स्कूल के लिये जो सफेद फ्रॉक होती, उसमें से थोड़ी सी घिसी हुई फ्रॉक को रंगने के लिये अलग कर लिया जाता. अपने घर के बगल में एक बंगाली सेन महाशय के बागान से हम दोनों बहनें सुबह सुबह जाकर हरसिंगार के झरे हुए फूल - पूरे बागान की हरी घास पर जिसकी चादर बिछी होती - चुन कर अपनी फूलों की डलिया भर लेते, तब भी फूल अगर कम लगते तो पेड़ के तने को दोनों हाथों से थामकर थोड़ा हिला भर देते और डालियों से हरसिंगार के फूल झमाझम बारिश की बूँदों की तरह झरने लगते - हमारे सिर माथे पर, हमारी डलिया में, हमारे कपड़ों पर. इतने ढेर सारे फूल लेकर फिर उन्हें आधी बाल्टी पानी में भिगोया जाता और उनके केसरिया रंग में फ्रॉक रंगी जाती. यह रंग एकसार होता - कहीं गहरा, कहीं हल्का नहीं जैसा आमतौर पर कपड़ों के रंगों में रंगने से हो जाता था. फिर फूलों की खुशबू भी फ्रॉक में रच-बस जाती .   


घर में भी हर साल सरस्वती की प्रतिमा आती और साल भर रहती, स्कूल में तो स्थायी प्रतिमा थी जिसका भव्य साज शृंगार सरस्वती पूजा के दिन किया जाता और विद्यार्थियों के रंगारंग कार्यक्रमों और गायन से पूरा वातावरण झंकृत हो उठता। वे 1955 से 1962 के बीच के साल थे जब मैं कक्षा पाँच से ग्यारहवीं तक कलकत्ता के श्री शिक्षायतन स्कूल में पढ़ रही थी. यह उस इलाके का हिन्दी माध्यम का सिर्फ लड़कियों का सबसे बेहतरीन स्कूल माना जाता था. सरस्वती पूजा हमारे स्कूल का एक बड़ा उत्सव था क्योंकि इस दिन विद्या की देवी की पूजा की जाती थी। महीने पहले से उत्सव की तैयारियाँ शुरु हो जातीं - नृत्य नाटिकाएँ, गायन-वाचन प्रतियोगिताएँ। 'वर दे वीणा वादिनी वर दे' से लेकर कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर का गीत '' आगुनेर परस दिए छोआओ प्राणे, ए जीबन पूर्ण करो दहन दाने '' सस्वर गाया जाता । पीले केसरिया गेंदे के फूलों से अल्पना का सुंदर गोलाकार वृत्त बनाया जाता और भीतर चावल के आटे से रंगोली आँकी जाती . नवीं और दसवीं कक्षा की लड़कियाँ अपने उस विषय की किताबें सरस्वती की प्रतिमा के पीछे रखतीं जो विषय उनको सबसे मुश्किल लगता और जिसको समझने के लिये देवी सरस्वती की विशेष अनुकंपा की ज़रूरत होती । 


नये नये स्कूलों का उद्घाटन वसंत पंचमी के दिन ही होता। हाथ में नयी स्लेट और नयी चॉक देकर सरस्वती पूजा के दिन ही बच्चों का विद्यारंभ करवाया जाता । उन दिनों ज्ञान और विद्या की देवी सरस्‍वती थी, इस देवी को नेट, गूगल और आइ पॉड ने रिप्‍लेस नहीं किया था । 


वसंत के आने की धमक के साथ बेर फल के आने का मौसम होता । स्कूल के बाहर बेर के खोमचे वाला बैठता जो आम तौर पर आमड़ा, इमली और अनारदाने के चूरन की गोलियाँ  रखता । माना जाता था कि लड़कियाँ इमली जैसी खट्रटी मीठी और चूरन जैसी चटपटी चीजें ही पसंद करती हैं। साल-भर के लिये यह स्थायी खोमचा था पर मौसमी फलों के आने के साथ वह अपने खोमचे पर तरह तरह के बेर सजाने लगता । हम उन बेरों को ललचाई नज़रों से देखते और चटखारे लेती जीभ को होंठों के भीतर कैद कर लेते कि बेर का पहला भोग सरस्वती मैया की प्रतिमा को लगेगा, तब जाकर हम मौसम का पहला बेर चखेंगे । अगर भोग से पहले चख लिया तो सरस्वती मैया नाराज़ हो जाएगी, फिर हम अच्छे नंबरों से पास नहीं होंगे, इसलिये प्रसाद के दोने का हाथ में आना मानो अब रोज़ बेर खाने का प्रवेश पत्र होता सो पहली बार फलों के प्रसाद के दोने में शंखालू, केले और अमरूद के साथ बेर चखने का मज़ा ही कुछ और था। सरस्वती पूजा के प्रसाद में मीठी बूँदी में नमकीन भुजिया मिले प्रसाद का पुड़ा भी हमें मिलता था । वह स्वाद याद कर आज भी मुँह में स्वादेन्द्रियाँ रस छलका रही हैं । 


कितना इंतजार करते थे हम इस सरस्वती पूजा का ! कैसा जुनून था किताबों का ! उन किताबों को सरस्वती की प्रतिमा के पीछे रखकर देवी से वरदान माँगने का ! और उत्साह से छलकते घर लौटते हुए, प्रसाद का थोड़ा सा हिस्सा बचाकर, माँ और पापा को देने का ! आज यह समय ही खो गया है । नहीं मालूम कोलकाता के स्कूलों में अब सरस्वती पूजा होती है या नहीं पर मुंबई में तो नहीं होती । बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा की जगह वेलेंटाइन डे होता है, जिसमें लड़कियाँ थोक में मित्रों को मित्रता की डोरी बाँधती हैं । यह रिवाज़ बुरा नहीं पर अपने पुराने उत्सवों को स्थगित कर इनका आना मन में अब एक टीस-सी पैदा करता है । क्या हमारे सारे त्यौहार, सारे जुड़ाव, किताबों के लिये ऐसा उछाह, गेंदे के फूलों की अल्‍पना और केसरिया बूँदी और नमकीन भुजिया का अनोखा प्रसाद, अब अतीत की चीज़ बनकर रह जायेगा ? 

 - सुधा अरोड़ा
1702 , सॉलिटेअर , डेल्‍फी के सामने,
हीरानंदानी गार्डेन्स, पवई,
मुंबई - 400 076 
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505

Nathuram Godse's defense speech in court


2nd October 1869- 30th January 1948 .


More than six decades after his assassination Mohandas Karamchand Gandhi still remains,  the most iconic figure of modern India. He was one of the most widely photographed men of his time; an entire industry of nationalist prints extolled his life; and his statues abound throughout India and, increasingly, the rest of the world .

On 30 January 1948, Gandhi was shot while he was walking to a platform from which he was to address a prayer meeting. The assassin, Nathuram Godse, was a Hindu nationalist with links to the extremist Hindu Mahasabha, who held Gandhi guilty of favouring Pakistan and strongly opposed the doctrine of nonviolence.



SOME FACTS ABOUT NATHURAM GHODSE.

Nathuram Ghodse was often a misunderstood character. He was referred to as a Hindu fanatic. It was often hard to understand Godse because the Government of India had suppressed information about him. His court statements, letters etc. were all banned from the public until recently. Judging from his writings one thing becomes very clear – He was no fanatic. His court statements were very well read out and indicated a calm and collected mental disposition. He never even once speaks ill about Gandhi as a person, but only attacks Gandhi’s policies which caused ruin and untold misery to Hindus. Another interesting point to note was that Godse had been working with the Hindu refugees fleeing from Pakistan. He had seen the horrible atrocities committed on them. Despite this Godse did not harm even single Muslim in India which he could easily have. So it would be a grave mistake to call him a Hindu fanatic.


Nathu Ram Godse, touched his feet to pay respect to the Father of Nation prior to shooting Gandhi.  He was agitated over partition of India which Mahatma had agreed. Moreover, Gandhi was adamant to give Pakistan a sum of Rs 550 Million as compensation. Prime Minister Nehru and his cabinet had passed a resolution not to give Pakistan the said amount as the latter has waged tribal war against India in Kashmir. Gandhi went on fast to oppose this and ultimately cabinet had to revert its decision. This agitated Godse more.

The final remains (ashes) of Godse are still kept in his house according to his will which he wrote prior to being hanged.  Godse presented historic arguments during his case though he did not defend himself.


The judge was moved by his knowledge and commented "Though he was bound by the provisions of law to write death sentence for Godse, but if the public present in the court room was to pass a judgement, the decision would probably have gone in favor of the accused". According to the will of Godse, his ashes to be flown into Sindhu river, if ever and when India and Pakistan become one nation again. Until then they are to be preserved.


Nathuram Godse's defense speech in court

नेताजी सुभाषचंद्र बोस : सच्चाई सिद्ध हो चुकी हैं

     The Truth now comes out........ 
 - (डॉ.) कविता वाचक्नवी



नेता जी सुभाषचंद्र बोस [ जन्म 23 जनवरी1897 – विमानदुर्घटना तिथि 18 अगस्त, 1945] की विमान दुर्घटना में मृत्यु का अपवाद सच मानकर देश ने विश्वास कर लिया था। आज ही के दिन वर्ष 1945 में यह अपवाद फैलाया गया था। अब जबकि जाँचसमिति से लेकर विश्व के कई बड़े शोधकर्ताओं ने यह पुष्ट कर दिया है कि नेता जी विमानदुर्घटना में नहीं मारे गए थे तो ऐसे में इसके साथ ही देश की सत्ता व उसके स्वार्थी चेहरों का भी संसार में असली रूप उजागर हो गया है।

नीचे, नेता जी से संबन्धित कई वीडियो व सच्चाईयों से परिचित करवाने वाले प्रमाणों का गंभीर ब्यौरा देने वाली डॉक्यूमेंट्री आदि प्रस्तुत की जा रही हैं। 

संभवतः आप न जानते हों कि नेता जी 70-80 के दशक में भारत में रह रहे थे। इसके लिए सबसे अंत में दिए पाँच वीडियो देखें। 


1 जुलाई 2010 को इसी ब्लॉग पर नेता जी से संबन्धित एक इंटरव्यू प्रस्तुत किया था, उसे आप यहाँ क्लिक कर सुनें -



जिन लोगों को यह सामग्री ईमेल से मिलेगी वे ईमेल में वीडियोज़ नहीं देख पाएँगे, अतः वे इस सारे संकलन को देखने सुनने के लिए इस लिंक को खोलें -

                                     नेताजी सुभाषचंद्र बोस  : सच्चाई सिद्ध हो चुकी हैं 

http://photochain.blogspot.co.uk/2012/08/Subhash-Chandra-Bose-The-Truth-now-comes-out...html






Netaji mystery: Justice Mukherjee's shocking revelation







SUBHASH CHANDRA BOSE PART 1 OF 4
    SUBHASH CHANDRA BOSE PART 2 OF 4         SUBHASH CHANDRA BOSE PART 3 OF 4          SUBHASH CHANDRA BOSE PART 4 OF 4              




Netaji mystery: Revelations (Part-1)

                                                        Netaji mystery: Revelations (Part-2)     
     

                                                                                
Historical Speech of Netaji Subhash Chandra Bose
     
      
Subhas Chandra Bose Netaji : A rare video                                                                          


Netaji Subhash Bose - Hidden Truth
         



नेता जी सन्यासी के रूप में अस्सी के दशक में कई वर्ष तक अयोध्या में रहे। 



                     NETAJI IN FAIZABAD (Part-1) 

    

 NETAJI IN FAIZABAD (Part-2)
                                                                  NETAJI IN FAIZABAD (Part-3)                                                                            NETAJI IN FAIZABAD (Part-4)                                                                                                                   NETAJI IN FAIZABAD (Part-5) VERY IMPORTANT  



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