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साप्ताहिकी

साप्ताहिकी
Monday, December 14, 2009


 
विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्ति परेषां परिपीडनाय (खलस्य)


कल रवि जी ने  श्री  देवाशीष   तथा  श्री रमण कौल  के एकल प्रयासों से बनी चिट्ठा निर्देशिका  का उल्लेख यहाँ किया तो कई चिट्ठाकारों ने अपना उल्लेख उसमें न होने की बात दुहराई| अब यदि कोई वहाँ रजिस्टर्ड ही नहीं हुआ स्वयं जा कर, तो वह स्वयं को वहाँ पाएगा कैसे ? इसलिए महत्वपूर्ण बात यह है कि चिट्ठाकार साथी अपने ब्लॉग को वहाँ रजिस्टर्ड करवाने के साथ ही साथ  आँकड़ों का एक विभाग तक भी जाएँ, अपने सम्बन्ध में जानकारी आदि दे कर तथ्यपूर्ण बनाएँ|  देखिए --

इस पोस्ट के बहाने सभी चिट्ठाकारों और चिट्ठे पढ़ने वालों और नेट पर हिन्दी के चाहने वालों से निवेदन हैं कि वे हिन्दी ब्लॉग्स चिट्ठादर्शिका पर पंजीकृत हों, अपने प्रोफाईल में सारी जानकारी भरें और यदि चिट्ठा लिखते हैं तो उसे निर्देशिका में जोड़ने के उपरांत उसे क्लेम भी करें। इससे हमें समय समय पर जाल पर हिन्दी प्रयोग और प्रयोक्ताओं के बारे में जानकारी मिलती रहेगी।


  उसे अद्यतन बनाने में अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह तो आप को व हमें ही करना है ना ! अस्तु !!


 गत  दिनों (बल्कि माहों) से हिन्दी चिट्ठा संसार पर मुख्यतः विग्रह, विवाद और वर्चस्व के बादल बहुधा छाए दिखाई देते रहे हैं| मेरे जैसा कड़े जी वाला व्यक्ति तक भी इस हाहाकार, छीना छपटी, अहमन्यता और पारस्परिक दोषारोपणों के जंजाल से विचलित ही नहीं विरक्त भी हो उठा मानो| जाने क्या तो बँट रहा है जिसके लिए युद्धक भूमिका में सब तने बैठे हैं ?  हम एक दूसरे की रेखा को छोटी कर के अपनी रेखा को बड़ा दिखाने के भ्रम में क्या तो पा लेंगे? पता नहीं !!



 आसपास के परिवेश, समय और परिस्थिति से अनजान समय और मनुष्य अपना कोई सकारात्मक योगदान देने की अपेक्षा किंचित भी संसाधनों और स्रोतों का दुरुपयोग करता है तो वह अपनी आने वाली नस्लों का अपराधी है| उदाहरण के लिए इस रिपोर्ट को देखें कि प्रति व्यक्ति की जाने वाली बर्बादी का दुष्परिणाम संसार के अलग अलग कोने में बैठे व्यक्तियों तक को कैसे भोगना पड़ जाता है | ऐसे में किसी का भी अनुत्तरदायी एक भी एक्शन (किसी भी कार्य/ व्यवहार का) बड़े भावी और समकालिक अर्थ रखता है|



स्वास्थ्य और विज्ञान में रूचि रखने वालों के लिए गत दिनों कुछ महत्वपूर्ण चीजें पढ़ने देखने को मिलीं| सर्वप्रथम आप अतिरिक्त भार को कम करने के प्रयास में जुटे एक व्यक्ति के प्रयासों और परिणाम  को सचित्र देखें-  ( चित्र मैंने सकारण हटा दिए हैं, आप लिंक पर ही उन्हें देखें ) |




दूसरा समाचार  मेडिकल से जुड़े हमारे साथी चिट्ठाकारों के साथ साथ स्वास्थ्य के प्रति सकारात्मक जागरूकता अपनाने वाले पाठकों  के लिए भी अतीव   महत्वपूर्ण शोध  है|


Alcohol consumption has long been linked to cancer and its spread, but the underlying mechanism has never been clear. Now, researchers at Rush University Medical Center have identified a cellular pathway that may explain the link.


हमारे साथी चिट्ठाकार बंधु ऐसे महत्त्व के विज्ञान लेखों का भी हिन्दी उल्था करके इतनी आवश्यक जानकारियों को निरंतर हिन्दी के पाठकों के लिए प्रस्तुत करने का काम करें तो लोक कल्याण की दृष्टि से व जन जागृति की दिशा में देश कुछ आगे बढ़े|



यहाँ अपनी भाषा के प्रति भावों की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में एक ऐसी कल्पना का रूप निरख कर एक बार अवश्य आप का भी वाह वाह कहने का मन हो आएगा |


Apostrophe
Brackets
Colon
Comma
Dash
Ellipsis
Exclamation Point
Hyphen
Parentheses
Period

Question Mark
Quotes
Semicolon




अब  गत दिनों हिन्दी ब्लॉग जगत की कुछ पठनीय प्रविष्टियों पर एक दृष्टि डालें तो डॉ. पद्मजा शर्मा की यह कविता बरबस संवेदना से सराबोर कर देती है -

कविता

पिता की मृत्यु  के बाद

माँ बहुत रोती है पिताजी
बेटा  दफ्तर जाते समय
न मिले तो / आंसू
पोता न सुने कहानी
घर में हो ब्याह
या जाया हो नाती
हर मौके बस रोती / माँ


आप जानते हो पिताजी
आपके खाने से पहले
खाती नहीं थी माँ


जब तक आपसे  नहीं कर लेती थी तकरार
कहाँ शुरू होता था उसका दिन
आपका भी कहाँ लगता था मन
जब हो जाती थी नाराज
कितना मनाते थे आप


सुनाकर माँ को / मुझसे कहते थे-
' तेरी माँ का स्वभाव फूल सरीखा है
जो दूसरों को बांटकर सुगंध
बिख़र जाता है ख़ुद '


तब माँ फेर लेती थी पीढ़ा
और आँखों की कौर से
पौछती थी गीलापन


जब से आप गए हो / पिताजी
बैठी रहती है आपकी तस्वीर के आगे
बिना कुछ खाए पिए
काट देती  है सारा  दिन


माँ की आँखों से
हंसी ख़ुशी उदासी की
जो त्रिवेणी बहती है
कभी पलट कर देखो तो सही / पिताजी


पोते को हँसता बोलता देखकर
कभी कभी रोते हुए माँ
कहती है  धीरे से -
' तेरे पिता हंस रहे हैं '


पर आप पहले की तरह
सिर्फ माँ के लिए
कब हंसोगे पिताजी



गत दिनों नंदिनी की एक कविता पर कवि ओम की एक टिप्पणी से जिस प्रकार की गलतफहमियाँ हुई और उस प्रकरण में विलंबित उत्तर के चलते जिस प्रकार नंदिनी ने अपना ब्लॉग बंद किया, नंदिनी के ब्लॉग बंद होने के चलते कई जगह विचलित होकर प्रतिक्रियाएँ आदि हुई, वह सब  घटनाक्रम काफी अजीबोगरीब व क्विक रिएक्शन के साथ मुझे व्यक्तिगत स्तर पर बहुत विगलित भावुकता से पूर्ण व कमजोर मनःस्थिति का वाचक प्रतीत होता रहा है|  मेरे ऐसा प्रतीत होने की जी भर आलोचना की जा सकती है किन्तु इधर युवा संभावनाशील लेखन की जो हल्की-सी छवि बननी प्रारम्भ हुई थी, उसका गुलशन नंदा टाईप कायांतरण मेरे गले नहीं उतरता| लेखन अथवा सम्बन्ध व्यक्ति की शक्ति हैं, उन्हें अपनी कमजोरी के भार से दबा देना आत्मघाती ऐसा कदम हैं कि जिसके लिए दया नहीं, सहानुभूति नहीं अपितु आक्रोश भर जाता है मन में| कोरी भावुकता के चलते, लेखन के डगमग होने की छवि के चलते किसी का कोई कल्याण उसमें निहित नहीं है| अतः ऐसे प्रसंगों से किसी भवितव्यता की अपेक्षा नहीं जन्मती|





२ दिन पूर्व वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा जी ने वर्तमान की युवतियों और विवाह संबंधों पर बातों बातों में एक प्रसंग में मुझे कहा कि अमृता जी बहुत भाग्यशाली थीं जो उन्हें इमरोज जैसा व्यक्ति उनके जीवन में मिला; और साथ ही यह भी जोड़ा कि दुनिया में कौन लड़की उतनी सौभाग्यशाली होती है भला?


कल के एक महत्वपूर्ण पाठ्य को पढ़ कर सुधा जी की इस बात के सोलह आना खरे होने से आप पुनः सहमत होंगे-


अमृता -इमरोज और साझा नज्म

पंद्रह दिनों पहले अमृता एक बार फिर इमरोज़ के सपनों में आई, बादामी रंग का समीज सलवार पहने | 'सुनते हो ,कमरे में इतनी पेंटिंग क्यूँ इकठ्ठा कर रखी है ?अच्छा नहीं लग रहा ,कुछ कम कर दो "|अमृता कहें और इमरोज़ न माने ,ये तो कभी हुआ नहीं ,अब इमरोज़ ने कमरे से पेंटिंग कम कर दी हैं ,कमरे में फिर से रंगों रोगन करा दिया है |हाँ ,अपने बिस्तर के पैताने या कहें आँखों के दायरों तक ,और मेज़ पर रखे रंगों और ब्रशों के बीच अमृता की तस्वीरें टांग रखी है |इन तस्वीरों को देखकर यूँ लगता है जैसे हर वक़्त अमृता आज भी इमरोज़ की निगहबानी कर रही है ,इमरोज़ घर से बाहर कम जाते हैं ,क्यूँकर जाते ?

 

 


डॉ. अजित गुप्ता वर्तमान में मनुष्य के मन में बसे भय को तोल कर और टटोल कर देखती हैं-

 

डर कैसे बस गया जीवन में?

बचपन शहर से दूर रेत के समन्‍दर के बीच व्‍यतीत हुआ। साँप और बिच्‍छू जैसे जीव रोज के ही साथी थे। वे बेखौफ कभी भी घर में अतिथी बन जाते थे। लेकिन डर पास नहीं फटकता था। घर के आसपास रेत के टीले थे, रोज शाम को सहेलियों के साथ वहाँ जाकर टीलों के ऊपर बैठते थे। कभी-कभी तो किसी एक सहेली के साथ ही जाकर बैठ जाते थे, लेकिन डर नहीं लगता था। उस जमाने में मोपेड बाजार में आयी तो घर में भी भाई ने खरीदी। हम उनकी आँख बचाकर निकल जाते सूनी सुनसान सड़क पर। चारों तरफ रेत ही रेत और बीच में काली सड़क। लेकिन फिर भी डर नहीं लगता था। सायकिल से कॉलेज जाते, रास्‍ते में कोई बदमाश छेड़ देता तो सामने तनकर खड़े हो जाते, क्‍योंकि डर नहीं था।

 

 

जिन महिला चिट्ठाकारों ने अथक श्रम द्वारा कुछ ही समय में निरंतरता बनाए रखते हुए विविध प्रकार से अवदान दिया है, उनमें संगीता पुरी जी का नाम उल्लेखनीय है| ज्योतिष से इतर उन्होंने तकनीकी शब्दावली को नेट पर टाईप कर डालने का कार्य भी अपने बूते हाथ में लिया व अपने सगोत्री समाज पर केन्द्रित ब्लॉग भी वे निरंतर लिख रही हैं| जिन विषयों पर बहुधा वाह वाह नहीं मिल सकती वैसे विषय भी उन्होंने जिम्मे लिए | इसी प्रकार का एक विशेष लेख उनका कल मेरे पढने में आया -


क्‍या ईश्‍वर ने शूद्रो को सेवा करने के लिए ही जन्‍म दिया था ??

प्रारम्भ में वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर थी, पर धीरे-धीरे यह व्यवस्था जन्म आधारित होने लगी । पहले वर्ण के लोग विद्या , दूसरे वर्ण के लोग शक्ति और तीसरे वर्ण के लोग पैसों के बल पर अपना महत्‍व बनाए रखने में सक्षम हुए , पर चौथे वर्ण अर्थात् शूद्र की दुर्दशा प्रारम्भ हो गयी। अहम्, दुराग्रह और भेदभाव की आग भयावह रूप धरने लगी। लेकिन इसके बावजूद यह निश्चित है कि प्राचीन सामाजिक विभाजन ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों में था जिसका अन्तर्निहित उद्देश्य सामाजिक संगठन, समृद्धि, सुव्यवस्था को बनाये रखना था। समाज के हर वर्ग का अलग अलग महत्‍व था और एक वर्ग के बिना दूसरों का काम बिल्‍कुल नहीं चल पाता था।




 समय की सुई तेजी से बढ़ रही है|

अतः अंत में केवल कुछ और प्रविष्टियों के लिंक आप को थमा रही हूँ जो मुझे विचारणीय व महत्त्व के प्रतीत हुए ( आपकी पसंद व महत्त्व देने  की कसौटी नितांत भिन्न भी हो सकती है )|


पहला लेख पढने पर उसमें वर्णित शोध परिणाम के बारे में जान  मुझे अपनी पुस्तक कविता की जातीयता  का एक अध्याय स्मरण हो आया|  




धीरे-धीरे ये स्ट्रेस दिमाग़ के उस हिस्से (हाइपोथेलमस) पर असर डालता है जो हमारे शरीर के कई एक्शन्स को कंट्रोल करता है...। इस स्ट्रेस की वजह से शरीर में ऐसे हारमोन्स का रिसाव होने लगता है जो शरीर को कमज़ोर कर देते हैं और बुढ़ापा समय से पहले ही आ जाता है...।




मान लीजिए अगर आप किसी को धोखा देते हैं तो आपके मन में कहीं न कहीं इस बात का पछतावा रहता है..। चाहे आपको इस बात का मलाल भी न हो लेकिन कहीं न कहीं ये बात आपके दिमाग पर गुपचुप तरीके से असर डाल रही होती है...।




सतीश चंद्र श्रीवास्तव द्वारा लिखित इस लेख को पढ़ कर मेरा तो मन जार जार रोने को हो आया था| शहीदों की चिताओं पर मेले लगना तो दूर ....


सोनिया गांधी और अंबिका सोनी की तस्वीरों से युक्त विज्ञापन प्रकाशित और प्रसारित किया गया। अब एक साल बाद सिर्फ 16 शहीदों के परिजनों का पता लगा पाना क्या कौम के खात्मे का गंभीर संकेत नहीं दे रहा? क्या पूंजीवाद और भूमंडलीकरण के दौर में राष्ट्रीयता और राष्ट्रभक्ति जैसी बातें अप्रासंगिक और दकियानूसी नहीं हो गई हैं? परंतु इस बात का जवाब भी तो सोचना पड़ेगा कि राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा करके अमेरिका-इंग्लैंड ही नहीं, चीन और जापान भी कोई कदम क्यों नहीं नहीं उठाते? ऐसे में भारतीय व्यवस्था आखिर किनके हाथों में खेल रही है?
सवालों में इतिहासकार
इतिहास के पन्नों में सभी ने पढ़ा है कि 13 अप्रैल 1919 को 'वैशाखी वाले दिन' जनरल डॉयर के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग की थी। हजारों की संख्या में लोग मारे गए थे। इतिहासकारों के पास इस बात का जवाब नहीं है कि किसे भ्रम में डालने के लिए और किसकी चापलूसी करते हुए पुस्तकों में 'वैशाखी वाले दिन' का इस्तेमाल किया गया। हकीकत यह है कि अमृतसर में वैशाखी मेला की कोई परंपरा नहीं है। पंजाब में वैशाखी का मेला आनंदपुर साहिब में लगता है। जलियांवाला बाग में न पहले कभी मेला लगता था और न आज ही कोई परंपरागत आयोजन होता है। कड़वी सचाई यह भी है कि आज के अमृतसर में पांच प्रतिशत लोग भी नहीं जानते कि मजदूर और मानवाधिकारों के विरोधी रॉलेट एक्ट के खिलाफ 31 मार्च और 6 अप्रैल को पूर्ण बंदी तथा 9 अप्रैल को रामनवमी के जुलूस में हिंदू-मुस्लिम एकता ने अंग्रेजों को हिला कर रख दिया था। आंदोलन प्रभावित करने के लिए 10 अप्रैल 1919 को प्रमुख नेता डा. सैफुद्दीन किचलू और डा. सत्यपाल को गिरफ्तार किया गया तो युवा हिंसक हो उठे। अंग्रेजों पर हमला बोला। स्टेशन, बैंक, डाकघर को निशाना बनाया। देशभक्तों पर हुई फायरिंग में 35 शहीद हुए। 13 अप्रैल को इसी सिलसिले में शोकसभा थी, जिसमें 20 हजार से अधिक लोग मौजूद थे। मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में सेवा समिति के दल ने 1500 से अधिक शहीदों की सूची तैयार की थी। उक्त सूची अब गायब है।



आचार्य रामचंद्र शुक्ल की १२५ वीं जयन्ती पर आयोजित एक गंभीर विमर्श की रिपोर्ट  तैयार की है अमिताभ त्रिपाठी जी ने इलाहाबाद से  |










अनंतिम



जाते जाते 
नेट पर हिन्दी लेखन के लिए दिए जाने वाले पुरस्कारों में सम्मिलित होइए, किन्तु कुछ तथ्य ध्यान में रखे रहते हुए|


आप का पूरा सप्ताह सर्व मंगल से परिपूर्ण हो |

प्रेम न हाट बिकाय










आज की चर्चा करने के लिए जी भर कोशिश करनी पड़ीं है| यात्रा पर निकलने से पूर्व चर्चा की मनःस्थिति बना पाना बड़ा ही दुष्कर होता है| पर आप तो जानते हैं कि कुछ चीजें दायित्वबोध के चलते भी निभाई जाती हैं, निभाई जानी चाहिएँ भी, जब जितना बन पड़े| सो, हम आप से गिने चुने कुछ लेखों की ही चर्चा करेंगे; वह इसलिए नहीं कि संकलक खंगालना समय माँगता है अपितु इसलिए भी कि कुछ मुद्दे गंभीर विमर्श की अपेक्षा करते हैं|




सब से पहले मैं चिट्ठाचर्चा परिवार और हिन्दी नेट समुदाय की ओर से स्वर्गीय कल्याण मल लोढ़ा जी को श्रद्धांजलि  अर्पित करती हूँ | हिन्दी के इन सुप्रतिष्ठित विद्वान का अतुल अमूल्य योगदान आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है|







Prof.Kalyanmal Lodha
हिंदी के सुविख्यात विद्वान तथा उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल आचार्य विष्णुकांत शास्त्री कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर लोढ़ा के शिष्य रहे. सन १९७९ से ८० तक आप राजस्थान के जोधपुर विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त किये गए. एक वर्ष के पश्चात आप पुनः कलकत्ता आ गए फिर सन १९८६ में आपने कलकत्ता विश्वविद्याला से अवकाश ग्रहण किया. प्रोफ़ेसर लोढ़ा ने ५० से अधिक शोध निबंध लिखे. आपने दर्जनों पुस्तकों की रचना की, जिनमे प्रमुख हैं- वाग्मिता, वाग्पथ, इतस्ततः, प्रसाद- सृष्टी व दृष्टी , वागविभा, वाग्द्वार, वाक्सिद्धि, वाकतत्व आदि. इनमे वाक्द्वार वह पुस्तक है, जिसमे हिंदी के स्वनामधन्य आठ साहित्यकारों - तुलसी, सूरदास, कबीर, निराला, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी के साहित्यिक अवदानों का सुचिंतित तरीके से मूल्याङ्कन किया गया है. प्रोफ़ेसर लोढ़ा ने प्रज्ञा चक्षु सूरदास , बालमुकुन्द गुप्त-पुनर्मूल्यांकन, भक्ति तत्त्व, मैथिलीशरण गुप्त अभिनन्दन ग्रन्थ का संपादन भी किया. प्रोफ़ेसर लोढ़ा को उनके साहित्यिक अवदानों के लिए मूर्ति देवी पुरस्कार, केंद्रीय हिंदी संसथान-आगरा से राष्ट्रपति द्वारा सुब्रमण्यम सम्मान, अमेरिकन बायोग्राफिकल सोसाइटी अदि ने सम्मानित किया. आप अपनी ओजपूर्ण वाक्शैली के लिए देश भर जाने जाते थे. विविध सम्मेलनों में आपने अपना ओजश्वी वक्तव्य देकर हिंदी का मान बढाया. आप के के बिरला फाउन्डेसन, भारतीय विद्या भवन, भारतीय भाषा परिषद्, भारतीय संस्कृति संसद सरीखी देश की सुप्रसिद्ध संस्थावों से जुड़े हुए थे. प्रोफ़ेसर लोढ़ा के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है. उनका अंतिम संस्कार रविवार २२ नवम्बर को जयपुर में किया जा रहा है.












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साहित्य अकादमी पुरस्कारों के सम्बन्ध में एक नई व अनोखी सूचना मिलने पर  हिन्दी-भारत याहू समूह  में जो परिचर्चा छिड़ी, उसे बाँचना स्वयं में दो विचारपक्षों में से किसी एक विचार की पक्षधरता मात्र नहीं है अपितु साहित्य से जुड़े ऐसे अति महत्व के प्रश्नों पर भविष्य में देश में क्या होने जा रहा है, क्या होना चाहिए और क्यों होना चाहिए की पक्षधरता भी है| दोनों ही मत-विमत अपनी अपनी जगह सही और सटीक हैं| परिचर्चा इतनी महत्वपूर्ण, रोचक, सामयिक व विचार- उर्वर है कि आप में से प्रत्येक भाषा और साहित्य से सम्बद्ध पाठक को एक बार अवश्य देखना पढ़ना और उस पर अपनी राय देनी चाहिए थी, किन्तु  हाय री आदान-प्रदान की श्रृंखला!! 



· यदि हम सैमसंग की सहायता से पुरुस्कार की राशि बढा सकें तो क्या यह लेखकों के लिये अच्छा नहीं होगा ? नोबल पुरुस्कार की महत्ता का एक कारण यह भी है कि उस के साथ एक बड़ी पुरुस्कार राशि जुड़ी होती है । · यदि एक ’अल्फ़्रेड नोबल’ अपने निजी धन से एक ऐसा पुरुस्कार स्थापित कर सकता है जिसे पूरी दुनिया सम्मान से देखे और वह पुरुस्कार आने वाले वर्षों में कभी किसी पर निर्भर न रहे तो ऐसा पुरुस्कार हमारे अम्बानी , बिरला या मित्तल क्यों नहीं स्थापित कर सकते ? हमें किसी विदेशी कम्पनी सैमसंग पर निर्भर नहीं रहना होगा । · इस दुनिया में कुछ भी मुफ़्त नहीं मिलता । हम मुफ़्त ’टेलीविज़न’ भी तभी देख पाते हैं जब प्रायोजक उस के लिये पैसा देते हैं । किसी भी पुरुस्कार को बनाये रखने के लिये धन की ज़रूरत होती है और वह कहीं न कहीं से आना ज़रूरी है । धन का स्त्रोत जो भी होगा कुछ सीमाएं और बंधन तो ले कर आयेगा ही । हमें देखना यह है कि किस में हम अपनी स्वतंत्रता को कम से कम खोते हैं ।


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गत सप्ताह  और मेरे हृदय की धक्-धक् पूछती है– वह कौन  पर एक टिप्पणी का यह अंश देखें -
ऋषभ  ने कहा…
महाराष्ट्र विधानसभा के चपत-समारोह को भावुकता के बजाय इस तरह भी देखने की ज़रुरत है कि इस बहाने एक उद्दंड नेता ने हिन्दी को जानबूझकर अपमानित कराया है..... उकसावा भी आपराधिक कृत्य है.


यह टिप्पणी बताती है कि हिन्दी के सम्मान के नाम पर  जिस प्रकार के दाँव पेंच खेले गए हैं, उनसे हिन्दी का  अपमान ही हुआ है| इसमें हिन्दी को दुत्कारने वाला जितना दोषी है, उस से बड़ा दोषी उसका सम्मान करने के नाम चाँटा खाने की सहानुभूति और महिमा मंडन पाने वाला है| उसके ऐसे कृत्य पर उसकी भर्त्सना के स्थान पर हिन्दी वालों ने यकायक पहली नज़र में उसे भले हिन्दी के लिए सार्वजनिक अपमान तक झेल जाने वाला नायक बना कर प्रस्तुत किया हो, मान  लिया हो; किन्तु उद्वेग उतरते ही उस आपराधिकता की पोल खुलते दीखने लगी है|



राजनीति की बजबजाती गंदगी को हिंदी की पैकिंग लगाकर उस बजबजाती राजनीति को सहेजने के लिए अपने-अपने पक्ष की सेना तैयार करने की कोशिश थी
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समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अबू आजमी के रिश्ते देश के दुश्मन दाऊद इब्राहिम से होने की खबरों के ठंडे हुए अभी बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ और न ही इसे ज्यादा समय बीता होगा जब मराठी संस्कृति के नाम पर भारतीय संस्कृति तक को चुनौती देने वाले राज ठाकरे गर्व से पॉप स्टार माइकल जैकसन की गंधाती देह के दर्शन के लिए आतुर थे।



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बन्दूकधारियों और हताहतों के अपने शब्दों के माध्यम द्वारा  मुम्बई आतंक की अकथ कथा के छिपे रहस्यों की जो वास्तविकता उजागर हुई है, उस कथा को उसके पूरे रूप में पहली बार पुरस्कृत  फिल्मकार  Dan Reed  ने कई अनजाने पक्षों के साथ खरा-खरा प्रस्तुत किया है,  ... एक ऐसी  कथा जिसे सुन देख कर आप सिहर उठेंगे .... अवाक हो जाएँगे ...





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गत दिनों मुझे एक अजीबोगारीब लेख देखने पढ़ने का अवसर मिला| लेख क्या था, मानो अपनी कुंठाओं की अभिव्यक्ति थी|  कृष्ण बिहारी जी के इस 5 नेट पन्नों में फैले लेख को आप भी स्वयं पढ़ें और विचारें|

लेखक लिखते हैं


प्रेम नहीं सेक्सप्रेम. यह शब्द जितना सम्मोहक है उतना ही भ्रामक भी. एक विचित्र-सी मनोदशा का नाम प्रेम है. यह कब होगा, किससे होगा और जीवन में कितनी बार होगा, इसका कोई अता-पता किसी को नहीं होता. जब-जब मुझसे किसी ने इसके बारे में सवाल किया है या मैंने खुद से पूछा है कि आख़िर यह मामला है क्या, तो मुझे केवल एक उत्तर ही देते बना है कि प्रेम वासना से उपजी मनोस्थिति है.
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असल में इस झूठ को वह इस तरह जीती है कि उसे यह सच लगता है कि किसी के साथ हमबिस्तर हो चुकने के बाद भी वह पाकीजा है. मैं नब्बे-पंचानबे प्रतिशत स्त्रियों की बात कर रहा हूं न कि उन पांच दस प्रतिशत की जिन्होंने समाज को ठेंगा दिखा दिया है. ये ठेंगा दिखाने वाली महिलाएं आर्थिक रूप से या तो स्वतंत्र हैं या फिर वेश्याएं हैं. वेश्या सबसे अधिक स्वतंत्र होती है.
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कहने का मतलब है कि रोज की दाल-रोटी है सेक्स, प्रेम का कहीं अता पता नहीं यह सच एक बड़ा सच है. मैं यदि देहधारी नहीं होता तो क्या कोई स्त्री मुझे प्रेम करती, यदि कोई अपने वज़ूद के साथ मुझे न बांधता तो क्या मैं उसके बारे में सोचकर अपना समय नष्ट करता. अशरीरी प्रेम को बहुत महत्व देने वालो, ऐसा कौन सा अशरीरी रिश्ता है जो तुम्हारे साथ ज़िंदा है
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इसका सीधा अर्थ है कि जिस्म है और पहुंच में है तो जहान है नहीं तो कुछ भी नहीं है.
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प्रेम एक ऐसा मर्ज़ है जो सबको जुकाम की तरह पकड़ता और छोड़ता है. कुछ लोगों को यह बार-बार पकड़ता और छोड़ता है. अगर यह उनकी आदत न बनी हो तो उन्हें हर बार पहले से ज्यादा दुखी करता है. प्रेम पहला हो या उसके बाद के किसी भी क्रम पर आए, होने पर पाने की छटपटाहट पहले से ज्यादा होती है और टूटने पर पहले से भी तगड़ा झटका लगता है. यह टूटना इनसान को बिखरा और छितरा देता है.जिनकी आदत ओछेपन की होती है और जो अवसर पाते ही अपना मतलब पूरा करने में लग जाते हैं उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. उनको ही क्रमश: लम्पट और छिनाल कहा जाता है. इस प्रवृत्ति के लोग प्रेम नहीं करते.ये एक किस्म की अलग लाइफ स्टाइल जीते हैं.
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प्रेम ईर्ष्यालु, शंकालु और हिंसक होता है. प्रेम ही एक मात्र ऐसा मानवीय व्यवहार है जिसमें सबसे अधिक अमानवीयता है. प्रेम बनाता नहीं, बरबाद करता है. यह अलग बात है कि बरबाद करने वाले की कोशिश कभी कभी नाकाम हो जाती है. मैं कभी नहीं मान सकता कि रत्नावली या विद्योत्तमा ने तुलसीदास या कालिदास को अमर कर दिया
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मैं जब इस लेख को लिखते हुए अपने परिवेश में इसकी चर्चा कर रहा हूं तो इस सभ्य समाज के लोग इसे मेरा व्यक्तिगत मत कहते हुए मुझे ख़ारिज करने में लगे हैं कि प्रेम कतई दैहिक नहीं है. प्रेम आत्मा की बात है. वासना का इससे कोई लेना-देना नहीं. प्रेम ही है कि दुनिया बची हुई है. मेरा मन इसे स्वीकार नहीं कर रहा. मैं समझता हूं कि करूणा है जिससे दुनिया बची हुई है. प्रेम और करूणा में अन्तर है .करूणा का जहां असीम विस्तार है, वहीं प्रेम एक संकरी गली है. प्रेम राजपथ नहीं है कि उस पर एक साथ और सबके साथ दुनिया चले. प्रेम में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है.




यदि प्रेम केवल देह से देह का सम्बन्ध ही होता और देह पाने तक,  पा चुकने तक की यात्रा तक ही प्रेम की यात्रा होती तो किसी से भी प्रेम करने के बाद उसे ही पाने की लालसा क्यों रहती| देह तो लुके छिपे किसी की भी पा लेने वाले लोग सदा इस समाज में रहे हैं ना !!


अर्थात्  a को यदि यदि b से प्रेम है और वह उस के लिए तड़प रहा / रही है तो उसे तड़पने की क्या आवश्यकता है? वह  b से इतर किसी अन्य के देह को माध्यम क्यों नहीं बना लेता ? उसी की देह की अनिवार्यता क्यों रहती है ( यदि देह ही मूल कारक है तो)| और  गृहस्थ के बुढापे में आपसी प्रेम को आप ऐसे ही ख़ारिज करते चले जाएँगे ?

आप खारिज कीजिए, क्योंकि आप के खारिज करने के अपने कारण हैं |


कहना शोभा तो नहीं देता किन्तु पूरे लेख से एक देह लोभी पुरुष की देह लोभी होने के कारण हुई दुर्गत से उपजी मानसिकता का दिग्दर्शन होता है| वैसे बूढ़े तोतों को पढ़ाने का लाभ  हम नहीं देखते, इसलिए लेख पर तर्क वितर्क करने तक से ऊब हुई| 



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इधर  हिन्दी  ब्लॉग  जगत्  में बच्चों के ब्लॉग बनाने का उत्साह भी दिखाई देता है, जो स्वागत योग्य है| ये ब्लॉग उन ब्लॉग से हट कर हैं जो बच्चों के विषयों पर अथवा उन्हें केंद्र में रख कर लिखे जा रहे हैं क्योंकि मैं उन ब्लॉग की बात कर रही हूँ जो बच्चों के नाम से उनके मातापिता अथवा परिवारीजनों द्वारा चलाए जा रहे हैं| अभी एक दो दिन पूर्व प्रवीण जाखड जी के ब्लॉग के माध्यम से हिन्दी में सबसे छोटी आयु की बच्ची का भी एक ब्लॉग देखा था|


 खैर, बच्चों के या किसी बच्चे विशेष के ब्लॉग का लिंक या उल्लेख करना यहाँ मेरा उद्देश्य नहीं है| मेरा उद्देश्य इस बात को यहाँ उठाने का दूसरा है| वह यह कि जब भी कोई रचना किसी पात्र - विशेष  के माध्यम से व्यक्त होती है तो वह उस पात्र की भाषा और उसी की भंगिमा लेकर आती है, आनी चाहिए| साहित्य इसका प्रमाण है| प्रेमचंद के हर पात्र की भाषा और भंगिमा उसके समाज, वय, लिंग, शिक्षा, अनुभव, स्तर, भाषिक पृष्ठभूमि आदि आदि आदि कई स्तरों का निर्वाह करती है| प्रेमचंद ही क्यों, सारा हिन्दी साहित्य, संस्कृत साहित्य, अन्य भाषाओं का साहित्य, पंचतंत्र..... जाने क्या क्या गिनाऊँ ! और तो और, बोलचाल में भी लोग जब बच्चे की भूमिका में कभी  संवाद करते हैं तो तुतला कर बोलना, ... आदि शैली को अपना लेते हैं| अभिप्राय यह कि  वाणी और शब्दों का चयन वक्ता अथवा पात्र के अनुसार होना भाषा की अनिवार्य शर्त है|


आज मुझे दुःख हुआ यह देख कर कि हम अपने बच्चों के मुँह में  कैसी भाषा आरोपित कर रहे हैं| स्वप्निल नाम की इस बच्ची का ब्लॉग यों तो सराहनीय है, प्यारा है किन्तु आज के संवाद में एक शब्द "चुड़ैल" के प्रयोग में ऐसी असावधानी हुई है कि लगा जैसे हम अपने बच्चों को अपनी  वान्छओं से आरोपित कर रहे हैं| उन पर  उनकी उम्र से बड़ी चतुराई और उस चतुराई की भाषा बोलना लाद रहे हैं| 


मुझे पक्का विश्वास है कि यह भाषा स्वप्निल कदापि नहीं बोलती होगी| बोलनी चाहिए भी नहीं| ऐसे में जो भी स्वप्निल बन कर इस ब्लॉग को लिख रहे हैं,  उन्हें चाहिए कि शब्द चयन में सावधानी बरतें| बच्चे की भाषा और भावना से सामंजस्य न रखने वाले एक शब्द के गलत चयन व प्रयोग से बच्चे की पूरी छवि धूमिल हो जाती है| बच्चों के पास उनका बचपन अधिकतम सुरक्षित रहने दें| मेरी इस बात को तर्क वितर्क का मुद्दा बना कर  मुझे खेद में न डालें| मैं किसी दुर्भावना वश ऐसा नहीं लिख रही हूँ| फिर भी यदि मेरी सलाह पर किसी को आपत्ति हो तो वह/ वे अपने बच्चों के लिए निर्णय लेने में स्वतन्त्र तो हैं ही |



स्वप्निल
My Photoअचानक पापा के कम्प्यूटर में मैंने एक फोटो देखी। फोटो में पापा एक लड़की के साथ शूट में खड़े हैं। मैंने सोचा मेरे पापा कब से फिल्मों में काम करने लग गए और ये चुडैल कौन है? जो मेरी मम्मी के स्थान पर पापा के साथ खड़ी है। पापा से पूछा तो पापा ने बताया कि बेटा ये तेरे पापा नहीं है, ये तो राजीव तनेजा अंकल के ब्लाग में किया गया कमाल है। यह जानकर मुझे अच्छा लगा कि चलो पापा न तो किसी फिल्म में काम कर रहे हैं और न ही मेरे मम्मी के स्थान पर कोई और है।  आप एक चित्र के साथ हुई चुहल में हमें पहचाने की कोशिश कीजिए तब तक हम आप से अगली बार मिलने के लिए विदा ले लेते हैं|




वैसे यह तो सच है कि राजीव तनेजा जी की तकनीकी चित्रकारी ने ब्लॉग जगत् के लोगों को क्या से क्या बना दिया है|

अब यही देखिए -

 हम आपसे  अगली बार मिलने से पूर्व आपके मंगलमय भविष्य की कामना करते हैं.


fvwegwe

आवाज़ पैरों की देती है सुनाई बार-बार….बार-बार





और मेरे हृदय की धक्-धक् पूछती है– वह कौन 
Author: कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee | Posted at: Monday, November 16, 2009 | Filed Under:




 -^-


कल १४ नवम्बर था-  "बाल दिवस" या कहें कि जवाहर लाल नेहरू का जन्म दिवस ;  जिनके विषय में बाबा नागार्जुन ने लिखा था -



आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !


देश ने और देशवासियों ने सरकारी / असर कारी / अ - सरकारी  और अन् + असरकारी अलग अलग विधि विधान से इसे मनाया और अपने अपने ढंग से जवाहर लाल और बालकों के प्रति उनके प्रेम को याद किया| ब्लॉग जगत में बाल दिवस के अवसर पर बच्चों पर केन्द्रित कई  प्रकार की विचारात्मक, सूचनात्मक , संवेदनात्मक, ........ आदि आदि सामग्री यथासम्भव उपलब्ध कराई गयी| वह सारी आप ब्लॉगवाणी तथा चिट्ठाजगत संकलकों पर जा कर गत ३२ घंटे की प्रविष्टियों को खंगालते हुए स्वरुचि के अनुसार ( या अपनी- अपनी  टिप्पणियों के आदान-प्रदान की सीमारेखा और तय नीति अनुसार ) देखभाल / पढ़ सकते हैं | वैसे रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी ने इसका एक  लघु संस्करण भी तैयार किया है - 



कई प्रविष्टियाँ यद्यपि इसमें छूट गयी हैं किन्तु उनके लिए शास्त्री जी ने सौजन्यता व विनम्रता पूर्वक इसे मानवीय चूक के रूप में लेने का आग्रह किया है | अत: किसी को उनसे किसी प्रकार की शिकायत मन में नहीं लानी चाहिए क्योंकि चर्चा करने वाली की भी अपनी सीमाएँ होती हैं |

हाँ तो, हम बात कर रहे थे बाल दिवस के साथ नाभिनाल सम्बद्ध जवाहर लाल नेहरू की|  पता नहीं क्यों जवाहरलाल नेहरु चाचा के साथ मैं सदा चीन का दागदार (चिन्हित) चेहरा चीन्हने में जुट जाती हूँ ? (ये अलंकार नहीं है भाई!, चक्कर है च का !!) | इसी सहसंबंध के कारण ही हो सकता है कि मुझे  भारत के पड़ोसी चीन के संबंधों पर लिखा एक लेख भी नेहरू जी के जन्मदिवस के अवसर पर, एकदम सही समय पर आया लगा| लेख विश्लेषणात्मक और सुचिन्तित है, जिसे लिखा है हमारे वरिष्ठ मित्र व `स्वतंत्र वार्ता' (दैनिक हिन्दी पत्र) के सम्पादक डॉ. राधेश्याम शुक्ला जी ने - 


अमेरिका, चीन और भारत के संबंधों का एक विश्लेषण


अमेरिका और चीन आज दुनिया के दो सर्वाधिक श्क्तिशाली देश हैं। इन दोनों के अंतर्संबंध इतने जटिल हैं कि उनकी सरलता से व्याख्या नहीं की जा सकती। उनके बीच न कोई सांस्कृतिक संबंध है, न सैद्धांतिक, बस शुद्ध स्वार्थ का संबंध है। इसलिए न वे परस्पर शत्रु हैं, न मित्र। इनमें से एक भारत का पड़ोसी है, दूसरा एक नया-नया बना मित्र। पड़ोसी घोर विस्तारवादी व महत्वाकांक्षी है। ऐसे में भारत के पास एक ही विकल्प बचता है कि वह अमेरिका के साथ अपना गठबंधन मजबूत करे। यह गठबंधन चीन के खिलाफ नहीं होगा, क्योंकि अमेरिका भी न तो चीन से लड़ सकता है और लडऩा चाहता है। लेकिन चीन की बढ़ती शक्ति से आतंकित वह भी है और भारत भी। इसलिए ये दोनों मिलकर अपने हितों की रक्षा अवश्य कर सकते हैं, क्योंकि चीन कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो जाए, वह अमेरिका और भारत की संयुक्त शक्ति के पार कभी नहीं जा सकता।


१३ नवम्बर को प्रख्यात हिन्दी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्मदिवस भी था| ठीक विधानसभा की जूतमपैजार के कुछ  दिन बाद | मुक्तिबोध मूलतः मराठीभाषी थे, उनके भाई मराठी के जाने माने  कवियों में गिने जाते हैं | है न कमाल, एक भाई मराठी का  कवि दूसरा हिन्दी का|

सीखिए- सीखिए कुछ तो! वर्चस्व के लडैतो !!


नेट पर इन दिनों देशकाल ने इस अवसर पर मुक्तिबोध सप्ताह की आयोजना की हुई है|  इसके अर्न्तगत मुक्तिबोध पर केन्द्रित कई वैचारिक आलेख आप वहाँ समयानुसार पढ़ सकते हैं| स्मरणपूर्वक इस अवसर पर चर्चा के इस मंच पर उनकी एक बहुप्रसिद्ध लम्बी कविता `अँधेरे में' का एक बहुत छोटा-सा अंश आपको पढ़वाने का लोभ संवरण नहीं हो पा रहा -


http://cmsdata.webdunia.com/hi/contmgmt/photogalleryimg/Photo/1187B_Gajajnan-Madhav-Muktibodh.jpg
ज़िन्दगी के…
कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार;
आवाज़ पैरों की देती है सुनाई
बार-बार….बार-बार,
वह नहीं दीखता… नहीं ही दीखता,
किन्तु वह रहा घूम
तिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक,
भीत-पार आती हुई पास से,
गहन रहस्यमय अन्धकार ध्वनि-सा
अस्तित्व जनाता
अनिवार कोई एक,
और मेरे हृदय की धक्-धक्
पूछती है–वह कौन
सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई !
इतने में अकस्मात गिरते हैं भीतर से
फूले हुए पलस्तर,
खिरती है चूने-भरी रेत
खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह–
ख़ुद-ब-ख़ुद
कोई बड़ा चेहरा बन जाता है,
स्वयमपि
मुख बन जाता है दिवाल पर,
नुकीली नाक और
भव्य ललाट है,
दृढ़ हनु
कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति।
कौन वह दिखाई जो देता, पर
नहीं जाना जाता है !!
कौन मनु ?



हिन्दी के नाम पर हुई अ - वैधानिक ( ?)  जूताजोरी के बाद हिन्दी की उपयोगिता को लेकर अंग्रेजी वालों के मध्य एक परिचर्चा कराने का विचार अपने एन डी टीवी वालों को वालों समय की माँग जैसा लगा (सही पहचाना,  यह वही अर्थशास्त्रीय / बाजार की माँग और आपूर्ति वाली माँग है बंधु !)| तो उन्होंने बिना देर लगाए इस अनुष्ठान को करने करवाने के लिए अलग अलग दिशाओं से पुरोहितों को  ( न-न, वक्ताओं को) आमंत्रण भेजे|  अब इस अनुष्ठान का विधिविधान देखने से आप चूक गए हों तो उसकी बानगी देख सकते हैं -

एन डी टी वी (अंग्रेजी )चैनल में हिन्दी की उपयोगिता पर निरर्थक बहस


आज शाम आठ बजे, टी वी चैनल - एन डी टी वी -(अंग्रेजी) में परिचर्चा का एक कार्यक्रम आयोजित था । विषय था -
हिन्दी का मुद्दा।
xxx
सभी लोगों ने अंत में एकमत से अंग्रेजी को ही भारत की संपर्क भाषा घोषित किया और कहा की अंग्रेजी से ही भारत का उत्थान होगा और अंग्रेजी ही देश की एकता को सुरक्षित रख सकती है. खुले आम हिन्दी और भारतीय भाषाओं की धज्जिया उडाई गयी । भारतीयता का न ही कोई बोध था, किसी में और न ही हिन्दी के प्रयोग के बारे में कोई जानकारी ही थी उन लोगो के पास. सभी लोगों ने हिन्दी को ही देश की समस्याओ का मूल कारण बताया और इससे जल्द से जल्द निजात पाने का फरमान घोषित कर दिया । वाह रे वाह भारत के बुद्धिजीवी और वाह रे वाह एन डी टी वी चैनल। धन्य हो बरखादत्त .


देश -दुनिया और समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर निरंतर लोग सद्प्रयासों में लगे हैं क्योंकि स्त्री को उसका समुचित मान-सम्मान दिए बिना कोई भी वर्ग,जाति, देश, समाज कभी अपनी ह्रासमान स्थितियों से उबर ही नहीं सकता| हमारे देश में एक दबंग, सच्ची और ईमानदार महिला पुलिस अधिकारी हुआ करती थीं| `थीं' इसलिए, क्योंकि तेजस्वी महिलाओं की स्वायता को नष्ट कर के अंगूठालगाऊ महिलाओं को आगे करने वाली सिंहासनारूढ़ सत्ता ने उन्हें दरकिनार कर दिया और ...| खैर, वे आज भी सक्रिय हैं और बड़े बड़े काम कर रही हैं| एक समाचार उनके विषय में -




किरण बेदी को देश का मुख्य सूचना आयुक्त बनाने की मुहिम


निष्पक्ष और निडर पुलिस अधिकारी के तौर पर ख्यात रहीं किरण बेदी को देश का मुख्य सूचना आयुक्त बनाने की मुहिम को और बल मिल गया है। बेदी ने अब खुद सामने आ कर कहा है कि उन्हें यह पद मंजूर करने से कोई एतराज नहीं।..........................
किरण बेदी से अच्छी सख्सियत नही हो सकती भारत में इस पद को सम्हालने के लिए ।
अगर सरकार को अपनी पुराणी गलतियाँ सुधारनी है तथा सच की थोडी सी भी शर्म है तो तुंरत किरण बेदी को इस पद पर नियुक्त कर दे।
पर इस की उम्मीद कम ही दिखायी पड़ती है , क्योंकि सच की तो कोई कदर ही नहीं है सरकार के घर ।
जो कांग्रेस बेशर्मी से कौडा जैसे नेता को समर्थन देती रही वो सच और ईमान दारी तो चाहती ही नही



महिलाओं की ऐसी-तैसी और इज्जत-उतार-अभियान देश, बस्ती, गली, कूचे, घर-बाहर, बाज़ार, संस्था, देश, परदेस,  लिखने, पढने, जीने मरने जैसे हर नुक्कड़ और हर शिखर पर हर कहीं चल रहा है, चलता आ रहा है, बस उजागर होने की कसर बची रहती है सदा-सर्वदा| उजागर  हों भी क्यों ? अंततः वे निरंकुशों की लिप्सा शांत करने का सामान-भर ही तो हैं !! कोई देख कर, कोई बोल कर, कोई लिख कर, कोई नोच कर, कोई मार कर, कोई भोग कर सभी तो लगे हैं अपनी लिप्सापूर्ति में ( स्त्री की देह को माध्यम बना कर )| यहाँ भी वे भोगे जाने के लिए शापित हैं -


रेड कॉरिडोर में कराहता सेकेंड सेक्स

माओवादी संगठनों ने सामाजिक राजनीतिक बदलाव की मुहिम छोड़ कर महिलाओं का बर्बर उत्पीड़न शुरू कर दिया है उत्तर प्रदेश,बिहार झारखण्ड और छतीसगढ़ के सीमावर्ती आदिवासी इलाकों में जहाँ इंसान का वास्ता या तो भूख से पड़ता है या फिर बन्दूक से ,माओवादियों ने यौन उत्पीडन की सारी हदें पार कर दी हैं |माओवादी , भोली भाली आदिवासी लड़कियों को बरगलाकर पहले उनका यौन उत्पीडन कर रहे हैं फिर उन्हें जबरन हथियार उठाने को मजबूर किया जा रहा है वहीँ संगठन में शामिल युवतियों का ,पुरुष नक्सलियों द्वारा किये जा रहे अनवरत मानसिक और दैहिक शोषण बेहद खौफनाक परिस्थितियां पैदा कर रहा है वो चाहकर भी न तो इसके खिलाफ आवाज उठा पा रही है और न ही अपने घर वापस लौट पा रही हैं |इस पूरे मामले का सर्वाधिक शर्मनाक पहलु ये है कि जो भी महिला कैडर इस उत्पीडन से आजिज आकर जैसे तैसे संगठन छोड़कर मुख्यधारा में वापस लौटने की कोशिश करती हैं ,उनके लिए पुलिस बेइन्तहा मुश्किलें पैदा कर दे रही है ।शांति, बबिता, आरती, चंपा, संगीता...ये वो नाम हैं जिनसे चार -चार राज्यों की पुलिस भी घबराती थी। लेकिन आज पीडब्ल्यूजी एवं एमसीसी की ये सदस्याएं, पुरूष नक्सलियों के दिल दहलाने वाले उत्पीड़न का शिकार हैं।  







आप ने अभिनेता ओमपुरी के जीवन प्रसंगों पर केन्द्रित उनकी पत्नी नंदिता की पुस्तक "अनलाइकली हीरो: ओम पुरी" को लेकर हो रही चर्चाओं के विषय में सुना पढ़ा होगा ही| मेरी चिंता इस सब के बीच पति पत्नी संबंधों के विघटन को लेकर थी| इस लेख से अधिक विस्तार व तथ्यपूर्वक घटनाक्रम की जानकारी मुझे श्री आलोक तोमर जी द्वारा उनके मध्य समझौता कराने की पहल से जुड़े घटनाक्रम द्वारा निरंतर मिल रही थी| कल दोपहर तोमर जी ने जैसे ही मुझे सूचना दी कि ओमपुरी और नंदिता दोनों अभी यहीं बैठे हैं और स्थिति यह है कि दोनों के मध्य सब ठीक हो गया है व अभी अभी पति पत्नी ने सहज भाव से परस्पर एक दुसरे को चूमा भी है| पारिवारिक विघटन की छाया एक दम्पती के परिवार से टल जाने के हर्षातिरेक से भर मैंने बात करनी चाही तो उधर से सीधे नंदिता से ही चैट हो गयी और यह भी पता चला कि विमोचन के समय अब ओमपुरी ही नंदिता की पुस्तक के अंशों का पाठ भी करेंगे| यह घटना भले ही किसी के एकदम वैयक्तिक जीवन से संबंद्ध हो, किन्तु यह तो प्रमाणित करती ही है कि पति पत्नी संबंधों के बीच ज़रा-सा बित्ते-भर अवकाश दीखते ही नज़ारा करने वालों और उसे खाइयों का रूप देने में बाहर से कोई कसर नहीं छोड़ता| कोई विरला ही अपना होता है, जो इन का लाभ उठाए बिना उन्हें वापिस साथ जोड़ मिला सकता है| ओमपुरी जी, नंदिताजी और तोमर जी को बधाई देने का अवसर है यह|





ऐसे प्रसंगों के लेखन और बाज़ार वाले समीकरण पर केन्द्रित एक आलेख कबाड़खाना पर आया है, उसे आप अवश्य बाँचें -

 

अंतरंग संबंधों पर लेखन : अवधारणा और बाजार




आत्मकथा के आयाम में बहुत चितेरे होते हैं, जो पाठकों को आकर्षित करते हैं, किंतु उससे कहीं अधिक आकर्षित करते हैं समाज और निजी जिंदगी के प्रवाह में डूबते-उतराते रिश्ते। संबंधों की अंतरंगता हर किसी के जीवन के खास पहलू होते हैं। उन संबंधों की याद में लोग भावुक होते हैं, जिंदगी से तृष्णा व वितृष्णा होती है और फिर किसी हवा के झोंके के साथ उससे गाहे-बगाहे सामना भी करना पड़ता है।
पाश्चात्य संस्कृति में पति-पत्नी के रिश्ते की बुनियाद या हकीकत जो भी हो लेकिन भारतीय परिवेश में इसके मायने अहम हैं। साहित्य, फिल्म के अलावा राजनीति की चमचमाती जिंदगी में संबंधों की अपनी अहमियत है और अंतरंग प्रसंगों को चटखारे लेने की परंपरा भी नई नहीं है। यही कारण है कि पत्रकार नंदिता पुरी द्वारा लिखी गई किताब ‘अनलाइकली हीरो : द स्टोरी ऑफ ओमपुरी’ लोकार्पण होने के पहले ही सुर्खियां बटोर रही है और ओमपुरी के बयान के कारण विवादों की चपेट में है। किसी की जिंदगी के महत्वपूर्ण और पवित्र हिस्सों को सस्ते और चटखारे वाली गॉसिप में बदलना किसी विश्वासघात से कम नहीं है।







अब पुनः आते हैं अपने ब्लॉगजगत के  घटनाक्रम में | मुझे गत दिनों रह रह कर एक कथा बहुत याद आती रही, जब  दो शिष्यों ने गुरु की सेवा को आधा आधा बाँटने  के चक्कर में गुरु को ही आधा आधा बाँट लिया था और सोते गुरु को मक्खी से बचाने की चेष्टा में गुरु जी का देह-भंग कर डाला था| ऐसे ही प्रसंगों के लिए नीतिकार कह गए हैं कि मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु अधिक अच्छा होता है| दलों में बँटे शिष्यों की चाँव-चाँव सुन कर यह कथा बार बार स्मरण हो आती रही|  बुरा भी लगता रहा | मैं अथवा मेरे जैसे कई लोग जिस पहल को नहीं कर सके उस पहल का दायित्व लिया खुशदीप ने  ब्लॉगिंग की 'काला पत्थर'... लिख कर -





मेरी उस फेहरिस्त में अनूप शुक्ल जी भी हैं और गुरुदेव समीर लाल जी समीर भी...ये मेरी अपनी पसंद है...ये मेरे अपने आइकन है....मैंने एक प्रण लिया...जिस तरह का स्तरीय और लोकाचारी लेखन मेरे आइकन करते हैं...उसी रास्ते पर खुद को चलाने की कोशिश करूंगा...अगर एक फीसदी भी पकड़ पाया तो अपने को धन्य समझूंगा...धीरे-धीरे ब्लॉगिंग करते-करते मुझे तीन महीने हो गए...इस दौरान दूसरी पोस्ट और टिप्पणियों को भी मुझे पढ़ने का काफी मौका मिला...जितना पढ़ा अनूप शुक्ल जी और गुरुदेव समीर के लिए मन में सम्मान और बढ़ता गया...लेकिन एक बात खटकती रही कि दोनों में आपस में तनाव क्यों झलकता है...या वो सिर्फ मौज के लिए इसे झलकते दिखाना चाहते हैं....क्या ये तनाव ठीक वैसा ही है जैसा कि चुंबक के दो सजातीय ध्रुवों के पास आने पर होता है...जितना इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश की, मेरे लिए उतनी ही ये रूबिक के पज्जल की तरह विकट होती गई...जैसा पता चलता है कि समीर जी भी शुरुआत में चिट्ठा चर्चा मंडल के साथ जुड़े रहे....किसी वक्त इतनी नजदीकी फिर दूरी में क्यो बदलती गई...
xxx
चिट्ठा चर्चाओं के ज़रिए उछाड़-पछाड़ के खेल से हिंदी ब्लॉगिंग में राजनीति के बीजों को पनपने ही क्यों दिया जाए...राजनीति किस तरह बर्बाद करती है ये तो हम पिछले 62 साल से देश के नेताओं को करते देखते ही आ रहे हैं..






इस प्रकरण का सबसे अच्छा पक्ष समीरलाल जी का बड़प्पन है | वह इसलिए क्योंकि स्थापित हो जाने, या स्वयं गुरु बन जाने, या किसी स्वार्थ के बिना किसी को सार्वजनिक रूप से अपने से अधिक महत्व देना व अपने `तत्सम्बन्धी' निर्माण में किसी के योगदान को रेखांकित करना वास्तव में प्रशंसनीय है|  अधिकाँश लोग ऐसी विनम्रता केवल स्थापित होने से पूर्व किसी न किसी स्वार्थ वश ही दिखाते हैं|  परन्तु समीर जी और अनूप जी के मध्य ऐसा कोई कारण नहीं है, क्योंकि समीर जी स्थापित और लोकप्रिय हो चुके हैं| ऐसे में उनकी ये स्वीकारोक्तियाँ उनका बड़प्पन ही दिखाती हैं| अतः  इस का स्वागत किया जाना चाहिए तथा यह आशा भी कि भविष्य में लोग अपने व्यक्तिगत मन मुटाव को सार्वजनिक मंचों पर अथवा अपने से इतर लोगों के बीच हँसी या विवाद का रूप नहीं लेने देंगे|






चर्चा बहुत लम्बी व समय बहुत अधिक हो गया है | इन गंभीर बातों के साथ आपको छोड़ जाने का जी नहीं होता| सो पहले आप श्रीश जी की एक कविता का रसास्वादन करें -





Shreesh Pathak



' सोचता हूँ; कितना कठिन समय है, अभाव, परिस्थिति, लक्ष्य...
'हुंह; सोचने भी नहीं देते, सब मुझसे ही टकराते हैं और घूरते भी मुझे ही हैं..'
समय कम है और समय की मांग ज्यादा,
जल्दी करना होगा..!
'ओफ्फो..! सबको जल्दी है..कहाँ धकेल दिया..समय होता तो बोलता भी मुझे ही...'

इतने संघर्षों में मेहनत के बाद भी..
आशा तो है पर..डर लगता है...
जाने क्या होगा..?


कविता को   यहाँ   पूरा पढें |




अनंतिम 


और सप्ताह में टाईमपास करने की समस्या का निदान काजल कुमार जी के इस कार्टून को देख कर स्वतः ढूँढ लें  क्योंकि हमें चर्चा करते हुए पूरे ७ घंटे हो गए हैं | अगले सप्ताह सामना होने तक आपके लिए सर्वमंगल की कामनाओं के साथ विदा लेती हूँ






Kajal Kumar

आओ टाइम पास का नया तरीक़ा दिखाऊं.














पुनश्च : चर्चा के प्रारंभ में "कल १४ नवम्बर था"  क्योंकि 

(१)  -   ५.३० घंटे पीछे हूँ
और
(२) - चर्चा भी १५ की सायं लिखी गयी है |




समय लिखेगा इनका भी इतिहास


गर्व का हजारवाँ चरण : प्रत्येक ज्ञात- अज्ञात को बधाई

Author: कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee | Posted at: Tuesday, November 10, 2009 | Filed Under: ,  



funny hindi Orkut scraps

आज का दिन बहुत विशेष है और इसे संयोग ही कहा जाएगा कि इस दिन की चर्चा का दायित्व अनायास ही मुझे करने का सुयोग मिला है | जिन कारणों से आज का दिन ऐतिहासिक है, उनमें से कुछेक का उल्लेख क्रमवार यहाँ किए जाने से पूर्व  इस चर्चा-मंच की परिकल्पना करने वाले संस्थापक, सभी चर्चाकार साथियों, इसकी साज सज्जा और रखरखाव आदि में प्रारंभ से आज तक अपने योगदान से निरंतर सहयोग देने वाले  हितैषी व अभिन्न शुभचिंतकों, मित्रों, सहृदय पाठकों, अपनी राय से अवगत कराने वाले बंधुओं व किसी भी रूप में इस से संबंद्ध प्रत्येक ज्ञात- अज्ञात व्यक्तित्व को आज मैं बधाई और धन्यवाद देना चाहती हूँ क्योंकि चर्चा के इस मंच पर आज मैं उपस्थित हुई हूँ चिट्ठाचर्चा की यह १००० वीं प्रस्तुति लेकर | इसका समस्त श्रेय इसके चर्चा मंडल के श्रम, समर्पण, निरंतरता, दायित्वबोध, पारस्परिकता, समयबद्धता, नूतनता के प्रति उत्साह, निरपेक्षता और निष्पक्षता को जाता है| प्रारंभ से व समय समय पर इसमें जो नए साथी जुड़ते गए, वे आज भी जुड़े हैं| भले ही वे आज नियमित रूप से चर्चा के लेखन से नहीं जुड़े हुए किन्तु वे आज भी इसकी चर्चा मंडली के स्थाई सदस्य हैं और चर्चा के इस मंच का मान हैं| उन सभी के प्रति यह मंच आभारी है, कृतज्ञ है, धन्यवादी है| .... और उस से भी बढ़ कर आभारी है  हिन्दी के नेट लेखन का तथा इस चर्चा मंच को जीवंत बनाए रखने वाले उन स्नेही साथियों का जिन्होंने  नित आकर इसे अपना दुलार, स्नेह सम्मान दिया|


आने वाले समय में कई और ऐसे मंचों की आवश्यकता अनुभव होगी, वे गठित होंगे, हो रहे हैं, स्वाभाविक है; किन्तु चर्चा के इस मंच की उपादेयता, ऐतिहासिकता व कालक्रम में इसकी सर्वांगीणता निस्संदेह है, प्रामाणिक है, सर्वविदित है,  चिरकालिक   और स्थाई है| इसमें कोई दो राय नहीं हो सकतीं| चर्चा के इस मंच के इतिहास को इन  अर्थों में बारम्बार दुहराना प्रासंगिक ही नहीं अवश्यम्भावी भी है कि आने वाले समय में इस नए इलेक्ट्रोनिक माध्यम को जनप्रिय बनाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपनी परम्परा ( भले ही वह चार-छह-आठ-दस वर्ष पुरानी ही क्यों न हो) विदित होनी चाहिए|  इन सन्दर्भों में  उस इतिहास  का खाका कुछ ऐसा है -





https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi_MSXeISHcx2rbAG3Iehwri-FolPgzBkvZ7euPAdjFRO7F8p8nOZ_yRjdgyl4dIa8D81YiwcTjg2_6SFsDIUV8grR_ZAlqUsLwq2MosjyJkXNJ0IHyTR2X3tGKfh4eNQShZ7mXJh2I4SbX/(2)_thumb.jpgभारतीय ब्लाग मेला: सन २००४ के अखिरी दिन थे। उन दिनों हम लोगों को पता चला कि अंग्रेजी भाषा के चिट्ठाकार भारतीय ब्लाग मेला का आयोजन करते हैं। इसमें लोग बारी-बारी से ब्लागर ब्लागर ब्लाग मेला का आयोजन करते थे। जिस ब्लागर को आयोजन करना होता उसके ब्लाग पर लोग अपनी पोस्ट के लिंक दे देते और फ़िर वह उसके बारे में लिखता था। उदाहरण के लिये आप देखिये यजद का आयोजन जिसमें अतुल अरोरा, जीतेंन्द्र चौधरी के साथ-साथ मैंने भी अपनी पोस्ट के लिंक दिये थे। इसके बाद उसकी चर्चा की थी यजद ने अपने ब्लाग पर।

हम बड़े खुश हुये कि अंग्रेजी ब्लागर के मेले में हम भी अपनी दुकान चला रहे हैं। उन दिनों हिंदी के ब्लागर कम थे सो हम लोग भिड़ने के लिये अंगेजी ब्लागरों पर निर्भर थे। कोई न कोई बात हो जाती कि बहस करते रहते।

अंग्रेजी के ब्लागरों के अलावा एक बार (३७ वें संस्करण) ब्लाग मेला का आयोजन देबाशीष ने भी किया था। देबाशीष कुछ व्यक्तिगत चिट्ठे ब्लाग मेला के नियम के अनुसार शामिल नहीं किये थे।

सुनामी मेला और बहसबाजी: जनवरी २००५ का पहला ब्लाग मेला मैडमैन के जिम्मे था। सुनामी तूफ़ान हाल ही में आ के गया था। इसलिये मैडमैन ने सुनामी स्मृति ब्लाग मेला आयोजित किया। पहले की तरह हिंदी ब्लागर्स ने अपनी पोस्ट नामीनेट की। मैडमैन ने निम्नकारण बताते हुये हिंदी ब्लाग की चर्चा करने से मना कर दिया:-

That's it for this week, folks. I know some Hindi blog entries were nominated, but I've left them out of this mela, not because I'm a snobbish bastard, but because:


1) I studied Hindi for 10 years at school, and speak the language fluently, but haven't read any big chunks of Hindi since 1990. So my reading speed has reduced to a crawl.


2) The thin strokes of the text coupled with the low resolution of a PC monitor made it even harder to read the entries.


3) Some of the spelling mistakes (mostly misplaced matras) didn't help either.

करेले पर नीम चढ़ा कमेंट किया किसी सत्यवीर ने। उसने लिखा-
I agree that hindi blogs should have a different blog mela. It is better to keep regional languages at a different forum.

बस फ़िर क्या था। बमचक मच गई। हिंदी-अंग्रेजी बबाल मचा। देबाशीष(Indiblogger) जीतेंन्द्र चौधरी और इंद्र अवस्थी )
ने इसका विरोध किया। अंतत: खिसिया के मैंड्मैन ने अपना कमेंट का बक्सा बन्द कर दिया।

चिट्ठाचर्चा की शुरुआत :इसके बाद अतुल ने गुस्से से फ़नफ़नाती हुई पोस्ट लिखी- तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ? । मैंने मौज ली अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है । लेकिन हमें यह भी लगा कि हर समय हा हा, ही ही करना ठीक नहीं तो हम गम्भीर हो लिये। हमने चिट्ठाचर्चा ब्लाग शुरू किया। स्वागतम पोस्ट में हमने लिखा था-
भारतीय ब्लागमेला के सौजन्य से पता चला कि हिदी एक क्षेत्रीय भाषा है.यह भी सलाह मिली कि हिंदी वालों को अपनी चर्चा के लिये अलग मंच तलाशना चाहिये.इस जानकारी से हमारेमित्र कुछ खिन्न हुये.यह भी सोचा गया कि हम सभी भारतीय भाषाओं से जुड़ने का प्रयास करें.

इसी पोस्ट में हमने हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं के ब्लाग की चर्चा भी करने का मन बनाया था। कुछ दिन अंग्रेजी, सिंधी, गुजराती और मराठी के चिट्ठों की चर्चा करते भी रहे।

शुरुआती प्रतिक्रियायें: शुरुआत चिट्ठाचर्चा की अच्छी ही रही। हिंदी के अलावा अंग्रेजी के ब्लागरों ने इसमें रुचि दिखाई। प्रसेनजित ने अगले भारतीय ब्लाग मेले में इसका जिक्र किया। शायद आलोक ने कहा था कि वे तमिल चिट्ठों की चर्चा का काम देखेंगे।

शुरुआत के दिन: शुरू के दिनों में हम चर्चा एक माह में एक बार करते थे। फ़िर शायद पन्द्रह दिन में करते थे। सब मिलकर चर्चा करते थे। देबाशीष, अतुल, जीतेंद्र और मैं। आप शुरुआत के चिट्ठे देखें तो आपको हिदी ब्लाग जगत के साथ भारतीय ब्लाग जगत की तमाम बेहतरीन पोस्टें देखने को मिल जायेंगी।

मन उचट गया: शुरुआत के दिन अच्छे लगे। फ़िर जब संकलक आ गये तब लगा कि हम चर्चा करके कौन सा तोप चला रहे हैं। लोगों को ब्लागस के बारे में पता तो चल ही जाता है संकलकों से। इसके बाद धीरे-धीरे हमारे आलस्य ने हमारे उत्साह पर विजय पायी और चिट्ठाचर्चा हो गयी धरासायी।

फ़िर उछलकूद लेकिन गुप्त वाली: फ़िर देबाशीष ने कहा कि चिट्ठाविश्व के लिये चर्चा करो। चिट्ठाविश्व हिंदीब्लाग जगत का पहला संकलक है शायद जिसके बाद नारद , ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत आये। हम एक गुप्त ब्लाग में चर्चा करते और वह संक्षिप्त चर्चा चिट्ठाविश्व में पोस्ट हो जाती। अच्छा लगा कुछ दिन। फ़िर धीरे-धीरे वह भी बंद हो गया।

चिट्ठाचर्चा का अपहरण: इन्हीं दिनों शायद सितम्बर ,२००५ में किसी शहजादे ने चिट्ठाचर्चा का अपहरण कर लिया। बाद में मित्रों के प्रयासों से, शायद गूगल को भी लिखा गया था ,चिट्ठाचर्चा की वापसी हुई। लेकिन जब वापसी हुई तब तक........

पूरा वृत्तांत पढने के लिए आप को यहाँ जाना होगा, यहाँ आपको निम्न बिन्दुओं पर जानकारी मिलेगी -
  • दनादन चर्चा, महारथी चर्चाकार
  •  नारद की अनुपस्थिति में चर्चा
  • एक लाइना, आलोक पुराणिक और चिट्ठाचर्चा
  • नये चर्चाकार, विविधता 
  • बदलता समय और चिट्ठाचर्चा का स्वरूप  
  • फ़िलहाल की चिट्ठाचर्चा मेरी नजर में 



आप सभी से निवेदन है कि चर्चा के इस मंच को अपना स्नेह इसी अविचल  भाव से देते रहें व सद्भाव बनाए रहें|


 बधाई और धन्यवाद के क्रम से आगे बढ़ते हैं |





अभी अभी शलाका पुरुष प्रभाष जी हमारे मध्य नहीं रहे हैं| उन पर हिन्दी ब्लॉग जगत ने कई सुचिंतित व मार्मिक लेख लिखे| वह क्रम अभी भी चल रहा है| इसी कड़ी में जनसत्ता में प्रकाशित प्रभाष जी के सुपुत्र का यह आलेख मुझे पिताजी के माध्यम से पढने को मिला|










कल एक इमेल  सन्देश मुझे  वरिष्ठ व प्रख्यात भाषावैज्ञानिक प्रो. सुरेश कुमार जी का प्राप्त हुआ, जिसे पढ़ कर मुझे रोमांच हो आया| उसका अविकल पाठ यहीं दे रही हूँ -

प्रभाष जी नहीं रहे. उनके बिना हिन्दी पत्रकारिता पहले जैसी नहीं रहेगी. ’जनसत्ता’ के (मुख्यतया)7 नवम्बर के अंक में विभिन्न व्यक्तियों और संस्थाओं ने उन्हें जैसे याद किया उसकी रिपोर्टें छपी हैं. उनमें प्रभाष जी के लिए प्रयुक्त विशेष्य विशेषणों की एक सूची नीचे दी जा रही जिससे उनके केन्द्रीय व्यक्तित्व की एक झलक मिलती है. यह झलक उस बॄहत्तर प्रतिमा का अंश है जिसने ’जनसत्ता’ के 8 नवम्बर के अंक में (पृष्ठ 6-7 पर) उनके विषय में प्रकाशित लेखों में (जिन्हें ’विशेषण  डिस्कोर्स’ कहा जा सकता है) आकार ग्रहण किया है. सूची इस प्रकार है :

  • अभिभावक जैसा सम्पादक
  • हिन्दी पत्रकारिता का सूर्य
  • हिन्दी पत्रकारिता का शिखर पुरुष
  • हिन्दी पत्रकारिता का युग पुरुष
  • पत्रकारिता का शलाका पुरुष
  • पत्रकारिता का सशक्त स्तम्भ
  • निर्भीक पत्रकारिता का सशक्त स्तम्भ
  • पत्रकारिता का महान स्तम्भ
  • जनपक्षीय पत्रकारिता का महान और मज़बूत स्तम्भ
  • देश का वरिष्ठ पत्रकार
  • विलक्षण और प्रेरक पत्रकार
  • मूर्धन्य पत्रकार
  • उत्कृष्ट पत्रकार
  • निष्पक्ष पत्रकार
  • निष्पक्ष और बेबाक पत्रकार
  • हिन्दी पत्रकारिता का बडा हस्ताक्षर
  • खेल पत्रकारिता का भीष्म पितामह
  • हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधाओं में से एक
  • उच्च कोटि का लेखक व चिन्तक
  • सुविख्यात, निडर व उत्कृष्ट लेखक
  • अपनी बेजोड लेखन शैली के लिए विख्यात
  • भाषा का जादूगर
  • शब्द और भाषा का जादूगर
  • लोकतन्त्र का सच्चा प्रहरी
  • असाधारण बौद्धिक और पेशेवर निष्ठा वाला
  • असाधारण बौद्धिक साहस का धनी
  • सर्वमान्य बुद्धिजीवी
  • बेलाग बोलने वाला बुद्धिजीवी
  • पत्रकारों की पूरी पीढी के लिए प्रेरणा स्रोत
  • प्रेरणा पुरुष
  • जन-पुरुख
 -     सुरेश कुमार
Prof Suresh Kumar
A-45, Welcome Apartments
Sector 9, रोहिणी
Delhi-110085




व्यक्तिगत रूप से प्रभाष जी पर केन्द्रित  जिन लेखों ने मुझे इन दिनों विशेष प्रभावित किया वे हैं -

प्रभाष जोशी  :  समय का सबसे समर्थ हस्ताक्षर

अभी न होगा मेरा अंत 

प्रभाष जोशी के न होने का अर्थ 

प्रभाष जोशी हिंदी के अंतिम समर्पित सेनानी




आज कवि सुदामा पाण्डेय धूमिल का जन्मदिवस है | रोचक (?) तथ्य यह है कि नेट पर तीन स्रोतों पर जाने से आप को जन्मतिथि को लेकर तीन अलग अलग स्थितियाँ दिखाई देंगी, जिन्हें मैंने नीचे सहेज दिया है | आप इस अवसर पर उनकी कुछ कविताओं की बानगी देखिए और फिर नीचे दी गयी वे प्रतिकृतियाँ भी |






(१)

मेरे सामने
तुम सूर्य - नमस्कार की मुद्रा में
खड़ी हो
और मैं लज्जित-सा तुम्हें
चुप-चाप देख रहा हूँ
(औरत : आँचल है,
जैसा कि लोग कहते हैं - स्नेह है,
किन्तु मुझे लगता है-
इन दोनों से बढ़कर
औरत एक देह है)


(२)

मेरी भुजाओं में कसी हुई
तुम मृत्यु कामना कर रही हो
और मैं हूँ-
कि इस रात के अंधेरे में
देखना चाहता हूँ - धूप का
एक टुकड़ा तुम्हारे चेहरे पर
(3)


रात की प्रतीक्षा में
हमने सारा दिन गुजार दिया है
और अब जब कि रात
आ चुकी है
हम इस गहरे सन्नाटे में
बीमार बिस्तर के सिरहाने बैठकर
किसी स्वस्थ क्षण की
प्रतीक्षा कर रहे हैं
(४)
न मैंने
न तुमने
ये सभी बच्चे
हमारी मुलाकातों ने जने हैं
हम दोनों तो केवल
इन अबोध जन्मों के
माध्यम बने हैं




धूमिल की कुछ कविताओं का अंग्रेजी रूपान्तर पढने का चाव रखने वालों के लिए भी नेट पर सामग्री है|




पुस्तकें खरीदने के लिए सुदूर बैठे पाठक अनुपलब्धता की बात नहीं कह सकते|




नेट पर जन्मतिथियों की स्थिति 



यहाँ (१) ....................................................        ................        .... (२)

जन्म: 09 नवम्बर 1936
निधन: 10 फरवरी 1975
उपनाम
धूमिल
जन्म स्थान
खेवली, जिला वाराणसी, उत्तरप्रदेश
कुछ प्रमुख
कृतियाँ

संसद से सड़क तक (1972), कल सुनना मुझे, सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र (1983)
विविध
कल सुनना मुझे काव्य संग्रह के लिये 1979 का साहित्य अकादमी पुरस्कार
जीवनी
धूमिल / परिच
Sudama Panday 'Dhoomil' (सुदामा पांडेय 'धूमिल') (November 7, 1936February 10, 1975, known mostly as Dhoomil, was a renowned Hindi poet from Varanasi, who is known for his revolutionary writings and his 'protest-poetry' [3][4], along with Muktibodh.
Known as the angry young man of Hindi poetry due to his rebellious writings [5], during his lifetime, he published just one collection of poems, 'Samsad se Sarak Tak', 'संसद से सड़क तक' (From the Parliament to the Street), but another collection of his work, titled "Kal Sunana Mujhe" 'कल सुनना मुझे' was released posthumously, which in 1979, went on to win the Sahitya Akademi Award in Hindi [6][7].




(३)
-   अब यहाँ हिन्दी पृष्ठ पर देखें | यहाँ अभी पृष्ठ बनने की प्रक्रिया में है, सो जन्मतिथि का उल्लेख नहीं है|


 

अस्तु, आगे बढ़ते हैं |







हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए आज का दिन कई अर्थों में महत्वपूर्ण है  क्योंकि आज लक्ष्मीमल्ल सिंघवी का भी जन्म दिवस है |





डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ने हिंदी के वैश्वीकरण और हिंदी के उन्नयन की दिशा में सजग, सक्रिय और ईमानदार प्रयास किए। भारतीय राजदूत के रूप में उन्होंने ब्रिटेन में भारतीयता को पुष्पित करने का प्रयास तो किया ही, अपने देश की भाषा के माध्यम से न केवल प्रवासियों अपितु विदेशियों को भी भारतीयता से जोड़ने की कोशिश की। वे संस्कृतियों के मध्य सेतु की तरह अडिग और सदा सक्रिय रहे। वे भारतीय संस्कृति के राजदूत, ब्रिटेन में हिन्दी के प्रणेता और हिंदी-भाषियों के लिए प्रेरणा स्रोत थे। विश्व भर में फैले भारत वंशियों के लिए प्रवासी भारतीय दिवस मनाने की संकल्पना डॉ. सिंघवी की ही थी। वे साहित्य अमृत के संपादक रहे और अपने संपादन काल में उन्होने श्री विद्यानिवास मिश्र की स्वस्थ साहित्यिक परंपरा को गति प्रदान की। भारतीय ज्ञानपीठ को भी श्री सिंघवी की सेवाएँ सदैव स्मरण रहेंगी।[२]


कल का दिन हिन्दी के नाम पर कलंक लगाने वाले इतिहास का एक अन्यतम दिवस रहा| जब हिन्दी में शपथ लेने पर विधान सभा में हाथापाई और चाँटाबाजी  हो गयी| मन बार बार यही कहने का होता है ( जो बात निराला जी ने मुंशी प्रेमचंद  के अंतिम दिनों में हुई भेंट के संस्मरण लिखते समय कही थी) .... जाने दीजिए, निराला जी के शब्द क्या दुहराऊँ  .... अपने मुँह से क्या कहूँ अब!


  हिन्दी की इस दशा / दुर्दशा का सारा पाप हमारा है | हमने अपने स्वार्थपने, नीचता, आत्मकेंद्रिकता, छल प्रपंच और कलुष से माँ का चीर तार तार कर दिया है | कोई भी भाषा अपने बोलने वालों के चरित्र की वाहक होती है| किसी भी भाषा -समाज का चरित्र देखना हो तो उसकी भाषा की स्थिति को देख लीजिए....... |


यह धिक्कार हम पर है कि हमारी माँ बीच चौरस्ते निर्वस्त्र हुई जाती है और हम अपने अहम् पोसते केवल दूसरों की रेखाएँ छोटी करने की वितंडा में लीन हैं| ईश्वर हमें सद्बुद्धि दे |



इसी दुर्घटना पर आधारित एक लेख पढ़ा जाना चाहिए -


महाराष्ट्र विधानसभा के नये सत्र के पहले दिन मनसे के विधायकों ने मराठी भाषा के नाम पर ,हिन्दी में शपथ लेने वाले सपा विधायक अबू आजमी के साथ जो गुंडागर्दी की है. उसकी जितनी निन्दा की जाय कम है, ये न केवल भारतीय संविधान का अपमान है बल्कि हिन्दी भाषा के लिये यह बहुत बडा खतरा बन गया है.उस भाषा के लिए जो देश के लाखों- करोडो लोगो की अपनी भाषा है. आज जब अंग्रेजी हमारी भाषाओं के लिये खतरा बन गई है, उस समय सभी भारतीय भाषाओं को मिलकर इसके खिलाफ़ लड्ना चाहिये. इस तरह की हरकतें न केवल हमारी अखंडता और एकता में अनेकता को खत्म कर रही है. साथ ही जनसामान्य के बीच खाई भी पैदा कर रही है.



कुछेक पठनीय लेख और देखें -

 स्त्रियों को कु-पाठ पढाने की घिनौनी कोशिश...

एक-दूसरे के साथ जीने-मरने की कसमे क्या केवल कागजी बातें है...? सब मरे यह ज़रूरी नहीं लेकिन कुछ लोग ऐसे करते है तो उसकी आलोचना नहीं की जानी चाहिए. किसी को चिता में जबरन बिठाने का कोई अग्यानी ही समर्थन करेगा.  जोशी जी ने साथ-साथ जीने-मरने की उसी भावना का सम्मान किया था, जो अब लुप्त होती जा रही है. मै भी इस भावना का सम्मान करता हूँ. भविष्य में भी करता रहूँगा. शर्म तो उन नकली लोगो को आनी चाहिए जो समाज को-प्रगतिशील मूल्यों  के नाम पर-दिशाहीन कर रहे है. औरतो को गलत पाठ पढ़ा रहे है. मै ऐसे लोगो के खिलाफ लिखता रहूँगा और शर्मिंदा होता रहूँगा कि समाज का सत्यानाश करने वाले भी जिंदा है. वे लोग अपने स्टार पर मुझे भी गरियाते रहेंगे  कि 'ये पिछडा -गंवार कहाँ से आ गया, जो अनैतिकता के दौर में नैतिकता का कुपाठ पढा  रहा है? छिः...इसे तो मध्य युग में होना था', लेकिन मै हूँ aur अपनी मुहिम में लगा हुआ हूँ.



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सुकृति आर्ट गैलरी में कलाकारों की कृतियां डिस्प्ले की गयी थीं। उदघाटन की रस्म भंवरी देवी ने अदा की। पर ये रस्म अदायगी नहीं थी। पुरुष को समझने की कोशिश करते चित्रों की मुंहदिखाई की रस्म भंवरी से बेहतर कौन निभाता। वैसे भी, उन्होंने पुरुष की सत्ता को जिस क़दर महसूस किया है, शायद ही किसी और ने किया हो पर अफ़सोस… अगले दिन मीडिया ने उनका परिचय कुछ यूं दिया, फ़िल्म बवंडर से चर्चा में आयीं भंवरी…!
+++
इस मौक़े पर चर्चित संस्कृतिकर्मी हरीश करमचंदानी ने 15 साल पुरानी कविता सुनाई, मशाल उसके हाथ में। भंवरी देवी के संघर्ष की शब्द-यात्रा।
+++
 [[और अंत में... एक बड़े अधिकारी की पत्नी ने कहा, भंवरी देवी को प्रदर्शनी की शुरुआत करने के लिए क्यों बुलाया गया? मुझसे कहतीं, मैं किसी भी सेलिब्रिटी को बुला देती! अफ़सोस कि ऐसा कहने वाली खुद को कलाकार भी बताती हैं। (कानों सुनी)]]



कुछ दिन से कई ईमेल द्वारा एक आह्वान की सूचना मिल रही थी आज सोचा जा कर उसे देखा जाए| जो देखा वह यह पाया -





This message from the youth of the community should be read in its letter and spirit that while we want to go home we do not want to sit with the government who trivialises the issue of our return.It isnt as if we had merrily left one day only to return now because they will pay us 7.5 lac rupees.Make no mistake about it.Let the government first show some resolve.Let them fast track cases related to killing of Kashmiri Pandits.Let there atleast be one conviction.Let them de-encroach the land of our shrines.




कवि प्रियंकर की वैवाहिक वर्षगाँठ की सूचना मुझे उन्हीं द्वारा अपनी धर्मपत्नी के लिए जारी इस रोचक और स्नेह पूर्ण सन्देश से मिली

Priyankar PaliwalPriyankar Paliwal सहजीवन के शानदार बीस वर्ष और प्रमिला के लिये एक गीत :

Twenty years of conjugal bliss and a song for Pramila :




आप ने सबसे ऊपर लगा "चल-चित्र" देखा होगा उसका सम्बन्ध भी खोज रहे होंगे तो बात यह है कि वह अनिमेटेड चित्र  मानो इनकी भावना को ही व्यक्त कर रहा है जब ये कहते हैं कि -

अपने तमाम गुस्से के साथ मैं बाहर आया। बाहर आकर मैनें मन ही मन यह इच्छा जाहिर की कि काश यह एक सामान्य फिल्म निकल जाये। इस फिल्म मे वह सब वहो ही नहीं जिसकी इच्छा लिये मैं एक सौ चालीस – पचास किलोमीटर आया था। मैं सोचता रहा कि काश यह डॉक्युमेंट्री फिल्म निकल जाये। काश सीरी फोर्ट मे अजीबोगरीब नियम लगाने वाले का लैपटॉप खो जाये, तमाम।



स्वगत  पर कुछ दिन पूर्व आई प्रविष्टि पर भी एक दृष्टि डालें -



संदेह - दृष्टि
बोर्हेस ने ‘द रिडल ऑफ पोएट्री’ में कहा है- ‘सत्तर साल साहित्य में गुज़ारने के बाद मेरे पास आपको देने के लिए सिवाय संदेहों के और कुछ नहीं।‘ मैं बोर्हेस की इस बात को इस तरह लेता हूं कि संदेह करना कलाकार के बुनियादी गुणों में होना चाहिए। संदेह और उससे उपजे हुए सवालों से ही कथा की कलाकृतियों की रचना होती है। इक्कीसवीं सदी के इन बरसों में जब विश्वास मनुष्य के बजाय बाज़ार के एक मूल्य के रूप में स्थापित है, संदेह की महत्ता कहीं अधिक बढ़ जाती है। एक कलाकार को, निश्चित ही एक कथाकार को भी, अपनी पूरी परंपरा, इतिहास, मिथिहास, वर्तमान, कला के रूपों, औज़ारों और अपनी क्षमताओं को भी संदेह की दृष्टि से देखना चाहिए।





गत दिनों सुशांत सिंहल जी से उनकी साईट के माध्यम से परिचय हुआ| प्रो. योगेश छिब्बर जी की एक कविता ने उनसे परिचय करवाया |  पिछले दिनों  वन्दे मातरम्  को लेकर जिस प्रकार का अवांछनीय वातावरण निर्मित किए जाने की घटनाएँ हुई हैं, उन दिनों माँ, जननी, मातृ-भू, माता आदि  संकल्पनाओं को अनायास ही राष्ट्र व धरती के साथ जोड़ कर देखने वाली परम्परा का स्मरण हो आता रहा| वह परम्परा भले ही वेद की ऋचाओं में "माता भूमि: पुत्रोहम् पृथिव्या: " का आदेश हो अथवा लंका जय के पश्चात राम का लक्ष्मण को लंका के वैभव को धूल समझने का विमर्श देते समय कहा गया -


अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते |
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी || 



या आधुनिक हिन्दी साहित्य में भारतेंदु काल से काव्य में  राष्ट्रभक्ति और भारत माता की प्रतिष्ठा करने की परम्परा| सभी स्थानों पर जननी व जन्मभूमि एक शब्द युग्म की भांति आते हैं| मेरे  मन की डूबती उतराती संवेदनाओं पर जिस कविता ने मरहम रखा, उसे पढ़ कर एक बारगी तो आप भी दंग रह जाएँगे| यहाँ  उसका यथावत् पाठ देखिए -


दुःख थे पर्वत, राई अम्मा
हारी नहीं लड़ाई अम्मा ।

लेती नहीं दवाई अम्मा,
जोड़े पाई-पाई अम्मा ।

इस दुनियां में सब मैले हैं
किस दुनियां से आई अम्मा ।

दुनिया के सब रिश्ते ठंडे
गरमागर्म रजाई अम्मा ।

जब भी कोई रिश्ता उधड़े
करती है तुरपाई अम्मा ।

बाबू जी तनख़ा लाये बस
लेकिन बरक़त लाई अम्मा।

बाबूजी थे छड़ी बेंत की
माखन और मलाई अम्मा।

बाबूजी के पांव दबा कर
सब तीरथ हो आई अम्मा।

नाम सभी हैं गुड़ से मीठे
मां जी, मैया, माई, अम्मा।

सभी साड़ियां छीज गई थीं
मगर नहीं कह पाई अम्मा।

अम्मा में से थोड़ी - थोड़ी
सबने रोज़ चुराई अम्मा ।

अलग हो गये घर में चूल्हे
देती रही दुहाई अम्मा ।

बाबूजी बीमार पड़े जब
साथ-साथ मुरझाई अम्मा ।

रोती है लेकिन छुप-छुप कर
बड़े सब्र की जाई अम्मा ।

लड़ते-सहते, लड़ते-सहते,
रह गई एक तिहाई अम्मा।



अनंतिम
अब उसी  नगर का एक और चेहरा देखें और मुझे विदा दें | हाँ इतना ध्यान अवश्य रखें कि चर्चा की १००० वीं  प्रविष्टि  होने की या अन्य सूचनाओं पर बधाई आदि देने से बढ़कर कुछ अधिक भी कहें| चर्चा पर किए जाने वाले श्रम में किसी चर्चाकार का कोई स्वार्थ नहीं होता है अतः चर्चा के इस मंच पर जब जब आप को किसी भी प्रकार का श्रम और समर्पण दिखाई दे तो अपनी भावनाओं को अवश्य व्यक्त करें , ये भावनाएँ औपचारिक शाबाशी से जितनी इतर होती हैं उतनी सुखदाई होती हैं | आप के लिए सर्वमंगल की कामनाओं  सहित इस चित्र के साथ अब विराम लेती हूँ |








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