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यह लोकतंत्र की अपूर्व विजय है

यह लोकतंत्र की अपूर्व विजय है
डॉ. वेदप्रताप वैदिक


यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की अपूर्व विजय है। टीवी चैनलों के कुछ एंकरों ने पूछा कि 2014 की विजय, 1971 और 1984 की विजय से भी बड़ी कैसे है? 1971 में इंदिरा गांधी को 352 सीटें मिली थीं और 1984 में राजीव गांधी को 410 सीटें मिली थीं। भाजपा और मोदी को तो अभी 350 सीटें भी नहीं मिलीं हैं और आप इस जीत को अपूर्व कह रहे हैं? इसका कारण क्या है?

ज़रा याद करें कि 1971 में क्या हुआ था? इंदिराजी पाँच साल तक भारत की प्रधानमंत्री रह चुकी थीं। नेहरु की बेटी थीं। कांग्रेस अध्यक्ष होने का भी उनका अनुभव था। इसके अलावा उन्होंने कांग्रेस के सारे खुर्राट नेताओं को पटकनी मारकर इंदिरा कांग्रेस खड़ी कर दी थी। बैंकों के राष्ट्रीयकरण और उसके बाद गरीबी हटाओ के नारे ने देश का ध्यान खींचा था। 1971 के चुनाव में क्या हुआ? वे कम सत्ता से ज्यादा सत्ता में आ गईं लेकिन मोदी मात्र मुख्यमंत्री थे। वे किसी प्रधानमंत्री के बेटे भी नहीं थे। वे पार्टी अध्यक्ष भी नहीं रहे। उनका अखिल भारतीय अनुभव भी अत्यंत सीमित था। वे एक ऐसी पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे, जो दस साल से सत्ता से बाहर थी और जिसका नेतृत्व भी एकजुट नहीं था। लेकिन 2014 के चुनाव में क्या हुआ? पहली बार एक प्रांतीय नेता ने देश का दौरा किया। कोई प्रांत नहीं छोड़ा। करोड़ों लोगों को साक्षात् संबोधित किया। लाखों कि.मी. यात्राएं कीं। दस साल प्रधानमंत्री रहने पर भी जितना देश को मनमोहनसिंह ने देखा, उससे भी ज्यादा देश को साल भर में जाना और पहचाना मोदी ने। मोदी की वजह से मतदान का जो प्रतिशत बढ़ा, वह अपूर्व था। मोदी की सभाओं में जैसा उत्साह का ज्वार उमड़ता था, वैसे मैंने 1952 से अब तक के किसी चुनाव में नहीं देखा। इसीलिए पिछले दो माह से मैं कहता रहा कि भाजपा-गठबंधन को 300 से ज्यादा सीटें मिलेंगी। सारे लोकमत और लगभग सभी मतदानों के अंदाजी घोड़े गलत साबित हुए। विपक्ष पहले भी हारा है लेकिन कांग्रेस जैसी महान पार्टी का आकार हाथी से सिकुड़कर बकरी का रह जाए, क्या यह अपूर्व नहीं है?

जहाँ तक 1984 की विजय का प्रश्न है, वह राजीव की नहीं, शहीद इंदिरा गांधी की विजय थी। शहीद इंदिराजी को विरोधी दलों के समर्थकों ने भी वोट दिए थे। वह चुनाव नहीं था। वह एक महान शहीद को राष्ट्र की श्रद्धांजलि थी। 2014 के वोट ने फिरोज गांधी-परिवार को राजनीतिक श्रद्धांजलि दे दी है। इंदिराजी चुनाव के पहले शहीद हुई थीं और फिरोज गांधी-परिवार चुनाव के बाद शहीद हो गया है। 2014 के चुनाव में लोगों को 1984 की तरह गुस्सा नहीं था। निराशा थी। देश को लगा कि वह ठगा गया है। उसने अपना देश अ-नेताओं को थमा दिया है। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे सज्जन में प्रधानमंत्री की कोई भी कुव्वत नहीं है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का श्रेय सबसे ज्यादा मैं किसी को देता हूँ तो वह सोनियाजी और मनमोहनसिंहजी को देता हूँ। राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो ज्ञानी जैलसिंह की कृपा से बने लेकिन नरेंद्र मोदी बन रहे हैं तो वे अपने पुरुषार्थ से बन रहे हैं। कांग्रेस को अपने किए और अनकिए का फल भुगतना ही था। उसे तो हारना ही था। नरेंद्र मोदी की खूबी यह है कि उन्होंने इस हार को अपूर्व और एतिहासिक बना दिया। कहा भी है कि ‘आशिक का जनाजा है, जरा धूम से निकले’।

इस चुनाव की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें 1971 की तरह कोई नाटकीयता नहीं थी और इसमें 1984 की तरह खौलता हुआ गुस्सा नहीं था। एक ठंडी समझ थी। इस गंभीर समझ के कारण भारत के लोगों ने भारतीय राजनीति के जातिवादी और सांप्रदायिक चरित्र को बदल दिया। प्रांतों के जातिवादी दिग्गजों ने जैसी पटकनी इस चुनाव में खाई, क्या इससे पहले किसी चुनाव में खाई? लालू, नीतिश, मुलायम, मायावती, देवेगौड़ा आदि कहाँ हैं? क्या हुआ, उनके जातीय वोट-बैंकों का? भारत के नागरिकों को मवेशियों की तरह थोकबंद वोट डालने से इस बार मुक्ति मिली हैं जहाँ तक वोटों के सांप्रदायिक बँटवारे का सवाल है, वह अपरिहार्य था। उसे टाला नहीं जा सकता था। लेकिन उसे ठीक से समझा जाना चाहिए। अल्पसंख्यकों ने मोदी को जिस वजह से वोट नहीं दिए, वह समझ में आती है लेकिन देश के अन्य सभी लोगों ने मोदी को जो वोट दिए, उसकी वजह अल्पसंख्यक नहीं थे। याने वास्तव में वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को वोट नहीं है। वह विकास का वोट था। आशा का वोट था। वह ठगी के विरुद्ध वोट था। उसके पीछे किसी प्रकार की सांप्रदायिक संकीर्णता या घृणा नहीं थी। सच पूछा जाए तो 2014 के चुनाव में सांप्रदायिकता कोई मुद्दा ही नहीं था। जाहिर है कि प्रधानमंत्री मोदी ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की राह पर निष्ठापूर्वक चलेंगे तो जो वोट उन्हें 2014 में नहीं मिले हैं, वे भी 2019 में उन्हें मिलेंगे।

इस चुनाव में भारतीय राजनीति की शक्ल को एक और ढंग से बदला है। इसने भाजपा को अखिल भारतीय दल और कॉंग्रेस को प्रांतीय दल बना दिया है। एकाध राज्य को छोड़कर सभी राज्यों में भाजपा का खाता खुल गया है जबकि कई राज्यों में कांग्रेस का सूंपड़ा ही साफ है। जहाँ वह बची है, वहाँ भी एकदम लहूलुहान होकर! महान से लहूलुहान, ऐसी दुर्गति पहली बार हुई है।

पहली बार ऐसा व्यक्ति भारत का प्रधानमंत्री बना है, जिसकी माँ घरेलू सेविका का काम करके अपने बच्चों का पोषण और शिक्षण करती रही है। वह स्वयं स्टेशन पर चाय बेचकर अपना गुजारा करता था। यह देश के 100 करोड़ गरीब और मजलूमों से तदाकार होना नहीं है तो क्या है? ला.ब. शास्त्रीजी के अलावा नरेंद्र मोदी ऐसे एकमात्र प्रधानमंत्री बने हैं, जिनकी अपनी माँ के चरणस्पर्श करके आशीर्वाद प्राप्त किया है। ऐसे प्रधानमंत्री को तो वर्ग-चेतना के हामी कम्युनिस्टों को भी क्या सलाम नहीं करना चाहिए?



अपनी भाषा से भेद क्यों ?



अपनी भाषा से भेद क्यों ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
               
                आस्ट्रेलियाई सरकार ने कहा है कि भारत जानेवाले उसके राजनयिकों को हिंदी सीखने की जरूरत नहीं हैक्योंकि वहाँ सारा काम-काज अंग्रेजी में होता हैप्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने तो यहाँ तक कहा है कि ''भारत एक अंग्रेजीभाषी लोकतंत्र है|'' आस्ट्रेलिया के विदेशी मामलों के एक प्रमुख विशेषज्ञ इयान हाल ने अपनी सरकार को सलाह दी थी कि भारत में नियुक्ति किए जानेवाले राजनयिकों को हिंदी इसलिए भी सिखाई जाए कि ऐसा करने से भारत का सम्मान होगाजब जापानचीनकोरियाइंडोनेशियाईरान और तुर्की जैसे देशों में भेजे जानेवाले राजनयिकों को उन देशों की भाषा सीखना अनिवार्य है तो भारत की उपेक्षा क्योंइस पर आस्ट्रेलिया के विदेश व्यापार सचिव का कहना था कि जब भारत ही अपना सारा काम-काज अंग्रेजी में करता है तो आस्ट्रेलियाई राजनयिकों को क्या पड़ी है कि वे हिंदी सीखें?

भारत के बड़े दोस्त थे रब्बानी


भारत के बड़े दोस्त थे रब्बानी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक



Portrait
अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति प्रो. बुरहानुद्दीन रब्बानी की हत्या से अफगानिस्तान में चल रहे शांति-प्रयासों को गहरा धक्का लगेगा। वे अफगानिस्तान के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे। वे सिर्फ राष्ट्रपति ही नहीं रहे, उन्होंने लगभग 20 साल तक मुजाहिदीन-संघर्ष का भी नेतृत्व किया था। वे पठान नहीं थे। वे ताज़िक थे, फारसीभाषी थे और उनका जन्म बदख्शान में हुआ था, जो पामीर पहाड़ों का घर है। उसे दुनिया की छत भी कहा जाता है।


इस समय वे अफगानिस्तान की उच्च शांति समिति के अध्यक्ष थे। उनके नेतृत्व में ही अफगानिस्तान की सबसे कठिन समस्या का समाधान खोजा जा रहा था। यह रब्बानी साहब के शानदार व्यक्तित्व का ही कमाल था कि उनके नाम पर अफगानिस्तान के सभी नेता और अमेरिका, पाकिस्तान व ईरान आदि सभी देश सहमत थे। तालिबान से बात करने के लिए सबसे उपयुक्त नेता वही थे। उनकी हत्या इसीलिए हुई है कि बड़े-बड़े तालिबान नेताओं की दुकानें रब्बानी साहब की वजह से बंद होने लगी थीं।

Citizens’ Silent Protest March





Citizens’ Silent Protest March
From Rajghat on 18 June at 5 pm



Please join in large numbers to register our strong protest against the government’s clampdown on peaceful demonstrators in the wee hours of 5 June. It reminded of the Jallianwala Bagh incident of 13 April 1919 when British troops opened fire on innocent citizens. The difference this time was that instead of bullets the state used batons. There was no provocation.


बाबा के आंदोलन के मुद्दे



बाबा के आंदोलन के मुद्दे

भ्रष्टाचार के विरुद्ध बाबा रामदेव जो मोर्चा लगा रहे हैं, वह एक बेमिसाल घटना होगी। यदि दिल्ली में एक लाख और देश में एक करोड़ से भी ज्यादा लोग अनशन पर बैठेंगे तो इसके मुकाबले की घटना हम कहाँ  ढूँढेंगे?



यह सबसे बड़ा अहिंसक सत्याग्रह होगा। इसका उद्देश्य जनता व शासन दोनों को भ्रष्टाचार के विरुद्ध कटिबद्ध करना है। यदि आंदोलन सिर्फ सरकार के विरुद्ध होता तो उसे शुद्ध राजनीति माना जाता, लेकिन बाबा ने स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता की राजनीति से उनका कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने सबके लिए दरवाजे खुले रखे हैं। जो भी भ्रष्टाचार विरुद्ध हो, वह अंदर आ सकता है।


यह आंदोलन एकसूत्री नहीं है। चार दिन की चाँदनी और फिर अंधेरी रात, ऐसा नहीं होगा। स्वयं बाबा रामदेव पिछले कई महीनों से देश के कोने-कोने में घूम रहे हैं। अब तक वे दस करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष संबोधित कर चुके हैं।



आम जनता से ऐसा सीधा संवाद किसी प्रधानमंत्री ने भी अपने चुनाव अभियान के दौरान नहीं किया होगा। इस जनाधार का एक ही लक्ष्य है कि भारत से भ्रष्टाचार भगाया जाए। इस लक्ष्य की प्राप्ति किसी एकसूत्री कार्यक्रम से नहीं हो सकती और सिर्फ सरकार से मुठभेड़ करने से भी नहीं हो सकती।



इस अभियान में नए-नए मुद्दे जुड़ते चले जाएँगे और उन मुद्दों पर सरकार और जनता दोनों को अमल करना होगा। यह लड़ाई लंबी चलेगी। दिल्ली के रामलीला मैदान में रामदेव की लीला की यह शुरुआत भर है। इस लड़ाई के मुद्दे क्या-क्या हो सकते हैं, यह सोचना जरूरी है।


मेरे कुछ सुझाव ये हैं  -   सबसे पहला मुद्दा तो यही है कि देश के कम से कम 20 करोड़ लोग प्रतिज्ञा करें कि वे न तो रिश्वत लेंगे और न ही रिश्वत देंगे। किसी भी व्यक्ति को रिश्वत लेने के लिए कोई बाध्य नहीं कर सकता, लेकिन ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं कि राजा हरिश्चंद्र जैसे व्यक्ति को भी रिश्वत देने को मजबूर होना पड़े।



लेकिन संकल्प यह होना चाहिए कि उस रिश्वतखोर के विरुद्ध बाद में आप सख्त कार्रवाई करवाएँगे । चुप नहीं बैठेंगे। दूसरा, देश के हर शहर-गाँव में रामदेववाहिनी जैसी किसी संस्था की शाखाएँ होनी चाहिए, जिन्हें कामचोरी या भ्रष्टाचार की खबर लगते ही उनके स्वयंसेवकों की टोली आ धमके ‘फ्लाइंग स्क्वाड’ की तरह। वे भ्रष्टाचारियों का अहिंसक घेराव करें। न मारें-पीटें, न गाली-गलौज करें। बस इतना काफी है।



तीसरा, देश में कोई सरकारी जवाबदेही या नागरिक अधिकार कानून बनना चाहिए, जैसा मध्यप्रदेश व बिहार में बना है। यदि सरकारी अफसर निश्चित समय में कोई काम करके न दें तो उन्हें उसका खामियाजा भुगतना पड़े। यह बात अदालतों पर भी लागू हो। आखिर तीन करोड़ मुकदमे बरसों से अधर में क्यों लटके हैं?



चौथा, देश के सभी चुने हुए प्रतिनिधियों की चल-अचल संपत्ति की घोषणा प्रतिवर्ष हो, सिर्फ चुनाव के समय नहीं। देश के सभी राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों पर भी यह नियम लागू हो, चाहे वे चुनाव लड़ें या न लड़ें। कैबिनेट सेक्रेटरी से लेकर चपरासी तक सभी सरकारी कर्मचारी भी इस नियम का पालन करें।


यह देश के सभी जजों, फौजियों और पुलिसवालों पर भी लागू हो। यदि आयकर विभाग में जमा किए गए हर हिसाब को भी सूचना के अधिकार के तहत खोल दिया जाए तो बड़ी-बड़ी कंपनियों, तथाकथित एनजीओ और अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों में चल रहे भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी।


संपत्ति की घोषणा में नेताओं, अफसरों, जजों आदि के नजदीकी रिश्तेदारों को भी जोड़ा जाए। इसमें पत्रकारों को भी शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि खबरपालिका शासन का चौथा खंभा है। पाँचवाँ, विदेशों में जमा काले धन की वापसी के लिए सरकार समयसीमा तय करे।



यदि उन देशों के बैंक सहयोग नहीं करें तो भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमा चलाए। उनके विरुद्ध विश्वव्यापी अभियान चलाए। संयुक्त राष्ट्र से उनकी सदस्यता खत्म करवाए। उन्हें अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, रिश्वतखोरी, तस्करी, मादक द्रव्य प्रसार, माफिया गतिविधि और चुनाव को भ्रष्ट करने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए।


छठा, काले धन की वापसी में यदि सरकार ढिलाई दिखाती है तो उसके विरुद्ध करबंदी अभियान चलाया जाए। अकेले स्विस बैंकों में इतना भारतीय पैसा जमा है कि भारत सरकार को 10 साल तक टैक्स उगाहने की जरूरत नहीं है। यदि भारत सरकार लापरवाही करे तो सारे देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन चले और नागरिक सरकार को टैक्स देना बंद कर दें।



सातवाँ,  500 और 1000 के नोटों को बंद किया जाए। देश के कुल नोटों के 84 प्रतिशत नोट ये ही हैं। कितनी विचित्र बात है कि देश के करोड़ों लोग 20 रुपए रोज पर गुजारा करते हैं। उनका 500 और 1000 के नोटों से कुछ लेना-देना नहीं है।


काले धन को चलाए रखने में इन बड़े नोटों की भूमिका सबसे तगड़ी है। ये खत्म होंगे तो सारे देश में बड़े लेन-देन चेक और क्रेडिट कार्ड से होंगे। देश का 90 प्रतिशत लेन-देन खुले में होगा। दुनिया के सभी मालदार देशों में प्रतिव्यक्ति आय यदि बहुत ऊँची है तो नोट छोटे हैं। डॉलर और पाउंड के 500 और 1000 के नोट नहीं होते।


आठवाँ, भ्रष्टाचार के विरुद्ध छह साल तक हीला-हवाला करने के बाद अब सरकार ने ‘संयुक्त राष्ट्र अभिसमय’ का पुष्टीकरण तो कर दिया, लेकिन उसे लागू करने के लिए ठोस कानून कब बनेंगे? भ्रष्टाचार विरोधी जाँच एजेंसी स्वायत्त कब होंगी और भ्रष्टाचारियों की चल-अचल संपत्ति जब्त कब होगी?



नौवाँ, लोकपाल को लेकर सरकार जो खींचातानी कर रही है, उसी से सिद्ध होता है कि वह ‘यूएन कन्वेंशन’ को ईमानदारी से लागू नहीं करना चाहती। प्रधानमंत्री, सांसद, विधायक, नौकरशाह और जज सभी लोकपाल की जाँच  के तहत होने चाहिए।


दसवाँ , देश में अनिवार्य मतदान की व्यवस्था कुछ वर्षो तक अवश्य लागू होनी चाहिए। व्यापक चुनाव सुधारों के साथ जनमत संग्रह व प्रतिनिधियों की वापसी का प्रावधान भी किया जाए। ग्यारहवाँ, भ्रष्टाचारियों के लिए तुरंत और कठोरतम सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए।


देश में व्यवस्था परिवर्तन के लिए विभिन्न प्रश्नों पर क्रांतिकारी जनमत तैयार करना होगा। इस मामले में हमारे राजनीतिक दल विफल हो गए हैं। यह करने की संभावना आज रामदेवजी में ही दिखाई पड़ती है।


- डॉ. वेदप्रताप वैदिक



संबंधों का नया मानचित्र




संबंधों का नया क्षेत्रीय नक्शा



प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की यह काबुल यात्रा ऐतिहासिक मानी जाएगी, क्योंकि पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने अफगानिस्तान में भारत को क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में प्रतिबिंबित किया है। अब तक काबुल जाने वाले हमारे नेताओं ने हमेशा सिर्फ सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध बढ़ाने की बात कही है।


वे यह मानकर चलते रहे कि गुटनिरपेक्ष होने के बावजूद भारत के संबंध अफगानिस्तान के साथ इसलिए घनिष्ठ नहीं हो सकते कि बीच में पाकिस्तान बैठा है और पाकिस्तान की पीठ पर अमेरिका का हाथ है। दूसरे शब्दों में अफगानिस्तान में कितनी भी बड़ी उथल-पुथल हो जाए, भारत सिर्फ तमाशबीन बना रहेगा।


यों भी पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पहुँचने के लिए भारत को कभी खुलकर रास्ता नहीं दिया। अफगानिस्तान जाने वाले रास्तों को कभी भारत से झगड़ा होने पर वह बंद कर देता है और कभी अफगानिस्तान से झगड़ा होने पर! इस घेराबंदी को अब भारत ने तोड़ दिया है। अफगान-ईरान सीमांत पर भारत ने लगभग 200 किमी की जरंज-दिलाराम सड़क बनाकर दुनियाभर के लिए एक वैकल्पिक थल मार्ग खड़ा कर दिया है।


इस वैकल्पिक मार्ग का भी कोई ठोस फायदा दिखाई नहीं पड़ रहा था। इसके दो कारण हैं। एक तो ईरान से अमेरिका के संबंध खराब हैं और दूसरा भारत की विदेश नीति अभी तक पुराने र्ढे पर घूम रही थी। सिर्फ अफगानिस्तान को हजारों करोड़ रुपया देते रहो और जैसा अमेरिका कहे, वैसा करते रहो।


इस नीति में अब बुनियादी परिवर्तन के संकेत सामने आ रहे हैं। हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन और विदेश सचिव निरुपमा राव को इस बात का श्रेय मिलना चाहिए कि उन्होंने अफगानिस्तान के साथ ‘सामरिक संबंध’ स्थापित करने की पहल की।


इस नए भारत-अफगानिस्तान समीकरण से अब अमेरिका को भी क्या आपत्ति हो सकती है? अमेरिका इस समय भारत और अफगानिस्तान के जितने करीब है, पाकिस्तान के नहीं है। इस सामरिक संबंध का विरोध सिर्फ चीन कर सकता है, लेकिन भारत अपनी कूटनीतिक चतुराई से चीन को भी पटा सकता है।


पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष ने अभी तीन हफ्ते पहले काबुल जाकर हामिद करजई को यह सलाह दी थी कि वे अब अमेरिका के बजाय चीन के साथ नत्थी हो जाएं। पाकिस्तान को भनक लग गई थी कि भारत, अफगानिस्तान और अमेरिका मिलकर अब सामरिक संबंधों का कोई नया क्षेत्रीय नक्शा बना रहे हैं।


इस सामरिक संबंध का अर्थ क्या है? इसका सीधा-सादा अर्थ यह है कि आंतरिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने में अफगानिस्तान की मदद करना और बाहरी आक्रमणों से उसकी रक्षा करना! इन दोनों लक्ष्यों की प्राप्ति में अफगान और अमेरिकी सरकारें पिछले 10 साल से नाकाम रही हैं।


अमेरिका ने सवा सौ अरब डॉलर फूँक दिए और हजारों अमेरिकी, यूरोपीय और अफगान जवान कुर्बान कर दिए, लेकिन ओबामा प्रशासन को अभी भी अफगानिस्तान से निकल भागने का रास्ता नहीं मिल पा रहा है। वह जुलाई 2011 में अफगानिस्तान खाली करना शुरू करेगा और 2014 तक उसे खाली कर पाएगा या नहीं, उसे खुद पता नहीं है।


ऐसे में भारत का मैदान में कूद पड़ना बहुत ही स्वागतयोग्य है। यह बात मैं पिछले दस साल से कह रहा हूँ और पिछले पाँच साल में इसे मैंने कई बार दोहराया है कि अफगानिस्तान अमेरिका की नहीं, भारत की जिम्मेदारी है। यदि अफगानिस्तान बेचैन होगा तो भारत कभी चैन से नहीं रह सकता।


हमारे सदियों पुराने इतिहास ने यह सिद्ध किया है। भारत में आतंकवाद ने तभी से जोर पकड़ा, जबसे अफगानिस्तान में अराजकता फैली है। अफगानिस्तान की अराजक भूमि का इस्तेमाल पहले रूस, फिर अमेरिका और सबसे ज्यादा पाकिस्तान ने किया।


सबसे ज्यादा नुकसान भारत का ही हुआ, लेकिन इस नुकसान की जड़ उखाड़ने का बीड़ा भारत ने कभी नहीं उठाया। वह अमेरिका पर अंधविश्वास करता रहा और अमेरिका पाकिस्तान पर अंधविश्वास करता रहा। अब ओसामा कांड ने इस अंधविश्वास के परखच्चे उड़ा दिए हैं।


अब भारत ने थोड़ी हिम्मत दिखाई है। पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा है कि अफगानिस्तान की समस्या हमारी क्षेत्रीय समस्या है। अफगानिस्तान अपनी सुरक्षा जब खुद करेगा तो उसकी मदद करने में भारत पीछे नहीं रहेगा। यानी अमेरिका की वापसी के बाद भारत की कोई न कोई भूमिका जरूर होगी।


अब भी भारत यह कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है कि हम पांच लाख जवानों की राष्ट्रीय अफगान फौज और पुलिस खड़ी करने में आपकी मदद करेंगे। यह काम जितने कम खर्च और कम समय में भारत कर सकता है, दुनिया का कोई देश नहीं कर सकता। इसका खर्च तो अमेरिका सहर्ष उठा सकता है और इसके लिए अफगान सरकार भी तैयार है।


पिछले नवंबर में अपनी काबुल यात्रा के दौरान मैंने अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई, उनके प्रमुख मंत्रियों, फौज और गुप्तचर विभाग के सर्वोच्च अधिकारियों और लगभग सभी अन्य प्रमुख नेताओं से बात की थी। अफगानिस्तान के उज्ज्वल भविष्य के लिए सबको यही एकमात्र विकल्प मालूम पड़ता है, लेकिन हमारी सरकार पता नहीं क्यों ठिठकी हुई है?



उसे पाकिस्तान पर शक है। यह स्वाभाविक है। पाकिस्तान इस विकल्प को अपनी मौत समझता है। यदि पाँच लाख जवानों की फौज काबुल के पास हो तो पाकिस्तान अफगानिस्तान को अपना पाँचवाँ प्रांत कैसे बना सकता है?


इसीलिए हमारे प्रधानमंत्री ने न तो अफगान संसद के अपने भाषण में और न ही संयुक्त वक्तव्य में कहीं भी पाकिस्तान पर हमला किया। यह अच्छा किया।


उन्होंने सीमापार आतंकवाद और आतंकवादी अड्डों का जिक्र तक नहीं किया। उन्होंने हामिद करजई की तालिबान से बात करने की पहल का भी स्वागत किया। माना यह जा रहा है कि अब भारत अफगान पुलिस को प्रशिक्षण देगा। यदि यही काम बड़े पैमाने पर शुरू हो जाए तो मान लीजिए कि हमने आधा मैदान मार लिया।


पाकिस्तान हमारा विरोध करेगा। रास्ता भी नहीं देगा। यदि जरंज-दिलाराम सड़क इस वक्त काम नहीं आएगी तो कब आएगी? पाकिस्तान से हुए अमेरिकी मोहभंग की वेला में अगर भारत इतना भी नहीं कर सके तो उसे अपने आपको न तो अफगानिस्तान का दोस्त कहने का अधिकार है और न ही दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय महाशक्ति!


- वेदप्रताप वैदिक

अब भारत को अगुवाई करनी होगी


अब भारत को अगुवाई करनी होगी



सामा बिन लादेन तो मारा गया, लेकिन मुख्य प्रश्न यह है कि अब पाकिस्तान के प्रति भारत की नीति क्या हो? ओसामा की हत्या ने भारत में इतना उत्साह पैदा कर दिया है कि कई जिम्मेदार नेता और लोग भी माँग कर रहे हैं कि भारत भी अमेरिका की तरह आतंकियों को उनकी माँद में घुसकर  मारे।


न्यूयॉर्क के ट्रेड टॉवर काण्ड में तीन-चार हजार लोग मारे गए थे, लेकिन भारत में अब तक एक लाख से भी ज्यादा लोगों को आतंकियों ने मौत के घाट उतार दिया है। ट्रेड टॉवर तो ट्रेड टॉवर है, भारत की तो संसद पर हमला हुआ। लाल किला, अक्षरधाम और ताज होटल जैसे ऐतिहासिक, पवित्र और व्यावसायिक संस्थानों को आतंक का शिकार बनना पड़ा। ऐसे में, अमेरिका से भी ज्यादा भारत की जिम्मेदारी बनती है कि वह दाऊद इब्राहीम, हाफिज सईद और लखवी जैसे सरगनाओं को जिंदा या मुर्दा पकड़े।


इस इच्छा के तूल पकड़ने की वजह यह रही कि भारत के सर्वोच्च सैन्य अधिकारियों ने कुछ प्रश्नों के जवाब में कह दिया कि देश चाहे, तो वे भी अमेरिका की तरह कार्रवाई कर सकते हैं, यानी हमारी फौज सक्षम है। पाकिस्तान सरकार इस प्रतिक्रिया को ले उड़ी। पाकिस्तानी विदेश सचिव ने तत्काल धमकी दे डाली कि यदि एबटाबाद जैसी कार्रवाई दोहराई गई, तो उसके परिणाम भयंकर होंगे।


दूसरे शब्दों में, पाकिस्तान परमाणु-बम का प्रयोग भी कर सकता है। यों भी पाकिस्तान के सेनाप्रमुख जनरल कियानी परमाणु हथियारों को लेकर काफी आक्रामक हैं। वह भारत की तरह संकोची नहीं हैं। जाहिर है, पाकिस्तान की वह त्वरित प्रतिक्रिया अनावश्यक थी, खासतौर से तब, जबकि भारत के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ने दो-टूक शब्दों में कहा कि ओसामा-कांड के बावजूद वे पाकिस्तान से संबंध सुधारने की नीति पर कायम रहेंगे।


भारत सरकार की इस घोषणा को निराशाजनक कहना बहुत आसान है, लेकिन यह भी सोचना होगा कि इसके अलावा भारत सरकार क्या कह सकती थी? अभी भारत पर कोई हमला तो नहीं हुआ कि जिस पर सरकार सख्त प्रतिक्रिया देती। जब देश में हमले हुए थे, संसद पर, अक्षरधाम पर और ताज होटल पर, तो सरकार ने आखिर क्या किया था? जवाबी हमले के लिए हम इसलिए उत्तेजित हो जाते हैं कि हम अमेरिका और भारत को एक ही पलड़े में रख देते हैं। लेकिन उनके बीच का जो अंतर हैं, उन्हें समझना जरूरी है।


पहला अंतर यह है कि अमेरिका पाकिस्तान का पड़ोसी नहीं है। अमेरिका पाकिस्तान से आठ-दस हजार किलोमीटर दूर है, जबकि भारत और पाकिस्तान की सेनाएँ एक-दूसरे की नाक पर खड़ी हैं। दूसरा, क्या अमेरिका में कश्मीर जैसी कोई जगह है, जहाँ पाकिस्तानी आतंकवादियों को सहज शरण मिल सकती है? तीसरा, भारत और पाकिस्तान पड़ोसी तो हैं ही, परमाणु बमधारी देश भी हैं। यह बहुत ही विषैला संयोग है। दो पड़ोसी परमाणु बमधारी देशों में ऐसी दुश्मनी कभी नहीं रही।


चौथा, अमेरिका और भारत की तरह पाकिस्तान की असली सत्ता नेताओं के हाथ में नहीं, फौजियों के हाथ में है। लड़ाई के अभ्यस्त फौजी कुछ भी निर्णय कर सकते हैं। पाँचवाँ, पाकिस्तान के साथ अमेरिका का रिश्ता काफी गहरा और लंबा है। वह अपनी दाल-रोटी और हथियारों के लिए सदा अमेरिका का मोहताज रहा है। उसका एहसानमंद रहा है। यदि अमेरिका कुछ ज्यादती करेगा, तो भी पाकिस्तान उसे बर्दाश्त करेगा, लेकिन भारत की किसी भी कार्रवाई को वह बर्दाश्त क्यों करेगा?


छठा, इस समय आतंकवाद के विरुद्ध चल रहे वैश्विक युद्ध में अमेरिका और पाकिस्तान साझेदार हैं। इस भागीदारी की आड़ में अगर अमेरिका जान-बूझकर या गलती से पाकिस्तान को चपत लगा देता है, तो पाकिस्तान क्या कर सकता है? सातवाँ, क्या भारत के पास अमेरिका की तरह ऐसी तकनीकी और यांत्रिक सैन्य-तैयारी है कि वह एबटाबाद जैसी सफल कार्रवाई कर सके?


ऐसे में, समझदारी यही है कि हमले की बात किसी भी तरह से सोची न जाए। लेकिन भारत के कुछ उग्र   किस्म की सोच वाले लोग अपनी सरकार के रवैये से इसलिए निराश दिखते हैं कि पाकिस्तान को लेकर पिछले साल भर में सरकार कई बार गच्चा खा चुकी है।


अभी तक पाकिस्तान ने न तो काबुल दूतावास के हत्यारों को पकड़ा है और न ही ताज होटल के। वे खुलेआम ‘जिहाद’ का ढोंग करते हैं और अब वे ओसामा का मर्सिया पढ़ रहे हैं। शर्म-अल-शेख में बलूचिस्तान के सवाल पर हम मात खा गए थे। हम आज तक अमेरिकियों को इस बात के लिए तैयार नहीं कर सके कि वे भारत विरोधी आतंकवादियों को आतंकी समझें।


भारत विरोधी आतंकवादियों को जिस दिन अमेरिका ओसामा की तरह मारेगा, उसी दिन माना जाएगा कि वह भारत का दोस्त है। अभी तो वह सिर्फ अपने हितों के लिए लड़ रहा है और इस लड़ाई में हम उसके पिछलग्गू बने हुए हैं। इस लड़ाई को सचमुच विश्व-आतंकवाद के विरुद्ध उसी दिन से माना जाएगा, जिस दिन से अमेरिका अपने और भारत-विरोधी आतंकियों में फर्क करना बंद करेगा। इसके लिए जरूरी है कि अमेरिका हर गलती के बाद पाकिस्तान को बख्शे नहीं, बल्कि उसके साथ सख्ती से पेश आए।


पाकिस्तान अपनी संप्रभुता का मामला उठा रहा है, लेकिन यह मजाक के अलावा क्या है? जो राष्ट्र अपनी धरती पर विदेशी सैनिक अड्डे खुशी-खुशी खड़े करवाता रहा हो, हमेशा मध्यस्थ और अधीनस्थ की भूमिका निभाता रहा हो और जिसकी सीमाओं में विदेशी आतंकवादी बेलगाम घूमते रहते हों, उसके मुँह से संप्रभुता की बातें अटपटी लगती हैं। इस मौके पर चीन उसे पानी पर चढ़ाने को तैयार बैठा है।


पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान से ज्यों ही अमेरिका हटे, चीन उसकी जगह आ जाए। भारत के लिए इससे बड़ी चुनौती क्या हो सकती है? अफगानिस्तान को अपना पाँचवाँ  प्रांत बनाकर भारत को सबक सिखाना पाकिस्तान का सर्वोच्च लक्ष्य है। इस लक्ष्य को भारत ध्वस्त कैसे करे?


आँख मींचकर अमेरिका का पीछा करने से तो यह लक्ष्य हासिल नहीं होगा। पिछले दस साल तक अमेरिका बुद्धू बनता रहा। अब जरूरी है कि भारत की देखरेख में पाँच लाख जवानों की राष्ट्रीय अफगान फौज खड़ी की जाए। इसकी जिम्मेदारी अमेरिका ले। यह अफगान-फौज पाक-अफगान आतंकवाद का खात्मा तो करेगी ही, उस खतरे पर भी लगाम लगाएगी, जो पाकिस्तान के उग्रवादी तत्वों द्वारा भारत के विरुद्ध खड़ा किया जाता है। अब तक अमेरिका आगे-आगे था और भारत उसके पीछे-पीछे। अब भारत आगे-आगे चले और अमेरिका उसके पीछे-पीछे। इसी में अमेरिका, पाकिस्तान और अफगानिस्तान का भी कल्याण है।

- वेद प्रताप वैदिक
अध्यक्ष, भारतीय विदेश नीति परिषद्  
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

हिरना, समझ-बूझ वन चरना




हिरना, समझ-बूझ वन चरना

जिसका शुरू से मुझे डर था, अब वही हो रहा है। लोकपाल के नाम पर उमड़ा अपूर्व जनाक्रोश अब अपूर्व दिग्भ्रम बनता चला जा रहा है। सबसे पहले अन्ना हजारे को ही लें। जब उन्हें अनशन पर बिठाया गया था, तब और अब, जबकि वे लोकपाल विधेयक कमेटी के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य हैं, उनकी अपनी कोई सोच दिखाई ही नहीं पड़ती। उन्हें जो भी तत्काल सूझ पड़ता है, उसे वे अखबारों को बोल देते हैं। उनकी बोली हुई बातों पर जरा ध्यान दें तो पता चलेगा कि न तो गांधीवाद से उनका कुछ लेना-देना है और न ही उनको यह पता है कि भारत का लोकपाल कैसा होना चाहिए।



अनशन के दौरान हिंसा की वकालत जमकर हुई। बार-बार कहा गया कि भ्रष्टाचारियों के हाथ काट दिए जाएँ और उन्हें फाँसी  पर लटकाया जाए। अन्ना ने एक बार भी इसका विरोध नहीं किया। अन्ना ने कई बार भगतसिंह, चंद्रशेखर, राजगुरु आदि क्रांतिकारियों के नाम लिए। नौजवानों को प्रोत्साहित करने के लिए इन सर्वस्व त्यागी क्रांतिकारियों का नाम लेने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन क्या कोई गांधीवादी ऐसी भूल कभी सपने में भी कर सकता है? गांधीजी ने जब भी कोई आंदोलन छेड़ा, अपने स्वयंसेवकों को कठोर प्रशिक्षण दिया, अनुशासन सिखाया और अहिंसा का दर्शन समझाया। अनशन के दौरान इस तरह की कोई बात संभव नहीं थी, क्योंकि सारा अनुष्ठान अचानक हुआ था, लेकिन अब भी इसके कोई आसार दिखाई नहीं पड़ते।




गांधीजी अपने आश्रमों के आय-व्यय के हिसाब पर कड़ी निगरानी रखते थे। आश्रमों के खाते सबके लिए खुले रहते थे। यह बहुत ही अच्छा हुआ कि अन्ना के आंदोलन के लिए आई धनराशि को जगजाहिर कर दिया गया, लेकिन अच्छा हो कि चार-छह दिन में खर्च हुए लाखों रुपए का हिसाब सबके सामने पेश कर दिया जाए, ताकि समस्त समाजसेवी संस्थाओं के लिए वह एक उदाहरण बन सके। यह देखना भी आयोजकों का काम है कि ज्यादातर राशि जनता से प्राप्त की जाए, न कि धन्ना-सेठों से। बड़ी राशि देने वाले या तो खुद किसी दिन नस दबा देते हैं या सरकार उनकी नस दबा देती है। यदि दबावों को ठुकरा देने की हिम्मत हो तो धनराशि कहीं से भी आने दे सकते हैं। लेकिन ऐसी हिम्मत तो कहीं दिखाई नहीं पड़ती। विधेयक कमेटी की पहली बैठक में ही ‘जनप्रतिनिधि’ ढेर हो गए। पहले ही दिन उन्होंने मान लिया कि लोकपाल को नियुक्त करने वाली कमेटी में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता होंगे। इन नेताओं को कमेटी में रखने का विरोध आंदोलनकारी डटकर कर रहे थे। यदि प्रधानमंत्री और विपक्षी नेता चयन समिति में होंगे तो उस समिति में किसकी चलेगी? जाहिर है कि उनकी सहमति के बिना कोई लोकपाल नहीं बन सकता? क्या वह लोकपाल इन महानुभावों को दंडित कर सकेगा? क्या ये नेतागण मिलीभगत नहीं कर सकते? क्या ये पीजे थॉमस से भी ‘योग्य’ उम्मीदवार नहीं  ढूँढ लाएँगे ?




अखबार कहते हैं कि बैठक में हुई बातचीत अन्ना हजारे को पल्ले ही नहीं पड़ी, क्योंकि वे सिर्फ मराठी और हिंदी जानते हैं। उन्हें भारत की राजभाषा नहीं आती। वह अंग्रेजी है। यदि अन्ना हजारे गांधीवादी होते और सचमुच सत्याग्रही होते तो इन मंत्रियों को फटकार लगाते और कहते जनभाषा बिना जनलोकपाल कैसे नियुक्त करोगे? लेकिन इन बुनियादी बातों से शायद अन्ना को कोई सरोकार नहीं है। यह भी पक्का नहीं कि अन्ना ‘जनलोकपाल बिल’ की किसी धारा को समझते हैं या नहीं। पूरा जनविधेयक और उसकी व्याख्या लगभग 100 पृष्ठों की है। पूरी की पूरी अंग्रेजी में है। उसमें क्या जोड़ा, क्या घटाया जा रहा है, क्या अन्ना को उसका कुछ पता रहता है? इसके बावजूद अन्ना कमेटी के सदस्य बन गए। वे बाहर रहते तो कहीं अच्छा होता। वे बाबूगिरी के चक्कर में क्यों फँसे? वे अंग्रेजी नहीं जानते, यह शुभ है। वे असली भारत के ज्यादा निकट हैं। जो अंग्रेजी जानने का दावा करते हैं, उन्हें वे विधेयक तैयार करने देते और फिर उस विधेयक को जनता की तुला पर तौलते। इस तौल का आधार अंग्रेजी के उलझे हुए शब्द नहीं होते, बल्कि कसौटी यह होती कि यह सर्वमान्य विधेयक जनलोकपाल के कितना निकट है। कमेटी के सदस्य बनकर वे उन्हीं लोगों के बीच जाकर बैठ गए, जिनके समझौते पर उन्हें अपना निर्णय देना है।




वे अंतिम निर्णय कैसे देंगे? वे तो अभी से फिसले जा रहे हैं। अंग्रेजी अखबार में वे क्या करने गए थे? वहाँ उन्होंने सारे आंदोलन को शीर्षासन करा दिया। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कह दिया, ‘यदि संसद हमारे विधेयक को रद्द कर देगी तो हम उसके निर्णय को मान लेंगे।’ इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता है? यदि आपको यही करना था तो आंदोलन चलाया ही क्यों? यदि अन्ना हजारे ने गांधीजी का ‘हिंद स्वराज’ सरसरी तौर पर भी पढ़ा होता तो उन्हें पता होता उस समय की ‘ब्रिटिश पार्लियामेंट’ के बारे में उन्होंने कितने कठोर शब्दों का प्रयोग किया था। उन शब्दों का प्रयोग आज हमारी संसद के लिए कतई नहीं किया जा सकता, लेकिन अन्ना को यह बात तो समझनी ही चाहिए कि संसद जनता से ऊपर नहीं होती। यदि संसद ने ही सारे राष्ट्र के विवेक का ठेका ले रखा है तो 42 साल से यह बिल अधर में क्यों लटका है? किसी भी लोकतंत्र में सर्वोच्च संप्रभु जनता ही होती है। डॉ लोहिया ने क्या खूब कहा था कि ‘जिंदा कौमें पाँच साल इंतजार नहीं करतीं।’




इस आंदोलन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि इसने संयुक्त कमेटी को केंद्रीय मुद्दा बनाकर एक ओर लोकसत्ता और दूसरी ओर चुनी हुई संसद, दोनों की गरिमा गिरा दी। यदि संसद अपना काम करती और आंदोलनकारी अपना तो कहीं बेहतर होता। अब जबकि उनके साथियों ने समझाया तो बेचारे अन्ना क्या करते? उन्होंने संसद संबंधी बयान उलट दिया। भोले-भाले अन्ना भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के सिर्फ प्रतीक बने रहें, यही काफी होगा। इस मूर्तिपूजक देश में उनकी यह स्थिति ही सर्वहितकारी होगी, अन्यथा ईर्ष्या - द्वेष से ग्रस्त विघ्नसंतोषी और भ्रष्टाचार विरोध से त्रस्त नेतागण उनके माथे पर पता नहीं क्या-क्या बिल्ले चिपका देंगे। हर कदम फूँक -फूँक कर रखने की जरूरत है। वरना, लोकपाल आंदोलन का शीराजा बिखरते ही देश में निराशा की लहर उठेगी। वह सारे देश में अराजकता और हिंसा फैला देगी। हिरना, समझ-बूझ वन चरना।



वेदप्रताप वैदिक
(लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)

बिनायक पर हंगामा क्यों ?


बिनायक पर हंगामा क्यों ?
डॉ वेदप्रताप वैदिक

डॉ. बिनायक सेन को लेकर देश का अंग्रेजी मीडिया और हमारे कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी जिस तरह आपा खो रहे हैं, उसे देखकर देश के लोग दंग हैं। इतना हंगामा तो प्रज्ञा ठाकुर वगैरह को लेकर हमारे तथाकथित राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी तत्वों ने भी नहीं मचाया। वामपंथियों ने आरएसएस को भी मात कर दिया। आरएसएस ने जरा भी देर नहीं लगाई और ‘भगवा आतंकवाद’ की भर्त्सना कर दी। अपने आपको हिंसक गतिविधियों का घोर विरोधी घोषित कर दिया। ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द ही मीडिया से गायब हो गया। लेकिन बिनायक सेन का झंडा उठाने वाले एक भी संगठन या व्यक्ति ने अभी तक माओवादी हिंसा के खिलाफ अपना मुँह  तक नहीं खोला। क्या यह माना जाए कि माओवादियों द्वारा मारे जा रहे सैकड़ों निहत्थे और बेकसूर लोगों से उनका कोई लेना-देना नहीं है? क्या वे भोले आदिवासी भारत के नागरिक नहीं हैं? उनकी हत्या क्या इसलिए उचित है कि उसे माओवादी कर रहे हैं? माओवादियों द्वारा की जा रही लूटपाट क्या इसीलिए उचित है कि आपकी नजर में वे किसी विचारधारा से प्रेरित होकर लड़ रहे हैं? मैं पूछता हूँ कि क्या जिहादी आतंकवादी और साधु-संन्यासी आतंकवादी चोर-लुटेरे हैं? वे भी तो किसी न किसी ‘विचार’ से प्रेरित हैं। विचारधारा की ओट लेकर क्या किसी को भी देश के कानून-कायदों की धज्जियाँ  उड़ाने का अधिकार दिया जा सकता है? क्या यही मानव अधिकार की रक्षा है?



यदि नहीं तो फिर प्रश्न उठता है कि छत्तीसगढ़ में जो लोग पकड़े गए हैं, उन्हें दंडित क्यों न किया जाए? जो भी दंड उन्हें दिया गया है, उसे वे खुशी-खुशी स्वीकार क्यों नहीं करते? यदि वे सचमुच माओवादी हैं या माओवाद के समर्थक हैं, तो उन्हें वैसी घोषणा खम ठोककर करनी चाहिए थी, देश के सामने और अदालत के सामने भी। जरा पढ़ें, 1921 में अहमदाबाद की अदालत में महात्मा गांधी ने अपनी सफाई में क्या कहा था। यदि वे लोग माओवादी नहीं हैं और उन्होंने छत्तीसगढ़ के खूनी माओवादियों की कोई मदद नहीं की है, तो वे वैसा साफ-साफ क्यों नहीं कहते? वे सरकारी हिंसा के साथ-साथ माओवादी हिंसा की निंदा क्यों नहीं करते? यदि वे ऐसा नहीं करते, तो जो अदालत कहती है, उस पर ही आम आदमी भरोसा करेगा। छत्तीसगढ़ की अदालत के फैसले पर जिस तरह का आक्रमण हमारे छद्म वामपंथी कॉमरेड लोग कर रहे हैं, वैसी न्यायालय की अवमानना भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुई।



यदि बिनायक सेन और उनके साथी सचमुच बहादुर होते या सचमुच आदर्शवादी होते तो सच बोलने का नतीजा यही होता न कि उन्हें फांसी पर लटका दिया जाता। जिसने अपने सिर पर कफन बांध रखा है, वह एक क्या, हजार फांसियों से भी नहीं डरेगा। आदर्श के आगे प्राण क्या चीज है? अपने प्राणों की रक्षा के लिए बहादुर लोग क्या झूठ बोलते हैं? क्या कायरों की तरह अपनी पहचान छुपाते हैं? भारत जैसे लोकतांत्रिक और खुले देश में जो ऐसा करते हैं, वे अपने प्रशंसकों को मूर्ख और मसखरा बनने के लिए मजबूर करते हैं। माओवादियों की दलाली कर रहे लोगों को कहीं उनके प्रशंसक भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद और बिस्मिल के उच्चासन पर बिठाने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं?




डॉ बिनायक सेन और उनकी पत्नी यदि सचमुच आदिवासियों की सेवा के लिए अपनी मलाईदार नौकरियाँ छोड़कर छत्तीसगढ़ के जंगलों में भटक रहे हैं तो वे निश्चय ही वंदनीय हैं, लेकिन उनके बारे में आग उगल रहे अंग्रेजी अखबार यह क्यों नहीं बताते कि उन्होंने किन-किन क्षेत्रों के कितने आदिवासियों की किन-किन बीमारियों को ठीक किया? यदि सचमुच उन्होंने शुद्ध सेवा का कार्य किया होता तो अब तक काफी तथ्य सामने आ जाते। लोग मदर टेरेसा को भूल जाते हैं। पहला प्रश्न तो यही है कि कोलकाता या दिल्ली छोड़कर वे छत्तीसगढ़ ही क्यों गए? कोई दूसरा इलाका उन्होंने क्यों नहीं चुना? क्या यह किसी माओवादी पूर्व योजना का हिस्सा था या कोई स्वत:स्फूर्त माओवादी प्रेरणा थी? जेल में फंसे माओवादियों से मिलने वे क्यों जाते थे? क्या वे उनका इलाज करने जाते थे? क्या वे सरकारी डॉक्टर थे? जाहिर है कि ऐसा नहीं था।




इसीलिए चिट्ठियाँ आर-पार करने का आरोप निराधार नहीं मालूम पड़ता। मैंने खुद कई बार आंदोलन चलाए और जेल काटी है। जो लोग जेल में रहे हैं, उन्हें पता है कि गुप्त संदेश आदि कैसे भेजे और मंगाए जाते हैं। पीयूसीएल के अधिकारी के नाते बिनायक का कैदियों से मिलना डॉक्टरी कम, वकालत ज्यादा थी। यदि कॉमरेड पीयूष गुहा के थैले से वे तीन चिट्ठियां पकड़ी गईं, जो कॉमरेड नारायण सान्याल ने बिनायक सेन को जेल में दी थीं, तो गुहा की कही हुई इस बात को झुठलाने के लिए वकीलों को खड़ा करने की जरूरत क्या थी? भारत को शोषकों से मुक्त करवाने वाला क्रांतिकारी इतना छोटा-सा ‘गुनाह’ करने से भी क्यों डरता है? पकड़े गए कॉमरेडों को किराए पर मकान दिलवाने और बैंक खाता खुलवाने की बात खुद बिनायक ने स्वीकार की है। अदालत को बिनायक की सांठ-गाँठ के बारे में अब तक जितनी बातें मालूम पड़ी हैं, वे सब ऊँट  के मुँह में जीरे के समान हो सकती हैं। असली बातों तक वे बेचारे पुलिसवाले क्या पहुंच पाएंगे, जो इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट को आईएसआई (पाकिस्तानी जासूसी संगठन) समझ लेते हैं। पुलिसवालों का दिल गुस्से से लबालब हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि माओवादी हिंसा में वे ही थोक में मारे जाते हैं। वे नेता हैं, न धन्ना सेठ। उनके लिए कौन रोएगा? हमारे गालबजाऊ और आरामफरमाऊ बुद्धिजीवी तो उन्हें मच्छर के बराबर भी नहीं समझते। एक माओवादी के लिए जो आसमान सिर पर उठाने को तैयार है, वे सैकड़ों पुलिसवालों की हत्या पर मौनी बाबा का बाना धारण कर लेते हैं।


कौन हैं ये लोग? असल में ये ही ‘बाबा लोग’ हैं। अंग्रेजीवाले बाबा! इनकी पहचान क्या है? शहरी हैं, ऊँची जात हैं, मालदार हैं और अंग्रेजीदाँ  हैं। आम लोगों से कटे हुए, लेकिन देश और विदेश के अंग्रेजी अखबारों और चैनलों से जुड़े हुए। इन्हें महान बौद्धिक और देश का ठेकेदार कहकर प्रचारित किया जाता है। ये देखने में भारतीय लगते हैं, लेकिन इनके दिलो-दिमाग विदेशों में ढले हुए होते हैं। इनकी बानी भी विदेशी ही होती है। भारतीय रोगों के लिए ये विदेशी नुस्खे खोज लाने में बड़े प्रवीण होते हैं। इसीलिए शोषण और अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए गांधी, लोहिया और जयप्रकाश इन्हें बेकार लगते हैं। ये अपना समाधान लेनिन, माओ, चे ग्वारा और हो ची मिन्ह में देखते हैं। अहिंसा को ये नपुंसकता समझते हैं, लेकिन इनकी हिंसा जब प्रतिहिंसा के जबड़े में फंसती है तो वह कायरता में बदल जाती है। इसी मृग-मरीचिका में बिनायक, सान्याल, गुहा, चारु मजूमदार, कोबाद गांधी – जैसे समझदार लोग भी फंस जाते हैं। ऐसे लोगों के प्रति मूल रूप से सहानुभूति रखने के बावजूद मैं उनसे बहादुरी और सत्यनिष्ठा की आशा करता हूं। ऐसे लोगों को अगर अदालतें छोड़ भी दें तो यह छूटना उनके जीवन-भर के करे-कराए पर पानी फेरना ही है। क्या वामपंथी बुद्धिजीवी यही करने पर उतारू हैं?

जाति मिटे तो गरीबी हटे





जाति मिटे तो गरीबी हटे
डॉ. वेदप्रताप वैदिक







जातीय गणना के इरादे को देश सफल चुनौती दे रहा है| जबसे 'सबल भारत' ने 'मेरी जाति हिंदुस्तानी' आंदोलन छेड़ा है, इसका समर्थन बढ़ता ही चला जा रहा है| देश के वरिष्ठतम नेता, न्यायाधीश, विधिशास्त्री, विद्वान, पत्रकार, समाजसेवी और आम लोग भी इससे जुड़ते चले जा रहे हैं| इसमें सभी प्रांतों, भाषाओं, जातियों, धर्मों और धंधों के लोग है| ऐसा नहीं लगता कि यह मुट्रटीभर बुद्घिजीवियों का बुद्घि-विलास भर है| 



दूसरी खुशी यह है कि जो लोग हमारे आंदोलन का विरोध कर रहे हैं, वे भी यह बात बराबर कह रहे हैं कि वे भी जात-पांत विरोधी हैं| वे जन-गणना में जाति को इसीलिए जुड़वाना चाहते हैं कि इससे आगे जाकर जात-पांत खत्म हो जाएगी| कैसे खत्म हो जाएगी, यह बताने में वे असमर्थ हैं| जातीय जन-गणना के पक्ष में जो तर्क वे देते हैं, वे इतने कमज़ोर हैं कि आप उनका जवाब न दें तो भी वे अपने आप ही गिर जाते हैं| फिर भी उन सज्जनों के साहस की दाद देनी होगी कि वे जातिवाद की खुले-आम निंदा कर रहे हैं| 



जन-गणना में जात को जोड़ना ऐसा ही है, जैसे बबूल का पेड़ बोना और उस पेड़ से आम खाने का इंतजार करना ! हर व्यक्ति से जब आप उसकी जात पूछेंगे और उसे सरकारी दस्तावेजों में दर्ज करेंगे तो क्या वह अपनी जात हर जगह जताने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा ? उसकी व्यक्तिश: पहचान तो दरी के नीचे सरक जाएगी और उसकी जातिश: पहचान गद्दी पर जा बैठेगी| क्या पाठशाला-प्रवेश, क्या नौकरी, क्या पदोन्नति, क्या यारी दोस्ती, क्या काम-धंधा, क्या राजनीति, क्या सामाजिक-जीवन सभी दूर लोगों को क्या उनकी जात से नहीं पहचाना जाएगा और क्या वही उनके अस्तित्व का मुख्य आधार नहीं बन जाएगी ? आज भी जात खत्म नहीं हुई है| वह है, लेकिन उसका दायरा शादी-ब्याह तक सिमट गया है| अब दफ्तर, रेल, अस्पताल या होटल में कोई किसी की जात नहीं पूछता| सब सबके हाथ का खाना खाते हैं और शहरों में अब शादी में भी जात के बंधन टूट रहे हैं| यदि जन-गणना में हम जात को मान्यता दे देंगे तो दैनंदिन जीवन में उसे अमान्य कैसे करेंगे ? जन-गणना में पहुँचकर वह घटेगी या बढ़ेगी ?



शादी के अलावा जात अगर कहीं जिंदा है तो वह राजनीति में है| जब राजनीतिक दलों और नेताओं के पास अपना कोई शानदार चरित्र नहीं होता, सिद्घांत नहीं होता, व्यक्तित्व नहीं होता, सेवा का इतिहास नहीं होता तो जात ही उनका बेड़ा पार करती है| जात मतदाताओं की बुद्घि हर लेती है| वे किसी भी मुद्दे का निर्णय उचित-अनुचित या शुभ-अशुभ के आधार पर नहीं, जात के आधार पर करते हैं| जैसे भेड़-बकरियां झुंड में चलती हैं वैसे ही मतदाता भी झुंड-मनोवृत्ति से ग्रस्त हो जाते हैं| दूसरे अर्थों में राजनीतिक जातिवाद मनुष्यों को मवेशी बना देता है| क्या यह मवेशीवाद हमारे लोकतंत्र को जिंदा रहने देगा ? जातिवाद ने भारतीय लोकतंत्र की जड़ें पहले से ही खोद रखी हैं| अब हमारे जातिवादी नेता जन-गणना में जाति को घुसवाकर हमारे लोकतंत्र को बिल्कुल खोखला कर देंगे| जैसे हिटलर ने नस्लवाद का भूत जगाकर जर्मन जनतंत्र को खत्म कर दिया, वैसे ही हमारे जातिवादी नेता भारतीय लोकतंत्र को तहस-नहस कर देंगे| नस्लें तो दो थीं, जातियाँ तो हजारों हैं| भारत अगर टूटेगा तो वह शीशे की तरह टूटेगा| उसके हजारों टुकड़े हो जाएँगे| वह ऊपर से एक दिखेगा लेकिन उसका राष्ट्र भाव नष्ट हो जाएगा| नागरिकों के सामने प्रश्न खड़ा होगा-राष्ट्र बड़ा कि जात बड़ी ? यह कहनेवाले कितने होंगे कि राष्ट्र बड़ा है राष्ट्र बड़ा !



दलितों और पिछड़ों के जातिवादी नेताओं को यह गलतफहमी है कि जातिवाद फैलाकर वे बच निकलेंगे| वे क्यों भूल जाते हैं कि उनकी हरकतें जवाबी जातिवाद को जन्म देंगी ? जन-गणना के सवाल पर ही यह प्रक्रिया शुरू हो गई है| कई सवर्ण नेताओं ने मुझे गुपचुप कहा कि जातीय गणना अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि उससे बहुत से जाले साफ हो जाएँगे| सबसे पहले तो यह गलतफहमी दूर हो जाएगी कि देश में सवर्ण लोग सिर्फ 15 प्रतिशत हैं| ताज़ातरीन राष्ट्रीय सेम्पल सर्वे के अनुसार सवर्णों की संख्या लगभग 35 प्रतिशत है और पिछड़ी जातियों की 41 प्रतिशत ! यदि इन जातियों में से 'मलाईदार परतों' को अलग कर दिया जाए और वास्तविक गरीबों को गिना जाए तो उनकी संख्या शायद सवर्णों से भी कम निकले| ऐसी हालत में उन्हें अभी जो आरक्षण मिल रहा है, उसे घटाने की मुहिम चलाई जाएगी| 1931 की अंतिम जातीय गणना ने तथाकथित पिछड़ी जातियों की संख्या 52 प्रतिशत बताई थी| इसी आधार पर उन्हें 27 प्रतिशत आरक्षण मिल गया| तो क्या अब उसे घटाकर 20 या 22 प्रतिशत करना होगा ? इसके अलावा जातीय जनगणना हुई तो आरक्षण प्राप्त जातियों में जबर्दस्त बंदरबाँट शुरू हो जाएगी| सभी जातियों के अंदर उप-जातियाँ और अति-उपजातियाँ हैं| वे भी अपना हिस्सा माँगेंगी| जो नेता जातीय गणना की माँग कर रहे हैं, उनके छक्के छूट जाएँगे, क्योंकि उनकी प्रभावशाली खापों के विरूद्घ बगावत हो जाएगी| उनकी मुसीबत तब और भी बढ़ जाएगी, जब जाट और गूजर जैसी जातियाँ सारे भारत में आरक्षण के लिए खम ठोकने लगेगीं| उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत बाँध रखी है| इस 50 प्रतिशत को लूटने-खसोटने के लिए अब 500 से ज्यादा जातीय दावेदार खड़े हो जाएँगे| अगर जातीय गणना हो गई तो आरक्षण मजाक बनकर रह जाएगा| कौन नहीं चाहेगा कि उसे मुफ्त की मलाई मिल जाए ? जातीय गणना निकृष्ट जातिवाद को पनपाएगी | जो वास्तव में गरीब हैं, उन्हें कोई नहीं पूछेगा लेकिन जिन जातियों के पास संख्या-बल और डंडा-बल है, वे मलाई पर हाथ साफ़ करेंगी ? इस लूट-खसोट में वे मुसलमान और ईसाई भी तत्पर होना चाहते हैं, जो जातीय-अभिशाप से बचने के लिए धर्मातंरित हुए थे| 



जो लोग जातीय गणना के पक्षधर हैं, उनसे कोई पूछे कि आप आखिर यह चाहते क्यों हैं ? आप गरीबी हटाना चाहते हैं या जात जमाना चाहते हैं ? यदि गरीबी हटाना चाहते हैं तो गरीबी के आंकड़े इकट्रठे कीजिए| यदि गरीबी के आंकड़े इकट्ठे करेंगे तो उसमें हर जात का गरीब आ जाएगा| कोई भी जात नहीं छूटेगी लेकिन सिर्फ जात के आंकड़े इकट्ठे करेंगे तो वे सब गरीब छूट जाएँगे, जिनकी जाति आरक्षित नहीं हैं| भारत में एक भी जात ऐसी नहीं है, जिसके सारे सदस्य गरीब हों या अमीर हों| जिन्हें हम पिछड़ा-वर्ग कहते हैं, उनके लाखों-करोड़ों लोगों ने अपने पुश्तैनी काम-धंधे छोड़ दिए हैं| उनका वर्ग बदल गया है, फिर भी जात की वजह से हम उन्हें पिछड़ा मानने पर मजबूर किए जाते हैं| क्या आंबेडकर, क्या अब्दुल कलाम, क्या के.आर. नारायण, क्या मायावती, क्या मुलायमसिंह, क्या लालू पिछड़े हैं ? ये लोग अगड़ों से भी अगड़े हैं| क्या टाटा को कोई लुहार कहता है ? क्या बाटा को कोई चमार कहता है ? क्या कमोड बनानेवाली हिंदवेयर कंपनी को कोई भंगी कहता है ? लेकिन जातीय गणना चलाकर हम इतिहास के पहिए को पीछे की तरफ मोड़ना चाहते हैं| हर नागरिक के गले में उसकी जात की तख्ती लटकवाना चाहते हैं| 21 वीं सदी के भारत को हम पोंगापंथी और पीछेदेखू क्यों बनाना चाहते हैं ?



काका कालेलकर और मंडल आयोग के पास गरीबी के पूरे आंकड़े नहीं थे| इसीलिए उन्होंने सरल उपाय ढूँढा| जाति को आधार बनाया, लेकिन यह आधार इतना अवैज्ञानिक था कि नेहरू और मोरारजी, दोनों ने इसे रद्द कर दिया| वि.प्र. सिंह ने इस अपना राजनीतिक हथियार बनाया| उनकी राजनीति तो कुछ माह के लिए सँवर गई लेकिन समाज बिखर गया| असली गरीबों को कोई खास लाभ नहीं मिला| अब जबकि लाखों कर्मचारी हैं, कंप्यूटर हैं, विशेषज्ञ हैं, गरीबी के सही-सही आंकड़ें क्यों नहीं इकट्रठे किए जाते ? जात के अधूरे, असत्य और अवैज्ञानिक आंकड़े इकट्ठे करके आप कैसी नीति बनाएँगे, यह बताने की जरूरत नहीं है| जिस जातीय गणना का विरोध 1931 में गांधी, नेहरू और कांग्रेस ने किया और जिसे हमारे संविधान-निर्माताओं ने अनुचित माना, उस कैंसर के कीटाणु को अब राष्ट्र की धमनियों में धँसवाने की कोशिश क्यों हो रही है ? क्या हम भूल गए कि 11 जनवरी 1931 को राष्ट्रीय कांग्रेस ने 'जन-गणना बहिष्कार दिवस' मनाया था ?



जो लोग जातीय गणना के पक्षधर हैं, वे अनजाने ही देश के पिछड़े वर्गों, गरीबों और वंचितों का बंटाढार करवाने पर तुले हुए हैं| वे आरक्षण को अनंतकाल तक बनाए रखना चाहते हैं| देश के 60-70 प्रतिशत लोग सदा अपाहिज बने रहें, सवर्णों की दया पर जिंदा रहे और आरक्षण की बेसाखियों के सहारे घिसटते रहें, यही उनकी गुप्त वासना है| इस वासना के मूल में है, वोटों की राजनीति ! तीन-चौथाई भारत अपंग बना रहे तो बने रहे, हमें तो वह वोट देता रहेगा| डॉ. आंबेडकर खुद इस आरक्षण को दस साल से ज्यादा नहीं चलाना चाहते थे लेकिन अब साठ साल चलकर भी यह कहीं नहीं पहुँचा है| देश की प्रथम श्रेणी की नौकरियों में आरक्षित पद खाली पड़े रहते हैं| अब तक केवल 4-5 प्रतिशत आरक्षित पद ही भरे जाते हैं| योग्यता का मानदंड ढीला कर देने पर भी यह हाल है| हमारे जातिवादी नेता मूल में क्यों नहीं जाते ? वे हमारे देश के पिछड़ों के लिए किसी ऐसे आरक्षण का प्रावधान क्यों नहीं करते, जिसे पाकर वे अगड़ों से भी अधिक योग्य बनें| किसी की दया पर जिंदा न रहें| ऐसा आरक्षण नौकरियों में नहीं, शिक्षा में दिया जाना चाहिए| किसी जाति या मजहब के भेदभाव के बिना प्रत्येक वंचित के बच्चों को दसवीं कक्षा तक मुफ्त शिक्षा, मुफ्त आवास, मुफ्त भोजन और मुफ्त वस्त्र् मुहैया करवाए जाएँ| देखिए, सिर्फ दस साल में क्या चमत्कार होगा| भारत का नक्शा ही बदल जाएगा| यदि बच्चों को काम-धंधों का अनिवार्य प्रशिक्षण दिया जाए तो वे सरकारी बाबू क्यों बनना चाहेंगे ? जिस दिन भारत में हाड़-तोड़ काम की इज्जत और लज्जत कुर्सीतोड़ काम के लगभग बराबर या ज्यादा हो जाएगी, उसी दिन इस देश में क्रांति हो जाएंगी| समतामूलक समाज बनेगा| न कोई सवर्ण रहेगा और न अवर्ण ! द्विज और अद्विज में फर्क नहीं होगा| सभी द्विज होंगे| शिक्षा के गर्भ से दुबारा जन्मे हुए !




भारत का संविधान प्रतिज्ञा करता है कि वह भारत को जातिविहीन समाज बनाएगा लेकिन हमारे कुछ नेता संविधान को शीर्षासन कराने पर उतारू हैं| संविधान में 'जातियों' को संरक्षण या आरक्षण देने की बात कहीं भी नहीं कही गई है| 'अनुसूचित जाति' शब्द का प्रयोग जरूर हुआ है लेकिन सबको पता है कि अनुसूचित नाम की कोई जाति भारत में नहीं है| हरिजन, अछूत और दलित शब्द पर ज्यादातर लोगों को आपत्ति थी| इसीलिए अछूतों के लिए 'अनुसूचित जाति' शब्द का प्रयोग हुआ| अस्पृश्यता को खत्म करने के लिए जैसे 'अनुसूचित जाति' शब्द का प्रयोग हुआ, वैसे ही हमने जातिवाद को खत्म करने के लिए 'मेरी जाति हिंदुस्तानी' शब्द का प्रयोग किया है| संविधान में 'पिछड़े वर्गों' के 'नागरिकों' के प्रति विशेष सुविधा की बात कही है| थोकबंद जातियों की बात नहीं, जरूरतमंद नागरिकों की बात ! जातीय आधार पर थोक में रेवडि़याँ बाँटना संविधान का उल्लंघन तो है ही, यों भी उन सबका हक मारना भी है, जो सच में जरूरतमंद हैं| रेवडि़याँ भी कितनी हैं ? हर साल पिछड़ों को यदि चार-पाँच हजार नौकरियाँ मिल गईं तो भी क्या उन 70-80 करोड़ लोगों का पेट भर जाएगा, जो 20 रू. रोज़ पर गुजारा कर रहे हैं ? चार-पाँच हजार के मुँह में लॉलीपॉप और 80 करोड़ के पेट पर लात, यही जातीय आरक्षण की फलश्रुति है| यदि जातीय गणना के आधार पर आरक्षण 70 प्रतिशत भी हो गया तो किसका भला होगा ? सिर्फ मलाईदार परतों का ! जो नेता और नौकरशाह पिछड़ी जातियों के हैं, उनके 'शील और व्यसन' सवर्णों से भी ज्यादा गए-बीते हैं| वे अपनी जातियों से कट चुके हैं| जातीय गणना करवाकर वे अपनी जातियों के लोगों को अपनी ही तोप का भूसा बनाएँगे| वे अपने ही लोगों को ठगेंगे | वे संविधान और राज्य की मर्यादा का भी उल्लंघन करेंगे| संविधान और भारत गणराज्य सभी नागरिकों की समान सेवा और रक्षा के लिए बने हैं, न कि कुछ खास जातियों के लिए ! सबकी जातें गिनवाकर आप जातिविहीन समाज की रचना कैसे करेंगे, यह समझ में नहीं आता| हम भारत को जातिविहीन बनाने की बजाय जातियों का महाभारत तो नहीं बना देंगे ?



जातीय गणना के पक्षधर अपने समर्थन में अमेरिका का उदाहरण देने लगते हैं| जैसे कालों की गिनती हुई और उन्हें विशेष अवसर दिया गया, वैसे ही भारत में जातीय गणना हो ओर विशेष अवसर दिए जाएँ| यह तुलना अज्ञान पर आधरित है| अमेरिका के काले लोगों की तुलना भारत के अद्विजों से बिल्कुल नहीं की जा सकती| भारत की अद्विज जातियाँ और द्विज जातियाँ भी ऊपर-नीचे होती रहती हैं| द्विज कब अद्विज और अद्विज कब द्विज बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता| 1931 के सेंसस कमिश्नर डॉ. जे. एच. हट्रटन ने तो यहाँ तक कहा था कि एक ही समय में एक ही जाति एक ही प्रांत में द्विज और अद्विज दोनों है| कई जातियों ने अपने आप को 1911 की जनगणना में चमार लिखाया था| उन्हीं ने 1921 में खुद को क्षत्रिय और 1931 में ब्राह्मण लिखवा दिया| इसी तरह अंग्रेजों के जमाने में हुई जनगणनाओं में जातियों की संख्या कुछ सौ से बढ़कर हजारों में चली गई| जातीय गणना कभी वैज्ञानिक हो ही नहीं सकती, क्योंकि हर व्यक्ति अपनी जाति ऊँची बताता है या अपने जातीय मूल को ऊँचा बताता है| उसे नापने का कोई वस्तुनिष्ट मापदंड है ही नहीं| गरीबी का है, जाति का नहीं| कालों की जाति पूछने की जरूरत कभी नहीं होती| वह तो देखने से ही पता चल जाती है| उनकी सिर्फ गरीबी पूछी गई और उसका इलाज़ किया गया| इसी तरह भारत में हम जाति को भूलें और गरीबी को याद रखें| जात को याद रखने से गरीबी दूर नहीं होगी| गरीब की जात क्या होती है ? वह तो खुद ही एक जात है| भारत की जातियाँ प्राकृतिक नहीं है| मनुष्यकृत हैं| वे जैसे पैदा की गई हैं, वैसे ही खत्म भी की जा सकती हैं लेकिन गोरे और काले का रंगभेद तो प्रकृत्तिप्रदत्त हे| इसीलिए रंगभेद और जातिभेद की तुलना नहीं की जा सकती, हालाँकि काले और गोरे का भेद भी ऊपरी ही है| सच्चाई तो यह है कि सारी मनुष्य जाति ही एक है| यदि एक नहीं होती तो वह समान प्रसवात्मिका कैसे होती ? जैसे सवर्ण और अवर्ण स्त्री-पुरूष से संतान पैदा होती है, क्या गोरे और काले युग्म से नहीं होती ? काले और गोरे के भेद में भी मनुष्यता का अभेद छिपा है| कोई गणना अगर मनुष्यों के बीच नकली और ऊपरी भेदों को बढ़ाए तो सभ्य समाज उसका स्वागत कैसे कर सकता है ?



जातीय जनगणना भारत को दुनिया के सभ्य समाज में बैठने लायक नहीं रहने देगी| अभी भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है| जातीय जन-गणना के बाद उसे लोकतंत्र नहीं, जातितंत्र माना जाएगा| जन्म के आधार पर भेद-भाव करनेवाला भारत दुनिया का एक मात्र राष्ट्र होगा| कई रंगभेद विरोधी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारतीय प्रतिनिधियों को जातिभेद के कारण भयंकर लताड़ें खानी पड़ती हैं| लोकतंत्र में हर नागरिक समान होता है लेकिन जातितंत्र में तो ऊँच-नीच का गगनचुंबी पिरेमिड उठ खड़ा होगा| यदि देश में 10 हजार जातियाँ होंगी तो यह जातीय पिरेमिड 10 हजार तल्लेवाला होगा| महाशक्ति के दर्जे पर पहुँचनेवाले भारत के लिए इससे बड़ा खतरा क्या होगा कि विदेशी शक्तियाँ इस जातीय विभाजन का इस्तेमाल अपनी स्वार्थ-सिद्घि के लिए करेंगी| यह संयोग मात्र नहीं है कि भारत के विशेषज्ञ माने जानेवाले अनेक विदेशी समाजशास्त्री जातीय गणना के कट्टर वकील बन गए हैं| क्यों बन गए हैं ? वे कहते हैं कि भारत को जानने-समझने के लिए सही-सही आंकड़ें चाहिए| वे भारत को जानना-समझना क्यों चाहते हैं ? किसलिए चाहते हैं ? क्या इसलिए नहीं कि वे अपने-अपने राष्ट्रों के संकीर्ण स्वार्थों को सिद्घ करना चाहते हैं ? वे जातीय गणना के जरिए जातिवाद के उस जहर को दुबारा फैलाना चाहते हैं, जो 1857 के बाद अंग्रेजों ने फैलाया था| अंग्रेज ने प्रथम स्वाधीनता संग्राम के ठीक चार साल बाद जनगणना शुरू की और उसमें धीरे-धीरे मजहब और जात का जहर घोल दिया| 1871 की जनगणना से जन्मी हंटर आयोग की रपट 1905 के बंग-भंग का कारण बनी| मुसलमानों के बारे में इकट्रठे किए गए आंकड़ों का जो हश्र 1905 और 1947 में हुआ, वह अब जातियों के आंकड़ों का नहीं होगा, इसकी क्या गारंटी है ? जाति का ज़हर स्वाधीनता आंदोलन को नष्ट कर सकता था इसीलिए कांग्रेस ही नहीं, भगतसिंह, सुभाष, सावरकर और यहाँ तक कि आंबेडकर जैसे लोगों ने भी जातिवाद का विरोध किया| आंबेडकर ने तो 'जातिप्रथा का समूलनाथ' नामक ग्रंथ भी लिखा| आजादी के बाद राममनोहर लोहिया ने 'जात तोड़ो' आंदोलन भी चलाया| जातीय गणना आंबेडकर और लोहिया के सपनों को दफन कर देगी| 



भारत के किसी भी आर्ष-ग्रंथ में जन्मना जाति का समर्थन नहीं है बल्कि कई जगह कहा गया है - 'जन्मन: जायते शूद्र:, संस्कारात् द्विज उच्यते' अर्थात जन्म से सब शूद्र होते हैं, संस्कार से द्विज बनते हैं| गीता में भगवान कृष्ण भी यही कहते हैं| - चातुर्वण्यं मया सृंष्टम् गुणकर्मविभागश: | याने चारों वर्ण मैंने गुण-कर्म के आधार पर बनाए हैं| मनुस्मृति में भी जन्मना जाति का स्पष्ट विरोध है| इसीलिए मैं कहता हूँ कि जो लोग जातीय आधार पर राजनीति कर रहे हैं, उन्हीं की व्याख्या के अनुसार वे घोर 'मनुवादी' हैं| उन्होंने मनु की मूर्खतापूर्ण व्याख्या की और वे खुद उस 'मनुवाद' के सबसे बड़े प्रवक्ता बन गए हैं| कैसी विडंबना है कि जिन्हें जातिवाद के समूलनाश का व्रत लेना चाहिए था, वे उसके सबसे बड़े संरक्षक बन गए हैं| 



डॉ. लोहिया ने कहा था, 'मैं समझता हूँ कि हिंदुस्तान की दुर्गति का सबसे सबसे बड़ा कारण जाति प्रथा है|' उन्होंने विदेशी हमलावरों की विजय का कारण भी देश में चली आ रही जाति प्रथा को ही माना है| जाति-प्रथा सामाजिक जड़ता की प्रतीक है| जब तक देश में जाति प्रथा कायम रहेगी, किसी को सामाजिक न्याय मिल ही नहीं सकता| अपनी योग्यता से कोई आगे नहीं बढ़ सकता| यदि आप ब्राह्रमण के घर में पैदा नहीं हुए तो शोध और अध्ययन नहीं कर सकते, यदि आप राजपूत नहीं तो हमलावरों से कैसे लड़ेंगे, यदि आप बनिए के घर पैदा नहीं हुए तो पूँजी कैसे बनाएँगे और यदि आप शूद्र के घर जन्मे हैं तो आप सिर्फ झाड़ू लगाएँगे या मजदूरी करेंगे| किसी भी राष्ट्र को तबाह करने के लिए क्या इससे अधिक कुटिल सूत्र कोई हो सकता है? भारत महाशक्ति बन रहा है तो इस सड़े हुए सूत्र के पतले पड़ने के कारण| अब जातीय गणना करवाकर इस सूत्र को, इस धागे को क्या हम मोटे से रस्से में नहीं बदल देना चाहते हैं ? पिछले सौ-सवा सौ में देश की विभिन्न जातियों के जो कठघरे ज़रा चरमराए हैं और इस चरमराहट के कारण जो सामाजिक तरलता बढ़ी है, क्या जातीयता बढ़ाकर हम उसे भंग नहीं कर देंगे ? यदि शासकीय नीतियों का आधार जाति को बनाया जाएगा तो क्या हमारे अनेक पिछड़ी जातियों के नेताओं, विद्वानों और उद्योगपतियों को दुबारा उनके पुश्तैनी धंधों में धकेला जाएगा ? क्या उन्हें भेड़-चराने, मैला साफ करने और जूते गाँठने पर मजबूर किया जाएगा ? यदि नही तो फिर जातीय चेतना जगाने की तुक क्या है ?



जात को खत्म किए बिना देश से गरीबी खत्म नहीं की जा सकती| जन-गणना में जाति जुड़वाने के बजाय माँग तो यह होनी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति अपने नाम के आगे से जातीय उपनाम (सरनेम) हटाए, जैसे कि हमारी मतदाता-सूचियों में होता है| अंग्रेज के आने के पहले क्या भारत में कोई जातीय उपनाम लगाता था ? राम, कृष्ण, बुद्घ, महावीर, सूर, तुलसी, कबीर, अशोक, अकबर, प्रताप, शिवाजी, नानक, कबीर - किसके नाम से उसकी जाति पता चलती है ?  गुलामी में पनपी इस विष-बेल को हम कब काटेंगे ? जो भी जातीय उपनाम लगाए, ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव न लड़ने दिये जाएँ और सरकारी कर्मचारियों पर भी यही प्रतिबंध लागू किया जाए| जातीय आधार पर आरक्षण माँगनेवाले दलों की वैधता रद्द की जाए| जाति के इन बाहरी चिन्हों को नष्ट किया जाए तो वह अंदर से भी टूटेगी|



जात-पांत के पतले पड़ने के कारण ही भारत की गुप्त ऊर्जा का अपूर्व विस्फोट हुआ है| ऐसे लाखों-करोड़ों लोग हैं, जो अपने जातीय धंधों की अंधी गली से बाहर निकले और उन्होंने अपनी व्यक्तिगत प्रतिभा से सारे राष्ट्र को रोशन कर दिया| जातीय गणना होने पर इन लोगों को अपनी जात लिखानी होगी| इनका इससे बड़ा अपमान क्या होगा ? देश का सबसे बड़ा विज्ञानकर्मी क्या यह लिखवाएगा कि वह मछुआरा है ? क्या यह सत्य होगा ? जातीय गणना देश में झूठ का विस्तार करेगी| 



जातीय गणना उन सब परिवारों को भी काफी पसोपेश में डाल देगी, जो अंतरजातीय हैं| जिन परिवारों में पिछली दो-तीन पीढि़यों में अंतरजातीय, अंतरधार्मिक और अंतरराष्ट्रीय विवाह होते रहे हैं, वे अपनी जात क्या लिखाएँगे ? जातीय गणना प्रकारांतर से कहेगी कि इस तरह के विवाह उचित नहीं हैं, क्योंकि वे जातीय मर्यादा को भंग करते हैं| व्यक्ति-स्वात्रंत्र्य पर इससे बड़ा प्रहार क्या होगा ? भारत के नागरिकों के जीवन का संचालन भारत के संविधान से नहीं, गाँवों की खापों और पंचायतों से होगा, जिनके हाथ स्वतंत्रचेता युवजनों के खून से रँगे हुए हैं|



भारत के उच्चतम न्यायालयों के अनेक निर्णयों में जाति को पिछड़ापन के निर्धारण में सहायक तो माना है लेकिन उसे एक मात्र प्रमाण नहीं माना है| उच्चतम न्यायालय ने 'मलाईदार परतों' की पोल खोलकर यह सिद्घ कर दिया है कि गरीबी का निर्धारण सिर्फ जाति के आधार पर नहीं किया जा सकता| यदि आरक्षण का आधार सिर्फ जाति है तो उसी जाति के कुछ लोगों को 'मलाईदार' कहकर आप जात-बाहर कैसे कर सकते हैं ? यदि करते हैं तो आपको मानना पड़ेगा कि गरीबी का निर्धारण सिर्फ जाति के आधार पर नहीं हो सकता| वास्तव में गरीबी का निर्धारण तो गरीबी के आधार पर ही हो सकता है| उच्चतम न्यायालय ने अपने ताज़ातरीन निर्णय में दक्षिण भारतीय राज्यों की इस तिकड़म पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है कि उन्होंने अपने यहाँ आरक्षण 69 प्रतिशत तक कर दिया है| न्यायालय ने उन्हें सिर्फ एक साल की मोहलत दी है, यह सिद्घ करने के लिए कि उन्होंने जो बंदरबाँट की है, उसका आधार क्या है ? जाहिर है कि इस बंदरबाँट का जातीय आधार उच्चतम न्यायालय की कूट-परीक्षा के आगे ध्वस्त हुए बिना नहीं रहेगा| जाति की आड़ में गरीबी को दरकिनार करने की साजिश कभी सफल नहीं हो पाएगी| 



गरीबी के इस तर्क-संगत आधार को मानने में हमारे राजनीतिक दल बुरी तरह से झिझक रहे हैं| ऐसा नहीं कि वे इस सत्य को नहीं समझते| वे जान-बूझकर मक्खी निगल रहे हैं| वे वोट बैंक के गुलाम हैं| वे यह मान बैठे हैं कि यदि उन्होंने जातीय गणना का विरोध किया तो उनके वोट कट जाएँगे| उन्हें नुकसान हो जाएगा| वे यह भूल जाते हैं कि जातीय वोट मवेशीवाद के तहत जातिवादी पार्टियों को ही मिलेंगे| उन्हें नहीं मिलेंगे| इसके बावजूद उनकी दुकान चलती रह सकती है, क्योंकि देश के बहुसंख्यक लोग जाति नहीं, गुणावगुण के आधार पर वोट करते हैं| यदि ऐसा नहीं होता तो केंद्र में कांग्रेस और भाजपा की सरकारें कैसे बनतीं ? देश में जितनी शिक्षा, संपन्नता और आधुनिकता बढ़ेगी, जाति का शिकंजा ढीला होता चला जाएगा| जाति गरीबी को बढ़ाती है और गरीबी जाति को बढ़ाती है| जिस दिन हमारे नेता गरीबी-उन्मूलन का व्रत ले लेंगे, जाति अपने आप नेपथ्य में चली जाएगी| सदियों से निर्बल पड़ा भारत अपने आप सबल होने लगेगा|



 (लेखक, 'सबल भारत' के संस्थापक हैं और 'मेरी जाति हिंदुस्तानी' आंदोलनके सूत्रधार हैं)

जातिवाद फैलाना शुद्ध देशद्रोह



जातीय जनगणना के विरूद्घ विशाल मार्च


नई दिल्ली, 27 जुलाई 2010 |

जनगणना में जाति को सम्मिलित करने के विरोध में "सबल भारत" द्वारा संचालित "मेरी जाति हिंदुस्तानी आंदोलन" ने आज एक विशाल मार्च का आयोजन किया| सैकड़ों, छात्र , लेखकों, पत्र्कारों, बुद्घिजीवियों, उद्योगपतियों एवं किसानों ने 13, बाराखंबा रोड से जंतर-मंतर तक मार्च किया| इस मार्च का नेतृत्व आंदोलन के सूत्रधार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने किया|



मार्च में भाग लेनेवाले अनेक राष्ट्रीय ख्याति के लोग नारे लगाते जा रहे थे कि  "सौ बातों की बात यहीं, जनगणना में जात नहीं", "जनगणना में जात नहीं, भारत को तू बाँट नहीं", "भारतमाता की यह बानी, मेरी जाति हिंदुस्तानी" आदि|



मार्च का समापन जंतर-मंतर पर हुआ| जंतर-मंतर पर एक विराट सभा हुई| सभा में विशेष रूप से भाजपा के वरिष्ठ नेता, जाने-माने अधिवक्ता तथा राज्यसभा सांसद श्री राम जेठमलानी, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष तथा पूर्व राज्यपाल श्री बलराम जाखड़, प्रसिद्घ पत्रकार टाइम्स आफ इंडिया के पूर्व मुख्य संपादक डॉ. दिलीप पडगाँवकर, पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री आरिफ मो. खान, भारत के पूर्व जाइंट चीफ आफ इंटेलिजेंस श्री आर के खंडेलवाल, राजस्थान भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तथा पूर्व राज्यसभा सांसद श्री महेशचंद्र शर्मा, पूर्व राजदूत श्री जगदीश शर्मा, प्रसिद्घ नृत्यागंना सुश्री उमा शर्मा, प्रसिद्घ समाजसेवी श्रीमती अलका मधोक एवं फिल्म निर्माता डॉ. लवलीन थडानी, जैन मुनि डॉ. लोकेशचंद्र, ईसाई नेता श्री फ्रांसिस आदि वक्ताओं ने सभा को संबोधित किया| सभा की अध्यक्षता आंदोलन के सूत्रधार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने की|



सभा को संबोधित करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता तथा भाजपा के सांसद श्री राम जेठमलानी ने कहा कि मैं इस आंदोलन का पुरजोर समर्थन करता हूँ तथा इस आंदोलन के लिए मैं अपने रक्त की अंतिम बूँद तक बहाने को तैयार हूँ| हमारे देश को गुलाम बनाए रखने के लिए जाति का आधार ही अंग्रेजों का मुख्य हथियार था| उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि राबर्ट क्लाइव ने ईस्ट इंडिया कंपनी को लिखे अपने पत्र में कहा था कि हम भारत में खुश हैं, हमारी ताकत तथा व्यापार दिन प्रतिदिन मजबूती से बढ़ रहा है, क्योंकि भारत के लोग जाति के नाम पर बँटे हुए हैं|


श्री बलराम जाखड़ ने कहा कि जनतंत्र में हम सभी को अपनी बात कहने का हक है| भारत की अखंडता एवं एकता की रक्षा हमारा धर्म है| हमें ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे देश बंटे| जनगणना में जाति को शामिल करना देशद्रोह के समान है| यह सबसे बड़ा कुकर्म है| इससे बड़ा बुरा काम कोई और नहीं हो सकता|



जुलूस में भाग ले रहे वरिष्ठ पत्रकार डॉ. दिलीप पडगाँवकर ने कहा कि जातिगत बातें मात्र वोट बैंक की राजनीति के लिए है| हमारे लिए देश का संविधान सबसे प्रमुख है और गणतंत्र को बचाने के लिए जातीय जनगणना का विरोध करना आवश्यक है| संविधान में स्पष्ट कहा गया है कि जाति, धर्म के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं होना चाहिए| आंबेडकर का अंतिम भाषण सभी को पढ़ाया जाना चाहिए, जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा था कि कोई भी जातीय-भेदभाव नहीं होना चाहिए|



देश के पूर्व राजदूत जगदीश शर्मा ने कहा कि जातीय आधार पर देश को बाँटने की कोशिश भारत को सारी दुनिया में बदनाम कर देगी| भारत की सेना इसीलिए महान मानी जाती है कि उसका आधार जाति नहीं, राष्ट्र है|



भारत के पूर्व जाइंट चीफ आफ इंटेलिजेंस आर. के. खंडेलवाल ने कहा कि देश को जोड़ने के लिए गांधीजी ने हिन्दु-मुस्लिम एकता का काम किया था| आज हम जातिगत बँटवारा कर के देश को कहाँ ले जा रहे है ?



पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री आरिफ मो. खान ने कहा कि जातीय गणना बिल्कुल अवैज्ञानिक है| इसके आधार पर गरीबों का नहीं, कुछ जातियों की मलाईदार परतों का ही भला हो सकता है|



रैली को संबोधित करते हुए जैन मुनि लोकेशजी ने कहा कि जाति से बड़ा हमारा राष्ट्र है| यदि राष्ट्र एक और अखंड रहा तो हम रहेंगे, वर्ना हम ही कहाँ  रह पाएँगे| दलित ईसाई नेता फ्रांसिस ने कहा कि जाति एक घातक बीमारी है| हम सब एक हैं| जातिगत आधार पर कोई भेदभव नहीं होना चाहिए|



इस अवसर पर प्रसिद्घ कलाकार उमा शर्मा, समाजिक कार्यकर्ता श्रीमती अलका मधोक और श्रीमती लवलीन थडानी ने भी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया| कार्यक्रम का संचालन आंदोलन के सूत्रधार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने किया| श्री अशोक कावडि़या ने मुख्य अतिथियों और जुलूस में भाग लेनेवाले साथियों को धन्यवाद दिया|





INTELLECTUALS MARCH AGAINST CASTE CENSUS

JAKAHR, JETHMALANI & PADGAONKAR ADDRESS THE RALLY



New Delhi, 28 July 2010. Hundreds of intellectuals, writers, arists, students and leaders representing various walks of the civil society took out an impressive march from Barakhamba Road to Jantar Mantar led by Dr.V.P Vaidik the founder and National Convener of Meri Jati Hindustani Movement. They opposed the inclusion of Caste in the Census (2011).

The March and Meeting at Jantar Mantar were joined by former Cabinet Ministers Balram Jakhar, Ram Jethmalani, Arif M. Khan, eminent journalist Dr. Dilip Padgaonkar, Ambassador J.C Sharma, former Chief of Joint Intelligence R.K Khandelwal, famous dancer Uma Sharma, leader of poor Christians R.L Francis, Dr. Lavlin Thadani, Alka Madhok and many other intellectuals, diplomats, industrialists and academics. Former Speaker Mr. Somnath Chatterjee and Former Cabinet Minister Mr. K.C. Pant sent their good wishes for the rally.

The Marchers were raising very interesting slogans. ‘Meri Jati’ – Hindustani. ‘Sau Baton ki ek baat yahee, Janganana me Jaat nahi’. ‘Janganana mei jaat nahi, Bhart ko tu baant nahi’. ‘Bharat Mata ki yah Baani, Hum Sab Hai Hindustani’.

While addressing the gathering after the March, Mr. Ram Jethmalani said that he is ready to shed the last drop of his blood to fight for this noble cause. He quoted from a letter of Lord Clive, who had said that as long as the caste – system is alive in India, there is no threat to the British Empire. The caste in the census will create a new monster which will demolish the modern India. Every right thinking Indian must oppose this regressive idea.

Mr. Balram Jakhar said that the inclusion of caste in census is the dirtiest trick to destroy the Indian unity. What we have achieved in the last 63 years shall disappear in a single stroke. The revival of caste is akin to treason. Every Indian must oppose this anti-national idea.

Mr. Dilip Padgaonkar minced no words to condemn the vote bank politics which is least concerned with the welfare of the poor. The caste enumeration will sap the foundation of our Republic, he opined. It goes against the spirit of the Constitution and the ideals of Baba Ambedkar.

Ambassador J.C Sharma said that to divide India on the basis of caste would be a big embarrassment for an emerging world power like India. Former Cabinet Minister Arif M Khan said the caste enumeration is a case of bad mathematics. It is very unscientific. It will not benefit the poor people. It will serve the narrow purpose of the creamy layers of the backward people.

The meeting was addressed by many others including R. K. Khandelwal, R.L Francis, Lokesh Muni, Dr. Lavlin Thadani, Alka Madhok and Uma Sharma. Dr. Vaidik presided over the meeting.

Mr. Ashok Kavaria, the organizer, thanked everybody at the end.



मीडिया प्रभारी
अशोक कावड़िया

जनगणना से जात हटाओ: रविवार को उपवास और धरना

(जनगणना से जात हटाओ)
रविवार को उपवास और धरना
           देश भर में फैले अपने सभी साथियों से मैं अनुरोध करता हूं कि आप कृपया रविवार (18 जुलाई 2010) को अपने शहर या गांव में सार्वजनिक उपवास और धरने का आयोजन करें| यह उपवास आत्म-प्रेरणा और आत्म-शुद्घि के लिए है|
           यह कार्यक्रम सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक चलाएँ| शहर के जाने-माने लोगों को आमंत्रित करें| वे शाम तक न बैठ सकें तो उद्‍घाटन में ही शामिल हो जाएँ|
            इसकी परवाह न करें कि आपके साथ कितने लोग आ रहे हैं| उपवास के लिए तो एक व्यक्ति ही काफी है| अपने उपवास की सूचना अखबारों और टीवी चैनलों को पहले से दे दीजिए|
            यदि आप पोस्टर और स्टिकर लगवा सकें तो और भी अच्छा !
             कृपया आयोजन की अगि्रम सूचना अवश्य भेजिए|
कृपया इस संदेश को अपने सभी मित्रें को फार्वर्ड कर दें|

आपका
वेदप्रताप वैदिक

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क्रिकेट की बीमारी और गुलामी



क्रिकेट की बीमारी और गुलामी 
डॉ. वेदप्रताप वैदिक 



शशि थरूर और ललित मोदी तो बीमारी के ऊपरी लक्षण हैं। असली बीमारी तो खुद क्रिकेट ही है। क्रिकेट खेल नहीं है, बीमारी है। यह कैसा खेल है, जिसमें ११ खिलाड़ियों की टीम में से सिर्फ एक खेलता है और शेष १० बैठे रहते हैं ? विरोधी टीम के बाकी ११ खिलाड़ी खड़े रहते हैं। उनमें से भी एक रह-रहकर गेंद फेंकता है। कुल २२ खिलाड़ियों में २० तो ज्यादातर वक्त निठल्ले बने रहते हैं, ऐसे खेल से कौन-सा स्वास्थ्य लाभ होता है ? पाँच-पाँच दिन तक दिन भर चलने वाला यह खेल क्या खेल कहलाने के लायक है ? जिंदगी में खेल की भूमिका क्या है ? काम और खेल के बीच कोई अनुपात होना चाहिए या नहीं ? सारे काम-धाम छोड़कर अगर आप सिर्फ खेल ही खेलते रहें तो खाएँगे क्या ? जिंदा कैसे रहेंगे ? क्रिकेट का खेल ब्रिटेन में चलाया ही उन लोगों ने था, जिन्हें कमाने-धमाने की चिंता नहीं थी। दो सामंत खेलते थे। एक ‘बेटिंग’ करता था और दूसरा ‘बॉलिंग’ ! शेष नौकर-चाकर पदते थे। दौड़कर गेंद पकड़ते थे और उसे लाकर ‘बॉलर’ को देते थे। यह सामंती खेल है। अय्याशों और आरामखोरों का खेल ! इसीलिए इस खेल के खिलौने भी खर्चीले होते हैं। जैसे रात को शराबखोरी मनोरंजन का साधन होती है, वैसे ही दिन में क्रिकेट फालतू वक्त काटने का साधन होता है। दो आदमी खेलें और २० पदें, इससे बढ़कर अहं की तुष्टि क्या हो सकती है? यह मनोरंजनों का मनोरंजन है। नशों का नशा है। असाध्य रोग है।




अंग्रेजों का यह सामंती रोग उनके गुलामों की रग-रग में फैल गया है। यदि अंग्रेज के पूर्व-गुलाम राष्ट्रों को छोड़ दें तो दुनिया का कौन सा स्वतंत्र राष्ट्र है, जहाँ क्रिकेट का बोलबाला है? ‘इंटरनेशनल क्रिकेट कौंसिल’ के जिन दस राष्ट्रों को अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने का अधिकार है, वे सब के सब अंग्रेज के भूतपूर्व गुलाम-राष्ट्र हैं। चार तो अकेले दक्षिण एशिया में हैं - भारत,पाक, बांग्लादेश और श्रीलंका ! कोई यह क्यों नहीं पूछता कि इन दस देशों में अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी, फ़्रांस और जापान जैसे देशों के नाम क्यों नहीं हैं? क्या ये वे राष्ट्र नहीं हैं, जो ओलम्पिक खेलों में सबसे ज्यादा मेडल जीतते हैं? यदि क्रिकेट दुनिया का सबसे अच्छा खेल होता तो ये समर्थ और शक्तिशाली राष्ट्र इसकी उपेक्षा क्यों करते ? क्रिकेट का सौभाग्य तो यह है कि इस खेल में गुलाम अपने मालिकों से भी आगे निकल गए हैं। क्रिकेट के प्रति भूतपूर्व गुलाम राष्ट्रों में वही अंधभक्ति है, जो अंग्रेजी भाषा के प्रति है। अंग्रेजों के लिए अंग्रेजी उनकी सिर्फ मातृभाषा और राष्ट्रभाषा है लेकिन ‘भद्र भारतीयों’ के लिए यह उनकी पितृभाषा, राष्ट्रभाषा, प्रतिष्ठा-भाषा, वर्चस्व-भाषा और वर्ग-भाषा बन गई है। अंग्रेजी और क्रिकेट हमारी गुलामी की निरंतरता के प्रतीक हैं।




जैसे अंग्रेजी भारत की आम जनता को ठगने का सबसे बड़ा साधन है, वैसे ही क्रिकेट खेलों में ठगी का बादशाह बन गया है। क्रिकेट के चस्के ने भारत के पारंपरिक खेलों, अखाड़ों और कसरतों को हाशिए में सरका दिया है। क्रिकेट पैसा, प्रतिष्ठा और प्रचार का पर्याय बन गया है। देश के करोड़ों ग्रामीण, गरीब, पिछड़े और अल्पसंख्यक लोग यह मंहगा खेल स्वयं नहीं खेल सकते लेकिन देश के उदीयमान मध्यम वर्ग ने इन लोगों को भी क्रिकेट के मोह-जाल में फँसा लिया है। आई पी एल जैसी संस्था के पास सिर्फ तीन साल में अरबों रूपए कहाँ से इकटठे हो गए ? उसने टी वी चैनलों, रेडियो और अखबारों का इस्तेमाल बड़ी चतुराई से किया। भारतीयों के दिलो-दिमाग में छिपी गुलामी की बीमारी को थपकियाँ दीं। जैसे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भोले लोग अपने बच्चों को अपना पेट काटकर पढ़ाते हैं, वैसे ही लोग क्रिकेट-मैचों के टिकिट खरीदते हैं, टीवी से चिपके बैठे रहते हैं और खिलाड़ियों को देवताओं का दर्जा दे देते हैं। क्रिकेट-मैच के दिनों में करोड़ों लोग जिस तरह निठल्ले हो जाते हैं, उससे देश का कितना नुकसान होता है, इसका हिसाब किसी ने तैयार किया है, क्या ? क्रिकेट-मैच आखिरकर एक खेल ही तो है, जो घोंघा-गति से चलता रहता है। यह कोई रामायण या महाभारत का सीरियल तो नहीं है। ये सीरियल भी दिन भर नहीं चलते। घंटे-आधे-घंटे से ज्यादा नहीं ! कोई लोकतांत्रिक सरकार अपने देश में धन और समय की इस सार्वजनिक बर्बादी को कैसे बर्दाश्त करती है, समझ में नहीं आता।




समझ में कैसे आएगा ? हमारे नेता जैसे अंग्रेजी की गुलामी करते हैं, वैसे ही वे क्रिकेट के पीछे पगलाए रहते हैं। अब देश में कोई राममनोहर लोहिया तो है नहीं, जो गुलामी के इन दोनों प्रतीकों को खुली चुनौती दे। अब नेताओं में होड़ यह लगी हुई है कि क्रिकेट के दूध पर जम रही मोटी मलाई पर कौन कितना हाथ साफ करता है। बड़े-बड़े दलों के बड़े-बड़े नेता क्रिकेट के इस दलदल में बुरी तरह से फंसे हुए हैं। क्रिकेट और राजनीति के बीच जबर्दस्त जुगलबंदी चल रही है। दोनों ही खेल हैं। दोनों के लक्ष्य भी एक-जैसे ही हैं। सत्ता और पत्ता ! सेवा और मनोरंजन तो बस बहाने हैं। क्रिकेट ने राजनीति को पीछे छोड़ दिया है। पैसा कमाने में क्रिकेट निरंतर चौके और छक्के लगा रहा है। उसकी गेंद कानून के सिर के ऊपर से निकल जाती है। खेल और रिश्वत, खेल और अपराध, खेल और नशा, खेल और दुराचार तथा खेल और तस्करी एक-दूसरे में गडडमडड हो गए हैं। ये सब क्रिकेट की रखैलें हैं। इन रखैलों से क्रिकेट को कौन मुक्त करेगा ? रखैलों के इस प्रचंड प्रवाह के विरूद्ध कौन तैर सकता है? जाहिर है कि यह काम हमारे नेताओं के बस का नहीं है। वे नेता नहीं हैं, पिछलग्गू हैं, भीड़ के पिछलग्गू ! इस मर्ज की दवा पिछलग्गुओं के पास नहीं, भीड़ के पास ही है। जिस दिन भीड़ यह समझ जाएगी कि क्रिकेट का खेल बीमारी है, गुलामी है, सामंती है, उसी दिन भारत में क्रिकेट को खेल की तरह खेला जाएगा। भारत में क्रिकेट किसी खेल की तरह रहे और अंग्रेजी किसी भाषा की तरह तो किसी को कोई आपत्ति क्यों होगी ? लेकिन खेल और भाषा यदि आजाद भारत की औपनिवेशिक बेड़ियाँ बनी रहें तो उन्हें फिलहाल तोड़ना या तगड़ा झटका देना ही बेहतर होगा।


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