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आतंक के दो मसीहाओं का द्वंद्व



आतंक के दो मसीहाओं का द्वंद्व
डॉ. वेदप्रताप वैदिक



11 सितंबर एक तारीख है लेकिन यह दुनिया में वैसे ही प्रसिद्ध हो गई है, जैसे 25 दिसंबर या 1 जनवरी! 11 सितंबर का मतलब वह दिन है, जब न्यूयार्क के ट्रेड टॉवर और वाशिंगटन के पेन्टेगॉन-भवन पर हवाई हमला हुआ था। इस हमले को हुए दस साल हो गए। इन दस वर्षों में अमेरिका और दुनिया ने क्या खोया और क्या पाया, इसका लेखा-जोखा जरूरी है।


संबंधों का नया मानचित्र




संबंधों का नया क्षेत्रीय नक्शा



प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की यह काबुल यात्रा ऐतिहासिक मानी जाएगी, क्योंकि पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने अफगानिस्तान में भारत को क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में प्रतिबिंबित किया है। अब तक काबुल जाने वाले हमारे नेताओं ने हमेशा सिर्फ सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध बढ़ाने की बात कही है।


वे यह मानकर चलते रहे कि गुटनिरपेक्ष होने के बावजूद भारत के संबंध अफगानिस्तान के साथ इसलिए घनिष्ठ नहीं हो सकते कि बीच में पाकिस्तान बैठा है और पाकिस्तान की पीठ पर अमेरिका का हाथ है। दूसरे शब्दों में अफगानिस्तान में कितनी भी बड़ी उथल-पुथल हो जाए, भारत सिर्फ तमाशबीन बना रहेगा।


यों भी पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पहुँचने के लिए भारत को कभी खुलकर रास्ता नहीं दिया। अफगानिस्तान जाने वाले रास्तों को कभी भारत से झगड़ा होने पर वह बंद कर देता है और कभी अफगानिस्तान से झगड़ा होने पर! इस घेराबंदी को अब भारत ने तोड़ दिया है। अफगान-ईरान सीमांत पर भारत ने लगभग 200 किमी की जरंज-दिलाराम सड़क बनाकर दुनियाभर के लिए एक वैकल्पिक थल मार्ग खड़ा कर दिया है।


इस वैकल्पिक मार्ग का भी कोई ठोस फायदा दिखाई नहीं पड़ रहा था। इसके दो कारण हैं। एक तो ईरान से अमेरिका के संबंध खराब हैं और दूसरा भारत की विदेश नीति अभी तक पुराने र्ढे पर घूम रही थी। सिर्फ अफगानिस्तान को हजारों करोड़ रुपया देते रहो और जैसा अमेरिका कहे, वैसा करते रहो।


इस नीति में अब बुनियादी परिवर्तन के संकेत सामने आ रहे हैं। हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन और विदेश सचिव निरुपमा राव को इस बात का श्रेय मिलना चाहिए कि उन्होंने अफगानिस्तान के साथ ‘सामरिक संबंध’ स्थापित करने की पहल की।


इस नए भारत-अफगानिस्तान समीकरण से अब अमेरिका को भी क्या आपत्ति हो सकती है? अमेरिका इस समय भारत और अफगानिस्तान के जितने करीब है, पाकिस्तान के नहीं है। इस सामरिक संबंध का विरोध सिर्फ चीन कर सकता है, लेकिन भारत अपनी कूटनीतिक चतुराई से चीन को भी पटा सकता है।


पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष ने अभी तीन हफ्ते पहले काबुल जाकर हामिद करजई को यह सलाह दी थी कि वे अब अमेरिका के बजाय चीन के साथ नत्थी हो जाएं। पाकिस्तान को भनक लग गई थी कि भारत, अफगानिस्तान और अमेरिका मिलकर अब सामरिक संबंधों का कोई नया क्षेत्रीय नक्शा बना रहे हैं।


इस सामरिक संबंध का अर्थ क्या है? इसका सीधा-सादा अर्थ यह है कि आंतरिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने में अफगानिस्तान की मदद करना और बाहरी आक्रमणों से उसकी रक्षा करना! इन दोनों लक्ष्यों की प्राप्ति में अफगान और अमेरिकी सरकारें पिछले 10 साल से नाकाम रही हैं।


अमेरिका ने सवा सौ अरब डॉलर फूँक दिए और हजारों अमेरिकी, यूरोपीय और अफगान जवान कुर्बान कर दिए, लेकिन ओबामा प्रशासन को अभी भी अफगानिस्तान से निकल भागने का रास्ता नहीं मिल पा रहा है। वह जुलाई 2011 में अफगानिस्तान खाली करना शुरू करेगा और 2014 तक उसे खाली कर पाएगा या नहीं, उसे खुद पता नहीं है।


ऐसे में भारत का मैदान में कूद पड़ना बहुत ही स्वागतयोग्य है। यह बात मैं पिछले दस साल से कह रहा हूँ और पिछले पाँच साल में इसे मैंने कई बार दोहराया है कि अफगानिस्तान अमेरिका की नहीं, भारत की जिम्मेदारी है। यदि अफगानिस्तान बेचैन होगा तो भारत कभी चैन से नहीं रह सकता।


हमारे सदियों पुराने इतिहास ने यह सिद्ध किया है। भारत में आतंकवाद ने तभी से जोर पकड़ा, जबसे अफगानिस्तान में अराजकता फैली है। अफगानिस्तान की अराजक भूमि का इस्तेमाल पहले रूस, फिर अमेरिका और सबसे ज्यादा पाकिस्तान ने किया।


सबसे ज्यादा नुकसान भारत का ही हुआ, लेकिन इस नुकसान की जड़ उखाड़ने का बीड़ा भारत ने कभी नहीं उठाया। वह अमेरिका पर अंधविश्वास करता रहा और अमेरिका पाकिस्तान पर अंधविश्वास करता रहा। अब ओसामा कांड ने इस अंधविश्वास के परखच्चे उड़ा दिए हैं।


अब भारत ने थोड़ी हिम्मत दिखाई है। पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा है कि अफगानिस्तान की समस्या हमारी क्षेत्रीय समस्या है। अफगानिस्तान अपनी सुरक्षा जब खुद करेगा तो उसकी मदद करने में भारत पीछे नहीं रहेगा। यानी अमेरिका की वापसी के बाद भारत की कोई न कोई भूमिका जरूर होगी।


अब भी भारत यह कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है कि हम पांच लाख जवानों की राष्ट्रीय अफगान फौज और पुलिस खड़ी करने में आपकी मदद करेंगे। यह काम जितने कम खर्च और कम समय में भारत कर सकता है, दुनिया का कोई देश नहीं कर सकता। इसका खर्च तो अमेरिका सहर्ष उठा सकता है और इसके लिए अफगान सरकार भी तैयार है।


पिछले नवंबर में अपनी काबुल यात्रा के दौरान मैंने अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई, उनके प्रमुख मंत्रियों, फौज और गुप्तचर विभाग के सर्वोच्च अधिकारियों और लगभग सभी अन्य प्रमुख नेताओं से बात की थी। अफगानिस्तान के उज्ज्वल भविष्य के लिए सबको यही एकमात्र विकल्प मालूम पड़ता है, लेकिन हमारी सरकार पता नहीं क्यों ठिठकी हुई है?



उसे पाकिस्तान पर शक है। यह स्वाभाविक है। पाकिस्तान इस विकल्प को अपनी मौत समझता है। यदि पाँच लाख जवानों की फौज काबुल के पास हो तो पाकिस्तान अफगानिस्तान को अपना पाँचवाँ प्रांत कैसे बना सकता है?


इसीलिए हमारे प्रधानमंत्री ने न तो अफगान संसद के अपने भाषण में और न ही संयुक्त वक्तव्य में कहीं भी पाकिस्तान पर हमला किया। यह अच्छा किया।


उन्होंने सीमापार आतंकवाद और आतंकवादी अड्डों का जिक्र तक नहीं किया। उन्होंने हामिद करजई की तालिबान से बात करने की पहल का भी स्वागत किया। माना यह जा रहा है कि अब भारत अफगान पुलिस को प्रशिक्षण देगा। यदि यही काम बड़े पैमाने पर शुरू हो जाए तो मान लीजिए कि हमने आधा मैदान मार लिया।


पाकिस्तान हमारा विरोध करेगा। रास्ता भी नहीं देगा। यदि जरंज-दिलाराम सड़क इस वक्त काम नहीं आएगी तो कब आएगी? पाकिस्तान से हुए अमेरिकी मोहभंग की वेला में अगर भारत इतना भी नहीं कर सके तो उसे अपने आपको न तो अफगानिस्तान का दोस्त कहने का अधिकार है और न ही दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय महाशक्ति!


- वेदप्रताप वैदिक

अब भारत को अगुवाई करनी होगी


अब भारत को अगुवाई करनी होगी



सामा बिन लादेन तो मारा गया, लेकिन मुख्य प्रश्न यह है कि अब पाकिस्तान के प्रति भारत की नीति क्या हो? ओसामा की हत्या ने भारत में इतना उत्साह पैदा कर दिया है कि कई जिम्मेदार नेता और लोग भी माँग कर रहे हैं कि भारत भी अमेरिका की तरह आतंकियों को उनकी माँद में घुसकर  मारे।


न्यूयॉर्क के ट्रेड टॉवर काण्ड में तीन-चार हजार लोग मारे गए थे, लेकिन भारत में अब तक एक लाख से भी ज्यादा लोगों को आतंकियों ने मौत के घाट उतार दिया है। ट्रेड टॉवर तो ट्रेड टॉवर है, भारत की तो संसद पर हमला हुआ। लाल किला, अक्षरधाम और ताज होटल जैसे ऐतिहासिक, पवित्र और व्यावसायिक संस्थानों को आतंक का शिकार बनना पड़ा। ऐसे में, अमेरिका से भी ज्यादा भारत की जिम्मेदारी बनती है कि वह दाऊद इब्राहीम, हाफिज सईद और लखवी जैसे सरगनाओं को जिंदा या मुर्दा पकड़े।


इस इच्छा के तूल पकड़ने की वजह यह रही कि भारत के सर्वोच्च सैन्य अधिकारियों ने कुछ प्रश्नों के जवाब में कह दिया कि देश चाहे, तो वे भी अमेरिका की तरह कार्रवाई कर सकते हैं, यानी हमारी फौज सक्षम है। पाकिस्तान सरकार इस प्रतिक्रिया को ले उड़ी। पाकिस्तानी विदेश सचिव ने तत्काल धमकी दे डाली कि यदि एबटाबाद जैसी कार्रवाई दोहराई गई, तो उसके परिणाम भयंकर होंगे।


दूसरे शब्दों में, पाकिस्तान परमाणु-बम का प्रयोग भी कर सकता है। यों भी पाकिस्तान के सेनाप्रमुख जनरल कियानी परमाणु हथियारों को लेकर काफी आक्रामक हैं। वह भारत की तरह संकोची नहीं हैं। जाहिर है, पाकिस्तान की वह त्वरित प्रतिक्रिया अनावश्यक थी, खासतौर से तब, जबकि भारत के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ने दो-टूक शब्दों में कहा कि ओसामा-कांड के बावजूद वे पाकिस्तान से संबंध सुधारने की नीति पर कायम रहेंगे।


भारत सरकार की इस घोषणा को निराशाजनक कहना बहुत आसान है, लेकिन यह भी सोचना होगा कि इसके अलावा भारत सरकार क्या कह सकती थी? अभी भारत पर कोई हमला तो नहीं हुआ कि जिस पर सरकार सख्त प्रतिक्रिया देती। जब देश में हमले हुए थे, संसद पर, अक्षरधाम पर और ताज होटल पर, तो सरकार ने आखिर क्या किया था? जवाबी हमले के लिए हम इसलिए उत्तेजित हो जाते हैं कि हम अमेरिका और भारत को एक ही पलड़े में रख देते हैं। लेकिन उनके बीच का जो अंतर हैं, उन्हें समझना जरूरी है।


पहला अंतर यह है कि अमेरिका पाकिस्तान का पड़ोसी नहीं है। अमेरिका पाकिस्तान से आठ-दस हजार किलोमीटर दूर है, जबकि भारत और पाकिस्तान की सेनाएँ एक-दूसरे की नाक पर खड़ी हैं। दूसरा, क्या अमेरिका में कश्मीर जैसी कोई जगह है, जहाँ पाकिस्तानी आतंकवादियों को सहज शरण मिल सकती है? तीसरा, भारत और पाकिस्तान पड़ोसी तो हैं ही, परमाणु बमधारी देश भी हैं। यह बहुत ही विषैला संयोग है। दो पड़ोसी परमाणु बमधारी देशों में ऐसी दुश्मनी कभी नहीं रही।


चौथा, अमेरिका और भारत की तरह पाकिस्तान की असली सत्ता नेताओं के हाथ में नहीं, फौजियों के हाथ में है। लड़ाई के अभ्यस्त फौजी कुछ भी निर्णय कर सकते हैं। पाँचवाँ, पाकिस्तान के साथ अमेरिका का रिश्ता काफी गहरा और लंबा है। वह अपनी दाल-रोटी और हथियारों के लिए सदा अमेरिका का मोहताज रहा है। उसका एहसानमंद रहा है। यदि अमेरिका कुछ ज्यादती करेगा, तो भी पाकिस्तान उसे बर्दाश्त करेगा, लेकिन भारत की किसी भी कार्रवाई को वह बर्दाश्त क्यों करेगा?


छठा, इस समय आतंकवाद के विरुद्ध चल रहे वैश्विक युद्ध में अमेरिका और पाकिस्तान साझेदार हैं। इस भागीदारी की आड़ में अगर अमेरिका जान-बूझकर या गलती से पाकिस्तान को चपत लगा देता है, तो पाकिस्तान क्या कर सकता है? सातवाँ, क्या भारत के पास अमेरिका की तरह ऐसी तकनीकी और यांत्रिक सैन्य-तैयारी है कि वह एबटाबाद जैसी सफल कार्रवाई कर सके?


ऐसे में, समझदारी यही है कि हमले की बात किसी भी तरह से सोची न जाए। लेकिन भारत के कुछ उग्र   किस्म की सोच वाले लोग अपनी सरकार के रवैये से इसलिए निराश दिखते हैं कि पाकिस्तान को लेकर पिछले साल भर में सरकार कई बार गच्चा खा चुकी है।


अभी तक पाकिस्तान ने न तो काबुल दूतावास के हत्यारों को पकड़ा है और न ही ताज होटल के। वे खुलेआम ‘जिहाद’ का ढोंग करते हैं और अब वे ओसामा का मर्सिया पढ़ रहे हैं। शर्म-अल-शेख में बलूचिस्तान के सवाल पर हम मात खा गए थे। हम आज तक अमेरिकियों को इस बात के लिए तैयार नहीं कर सके कि वे भारत विरोधी आतंकवादियों को आतंकी समझें।


भारत विरोधी आतंकवादियों को जिस दिन अमेरिका ओसामा की तरह मारेगा, उसी दिन माना जाएगा कि वह भारत का दोस्त है। अभी तो वह सिर्फ अपने हितों के लिए लड़ रहा है और इस लड़ाई में हम उसके पिछलग्गू बने हुए हैं। इस लड़ाई को सचमुच विश्व-आतंकवाद के विरुद्ध उसी दिन से माना जाएगा, जिस दिन से अमेरिका अपने और भारत-विरोधी आतंकियों में फर्क करना बंद करेगा। इसके लिए जरूरी है कि अमेरिका हर गलती के बाद पाकिस्तान को बख्शे नहीं, बल्कि उसके साथ सख्ती से पेश आए।


पाकिस्तान अपनी संप्रभुता का मामला उठा रहा है, लेकिन यह मजाक के अलावा क्या है? जो राष्ट्र अपनी धरती पर विदेशी सैनिक अड्डे खुशी-खुशी खड़े करवाता रहा हो, हमेशा मध्यस्थ और अधीनस्थ की भूमिका निभाता रहा हो और जिसकी सीमाओं में विदेशी आतंकवादी बेलगाम घूमते रहते हों, उसके मुँह से संप्रभुता की बातें अटपटी लगती हैं। इस मौके पर चीन उसे पानी पर चढ़ाने को तैयार बैठा है।


पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान से ज्यों ही अमेरिका हटे, चीन उसकी जगह आ जाए। भारत के लिए इससे बड़ी चुनौती क्या हो सकती है? अफगानिस्तान को अपना पाँचवाँ  प्रांत बनाकर भारत को सबक सिखाना पाकिस्तान का सर्वोच्च लक्ष्य है। इस लक्ष्य को भारत ध्वस्त कैसे करे?


आँख मींचकर अमेरिका का पीछा करने से तो यह लक्ष्य हासिल नहीं होगा। पिछले दस साल तक अमेरिका बुद्धू बनता रहा। अब जरूरी है कि भारत की देखरेख में पाँच लाख जवानों की राष्ट्रीय अफगान फौज खड़ी की जाए। इसकी जिम्मेदारी अमेरिका ले। यह अफगान-फौज पाक-अफगान आतंकवाद का खात्मा तो करेगी ही, उस खतरे पर भी लगाम लगाएगी, जो पाकिस्तान के उग्रवादी तत्वों द्वारा भारत के विरुद्ध खड़ा किया जाता है। अब तक अमेरिका आगे-आगे था और भारत उसके पीछे-पीछे। अब भारत आगे-आगे चले और अमेरिका उसके पीछे-पीछे। इसी में अमेरिका, पाकिस्तान और अफगानिस्तान का भी कल्याण है।

- वेद प्रताप वैदिक
अध्यक्ष, भारतीय विदेश नीति परिषद्  
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

ओसामा के बाद की राजनीति







 ओसामा के बाद की राजनीति


ओसामा के उन्मूलन ने पाकिस्तान को बेनकाब कर दिया है। यह साफ हो गया है कि पाकिस्तान ही विश्व आतंकवाद का अड्डा है। उन सभी पाकिस्तानी शासकों के मुंह पर कालिख पुत गई है, जो बार-बार दावा करते थे कि ओसामा या तो मर गया है या अफगान पहाड़ों की अगम्य गुफाओं में छिपा हुआ है। पिछले पांच साल से वह उनकी नाक के नीचे रह रहा था। इस्लामाबाद से सिर्फ 50 किमी दूर एबटाबाद में और काकुल सैन्य अकादमी सेदो फर्लाग की दूरी पर!



अमेरिकी नीति निर्माता पाकिस्तान के इस दोमुंहे खेल को समझ गए थे, इसलिए उन्होंने कोई झगड़ा मोल नहीं लिया। पाक सरकार या फौज को सुराग तक न लगने दिया और ओसामा को मार गिराया। पाकिस्तानी सरकार हतप्रभ है। लगभग 12 घंटे तक उसकी घिग्घी बंधी रही। वह बोले तो क्या बोले? अगर वह यह कहती है कि ओसामा को मारने में उसने मदद की है तो जनता उसके खिलाफ हो जाएगी और अगर वह यह कहती है कि यह काम अमेरिकियों ने खुद-ब-खुद किया है तो लोग कहेंगे कि तुम अमेरिकियों की कठपुतली हो! यही बात मुशर्रफ ने लंदन में यों घुमाकर कही कि अमेरिकियों ने पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन किया है। इस प्रश्न को पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री टाल गए। उन्होंने ओसामा के उन्मूलन पर सिर्फ संतोष प्रकट कर दिया। आश्चर्य की बात है कि पाकिस्तान के लोगों ने अपनी इस ‘निकम्मी’ सरकार के विरुद्ध अभी तक कोई हुड़दंग क्यों नहीं मचाया?


असली प्रश्न यही है कि पाकिस्तान के प्रति अब अमेरिका का रुख क्या होगा? जाहिर है कि अमेरिकी रवैये में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं होगा, क्योंकि उसे पाकिस्तान की जरूरत अभी भी है। ओसामा के मरने से आतंकवादियों का मनोबल जरूर ध्वस्त होगा, लेकिन वे अपनी दुकानें एकदम बंद कैसे कर देंगे? पिछले दस वर्षो में आतंकवाद अपने आप में एक महाउद्योग बन गया है, जिसका सबसे बड़ा शेयर होल्डर पाकिस्तान का सत्ता-प्रतिष्ठान है। अलकायदा और तालिबान की शाखाएं दुनिया के लगभग 40 देशों में खुल गई हैं और उनमें से ज्यादातर स्वायत्त और आत्मनिर्भर हैं। पाकिस्तान चाहेगा कि उसे डॉलर और हथियार लगातार मिलते रहें, इसीलिए वह आतंकवादी प्रतिक्रिया को बढ़ा-चढ़ाकर चित्रित करेगा। अमेरिका उसकी बात पर विश्वास भी करेगा, क्योंकि पिछले दिनों ही विकीलीक्स से पता चला था कि अलकायदा के लोगों ने भयंकर धमकी दी है। उन्होंने कहा है कि यदि ओसामा को पकड़ा या मारा गया तो वे कुछ यूरोपीय शहरों को परमाणु बमों से उड़ा देंगे। यों भी सीआईए को पता है कि अलकायदा के लोगों ने उक्रेन, कजाकिस्तान और पूर्वी यूगोस्लाविया के राज्यों से परमाणु हमले के पूरे साधन जुटा रखे हैं।



अमेरिका, यूरोप और भारत जैसे राष्ट्रों को ऐसे हमलों के प्रति सतर्क तो रहना ही होगा, लेकिन अमेरिका का सबसे बड़ा सिरदर्द यह है कि अगले दो-तीन साल में अफगानिस्तान से उसकी ससम्मान वापसी कैसे हो? ओसामा के सफाये ने ओबामा की छवि में चार चांद जरूर टांक दिए हैं, लेकिन अगर उन्हें चुनाव जीतना है तो वे अफगानिस्तान को अधर में लटकाकर भाग नहीं सकते। अधर में लटका हुआ अफगानिस्तान अमेरिका के लिए अभी से भी ज्यादा खतरनाक और खर्चीला सिद्ध होगा। वह अनेक ओसामाओं की जन्मस्थली बन जाएगा। इसीलिए अमेरिका को अब आतंकवाद के समूल नाश का संकल्प लेना होगा। यह समूल नाश अफगान लोग ही करेंगे। यदि पांच लाख जवानों की शक्तिशाली अफगान फौज खड़ी कर दी जाए तो वह आतंकवादियों से ही नहीं, उनके संरक्षकों से भी निपट लेगी। यह काम बहुत कम समय और बहुत कम खर्च में भारत कर सकता है। इस समय अफगानिस्तान में भारत की लोकप्रियता शिखर पर है। यदि अफगान फौज खड़ी करने में पाकिस्तान सहयोग करे तो बहुत अच्छा, वरना उसके बिना भी अमेरिका को इस लक्ष्य की पूर्ति हर कीमत पर करनी ही चाहिए। खासतौर से यह सिद्ध हो जाने के बाद कि पाकिस्तान ने ही ओसामा को छिपा रखा था।


राष्ट्रपति ओबामा ने यह स्पष्ट करके ठीक ही किया कि अमेरिका की लड़ाई इस्लाम के विरुद्ध नहीं है। वास्तव में ओसामा का आचरण इस्लाम के उच्च और शांतिपूर्ण सिद्धांतों के विरुद्ध था। जिहाद के नाम पर उसने हजारों बेकसूरों को मौत के घाट उतारा। उसने इस्लाम को आतंकवाद और हिंसा का पर्याय बना दिया। आश्चर्य है कि भारत के कुछ जाने-माने तथाकथित मुसलमान नेताओं ने ओसामा को आतंकवादी कहने पर एतराज जताया है। अमेरिका के विरुद्ध उनका गुस्सा बहुत हद तक जायज है, क्योंकि यदि ओसामा छोटा आतंकवादी है तो अमेरिका बड़ा आतंकवादी है, जिसने झूठे बहाने से सद्दाम को खत्म किया और अब गद्दाफी पर ताकत आजमा रहा है, लेकिन यह कैसे माना जा सकता है कि ओसामा आतंकवादी ही नहीं था? बड़ा कांटा छोटे को उखाड़ रहा है, इसका अर्थ यह नहीं कि हम छोटे कांटे को गुलाब कहने लगें।



ओसामा का उन्मूलन जिस तरीके से हुआ, वह भारत के लिए काफी फायदेमंद है। यदि इसमें पाकिस्तान को जरा भी श्रेय मिल जाता तो वह अमेरिकियों को जमकर निचोड़ता। अमेरिकियों से जो भी अतिरिक्त मदद मिलती, उसका इस्तेमाल वह भारत के विरुद्ध करता। अब अमेरिका अपना हाथ थोड़ा खींच सकता है और पाकिस्तान की टांग ज्यादा खींच सकता है। वह उसे मजबूर कर सकता है कि दक्षिण एशिया की समग्र नीति में वह भारत के साथ कदम से कदम मिलाकर चले। भारत की मांग होनी चाहिए कि अब अमेरिका उस आतंकवाद की भी सुध ले, जो भारत के खिलाफ हो रहा है। मुंबई हमले के दोषियों को तो दंडित किया ही जाए (ओसामा की तरह) और उन सब आतंकवादी शिविरों पर भी सीधा हमला किया जाए, जो भारत विरोधी प्रशिक्षण देते हैं। ओसामा समेत सभी आतंकवादी पाकिस्तान की संप्रभुता का निरंतर उल्लंघन करते रहे हैं। पाकिस्तान की सच्ची संप्रभुता की रक्षा तभी होगी, जबकि निरंकुश आतंकवादियों को जड़-मूल से उखाड़ा जाएगा। ओसामा के उन्मूलन ने भारत को नया अवसर दिया है कि वह दक्षिण एशिया में अग्रगण्य भूमिका निभाए। यदि अब भी वह अमेरिका का मौन सहयात्री बना रहा और उसने पहल नहीं की तो वह अमेरिकी वापसी की बेला में स्वयं को सर्वथा निरुपाय और असहाय पाएगा।

-  डॉ.  वेद प्रताप वैदिक
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