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मोदी : हिन्दी और विदेश नीति

 मोदी : हिन्दी और विदेश नीति
 - वेद प्रताप वैदिक 


एक अंग्रेजी अखबार की इस खबर ने मुझे आह्लादित कर दिया कि दक्षेस देशों से आए नेताओं से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदी में वार्तालाप किया। वैसे नवाज शरीफ, हामिद करजई, सुशील कोइराला आदि तो हिंदी खूब समझते हैं। इन नेताओं से मेरी दर्जनों बार बात हुई है पर इन्होंने मुझसे कभी भी अंग्रेजी में बात नहीं की। किंतु मोदी ने श्रीलंकाई नेता महिंद राजपक्षे से भी हिंदी में बात की। राजपक्षे हिंदी बिल्कुल भी नहीं समझते। तो क्या ऐसा हुआ होगा कि मोदी बोलते रहे होंगे और राजपक्षे बगलें झांकते रहे होंगे? न ऐसा हुआ है और न कभी ऐसा होता है। जब भी दो राष्ट्रों के नेता मिलते हैं तो वे दोनों अपनी-अपनी राष्ट्रभाषा में बोलते हैं और दोनों पक्षों के अनुवादक उस वार्तालाप का तत्काल अनुवाद करते चलते हैं। कूटनीतिक वार्ताओं में अनुवाद का बड़ा महत्व होता है। जब तक अनुवादक अनुवाद करते हैं, वार्ताकार को सोचने का समय मिल जाता है। दूसरा, यदि कोई गलत शब्द मुंह से निकल जाए तो अनुवादक के मत्थे मढ़कर मुख्य वार्ताकार बच निकल सकता है। तीसरा, शीर्ष वार्ताओं में राष्ट्रभाषा के प्रयोग से राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता प्रदर्शित होती है।


भारत का सौभाग्य है कि उसे मोदी जैसा प्रधानमंत्री मिल गया है। उन्होंने अपने पहले हफ्ते में ही दो ऐसे काम कर दिए, जो आज तक कोई भी प्रधानमंत्री नहीं कर सका। दक्षेस नेताओं को बुलाना और उनसे राष्ट्रभाषा में बात करना। इन दोनों कामों के लिए मैं इंदिराजी से लेकर अभी तक सभी प्रधानमंत्रियों से कहता रहा हूं, लेकिन इसे क्रियान्वित किया, अकेले मोदी ने। जिस भाषा में मोदी ने वोट माँगे, उसी में वे राज चला रहे हैं। इससे बड़ी ईमानदारी क्या हो सकती है। गुजरात का यह सपूत दो अन्य गुजराती महापुरुषों महर्षि दयानन्द और महात्मा गांधी के मार्ग पर चल पड़ा है। कौन जाने, इसे भी देश कभी महान प्रधानमंत्री के तौर पर जानेगा।


यों तो अटलजी ने मेरे अनुरोध पर विदेश मंत्री के तौर पर संयुक्तराष्ट्र में अपना भाषण हिंदी में दिया था, लेकिन वह मूल अंग्रेजी का हिंदी अनुवाद था। चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री के रूप में मालदीव जाते समय हवाई अड्डे पर मुझसे वादा किया था कि वे दक्षेस-सम्मेलन में हिंदी में बोलेंगे। उनका वह आशु हिंदी भाषण विलक्षण और मौलिक था। उसे करोड़ों लोगों ने सुना और समझा, लेकिन दोनों प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल में नेहरूकालीन ढर्रे को बदल न सके। नरसिंह राव जब चीन गए तो एक चीनी प्रोफेसर को हिंदी अनुवाद के लिए तैयार किया गया, लेकिन जब मैंने उससे पूछा कि आपसे काम क्यों नहीं लिया गया तो वह बोला कि आपके प्रधानमंत्री अचानक अंग्रेजी में ही बोलने लगे। नरसिंह राव जैसा कई देशी और विदेशी भाषाओं का पंडित भी अंग्रेजी की गुलामी से छुटकारा न पा सका। मोदी भी अंग्रेजी बोल सकते हैं। वे कामराज की तरह नहीं हैं, लेकिन उन्होंने जानबूझकर राजभाषा का प्रयोग किया। उन्होंने संविधान का मान बढ़ाया, भारत का मान बढ़ाया और हिंदी का मान बढ़ाया।


भारत को आजाद हुए 67 साल हो गए, लेकिन इस देश में एक भी प्रधानमंत्री ऐसा नहीं हुआ, जो इस राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता का ध्यान रखता रहा हो। भारत आजाद भी हो गया और आप प्रधानमंत्री भी बन गए, लेकिन रहे गुलाम के गुलाम ही। विदेशियों से स्वभाषा में व्यवहार करना तो बहुत दूर की बात है, हमारे प्रधानमंत्रियों को अपनी संसद में भी अंग्रेजी बोलते हुए कभी शर्म नहीं आई। सभी प्रधानमंत्री अपने अफसरों के अंग्रेजी में लिखे भाषणों को संसद में पढ़ते रहे। विदेशी अतिथि चाहे चीन का हो, रूस का हो, ईरान का हो, जर्मनी का हो या पाकिस्तान का ही क्यों न हो, हमारे नेता उससे अंग्रेजी में ही वार्तालाप करते रहे हैं। हर शीर्ष विदेशी मेहमान को हैदराबाद हाउस में राज-भोज दिया जाता है। मैं अब तक दर्जनों राजभोजों में शामिल हुआ हूं। उस समय जो भाषण भारत की तरफ से दिया जाता है, मुझे याद नहीं पड़ता कि उनमें से कभी कोई हिंदी में दिया गया हो। इसके विपरीत, विदेशी शासनाध्यक्ष अपना राजभोज-भाषण और कूटनीतिक वार्तालाप अपनी राष्ट्रभाषा में ही करते हैं। उनका सद्य: अनुवाद कभी कभार हिंदी में हुआ है। वरना वे भी अपनी भाषा का अनुवाद हमारे पुराने मालिकों, अंग्रेजों की भाषा अंग्रेजी में करते हैं। जब हम खुद गर्व से कहते हैं कि हम अंग्रेजों के भाषायी गुलाम हैं तो दूसरों को हमें खुश रखने में क्या एतराज हो सकता है? ब्रिटिश राष्ट्रकुल के जो देश हमारी तरह अंग्रेजों के भूतपूर्व गुलाम हैं, उनमें से ज्यादातर की हालत हमारे जैसी ही है। श्रीलंका और पाकिस्तान हमारे जैसे हैं, लेकिन नेपाल और अफगानिस्तान का भाषायी आचरण स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्रों के जैसा है। यदि हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री विदेशी अतिथियों के साथ हिंदी में बात करें तो वे अपने साथ अंग्रेजी का अनुवादक क्यों लाएंगे? यदि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज चीनी विदेश मंत्री से हिंदी में बात करेंगी तो वे अपने साथ चीनी-हिंदी अनुवादक को लाएंगे, लेकिन अगर सुषमाजी अंग्रेजी बोलने पर अड़ी रहीं तो चीनी विदेश मंत्री तब भी चीनी में ही बोलेगा, लेकिन अपने साथ अनुवादक अंग्रेजी का लाएगा।


सुषमा स्वराज अगर चाहें तो वे नया इतिहास बना सकती हैं। वे हिंदी आंदोलन में मेरे साथ बरसों पहले काम कर चुकी हैं। डॉ. लोहिया और मधु लिमये की भाषा-नीति को वे निष्ठापूर्वक मानती रही हैं। एक अंग्रेजी अखबार की यह खबर यदि सही है कि उन्होंने विदेशी अतिथियों से अपनी औपचारिक बातचीत भी अंग्रेजी में की है तो मेरे लिए यह दुख की बात है। मैं समझ नहीं पाता कि सुषमाजी जैसी विलक्षण प्रतिभा और वाग्शक्ति की स्वामिनी महिला भी अंग्रेजी के आतंक से ग्रस्त हो सकती हैं। अंग्रेजी का सहारा तो प्राय: वही लोग लेते हैं, जो प्रतिभा, परिश्रम और निष्ठा की अपनी कमी की भरपाई करना चाहते हैं। मोदी जैसा प्रधानमंत्री और सुषमा जैसी विदेश मंत्री! वाह, क्या जोड़ी है? यह जोड़ी चाहे तो हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में भी चलवा सकती है, लेकिन इसके पहले हमारे विदेश मंत्रालय से अंग्रेजी के विदेशी प्रभाव को घटाना होगा और राज-काज में स्वभाषाएं लानी होंगी। कूटनीति के क्षेत्र में स्वभाषा के प्रयोग की उपयोगिता स्वयंसिद्ध है।


सभी महाशक्तियाँ अंतरराष्ट्रीय संधियाँ और अपने कानूनी दस्तावेज अपनी भाषा में तैयार करने पर जोर देती हैं। हाँ, यदि कोई अत्यंत गोपनीय वार्ता करनी हो, जिसमें अनुवादक का रहना भी खतरनाक हो सकता है, वहां दो नेता अंग्रेजी क्या, किसी अफलातूनी भाषा में भी बात करें तो वह अनुचित नहीं है। वैसे सारा काम-काज स्वभाषा में हो तो गोपनीयता बनाए रखना ज्यादा आसान होता है। सुषमाजी को चाहिए कि वे हमारे विदेश मंत्रालय के अफसरों से हिंदी में ही बात करें और अपना अंदरूनी काम-काज वे यथासंभव हिंदी में ही करें। अंग्रेजी का पूर्ण बहिष्कार न करें, लेकिन उसका इस्तेमाल अमेरिका, ब्रिटेन,कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे पांच-छह अंग्रेजीभाषी देशों तक ही सीमित रखें। शेष महत्वपूर्ण देशों के साथ यदि हम उनकी भाषाओं में व्यवहार करेंगे तो हमारी कूटनीति में चार चाँद लग जाएँगे। हमारी पकड़ उन देशों की आम जनता तक हो जाएगी। हमारा अंतरराष्ट्रीय व्यापार चार गुना हो जाएगा। भारत को महाशक्ति बनाने का रास्ता आसान हो जाएगा। नरेंद्र मोदी के राज में भारत महाशक्ति नहीं बनेगा तो कब बनेगा। 


हिन्दी दिवस से पहले हिन्दी के लिए एक विजय





देश का संविधान चीख-२ कर कहता है कि हिन्दी भारत की राजभाषा है और कामकाज हिन्दी में होना चाहिए पर यह बात भारत सरकार के विभिन्न विभागों और मंत्रालयों में बैठे अधिकारी हिन्दी के नाम पर पिछले ६६ वर्षों से खानापूर्ति करते आ रहे हैं और अंग्रेजी का वर्चस्व जस का तस है.


नवी मुंबई में निवासरत एक युवा हिन्दीप्रेमी ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत 'पत्र सूचना कार्यालय' [पसूका] में राजभाषा की घोर उपेक्षा का प्रकरण अपने हाथ लिया, ६ फरवरी २०१३ से निरंतर उन्होंने पत्र सूचना कार्यालय के अधिकारियों को ईमेल भेजना आरम्भ किया, कई अनुसमारक भेजे, पर उत्तर ना आया. राजभाषा अधिनियम के उल्लंघन की शिकायत राजभाषा विभाग को भेजी गई. पर बात आगे नहीं बढ़ी. शिकायत पर राजभाषा विभाग द्वारा कोई कार्यवाही ना होने से हताश होकर अंतिम हथियार के रूप में शिकायतकर्ता 'सूचना का अधिकार अधिनियम' का सहारा लिया और एक आवेदन लगाया और पसूका से राजभाषा के अनुपालन से जुड़े ढेरों प्रश्न पूछ डाले जिन पर पसूका के केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारियों को अपनी गलती का भान हुआ और कार्यालय को १९९२ के उस निर्देश का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया है कि जहाँ-२ हिन्दी अंग्रेजी का एकसाथ प्रयोग होगा, वहाँ -२ हिन्दी को अंग्रेजी के ऊपर प्राथमिकता दी जाएगी क्योंकि राजभाषा हिन्दी है ना कि अंग्रेजी. आरटीआई आवेदन के कई प्रश्नों के ठीक-२ उत्तर नहीं दिए, तब आवेदक ने प्रथम अपील लगा दी. 


अपील के उत्तर में पसूका ने स्पष्ट किया कि वे पसूका की वेबसाइट की सभी सेवाओं में हिन्दी को प्राथमिकता देंगे एवं हिन्दी की सम्पूर्ण सामग्री को अंग्रेजी की सामग्री के पहले/ऊपर/आगे प्रकाशित किया जाएगा.


और कल का दिन 'इतिहास' बन गया है. कल से पसूका की वेबसाइट http://pib.nic.in/newsite/mainpage.aspx पर भारत की राजभाषा को उसका उचित स्थान मिल गया, वेबसाइट पर कई सेवाओं जो पहले केवल अंग्रेजी में थी, अब हिन्दी में उपलब्ध हैं. हिन्दी की विज्ञप्तियों को अंग्रेजी से ऊपर कर दिया गया है, सभी टैब द्विभाषी बना दिए गए हैं. पहले हिन्दी में उन्नत खोज का विकल्प नहीं था, उसे आरम्भ कर दिया गया है, इस तरह दस्तावेज, आलेख आदि को अंग्रेजी सामग्री से नीचे प्रकाशित किया जाता था, उसे भी हिन्दी में ऊपर लगा दिया गया है.


शीघ्र ही फोटो का विवरण भी द्विभाषी रूप में उपलब्ध होगा आज तक उसे केवल अंग्रेजी में डाला जा रहा है. पसूका के ट्विटर एवं यू-ट्यूब पर भी नवीन जानकारी द्विभाषी रूप में शुरू की जा रही है.


विश्व हिंदी सम्मेलन : सार्थकता, औचित्य व दायित्व



गत दिनों दक्षिण अफ्रीका में सम्पन्न हुए 9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के संदर्भ में हिन्दी से जुड़े लेखकों, कलमकारों, तकनीक विशेषज्ञों, पाठकों व प्रेमियों के मध्य सम्मेलन को लेकर भिन्न भिन्न  प्रकार के संवाद, सम्मतियाँ, आपत्तियाँ, आरोप प्रत्यारोप, प्रश्नाकुलताएँ व विरोध, समर्थन इत्यादि का दौर चलता रहा है। इसी बीच हिन्दी के तकनीकी पक्ष से जुड़े हरिराम जी ने हिन्दी-भारत (याहूसमूह) पर एक लंबी टिप्पणी लिखी जिसमें सम्मेलन में भाग लेने वालों से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे गए थे। उन प्रश्नों वाले संदेश को पढ़कर जो प्रतिक्रिया मैंने लिखी  उसे अगले दिन 'प्रवासी दुनिया' ने स्वतंत्र आलेख के रूप में प्रकाशित भी कर दिया    

 निम्नलिखित बॉक्स में हरिराम जी द्वारा उठाए गए वे महत्वपूर्ण प्रश्न ज्यों के त्यों पढे जा सकते हैं और
उत्तर में लिखी मेरी टिप्पणी को भी आलेख  (विश्व हिंदी सम्मेलन : सार्थकता, औचित्य व दायित्व ) के रूप में पढ़ा जा सकता है।  



स्क्रॉल कर पढ़ें 

*निम्न कुछ तथ्यपरक व चुनौतीपूर्ण प्रश्न 9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में पधारे विद्वानों से करते हुए इनका उत्तर एवं समाधान मांगा जाना चाहिए..

 (1)---- हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के लिए कई वर्षों से आवाज उठती आ रही है, कहा जाता है कि इसमें कई सौ करोड़ का खर्चा आएगा... बिजली व पानी की तरह भाषा/राष्ट्रभाषा/राजभाषा भी एक इन्फ्रास्ट्रक्चर (आनुषंगिक सुविधा) होती है.... अतः चाहे कितना भी खर्च हो, भारत सरकार को इसकी व्यवस्था के लिए प्राथमिकता देनी चाहिए।

 (2) ---- हिन्दी की तकनीकी रूप से जटिल (Complex) मानी गई है, इसे सरल बनाने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं? 
 -- कम्प्यूटरीकरण के बाद से हिन्दी का आम प्रयोग काफी कम होता जा रहा है...
 -- -- हिन्दी का सर्वाधिक प्रयोग डाकघरों (post offices) में होता था, विशेषकर हिन्दी में पते लिखे पत्र की रजिस्ट्री एवं स्पीड पोस्ट की रसीद अधिकांश डाकघरों में हिन्दी में ही दी जाती थी तथा वितरण हेतु सूची आदि हिन्दी में ही बनाई जाती थी, लेकिन जबसे रजिस्ट्री और स्पीड पोस्ट कम्प्यूटरीकृत हो गए, रसीद कम्प्यूटर से दी जाने लगी, तब से लिफाफों पर भले ही पता हिन्दी (या अन्य भाषा) में लिखा हो, अधिकांश डाकघरों में बुकिंग क्लर्क डैटाबेस में अंग्रेजी में लिप्यन्तरण करके ही कम्प्यूटर में एण्ट्री कर पाता है, रसीद अंग्रेजी में ही दी जाने लगी है, डेलिवरी हेतु सूची अंग्रेजी में प्रिंट होती है। -- -- 
अंग्रेजी लिप्यन्तरण के दौरान पता गलत भी हो जाता है और रजिस्टर्ड पत्र या स्पीड पोस्ट के पत्र गंतव्य स्थान तक कभी नहीं पहुँच पाते या काफी विलम्ब से पहुँचते हैं। अतः मजबूर होकर लोग लिफाफों पर पता अंग्रेजी में ही लिखने लगे है।
 *डाकघरों में मूलतः हिन्दी में कम्प्यूटर में डैटा प्रविष्टि के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं?* 

 (3)-- -- रेलवे रिजर्वेशन की पर्चियाँ त्रिभाषी रूप में छपी होती हैं, कोई व्यक्ति यदि पर्ची हिन्दी (या अन्य भारतीय भाषा) में भरके देता है, तो भी बुकिंग क्लर्क कम्प्यूटर डैटाबेस में अंग्रेजी में ही एण्ट्री कर पाता है। टिकट भले ही द्विभाषी रूप में मुद्रित मिल जाती है, लेकिन उसमें गाड़ी व स्टेशन आदि का नाम ही हिन्दी में मुद्रित मिलते हैं, जो कि पहले से कम्प्यूटर के डैटा में स्टोर होते हैं, रिजर्वेशन चार्ट में नाम भले ही द्विभाषी मुद्रित मिलता है, लेकिन "नेमट्रांस" नामक सॉफ्टवेयर के माध्यम से लिप्यन्तरित होने के कारण हिन्दी में नाम गलत-सलत छपे होते हैं। मूलतः हिन्दी में भी डैटा एण्ट्री हो, डैटाबेस प्रोग्राम हो, इसके लिए व्यवस्थाएँ क्या की जा रही है? 

 (4)-- -- मोबाईल फोन आज लगभग सभी के पास है, सस्ते स्मार्टफोन में भी हिन्दी में एसएमएस/इंटरनेट/ईमेल की सुविधा होती है, लेकिन अधिकांश लोग हिन्दी भाषा के सन्देश भी लेटिन/रोमन लिपि में लिखकर एसएमएस आदि करते हैं। क्योंकि हिन्दी में एण्ट्री कठिन होती है... और फिर हिन्दी में एक वर्ण/स्ट्रोक तीन बाईट का स्थान घेरता है। यदि किसी एक प्लान में अंग्रेजी में 150 अक्षरों के एक सन्देश के 50 पैसे लगते हैं, तो हिन्दी में 150 अक्षरों का एक सन्देश भेजने पर वह 450 बाईट्स का स्थान घेरने के कारण तीन सन्देशों में बँटकर पहुँचता है और तीन गुने पैसे लगते हैं... क्योंकि हिन्दी (अन्य भारतीय भाषा) के सन्देश UTF8 encoding में ही वेब में भण्डारित/प्रसारित होते हैं। *हिन्दी सन्देशों को सस्ता बनाने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं?*

 (5)-- -- अंग्रेजी शब्दकोश में अकारादि क्रम में शब्द ढूँढना आम जनता के लिेए सरल है, हम सभी भी अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश में जल्दी से इच्छित शब्द खोज लेते हैं, -- -- लेकिन हमें यदि हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश में कोई शब्द खोजना हो तो दिमाग को काफी परिश्रम करना पड़ता है और समय ज्यादा लगता है, आम जनता/हिन्दीतर भाषी लोगों को तो काफी तकलीफ होती है। हिन्दी संयुक्ताक्षर/पूर्णाक्षर को पहले मन ही मन वर्णों में विभाजित करना पड़ता है, फिर अकारादि क्रम में सजाकर तलाशना पड़ता है... विभिन्न डैटाबेस देवनागरी के विभिन्न sorting order का उपयोग करते हैं। *हिन्दी (देवनागरी) को अकारादि क्रम युनिकोड में मानकीकृत करने तथा सभी के उपयोग के लिए उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?*

 (6) -- -- चाहे ऑन लाइन आयकर रिटर्न फार्म भरना हो, चाहे किसी भी वेबसाइट में कोई फार्म ऑनलाइन भरना हो, अधिकांशतः अंग्रेजी में ही भरना पड़ता है... -- -- Sybase, powerbuilder आदि डैटाबेस अभी तक हिन्दी युनिकोड का समर्थन नहीं दे पाते। MS SQL Server में भी हिन्दी में ऑनलाइन डैटाबेस में काफी समस्याएँ आती हैं... अतः मजबूरन् सभी बड़े संस्थान अपने वित्तीय संसाधन, Accounting, production, marketing, tendering, purchasing आदि के सारे डैटाबेस अंग्रेजी में ही कम्प्यूटरीकृत कर पाते हैं। जो संस्थान पहले हाथ से लिखे हुए हिसाब के खातों में हिन्दी में लिखते थे। किन्तु कम्प्यूटरीकरण होने के बाद से वे अंग्रेजी में ही करने लगे हैं। *हिन्दी (देवनागरी) में भी ऑनलाइन फार्म आदि पेश करने के लिए उपयुक्त डैटाबेस उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?*

 (7) ---सन् 2000 से कम्प्यूटर आपरेटिंग सीस्टम्स स्तर पर हिन्दी का समर्थन इन-बिल्ट उपलब्ध हो जाने के बाद आज 12 वर्ष बीत जाने के बाद भी अभी तक अधिकांश जनता/उपयोक्ता इससे अनभिज्ञ है। आम जनता को जानकारी देने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? 

 (8)--- भारत IT से लगभग 20% आय करता है, देश में हजारों/लाखों IITs या प्राईवेट तकनीकी संस्थान हैं, अनेक कम्प्यूटर शिक्षण संस्थान हैं, अनेक कम्प्टूर संबंधित पाठ्यक्रम प्रचलित हैं, लेकिन किसी भी पाठ्यक्रम में हिन्दी (या अन्य भारतीय भाषा) में कैसे पाठ/डैटा संसाधित किया जाए? ISCII codes, Unicode Indic क्या हैं? हिन्दी का रेण्डरिंग इंजन कैसे कार्य करता है? 16 bit Open Type font और 8 bit TTF font क्या हैं, इनमें हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाएँ कैसे संसाधित होती हैं? ऐसी जानकारी देनेवाला कोई एक भी पाठ किसी भी कम्प्यूटर पाठ्यक्रम के विषय में शामिल नहीं है। ऐसे पाठ्यक्रम के विषय अनिवार्य रूप से हरेक computer courses में शामिल किए जाने चाहिए। हालांकि केन्द्रीय विद्यालयों के लिए CBSE के पाठ्यक्रम में हिन्दी कम्प्यूटर के कुछ पाठ बनाए गए हैं, पर यह सभी स्कूलों/कालेजों/शिक्षण संस्थानों अनिवार्य रूप से लागू होना चाहिए। *इस्की और युनिकोड(इण्डिक) पाठ्यक्रम अनिवार्य करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?* 


 (9)---हिन्दी की परिशोधित मानक वर्तनी के आधार पर समग्र भारतवर्ष में पहली कक्षा की हिन्दी "वर्णमाला" की पुस्तक का संशोधन होना चाहिए। कम्प्यूटरीकरण व डैटाबेस की "वर्णात्मक" अकारादि क्रम विन्यास की जरूरत के अनुसार पहली कक्षा की "वर्णमाला" पुस्तिका में संशोधन किया जाना चाहिए। सभी हिन्दी शिक्षकों के लिए अनिवार्य रूप से तत्संबंधी प्रशिक्षण प्रदान किए जाने चाहिए। *इसके लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? 

 (10)--- अभी तक हिन्दी की मानक वर्तनी के अनुसार युनिकोड आधारित कोई भी वर्तनी संशोधक प्रोग्राम/सुविधा वाला साफ्टवेयर आम जनता के उपयोग के लिए निःशुल्क डाउनलोड व उपयोग हेतु उपलब्ध नहीं कराया जा सका है। जिसके कारण हिन्दी में अनेक अशुद्धियाँ के प्रयोग पाए जाते हैं। इसके लिए क्या व्यवस्थाएँ की जा रही हैं? 
 -- हरिराम



विश्व हिंदी सम्मेलन : सार्थकता, औचित्य व दायित्व   
 (डॉ.) कविता वाचक्नवी


“विश्व हिन्दी सम्मेलन” एक बहुत अच्छे उद्देश्य व मंतव्य से प्रारम्भ हुआ था। सरकार इसका खर्च वहन करती है, यह भी प्रशंसनीय है । किन्तु जैसा कि एकदम निर्धारित व स्थापित तथ्य बन चुका है कि बंदरबाँट के कारण बरती जाने वाली अदूरदर्शिता के चलते दुर्भाग्य से यह मात्र कुछ सांसदों, अधिकारियों व सम्बन्धों का आयोजन बन चुका है।


इसके लिए दोष किन्हीं अँग्रेजी वालों या अँग्रेजी को देना बहुत सीमा तक अनुचित है।....  क्योंकि मैं इसके लिए स्वयं हिन्दी वालों को उत्तरदायी समझती हूँ… वे किसी भी चीज का विरोध या समर्थन विवेक व सही गलत के आधार पर नहीं अपितु अपना लाभ-हानि देख कर करते हैं। इसीलिए जिन्हें जब तक इस सम्मेलन में सरकारी खर्च पर नहीं बुलाया जाता और जब तक इनके वांछितों के नियंत्रण में इसे नहीं सौंप दिया जाता, तब तक वे (हिन्दी से संबन्धित प्रत्येक संस्था, आयोजन, प्रकाशन आदि की तर्ज पर) इसका भी विरोध और मखौल उड़ाते रहेंगे/ रहते हैं और इस सम्मेलन के औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगा कर इसे बंद कर देने के पक्ष में हल्ला मचाए रहेंगे/ रहते हैं। किन्तु हिन्दी से संबन्धित प्रत्येक संस्था, आयोजन, प्रकाशन आदि की तर्ज पर जैसे ही चीज उनके हाथ में आए या उन्हें सम्मिलित कर लिया जाए, उनका सारा विरोध और बहिष्कार टाँय टाँय फिस्स हो जाता है। मूलतः हम अधिकांश हिन्दी वालों की सारी लड़ाई अपने कारणों से शुरू होती है और अपने स्वार्थ की पूर्ति हो जाने पर समाप्त हो जाती है। हिन्दी वालों की पक्षधरताएँ स्वार्थ के बूते तय होती हैं। वे इस व्यापार को बखूबी जानते हैं कि कब किस के पक्ष में बोलना है, कब किसका विरोध करना है। मूलतः हिन्दी उनके व्यावसायिक हितों (?) को साधने का माध्यम- भर रह गई है।


ऐसे काल व वातावरण में व ऐसे ही लोगों के वर्चस्व के चलते कुछ बचे खुचे वास्तविक भाषाप्रेमियों की जगह-जगह व बार बार ऐसी-तैसी होती रहती है और उनके विचारों, सुझावों एवं मान्यताओं सहित उन्हें भी झटक कर दूर कर देने का कुचक्र जोर-शोर व सर्वमान्य ढंग से नियमित तथा प्रत्येक प्रकरण में जारी है।


इसी प्रवृत्ति का शिकार यह सम्मेलन भी गत कई वर्षों से होता आया है व हो रहा है। अधिकांश स्थापित लोग भी इसकी निंदा इसलिए करते हैं क्योंकि वे स्वयं इसका हिस्सा नहीं हैं। वे इसका बहिष्कार यहाँ तक करना चाहते हैं कि इस सम्मेलन को पूर्णतया समाप्त कर देने व सरकार द्वारा इसका खर्च न दिए जाने की वकालत करते हैं। जबकि सम्मेलन न होने देना समस्या का समाधान नहीं और न ही सम्मेलन का औपचारिकता-भर बन जाना केवल सरकार का दोष है। मेरे विचार में तो हिन्दी और भारतीय भाषाओं के पतन के लिए मूलतः इन भाषाओं के प्रयोक्ताओं  ही अधिक जिम्मेदार हैं, जो अपनी मानसिकता के कारण एक अच्छी चीज को भी अपने स्वार्थ/स्वार्थों के चलते नष्ट कर देने में सदा निमग्न रहते हैं।


वर्तमान संदर्भों में हिन्दी को जोड़ कर देखने वाले व उसका उत्थान चाहने वाले कुछ वरिष्ठ हिन्दी सेवियों ने इस सम्मेलन की `थीम’ सुझाने के लिए आयोजित हुई बैठक में `तकनीक और हिन्दी’ को `थीम’ के रूप में रखना प्रस्तावित किया था। किन्तु प्रस्ताव के चरण में ही उसे उस रूप में स्वीकार नहीं किया गया। इसका कारण क्या हो सकता है, यह अनुमान आप ऊपर लिखे गए वाक्यों के साथ जोड़ कर लगा सकते हैं। `तकनीक और हिन्दी’ एक ऐसा विषय है, जिस पर वही साधिकार बोल लिख सकता है, जो इस क्षेत्र से जुड़ा है। यह क्षेत्र नया होने के कारण इस पर सालों से तैयार पड़ी सामग्री का ढेर भी नहीं है कि कोई भी, कहीं से भी शुरू करे और कुछ भी बोल दे… जो कि सम्मेलनों में बरसों से बोलते चले आने का अभ्यास रखने वालों के लिए कठिन हो जाता । ऐसे में इस विषय का इस रूप में धराशायी हो जाना स्वाभाविक ही था।


अब इसी का दूसरा पक्ष एक और भी है। वह यह कि हिन्दी में तकनीक से जुड़े लोगों का 2-3 प्रतिशत भी ऐसा नहीं है जो भाषा संरचना, भाषा की सैद्धांतिकी आदि से परिचित हो। भारतीय भाषाओं और मुख्यतः हिन्दी में तकनीक के प्रयोक्ताओं में बहुत विरले लोग हैं जो भाषा का शास्त्र और भाषा का विज्ञान व सैद्धांतिकी जानते हैं व जिनकी एकेडमिक समझ प्रशंसनीय व तलस्पर्शी हो। इन 2-3 प्रतिशत को यदि हमारा भाषासमाज, आयोजक, संस्थाएँ और संगठन आदि सही व समुचित आदर, स्थान व महत्व नहीं देते हैं तो यह दोष उन लोगों का है, उस समाज का है और उसे हानि उठानी ही पड़ेगी। हर क्षेत्र की तरह यहाँ भी नकली लोग अपनी चाँदी काटने में व्यस्त हो ही जाएँगे… यथापूर्वम्… ! तकनीक व भाषिक उर्वरता के मध्य की इस खाई का लाभ स्वार्थसिद्धि में रत मानसिकता को मिलता ही है। इसका कुछ दोष उन अकादमिक लोगों पर भी है जो तकनीक से बिदकते हैं और उसे भाषा व साहित्य के लिए त्याज्य व निकृष्ट समझते हैं।


इन तथ्यों और वस्तुस्थिति के आलोक में देखने पर आपके ये प्रश्न जिनसे समाधान की आशा करते हैं …. उनके पास उत्तर नहीं होने से पहले, उत्तर देने वालों का ही न होना एक बड़ी त्रासदी है। किन्तु इस त्रासदी के लिए हम सभी स्वयं उत्तरदायी हैं, हमारे भाषा-समाज की मानसिकता उत्तरदायी है। … क्योंकि वस्तुत: सरकार पैसा लगा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है और कुम्भ की तरह सांसद, अधिकारी व उनके परिचित भी कृतकृत्य हो जाते हैं। आयोजन को सार्थक व ठोस बनाने रखने का दायित्व तो स्वयं हिन्दी वालों का है, अतः उसके सार्थक व ठोस न होने का दायित्व भी हमारा ही हुआ। सम्मेलन के आयोजन पर ही प्रश्नचिह्न लगाना मुझे इसीलिए उपयुक्त नहीं लगता।


जब तक हिन्दी भाषासमाज की मानसिकता कई ढेरों-ढेर इच्छाओं (?) से उबरती नहीं है, तब तक आपको व हमें यक्ष की तरह युधिष्ठिर के आने की प्रतीक्षा में अपने प्रश्नों के साथ जलाशय की रखवाली जिस किसी तरह करते रहने को शापित रहना होगा और युधिष्ठिरों का पथ प्रशस्त करने के लिए स्वयं बुरे बन कर अन्य `प्यासों’ को मूर्छना की कसैली औषध पिलाते रहना होगा।

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हिन्दी को टूटने से बचाएँ


    हिन्दी को टूटने से बचाएँ : संदर्भ आठवीं अनुसूची
   डॉ. अमरनाथ



संसद का आगामी मॉनसून सत्र हमारी राजभाषा हिन्दी के लिए सुनामी का कहर बनकर आएगा और उसे चन्द मिनटों मे टुकड़े-टुकड़े करके छिन्न-भिन्न कर देगा। चन्द मिनटों में इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने विगत 17 मई 2012 को लोक सभा के सांसदों को आश्वासन दे रखा है कि इसी सत्र में भोजपुरी सहित हिन्दी की कई बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने वाला बिल संसद में पेश होगा। यदि हमने समय रहते इस बिल के पीछे छिपी साम्राज्यवाद और उसके दलालों की साजिश का पर्दाफाश नहीं किया तो हमें उम्मीद है कि यह बिल बिना किसी बहस के कुछ मिनटों में ही पारित हो जाएगा और हिन्दी टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाएगी। इस देश के गृहमंत्री की जबान से इस देश की राजभाषा हिन्दी के शब्द सुनने के लिए जो कान तरसते रह गए उसी गृहमंत्री ने हम रउआ सबके भावना समझतानीं जैसा भोजपुरी का वाक्य बोलकर भोजपुरी भाषियों का दिल जीत लिया। सच है भोजपुरी भाषी आज भी दिल से ही काम लेते हैं, दिमाग से नहीं, वर्ना, अपनी अप्रतिम ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक समृद्धि, श्रम की क्षमता, उर्वर भूमि और गंगा यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियों के रहते हुए यह हिन्दी भाषी क्षेत्र आज भी सबसे पिछड़ा क्यों रहता ? यहाँ के लोगों को तो अपने हित- अनहित की भी समझ नहीं है। वैश्वीकरण के इस युग में जहाँ दुनिया के देशों की सरहदें टूट रही हैं,  टुकड़े टुकड़े होकर बिखरना हिन्दी भाषियों की नियति बन चुकी है।

अपनी भाषा से भेद क्यों ?



अपनी भाषा से भेद क्यों ?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
               
                आस्ट्रेलियाई सरकार ने कहा है कि भारत जानेवाले उसके राजनयिकों को हिंदी सीखने की जरूरत नहीं हैक्योंकि वहाँ सारा काम-काज अंग्रेजी में होता हैप्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने तो यहाँ तक कहा है कि ''भारत एक अंग्रेजीभाषी लोकतंत्र है|'' आस्ट्रेलिया के विदेशी मामलों के एक प्रमुख विशेषज्ञ इयान हाल ने अपनी सरकार को सलाह दी थी कि भारत में नियुक्ति किए जानेवाले राजनयिकों को हिंदी इसलिए भी सिखाई जाए कि ऐसा करने से भारत का सम्मान होगाजब जापानचीनकोरियाइंडोनेशियाईरान और तुर्की जैसे देशों में भेजे जानेवाले राजनयिकों को उन देशों की भाषा सीखना अनिवार्य है तो भारत की उपेक्षा क्योंइस पर आस्ट्रेलिया के विदेश व्यापार सचिव का कहना था कि जब भारत ही अपना सारा काम-काज अंग्रेजी में करता है तो आस्ट्रेलियाई राजनयिकों को क्या पड़ी है कि वे हिंदी सीखें?

आईसीयू में पड़ी भारतीय भाषाएँ



आईसीयू में पड़ी भारतीय भाषाएँ
किंशुक पाठक, प्राध्यापक, बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, पटना





तीन सौ से अधिक भारतीय भाषाओं के अकाल मृत्यु के द्वार पर पहुँचने की खबर से कोई खलबली नहीं मची। यह चिंता का विषय होना चाहिए। मानव संचार का मूल आधार है भाषा। प्रतीकों की भाषा, बिंदु-रेखाओं से बनी भाषा, आंगिक भाषा जैसे अनेक भाषायी रूपों को सभ्य समाज ने खूब पहचाना है और महत्व दिया है। फिर भारत की भाषाओं की मृत्यु की आशंकाओं का समाचार और आंकड़े हमें क्यों नहीं कुरेदते? इन्हें बचाने, सजाने-संवारने को हम क्यों नहीं उद्वेलित होते?

भारतीय साहित्य का भविष्य



भारतीय साहित्य का भविष्य
-- डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय




असम साहित्य सभा ने जब मुझे अपने विराट सम्मेलन में आमंत्रित किया और व्याख्यान के लिए किसी विषय में न बाँधा, तब मुझे लगा कि स्वाधीन होना कितना बड़ा दायित्व है ! कई विय मन में आए-गए , अंत में मैंने सोचा कि यदि भारतीय साहित्य अनेक भाषाओं में लिखा एक साहित्य है तो किसी भी काल में विभिन्न भाषाओं की समस्याओं, चुनौतियों और संभावनाओं में कुछ समानताएँ तो जरूर होंगी।


हिंदी विदेशी भाषा की तरह है





हिंदी विदेशी भाषा की तरह है
डॉ. वेदप्रताप वैदिक 



गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले पर किसी भी हिंदीभाषी को जबरदस्त गुस्सा आ सकता है। उसने अपने एक निर्णय में कह दिया कि हिंदी तो किसी भी विदेशी भाषा की तरह है। गुस्सा करने से पहले जरा सोचें कि उसने ऐसा क्यों कहा? उसने ऐसा इसलिए कहा कि गुजरात के एक सुदूर गाँव के लोगों ने शिकायत की कि राष्ट्रीय राजमार्ग पर जो नामपट लगे हुए हैं, वे सिर्फ अंग्रेजी और हिंदी में हैं। वे गुजराती भाषा में क्यों नहीं हैं ?


गाँववालों का यह सवाल बिल्कुल वाजिब है। उनमें से ज्यादातर लोग अनपढ़ या अल्पशिक्षित होंगे। वे न रोमन लिपि पढ़ सकते होंगे और न ही देवनागरी। उनमें से कई तो गुजराती लिपि भी नहीं पढ़ पाते होंगे। अपनी समस्या लेकर वे अदालत में गए, यह उन्होंने ठीक किया। यदि कोई नागरिक अनपढ़ है, तो क्या उसके मानव अधिकार का हनन करने की छूट सरकार को दी जा सकती है? क्या वह नागरिक नहीं है? क्या वह मनुष्य नहीं हैं?


गुजरात में लगा हर सरकारी नामपट गुजराती में होना चाहिए। हर सरकारी काम-काज भी गुजराती में होना चाहिए। इस सिद्धांत का पालन हर प्रांत में होना चाहिए लेकिन होता क्या है? प्रांतों में प्रांतीय भाषाओं की उपेक्षा होती है और उनकी जगह अंग्रेजी और हिंदी लाद दी जाती है। खासतौर से केंद्र सरकार के दफ्तरों और कामकाज में! हिंदी तो राजभाषा है। राष्ट्रभाषा और संपर्क भाषा है। जोड़ भाषा है। जनभाषा है, लेकिन अंग्रेजी किसलिए थोपी जाती है? अंग्रेजी के कारण प्रांतीय भाषाओं का हक मारा जाता है। 


यदि गुजरात के गांवों के नामपटों पर गुजराती के साथ-साथ हिंदी होती तो क्या अदालत वे शब्द बोलती, जो उसने हिंदी के बारे में बोले? कभी नहीं। उसे जो अंग्रेजी के बारे में बोलना चाहिए था, वह उसने हिंदी के बारे में बोल दिया। जरा जुबान फिसल गई। वरना, इस देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का श्रेय जिन दो महापुरूषों को है, वे गुजराती ही थे। महर्षि दयानंद और महात्मा गांधी


गुजराती और देवनागरी लिपियों में जितना साम्य है, दुनिया की किन्हीं दो लिपियों में नहीं है। गुजराती और हिंदी के असंख्य शब्द और मुहावरे एक जैसे है। इसीलिए गुजरातियों के लिए हिंदी को विदेशी भाषा का दर्जा दे देना अत्यंत अतिरंजनापूर्ण है। कुछ गाँव वालों के लिए देवनागरी अजनबीपन सही, हो सकता है लेकिन उसको विदेशीपन तक खींच ले जाना उपमा का गलत प्रयोग है। लड़ाई हिंदी और गुजराती के बीच नहीं है। गुजराती का हक मारने वाली अंग्रेजी के साथ है। सर्वत्र प्रांतीय भाषाओं और हिंदी का प्रयोग होना चाहिए और अंग्रेजी के प्रयोग पर सामान्यता कानूनी प्रतिबंध होना चाहिए।



भाषा के सच्चे अनुरागी : स्वर्गीय प्रो.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव


जयंतीवर्ष एवं जयंतीमाह पर विशेष 




भाषा के सच्चे अनुरागी 
स्वर्गीय प्रो.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव
- गुर्रमकोंडा नीरजा 




हिंदी भाषाविज्ञान के शिखर पुरुष प्रो.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव (9 जुलाई, 1936 - 3 अक्‍तूबर, 1992) का यह 75 वाँ जयंती वर्ष है. 

प्रो.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव का जन्म 9 जुलाई, 1936 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हुआ. उनकी प्राथमिक शिक्षा - दीक्षा गाँव में ही संपन्न हुई. वे वस्तुतः विज्ञान के विद्‍यार्थी थे. लेकिन उन्होंने साहित्य की ओर अपना कदम बढ़ाया. साहित्य से उनकी रुचि भाषाविज्ञान की ओर बढ़ी. उन्होंने लेनिनग्राद विश्‍वविद्‍यालय (सोवियत संघ) से भाषाविज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्‍त की. फिर उन्होंने कैलिफोरनिया से पोस्ट डॉक्टरेट किया. उन्होंने विभिन्न अंतरराष्‍ट्रीय परंपराओं में हुए चिंतनों को भारतीय भाषाओं के परिप्रेक्ष्य में व्यापक दृष्‍टिकोण प्रदान किया. उन्होंने अपने गंभीर लेखन एवं वैचारिकता से भारतीय भाषाविज्ञान के संपूर्ण परिदृश्‍य को बदल डाला.


‘उदारीकरण का उन्माद और आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन : सरलता के सहारे हत्या की हिकमत


आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन


सरलता के सहारे हत्या 




पिछले दिनों राजभाषा के नीति-निर्देशों को लेकर गृह मंत्रालय का एक जो नया ‘ परिपत्र ' प्रकाश में आया है (क्लिक - "हिन्दी पर सरकारी हमले का आखिरी हथौड़ा" ) , उसने भाषा के संबंध में निश्चय ही एक नये ‘विमर्श‘ को जन्म दे दिया है। क्योंकि, भाषा केवल ‘सम्प्रेषणीयता‘ का माध्यम भर नहीं है, बल्कि वह मनुष्य का सामाजिक-सांस्कृतिक आविष्कार भी है। फिर क्या किसी भी राष्ट्र की भाषा की संरचना में मनमाने ढंग से छेड़छाड़ की जा सकती है ? क्या वह मात्र एक सचिव और समिति के सहारे हाँकी जा सकती है ? निश्चय ही इस प्रश्न पर समाजशास्त्री, शिक्षा-शास्त्री, संस्कृतिकर्मी और राजनीतिक विद्वानों को बहस के लिए आगे आना चाहिए। यहाँ प्रस्तुत है , इस प्रसंग में एक बौध्दिक-जिरह को जन्म देने वाली कथाकार प्रभु जोशी की टिप्पणी


सरलता के सहारे हत्या की हिकमत
प्रभु जोशी 



भारत-सरकार के गृह-मंत्रालय की सेवा-निवृत्त होने जा रही एक सचिव सुश्री वीणा उपाध्याय ने जाते-जाते राजभाषा संबंध नीति-निर्देशों के बारे में एक ताजा-परिपत्र जारी किया कि बस अंग्रेजी अखबारों की तो पौ-बारह हो गयी। उनसे उनकी खुशी संभाले नहीं संभल पा रही है। क्योंकि, वे बखूबी जानते हैं कि बाद ऐसे फरमानों के लागू होते ही हिन्दी, अंग्रेजी के पेट में समा जायेगी। दूसरी तरफ हिन्दी के वे समाचार-पत्र, जिन्होंने स्वयं को ‘अंग्रेजी-अखबारों के भावी पाठकों की नर्सरी‘ बनाने का संकल्प ले रखा है, उनकी भी बांछें खिल गयीं और उन्होंने धड़ाधड़ परिपत्र का स्वागत करने वाले सम्पादकीय लिख डाले। वे खुद उदारीकरण के बाद से आमतौर पर और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हासिल करने के बाद से खासतौर पर अंग्रेजी की भूख बढ़ाने का ही काम करते चले आ रहे हैं।


षडयंत्र है या अनभिज्ञता


 षडयंत्र है या अनभिज्ञता

 - प्रो. सुरेन्द्र गंभीर








मान्यवर प्रभु जोशी जी और राहुलदेव जी ने एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर हमारा ध्यान खींचा है।
भारत में हिन्दी की और न्यूनाधिक दूसरी भारतीय भाषाओं की स्थिति गिरावट के रास्ते पर है। ऐसी आशा थी कि समाज के नायक भारतीय भाषाओं को विकसित करने के लिए स्वतंत्र भारत में क्रान्तिकारी कदम उठाएँगे परंतु जो देखने में आ रहा है वह ठीक इसके विपरीत है। यह षडयंत्र है या अनभिज्ञता इसका फ़ैसला समय ही करेगा।




भाषा के सरलीकरण की प्रक्रिया स्वाभाविक है परंतु वह अपनी ही भाषा की सीमा में होनी चाहिए। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आज अंग्रेज़ी और उर्दू के बहुत से शब्द ऐसे हैं जिसके बिना हिन्दी में हमारा काम सहज रूप से नहीं चल सकता। ऐसे शब्दों का हिन्दी में प्रयोग सहज और स्वाभाविक होने की सीमा तक पहच चुका है और ऐसे शब्दों के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए किसी को कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। यह भी ठीक है कि हिन्दी में भी कई बातों को अपेक्षाकृत सरल तरीके से कहा जा सकता है। परंतु यह सब व्यक्तिगत या प्रयोग-शैली का हिस्सा है। विभिन्न शैलियों का समावेश ही भाषा के कलेवर को बढ़ाता है और उसमें सर्जनात्मकता को प्रोत्साहित करता है।

हिन्दी का ताबूत



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कल यहीं प्रकाशित  " हिन्दी पर सरकारी हमले का आखिरी हथौड़ा"   पर  वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव जी ने अपनी जो  प्रतिक्रिया व्यक्त की है, उसका अविकल पाठ यहाँ दे रही हूँ। 





हिन्दी का ताबूत
 - राहुल देव 

हिन्दी के ताबूत में हिन्दी के ही लोगों ने हिन्दी के ही नाम पर अब तक की सबसे बड़ी सरकारी कील ठोंक दी है। हिन्दी पखवाड़े के अंत में, 26 सितंबर 2011 को तत्कालीन राजभाषा सचिव वीणा ने अपनी सेवानिवृत्ति से चार दिन पहले एक परिपत्र (सर्कुलर) जारी कर के हिन्दी की हत्या की मुहिम की आधिकारिक घोषणा कर दी है। यह हिन्दी को सहज और सुगम बनाने के नाम पर किया गया है। परिपत्र कहता है कि सरकारी कामकाज की हिन्दी बहुत कठिन और दुरूह हो गई है। इसलिए उसमें अंग्रेजी के प्रचलित और लोकप्रिय शब्दों को डाल कर सरल करना बहुत जरूरी है। इस महान फैसले के समर्थन में वीणा जी ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली केन्द्रीय हिन्दी समिति से लेकर गृहराज्य मंत्री की मंत्रालयी बैठकों और राजभाषा विभाग द्वारा समय समय पर जारी निर्देशों का सहारा लिया है। यह परिपत्र केन्द्र सरकार के सारे कार्यालयों, निगमों को भेजा गया है इसे अमल में लाने के लिए। यानी कुछ दिनों में हम सरकारी दफ्तरों, कामकाज, पत्राचार की भाषा में इसका प्रभाव देखना शुरु कर देंगे। शायद केन्द्रीय मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के उनके सहायकों और राजभाषा अधिकारियों द्वारा लिखे जाने वाले सरकारी भाषणों में भी हमें यह नई सहज, सरल हिन्दी सुनाई पड़ने लगेगी। फिर यह पाठ्यपुस्तकों में, दूसरी पुस्तकों में, अखबारों, पत्रिकाओं में और कुछ साहित्यिक रचनाओं में भी दिखने लगेगी।

भारतीय भाषाओं की अस्मिता की रक्षा के लिए : भोपाल घोषणा-पत्र


भारतीय भाषाओं की अस्मिता की रक्षा के लिए
भोपाल घोषणा-पत्र

(नीचे के प्रारूप से जो भी मित्र सहमत हों वे अपने हस्ताक्षर करते चलें ताकि शीघ्रातिशीघ्र केंद्र सरकार को भेजा जा सके।

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भोपाल में 24 और 25 सितम्बर 2011 को `भूमण्डलीकरण और भाषा की अस्मिता' विषय पर आयोजित परिसंवाद के हम सभी सहभागी महसूस करते हैं कि हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की अस्मिता ही नहीं, अस्तित्व तक खतरे में हैं। 


स्वतन्त्र भारत को एक सम्पन्न, समतामूलक तथा स्वाभिमानी देश के रूप में विकसित होना चाहिए था। यह जीवन के सभी क्षेत्रों में भारतीय भाषाओं के उपयोग से ही सम्भव था, किन्तु न केवल हमारी अपनी भाषाओं की उपेक्षा की गयी, बल्कि इनकी कीमत पर अंग्रेजी को अनुचित बढ़ावा दिया गया। इसके पीछे जो वर्गीय नज़रिया था, उसने हमें एक औद्योगिक राष्ट्र बनने से रोका, हमारी खेती को चौपट किया, आम जनता से सरकारी तन्त्र की दूरी बढ़ाई और शिक्षा तथा पूँजी के वर्चस्व ने इस प्रकिया की रफ्तार को खतरनाक ढ़ंग से बढ़ाया है।


हम मानते है कि वर्तमान भूमण्डलीकृत निजाम में भारत की जो हैसियत, भूमिका और दिशा है उसमें ज़्यादातर हिन्दुस्तानियों की भौतिक खुशहाली तथा सांस्कृतिक उन्नति की कोई गारन्टी नही है। उनकी अपनी भाषाओं का दमन, उनकी भौतिक विपन्नता और लोकतान्त्रिक व्यवस्था में उनकी समुचित हिस्सेदारी के अभाव के लिए जिम्मेदार है। इसलिए हमारी नजर में जन-भाषाओं की रक्षा, तरक्की और फैलाव का सुनिश्चित कार्यक्रम अपना कर तथा इस पर अमल की प्रक्रिया में शिक्षा, प्रशासन, न्याय तथा जीवन के सभी अहम पहलुओं से जुड़ी व्यवस्थाओं में गहरे परिवर्तन ला कर हम भारत के संविधान के आदर्शों एवं लक्ष्यों को हासिल कर सकते है।


अंगे्रजी से हमारा कोई दुराव नही है हम इसकी शक्ति, दक्षता और खूबसूरती के कायल है। हम चाहते है कि हमारे लोग दुनिया की अन्य समृद्ध भाषाओं के साथ-साथ अंगे्रजी से भी लाभान्वित हो, लेकिन हम नही चाहते कि अंग्रेजी या कोई भी विदेशी भाषा सम्पूर्ण भारत के समग्र विकास में रोड़े खड़े करे तथा हिन्दुस्तानियों की एक बहुत बड़ी जमात को अपने ही घर में पराया बना दे। हमें यकीन है कि अंग्रेजी के सच्चे प्रेमी अंग्रेजी को शोषण, अन्याय, विषमता तथा अविकास का औजार बनते देखकर खुश नही हो सकते। इसलिए हम इस भोपाल घोषणा-पत्र को अंगीकार करते हुए यह चाहते है और माँग करते हैं कि -


1. भारत के सार्वजनिक में यथासंभव भारतीय भाषाओं का प्रयोग हो। 


2. नीचे से लेकर ऊपर तक समस्त शिक्षा भारतीय भाषाओं में दी जाये। इसकी तुरन्त शुरुआत प्राथमिक शिक्षा से की जाये। जिन विषयों की बेहतरीन किताबें भारतीय भाषाओं में नहीं है, उन्हें तैयार करने का काम विद्वानों की टोलियों को सौंपा जाए। यह काम ज्यादा से ज्यादा दस वर्ष की मियाद मंे पूरा किया जाना चाहिए। इसके चार चरण हो सकते हैं-पहले माध्यमिक शिक्षा स्तर तक, उसके बाद स्नातक स्तरप तक, फिर उत्तर-स्नातक और शोध तक और अन्त में तकनीकी विषयों की शिक्षा।


3. किसी भी भारतीय को अंग्रेज या कोई विदेशी भाषा सीखने के लिए बाध्य न किया जाये। प्रत्येक भारतीय को संविधान-मान्य भाषा में उच्चतम स्थान तथा पद तक जानेका अधिकार होना चाहिए। 


4. सभी तरह की औद्योगिक प्रक्रियाओं तथा जन माध्यमों से अंग्रेजी को रुखसत करते हुए देशी भाषाओं को उनका हक दिया जाये।


5. धारा सभाओं, प्रशासन एवं अदालतों से अंग्रेजी को हटाने के लिए एक मियाद तय की जाये और किसी भी हालत में उस मियाद को न बढ़ाया जाये।


6. राज्यों की भाषा क्या हो, इस पर विवाद नहीं है। पर केन्द्र का मामला उलझा हुआ है। हम महसूस करते हैं कि बहुभाषी केन्द्र चलाना व्यावहारिक नहीं है। इसलिए, जैसा कि संविधान कहता है, केन्द्र की भाषा हिन्दी ही रहे, लेकिन केन्द्रीय नौकरियों की संख्या और नौकरशाहों की शक्ति को देखते हुए केन्द्र की राजभाषा के रूप में हिन्दी को ऐसे अतिरिक्त अवसर नहीं मिलने चाहिए, जिससे अन्य भाषा-भाषियों को अनुभव हो कि उनके साथ अन्याय हो रहा है। इसलिए हम चाहते हैं कि केन्द्र के पास सेना, मुद्रा, विदेश नीति तथा अन्तरराज्यीय संसाधन जैसे विषय ही रहें और बाकी सभी अधिकार राज्यों, जिलों एवं स्थानीय निकायों के बीच बांट दिये जाएं। इससे कई राज्यों में हिन्दी के प्रति जो आक्रोश दिखाई पड़ता है, वह खत्म हो सकता है और भारतीय भाषाओं की पारिवारक एकता मजबूत हो सकती है। 


7. जनसंचार माध्यमों पर पूंजी के नियंत्रण को हम खतरनाक मानते हैं। अतः जनसंचार के किसी भी माध्यम से भाषा नीति का फैसला उस माध्यम से मालिकों तथा उसमें काम करने वालों की बराबरी पूर्ण सहमति और ऐसी सहमति न बन पाने पर ‘एक व्यक्ति: एक वोट‘ के आधार पर होना चाहिए।


8. हमारे देश का नाम भारत है। अपने ही देशवासियों के मुँह से ‘इण्डिया‘ सुनकर हमें अच्छा नहीं लगता। इसलिए ‘इण्डिया, दैट इज भारत‘ को हटाकर सिर्फ भारत रखा जाये। इसी तरह, भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय रेल, आकशवाणी आदि जैसे सभी राष्ट्रीय संस्थानों के अंग्रेजी नामों कोक हटाकर उनके भारतीय नामों को ही मान्य करना होगा। ‘इण्डियन आॅयल‘ तथा ‘एअर इण्डिया‘ जैसे सभी अंग्रेजी नामों को हटा कर उनकी जगह भारतीय नाम देने का काम तुरन्त हो।


भोपाल घोषणा-पत्र किसी प्रकार के ‘शुद्धतावाद‘ या इकहरेपन का आग्रही नहीं है, न ही यह भारत को बाकी दुनिया से काट कर रखने की हिमायत करता है। घोषणा-पत्र की समझ यह है कि भौतिक रूप से सम्पन्न तथा मजबूत और सांस्कृतिक दृष्टि से प्रौढ़ एवं प्रगतिशील भारत ही विश्व बिरादरी में अपना उचित तथा गौरवपूर्ण स्थान बना सकता है। इसकी शुरुआत भारत की भाषाई अस्मिता की रक्षा के संघर्ष से ही हो सकती है। हमारी भाषाएं बचेंगी, तभी हम भी बचेंगे। अर्थात् हमें पूरे आदमी और पूरे समाज की तरह जीवित रहना है, तो अपनी भाषाओं की अस्मिता को बचाने तथा समृद्ध करने की लड़ाई उसकी तार्किक परिणति तक लड़नी ही होगी। भोपाल घोषणा-पत्र निष्ठा, दृढ़ता और विनम्रता के साथ इस लड़ाई के लिए सभी का आवाहन करता है। 


  सौजन्य :  कथाकार प्रभु जोशी 

स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ (प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ) - भाग-3



कल आपने पढ़ा -

"..... ये दोनों प्रश्न हिंदी प्रदेश के सभी हिंदी पुरोधाओं से भी पूछे जाने चाहिए कि उनमें से कितनों ने भारतीय भाषाओं से हिंदी में अथवा हिंदी से किसी भारतीय भाषा में अनुवाद किया है? या दक्षिण भारत में हिंदी से और हिंदी में किए गए अनुवाद कार्य की उन्हें जानकारी भी है? और यह भी कि क्या आप हिंदी के ‘बेसिक ग्रामर’ की समझ रखते हैं? कहना न होगा कि तब हिंदी के अधिकतर झंडाबरदार भी बगलें झाँकते नजर आएँगे। "



स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ (प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ) - भाग-3 

भाग - 2  से आगे 

- प्रो. दिलीप सिंह 




समय के साथ चलने की ललक हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं में भरपूर है। ये आगे बढ़ने का प्रयास भी कर रही हैं। एक ओर साधनों की कमी ने इन्हें बाँधे रखा है तो दूसरी ओर हिंदी क्षेत्र की निरंतर उपेक्षा से ये दुखी हैं। मुझे बार-बार यह लगता है कि थोड़े-से प्रयास यदि एकजुट हो कर किए जाएँ तो इनकी उपादेयता और भी बढ़ाई जा सकती है। यह पूरे भारत का दायित्व है, इस देश के प्रत्येक व्यक्ति का कि वह अपनी मातृभाषा और अपनी राष्ट्रभाषा के उत्थान, विस्तार और प्रचलन के लिए डट कर इन संस्थाओं के साथ खड़ा हो। दक्षिण भारत में हिंदी की एकमात्र ‘राष्ट्रीय महत्व की संस्था’ में अपने सुदीर्घ अनुभव के आधार पर मैं यह पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इन संस्थाओं की उपयोगिता को दोबाला करने का एक ही सूत्र है - नव्यता। आधुनिकता, इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि इस शब्द के आज कई भिन्नार्थ (शेड्स) या कहें अनेक प्रत्याख्यान (इंटरप्रेटेशन) तैयार किए जा चुके हैं। नव्यता कई स्तरों पर और कई तरह की चाहिए होगी। इनमें से कुछ के प्रति दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास प्रयत्नशील भी है पर सुविधाओं की कमी और संस्था के कई लोगों के भीतर जड़ जमा चुका यथास्थितिवाद इन प्रयत्नों की अपेक्षित त्वरा को कच्छप गति में बदल देता है। नव्यता के स्तर हैं: 

स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ (प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ) - भाग 2



गतांक से आगे 



ऐतिहासिक महत्व का आँखे खोल देने वाला अत्यंत विचारोत्तेजक लेख, जिसे हिन्दी के प्रत्येक आधुनिक अकादमिक को तो अवश्य पढ़ना ही चाहिए, साथ ही हिंदीतर क्षेत्रों में हिन्दी की वास्तविक स्थिति को जानने के लिए व उसकी तुलना में हिन्दी के नाम पर सर्वत्र व्याप्त धंधेबाजी में डूबे तथाकथित हिंदीवालों के मूल्यांकन के लिए भी इस लेख का पढ़ना अनिवार्यतम है।
-  क.वा.
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स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ (प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ)

गतांक से आगे 

- प्रो. दिलीप सिंह 


स्वतंत्रता के आंदोलन में खादी और स्वदेशी की तरह ही कौमी ज़बान की आवाज ने भी जन-जन को आंदोलित कर दिया था। स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं के इतिहास में यह सभी कुछ तफ़्सील से दर्ज है। इस तरह की संस्थाओं के लिए यह प्रश्न उठाना कि अब इनकी क्या जरूरत है, आज के प्रबुद्ध वर्ग के दिमागी दिवालियेपन की निशानी ही माना जाएगा। 


राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक उत्थान और सामाजिक जागरण आज भी राष्ट्रीय स्तर पर ज्वलंत मुद्दे हैं। इनकी सिद्धि में हिंदी भाषा की भूमिका अब और भी प्रबल बन कर उभर रही है। इन बातों को दुहराने की जरूरत नहीं है। बस इतना ही कहना है कि इन तीनेां के लिए जितना प्रयास और संघर्ष ; अनेकानेक प्रकार की कठिनाइयों और अड़चनों के रहते हुए भी; इन संस्थाओं ने किया है - इनकी संभाल की है - इन्हें संभव बनाया है, उसकी कोई और मिसाल नहीं दी जा सकती। किसी संस्थागत ढाँचे का आदर्श स्वरूप उसके राष्ट्रीय, वैश्विक और प्रगतिशील दृष्टिकोण के मद्देनजर ही रचा और परखा जाता है। स्वतत्रंता के पहले यह दृष्टिकोण राष्ट्रीय, भावात्मक एवं सांस्कृतिक एकता को केंद्र में रख कर विकास पा रहा था और आज उसके दृष्टिकोण भारतीय संविधान की उद्देशिका (प्रिएंबल) में निहित ‘राष्ट्र की एकता और अखंडता’ वाले सूत्र से प्रेरणा ग्रहण कर रहे हैं। इन संस्थाओं पर आक्षेप करने वाले चाहे संविधान के भाग 4 क में उल्लिखित नागरिक कर्तव्यों को बिसरा चुके हों पर ये संस्थाएँ इन दस कर्तव्यों में से तीन (ख, ग, च) का पालन इन्हें अपनी सामूहिक जिम्मेदारी मान कर करती चली आ रही हैं - 

स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ (प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ)



3 अंकों में समाप्य लंबा आलेख 
पहला भाग 

स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ 
(प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ) 

- प्रो. दिलीप सिंह 




दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास [तमिलनाडु]
पिछले कुछ वर्षों से हिंदी क्षेत्र के कई स्वनामधन्य आधुनिक हिंदी के स्वघोषित स्तंभ जगह-जगह स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की प्रासंगिकता और उपादेयता पर प्रश्न खडे़ करने लगे हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने हिंदीतर प्रदेशों में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में अपना कोई योगदान कभी नहीं दिया है। भारत के बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में बैठकर तथा हिंदी की समितियों में घुसपैठ करके ये अपने आप को हिंदी का स्वयंभू समझने लगे हैं। 


लिपि-साहित्य-संस्कृति-शिक्षा







हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर विशेष 




लिपि-साहित्य-संस्कृति-शिक्षा

-  ओम विकास

लिपि : वाणी का दर्पण

जब तक सोया था मानव, अहसास नहीं था, कहाँ है ? क्या है ? किधर जाएगा ? पथ का पता नहीं। नयन उन्मेष पर संवेदनशील हु। प्रकृति की निरंतरता और विपुल भंडार को संजोए गत्यात्मकता मानव जिज्ञासा को उद्दीप्त करती रही है। संवेदनशीलता से विजय भावना भी प्रबलतर होती रही है। कभी आश्रय देकर और कभी आश्रित बनाकर सुखानुभूति। कृपा-क्रूरता का काल-क्रम चलता रहा। सहनशीलता के अतिक्रमण की सीमा बंधने लगीं, कुटुम्ब और समाज परिभाषित होने लगे। शब्द थे, अभिव्यक्ति की भाषा बनी। फिर समझ की सीमाएँ निर्धारित करने के लिए नियम बने। अतीत-वर्तमान-भविष्य का ज्ञान सेतु लेखन पद्धति से संभव हुआ। उत्तरोत्तर प्रयोग और परिष्कार से भाषा का मान्य स्वरूप उद्भूत हुआ। वाणी और लेखन की सुसंगत एकरूपता के लिए पाणिनि जैसे मनीषियों ने लिपि का नियमबद्ध  निर्धारण किया। लिपि वाणी का दर्पण है  लिपि दर्पण से वाणी का प्रतिबिम्ब लेखन के रूप में दिखता है। धुंधला दर्पण तो धुंधला बिम्ब। दर्पण की संरचना पर निर्भर करता है कि बिम्ब की स्पष्टता किस कोटि की होगी।

भारत में हो मेरा पुर्नजन्‍म


भारत में हो मेरा पुर्नजन्‍म

जापानी भाषा के विद्वान अकियो हागा हिंदी वि.वि. में प्रोफेसर के रूप में नियुक्‍त

अब हिंदी माध्‍यम से कीजिए विदेशी भाषा- स्‍पेनिश, चीनी, जापानी के पाठ्यक्रम



 जापानी भाषा के विद्वान एवं कवि अकियो हागा महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी वि‍श्‍वविद्यालय, वर्धा में प्रोफेसर के पद पर हाल ही में नियुक्‍त हुए हैं। वे विश्‍वविद्यालय में जापानी भाषा के विद्यार्थियों को पढायेंगे। ज्ञातव्य है कि विश्‍वविद्यालय में भाषा विद्यापीठ के अंतर्गत पहली बार हिंदी माध्‍यम से चीनी, स्‍पेनिश, जापानी भाषा में सर्टिफिकेट, डिप्‍लोमा व एडवांस्‍ड डिप्‍लोमा के पाठ्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं।

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