मीडिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मीडिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

इसलिए बिदा करना चाहते हैं हिन्दी को ....(१)


इसलिए बिदा करना चाहते हैं...... 


कुछ समय पूर्व (डेढ़ वर्ष ) ‘हिन्दी के हत्यारे’ शीर्षक से २ भागों में एक आलेख अपने चर्चा समूह पर प्रस्तुत किया था। भाँति -भाँति की प्रतिक्रियाएँ आईं। किसी को लगा कि भाषा के नाम पर बेकार व निरर्थक भय पैदा किया जा हिंदी है, किसी को लगता रहा कि ऐसे यत्नों का कोई औचित्य ही नहीं है, किसी ने कहा इंटरनेट पर हिन्दी आ गई, तो हिंदी खूब सुरक्षित है, किसी ने फ़िल्मों व टी.वी. से होने वाली आय-व्यय आदि का मुद्दा भी किसी प्रसंग में उठाया; और हद तो तब हो गई जब किसी ने यहाँ तक कह डाला कि भाषाओं का मरण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, मरना ही भारत इसे तो, मर रही है, काहे की हाय तौबा..; क्या देवनागरी लिपि से भारतीय भाषाओं को ऐसा ही खतरा नहीं हिंदी....आदि आदि। इन सब के अलग अलग उत्तर कुछ दिए भी गए, चर्चा हुई। ठीक रहा। ऐसी जिज्ञासाएँ व प्रश्न अपने हिंदी परिपूर्ण करने की दिशा में निश्चित ही सहायक व मार्गदर्शक का कार्य करते हैं यदि वास्तव में हमें उनके भारत उत्तरों की व निदान की अपेक्षा हो व हम उन्हें खुले मन से स्वीकारने , समझने व अपनाने के उत्सुक उत्सुक हों तो ।

उन सब की चर्चा को पुन: उठाने का प्रयोजन यह भी है कि उन सब तर्कों के सटीक व समायोजित उत्तर के लिए इस बार प्रभु जोशी जी के मूल आलेख का सम्पूर्ण पाठ ‘हिन्दी भारत’ / हिंदी-भारत के पाठकों के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है।

लेखमाला कुल चार(४) भागों की है। आज प्रस्तुत है इसका प्रथम भाग । आगामी भाग आप आने वाले समय में पढ़ पाएँगे।
(- कविता वाचक्नवी)

*************************************************************************

बिदा करना चाहते हैं, हिन्दी को हिन्दी के अख़बार
(१)
प्रभु जोशी



भारत इन दिनों दुनिया के ऐसे समाजों की सूची के शीर्ष पर हैं, जिस पर बहुराष्ट्रीय निगमों की आसक्त और अपलक आँख निरन्तर लगी हुई है । यह उसी का परिणाम है कि चिकने और चमकीले पन्नों के साथ लगातार मोटे होते जा रहे हिन्दी के दैनिक समाचार पत्रों के पृष्ठों पर, एकाएक भविष्यवादी चिन्तकों की एक नई नस्ल अंग्रेजी की माँद से निकलकर, बिला नागा, अपने साप्ताहिक स्तम्भों में आशावादी मुस्कान से भरे अपने छायाचित्रों के साथ आती है - और हिन्दी के मूढ़ पाठकों को गरेबान पकड़कर समझाती है कि तुम्हारे यहां हिन्दी में अतीतजीवी अंधों की बूढ़ी आबादी इतनी अधिक हो चुकी है कि उनकी बौद्धिक-अंत्येष्टि कर देने में ही तुम्हारी बिरादरी का मोक्ष है । कारण यह कि वह अपने आप्तवाक्यों में हर समय इतिहास का जाप करती रहती है और इसी के कारण तुम आगे नहीं बढ़ पा रहे हो। इतिहास ठिठककर तुम्हें पीछे मुड़कर देखना सिखाता है, इसलिए वह गति अवरोधक है । जबकि भविष्यातुर रहनेवाले लोगों के लिए गरदन मोड़कर पीछे देखना तक वर्ज्य है । एकदम निषिद्ध है। ऐसे में बार-बार इतिहास के पन्नों में रामशलाका की तरह आज के प्रश्नों के भविष्यवादी उत्तर बरामद कर सकना असम्भव है । हमारी सुनो, और जान लो कि इतिहास एक रतौंध है, तुमको उससे बचना है । हिस्ट्री इज बंक । वह बकवास है । उसे भूल जाओ ।


बहरहाल-- `अगर मगर मत कर । इधर उधर मत तक । बस सरपट चल।´ भविष्यवाद यह नया सार्थक और अग्रगामी पाठ है ।


जबकि इस वक्त की हकीकत यह है कि हमारे भविष्य में हमारा इतिहास एक घुसपैठिये की तरह हरदम मौजूद रहता है । उससे विलग, असंपृक्त और मुक्त होकर रहा ही नहीं जा सकता । इतिहास से मुक्त होने का अर्थ स्मृति-विहीन हो जाना है-- सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अनाथ हो जाना है ।


लेकिन वे हैं कि बार-बार बताये चले जा रहे हैं कि तुम्हारे पास तुम्हारा इतिहास बोध तो कभी रहा ही नहीं है । और जो है, वह तो इतिहास का बोझ है । तुम लदे हुए हो। तुम अतीत के कुली हो और फटे-पुराने कपड़ों में लिपटे हुए अपना पेट भर पालने की जद्दोजहद में हो, जबकि ग्लोबलाइजेशन की फ्यूचर एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर खड़ी है और सीटी बजा चुकी है । इसलिए तुम इतिहास के बोझ को अविलम्ब फेंको और उस पर लगे हाथ चढ़ जाओ । जी हाँ, अधीरता पैदा करने वाली नव उपनिवेशवाद की यही वह मोहक और मारक भाषा है जो कहती है कि अब आगे और पीछे सोचने का समय नहीं है । अलबत्ता, हम तो कहते हैं कि अब तो सोचने का काम तुम्हारा है ही नहीं, वह तो हमारा है । हम ही सोचेंगे तुम्हारे बारे में । अब हमें ही तो सब कुछ तय करना है तुम्हारे बारे में। याद रखो हमारे पास वह छैनी है, जिस के सामने पत्थर को भी तय करना पड़ता कि वह क्या होना चाहता है -- घोड़ा या कि साँड । उस छैनी से यदि हम तुम्हें घोड़ा बनायेंगे तो निश्चय ही रेस का घोड़ा बनायेंगे । यदि हमें सांड बनाना होगा तो तुम्हें वो सांड बनायेंगे जो अर्थव्यवस्था को सींग पर उछालता हुआ सेंसेक्स के ग्राफ में सबसे ऊपर डुंकारता हुआ दिखाई पड़ेगा ।


इन्हीं चिन्तकों की इसी नई नस्ल ने हिन्दी के अख़बारों के पन्नों पर रोज़-रोज़ लिख लिखकर सारे देश की आंख उस तरफ लगा दी है, जहां विकास दर का ग्राफ बना हुआ है और उसमें दर-दर की ठोंकरे खाता आम आदमी देख रहा है कि येल्लो, उसने छ:, सात और आठ के अंक को छू लिया है । इसी दर के लिए ही तमाम दरों-दीवारों को तोड़कर महाद्वार बनाया जा रहा है । इसे ही ओपन डोअर पॉलिसी कहते हैं । और, कहने की ज़रूरत नहीं कि चिन्तकों की ये फौज, इसी ओपन डोअर से दाखिल हुई है । यही उसकी द्वारपाल है, जो घोषणा कर रही है कि तुम्हारे यहाँ मही (पृथ्वी) पाल आ रहे हैं । तुम्हारे यहाँ विश्वेश्वर आ रहे हैं । दौड़ो और उनका स्वागत करो । तुमने आपात्काल का स्वागत किया था, तो इसका स्वागत करने में क्या हर्ज है ! मजेदार बात यह कि इसके स्वागत में, इसकी अगवानी में, सबसे पहले शामिल हैं, हिन्दी के अख़बार । वे बाजा फूँक रहे हैं और फूँकते-फूँकते बाजारवाद का बाजा बन गये हैं । ये अख़बार पहले विचार देते थे । विचार की पूँजी देते थे, लेकिन अब पूँजी का विचार देने में जुट गये हैं । एक अल्प उपभोगवादी भारतीय प्रवृत्ति को पूरी तरह उपभोक्तावादी बनाने की व्यग्रता से भरने में जी-जान से जुट गये हैं, ताकि भूमण्डलीकरण के कर्णधारों तथा अर्थव्यवस्था के महाबलीश्वरों के आगमन में आने वाली अड़चनें ही खत्म हो जाये और इन अड़चनों की फेहरिस्त में वे तमाम चीजें आती है, जिनसे राष्ट्रीयता की गंध आती हो ।


कहना न होगा कि इसमें इतिहास, संस्कृति और भाषा शीर्ष पर है । फिर हिन्दी से तो राष्ट्रीयता की सबसे तीखी गंध आती है । नतीजतन भूमण्डलीकरण की विश्व-विजय में सबसे पहले निशाने पर हिन्दी ही है । इसका एक कारण तो यह भी है कि यह हिन्दुस्तान में संवाद, संचार और व्यापार की सबसे बड़ी भाषा बन चुकी है। दूसरे इसको राजभाषा या राष्ट्रभाषा का पर्याय बना डालने की संवैधानिक भूल गांधी की उस सीढ़ी को पार दी, जो यह सोचती थी कि कोई भी मुल्क अपनी राष्ट्रभाषा के अभाव में स्वाधीन बना नहीं रह सकता । चूंकि भाषा सम्प्रेषण का माध्यम भर नहीं, बल्कि चिन्तन-प्रक्रिया एवं ज्ञान के विकास और विस्तार का भी हिस्सा होती है । उसके नष्ट होने का अर्थ एक समाज, एक संस्कृति और एक राष्ट्र का नष्ट हो जाना है । वह प्रकारान्तर से राष्ट्रीय एवं जातीय अस्मिता का प्रतिरूप भी है । इस अर्थ में भाषा उस देश और समाज की एक विराट ऐतिहासिक धरोहर भी है । अत: उसका संवर्धन और संरक्षण एक अनिवार्य दायित्व है ।


जब देश में सबसे पहले मध्यप्रदेश के एक स्थानीय अख़बार ने विज्ञापनों को हड़पने की होड़ में बाकायदा सुनिश्चित व्यावसायिक रणनीति के तहत अपने अख़बार के कर्मचारियों को हिन्दी में 40 प्रतिशत अंग्रेजी के शब्दों को मिलाकर ही किसी खबर के छापे जाने के आदेश दिये और इस प्रकार हिन्दी को समाचार पत्र में हिंग्लिश के रूप में चलाने की शुरूआत की तो मैं अपने पर लगने वाले सम्भव अरोप मसलन प्रतिगामी, अतीतजीवी अंधे, राष्ट्रवादी और फासिस्ट आदि जैसे लांछनों से डरे बिना एक पत्र लिखा । जिसमें मैंने हिन्दी को हिंग्लिश बना कर दैनिक अखबार में छापे जाने से खड़े होने वाले भावी खतरों की तरफ इशारा करते हुए लिखा -- `प्रिय भाई, हमने अपनी नई पीढ़ी को बार-बार बताया और पूरी तरह उसके गले भी उतारा कि अंग्रजों की साम्राज्यवादी नीति ने ही हमें ढाई सौ साल तक गुलाम बनाये रक्खा । दरअसल ऐसा कहकर हमने एक धूर्त - चतुराई के साथ अपनी कौम के दोगलेपन को इस झूठ के पीछे छुपा लिया । जबकि, इतिहास की सचाई तो यही है कि गुलामी के विरूद्ध आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले नायकों को, अंग्रेजों ने नहीं, बल्कि हमीं ने मारा था । आज़ादी के लिए `आग्रह´ या `सत्याग्रह´ करने वाले भारतीयों पर क्रूरता के साथ लाठियाँ बरसाने वाले बर्बर हाथ, अंग्रेजों के नहीं, हम हिन्दुस्तानी दारोगाओं के ही होते थे । अपने ही देश के वासियों के ललाटों को लाठियों से लहू-लुहान करते हुए हमारे हाथ ज़रा भी नहीं काँपते थे । कारण यह कि हम चाकरी बहुत वफादारी से करते हैं और यदि वह गोरी चमड़ी वालों की हुई तो फिर कहने ही क्या ?


पूछा जा सकता है कि इतने निर्मम और निष्करूण साहस की वजह क्या थी ? तो कहना न होगा कि दुनिया भर के मुल्कों के दरमियान `सारे जहां से अच्छा´ ये हमारा ही वो मुल्क है, जिसके वाशिन्दों को बहुत आसानी से और सस्ते में खरीदा जा सकता है । देश में जगह-जगह घटती आतंकवादी गतिविधियों की घटनाएं, हमारे ऐसे चरित्र का असंदिग्ध प्रमाणीकरण करती हैं । दूसरे शब्दों में हम आत्मस्वीकृति कर लें कि `भारतीय´, सबसे पहले `बिकने´ और `बेचने´ के लिए तैयार हो जाता है और, यदि वह संयोग से व्यवसायी और व्यापारी हुआ तो सबसे पहले जिस चीज़ का सौदा वह करता है, वह होता है उसका ज़मीर । बाद इस सौदे के, उसमें किसी भी किस्म की नैतिक-दुविधा शेष नहीं रह जाती है और `भाषा, संस्कृति और अस्मिता´ आदि चीजों को तो वह खरीददार को यों ही मुफ्त में बतौर भेंट के दे देता है । ऐसे में यदि कोई हिंसा के लिए भी सौदा करे तो उसे कोई अड़चन अनुभव नहीं होती है । फिर वह हिंसा अपने ही `शहर´, `समाज´, या `राष्ट्र´ के खिलाफ ही क्यों न होने जा रही हो ।

- क्रमश:








तो अब हिंदी में सुन लो

तो अब हिंदी में सुन लो




हिंदी और खास तौर पर पत्रकारिता की हिंदी पर मेरे लेख पर इधर उधर से बहुत सारी टिप्पणियाँ आईं। अब यह तो उम्मीद नहीं की जा सकती कि सबके विचार मेरे विचारों से मिलते हों लेकिन बहुत सारे मित्रों ने लेख की आत्मा के मर्म को समझा और उसमें अपने ज्ञान और दृष्टिकोण को जोड़ कर लेख के सरोकार में मदद की। उन सबको धन्यवाद।



आईबीएन-7 में काम करने वाले युवा मित्र मयंक प्रताप सिंह की टिप्पणी हिंदी की चिंता करने वाले एक सतर्क मन की टिप्पणी थी। उन्होंने हिंदी की खास तौर पर मीडिया में जो दुर्दशा हो रही है, उसके लिए महानगरीय सभ्यता और टीआरपी रेटिंग को जिम्मेदार ठहराया। मयंक की तरह ही और भी बहुत सारे मित्र टीआरपी रेटिंग से नाराज थे। उनका कहना था कि जब तक आज की युवा पीढ़ी जो कनॉट प्लेस को सीपी बोलती है, की भाषा में खबरें नहीं बोली जाएंगी, टीआरपी नहीं बढ़ेगी। इन मित्रों को एक छोटी सी जानकारी देनी है। यह टीआरपी नामक जो मिथक है वह पूरे देश का प्रतिनिधित्व तो नहीं ही करता, चैनलों की टीआरपी खरी और खांटी खबरों से नहीं बल्कि सास बहू और साजिश तथा तंत्र मंत्र वाले कार्यक्रमों से बढ़ती है। चुनाव के दिनों में ठीक उसी उत्सुकता से दर्शक चुनाव के नतीजे देखते हैं जैसे क्रिकेट के मैच देख रहे हों। सो, वह टीआरपी भी प्रासंगिक है। मगर क्षणभंगुर हैं।



ऐसा नहीं है कि हिंदी समाज में खरी और टनाटन बोलने वाली भाषा के ग्राहक नहीं रह गए हैं। दूरदर्शन की भाषा को बहुत कोसा जाता है लेकिन मेरा अनुभव बताता है कि साल में कभी कभार जिस चैनल की कोई टीआरपी गिनी ही नहीं जाती, उस लोकसभा चैनल पर अगर मैंने आधे घंटे का कोई कार्यक्रम कर दिया हो तो फटाफट पूरे देश से सैकड़ों फोन आ जाते हैं। ऐसा उन चैनलों पर घंटों रहने के बावजूद नहीं होता जो टीआरपी के सम्राट कहे जाते हैं । इसलिए यह बात तो मन से निकाल दीजिए कि खरी और प्रांजल हिंदी अपने हिंदी वालों को मंजूर नहीं।



मैंने उस लेख में भी लिखा था और फिर दोहरा रहा हूँ कि मेरे सीएनईबी चैनल में खूब तत्सम और खूब तद्भव मुहावरेदार भाषा लिखी जाती है और अगर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और भारतीय जनसंचार संस्थान के मित्रों की प्रतिक्रिया को मानक माने तो उन्हें यह भाषा मंजूर हैं बल्कि वे उसका स्वागत करते हैं। पिछले दिनों हमारे चैनल के हस्ताक्षर कार्यक्रम महाखबर में हमने दुष्यंत कुमार से लेकर अदम गौडवी और निदा फाजली के अलावा कई साहित्यिक माने जाने वाले कवियों की रचनाओं का धुँआधार इस्तेमाल किया था और उतना ही धुआधांर उसका स्वागत हुआ था।



जैसा कि पहले कहा कि मीडिया और खास तौर पर टीवी मीडिया में ग्लैमर जुड़ गया है और जो पीढ़ी पहले मुंबई में हीरो या पटकथा लेखक बनने के लिए भागती थी वह मीडिया की ओर आ रही है। लगभग हर चैनल ने अपने मीडिया स्कूल खोल रखे हैं और उनकी सफलता इस बात का सबूत हैं कि चाहे जितने मीडिया संस्थान खोल ले, उनमें आने वालों की कमी नहीं रहेगी। मंदी के दौर में भी पांच नए टीवी चैनल तीन महीने में खुले।



टीवी की भाषा संवाद और वाचिक परंपरा की भाषा है। दुर्भाग्य से टीवी के सर्वोच्च पदों पर जो लोग बैठे हैं और जो भाषा निर्धारित करते हैं, उनमें से ज्यादातर अब भी अखबारी पृष्ठिभूमि के हैं और अपने आपको इस ग्रंथि से मुक्त कराने के लिए जिस तरह की हिंदी का इस्तेमाल करने पर वे अपने पत्रकारों को बाध्य कर रहे हैं वह न लिखित परंपरा की हिंदी रह गई है और न वाचिक परंपरा की।



यहाँ यह भी याद रखा जाना चाहिए कि जीटीवी हिंदी का पहला प्रमाणिक समाचार चैनल था। इसके पहले भी जैन टीवी था मगर डॉक्टर जे के जैन जैसे हाथ की सफाई दिखाने वाले और फुटपाथ पर बैठ कर मदारियों की तरह खबरों की हाट लगाने वाले दो कौड़ी के लोग कभी मीडिया की मुख्य धारा में आ ही नहीं पाए। उनके लिए संपत्तियों पर कब्जा करना, विदेशों से उपकरण आयात कर के भारत में बेचना और भारतीय जनता पार्टी से शुरू कर के कांग्रेस तक पहुंचना ही प्राथमिकता थी। लेकिन जीटीवी के समाचार विभाग जो अब पूरा जी न्यूज चैनल हैं, की शुरूआत करने का श्रेय रजत शर्मा को जाता है। उन्होंने टीवी की भाषा तो नहीं लेकिन खबरे दिखाने का व्याकरण जरूर बदल दिया। इसके साथ ही यह कलंक भी वे कभी नहीं मिटा पाएंगे कि टीवी की भाषा को रजत शर्मा के नेतृत्व में जितना भ्रष्ट किया गया है उतना शायद किसी और ने नहीं किया।



हमारे एक सहयोगी मित्र हैं श्रीपति। हम लोग साथ बैठ कर खबरें लिखते हैं और इंडिया टीवी में बहुत समय तक रहने के बावजूद श्रीपति कई बार चौकाने वाले चमत्कार कर डालते हैं। जैसे शीतल मफतलाल जब कस्टम विभाग ने गिरफ्तार की और मफतलाल परिवार के विवाद सामने आए तो पता चला कि इस परिवार की एक बेटी ने पारिवारिक संपत्ति में हिस्सा पाने के लिए सेक्स चेंज करवा के लड़का बन जाने की हरकत की। अपर्णा नाम था लेकिन अब वह अजय है। इतनी लंबी कहानी को श्रीपति ने एक वाक्य में समेट दिया कि एक ननद थी जो अब देवर बन गई है। टीवी को ऐसी त्वरित और सार्थक भाषा चाहिए।



कुछ मित्रों ने यह भी लिखा कि मैथिली, अवधी और भोजपुरी को पूरी भाषा की संज्ञा नहीं दी गई है और ये ऐतराज की बात है। अवधी में रामचरित मानस लिखा गया था, मैथिली में विद्यापति जैसे महाकवि जन्में हैं और भोजपुरी की संस्कृति का एक पूरा संसार हैं। उसका फिल्म उद्योग भी काफी विकसित है। मगर इन सबका व्याकरण और लिपि देवनागरी हैं इसलिए इन्हें कम से कम सहोदरा तो कहा जाना चाहिए। वरना भाषा की मान्यता का सवाल आया तो बुंदेलखंडी, ब्रज और दूसरी कई देसी बोलियां भी दौड़ में शामिल हो जाएंगी और खुद बुंदेलखंडी पृष्ठिभूमि से आने के बावजूद मैं फिर यही कहूंगा कि बुंदेलखंडी और ब्रज भाषा नहीं अभिव्यक्तियां हैं और बहुत ताकतवर अभिव्यक्तियां हैं। किसी भाषा के भाषा होने के लिए उसका अपना व्याकरण और संभव हो तो लिपि भी चाहिए होती है।



एक कोई साहब है शाहिद मिर्जा। मेरे एक दिवंगत मित्र भी शाहिद मिर्जा थे जो नव भारत टाइम्स में रहने के बाद दैनिक भास्कर के किसी संस्करण के संपादक हो गए थे। वे जैसी भाषा लिखते थे उसके सामने उनकी जो पैरोडी यानी नए शाहिद मिर्जा हैं उन्हें इस नाम पर कलंक ही कहा जाना चाहिए। जिस मूरख को यह पता न हो कि कान लगा कर कैसे सुना जाता है उससे क्या बात करनी?

- आलोक तोमर

बीबीसी हिन्दी (व अन्य)की विष्णुप्रभाकर जी के सम्बन्ध में भारी भूल

कई लोगों ने आज बीबीसी हिन्दी पर इस समाचार को देखा होगा

जिसका आरम्भ कुछ यों है -

"साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का निधन

जाने-माने हिंदी साहित्यकार पद्म विभूषण विष्णु प्रभाकर का
<span title=

शनिवार को दिल्ली में निधन हो गया. पिछले कुछ दिनों से दिल्ली के एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था.

विष्णु प्रभाकर 97 वर्ष के थे. उनके परिवार में उनकी दो बेटियाँ और दो बेटे है. विष्णु प्रभाकर का अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा क्योंकि उन्होंने मृत्यु के बाद अपना शरीर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को दान करने का फ़ैसला किया था.

उन्हें उनके उपन्यास अर्धनारीश्वर के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था. उनका लेखन देशभक्ति, राष्ट्रीयता और समाज के उत्थान के लिए जाना जाता था.

उनकी प्रमुख कृतियों में 'ढलती रात', 'स्वप्नमयी', 'संघर्ष के बाद' और 'आवारा मसीहा' शामिल हैं. इनमें से 'आवारा मसीहा' प्रसिद्ध बंगाली उपन्यासकार शरतचंद्र चटर्जी की जीवनी है जिसे अब तक की तीन सर्वश्रेष्ठ हिंदी जीवनी में एक माना जाता है.

विष्णु प्रभाकर का जन्म 29 जनवरी 1912 को उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के मीरापुर गाँव में हुआ था. उनकी माता महादेवी एक शिक्षित महिला थीं जिन्होंने अपने समय में परदा प्रथा का विरोध किया था.

हिंदी में प्रभाकर

उनकी पहली नौकरी एक चतुर्थ श्रेणी की थी और उन्हें मात्र 18 रुपए प्रतिमाह वेतन मिलता था. उन्होंने अपनी इस नौकरी के साथ पढ़ाई भी जारी रखी और हिंदी में प्रभाकर और हिंदी भूषण की डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने अंग्रेज़ी में भी स्नातक किया.

बाद में अपनी नौकरी के साथ ही उन्होंने एक नाटक कंपनी में भी भाग लिया और 1939 में 'हत्या के बाद' नामक एक नाटक लिखा जो उनका पहला नाटक था.

बीच में कुछ समय के लिए उन्होंने लेखन को अपना पूरा समय दिया. उन्होंने 1938 में सुशीला नामक युवती के साथ विवाह किया.

स्वतंत्रता के बाद उन्होंने 1955 से 1957 तक आकाशवाणी, नई दिल्ली में ड्रामा निर्देशक के रूप में काम किया. वर्ष 2005 में उन्होंने राष्ट्रपति भवन में दुर्व्यवहार होने का आरोप लगाते हुए अपना पद्मविभूषण सम्मान लौटाने की बात कही थी."


आश्चर्य अत्यन्त दुःख की बात है कि उपर्युक्त समाचार में "पद्मविभूषण "जाने कितने बजे से यहाँ ऐसे ही लगा है और किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। समाचार में लाल रंग से बोल्ड किए शब्दों को ध्यान से पढ़िए। इनमें बताया गया है कि प्रभाकर जी को पद्म विभूषण सम्मान दिया गया जबकि तथ्य कुछ और हैं। मैंने अभी देखा तो तुंरत जो टिप्पणी उन्हें शिकायत के रूप में क्षमा माँगने के लिए कहते हुए लिखी, उसे अभी तक बीबीसी द्वारा पारित नहीं किया गया। आप उसकी एक कॉपी नीचे देख सकते हैं



" विष्णु प्रभाकर जी के देहावसान के समाचार में आपने एक भारी भूल की है।
विष्णु प्रभाकर जी को पद्मविभूषण नहीं अपितु पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया गया था।

भले ही पद्म सम्मानों की साईट पर जा कर देख लें,या अपने यहाँ के २००५ में छ्पे समाचार की आवृत्ति कर लें। यह राष्ट्रीय मानापमान का मामला है, आपको क्षमा माँगते हुए तुरन्त सुधार करना चाहिए"
. वा.



मेरे उक्त तथ्य की पुष्टि के लिए आप निम्न आधिकारिक साईट पर देख सकते हैं-

This page in Hindi (External website that opens in a new window)

Padma Bhushan Awardees

Search Awardees

Showing 141 to 150 of 1003

  • Shri Madurai Thirumalai Nambi Seshagopalan
    Arts : 2004 : India : Tamil Nadu
  • Dr. Smt. N. Rajam
    Arts : 2004 : India : Uttar Pradesh
  • Smt. Poornima Arvind Pakvasa
    Social Work : 2004 : India : Gujarat
  • Prof. Sardara Singh Johl
    Science & Engineering. : 2004 : India : Punjab
  • Shri Soumitra Chatterjee
    Arts : 2004 : India : West Bengal
  • Shri Thoppil Varghese Antony
    Civil Service : 2004 : India : Tamil Nadu
  • Shri Tiruvengadam Lakshman Sankar
    Civil Service : 2004 : India : Andhra Pradesh
  • Shri Vishnu Prabhakar
    Literature & Education : 2004 : India : Delhi
  • Shri Yoshiro Mori
    Public Affairs : 2004 : Japan :
  • Shri Ammannur Madhava Chakyar
    Arts : 2003 : India : Kerala



ऐसी ही स्थिति और ग़लत जानाकारियोम की उपस्थिति नेट पर और कई जगह है, जहाँ जगह जगह `आवारा मसीहा' को उनकी अपनी जीवनी बताया गया है , यहाँ तक कि हिन्दी विकीपीडिया तक पर भी ऐसी ही चूक आज दोपहर तक चली रही थी।जो परिवर्तन मैंने किए उन्हें यद्यपि अब पूरी तरह हटाया जा चुका है,हिन्दीभारत के गत लेख के सन्दर्भ सहित|



ऐसे ही तीसरी घटना - इस लिंक पर जाकर देखें तो पाएँगे कि यहाँ उनका नाम तक प्रभाकरन कर दिया गया है और आवारा मसीहा को `उनकी' जीवनी बताया गया है। कुछ अंश देखें -

Prabhakaran was born on January 29, 1912 in the Mirapur village of Muzaffarnagar district in Uttar Pradesh.

Writer of over 50 published works, Dr Prabhakaran had written novels, plays and story collections in his lifetime.

A unique characteristic of his works is that it had elements of patriotism, nationalism and messages of social upliftment.

Dr Prabhakar was awarded Padma Bhushan and the Sahitya Akademi Award for his novel Ardhanarishvara (The Androgynous God or Shiva).

He had also won lot of acclaim for his biography ''Awara Maseeha''. (ANI)


यहाँ भी मैंने टिप्पणी करके भूल सुधार के लिए आग्रह किया है, किंतु अभी तक न तो सुधार किया गया है व न ही टिप्पणी को ही पारित किया गया है।

आप भी यदि हिन्दी के इन कृती लेखक के प्रति अपना ऋण चुकाने की भावना रखते हैं तो कृपया ऐसे लिंक खोजिए उन्हें भूल सुधार के लिए बाध्य करिएताकि आने वाली पीढियों को नेट खंगालने पर हिन्दी के ऐसे अमर साहित्यकार तक की जानकारी भ्रामक, झूठी, अधूरी, अंतर्विरोधों से भरी ग़लत मिले। शायद इसी तरह हम अपने मन का बोझ कुछ कम कर सकें।


- कविता वाचक्नवी





जरा खुल कर जय हो




जरा खुल कर जय हो




हम उत्सवधर्मा हैं, पर हमें खुशी मनाने में मुश्किल होती है। खुशी के पलों में अचानक हम पहले गंभीर हो जाते है, फिर आलोचक और फिर थोड़े उदास, थोड़े कुंठित। हम सोचने लगते हैं कि हम बेवजह खु्श हो रहे हैं, जबकि कायदे से तो यह गंभीर विमर्श का मौका है। सोचते-सोचते फिर हमारा मन बोझिल हो जाता है और हम गहरी उदासी में उतरने लगते हैं। हमारे साथ कुछ ऐसा ही हुआ हाल में। हमें ऒस्कर मिल गया। अंग्रेजी के एक हिंदुस्तानी लेखक और राजनयिक विकास स्वरूप ने एक उपन्यास लिखा। किसी अंग्रेज निदेशक को उसका कथानक जमा। एक पटकथा लिखी गयी। फिर एक जटिल फिल्म बनी, जिसमें गंदगी और गरीबी के माहौल में भी एक फंतासी रची गयी। कहानी के एक मोड़ पर भाग्य के पट खुले और एक नाकुछ करोड़पति बन गया। उस पर शक भी किया गया-मानो जो गरीब और वंचित है वह ज्ञान के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता। कुछ ऐसे सरलीकरण और कुछ अद्भुत फिल्मीकरण, कुछ फार्मूले और कुछ नए अंदाज -इन सबको एक फिल्म का स्वरूप मिला। इसमें कोई एक बंबइया अनिल कपूर तथा लंदन में होने के बावजूद एक औसत स्कूल विटमोर हैरो का एक साधारण युवक देव पटेल आमने सामने बैठ कर ’’कौन बनेगा करोड़पति’’ खेलने लगे। इन दोनों में से कोई भी अभिनय की दुनिया के दिलीप कुमार नहीं है।



जैसा कि सब जानते हैं फिल्म वैसे भी एक संश्लिष्ट, दुरूह एवं बहुविधात्मक कला माध्यम है- उसमें तकनीक भी है और कला भी, ग्लैमर भी है और संवेदना भी, चाक्षुष भी है और श्रव्य भी, शब्द भी हैं और सुर भी, और अभिनय तो है ही। अब ’स्लमडॊग मिलियेनेयर’ में भी यह सब ब्रिटिश और भारतीय कलाकारों तथा कामकारों के संयुक्त संयोजन मे हुआ है। रेसूल पुकुट्टी का स्वर संयोजन तकनीक और कला का एक उत्कृष्ट बिंदु है, वरना अनुराग कश्यप की आधुनिक फिल्म ’नो स्मोकिंग’ में अर्थमय गानों और प्रभावी संगीत होने के बावजूद साउंड ट्रैक में कुछ रुखड़ा-सा फॅंसा-फॅंसा सा लगता है। वहाँ भी गुलजार ने कई अनोखे प्रयोग किए थे -’’लंबे धागे धुएँ के, साँस सिलने लगे हैं, प्यास उधड़ी हुई है, ओठ छिलने लगे हैं’’ या फिर ऐश-ट्रे में ’’बहुत से आधे बुझे हुए दिन पड़े हैं इसमें, बहुत सी आधी जली हुई रातें गिर पड़ी है।’’ और भी जैसे ’’धुआँ लिपटता है बाजीगर की तरह हवा से, वो बल पे बल खा के उठ रहा है, तमाम करतब दिखा रहा है, ये ऐश-ट्रे भरती जा रही है।’’ इतने खूबसूरत कविता-तत्व फिल्म की सफलता-असफलता के धुएँ में धुंधले हो गए और उन गीतों का वह असर न हो सका, जो होना चाहिए था।



स्लमडॊग में इन्हीं गुलजार ने ’’रत्ती-रत्ती सच्ची मैंने जान गॅंवाई है, नच-नच कोयलों पे रात बिताई है, अखियों की नींद मैंने फॅंकों से उड़ा दी, गिन-गिन तारे मैंने उँगली जलाई है’’ जैसे बिम्ब जरीवाले नीले आसमान के तले बिखेरे है और पूरी दुनिया में इसका जादू सर चढ़ कर बोल रहा है।



यह कोई नहीं कहता कि ’’स्लमडॊग’’ गुलजार का सर्वश्रेष्ठ है, पर यह भी उनकी रचनात्मक का एक ऐसा योगदान है जिसने रहमान के संगीत में हिंदुस्तानी लफ्ज दिए जिसकी वजह से एकेडमी अवार्ड के मंच पे सबने एक स्वर में कहा- जय हो! रहमान के सरगम की उमगती चढ़ाई पर गुलजार की कविता ने कुछ ठोस पड़ाव दिए और इस अदभुत समां को अंतर्राष्टीªय मंच पर उद्घोष मिला-जय हो! हमारे मंदिरों, चैपालों, गोष्ठियों से उठ कर एक रोजमर्रा की अभिव्यक्ति गूँज उठी - जय हो!



तो मुद्दा यह नहीं कि ’लगान’, ’ब्लैक’, या ’तारे जमीं पर’ को ऒस्कर क्यों नहीं मिला? मिलना चाहिए था। यदि लगान को मिल जाता तो भाई लोग उसमें भी गुगली फेंकते कि कबड्डी और गुल्ली-डंडा खेलने वालों के बीच क्रिकेट का बुखार फैले, इसलिए लगान को ऒस्कर मिला। न मिलने पर कहने वाले कहते कि अमेरिका का ऒस्कर बेसबॊल या फुटभॊल पर आधारित कहानी पर मिल सकता था, क्रिकेट तो वहाँ का पॊपुलर खेल है नहीं। ’’ब्लैक’’ या ’’तारे जमीं पर’’ भी उम्मीद की लौ जलाने वाली फिल्मे हैं, फिर क्यों स्लमडॊग की उम्मीद को ही ऒस्कर से नवाजा गया? मुद्दा इन सवालों का नहीं हैं, दरअसल मुद्दा यह है कि ऒस्कर मिलने पर हम खुशी क्यों न मनाएँ? पप्पू के पास होने पर चॊकलेट खाएँ या लड्डू, कुछ मीठा तो होना चाहिए न। हो सकता है कि इसे ऒस्कर नहीं मिलता तो फिर भी हम रहमान के सुर में सुर मिलाकर ’जय हो’ तो गाते ही, क्योंकि यह खूबसूरत रचना बन पड़ी है। या फिर जैसा मैंने शुरुआत में कहा कि हम उदास हो कर एक बोझिल विमर्श करने लगते कि फिल्मों में किस थीम पर लिखा जाना चाहिए और किस पर नहीं। दरअसल फिल्में बनाते समय कोई इतना दूरदर््शी नहीं हो पाता होगा कि वह ऒस्कर की जीत को दिमाग में रख कर फिल्म बनाए। फिल्म बनने के बाद जरूर अपेक्षित श्रेणी में नामांकन की कोशिश होती होगी और जीतने की ख्वाहिश। ’स्लमडोग’ को ऒस्कर मिला तो क्यों मिला, और भी बेहतर फिल्में बनती हैं? न मिला तो क्यों न मिला, इतनी अच्छी फिल्म थी- यह रोना निदा फाजली के खयाल को पुख्ता करना है-’’दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।’’ तो दोस्तो, हर वक्त का रोना भी बेकार का रोना है।



यह मौका पॊपुलर बनाम गंभीर के विवाद का भी नहीं। जिस तरह पॊपुलर होना हमेषा श्रेष्ठ होने का पर्याय नहीं, उसी तरह सिर्फ गंभीर होना हमेशा रचनात्मकता का पर्याय भी नहीं। फिर सिनेमा जैसे माध्यम में कौन चाहेगा कि वह पॊपुलर और सफल न हो। वैसे भी रहमान रोजा के जमाने से और गुलजार बंदिनी या काबुलीवाला के जमाने से जो कुछ लगातार रच रहे हैं, वह सिर्फ पॊपुलर होना नहीं है। पुकुट्टी ने भी जो ध्वनि संयोजन किया है, वह जाहिर है कि पूना इंस्टीट्यूट के दिनों से उनकी सतत साधना का ही परिणाम है। यह अलबत्ता संयोग है कि एकेडमी अवार्ड के मापदंडों पर बनी और अमेरिका में प्रदर्शित एक अंग्रेजी फिल्म में होने की वजह से इन सबको ऒस्कर मिला, वरना हिंदुस्तानी संदर्भ में सब मानेंगे कि रहमान या गुलजार की पहचान पुरस्कारों की मोहताज नहीं।





तो आइए, जो हुआ उसका जश्न मनाएँ और जो होना चाहिए उसके लिए आगे कोशिश करें। किसने रोका है इससे बेहतर लिखने से, इससे बेहतर संगीत की रचना करने से, और इससे बेहतर फिल्म बनाने से। न तो ऒस्कर का यह आखिरी साल है, न ही ऒस्कर इकलौता सम्मान है और न ही जिंदा शामियाने के तले लफ्जों, धुनों, इंसानी हुनर और दानिशमंदी की महफिल अभी खत्म हुई है। फिलहाल दबे मन से नहीं, सुखविंदर की तरह खुले गले से रहमान, गुलजार, रेसूल पुकुट्टी, लवलीन टंडन, राज आचार्य, रूबीना, इस्माइल, आयुष, तनय, तन्वी, इरफान खान, अनिल कपूर तथा डेनी ब्वायल के लिए कोरस में बोलने का वक्त है- जय हो!



- विनोद खेतान
429, हवा सिंह ब्लॊक, खेल गाँव,
नई दिल्ली-110049.

सचाई के साथ फ्लर्ट करता मीडिया

सचाई के साथ फ्लर्ट करता मीडिया

- प्रभु जोशी





आज हम गाहे--गाहे सुनते रहते हैं और अख़बारों के पन्नों पर भी हमें बार-बार यह याद दिलाया जाता है किसूचना भी एक सत्ता है।लेकिन, इसमें संशोधन करते हुए यह कहा जाना उचित होगा किअब तो केवलसूचनाही सत्ता है।कहना होगा, कि जब से सूचना के इतनेसत्तावानहोने का अहसास हमारे मीडिया को हुआ है, तभी से उसने स्वयं को लगभगसर्वसत्ताके रूप में बिना किसी संकोच के निर्विघ्न रूप से स्थापित कर लिया है। कदाचित् यही कारण है किमीडियाका पूरा चरित्र अबसत्ताके चरित्र से भिन्न नहीं रह गया है।



दरअसल, किसी भी क़िस्म कीसत्ताको जो हक़ीकतनसत्ताबनाती है; वह घटक है स्वयंराज्यका प्रतिरूप बन जाना। राज्य की विशेषता यही होती है कि उसी मेंदमनहै और उसी मेंमुक्तिभी समाहित है।दमनऔरमुक्ति’, राज्य को उपलब्ध दोअमोघ अस्त्रहैं, जिन्हेंश्राप और वरदानकी तरह कहना ज़्यादा उचित होगा। राज्य को उपलब्ध इन्हीं दो आयुधों के कारण, ‘व्यक्तिऔरसमाजउससे निकटता बनाये रखने में जुटे रहते हैं। और, यह आकस्मिक नहीं कि ये दोनों ही चीजें अबमीडियाके अधिकार में है। अर्थात् वह अब किसीवामनकोअभयदानदेकर विराट बना सकता है, तो किसीविराटपर कुपित होकर उसे वामन बना सकता है। यह खेल खेलता हुआ वह अपनी लीला मेंराज्यका ही तो स्वांग रचाता है। इसमें ध्यान देने की बात यह है कि मीडिया के इस खेल में बाज़ार सबसे बड़ी भूमिका में चुका है।



कहने की ज़रूरत नहीं कि आज हर शख्सबाज़ार के बीचहै और इन दिनों ज्ञान के इलाके में खुला सबसे बड़ा बाज़ारसूचनाका है, जिसमें वह कबिरा की तरह निरबंक अकेला खड़ा कबिरा के पास तो लकुटिया हाथ में थी, ये तो लगभग खाली हाथ ही है हालांकि मुझे अचरज तो इस बात पर आज भी होता है कि तब बाज़ार में कबिरा लकुटिया के साथ कैसे खड़ा रह पाया होगा ? फिर लकुटिया के सहारे उसने क्या खरीद लिया होगा ? एक दफा ख़रीदने की बात भी छोड़िए, हाथ में लकुटिया लेकर उसने किसी का क्या ही बिगाड़ लिया होगा ? आज हाथ में लकड़ी लेकर पुलिस वाला तक बाज़ार में कुछ नहीं कर पाता तो फिर कबिरा की हैसियत तो पुलिस जैसी भी नहीं रही थी बाज़ार कासचयह है कि वहाँ लकुटिया नहीं, सिर्फ बटुए के सहारे ही खड़ा रहा जा सकता है बिना बटुए के आप बाज़ार से बाहर हकाल दिए जाएंगे हो सकता हो, कबीर युग मेंहाट-बाज़ारमें बटुए के बजाए, ’शब्दका मोल होता हो और लोग उस पर भरोसा करते हों मगर, ये एक ऐसानया बाज़ारहै, जहाँशब्दका तो मूल्य ही नहीं रह गया है या फिर, शब्द के इतने-इतने और ढेर सारे मूल्य हो गए हैं कि समझ में नहीं पा रहा है कि कहाँ क्यागफ़लतहो गई कहीं ऐसा तो नहीं कि अबगफ़लतही मुख्य है और सारा बाज़ार, बस उसके सहारे ही चल रहा है इल्म के इलाकेमेंगफ़लतइतना बड़ा व्यापार करेगी, यह बात इस बाजारू हुए और निरन्तर होते जा रहे समय में ही समझ रही है। बल्कि, कहा जाए किगफ़लतही उसकी समझ बन गई है।



बहरहाल, इस धोखादेह वक्त में हम ढेरों ऐसी गफ़लतों से घिरे हुए हैं, जोसूचनाऔरसचके मनोहारी मुखौटे लगाए हुए हैं ऐसा नहीं है कि सामान्यजन पहलेगफलतोंसे घिरा हुआ नहीं था और अब हो गया है वास्तव में गफलतें तब भी थीं और बेशक आदमी उससे घिरा भी हुआ करता था, मगर बावजूद इसके वहाँसचभी हुआ करता था लेकिन, अब वहाँसचनहीं होता, बससच के होने की अफवाहभर होती है - या कहें कि वहाँ सिर्फसच संबंधी सूचनाऔर उसकी निर्मिति भर होती है, जिसमेंसचको बहुत किफायत के साथ इस्तेमाल किया जाता है इस तरहसचको किफायत के साथ इस्तेमाल करने की सबकी अपनी-अपनी अलग और अचूक शैलियाँ हैं मान लीजिए कि यदि एक आदमी कोसचजानना है तो वह पाता है कि उसके चारों तरफ दस-बीस-तीस या चालीससचहैं ? वह घर के ड्राइंग रूप में बैठकर रिमोट हाथ में लेकरसचके पाठ बदलता रहता है- वह पाता है कि एक जगह जिससचको वहविराटकी तरह देख रहा था, दूसरी जगह वहाँसचबिल्कुलवामनहै एक जगह जोसचखम ठोंकबोलताहुआ बरामद होता है, रिमोट का बटन दबते ही दूसरी जगह वह एक निहायत ही थरथराते गिड़गिड़ातेसचके रूप में दिखाई पड़ता है। अंत में रिमोट एक ओर फेंककर एक हीसचके इतने सारे नमूनों और संस्करणों के बीच से गुज़रकर वह सोचता है कि दरअसल उसने इस कालावधि मेंसचकीपहचानऔरप्रतिमानही खो दिये हैं परख की जोकसौटियाँउसके पास थीं, वे सब बेकार हो हो गई है और तो और वह जो देख रहा था, वहसचनहीं, बल्किसूचना के बाज़ारमें डटे निर्माताओं के आकर्षणब्राण्डहैं अतः अब सबसे बड़ी सचाई यही है किब्राण्डहीसचहै और हर निर्माता उसे अपने-अपने पैकेजिंग के साथ बेच रहा है नतीज़तन, ’सच का बाज़ारऔरबाज़ार का सच‘, एक दूसरे में इतना गड्डमड्ड हो गया है कि उसमें दोनों के दरमियान इम्तियाज़ की सामान्य कूबत ही नहीं बची है



ऐसे में मुझे एक बहुप्रचारित शीतलपेय की पुड़िया की याद आती है एक पुड़िया और बारह गिलास कितना किफायतीसच छोटा सा माल और इतना इतना विपुल उत्पाद। थोड़े से कच्चे माल से समूचे बाज़ार को पाटने की कारगर तकनीक बारह हाथ की कांकड़ी में तेरह हाथ का बीज।मालथोड़ा औरपूर्तिबड़ी इस तरह अबसचएक प्राॅडक्ट है, इसलिए उसकी निर्मिति (मेन्युफेक्चरिंग) उनकी ज़रूरत। वही तो उनकी आर.टी.पी. बनाता और निरन्तर बढ़ाता है।



कदाचित् आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा हो रहा है कि हमारा सूचासमाज‘ ’सचको इतना संकटग्रस्त देख रहा है सच को बेचनेकेधंधे में धुत्तलोग आम आदमी की चूख को चुप्पी में बदलकर उसे एक नए किस्म का गूंगापन भेंट कर रहे हैं ताजमहल जैसी राष्ट्रीय धरोहर को आश्चर्यों की सूची में दर्ज़ करवाने के लिए ज़मीन-आसमान एक कर रहे हैं, जबकि भाषा जैसी धरोहर की ईंट-ईंट को चुन-चुन कर तोड़ने की उन्होंने सुपारी ले रखी है, जो धरोहर को धराशायी करने का सबसे विराट राष्ट्रद्रोह है यह परम्परा के प्रेम का कैसासचहै ? माथे के सिंदूर बेचने की दूकान में चकलाघर चलाने के आयटम मिलने लगते हैं। पतिव्रता की पोशाक पहन कर, छिनाले का सौदा पटाया जा रहा है। लोग चीख कर पूछना चाहते हैं कि आख़िरकार ये क्या हो रहा है ?



लेकिन, किससे पूछे ? चूँकि, उत्तर दे सकने वाले लोग भूमिगत हैं वे मिट्टी के नीचे दबे पड़े हैं और अब वहाँ क्रांकीटीकरण हो गया है। क्रांकीटीकरण वाले ही उत्तर देने वालों की जगह बैठ गए हैं। उन्होंने एक निर्लज्ज अनसुनी को अपना कवच बना लिया है। वे प्रश्नबिद्ध होने से बचे हुए हैं। कितने ही तीखे सवाल दाग दिए जाएँ। उन्हें आहत नहीं किया जा सकता है क्योंकि उनके कवच अभेद्य हैं। उनके पास हर तीखे प्रश्न का रेडीमेड उत्तर है। फिर काफी इफरात है, रेडीमेड की। जब इतने उत्तर रेडीमेड हों तो बाज़ार में लगे हाथ लेन-देन हो जाता है। अब रेडीमेड में विश्वास बढ़ा है तैयार उत्तर का स्टाक हो तोसचको खोजने के खटकरम से बच जाने की तसल्ली बनी रहती है। आपके भीतर अधिकतम लोगों की अधिकतम पूर्ति का प्रबंध हो जाता है। इसलिए मीडिया और माफिया दोनों हीसर्वज्ञके अहम् से बोलते है कर लो क्या क्या करते हो ? यही उनका सबसे बड़ा उत्तर है ये उनके द्वारा दिया जा रहासचहै। इसलिए सत्य पर मीडिया विचार ही नहीं करता-क्योंकि उसे तो सच का सरलीकरण करना है। सरलीकरण स्वयंविचारकी संभावनाओं पर पानी फेर देता है इसलिए लोगसच के विचारमें नहींसच की ग्राहकीमें फंसे रहते हैं, यही उनका अंतिम उद्देश्य और अंतिम अभीष्ट भी है उन्हें मालूम है किविचारसमय लेता है और उनके पाससमयनहीं है समय उनके लिए केवल एकस्लाॅटहै एक चंक है और उस चंक या स्लाॅट में हुए, ‘दर्शक की व्यग्रता का ग्राफऊँचा उठाना है इसलिए, वे हर क्षण उतावली में रहते हैं उतावली मेंब्रेकमदद करता है उनके यहाँविचारकी जगहफंडेने ले ली है वहाँ फंडा लगाकरसचकी खोज की जाती है विचारएक निहायत बोगस और बासी शैली है, जो अब अख़बारों से भी निकाल फेंक दी गई है।



वास्तव में विचार गुज़रे और गुज़िश्ता लोगों की सनक थी, जो अपने देश और समाज को बनाने के संकल्प से भरे थे वे एक नव स्वतंत्र राष्ट्र का भविष्य गढ़ने के लिए एक नया और ईमानदार नागरिक गढ़ना चाहते थे अब सूचना के व्यापार में देश और समाज को बनाने की बात, एक सिरे सेअनप्रोफेशनलहै प्रबंधन का प्रशिक्षण लेने वाले सम्पादक के नाम सम्पादक के नाम पर पैकेज की दाड़की पर काम करने वाले आदमी को बिठा दिया जाता है और उसे बताया जाता है कि उसेजनतानहीं, ‘ग्राहकका निर्माण करना है। अबजनताकहीं नहीं है, बल्कि वह केवल एक उपभोक्ता समूह है, जिसे आपको अपना प्राडॅक्ट मत्थे भेड़ना है। वे आपके द्वारा बनाए दे रहेसचके उपभोगी भर बने रहें, बस इतना ही आपका दायित्व है। कहीं वे चेतनासम्पन्न पाठक या नागरिक बन जाएँ और वे आपसेचैबीस-कैरेट सचकी मांग करने लगें। याद रखे, ’सच की मांगसेसत्ताएँबनती हैं, लेकिनसच को अमलमें लाने सेसत्ताएँढहती हैं। इसलिएसचकोसचनहीं, ‘सनसनी और स्वादमें बदलो। सत्य को कटु नहीं, जायकेदार बनाओ। अब विचार एक किस्म का बौद्धिक दिवालियापन है। असल में अबफनऔरएक्सटैसीही सबसे बड़ासचहै। इसी से माल काउठावबना रहता है।बाज़ार की रुचिऔररुचि का बाज़ारबनाना अख़बार ही नहीं पूरे मीडिया का काम है। वह वस्तुओं को चुनने की सुविधा को स्वतंत्रता का पर्याय मान बैठे। यह धंधे की सफलता का अब सर्वोपरि ध्येय है।



हमारे प्रिंट और इलेक्ट्राॅनिक मीडिया को बाज़ार ने अपने कच्छे की तरह पहन लिया है। बाज़ार की नंगई ढांपने की भूमिका में उतर कर मीडिया मुग्ध है। उधर इंटरनेट पर ब्रिटनी स्पीयर्स अपने जननांग के चित्र जारी करती है, इधर हमारे मीडिया के कच्छे गीले होने लगते हैं। यही हमारामीडिया विज़्डमबन गया है। प्रिंस वाली घटना के बाद सेकरुणा का कारोबारबंद कर दिया गया। अब उत्तेजना का कारोबार चल रहा है। इसलिए, रिक्शा चालक के बेटे का आईएएस में चयन हो जाना समाचार में उतनी जगह नहीं घेरता, जितनी राखी सावंत की बाइट। और अब तो सरकार खुद एक्सटैसी के इंतजाम में लग गई है। उन्होंने भरपूर यौनरंजन के लिए तृप्तिदायक खिलौने खोज आविष्कृत कर दिये हैं।फक्डकी फीलिंग, भूख से बड़ी है। हमारे समाज और सरकार के लिए, ब्रेड का कोई नया कारखाना खोलने के बजाए यौनरंजन के लिए उत्पाद और कंडोम का कारखाना खोलने में लगी सरकार की प्राथमिकताएँ बताती हैं कि बाज़ार की ताकत कितनी बड़ी है।



सरकारें बाज़ार के लिए च्यूइंग गम से ऊपर नहीं है, बल्कि, बाज़ार ने हमारेसमग्रको च्यूइंग गम बना लिया है। अब कौन और कहाँ करे किसी का गम ? अब गम नहीं सिर्फ जश्न भर की जगह शेष है। उत्सव है-आंदोलन नहीं। एक नया आनंदबाज़ार बन रहा है। हमारा देश और समाज में, जिसमें वर्जनाओं के कच्छे उतारकर एक अरब लोगों को शामिल करने का एजेंडा बन चुका है। यही नंगासचहै, हमारे देश का। क्योंकि हमें संपट नहीं बैठ रही है कि कहाँ से मीडिया शुरू होता है और कहाँ से माफिया। हम तो राजा के समय के प्रजाबोध से मुक्त नहीं हुए हैं और यही हमारे राजा हैं। यही हमारे बादशाह है। यही हमारे मुग़ल हैं। हम तो हैं केवल इनकी रियाया। अब इन्हीं के मत्थे सारी जिम्मेदारी छोड़कर, छककर सो जाना चाहते हैं, पांच नहीं, पचास साल के लिए। हमें फटी धोती और सड़ी हुई लाठी टेककर चलने वाले गांधी नहीं, इस सबको उखाड़ फेंकने वाली भूमण्डलीकरण की आंधी की ज़रूरत है। उम्मीद है, मीडिया ही इसमें मदद कर सकेगा कहना होगा कि मीडिया मुग़ल चुके हैं और वे बहुत ज़ल्दी वह सब कर दिखायेंगे, जिसकी ज़रूरत हिंदुस्तान के हरआमऔरख़ासको है। गांधीजी ने एक लंगोटी लपेटकर गांव-गांव घूमते हुए, उपवास करते हुए, जेलों में रात-दिन काटते हुए जो हमें दिलाया था, वह तो बिना ढाल और बिना तलवार के था, .....और, वह सब एक सड़ी सी स्टिक (जिसे हिंदी जैसी भदेस भाषा में लाठी कहते हैं) के सहारे दिलाया था, लेकिन मीडिया अब ज्वाॅय-स्टिक के सहारे हमें उपलब्ध करवा देगा। यह नई और रेडीमेड सचाई है। इसके के साथ फ्लर्ट करने का आनंद है।


...............

Comments system

Disqus Shortname