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यह कैसे होगा ?




यह कैसे होगा ?
 

 

यह कैसे होगा ?

यह क्यों कर होगा?

नई-नई सृष्टि रचने को तत्पर

कोटि-कोटि कर-चरण

देते रहें अहरह स्निग्ध इंगित

और मैं अलस-अकर्मा

पड़ा रहूँ चुपचाप !

यह कैसे होगा ?

यह क्योंकर होगा ?




यथा समय मुकुलित हों

यथासमय पुष्पित हों

यथासमय फल दें

आम और जामुन, लीची और कटहल !

तो फिर मैं ही बाँझ रहूँ !

मैं ही न दे पाऊँ !

परिणत प्रज्ञा का अपना फल !

यह कैसे होगा ?

यह क्योंकर होगा ?




भौतिक भोगमात्र सुलभ हों भूरि-भूरि,

विवेक हो कुंठित !

तन हो कनकाभ, मन हो तिमिरावृत्त !

कमलपत्री नेत्र हों बाहर-बाहर,

भीतर की आँखें निपट-निमीलित !

यह कैसे होगा ?

यह क्योंकर होगा ?

- नागार्जुन

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