डॉ. वेदप्रताप वैदिक INDIA लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
डॉ. वेदप्रताप वैदिक INDIA लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

पुलिस अफसर हत्या : दूसरा पहलू

पुलिस अफसर हत्या : दूसरा पहलू
- डॉ वेदप्रताप  वैदिक 




मुरैना में होली के दिन हुई पुलिस अफसर नरेंद्र कुमार की हत्या ने सारे देश में सनसनी-सी फैला दी थीमाना यह जा रहा था कि वह किसी खनन-माफिया की करतूत है और यह नहीं हो सकता कि इस माफिया के मप्र सरकार के साथ सूत्र न जुड़े होंयह कैसे हो सकता है कि एक मामूली ट्रैक्टर ड्राइवर एक पुलिस अफसर को कुचल कर मार डालेकांग्रेस के कुछ प्रांतीय नेताओं ने टीवी चैनलों पर यह तक कह डाला कि खनन माफिया के तार सीधे मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी के साथ जुड़े हैंलेकिन अब अखबारों में जो तथ्य आ रहे हैंउनसे सारे निष्कर्ष उल्टे पड़ते दिखाई पड़ रहे हैंट्रैक्टर चलाने वाले किसान मनोज गूजर ने माना कि नरेंद्र कुमार को उसी के ट्रैक्टर ने कुचला है लेकिन यह जान-बूझकर नहीं हुआ हैपुलिस अफसर नरेंद्र कुमार ने मनोज पर पिस्तौल तानी और उसे रुकने के लिए कहालेकिन मनोज ने डर के मारे ट्रैक्टर तेजी से भगा लियाइस पर नरेंद्र ने ऊपर कूदकर ट्रैक्टर का स्टीयरिंग व्हील पकड़ने की कोशिश की और वे फिसलकर नीचे गिर पड़ेइस हड़बड़ में वे कुचले गएमनोज के भाइयों का कहना है कि वह अच्छे पुलिस अफसर थे और उनके उनके परिवार का कोई झगड़ा नहीं थालोग अपना ट्रैक्टर इसलिए अंधाधुंध भगा ले जाते है कि पकड़े जाने पर पुलिस मोटी रिश्वत माँगती है|

Citizens’ Silent Protest March





Citizens’ Silent Protest March
From Rajghat on 18 June at 5 pm



Please join in large numbers to register our strong protest against the government’s clampdown on peaceful demonstrators in the wee hours of 5 June. It reminded of the Jallianwala Bagh incident of 13 April 1919 when British troops opened fire on innocent citizens. The difference this time was that instead of bullets the state used batons. There was no provocation.


एक और हजार का फर्क



एक और हजार का फर्क
डा. वेदप्रताप वैदिक





भारत में गरीब होने का अर्थ जैसा है, वैसा शायद दुनिया में कहीं नही है| भारत में जिसकी आय 20 रू. से कम है, सिर्फ वही गरीब है| बाकी सब ? यदि सरकार और हमारे अर्थशास्त्रियों की मानें तो बाकी सब अमीर हैं| 25 रू. रोज़ से 25 लाख रू. रोज तक कमानेवाले सभी एक श्रेणी में हैं| इससे बड़ा मज़ाक क्या हो सकता है ? ये लोग गरीबी की रेखा के उपर हैं| जो नीचे हैं, उनकी संख्या भी तेंदुलकर-कमेटी के अनुसार 37 करोड़ 20 लाख हैं| ये 37 करोड़ लोग, हम ज़रा सोचें, 20 रू. रोज़ में क्या-क्या कर सकते हैं ? अगर कोई इन्सान इन्सान की तरह नहीं, जानवर की तरह भी रहना चाहे तो उसे कम से कम क्या-क्या चाहिए? रोटी, कपड़ा और मकान तो चाहिए ही चाहिए| बीमार पड़ने पर दवा भी चाहिए| और अगर मिल सके तो अपने बच्चों के लिए शिक्षा भी चाहिए| क्या 20 रू. रोज में आज कोई व्यक्ति अपना पेट भी भर सकता है ? आजकल गाय और भैंस 20 रू. से ज्यादा की घास खा जाती हैं| क्या हमें पता है कि देश के करोड़ों वनवासी ऐसे भी हैं, जिन्हें गेहूँ  और चावल भी नसीब नहीं होते| इस देश के जानवर शायद भरपेट खाते हों लेकिन इन्सान तो भूखे ही सोते हैं| वे इसलिए भी भूखे सोते हैं कि वे इन्सान हैं| वे एक-दूसरे का भोजन छीनते-छपटते नहीं| गरीब परिवारों में कभी बाप भूखा सोता है तो कभी मॉं और कभी-कभी बच्चों को भी अपने पेट पर पट्रटी बाँधनी  होती है| जहाँ तक कपड़ों और मकान का सवाल है, भोजन के मुकाबले उनका महत्व नणण्य है| किसी तरह तन ढक जाए और रात को लेटने की जगह मिल जाए, इतना काफी है| ऐसे 37 करोड़ लोगों का देश दुनिया में कोई और नहीं है| दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब लोग अगर कहीं रहते हैं तो भारत में ही रहते हैं|


यह तो सरकारी आंकड़ा है लेकिन असलियत क्या है ? असलियत का अंदाज तो सेनगुप्ता-कमेटी की रपट से मिलता है| उसके अनुसार भारत के लगभग 80 करोड़ लोग 20 रू. रोज़ पर गुजारा करते हैं| यहाँ  तेंदुलकर-रपट सिर के बल खड़ी है| किसे सही माना जाए ? तेंदुलकर को या सेनगुप्ता को ? भारत का तथाकथित मध्यम-वर्ग यदि 25-30 करोड़ लोगों का है तो शेष 80 करोड़ लोग आखिर किस वर्ग में होंगे ? उन्हें निम्न या निम्न-मध्यम वर्ग ही तो कहेंगे| उनकी दशा क्या है ? क्या वे इंसानों की जिंदगी जी रहे हैं ? उनकी जिदंगी जानवरों से भी बदतर है| वे गरीबी नहीं, गुलामी का जीवन जी रहे हैं| वे लोग कौन हैं ?
 
 

ये वे लोग हैं, जो गावों में रहते हैं, शारीरिक श्रम करते हैं, पिछड़ी और अस्पृश्य जातियों के हैं, शहरों में मजदूरी करते हैं, शिक्षा और चिकित्सा से वंचित हैं और जिन्हें सिर्फ पेट भरने, तन ढकने और सोने की सुविधा है| इन्हें वोट का अधिकार तो है लेकिन पेट का अधिकार नहीं है| यह भारत है| यह भूखा और नंगा है| और वह इंडिया है| उसमें वही 25-30 करोड़ लोग रहते हैं| ये नागरिक हैं, सभ्य हैं, स्वामी हैं| कौन हैं, ये लोग ? ये शहरी हैं, ऊँची जातियों के हैं, अंग्रेजीदाँ हैं| राजनीति, व्यापार और ऊँची नौकरियों पर इन्हीं का कब्जा है| इन्हीं के लिए चिकनी-चिकनी सड़कें, रेल, हवाई जहाज, कारें बनती हैं| बड़े-बड़े स्कूल, अस्पताल और कालोनियाँ  खड़ी की जाती हैं| इनका संसार अपना है और अलग है| यही वर्ग तय करता है कि गरीबी क्या है और गरीबी कैसे हटाई जाए ? इसीलिए यह फतवा जारी कर देता है कि जो 20 रू. से ज्यादा कमाता है, वह गरीब नहीं है और जो गरीब नहीं है, वह चिल्लाए क्यों और उसके लिए कुछ खास क्यों किया जाए ? याने देश के 80 करोड़ लोगों के बारे में विशेष चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि ये लोग गरीबी की रेखा के उपर हैं| जिन 37 करोड़ लोगों की चिंता है, उनकी गरीबी दूर करने के प्रयास जरूर होते हैं लेकिन वे सतही और तात्कालिक होते हैं और उनमें से ज्यादातर भ्रष्टाचार की बलि चढ़ जाते हैं| सस्ते राशन और 'नरेगा' (ग्रामीण रोजगार) से क्या वाकई गरीबी हटाई जा सकती है ? ये काम भी यदि ईमानदारी से किए जाएँ तो थोड़ी देर के लिए गरीबी हटती जरूर है लेकिन वह मिटती बिल्कुल भी नहीं| उसकी जड़ पर प्रहार होना तो बहुत दूर की बात है| सरकारी प्रयास तो उसकी जड़ को छूते तक नहीं|


हमारी सरकारों ने गरीबी की जड़ उखाड़ने की बात कभी सोची ही नहीं| हजारों बरस से चली आ रही हमारी गरीबी का मूल कारण जातिवाद है| कुछ जातियाँ दिमाग का काम करेंगी और कुछ हाथ -पाँव  का ! दिमागवाली जातियाँ  मलाई खाएँगी  और हाथ-पाँववाली जूठन ! इस तिकड़म को बरकरार रखने के लिए हमने सूत्र यह चलाया कि दिमागी काम की क़ीमत ज्यादा और शारीरिक काम की क़ीमत कम ! कुर्सीतोड़ काम महत्वपूर्ण और हाथ-तोड़ काम महत्वहीन ! ऊँची जातियाँ  शहरी लोगों और अंग्रेजीदानों ने कुर्सीतोड़ काम पकड लिए और ग्रामीणों, पिछड़ी जातियों और गरीबों ने हाड़-तोड़ काम ! यहीं इंडिया और भारत की खाई खड़ी हो गई| यह खाई तभी पटेगी, जब दिमागी और जिस्मानी कामों में चला आ रहा जमीन-आसमान का अंतर खत्म होगा| आज तो एक और हजारों का अंतर है| मजदूर को 100 रू0 रोज मिलते हैं तो कंपनी बॉस को लाखों रू. रोज़ ! यह अंतर एक और 10 का करने की हिम्मत जिस सरकार की होगी, वह गरीबी की जड़ पर पहला प्रहार करेगी| इसी प्रकार देश में से दो प्रकार की शिक्षा और दो प्रकार की चिकित्सा का तुरंत खात्मा होना चाहिए| यदि अंग्रेजी की अनिवार्यता नौकरियों और शिक्षा से एक दम हट जाए तो गरीबों के बच्चों को अपना जौहर दिखाने का सच्चा मौका मिलेगा| आरक्षण, बेगारी भत्ता (ग्रामीण रोजगार), सस्ता अनाज आदि की अपमानजनक मेहरबानियाँ अपने आप अनावश्यक हो जाएँगी, अगर शिक्षा के बंद दरवाजे खोल दिए जाएँ| किताबें रटाने की बजाय बच्चों को काम-धंधे सिखाए जाएँ, छोटे-छोटे कर्जे़ देकर काम-धंधे खुलवाए जाएँ और अमीरों और नेताओं के अंधाधुंध खर्चों पर रोक लगाई जाए तो गरीबी कितने दिन टिकेगी ? हमारी सरकारें आमदनी पर तो टैक्स लगाती है, लेकिन खर्चों पर कोई सीधा टैक्स नहीं है| इसकी वजह से समाज में जबर्दस्त प्रतिस्पर्द्घा और भोगवाद को बढ़ावा मिलता है| लोग बचत करने की बजाय भ्रष्टाचार करने पर उतारू हो जाते है| यदि खर्च की सीमा बाँधी  जाए तो सामाजिक विषमता अपने आप घटेगी| गरीब को गरीबी उतनी नहीं चुभेगी| गरीबी अपने आप में ही अभिशाप है| जब तक उसे दूर नहीं किया जाता, लोकतंत्र और आर्थिक प्रगति कोरे दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं हैं|



ए-19 प्रेस एन्क्लेव नई दिल्ली-17-फोन-2686-7700, 2651-7295

रूस की सर्दियों में भारत का बसंत





रूस की सर्दियों में भारत का बसंत
डॉ. वेदप्रताप वैदिक



प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह की मास्को-यात्रा की तुलना यदि उनकी वाशिंगटन-यात्रा से और ओबामा की पेइचिंग-यात्रा से की जाए तो माना जाएगा कि यह मास्को-यात्रा अधिक सगुण और अधिक सार्थक रही है| इस मास्को-यात्रा का कोई खास शोर-शराबा नहीं था, जैसा कि उल्लिखित दोनों यात्राओं का था लेकिन इस यात्रा में से जैसे समझौते और दिशा-निर्देश निकले हैं, वे सिर्फ भारत-रूस संबंधों में ही गर्माहट पैदा नहीं करेंगे, वे दक्षिण एशिया और विश्व-राजनीति पर भी अपना गहरा प्रभाव डालेंगे|


दो साल पहले प्रधानमंत्री की मास्को-यात्रा में जिस तरह का मोह-भंग हुआ था, उसने भारत-रूस संबंधों को लगभग बर्फ में जमा दिया था| गोर्शकोव-सौदा तो अधर में झूल ही रहा था, परमाणु-सौदे भी खटाई में पड़ गए थे| भारत को यह समझ ही नहीं पड़ रहा था कि अमेरिकी सौदा संपन्न होने के पहले वह रूस से सौदा करे या न करे| भारत-रूस व्यापार भी सिर्फ चार बिलियन डॉलर पर अटका हुआ था| इधर अमेरिका और रूस में परमाणु-छतरी को लेकर तनाव बढ़ गया था और भारत अमेरिका के नज़दीक जाने के लिए बेताब हो रहा था| यह भी पता नहीं चल रहा था कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान आदि के प्रति भारत और रूस के रवैए में कितनी समानता हो सकती है| लेकिन पिछले साल रूसी प्रधानमंत्री विक्तोर झिबकोव की भारत-यात्रा के दौरान जो हल्के-से संकेत उभरे थे, उन्हें हमारे प्रधानमंत्री की इस मास्को-यात्र ने गरज़ती हुई प्रतिध्वनियों में बदल दिया है| इधर भारत में मनमोहन सिंह दुबारा प्रधानमंत्री बने और उधर रूस में मई 2008 में व्लादिमीर पुतिन खुद प्रधानमंत्री बने और उन्होंने अपने शिष्य दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बना दिया| इस पट-परिवर्तन के साथ-साथ भारत-अमेरिकी परमाणु-सौदा भी संपन्न हो गया| इन घटनाओं ने भारत और रूस के सामने संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए| इसीलिए रूस के साथ हुआ परमाणु-सौदा अमेरिकी सौदे से भी काफी आगे निकल गया| रूस की सर्दियों में भारत का बसंत खिल गया|


भारत-अमेरिकी सौदे पर पाँच साल की खींचातानी के बावजूद प्रधानमंत्री की वाशिंगटन-यात्रा के दौरान परमाणु-ईंधन का मामला अधर में ही लटका रहा लेकिन मास्को-यात्रा के दौरान रूस ने भारत को वे रियायतें दे दी हैं, जो अमेरिका उसे सपने में भी नहीं दे सकता| अमेरिका की शर्त है कि अगर परमाणु-सौदा भंग होता है तो ईंधन की सप्लाई तुरंत बंद हो जाएगी और सारे संयंत्र लौटाने होंगे याने भारत ने यदि कोई परमाणु-विस्फोट कर दिया तो उसे लेने के देने पड़ जाएँगे | अमेरिकी ईंधन से चलनेवाले उसके संयंत्र ठप्प हो जाएँगे और अरबों रूपए के अमेरिकी संयंत्र उसे वापस लौटाने होंगे जबकि उसी स्थिति में रूसी ईंधन की सप्लाय जारी रहेगी| रूस जी-8 के उस प्रस्ताव को भी नहीं मानेगा जो कहता है कि भारत-जैसे परमाणु-अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत नहीं करनेवाले राष्ट्रों को ईंधन संशोधन और परिवर्द्धन की तकनीक न दी जाए| इसका अर्थ यह हुआ कि रूस ने भारत को व्यावहारिक तौर पर छठा परमाणु शक्तिसंपन्न राष्ट्र मान लिया है| अमेरिका के 123 समझौते ने जो बंधन भारत पर डाले हैं, उन्हें रूसी सौदे ने दरी के नीचे सरका दिया है| अब ऐसा लग रहा है कि दो साल पहले भारत और रूस जो अचानक ठिठक गए थे, वह उन्होंने ठीक ही किया था| अब अमेरिका सौदे ने भारत का मार्ग प्रशस्त कर दिया है| इसका लाभ उठाकर भारत ने फ्रांस, केनाडा, नामीबिया, मंगोलिया, कजाकिस्तान, नाइजीरिया आदि के साथ भी परमाणु संयंत्रें और ईंधन के समझौते कर लिये हैं| रूस के साथ हुआ यह समझौता न केवल भारत को छह नए परमाणु-संयंत्र देगा बल्कि लगभग 20 संयंत्र अलग-अलग प्रांतों में भी लगाएगा| राष्ट्रपति मेदवेदेव ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि भारत को परमाणु संयंत्र, तकनीक या ईंधन देते समय रूस किसी के दबाव में आनेवाला नहीं है और ये समझौते सिर्फ क्रय-विक्रय संबंधी नहीं हैं| इनके तहत दोनों देशों के बीच परमाणु-शोध और व्यापक उर्जा सहयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा| इसमें संदेह नहीं है कि रूस और फ्रांस ने परमाणु-उर्जा से बिजली बनाने के जो सफल प्रयोग किए हैं, उनका लाभ भारत को मिलेगा|


भारत ने सिर्फ परमाणु-उर्जा ही नहीं, तेल और गैस देने के लिए भी रूस को पटा लिया है| रूस के ताइमन पेचोरा क्षेत्र के त्रेब और तीतोव में भारत अब तेलोत्खनन करेगा और यह सुविधा उसे अब सखालिन-3 में भी मिल सकती है| अब भारत अपनी युद्ध-क्षमता बढ़ाने के लिए दुबारा रूस की तरफ अभिमुख हो रहा है| उसने यातायात और युद्धक विमान बनाने के नए समझौते तो किए ही हैं, विमानवाहक पोत गोर्शकोव का सौदा भी सुलझा लिया है| भारत रूस व्यापार को अगले कुछ वर्षों में तिगुना करने का संकल्प भी लिया गया है| दोनों देशों ने अफगानिस्तान की स्थिरता और पुनर्निर्माण पर भी विचार किया है| ईरान के बारे में दोनों देशों का रवैया अन्य महाशक्तियों से ज़रा भिन्न हैं और दोनों ने पाकिस्तान के आतंकवादी तत्वों पर खुले-आम उंगली उठाई है| भारत और रूस की इस लौटती हुई घनिष्टता से अमेरिका और चीन जैसे राष्ट्रों को चिंतित होने की जरूरत नहीं है, यह बात रूसी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री ने एकदम स्पष्ट कर दी है| चीन और अमेरिका के साथ रूस और भारत अपने द्विपक्षीय संबंध अपने-अपने ढंग से आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन इन दो पुराने मित्रों की घनिष्टता विश्व-राजनीति के दादाओं के कान खड़े कर सकती है| यह मित्रता विश्व-राजनीति को बहुध्रुवीय बनाने में तो सहायक होगी ही, वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर चलनेवाली अनेक अंतरराष्ट्रीय दादागीरियों पर ब्रेक लगाने में भी सक्षम हो सकती है| इस समय भारत को रूस की जितनी जरूरत है उतनी ही जरूरत रूस को भारत की है| पाँच-सात साल पहले तक रूस अपने गैस और तेल की उपलब्धि के दम पर भारत जैसे मित्रें को हाशिए में डालता चला जा रहा था| उसे न तो अपने पारंपरिक शस्त्र-बाजार की परवाह रह गई थी और न ही वह अपने पुराने परखे हुए संबंधों को निभाते रहना चाहता था| लेकिन अब जबकि तेल और गैस के अंतरराष्ट्रीय दाम काफी गिर गए हैं, रूस को अब अपने पुराने ग्राहकों, दोस्तों और भारत जैसी नई विश्व-शक्तियों का दुबारा ध्यान आ रहा है| साम्यवाद के चंगुल से छूटा हुआ रूस अभी तक अपनी नई ज़मीन नहीं तलाश पाया है| वह अब भी विचारधारा के शिशिर में ठिठुर रहा है| भारत का लोकतंत्र और प्रगति के पथ पर बढ़ता हुआ अर्थतंत्र रूस की सर्दियों में बसंत को खिला सकता है|

ए-19 प्रेस एन्क्लेव नई दिल्ली-17

Comments system

Disqus Shortname