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द्वंद्व नहीं, प्रतिद्वंद्विता का सवाल : क्या युद्ध हमेशा सीमाओं पर ही लड़ा जाता है?





द्वंद्व नहीं, प्रतिद्वंद्विता का सवाल

दूसरी बात हाल ही में सामने आई है, जिसका श्रेय ‘माओ : द अननोन स्टोरी’ के लेखक द्वय जुंग चांग और जॉन हैलिडे को है। इस पुस्तक में विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर यह बताया गया है कि माओ त्से तुंग ने भारत पर इसलिए हमला करवाया कि वे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में जवाहरलाल नेहरू की बढ़ती हुई लोकप्रियता से चिढ़ने लगे थे। माओ का यह सपना भी पूरा हुआ, क्योंकि चीनी आक्रमण के बाद नेहरू की ख्याति और लोकप्रियता पर ग्रहण लग गया और सिर्फ दो वर्ष बाद उनका देहावसान भी हो गया। दरअसल, अतिशय महत्वाकांक्षी और सत्ता-कामी माओ का यह चेहरा भारतीय मीडिया और जनमत से छिपा रहा है, क्योंकि भारत के वामपंथ ने माओ के व्यक्तित्व को एक ‘क्रांतिकारी रहस्यवाद’ से ढक रखा है। इस बीच चीन ने अपने को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है, इसमें संदेह नहीं। दूसरी ओर, भारत सरकार और उसका चापलूस बुद्धिजावी वर्ग भारत को भी महाशक्ति के रूप में पेंट करता रहता है, पर चीन और भारत के बीच अभी भी कोई तुलना नहीं है – न सामरिक शक्ति के स्तर पर और न आर्थिक शक्ति के स्तर पर। हाँ, व्यापक गरीबी के मामले में जरूर दोनों एक-दूसरे के आसपास ही हैं। आर्थिक मंदी के परिणामस्वरूप इस समय चीन की राजधानी तथा अन्य शहरों से गरीबों को कुत्तों की तरह खदेड़ा जा रहा है। इसे ‘बैक टू विलेज’ अभियान बताया जा रहा है। उसके बावजूद, भारत में दरिद्रता का प्रकोप कहीं ज्यादा है। हो सकता है, चीन अगले बीस-पचीस सालों में गरीबी की समस्या सुलझा ले, पर भारत की आर्थिक प्रगति की दिशा और तैयारी को देखते हुए यह अवधि पचास वर्ष से आगे भी जा सकती है।








1962 और 2009 के बीच फर्क क्या है? तब हमारा मीडिया सोया हुआ था और आज वह कुछ ज्यादा ही जगा हुआ है। तब अखबारों में वही सब छपता था जो सरकार चाहती थी या मुहैया कराती थी। आज मीडिया हर जगह अपना एक एजेंडा तैयार कर लेता है। तब राष्ट्रभक्ति के मोह में असुविधाजनक सवाल नहीं पूछे जाते थे। आज सिर्फ असुविधाजनक सवाल ही पूछे जाते हैं और अकसर झूठी राष्ट्रभक्ति दिखाई जाती है। सनसनी की खोज केंद्रीय महत्व की वस्तु हो गई है और इसके लिए युद्ध का आधारहीन माहौल भी बनाया जा सकता है।































1962 और 2009 के बीच फर्क क्या है? तब हमारा मीडिया सोया हुआ था और आज वह कुछ ज्यादा ही जगा हुआ है। तब अखबारों में वही सब छपता था जो सरकार चाहती थी या मुहैया कराती थी। आज मीडिया हर जगह अपना एक एजेंडा तैयार कर लेता है। तब राष्ट्रभक्ति के मोह में असुविधाजनक सवाल नहीं पूछे जाते थे। आज सिर्फ असुविधाजनक सवाल ही पूछे जाते हैं और अकसर झूठी राष्ट्रभक्ति दिखाई जाती है। सनसनी की खोज केंद्रीय महत्व की वस्तु हो गई है और इसके लिए युद्ध का आधारहीन माहौल भी बनाया जा सकता है।


पिछले कुछ समय से मीडिया में चीन को ले कर खासा तनाव है। कई बार तो ऐसा वातावरण बनाने की कोशिश की गई कि अरुणाचल प्रदेश में चीन का आक्रमण अब हुआ कि तब हुआ। चीन अरुणाचल प्रदेश को अपने देश का हिस्सा मानता है और बताता है, यह कोई नई बात नहीं है। ऐसे ही कुछ बहानों से उसने भारत पर आक्रमण भी किया था। अरुणाचल प्रदेश में, जिसे तब नेफा कहते थे, वह दाखिल भी हो गया था। लेकिन आज यह यकीन कर पाना मुश्किल है कि वह अपने दावे को साबित करने के लिए सेना भेजने की सोच सकता है। अगर वह ऐसा करता है, तो उसे फायदा कम, नुकसान ज्यादा होगा। लेकिन यह चीन के राजनय का अनिवार्य हिस्सा है कि वह भारत को और दुनिया को अपने दावे की सतत याद दिलाता रहे। जब दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा का कार्यक्रम बना, तो स्वाभाविक था कि चीन की मुखरता कुछ और कर्कश हो जाती। यही हुआ और सनसनी की तलाश में हमारे मीडिया ने हुआँ हुआँ करना शुरू कर दिया।


यद्यपि भारत सरकार बार बार टीवी चैनलों को चेतावनी जारी करती रही है कि वे तिल का ताड़ बना कर जनता को गुमराह न करें, फिर भी मीडिया के नजरिए में कोई परिवर्तन नहीं आया है। कोई मामूली-सी घटना भी हो जाती है या चीन सरकार द्वारा रुटीन टाइप का बयान भी जारी होता है, तो कुछ चैनलों को जुकाम हो जाता है। अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर अरसे से हो रही घुसपैठों और सीमा पार चल रही सैनिक गतिविधियों को गरम से गरम बना कर पेश करनेवाले हमारे टीवी चैनल अपने इस अज्ञान का परिचय देते थक नहीं रहे कि सन बासठ के हमले का रहस्य क्या था। बासठ के समझे बिना दो हजार नौ को समझा नहीं जा सकता।


अब यह सूरज की रोशनी की तरह साफ हो चुका है कि बासठ में भारत की सीमाओं पर हमला करने के पीछे चीन का इरादा इस देश पर कब्जा करना नहीं था। सैनिक स्तर पर यह शायद असंभव न रहा हो, लेकिन व्यावहारिक यह किसी भी तरह से नहीं था। अगर सैनिक ताकत के बल पर कब्जा हो भी जाता, तो वह कितने दिनों तक टिक सकता था? जो देश सिर्फ पंद्रह साल पहले ब्रिटेन की गुलामी से मुक्त हुआ था, वह अपने पड़ोसी देश की अधीनता स्वीकार कर लेगा, यह बात किसी पागल के दिमाग में भी नहीं आ सकती थी। पर चीन पागल नहीं था, न है। उसकी कुछ नीतियों में शैतानी का तत्व जरूर रहा है और यह आज भी कायम है।
अब यह सूरज की रोशनी की तरह साफ हो चुका है कि बासठ में भारत की सीमाओं पर हमला करने के पीछे चीन का इरादा इस देश पर कब्जा करना नहीं था। सैनिक स्तर पर यह शायद असंभव न रहा हो, लेकिन व्यावहारिक यह किसी भी तरह से नहीं था। अगर सैनिक ताकत के बल पर कब्जा हो भी जाता, तो वह कितने दिनों तक टिक सकता था? जो देश सिर्फ पंद्रह साल पहले ब्रिटेन की गुलामी से मुक्त हुआ था, वह अपने पड़ोसी देश की अधीनता स्वीकार कर लेगा, यह बात किसी पागल के दिमाग में भी नहीं आ सकती थी। पर चीन पागल नहीं था, न है। उसकी कुछ नीतियों में शैतानी का तत्व जरूर रहा है और यह आज भी कायम है।


विभिन्न तथ्यों, विश्लेषणों और रहस्योद्घाटनों से छन कर जो बात सामने आती है, वह यह है कि बासठ की सैनिक कार्रवाई के पीछे चीन के दो इरादे थे – एक, भारत की सीमावर्ती जमीन का जितना बड़ा हिस्सा हड़पा जा सके, हड़प लिया जाए। चीन शुरू से ही विस्तारवाद की नीति का शिकार रहा है। पड़ोसियों की जमीन पर उसकी आँख बराबर लगी रहती है। यहाँ तक कि उसके सैनिक नदी के छोटे-छोटे द्वीपों तक पर कब्जा जमाने के लिए रूसी सैनिकों से टकराते रहते थे। बासठ में जब चीन का यह इरादा पूरा हो गया, तो उसने अपनी आगे बढ़ती हुई सेना को पीछे लौटने का आदेश दे दिया। युद्धों के इतिहास में यह एक विरल घटना थी कि एक शक्तिशाली और विजयी होता हुआ देश पराजित हो रहे देश की जमीन से अपने पाँव पीछे खींच ले।



दूसरी बात हाल ही में सामने आई है, जिसका श्रेय ‘माओ : द अननोन स्टोरी’ के लेखक द्वय जुंग चांग और जॉन हैलिडे को है। इस पुस्तक में विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर यह बताया गया है कि माओ त्से तुंग ने भारत पर इसलिए हमला करवाया कि वे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में जवाहरलाल नेहरू की बढ़ती हुई लोकप्रियता से चिढ़ने लगे थे। माओ का यह सपना भी पूरा हुआ, क्योंकि चीनी आक्रमण के बाद नेहरू की ख्याति और लोकप्रियता पर ग्रहण लग गया और सिर्फ दो वर्ष बाद उनका देहावसान भी हो गया। दरअसल, अतिशय महत्वाकांक्षी और सत्ता-कामी माओ का यह चेहरा भारतीय मीडिया और जनमत से छिपा रहा है, क्योंकि भारत के वामपंथ ने माओ के व्यक्तित्व को एक ‘क्रांतिकारी रहस्यवाद’ से ढक रखा है। इस बीच चीन ने अपने को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है, इसमें संदेह नहीं। दूसरी ओर, भारत सरकार और उसका चापलूस बुद्धिजावी वर्ग भारत को भी महाशक्ति के रूप में पेंट करता रहता है, पर चीन और भारत के बीच अभी भी कोई तुलना नहीं है – न सामरिक शक्ति के स्तर पर और न आर्थिक शक्ति के स्तर पर। हाँ, व्यापक गरीबी के मामले में जरूर दोनों एक-दूसरे के आसपास ही हैं। आर्थिक मंदी के परिणामस्वरूप इस समय चीन की राजधानी तथा अन्य शहरों से गरीबों को कुत्तों की तरह खदेड़ा जा रहा है। इसे ‘बैक टू विलेज’ अभियान बताया जा रहा है। उसके बावजूद, भारत में दरिद्रता का प्रकोप कहीं ज्यादा है। हो सकता है, चीन अगले बीस-पचीस सालों में गरीबी की समस्या सुलझा ले, पर भारत की आर्थिक प्रगति की दिशा और तैयारी को देखते हुए यह अवधि पचास वर्ष से आगे भी जा सकती है।



इसलिए वास्तविकता यह है कि चीन के साथ हमारी असली समस्या सैनिक द्वंद्व की नहीं, आर्थिक प्रतिद्वंद्विता की है। आर्थिक विकास के तमाम दावों के बावजूद भारत चीन से बहुत पीछे है। विकसित देशों के तमाम औद्योगिक निर्माताओं के लिए चीन विनिर्माण और निर्यात का मक्का बना हुआ है। स्वयं चीन की सरकार अपने उद्योग-धंधों को अधिक से अधिक उत्पादन और निर्यात करने के लिए भारी मात्रा में प्रोत्साहन दे रही है। इस समय चीन में बने सामान से भारत के बाजार पटे हुए हैं। बिजली, इलेक्ट्रानिक्स, खिलौने, कपड़े, जूते, घडियाँ आदि कई क्षेत्र हैं जिनमें चीन का सस्ता सामान हमारे उपभोक्ताओं को लुभा रहा है। भारत में उत्पादन की स्थिति ऐसी है कि बहुत-से निर्माता अपने यहाँ माल तैयार करने के बदले चीन में कारखाना लगाने या वहाँ के उत्पादों का आयात करने में फायदा देखते हैं। राखी, होली और दीपावली जैसे त्योहारों पर तो हमारे बाजारों में चीन ही चीन नजर आता है।


सीमा पर जो भी होगा, हमारे सैनिक संभाल लेंगे, यह विश्वास अतार्किक नहीं है। आखिरकार मामला छोटी-मोटी झड़पों तक ही सीमित रहेगा। लेकिन आर्थिक क्षेत्र में जो परिघटना दिखाई पड़ रही है, वह गुरिल्ला कार्रवाइयों की नहीं, खुले युद्ध की है। इस युद्ध में हम लगातार पराजित हो रहे हैं और सरकारी स्तर पर, उद्योग-धंधों की दुनिया में या मीडिया के जंगल में इसकी कोई चर्चा तक नहीं है। क्या युद्ध हमेशा सीमाओं पर ही लड़ा जाता है?




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चित्र : अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर का भाग भारत से पूरी तरह गायब  है।
राजकिशोर 

व्यंग्य का समय

 
परत-दर-परत


व्यंग्य का समय

राजकिशोर
हमारे हाजी साहब बहुत काम के आदमी हैं। उनसे किसी भी विषय पर राय ली जा सकती है और वे किसी भी विषय पर टिप्पणी कर सकते हैं। सुबह-सुबह पढ़ा कि दिल्ली की हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष एक व्यंग्यकार को बनाया गया है, तो उनके पास दौड़ गया। हाजी साहब की एक खूबी और है। कई बार वे मन की बात भाँप लेते हैं। उन्होंने ठंडे पानी के गिलास से मेरा स्वागत किया और बोले, ‘बैठो, बैठो। मैं समझ गया कि कौन-सी बात तुम्हें बेचैन कर रही है।’ मैंने आपत्ति की, ‘हाजी साहब, मैं किसी राजनीतिक मामले पर चरचा करने नहीं आया हूँ।’ हाजी साहब – ‘हाँ, हाँ, मैं भी समझता हूँ कि तुम जी-5, जी-8 और जी-14 पर बात करने नहीं आए हो। ये पचड़े मेरी भी समझ में नहीं आते। इस तरह सब अलग-अलग बैठक करेंगे, तो संयुक्त राष्ट्र का क्या होगा? कुछ दिनों के बाद तो वहाँ कुत्ते भी नहीं भौंकेंगे। लेकिन तुम आए हो राजनीतिक चर्चा के लिए ही, यह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ।’ मुझे हक्का-बक्का देख कर उन्होंने अपनी बात साफ की, ‘तुम्हें यही बात परेशान कर रही है न कि हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष पहली बार एक व्यंग्यकार को बनाया गया है!’


मैं विस्फारित नेत्रों से उनकी ओर देखता रह गया। वे बोले जा रहे थे, ‘बेटे, यह मामला पूरी तरह से  राजनीतिक है। यह तो तुम्हें पता ही होगा कि दिल्ली की मुख्यमंत्री ही यहाँ की हिन्दी अकादमी की अध्यक्ष हैं। वे साहित्यकर्मी नहीं, राजनीतिकर्मी हैं। साहित्यकर्मी होतीं, तो इस प्रस्ताव पर ही उनकी हँसी छूट जाती। राजनीतिकर्मी हैं, सो आँख से नहीं, कान से देखती हैं। उनके साहित्यिक सलाहकारों ने कह दिया होगा कि इस समय एक व्यंग्यकार से ज्यादा उपयुक्त कोई अन्य व्यक्ति नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री जी ने बिना कुछ पता लगाए, बिना सोचे-समझे ऑर्डर पर हस्ताक्षर कर दिए होंगे। इसमें परेशान होने की बात क्या है? बेटे, दुनिया ऐसे ही चलती है। हमारा राष्ट्रीय मोटो भी तो यही कहता है - सत्यमेव जयते। आज का सत्य राजनीति है। सो राजनीति ही सभी अहम चीजों का फैसला करेगी। वाकई कुछ बदलाव लाना चाहते हो, तो तुम्हें राजनीति ज्वायन कर लेना चाहिए।’


मेरे मुँह का स्वाद खट्टा हो आया। मैंने यह तो सुना था कि साहित्य में राजनीति होती है, पर यह नहीं मालूम था कि राजनीति में भी साहित्य होता है। आजकल राजनीति की  मुख्य खूबी यह है कि मेसेज छोड़े जाते हैं और संकेत दिए जाते हैं।
    हाजी साहब से पूछा, ‘फिर तो आप कहेंगे कि एक शीर्ष व्यंग्यकार के हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनने में भी कुछ संकेत निहित हैं !’ हाजी साहब ने मुसकराते हुए कहा, ‘तुम मूर्ख हो और मूर्ख ही रहोगे। संकेत बहुत स्पष्ट है कि यह व्यंग्य का समय है। पहले दावा किया जाता था कि यह कहानी का समय है, कोई कहता था कि नहीं, कविता का समय अभी गया नहीं है, तो कोई दावा करता था कि उपन्यास का समय लौट आया है। हिन्दी अकादमी का नया चयन बताता है कि यह व्यंग्य का समय है। व्यंग्य से बढ़ कर इस समय कोई और विधा नहीं है।’


मैंने अपना साहित्य ज्ञान बघारने की कोशिश की, ‘हाजी साहब, आप ठीक कहते हैं। आज हर चीज व्यंग्य बन गई है। हिन्दी में तो व्यंग्य की बहार है। कविता में व्यंग्य, कहानी में व्यंग्य, उपन्यास में व्यंग्य, संपादकीय टिप्पणियों में व्यंग्य -- व्यंग्य कहां नहीं है? एक साहित्यिक पत्रिका ने तो अपने एक विशेषांक के लेखकों का परिचय भी व्यंग्यमय बना दिया था। क्या इसी आधार पर आप कहना चाहते हैं कि व्यंग्य इस समय हिन्दी साहित्य की टोपी है -- इसके बिना कोई भी सिर नंगा लगता है। शायद इसीलिए सभी लेखक एक-दूसरे पर व्यंग्य करते रहते हैं। कभी सार्वजनिक रूप से कभी निजी बातचीत में।’

हाजी साहब बोले, ‘तुम कहते हो तो होगा। पर मेरे दिमाग में कुछ और बात थी। हिन्दी में तो दिल्ली शुरू से ही व्यंग्य का विषय रही है। इस समय मुझे दिल्ली पर दिनकर जी की कविता याद आ रही है - वैभव की दीवानी दिल्ली ! /  कृषक-मेध की रानी दिल्ली ! / अनाचार, अपमान, व्यंग्य की / चुभती हुई कहानी दिल्ली ! डॉ. लोहिया ने लिखा है कि दिल्ली एक बेवफा शहर है। यह कभी किसी की नहीं हुई। पूरा देश दिल्ली की संवेदनहीनता पर व्यंग्य करता है। लेकिन दिल्ली पहले से ज्यादा पसरती जाती है। हड़पना उसके स्वभाव में है। इसी दिल्ली में कभी हड़पने को ले कर कौरव-पांडव युद्ध हुआ था। इसलिए अगर आज दिल्ली में व्यंग्य को इतना महत्व दिया जा रहा है, तो इसमें हैरत की बात क्या है? तुम भी मस्त रहो और जुगाड़ बैठाते रहो। यहाँजुगाड़ बैठाए बिना जीना मुश्किल है।’


मैंने कहा, ‘हाजी साहब, लगता है, आज आपका मूड ठीक नहीं है। मुझ पर ही व्यंग्य करने लगे ! मेरा जुगाड़ होता, तो मैं मुँह बनाए आपके पास क्यों आता?’ हाजी साहब – ‘नहीं, नहीं, मैं तुम्हें अलग से थोड़े ही कुछ कह रहा था। मैं तो तुम्हें युग सत्य की याद दिला रहा था। हर युग का सत्य यही है कि युग सत्य को सभी जानते हैं, पर उसे जबान पर कोई नहीं लाता। अपनी रुसवाई किसे अच्छी लगती है?’

मैंने हाजी साहब का आदाब किया और चलने की ख्वाहिश जाहिर की। हाजी साहब का   आखिरी कलाम था – ‘आदमी की  फितरत ही ऐसी है। फर्ज करो, तुमसे पूछा जाता कि जनाब, आप हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनेंगे, तो क्या तुम इनकार कर देते? क्या तुम यह कहने की हिम्मत दिखाते कि ‘मुआफ कीजिए, दिल्ली में बड़े बड़े काबिल लोग बैठे हैं। मैं तो उनके पाँवों की धूल हूँ। मुझसे पहले उनका हक है।’ आती हुई चीज को कोई नहीं छोड़ता। यहाँ तो लोग तो जाती हुई चीज को भी बाँहों में जकड़ कर बैठ जाते हैं। और जब आना-जाना किसी नियम से न होता हो, तो अक्लमंदी इसी में है कि हवा में तैरती हुई चीज को लपक कर पकड़ लिया जाए। सागर उसी का है जो उठा ले बढ़ाके हाथ।’  

देवी सरस्वती के चरणों में

परत-दर-परत


देवी सरस्वती के चरणों में
- राजकिशोर









बंगाल में सरस्वती पूजा के दिन जो खास बात देखने में आती है, उसका संबंध छात्राओं के उत्साह से है।
दिल्ली में रहते हुए वसंत का तो कभी-कभी पता चलता है, पर वसंत पंचमी का बिलकुल नहीं। इस दिन पश्चिम बंगाल में देवी सरस्वती की पूजा होती है। यह विद्यार्थियों के लिए खास दिन होता है। वे सरस्वती की मिट्टी की मूर्ति खरीद कर लाते हैं और पूजा करते हैं। पूजा के समय मूर्ति के समय अपनी किताबें -- ज्यादातर टेक्स्ट बुक्स -- रखते हैं। मैं भी बचपन में अपने घर की गली में सरस्वती पूजा का छोटा-सा निजी आयोजन किया करता था। मेरे बेटे ने भी कई वर्षों तक किया। लेकिन बेटी को इसकी कोई याद नहीं है, क्योंकि जब तक वह समझने-बूझने लायक हुई, हम दिल्ली आ चुके थे। यहाँ सरस्वती का वास है, पर सरस्वती की पूजा कोई नहीं करता।


बंगाल में सरस्वती पूजा के दिन जो खास बात देखने में आती है, उसका संबंध छात्राओं के उत्साह से है। सबेरे से ही पढ़नेवाली लड़कियाँ नहा-धो कर पीली साड़ी में और मुक्त केशराशि लहराते हुए सड़कों पर चलते हुए दिखाई पड़ने लगती हैं। उनका सौंदर्य अद्भुत होता है। इस कोमल और अवयस्क सुंदरता के आगे रमणियों का सौंदर्य साल भर पानी भरता रहता है। ये ही लड़कियाँ जब दुर्गा पूजा के अवसर पर सज-धज कर पूजा देखने निकलती हैं, तो उनका रूप बदल जाता है। तब वे सेक्सी दिखाई पड़ने की कोशिश करती हैं। पर सरस्वती पूजा के दिन उनके अस्तित्व के हर आयाम से पवित्रता छलकती रहती है। वे स्वयं छोटी-छोटी सरस्वतियाँ नजर आती हैं। मुझे लगता है, देवी सरस्वती का साहचर्य उन्हें कुछ पवित्र बना जाता है। इससे पता चलता है कि दुनिया में कोई भी चीज निरपेक्ष नहीं है -- हमारा आसंग तय करता है कि हम क्या होंगे और कैसा दिखेंगे। इस दृष्टि से सरस्वती पूजा की निर्मलता और पवित्रता अनोखी है। ऐसी ऊँचाई किसी और पर्व में दिखाई नहीं देती।


पर्व-त्यौहारों में अब मुझे कुछ खास आनंद नहीं आता। शायद यह उम्र का असर है। लेकिन पहले भी कुछ विशेष आनंद आता था, ऐसा याद नहीं पड़ता। इसका एक कारण शायद यह है कि पर्वों के साथ जो भावनाएँ जुड़ी हुई होनी चाहिए, वे नदारद हो चुकी हैं। सिर्फ होली अपने समस्त रंगों के साथ जारी है। हालाँकि उसे निरंतर अश्लील बनाने का सिलसिला जारी है। वसंतोत्सव या रंगोत्सव के रूप में उसकी जो मधुर सांस्कृतिक कल्पना की जा सकती है, उसके लिए समाज में कोई जगह नहीं देती। बहरहाल, अगर किसी एक हिन्दू त्यौहार को बचाए रखने के मामले में मेरी राय माँगी जाए, तो मैं सरस्वती पूजा के पक्ष में वोट दूँगा।


सरस्वती सिर्फ ज्ञान की देवी नहीं हैं। वे साहित्य और कला की भी देवी हैं। वे वाग्देवी भी हैं। इस तरह वे रचनात्मकता के सभी पहलुओं का प्रतिबिंबन करती हैं। हमें ज्ञान चाहिए, क्योंकि अज्ञानी रह कर न अपना भला कर सकते हैं न किसी और का। पर ज्ञान को शुष्क नहीं होना चाहिए -- उसके साथ भावना भी जुड़ी होनी चाहिए। इससे साहित्य तथा विभिन्न कलाओं की नदियाँ फूटती हैं। अंत में, सरस्वती का वाहन कहीं कमल का फूल और कहीं हंस दिखाई देता है। दोनों ही इस बात के प्रतीक हैं कि जो ज्ञान की आराधना करता है, वह धीरे-धीरे धवलबुद्धि, नीर-क्षीर विवेकी तथा नि:संग होता जाता है। इस प्रशांत अवस्था को हासिल किए बिना ज्ञान-कला-साहित्य की उपासना व्यर्थ है। इस लक्ष्य तक पहुंचने का एक रास्ता अध्यात्म से भी हो कर जाता है, पर जीवन के इस गुह्र आयाम तक सबकी गति नहीं हो सकती। इसलिए इसे आपवादिक मान कर चलना ही उचित और सुरक्षित है।


कहा जा सकता है कि यह ज्ञान का युग है। भक्ति मार्ग बहुत पीछे छूट चुका है। ज्ञान मार्ग प्रशस्त हो रहा है। हर आधुनिक व्यक्ति के पास जो न्यूनतम ज्ञान होता है, वह पहले बड़े-बड़े ज्ञानियों को नसीब नहीं होता था। यह आपत्ति आधारहीन नहीं है कि यह ज्ञान नहीं, सूचना है। इस युग को भी सूचना युग ही कहा जाना चाहिए। बात काफी हद तक सही है। लेकिन ज्ञान वह फूल है जो सूचनाओं के पेड़ पर ही खिलता है। वह जमाना चला गया जब लोग आँख बंद करके साधना करते थे और सहसा एक दिन ज्ञानी हो जाया करते थे। ऐसे ज्ञान से आज हमारा काम नहीं चल सकता। आज हमें वह ज्ञान चाहिए जो खुली आँखों से देखने पर हासिल होता है। बल्कि सिर्फ देखने से ही नहीं, बल्कि प्रयोगशाला में परीक्षण करके, क्योंकि आँखों को धोखा हो सकता है। सामाजिक विज्ञानों की अपनी प्रयोगशालाएँ हैं।


दुःख की बात यह है कि ज्ञान या सूचना जो कहिए, उसके विस्फोट ने हमारे जीवन बोध को किसी उल्लेखनीय पैमाने पर नहीं बदला है। हमारी जीवन शैली मोटे तौर पर वैसी ही है जैसी तब थी जब हम अपेक्षाकृत कम जानकार थे। शोषण, अन्याय, युद्ध, हिंसा आदि की समस्याएँ बनी हुई हैं। स्त्रियों और बच्चों का जीवन अभी भी असुरक्षित है। तरह-तरह के भेदभाव कायम हैं। पर्यावरण पर खतरा रोज बढ़ता जाता है। हम आज जिस पृथ्वी को जानते हैं, वह सौ साल बाद भी इसी रूप में मिलेगी? कोई नहीं जानता। नदियाँ, भूजल, वायु -- सब प्रदूषण का शिकार होते जा रहे हैं। इसी तरह हमारी भावनाएँ और व्यवस्थाएँ भी। समाजवाद अब फिर एक स्वप्न हो गया है। सुबह का अखबार पढ़ कर कहीं से क्या ऐसा लगता है कि यह ज्ञानी या जानकार लोगों की सभ्यता है?

इसका एक कारण शायद यह है कि पर्वों के साथ जो भावनाएँ जुड़ी हुई होनी चाहिए, वे नदारद हो चुकी हैं।



ऐसी सभ्यता में ही वह चीज फूल-फल सकती है जिसे ज्ञान का उद्योग (नॉलेज इंडस्ट्री) कहा जाता है। यह एक नया उद्योग है जिसका आधार सूचनाओं का आदान-प्रदान है। वैसे तो हर उद्योग का आधार ज्ञान ही है, पर इस उद्योग में ज्ञान स्वयं ही खरीद-बिक्री की चीज बन जाता है। ज्ञान का यह व्यापारीकरण हमारी सभ्यता के बुनियादी चरित्र की ओर संकेत करता है। यहाँ कोई भी चीज तुरंत व्यापार बना दी जाती है - कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे? यह ज्ञान की उपासना नहीं, ज्ञान का भक्षण है। ऐसे माहौल में ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा और ज्यादा उपयोगी तथा मूल्यवान हो जाती है। आराधक में विनम्रता होती है। ज्ञान की खोज में लगे लोगों में भी विनम्रता होनी चाहिए -- अहंकार नहीं। आराधक सभी के कल्याण की कामना करता है। ज्ञान के क्षेत्र में काम करनेवालों को भी नहीं भूलना चाहिए कि उनका लक्ष्य निजी या राष्ट्रीय लाभ नहीं, बल्कि मानव मात्र का कल्याण है। देवी सरस्वती निश्चय ही एक मिथक हैं -- पर एक ऐसा मिथक, जो हमारे समस्त यथार्थ बोध का मानदंड बन सकता है।

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गाँव आखिर किसके लिए हैं

परत-दर-परत
गाँव आखिर किसके लिए हैं


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दिल्ली में ऐसे लेखक और कवि बहुतायत में हैं जो शहर को मिथ्या और गाँव को सत्य मानते हैं। इन्होंने दर्जनों उपन्यास, सैकड़ों कहानियाँ और हजारों कविताएँ लिखी हैं जिनमें पीछे छूट गए गाँव की जबरदस्त कसक दिखाई देती है। इनमें से सभी कृतिकार ग्रामीण परिवेश से ही आए हैं और उसके प्रति ममता इनके हृदय से गई नहीं हैं। इनके लेखन के मर्म में देहात का रोमांस उसी तरह अंकित है जैसे हनुमान के हृदय में राम बसा करते थे। गाँव की बड़ाई या अपने खोए हुए गाँव की स्मृतियाँ ही वह पूँजी है जिसके बल पर बार-बार एक ऐसी रामांटिक कविता या कहानी लिखी जाती है जो उन्हें धिक्कारती-सी प्रतीत होती है जो शहर में रहते हैं और शहर के बारे में ही लिखते या पढ़ते हैं। इन रचनाओं को पढ़ कर ऐसा लगता है जैसे गाँव अपनी सादगी, ईमानदारी और भावमयता के साथ लौट आया, तो भारत फिर एक रहने लायक देश हो जाएगा।


बहुत पहले जब मैथिलीशरण गुप्त ने वह अमर कविता लिखी थी जिसकी यह पंक्ति मुहावरे में तब्दील हो चुकी है कि अहा, ग्राम्य जीवन भी क्या है, तो शुरू में तो वह बहुत पसंद की गई (यह कविता मैंने कक्षा सात या आठ के कोर्स में पढ़ी थी), लेकिन बाद में सादगी के महान कवि मैथिलीशरण गुप्त की काव्य प्रतिभा की हँसी उड़ाने या ग्रामीण जीवन की नई जटिलताओं की ओर ध्यान खींचने के लिए इसका व्यापक उपयोग होने लगा। गुप्त जी ने जब यह कविता लिखी थी, उस समय हमारे गाँव लगभग ऐसे ही थे -- गुप्त जी के शब्दों में 'यहाँ गँठकटे चोर नहीं हैं, तरह-तरह के शोर नहीं हैं'। इस कविता के दो और प्रयोजन थे। एक तो गाँधी जी की आस्थाओं का प्रचार करना। महात्मा आधुनिक युग में गाँवों के सबसे बड़े वकील थे। उनकी नजर में कोई भी सभ्य देश गाँवों का समूह ही हो सकता है। दूसरे, यह आडंबरयुक्त शहरी जीवन की आलोचना भी थी। गुप्त जी के आलोचकों को भूलना नहीं चाहिए कि मैथिलीशरण भी मूलत: एक ग्रामीण आत्मा थे - थोड़ा और बढ़ कर कहना चाहें, तो एक हिन्दू ग्रामीण आत्मा। वे एक ठेठ देहाती आदमी की तरह ही गाँव की तारीफ में सहजता से लिखे जा रहे थे । इसलिए उन पर हँसना गाँव मात्र पर हँसना है, जो सभ्यता के दायरे में नहीं आता।


परवर्ती कवियों और लेखकों ने गाँव की बड़ाई कुछ इसलिए की कि वहाँ बहुत कुछ बचा हुआ है और कुछ इसलिए कि वहाँ से बहुत कुछ विलुप्त हो चुका है। स्वर कुछ यों होता है -- वहाँ अभी भी टोपियाँ सिलते हैं कासिम चाचा, ईद की सेवइयाँ होड़ करती हैं दीवाली की मिठाइयों से, यहाँ एक नदी थी, कहाँ गए वे जंगल जहाँ हम पाँच दोस्त तितलियाँ पकड़ते थे आदि। ऐसी रचनाओं को पढ़ते हुए लगता है कि दिल्ली या मुंबई जैसे महानगर के प्रदूषित और छल-कपटमय वातावरण में रहते हुए कवि या कथाकार की साँस घुट रही है और वह अपने गाँव लौट जाना चाहता है। वे कविताएँ और कहानियाँ झूठी हैं, ऐसा कहने वाला मैं कौन होता हूँ? लेकिन मैं यह जरूर कहना चाहता हूँ कि ऐसे सभी लेखक नौकरी से रिटायर होने के बाद दिल्ली या मुंबई में ही बस गए हैं। यहाँ उन्होंने फ्लैट या घर बनवा लिए हैं । इनमें कई लेखक ऐसे भी हैं जिनका शेष परिवार गाँव में ही रहता है और ये स्वयं महानगर की प्रदूषित हवा से मुक्त होना नहीं चाहते। अनुमान किया जा सकता है कि उनकी अरथी यहीं से उठेगी।



स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गाँवों के बारे में दो तरह की धारणाएँ थीं। गाँधी मानते थे कि भारत की सभ्यता गाँव में ही बची हुई है -- जितनी बची हुई है। लेकिन देश के तत्कालीन गाँवों को वे आदर्श नहीं मानते थे। वे गाँवों को आत्मनिर्भर, सुंदर और सुविधा-संपन्न बनाना चाहते थे। इस तरह गाँव के यथार्थ और आदर्श, दोनों के प्रति वे संबोधित थे। लेकिन आंबेडकर और नेहरू गाँवों को बहुत ही नापसंद करते थे। उनके हिसाब से ये ऐसी जगहें नहीं थीं जहाँ सभ्य और शिक्षित आदमी रह सकते हैं। दलितों के लिए तो गाँव बूचड़खाना ही थे। पिछले साठ वर्षों में गाँवों का विकास करने के प्रयत्न किए गए हैं और देश के एक बहुत बड़े हिस्से में उनका कायाकल्प हो गया है। लेकिन आज भी एक शिक्षित रिटायर्ड आदमी के लिए वहाँ कुछ है नहीं। यहाँ तक कि वह सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन भी नहीं हैं जिसकी कामना एक पढ़ा-लिखा आदमी करता है। इस बीच शहरों की सुविधाएँ तथा वहाँ उपलब्ध अवसर तेजी से बढ़े हैं। कुछ मामलों में गाँव और शहर के बीच का अंतराल कम हुआ है, तो कुछ मामलों में बढ़ा भी है। लेकिन कुल मिला कर गाँवों की हालत बेहद नागवार है। बताते हैं कि वहाँ रहना जीवन को नष्ट करना है।


तो गाँव किसके लिए हैं? जवान वहाँ रहना नहीं चाहते। अवसर की तलाश में वे शहर भागते हैं। गाँव से आ कर जिन्होंने अपनी जवानी शहर में बिता दी, वे अंत समय में गाँव लौटना नहीं चाहते। ये लौटते, तो ग्रामीण समाज को एक नई दिशा दे सकते थे। किसान भी नहीं चाहते कि उनके बेटे-बेटियाँ गाँव में सड़ती रहें। इस तरह, आज गाँव में वही रहता है जो वहाँ रहने के लिए मजबूर है या कहिए अभिशप्त है। यह इतना बड़ा क्षेत्र नए भारत का कालापानी है। एक विशालकाय आजाद जेल है, जिसके दंडित बाशिंदे खुलेआम घूम-फिर सकते हैं। यह आजादी उन्हें इसलिए दी गई है कि भारत भाग्य विधाताओं को पता है कि ये जाएँगे भी तो कहाँ जाएँगे? ये गाँव न तो महात्मा के सपनों के गाँव बन पाए हैं न आधुनिक शहरों में बदल सके हैं जैसा कि नेहरू चाहते थे। ये एक ऐसी अंधी गली में फँसे हुए हैं जहाँ से कोई रास्ता खुलता दिखाई नहीं देता। अगर हमारे विरोधी राजनीतिक दलों का गाँव के लोगों से थोड़ा भी संबंध होता, तो वहाँ से कभी-कभी नहीं, रोज संघर्ष की लपटें निकलती होतीं। नक्सलवादी कई इलाकों में ये लपटें पैदा कर रहे हैं, लेकिन इन लपटों की रोशनी में इन गाँवों के भविष्य का कोई सुंदर चित्र दिखाई नहीं देता। इस गतिरोध के सामने उदीयमान भारत (जिसे पहले चमकता भारत कहते थे), जो हमारे शासकों को और अंधा कर रही है, क्या एक बहुत बड़ा फ्रॉड नहीं है?

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- राजकिशोर

आतंकवाद और गांधी का रास्ता

परत-दर-परत







आतंकवाद और गांधी का रास्ता
- राजकिशोर


बहुत-से लोग पूछते हैं कि आतंकवाद की समस्या का समाधान करने के लि क्या गांधीवाद के पास कोई कार्यक्रम है? काश, इस प्रश्न के पीछे किसी प्रकार की जिज्ञासा होती! समाधान वहीं निकलता है जहाँ जिज्ञासा होती है। जब मजाक उड़ाने के लिए कोई सवाल किया जाता है, तो समाधान होता भी है तो वह छिप जाता है। यह ट्रेजेडी गांधीवाद के साथ अकसर होती है। ज्ञात गांधीवादियों ने भी ऐसी कोशिश नहीं की है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि गांधीवाद की झोली में हर समस्या का कुछ न कुछ इलाज जरूर है। दरअसल, वही विचारधारा व्यापक तौर पर स्वीकार्य हो सकती है जिसमें जीवन के अधिकांश प्रश्नों का हल निकालने की संभावना हो। लेकिन किसी को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि जीवन कभी भी समस्यारहित हो सकता है। कोई भी विचारधारा यह जादू कर दिखाने का दावा नहीं कर सकती। इसलिए गांधीवादी भी अपने को सत्य का अन्वेषक ही मानता है -- सत्य का गोदाम नहीं।


जब सामना प्रत्यक्ष हिंसा -- चाहे व्यक्ति द्वारा चाहे हिंसक समूह द्वारा -- से हो, उस वक्त क्या करना चाहिए, इसका कोई तसल्लीबख्श जवाब किसी के भी पास नहीं है। तनी हुई बंदूक के सामने दिमाग फेल हो जाता है। उस वक्त मैदान संवेग के हाथ में आ जाता है। संवेगों को भी प्रशिक्षित करने की सख्त जरूरत है। अन्यथा वे अपने आदिम, अराजक रूप में प्रकट होते हैं और कई लाख वर्ष पुराना हुक्म दुहराते हैं कि ईंट का जवाब पत्थर है। क्या यह सुझाव सफलता का आश्वासन देता है? संवेग को इससे कोई मतलब नहीं। वह तो उबल रहे खून की आवाज होती है, जिसे भविष्य की कोई फिक्र नहीं होती। अगर हर मामले में र्इंट का जवाब पत्थर से देने की थोड़ी भी संभावना होती, तो र्इंट उठाने का चलन ही मिट जाता। गांधी का रास्ता अहिंसक प्रतिरोध का है, जिसमें आक्रमणकारी के प्रति भी प्रेम रहता है। अगर मानवता का अधिकांश हिस्सा इस जीवन प्रणाली को स्वीकार कर लें, तो हिंसा को मिलनेवाली सफलता का अनुपात बहुत कम हो जाएगा।


जब लोग आतंकवाद के गांधीवादी समाधान के बारे में पूछते हैं, तो उनका आशय यह होता है कि सारी वर्तमान व्यवस्था यूं ही चलती रहे और तब बताओ कि गांधीवाद आतंकवाद को खत्म करने का क्या तरीका सुझाता है। यह कुछ इसी तरह का पूछना है कि मैं यही सब खाता-पीता रहूं, मेरी जीवन चर्या में कोई परिवर्तन न आए और मेरी बीमारी ठीक हो जाए। यह कैसे हो सकता है? जिन परिस्थितियों के चलते आतंकवाद पनपा है, उन परिस्थितियों के बरकरार रहते आतंकवाद से संघर्ष कैसे किया जा सकता है? गांधीवाद तो क्या, किसी भी वाद के पास ऐसी गोली या कैप्सूल नहीं हो सकता जिसे खाते ही हिंसा के दानव को परास्त किया जा सके। जब ऐसी कोशिशें नाकाम हो जाती है, तो यह सलाह दी जाती है कि हमें आतंकवाद के साथ जीना सीखना होगा।


आतंकवाद के दो प्रमुख उत्स माने जा सकते हैं। एक, किसी समूह के साथ अन्याय और उसके जवाब में हिंसा की सफलता में विश्वास। दो, आबादी की सघनता, जिसका लाभ उठा कर विस्फोट के द्वारा जानमाल की क्षति की जा सके और लोगों में डर फैलाया जा सके कि उनका जीवन कहीं भी सुरक्षित नहीं है। गांधीवादी मॉडल में जीवन की व्यवस्था इस तरह की होगी कि भारी-भारी जमावड़ेवाली जगहें ही नहीं रह जाएंगी। महानगर तो खत्म ही हो जाएंगे, क्योंकि वे बसावट का उचित मॉडल नहीं हैं। लोग छोटे-छोटे आधुनिक गाँवों में रहेंगे जहां सब सभी को जानते होंगे। स्थानीय उत्पादन पर निर्भरता ज्यादा होगी। इसलिए बड़े-बड़े कारखाने, बाजार, व्यापार केंद्र वगैरह अप्रासंगिक हो जाएंगे। रेल, वायुयान आदि का चलन भी बहुत कम हो जाएगा, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में लोग हर समय परिवहन के तहत रहे, यह पागलपन के सिवाय और कुछ नहीं है। वर्ष में एक-दो बार लाखों लोग अगर एक जगह जमा होते भी हैं जैसे कुंभ के अवसर पर या कोई राष्ट्रीय उत्सव मनाने के लिए, तो ऐसी व्यवस्था करना संभव होगा कि निरंकुशता और अराजकता न पैदा हो। इस तरह भीड़भाड़ और आबादी के संकेंद्रण से निजात मिल जाएगी, तो आतंकवादियों को प्रहार करने के ठिकाने बड़ी मुश्किल से मिलेंगे।


लेकिन ऐसी व्यवस्था में आतंकवाद पैदा ही क्योंकर होगा? बेशक हिंसा पूरी तरह खत्म नहीं होगी, लेकिन संगठित हिंसा की जरूरत नहीं रह जाएगी, क्योंकि किसी भी समूह के साथ कोई अन्याय होने की गुंजाइश न्यूनतम हो जाएगी। राज्य न्यूनतम शासन करेगा। अधिकतर नीतियां स्थानीय स्तर पर बनाई जाएंगी, जिनका आधार सामाजिक हित या सर्वोदय होगा। मुनाफा, शोषण, दमन आदि क्रमश: इतिहास की वस्तुएं बनती जाएंगी। जाहिर है, सत्य और अहिंसा पर आधारित इस व्यवस्था में सांप्रदायिक, नस्ली या जातिगत विद्वेष या प्रतिद्वंद्विता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाएगा। हिंसा को घृणा की निगाह से देखा जाएगा। कोई किसी के साथ अन्याय करने के बारे में नहीं सोचेगा। अभी तक के अनुभवों को देखते हुए यह उम्मीद करना मुश्किल है कि इस तरह का समाज कभी बन सकेगा या नहीं। शायद नहीं ही बन सकेगा। लेकिन हमें इसकी आशा भी नहीं करनी चाहिए। पूर्णता की कामना ही मनुष्य की किस्मत में है, पूर्णता नहीं। लेकिन इतिहास की गति अगर हिंसा से अहिंसा की ओर, अन्याय से न्याय की ओर तथा एकतंत्र या बहुतंत्र से लोकतंत्र की ओर है, जो वह है, तो कोई कारण नहीं कि ऐसा समाज बनाने में बड़े पैमाने पर सफलता न मिले जो संगठित मुनाफे, संगठित अन्याय और संगठित दमन पर आधारित न हो। केंद्रीकरण -- सत्ता का, उत्पादन का और बसावट का -- अपने आपमें एक तरह का आतंकवाद है, जिसमें अन्य प्रकार के आतंकवाद पैदा होते हैं। आतंकवाद सिर्फ वह नहीं है जो आतंकवादी समूहों द्वारा फैलाया जाता है। आतंकवाद वह भी है जो सेना, पुलिस, कारपोरेट जगत तथा माफिया समूहों के द्वारा पैदा किया जाता है, जिसके कारण व्यक्ति अपने को अलग-थलग, असहाय और समुदायविहीन महसूस करता है।


ऐसा नहीं मानना चाहिए कि जिन समाजों में आतंकवाद की समस्या हमारे देश की तरह नहीं है, वे कोई सुखी समाज हैं। एक बड़े स्तर पर आतंकवाद उनके लिए भी एक भारी समस्या है, नहीं तो संयुक्त राज्य अमेरिका आतंकवाद के विरुद्ध विश्वयुद्ध नहीं चला रहा होता। लेकिन जिस जीवन व्यवस्था से आतंकवाद नाम की समस्या पैदा होती है, उससे और भी तरह-तरह की समस्याएं पैदा होती हैं, जिनमंे पारिवारिक तथा सामुदायिक जीवन का विघटन एवं प्रतिद्वंद्विता का निरंतर तनाव प्रमुख हैं। इसलिए हमें सिर्फ आतंकवाद का ही समाधान नहीं खोजना चाहिए, बल्कि उन समस्याओं का भी समाधान खोजना चाहिए जिनका एक रूप आतंकवादी हिंसा है। इस खोज में गांधीवाद सर्वाधिक सहायक सिद्ध होगा, ऐसा मेरा अटल विश्वास है।

भारत को छावनी बना दो

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परत-दर-परत


भारत को छावनी बना दो
राजकिशोर



मुंबई आतंक काण्ड के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जो राजनीतिक पहल की, उसके फेल हो जाने के बाद कहा जा सकता है कि भारत के राजनीतिक नेतृत्व में कोई बड़ा कदम उठाने की क्षमता नहीं है। अगर पाकिस्तानी आईएसआई के प्रमुख दिल्ली आ भी जाते, तो समझ में आना मुश्किल है कि इससे कौन-सा उद्देश्य सिद्ध होता। अगर मुंबई पर आतंकवादी हमला आईएसआई या पाकिस्तान सरकार की किसी एजेंसी द्वारा प्रायोजित था, तो इन एजेंसियों के प्रतिनिधियों से भारत सरकार क्या बातचीत कर सकती है! पाकिस्तान सरकार पर दबाव डालने के तरीके दूसरे हैं और भारत सरकार के सोचने के पैटर्न से ऐसा दिखाई नहीं देता कि वह इन तरीकों का इस्तेमाल करेगी। ऐसा लगता है कि भारत की राजनीति पूरी तरह से दिवालिया हो चुकी है। वह विदेशी आतंकवाद से भारत के लोगों की रक्षा करने में असमर्थ है। हम यह सुझाव नहीं दे रहे हैं कि 9/11 के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार जिस तरह वहशी हो गई थी और उसने पहले अफगानिस्तान पर और बाद में इराक पर हमला कर दिया था, हम भी वैसा ही करें। लेकिन और भी कई तरह की प्रभावशाली पहलें की जा सकती हैं, जिनके बारे में राजनीतिक स्तर पर सोचा तक नहीं जा रहा है। क्या इसलिए कि आतंकवाद का मुख्य संबंध मुस्लिम जमात से हैं? इस तरह का सेकुलरवाद भारत की जनता के लिए बहुत मँहगा पड़ेगा।


ऐसी स्थिति में जिस न्यूनतम कर्तव्य की अपेक्षा की जा सकती है, वह है देश के भीतर अपनी सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करना। मुंबई में हमारे सुरक्षा दस्तों ने जो काम किया, वह दमकल की कार्रवाई जैसा था। जब कहीं आग लगती है, तो दमकल कर्मचारी वहाँ पहुँच कर आग बुझा देते हैं और फिर अगले अग्निकांड की प्रतीक्षा करने लगते हैं। मुंबई में तो आग बुझाने का मौका मिल गया। लेकिन हर आतंकवादी घटना ऐसी नहीं होती। ज्यादातर मामलों में आतंकवादी कत्लेआम का अपना इरादा पूरा करने में सफल हो जाते हैं और पकड़े भी नहीं जाते। दिल्ली के सरोजिनी नगर और जयपुर की घटनाओं को याद कीजिए। यहाँ हम रोते-बिलखते और हाथ मलते रह जाते हैं। भविष्य में ऐसा न हो, इसका प्रबंध तो किया ही जा सकता है। आतंकवादी आक्रमण की पिछली घटनाओं की उपेक्षा कर दी गई, तभी मुंबई जैसी बड़ी घटना हो सकी। अब मुंबई से सबक लेना चाहिए और आंतरिक सुरक्षा प्रणाली को अभेद्य बनाने के लिए एक राष्ट्रीय सुरक्षा प्रणाली के गठन के बारे में सोचना चाहिए।


हमारी खुशकिस्मती है कि भारत अभी भी गाँवों में रहता है। गाँवों की जीवन प्रणाली ऐसी है कि वहाँ आतंकवादी हमला हो ही नहीं सकता। ये हमले वहाँ होते हैं जहाँ लोगों का केंद्रीकरण हो, जैसे रेलवे स्टेशन, सिनेमा हॉल, बाजार, मेले, बड़े होटल, बस अड्डे, कारखाने, मॉल आदि। भारत एक बड़ा देश है। ऐसे केंद्रों की संख्या बहुत अधिक है। लेकिन इतनी अधिक भी नहीं है कि उनमें से प्रत्येक को सुरक्षा घेरे में न लाया जा सके। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर योजना बनानी चाहिए और सुरक्षा प्रणाली में लाखों लोगों को नियुक्त करना चाहिए। भारत में इतने बड़े पैमाने पर शिक्षित और अशिक्षित बेरोजगारी है कि इस निष्क्रिय पड़ी मानव शक्ति को सुरक्षा के काम में लगाना एक रचनात्मक प्रयत्न भी हो सकता है।


जहाँ तक निजी संपत्तियों का सवाल है, जैसे सिनेमा हॉल, मॉल, होटल, उनके मालिकों के लिए यह कानूनन अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे उनकी सुरक्षा व्यवस्था को पर्याप्त मजबूत करें। रेलवे, बस अड्डों, हवाई अड्डों आदि की सुरक्षा की जिम्मेदारी इन संस्थाओं के संचालक मंडलों की होनी चाहिए। यही नियम स्कूलों, अस्पतालों आदि पर लागू होगा। अन्य सार्वजनिक स्थान, जैसे बाजार, चौक, मेला स्थल आदि राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र की जिम्मेदारी में होने चाहिए। नि:संदेह इस तंत्र का एक काम समन्वय और निगरानी का भी होगा। ताज और ओबेरॉय होटलों की सुरक्षा व्यवस्था में जिस तरह की गंभीर कमी पाई गई, जिसके कारण आतंकवादी वहाँ महीनों से कार्यरत रहे, उसे देखते हुए यह जरूरी है कि तटस्थ एजेंसियों द्वारा प्रत्येक निगरानी व्यवस्था की समय-समय पर जाँच की जाती रहे। हमारे सुरक्षा विशेषज्ञों का कर्तव्य है कि वे इस तरह के राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र का विस्तृत खाका बना कर सरकार को पेश करें। इसके बिना हम आतंकवादी हमलों की आशंका से मुक्त नहीं रह सकते। हो सकता है तब भी आतंकवादी कुछ स्थानों पर सफल हो जाएँ। पर ये छिटपुट और इक्का-दुक्का घटनाएँ ही होंगी। किसी बड़ी घटना के लिए गुंजाइश नहीं रह जाएगी।


यह कहने से काम नहीं चलेगा कि आतंकवाद एक ऐसी परिघटना है जिससे बचा नहीं जा सकता, उसके खिलाफ चाहे जितनी तैयारी कर लो। पहले तैयारी करके तो दिखाइए। इस बात की पूरी संभावना है कि प्रारंभिक सफलता के बाद यह सुरक्षा तंत्र धीरे-धीरे आलसी और निष्क्रिय हो जाए, जैसा इमरजेंसी के आखिरी दिनों में देखा गया था। अगर भारत को अपनी हिफाजत और इज्जत प्यारी है, तो कम से कम अगले दस वर्षों तक आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर एक जैसी चुस्ती दिखानी होगी। सतत निगरानी के बिना स्वाधीनता को बचाया नहीं जा सकता। मुंबई ने साबित कर दिया है कि छिटपुट आतंकवादी घटनाएँ अब खंड युद्ध का रूप ले चुकी हैं। यह एक तरह की गुरिल्ला लड़ाई थी। भविष्य में यह पैटर्न और बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकता है। इसलिए हमारे पास इंतजार करने के लिए थोड़ा भी वक्त नहीं है।


यह जरूर है कि सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था को चुस्त और व्यापक बनाना काफी नहीं है। मुस्लिम आतंकवाद के पीछे एक बड़ा कारण भारत के मुस्लिम मानस का आहत होना है। किसी भी वर्ग का तुष्टीकरण नहीं होना चाहिए, पर ऐसी नीतियाँ बनानी ही होंगी जिससे भारत के मुसलमानों को लगे कि उनके साथ न्याय हो रहा है। सुरक्षा के मोर्चे पर कोई रियायत नहीं, पर नीति के स्तर पर पूरी उदारता और लचीलापन, इस तरह का न्यायपूर्ण द्विपक्षीय रुख अपना कर ही हम देश और समाज में शांति लौटा सकते हैं। सबसे पहले तो हमें अर्जेंसी का भाव दिखाना होगा। अगर सरकार इस मामले में चेतने को तैयार नहीं है, तो यह देश के सभी जागरूक वर्गों का कर्तव्य है कि वे इतना तगड़ा जनमत बनाएँ कि सरकार को बाध्य हो कर जरूरी कदम उठाने पड़ें। इस दिशा में अखबार, रेडियो, टीवी जैसे जनसंचार माध्यमों की भूमिका निर्णायक होगी।

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चर्च : व्यवसाय और विदेशी धन

धर्म और पैसा
- राजकिशोर



मेरे एक लेख पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पुवर क्रिश्चियन लिबरेशन फ्रंट के अध्यक्ष एल आर फ्रांसिस ने ईसाई चर्चों की अनेक विसंगतियों की ओर संकेत किया है। जैसे चर्च के अंदर शोषण, अत्याचार और दमन। यहां मैं धर्म और पैसे से जुड़े हुए मामलों तक सीमित रहना चाहता हूं।


फ्रांसिस के अनुसार, इस वर्ग में तीन तरह के सवाल आते हैं -- विदेशी पैसा, चर्च की संपत्ति और चर्च अधिकारियों द्वारा अपने कर्मचारियों का आर्थिक शोषण। ये तीनों ही मामले गौरतलब हैं। इनके बीच आपसी रिश्ता भी है।


फ्रांसिस के अनुसार, 'हाल ही में रतलाम (मध्य प्रदेश) की एक रेलवे कॉलोनी में स्थित 85 वर्ष पुराने चर्च में आग लगा दी गई। इस घटना को सीधे हिन्दू संगठनों से जोड़ा गया। मामला तुरंत अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया गया। बाद में पता चला कि उक्त घटना की तह में था उसी चर्च का चौकीदार -- नोएल पारे। चर्च की 86वीं वर्षगांठ मनाई जानेवाली थी। बड़े समारोह की तैयारियां थीं। किन्तु उस चर्च के चौकीदार पर आठ हजार का कर्ज था। कर्ज था बनियों का, जिनसे वह पेट भरने के लिए जरूरी नून-तेल उधार लेता था।


'चर्च प्रशासन उसे मात्र 1,000 रुपए मासिक वेतन देता था। कितना बड़ा अंतर है सरकारी नियमों में न्यूनतम मजदूरी को ले कर और चर्च प्रशासन द्वारा दी जाने वाली मजदूरी के बीच। देश की राजधानी दिल्ली में ही चर्च द्वारा चलाए जाने वाले अधिकतर संगठनों में भी ऐसा ही हाल है। सरकारी आदेश पोप पोषित धर्मराज्य के प्रशासकों के ठेंगे पर होते हैं। चर्च का गुलाम कर्मचारी 24 घंटे काम करके एक हजार रुपए अर्थात 33 रुपए प्रतिरोज पाता है। ऐसी स्थिति में क्रिया की प्रतिक्रिया अर्थात शोषण का परिणाम आक्रोश होगा ही। आक्रोशवश ऐसा कर्मचारी कुछ भी कर सकता है -- हत्या या आत्महत्या या फिर तोड़फोड़, मारपीट, आगजनी कुछ भी।'


आंतरिक शोषण का यह मामला ईसाई धर्म की खूबी नहीं है। मेरा अनुमान है कि सभी धार्मिक संगठनों में इस तरह का आर्थिक शोषण होता है। असल में, यह समुचित नौकरी नहीं होती, जिसमें डीए, पीएफ, ग्रेट्युटी आदि का प्रावधान हो। यह चाकरी श्रद्धा की है। श्रद्धा ज्ञान और भक्ति देती है, तो गरीब को भौतिक स्तर पर गुलाम भी बनाती है। इस तरह की गुलामी राजनीतिक संगठनों के तंत्र में भी दिखाई देती है। शायद ही कोई राजनीतिक दल अपने कर्मचारियों को नियम-संगत और जायज पैसे देता हो। इससे यह भी पता चलता है कि जो धर्म या राजनीति ऐसा करते हैं, वे वास्तव में कितने नैतिक हैं। नैतिकता का मूल आधार छोड़ देने के बाद कैसा धर्म और कैसी राजनीति।


फ्रांसिस का दूसरा मुद्दा है चर्च की संपत्ति का। वे लिखते हैं, 'मलयाली मूल और मंगलूर-कर्नाटक-गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे हैं। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की ओर लौटे तो भारत की ईसाई चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों - बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रूप में ही चर्च के सदस्य हैं।' कहने की जरूरत नहीं कि संपत्ति अकसर विषमता पैदा करती है। इसीलिए सभी धर्मों में संपत्ति को हिकारत की निगाह से देखा गया है। जाहिर है, आप या तो कुबेर के दास बन सकते हैं या भगवान के भक्त। दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। लेकिन सभी धर्म संस्थान ऐश्वर्य की खोज में रहते हैं। वे अपने मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों को आलीशान से आलीशान रूप देना चाहते हैं। इससे इन संगठनों में चरित्र वालों को नहीं, पैसे वालों को महत्व मिलता जाता है। जैसे-जैसे पैसे की आपूर्ति बढ़ती है, धार्मिक संगठन के भीतर तानाशाही का तत्व मजबूत होता है और धर्म धुआं बन कर उड़ने लगता है। इसलिए इस पर विचार होना चाहिए कि धार्मिक संगठनों के पास संपत्ति होनी चाहिए या नहीं और होनी चाहिए तो कितनी तथा उसके प्रबंधन का तरीका क्या हो। इतिहास बताता है कि अकूत संपत्ति पर कब्जा करने के लिए धार्मिक संगठनों में हत्याएं तक हुई हैं। पैसा बारूद की तरह ही खतरनाक चीज है। जीविका के लिए जितना धन चाहिए, उससे अधिक धन-संपत्ति होने से धार्मिक संगठन पूरी तरह धार्मिक नहीं रह जाते। आज जब धर्म की भूमिका पर पुनर्विचार चल रहा है, यह प्रश्न उठाने लायक है कि धार्मिक संगठनों के लोग आर्थिक दृष्टि से परजीवी या उपजीवी क्यों हों। वे भी क्यों अपनी कमाई हुई रोटी ही खाएं और तब दूसरों को सीख दें कि धर्मपूर्वक जीने का मतलब क्या होता है।


विदेशी पैसे का सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं। फ्रांसिस के अनुसार, 'चर्च अधिकारी आज विभिन्न तरीकों से अथाह दौलत कमा रहे हैं। उनका पूरा व्यवसाय इस देश के करोड़ों वंचितों के नाम पर चल रहा है।' इस अथाह दौलत का एक बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय ईसाई संगठनों से आता है। भारत में या किसी भी लोकतांत्रिक देश में धर्म प्रचार करने का अधिकार सभी को है, लेकिन इस सिलसिले में विदेशी पैसे की खतरनाक भूमिका को नहीं भूलना चाहिए। आप इटली, अमेरिका या इंग्लैंड के पैसे से भारत के आदिवासियों के लिए स्कूल और अस्पताल बनाते हैं, तो उनका भला नहीं करते। पहली बात तो इसमें करुणा का तत्व कहीं नहीं है। यह निवेश की तरह दिखाई देता है। दूसरी और ज्यादा मारक बात यह है कि आप आदिवासियों को आत्मनिर्भर होने का पाठ नहीं पढ़ा रहे होते हैं। धार्मिक व्यक्ति अगर आत्मनिर्भर नहीं है, तो वह धर्म का पालन कर ही नहीं सकता। इसलिए सामाजिक कल्याण के कामों के पीछे भी राष्ट्रीय या सामुदायिक आत्मनिर्भरता होनी चाहिए। लोग अपने श्रम और योगदान से अपना जीवन संवारें। मुफ्त में मिलने वाला विदेशी पैसा कामचोर और लालची बनाता है तथा स्वाभिमान की जड़ खोद देता है। प्रदूषण उन तक भी फैलता है जिनके माध्यम से यह विदेशी पैसा आता है। दलाली की संस्कृति से कोई ऊंची धर्म भावना नहीं पनप सकती।


कुल मिला कर कहना यह है कि धर्म और पैसे के रिश्तों पर गहराई से विचार होना चाहिए। पैसे ने धर्म का बहुत अपकार किया है। पैसे की अधीनता स्वीकार कर लेने के बाद धर्म की मौलिकता नष्ट हो जाती है और वह संपन्न लोगों के निहित स्वार्थों का औजार बन जाता है। अगर भारत की ईसाई मिशनरियां अमीर नहीं होतीं, तो उनसे किसी समुदाय को ईर्ष्या भी नहीं होती। मैं नहीं जानता कि गरीब ईसाइयों के बीच एल आर फ्रांसिस की साख कैसी है, लेकिन उन्होंने जो प्रश्न उठाए हैं, वे महत्वपूर्ण हैं। अन्य धर्मों के लोगों के मन में भी इस तरह के प्रश्न उठने चाहिए।

प्रतिबन्ध के विरुद्ध


प्रतिबंध के विरुद्ध
- राजकिशोर



पिछले दिनों कई जिम्मेदार लोगों के मुंह से सुनने को मिला कि बजरंग दल जैसे संगठनों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। सिमी पर से प्रतिबंध हटाना उचित हुआ या नहीं अथवा उस पर फिर प्रतिबंध लगा दिया जाए या नहीं, यह बहस अभी भी ठंडी नहीं हुई है। वैसे भी समय-समय पर अनेक संगठनों के बारे में यह मांग उठाई जाती रहती है कि उन पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। मेरा खयाल है, यह प्रतिबंध-केंद्रित धारणाा कोई समाधान होने के बजाय स्वयं एक समस्या है। लोकतांत्रिक ढांचे में इस तरह की धारणाओं के लिए कोई जगह नहीं है। प्रतिबंध लगाते-लगाते एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब लोकतंत्र पर ही प्रतिबंध लगाने की मांग की जाने लगे। इस मांग का तर्क यह होगा कि भारत की जनता लोकतंत्र का उचित उपयोग करने में अक्षम साबित हुई है तथा लोकतांत्रिक स्वाधीनताओं के कारण अनेक अवांछित प्रवृत्तियों, गतिविधियों तथा संगठनों का उदय हुआ है, इसलिए राष्ट्र हित में उचित यह है कि कुछ समय के लिए लोकतंत्र पर ही प्रतिबंध लगा दिया जाए।

प्रतिबंधवादी सोचते हैं कि किसी अवांछनीय संगठन को प्रतिबंधित कर देने से उस संगठन का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और उसके सदस्य दूसरे कामों में लग जाएंगे। अब तक का अनुभव बताता है कि दुनिया भर में कहीं भी ऐसा नहीं हुआ है। कम्युनिस्ट पार्टियां एक समय में प्राय: सभी देशों में प्रबंधित रहीं। ब्रिटिश जमाने में भारत में भी कुछ समय तक उन पर प्रतिबंध लगा रहा। लेकिन इससे कम्युनिस्ट पार्टियों के विकास में कोई बड़ी बाधा नहीं आई। बल्कि प्रतिबंध की अवधि में वे तेजी से बढ़ीं। स्वंत्रतता प्राप्ति के बाद महात्मा गांधी की हत्या हुई, तब भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। यह प्रतिबंध कई वर्षों तक चला। लेकिन इससे संघ की गतिविधियां बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं हुईं। आज भी अनेक नक्सलवादी समूह प्रतिबंधित हैं, पर उनके सदस्य पूरी आजादी से अपना राजनीतिक काम कर रहे हैं।


किताबों पर, फिल्मों पर और नाटकों पर प्रतिबंध लगाने का तो कुछ नतीजा सामने आता है। जब वे सुलभ नहीं रह जाते, तो उन तक कम लोगों की ही पहुंच बन पाती है। इसलिए अगर उनमें कुछ खतरनाक तत्व हैं, तो उनका प्रसार नहीं हो पाता। लेकिन हकीकत में यह भी एक खामखयाली भर है। असल में होता यह है कि अगर प्रतिबंधित किताबें या फिल्में या नाटक जनता के लिए प्रासंगिक हैं या उनकी किसी महत्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति करती हैं, तो उनका प्रसार रुकता नहीं है, बल्कि और बढ़ जाता है। डी।एच. लारेंस का प्रसिद्ध उपन्यास 'लेडी चैटर्ली'ज लवर' यूरोप और अमेरिका में लगभग पचास साल तक प्रतिबंधित रहा, लेकिन इससे उसकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। वह छिप-छिपा कर छापी जाती रही और हाथ बदल-बदल कर पढ़ी जाती रही। हां, उसे पढ़ने की आर्थिक लागत जरूर बढ़ गई। आज वह सर्वत्र सुलभ है, पर आम पाठक उसे छूते तक नहीं।



यही नियम संगठनों पर लागू होता है। संगठन व्यक्तियों से बनते हैं और व्यक्ति अपने विचारों से संचालित होते हैं। इस तरह, जब आप किसी संगठन को प्रतिबंधित करते हैं, तो वास्तव में उन व्यक्तियों की संगठित कार्यशीलता को प्रतिबंधित करते हैं। यह एक असंभव कामना है। प्रतिबंधित हो जाने के बाद कोई संगठन खुले रूप से काम नहीं कर पाएगा। पर गोपनीय रूप से काम करने से उसे कौन रोक सकता है? सच पूछिए तो अवांछनीय या अवांछित किस्म के सभी संगठन पहले से ही गोपनीय रूप से काम कर रहे होते हैं। भले ही उनके सम्मेलन वगैरह सार्वजनिक रूप से होते हों जिनमें कोई भी जा सकता है या जो जनसंचार माध्यमों के लिए खुले होते हैं, पर इन संगठनों के वास्तविक फैसले सार्वजनिक रूप से नहीं लिए जाते। आप क्या सोचते हैं, बजरंग दल या उसकी तरह की विचारधारा वाले अन्य संगठनों या गुटों ने सार्वजनिक सभा या बैठक कर यह प्रस्ताव पास किया होगा कि चूंकि ईसाई मिशनरियां धर्म परिवर्तन की मुहिम में लगी हुई हैं, इसलिए उन पर हमला बोल देना चाहिए? क्या भारतीय जनता पार्टी या विश्व हिन्दू परिषद ने अपने किसी सम्मेलन में यह प्रस्ताव पास किया था कि बाबरी मस्जिद की टूटी-फूटी इमारत को ढाह कर उस जमीन पर राम मंदिर बनाया जाना चाहिए? ऐसा कहीं नहीं होता। सभी संगठन कागज पर अच्छा और कानून-सम्मत ही दिखने की कोशिश करते हैं, पर असल बात यह होती है कि व्यवहार में वे कैसे हैं। उदाहरण के लिए, लालकृष्ण आडवाणी ने ईसाइयों पर हो रहे आक्रमणों का विरोध किया और धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर राष्ट्रीय बहस की मांग की। लेकिन अगर वे ईसाइयों पर हिंसा के सचमुच विरोधी थे या हैं, तो उनके एक इशारे पर वह सब रुक सकता था जो कंधमाल तथा अन्य स्थानों पर हुआ।


मुद्दा यह नहीं है कि कौन-सा संगठन अच्छा है या बुरा है। या, किसे काम करने देना चाहिए, किसे नहीं। मुद्दा यह है कि वे गतिविधियां कानून द्वारा पहले से ही प्रतिबंधित होती हैं जो उन संगठनों द्वारे संचालित की जाती हैं जिन पर प्रतिबंध लगाने की मांग की जाती हैं, तो वे होने क्यों दी जाती हैं? अगर बजरंग दल या विश्व हिन्दू परिषद न होते, तब भी ईसाइयों और चर्चों पर हमला करना कानून की दृष्टि से प्रतिबंधित था और है। यह राज्य और समाज का दायित्व है कि वह किसी भी तरह की हिंसा को रोके। उड़ीसा सरकार वास्तव में चाहती, तो वह कंधमाल में होनेवाली घटनाओं को तत्काल रोक सकती थी। जैसे जिला प्रशासन चाहे तो कोई भी सांप्रदायिक दंगा कुछ घंटों से ज्यादा जारी नहीं रह सकता। इसलिए मांग यह की जानी चाहिए कि राज्य और प्रशासन को कुशल, चुस्त और सक्षम बनाया जाए, ताकि वह कानून द्वारा प्रतिबंधित गतिविधियों को होने न दे, शुरू हो गई हैं तो उनका प्रसार होने से रोके और जिन्होंने भी कानून तोड़ा है या तोड़ने की कोशिश की है, उन्हें उचित सजा दिलाए। बढ़ती हुई अराजकता को इसी तरह रोका जा सकता है। इसके बजाय संगठनों पर प्रतिबंध लगाने की कामना स्वयं में ही इस अराजकता की एक अभिव्यक्ति है।


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अब मुस्लिम समाज के कर्तव्य (२) - राजकिशोर

संदर्भ : बढ़ता हुआ आतंकवाद


गतांक से आगे
अब मुस्लिम समाज के कर्तव्य
- राजकिशोर




आज देश जिस आतंकवाद से पीड़ित और चिंतित है, वह स्थानीय नहीं है। बहुत दिनों तक हमें यह समझाया जाता रहा कि यह समस्त हिंसा पड़ोसी देश द्वारा प्रायोजित है। अब भी यह बात कही जाती रहती है। लेकिन इस पर विश्वास करना रोज-ब-रोज कठिन होता जा रहा है। यह सर्वमान्य हो चला है कि यह आतंकवाद मुख्यत: हमारा अपना है, हमारी अपनी मिट्टी से पैदा हुआ है और हमारे अंतर्विरोधों का ही फल है, भले ही इसे पाकिस्तान या दूसरे देशों से आर्थिक, तकनीकी तथा अन्य प्रकार की मदद मिल रही हो। अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद भारतीय आतंकवाद की मदद कर रहा है और भारतीय आतंकवाद अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के नेटवर्क का अंग बन गया है। ऐसी स्थिति में अब तक जो गुस्सा पाकिस्तान के प्रति पुंजीभूत होता था, उसका मुंह देश के मुस्लिम समाज की ओर घूम सकता है। सांप्रदायिक ताकतें चाहेंगी कि इसकी परिणति एक बार फिर गृह युद्ध में हो। इस बार अगर वे सफल हो गईं, तो भारत का भविष्य अंधेरे में है।


इस स्थिति में बहुसंख्यक जमात का होने के कारण हिन्दू समाज का दायित्व सबसे ज्यादा है, लेकिन वह चाहे कुछ करे या न करे, मुसलमानों के लिए अनिवार्य हो गया है कि वे कुछ जरूरी सावधानियां बरतें। यह खुशी की बात है कि कुछ महीनों से मुसलमानों ने संगठित रूप से आतंकवादी घटनाओं का विरोध करना शुरू कर दिया है। विरोध प्रगट करने के लिए उपवास तक हुआ है। लेकिन अभी भी यह पर्याप्त नहीं है। मुस्लिम समाज को और खुल कर आतंकवाद का विरोध करना चाहिए तथा संभव हो तो अपने बीच मौजूद उपद्रवकारी तत्वों की पहचान कर उन्हें कानून के हवाले करना चाहिए। यह मांग बनाए रखनी चाहिए कि सरकार सभी प्रकार के आतंकवाद के साथ एक जैसा सलूक करे और इंडियन मुजाहिदीन तथा बजरंग दल के बीच फर्क न करे। लेकिन भारत सरकार का इतिहास हम सभी जानते हैं। सांप्रदायिक विवादों में वह कभी भी स्पष्ट और दृढ़ रुख नहीं अपनाती। सांप्रदायिक अपराधों में लिप्त लोगों को न पकड़ा जाता है न उन्हें सजा दी जाती है। इस रुख के कारण हो सकता है जल्द ही मुसलमानों के लिए जीवन-मरण के सवाल खड़े हो जाएं। इसलिए मुसलमानों को अपनी पहल पर सिर्फ प्रतीकात्मक स्तर पर नहीं, बल्कि पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ ऐसे सभी काम करने होंगे जिससे यह जन मत में यह बिलकुल साफ हो सके कि भारत के मुसलमानों का एक प्रतिशत हिस्सा भी आतंकवाद के साथ नहीं है। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि मुसलमानों के साथ इतना भेदभाव और अन्याय किया गया है और किया जा रहा है कि उनके बीच से आतंकवादी प्रवृत्तियों के उभरने पर हैरत नहीं होनी चाहिए। यह बहुत ही खतरनाक और आत्मघाती तर्क है । इस तर्क में यह मान लिया गया है कि अन्याय का प्रतिकार हिंसात्मक तरीकों के बगैर हो ही नहीं सकता। इस तरह का तर्क अल्पसंख्यकों के लिए तो जानलेवा भी बन सकता है। बात अच्छी लगे या बुरी, हमें यह मान कर चलना चाहिए कि किसी भी देश में अल्पसंख्यक समुदाय तभी तक सुरक्षित रहते हैं जब तक समाज में आम सद्भाव रहता है। यह सद्भाव खत्म हो जाने के बाद कोई भी सेना, पुलिस या आत्मरक्षा संगठन अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सकते। इसलिए उचित है कि इस सद्भाव को बिगड़ने ही न दिया जाए। या, यों कहिए कि जो सांप्रदायिक संगठन इस सद्भाव को बिगाड़ने पर आमादा हैं, उन्हें सफल न होने दिया जाए।


अभी भी भारत की जनता सभी मुसलमानों को सांप्रदायिक या आतंकवादी या आतंकवादी हिंसा में सहयोग करने वाली नहीं मानती। यह बहुत बड़ी गनीमत है। इसे बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि मुसलमान भी आतंकवादी घटनाओं का पुरजोर विरोध करें। बाबरी मस्जिद ढाहे जाने के बाद मुस्लिम बुद्धिजीवियों में कुछ सचेतनता आई थी और मुस्लिम समाज में मंथन और पुनर्विचार की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। मुंबई में होनेवाले सांप्रदायिक हमलों के बाद सम्मेलन, सेमिनार आदि का सिलसिला काफी बढ़ गया था। लेकिन जैसे ही वातावरण थोड़ा सामान्य हुआ, मुस्लिम समाज का यह क्रीमी लेयर शांत और निष्क्रिय हो कर बैठ गया। यह बहुत ही दुख की बात है। दुर्भाग्य से आज उससे भी ज्यादा भयानक वातावरण बन रहा है। इस वातावरण में मुस्लिम समाज को और ज्यादा सचेतन तथा संगठित होना पड़ेगा। यह बहुत ही दुखद सवाल है कि हर बार मुसलमानों को ही देशभक्त होने का प्रमाण क्यों देना पड़ता है। लेकिन प्रत्येक आतंकवादी हिंसा के बाद जब टीवी चैनलों पर मस्लिम नामों की झड़ी लग जाती है, तब सोचिए कि टीवी देख-सुन रहे गैर-मुसलमानों के मन में किस तरह के सिद्धांत बन रहे होंगे। हिन्दू घरों, दफ्तरों और आम वातावरण में इस समय मुसलमानों के बारे में क्या सोच चल रहा है, इसका पूरा उद्घाटन भारत के मौजूदा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के माहौल में विस्फोटक साबित हो सकता है। इसे तुरंत रोकने की जरूरत है, अन्यथा हम बहुत बड़ी बरबादी के रास्ते पर होंगे। हमें सोचना होगा कि धर्मनिरपेक्ष लोग और संगठन तथा मुस्लिम समुदाय क्या-क्या करें कि देश का बच्चा-बच्चा यह जानने और सोचने को बाध्य हो कि आतंकवादी हिंसा के पीछे सिर्फ मुट्ठी भर मुसलमान हैं और शेष मुसलमान न केवल उनका साथ नहीं दे रहे हैं, बल्कि उनके खिलाफ हैं। हिन्दू भी कम कट्टरपंथी नहीं हैं। लेकिन मुस्लिम समाज का कट्टरपंथ एक खास तरह के सांप्रदायिक विचार को ईंधन दे रहा है, इसलिए उसकी रोकथाम करना और मुस्लिम समाज में आधुनिक विचार को प्रोत्साहन देना सबसे ज्यादा अल्पसंख्यकों के ही हित में है। हो सकता है, इससे बहुसंख्यक समाज के संप्रदायीकरण को रोकने में मदद भी मिले।


इसके लिए यह भी जरूरी होगा कि देश भर में विभिन्न स्तरों पर ऐसे संयुक्त संगठन बनें जिनमें सभी समुदायों के प्रतिनिधि शामिल हों। जब भी आतंकवादी हिंसा की कोई घटना हो, इन संगठनों के प्रतिनिधियों को सामने आना चाहिए तथा न केवल आतंकवाद की निंदा करनी चाहिए, बल्कि आतंकवादी हिंसा से प्रभावित परिवारों के लिए जो भी संभव है, वह करना चाहिए। मुस्लिम संगठनों को तो अपरिहार्य रूप से ऐसा करना चाहिए। अल्पसंख्यक होने के नाते यह उनका विशेष ऐसिहासिक दायित्व है कि वे बहुसंख्यक वर्ग के शुभचिंतक नजर आएं, जैसे यह बहुसंख्यक वर्ग के सदस्यों का कर्तव्य है कि वे जान पर खेल कर भी अल्पसंख्यक वर्ग के सदस्यों की रक्षा करें। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्र सिर्फ संविधान, कानून, मानवाधिकार आयोग आदि नहीं होता, यह प्रेम, सद्भाव, कर्तव्य और आत्मोत्सर्ग भी होता है। सभी को राष्ट्र से मांगने का अधिकार है, लेकिन यह भी सभी का दायित्व है कि राष्ट्र को देने में कृपणता न दिखाई जाए।

अब मुस्लिम समाज के कर्तव्य ( भाग -१) - राजकिशोर


संदर्भ : बढ़ता हुआ आतंकवाद


भाग -1
अब मुस्लिम समाज के कर्तव्य
- राजकिशोर




जब भी कोई आतंकवादी घटना होती है, टीवी पर, रेडियो पर, अखबारों में कुछ मुस्लिम नाम आना शुरू हो जाते हैं। पहले पत्रकारिता का एक नियम होता था कि दो समुदायों के बीच हिंसा होने से किसी भी समुदाय का नाम नहीं छापा जाता था। इसके पीछे उद्देश्य यह होता था कि सामप्रदायिक हिंसा की आग अन्य क्षेत्रों में न फैले। अब भी इस नियम का पालन होता है। कभी-कभी नहीं भी होता। लेकिन जब बम विस्फोट जैसी घटना हो, जिसमें पंद्रह-बीस या इससे ज्यादा लोग मारे जाएं, और कुछ धरपकड़ भी हो, तो आज की सनसनी-प्रिय पत्रकारिता सारी मर्यादाओं को भूल जाती है और घटना के लिए जिम्मेदार संगठनों या व्यक्तियों के सिलसिले में जिनका भी नाम लिया जा सकता है, लेने लगती है। इसका कुछ श्रेय पुलिस विभाग को भी है। ये नाम अदबदा कर मुस्लिम नाम होते हैं और इन नामों को सुनते हुए गैर-मुस्लिम, खासकर हिन्दू चित्त में किस तरह की प्रतिक्रिया होती होगी, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। आतंकवाद के सिलसिले में मुस्लिम नाम लगातार सुनते-सुनते हिन्दू चित्त में मुस्लिम समुदाय के बारे में एक खास तसवीर बनने लगती है या बन चुकी है तो वह गाढ़ी होने लगती है। इसी प्रक्रिया में यह भयानक कहावत पैदा हुई है कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते, लेकिन सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं। इस कहावत में यह अंतर्निहित है कि अगर कोई व्यक्ति मुसलमान है, तो उसके आतंकवादी होने की संभावना सिद्धांत रूप से मौजूद है।

जाहिर है, यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है। भारत विभाजन के बाद से ही भारत में रह गए मुसलमानों को शक की निगाह से देखा जाता रहा है। लेकिन तब शक का स्तर बहुत साधारण हुआ करता था। आतंकवाद के आविर्भाव के बाद से मामला बहुत गंभीर हो चुका है। यह गंभीरता इसलिए और बढ़ जाती है कि कुछ हिन्दूवादी सांप्रदायिक संगठन आतंकवादी हिंसा का फायदा उठा कर पूरे मुस्लिम समाज को राष्ट्र-विरोधी साबित करने पर तुले हुए हैं। ये संगठन शुरू से ही चाहते रहे हैं कि भारत में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच गृह युद्ध हो। विभाजन के समय का वातावरण भी एक तरह से गृह युद्ध ही था। लेकिन उससे हमारे उपमहादेश की सांप्रदायिक समस्या हल नहीं हुई। हल होनी भी नहीं थी, क्योंकि भारत विभाजन का कोई तार्किक आधार नहीं था। वह तत्काल सत्ता पाने के लिए किया गया एक राजनीतिक समझौता था और समझौते का कोई भी पक्ष भारत की सामुदायिक एकता को बनाए रखने के प्रति प्रतिबद्ध नहीं था। आज भी स्थिति लगभग वैसी ही है। देश भर में राष्ट्रीयता की ताकत कमजोर होती जा रही है तथा तरह-तरह के अलगाववादी स्वर सुनाई पड़ रहे हैं।

बाबरी मस्जिद की घटना के बाद सांप्रदायिक अलगाव की भावना और मजबूत हुई है तथा देश के शासक वर्ग ने निश्चय किया है कि सामप्रदायिकता पर प्रहार नहीं करना है। इस तरह कांग्रेस भाजपा के बने रहने की और भाजपा कांग्रेस के बने रहने की अनिवार्य शर्त बन चुकी है। अन्यथा 6 दिसंबर 1992 के बाद हिन्दू संप्रदायवादियों का राष्ट्रीय बहिष्कार होना चाहिए था और बाबरी मस्जिद की घटना के लिए जिम्मेदार लोगों को जेल में होना चाहिए था। इसके विपरीत हुआ कि उनके नेतृत्व में केंद्र में तथा कई राज्यों में सरकार बनी। आतंकवाद, भारत-अमेरिका परमाणु करार, किसानों की आत्महत्या, मंहगाई, सेज, बेरोजगारी आदि विभिन्न मुद्दे जिस तरह घने होते जा रहे हैं, उसे देखते हुए उम्मीद बहुत कम है कि केंद्र में सत्तारूढ़ वर्तमान गठबंधन अगले आम चुनाव के बाद सत्ता में वापस आ सकेगा। असुरक्षा के घने होते हुए वातावरण का लाभ हिन्दूवादी सांप्रदायिक शक्तियों को मिल सकता है। यह एक बहुत बड़ी विडंबना होगी क्योंकि आतंकवाद की जो खूनी फसल आज लहलहा रही है, उसका बीज वपन बाबरी मस्जिद की घटना से ही हुआ था। 6 दिसंबर 1992 के पहले मुस्लिम आतंकवाद नाम की कोई चीज नहीं थी। पंजाब में आतंकवाद की आग शांत होने लगी थी, हालांकि उत्तर-पूर्व और जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी हिंसा बदस्तूर जारी थी। पर इस हिंसा का कोई अखिल भारतीय स्वरूप नहीं था। यह एक स्थानीय किस्म की हिंसा थी और है।

क्रमश: >>>>
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काश, कोई लुगो यहाँ भी होता - राजकिशोर

परत-दर-परत

काश, कोई लुगो यहाँ भी होता
- राजकिशोर


भारत का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, इस बारे में अनुमान लगाने की मशीन कभी खाली नहीं बैठती। इस पर विचार-विमर्श नहीं होता कि भारत का अगला प्रधानमंत्री कैसा होना चाहिए? यह बहुत लोगों को मालूम है कि देश के पहले राष्ट्रपति के रूप में महात्मा गांधी किसी दलित महिला को देखना चाहते थे। उनके अन्य सभी सपनों की तरह यह सपना भी उन्हीं के साथ राख में मिल गया। देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में गांधी जी ने जवाहरलाल नेहरू का चयन किया था -- इस आधार पर कि 'जब मैं नहीं रहूँगा, वह मेरी भाषा बोलेगा।' नेहरू की भाषा में ज्यादा फर्क तो नहीं आया, पर उन्होंने जिस भारत की नींव रखी, उसमें गरीबों के लिए जगह सबसे आखिर में थी। यह जगह अभी तक नहीं बदली है।



इतिहास की खूबी यह है कि वह बराबर हमारे सामने कुछ बेहतरीन उदाहरण रखता जाता है। यह हमारा अंधापन है कि हम इन उदाहरणों को देखना नहीं चाहते। इसका कारण यह है कि हमारी नजर में बहुत धूल जमी होती है। यह धूल यथास्थितिवाद (जैसा चल रहा है, चलने दो) की है। कुछ भी नया करने के लिए अपने को पूर्वाग्रहों से मुक्त करना होता है, नई दिशाओं में सोचना और करना होता है तथा प्रयोग करने का जोखिम लेना पड़ता है। सभी समयों में वही समाज आगे बढ़े हैं, जिन्होंने लीक से हट कर चलना सीखा। लैटिन अमेरिका के एक छोटे-से देश पराग्वे ने पूर्व-बिशप फरनांडो लुगो को अपना नया राष्ट्रपति चुन कर लीक से हट कर एक ऐसा ही काम किया है। सुखद संयोग यह है कि लुगो ने ठीक 15 अगस्त 2008 को राष्ट्रपति पद की शपथ ली। क्या हमारा भी कोई 15 अगस्त इतना सुहावना हो सकता है? हम भारतीय चाहें तो इस असाधारण घटना से बहुत कुछ सीख सकते हैं।



फरनांडो लुगो का बचपन बहुत गरीबी में बीता। जीविका के लिए उन्हें अनेक छोटे-मोटे काम करने पड़े, जैसा कि हमारे गरीब घरों के लड़कों को करना पड़ता है। फिर लुगो ने शिक्षक होने का प्रशिक्षण लिया। लेकिन उन्हें एक दूसरी तरह का शिक्षक बनना था -- उस ईश्वर का दूत, जिसे अमीरों के पुष्पगुच्छों की तुलना में गरीबों के आँसू प्रिय हैं। लैटिन अमेरिका के धार्मिक संगठनों में अरसे से यह बहस चल रही है कि जब चारों ओर भुखमरी हो, जुल्म और अन्याय हो, उस समय सच्चे ईसाई का कर्तव्य क्या है? क्या वह चर्च और बाइबल में खोया रहे या चर्च की दीवारों से बाहर निकल कर सड़क पर आए और अभावग्रस्त लोगों को मनुष्य की गरिमा लौटाने के लिए संघर्ष करे? इस द्वंद्व ने लुगो के संवेदनशील हृदय में खलबली मचा दी।



डिवाइन वर्ड मिशनरीज में शामिल होने के कुछ समय बाद लुगो का इक्वाडोर जाना हुआ, जहाँ उनकी मुलाकात रियोबांबा के बिशप प्रोआना से हुई। प्रोआना उन ईसाई पादरियों में हैं जिन्हें गरीब की झोपड़ी में ईश्वर ज्यादा नजदीक दिखाई देता है। लुगो को दिशा मिल गई। उन्होंने निर्धन और देशज लोगों के लिए काम करना शुरू कर दिया। लैटिन अमेरिका के अधिकांश देशों में देशज आबादी की हालत लगभग वैसी ही है जैसी हमारे यहाँ भूमिहीन मजदूरों, दलितों और जनजातियों की। 1994 में लुगो को सैन पेड्रो का बिशप बनाया गया। इसके साथ-साथ उनके जनवादी संघर्ष जारी रहे। लोग उन्हें प्यार से 'गरीबों का बिशप' कहने लगे। जल्द ही लुगो की समझ में आ गया कि अभावग्रस्त लोगों की जिंदगी बदलने के लिए उनकी छिटपुट सहायता और उनके हकों के लिए छिटपुट संघर्ष, जैसा कि सभी एनजीओ करते हैं, काफी नहीं हैं। इसके लिए राजनीतिक सत्ता का चरित्र बदलना जरूरी है। आज राजनीति ही हमारी नियति की सबसे बड़ी निर्धारक शक्ति है। इस शक्ति को ऐयाशों, (प्रगट या छद्म) तानाशाहों और गुंडों के हाथ में क्यों छोड़ दिया जाए?



दिसंबर 2006 में फरनांडो लुगो ने पराग्वे के राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने का अहम फैसला किया। इसके लिए बिशप के पद से मुक्त होना जरूरी था। चर्च से अपना इस्तीफा लिखते हुए लुडो ने कैथलिक ईसाइयों के मुख्यालय वेटिकन को लिखा कि आज से पूरा देश ही मेरा कैथेड्रल है। वेटिकन से रूढ़िग्रस्त जवाब आया कि आप इस्तीफा नहीं दे सकते, क्योंकि जो एक बार पादरी हो गया, उसे जीवन भर पादरी रहना होता है। लुगो ने गांधी जैसी सच्चाई और ईमानदारी का उदाहरण पेश किया -- 'राजनीति में तो अब मैं आ ही गया हूं। आप या तो मेरा इस्तीफा मंजूर करें या मुझे सजा दें।' वेटिकन पसोपेश में पड़ा रहा। जब लुगो अपने देश के राष्ट्रपति चुन लिए गए, ते पोप ने उन्हें पादरी पद से मुक्त कर दिया। ज्ञात इतिहास में यह इस तरह की शायद पहली घटना है।

फरनांडो लुगो ने 15 अगस्त 2008 को जब राष्ट्रपति पद की शपथ ली, वे एक मामूली-सी सफेद कमीज पहने हुए थे और उनके पैरों में बूट नहीं, चप्पलें थीं। अगर मैं वहां मौजूद होता, तो उन चप्पलों की धूल अपने ललाट पर लगा लेता। पराग्वे के राष्ट्रपति को वेतन के रूप में 40,000 डॉलर सालाना मिलते हैं। लुगो ने घोषणा की कि वे वेतन के रूप में एक पेंस भी नहीं लेंगे और अपने छोटे-से घर में ही रहेंगे। लुगो ने एक ऐसी युवती को देशज मामलों का मंत्री बनाया है जिसे बचपन में बलात श्रम करने के लिए बेच दिया गया था और जो अब हाई स्कूल का इम्तहान देने की तैयारी कर रही है।


गरीबों का राष्ट्रपति कैसा होता है? अगर यह तुरंत सामने नहीं आ जाता, तो बाद में इसकी संभावना धूमिल होती जाती है। फरनांडो लुगो ने 15 अगस्त 2008 को जब राष्ट्रपति पद की शपथ ली, वे एक मामूली-सी सफेद कमीज पहने हुए थे और उनके पैरों में बूट नहीं, चप्पलें थीं। अगर मैं वहां मौजूद होता, तो उन चप्पलों की धूल अपने ललाट पर लगा लेता। पराग्वे के राष्ट्रपति को वेतन के रूप में 40,000 डॉलर सालाना मिलते हैं। लुगो ने घोषणा की कि वे वेतन के रूप में एक पेंस भी नहीं लेंगे और अपने छोटे-से घर में ही रहेंगे। लुगो ने एक ऐसी युवती को देशज मामलों का मंत्री बनाया है जिसे बचपन में बलात श्रम करने के लिए बेच दिया गया था और जो अब हाई स्कूल का इम्तहान देने की तैयारी कर रही है। आनेवाले दिनों में हमें ऐसे बहुत-से सुखद समाचार पढ़ने को मिलेंगे।


वे कौन हैं जो भारत की तरक्की की दिशा तय करने के लिए अमेरिका और यूरोप पर निगाह टिकाए रखते हैं? कौन हैं वे जिन्हें भारत जैसे गरीब देश में लोगों की नहीं, टेक्नोलॉजी की बेहतरी चाहिए? ये हमें साठ वर्षों में जहाँ तक ला सकते थे, ले आए हैं। इन्हें धन्यवाद। पर आगे का रास्ता 'गरीबों के बिशप' लुगो जैसे नेता ही दिखा सकते हैं। दक्षिण एशिया के बाशिंदों को लैटिन अमेरिकी देशों के घटनाक्रम पर निगाह रखनी चाहिए। वहाँ कई-कई स्वतंत्रता संघर्ष एक साथ चल रहे हैं।


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परत-दर-परत : बुराई की बाढ़ : बिहार - राजकिशोर

परत-दर-परत
बुराई की बाढ़
- राजकिशोर



उत्तर बिहार की बाढ़ जितनी बड़ी खबर है, उससे बड़ी खबर यह है कि मुसीबतजदा लोगों को लूटा जा रहा है और औरतों को बेइज्जत किया जा रहा है। बाढ़ की आपदा से त्रस्त जो लोग अपने घरों को छोड़ कर जान बचाने की खातिर अनिश्चित भविष्य की ओर चल पड़े हैं, उनके घरों पर स्थानीय गुंडों और बदमाशों की कुदृष्टि है। घर में जो थोड़ा-बहुत सामान है -- लोटा-थाली, कपड़े, रोजाना के इस्तेमाल की चीजें, वे सब हथिया ली जा रही हैं तथा सूने घरों को और सूना बनाया जा रहा है। पहले हमारे परिवार को निकालो, यह मांग पहले भी हर बाढ़ में की जाती रही है और इस पर झगड़ा-फसाद भी होता रहा है। इस बार नावों पर जबरिया कब्जे की घटनाएं बढ़ रही हैं और 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' का सिद्धांत खुल कर खेल रहा है। इसी तरह, राहत सामग्री की लूट की प्रतिद्वंद्विता तीव्र गति से जारी है। सबसे बड़ा हादसा उन औरतों के साथ गुजर रहा है, जो मौत के खतरे को पार कर राहत-नावों में शरण प्राप्त करने में सफल हो जा रही हैं। प्रकृति के कोप से बच जाने के बाद इन्हें मनुष्य की वासना का शिकार होना पड़ रहा है। मानो ये 'नो मैन्स लैंड' हों और इनके साथ कुछ भी किया जा सकता हो। डरी हुई औरत को और ज्यादा डराना कितना आसान होता है!


क्या यही मूल मानव स्वभाव है? क्या मनुष्य हमेशा दूसरों की लाचारगी का फायदा उठाना चाहता है? किसी बड़ी सामूहिक आपदा के समय आदमी क्या हमेशा कुत्ता हो जाता है? इसका जवाब एक असंदिग्ध हां में नहीं दिया जा सकता। होता है, यह भी होता है। लेकिन हमेशा यही नहीं होता। भारत विभाजन के खूनी दिनों में भी, जब आदमी आदमी का दुश्मन हो रहा था, ऐसी अनंत घटनाएं हुई थीं जिनमें सक्षम लोगों ने असुरक्षित लोगों को अपनी जान पर खेल कर बचाया था और अपने घरों में शरण दी थी। यह भी मानव स्वभाव है। बिहार की इस भयावह बाढ़ में ऐसी भी अनेक घटनाएं हो रही होंगी। संभव है, इनकी रिपोर्ट बाद में छपे।


अभी जो सामने आ रहा है, वह मानव स्वभाव का एक दुखद पहलू है। लेकिन मानव स्वभाव कोई जड़ या अपरिवर्तशील चीज नहीं है। दक्षिण भारत में जब सुनामी का हमला हुआ था और लाखों जानें चली गई थीं और इनसे अधिक लोग बेघर हो गए थे, ऐसी एक भी घटना नहीं सुनी गई कि बेसहारा लोगों को लूट लिया गया या औरतों को बेइज्जत करने की कोशिश की गई। यह खबर जरूर आई थी कि देह व्यापार का धंधा चलानेवाले दुष्ट गिरोहों के लोग अकेली लड़कियों और औरतों को भगा कर ले जाने के लिए सुनामी-पीड़ित इलाकों में पहुंच गए थे। लेकिन यह तो धंधा है। यह कुछ इस तरह की घटना थी जैसे भोपाल गैस रिसाव कांड के बाद अमेरिका के बहुत-से लालची वकील भोपाल आ धंसे थे, ताकि गैस-पीड़ित लोगों को मुआवजे के रूप में ज्यादा से ज्यादा रकम दिलवाई जा सके और उसमें से अपने लिए ज्यादा से ज्यादा हिस्सा झटका जा सके। बिहार की इस बाढ़ में भी ऐसे गिरोह सक्रिय हो गए होंगे। जहां मुरदा पड़ा होता है, कौए और गिद्ध मंडराते ही हैं। हमारी चिंता का विषय यह है कि तमिलनाडु की तुलना में बिहार में लोगों की मुसीबत से फायदा उठाने का असंगठित उपक्रम इतना अधिक क्यों हो रहा है कि अखबारों की 'लीड' बन सके।


क्या यह कहा जा सकता है कि तमिलनाडु और बिहार में मानव स्वभाव की अलग-अलग परिभाषाएं सामने आ रही हैं? नृतत्वशास्त्र इसका समर्थन नहीं करता। मनुष्य सभी जगह एक जैसे होते हैं। यह उनकी परिस्थितियां हैं जो उनके चरित्र और व्यवहार में फर्क ले आती हैं। इसकी सचाई हम वर्तमान परिस्थिति में भी देख सकते हैं। बिहार और तमिलनाडु, दोनों राज्यों की आर्थिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थितियां अलग-अलग हैं। बिहार के अनेक हिस्सों में जैसी दरिद्रता दिखाई देती है, वह तमिलनाडु में नहीं है। बिहार जैसी अराजकता भी वहां दिखाई नहीं देती। शायद इतनी विषमता भी नहीं है। इसलिए तमिलनाडु में मुसीबत के समय दया-माया दिखाने की संस्कृति काफी हद तक बची हुई है। इसके विपरीत, बिहार प्रत्येक दृष्टि से आशाविहीन है। यह तथ्य उन्हें क्रूर और हिंसक बना रहा है जिनकी स्थिति में इसके लिए थोड़ी भी गुंजाइश है। बाढ़ के समय किसी नई नीचता का जन्म नहीं हुआ है। यह उसी नीचता का एक और प्रगटन है जो सामान्य दिनों में दिखाई देती है। नि:संदेह इसका एक वर्ग आधार भी है। जो दीन-हीन लोग सामान्य दिनों में लूटे-खसूटे जाते हैं, वे ही बाढ़ के समय भी आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्तियों के शिकार हो रहे हैं। जो पहले कुछ हद तक सुरक्षित थे, वही आज भी सुरक्षित हैं।


आशाविहीनता से उत्पन्न विक्षोभ और स्वार्थपरता का एक रुाोत सरकार का बाढ़ प्रबंधन है। जो सरकार सामान्य दिनों में भी सामान्यलोगों की सुख-सुविधाओं का खयाल नहीं रख सकती, उनके लिए दो जून पौष्टिक खाने और चौबीस घंटों में बारह घंटे बिजली देने का इंतजाम नहीं कर सकती, उससे यह उम्मीद करना बेकार है कि वह एक विशाल प्राकृतिक आपदा के समय अचानक संवेदनशील, कार्य-कुशल और हो जाए। बेशक बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए सेना को भी उतारा गया है, पर काम जितना ज्यादा है, सैनिकों की संख्या उससे बहुत कम है। इसलिए बाढ़ पीड़ितों को यकीन नहीं है कि सभी के साथ न्याय होगा। सभी को बचाया जाएगा और सभी को राहत सामग्री मिलेगी। बंटवारे का यह अनिश्चय भी लोगों के दिलों को छोटा बना रहा है। यह लगभग वैसी ही स्थिति है जैसी भगदड़ के समय होती है। हर आदमी अपनी जान बचाने को उच्चतम वरीयता देता है। इसी कारण लोग इतनी तादाद में मरते हैं। बिहार की इस मुसीबत में केंद्र सरकार ने अपना खजाना खोलने में उदारता दिखाई है। बिहार के मुख्यमंत्री भी खासे चिंतित और सक्रिय हैं। लेकिन बिहार का हाल का इतिहास भी उसका पीछा कर रहा है। यह इतिहास अन्याय और जुल्म के छोटे-बड़े द्वीप बनाने का है। यही द्वीप बाढ़ के इस जानलेवा मौसम में भी जगह-जगह उभर रहे हैं।




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