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ब्रिटेन में क्षेत्रीय हिंदी सम्मलेन संपन्न


ब्रिटेन में क्षेत्रीय हिंदी सम्मलेन २०११ संपन्न 

लन्दन/ 2 जुलाई 2011

 



लन्दन में दिनांक 24 से 26 जून, 2011 तक बर्मिंघम के एस्‍टन विश्‍वविद्यालय प्रांगण में यू. के. क्षेत्रीय हिन्‍दी सम्‍मेलन का आयोजन किया गया. इस सम्मलेन का आयोजन विभिन्न संगठनों के सहयोग से किया गया. भारतीय उच्‍चायोग, लन्‍दन और प्रधान कोंसुलावास, बर्मिंघम के संरक्षण में गीतांजलि बहुभाषी साहित्‍यक समुदाय द्वारा गीतांजलि ट्रेंट, चौपाल, एचसीए वेल्‍स, सैंडवेल कन्‍फेडरेशन ऑव इंडियन्स, संत निरंकारी मंडल यूके, कथा यूके, भारतीय भाषा संगम, नेशनल काउंसिल ऑव हिन्‍दू प्रीस्‍ट्स, संस्‍कृति यूके, डीयूटी नीदरलैण्‍ड के सहयोग से सम्मलेन को सफल बनाया जा सका.


कौन है असली सिंह?



आपने अनेक विदेशियों को हिंसक पशुओं के साथ सामान्य रूप से खेलते-रहते हुए के वीडियो अथवा चित्र आदि किन्हीं समाचार चैनल्ज़ पर अथवा किन्हीं वीडियो साईट्स पर देखे होंगे; जिन्हें देखकर अचम्भा होने के साथ साथ उन पशुओं के मित्रवत व्यवहार अथवा स्नेह के वशीकृत हो जाने या फिर पालक के निडर होने जैसे कई भावों ने भी घेरा होगा| 


बहुधा भारतीयों के ऐसे कार्यों को न तो मीडिया प्रधानता देता है, न देना आवश्यक समझता है| भारत से जुड़ी तमाम तरह की बुरी चीजें खूब ख्यात हो जाती हैं और उनके घटाटोप में किसी को किसी और सकारात्मक चीज की ओर ध्यान देने की इच्छा नहीं होती| स्वयं भारतीय अपनी बुरी चीजों के प्रचार व अच्छी चीजों की नकार में अग्रणी रहते हैं|


   आज आपको एक भारतीय के आश्चर्यजनक  कारनामे से दो-चार कराती हूँ | सभी चित्र एक परिचित ने भिजवाए हैं|  आप भी देखें व इनके साहस की दाद दें| 

 यह भी विचारें कि कौन है असली सिंह? 











































































कराची में तिरंगा




कराची में भारत की धरोहर

कराची में स्कूल
कराची में स्थित इस सरकारी स्कूल पर तिरंगा बना है


पाकिस्तान के सिंध प्रांत की राजधानी कराची के बीचों-बीच एक इमारत पर नज़रें एकाएक ठहर जाती हैं क्योंकि वहाँ दिखाई देता है - भारत का झंडा.

ये झंडा दिखाई देता है रतन तलाव स्कूल की इमारत पर, जिसे देख कुछ पलों केलिए लगता है मानो आप भारत में हैं जहाँ किसी राष्ट्रभक्त ने अपने घर पर तिरंगा बनवा लिया है.
रतन तलाव स्कूल के मुख्य द्वार पर सीमेंट से भारत का राष्ट्रीय ध्वज बना हुआ है जिसे ना धूप-बारिश-धूल मिटा पाई है ना बँटवारे का भूचाल.
तिरंगे के साथ हिंदी में दो शब्द भी लिखे दिखाई देते हैं - स्वराज भवन.
ये स्कूल एक सरकारी स्कूल है और वहाँ के बुज़ुर्ग अध्यापक ग़ुलाम रसूल बताते हैं कि इस सरकारी स्कूल में दो पारियों में कक्षाएँ चलती हैं जिनमें कम-से-कम सौ बच्चे पढ़ते हैं.


अतीत
स्कूल की इमारत पर लगी पट्टी
स्कूल में गंदी हो चुकी एक पट्टी पर दिखता है बाबू राजेंद्र प्रसाद का नाम


ग़ुलाम रसूल बताते हैं कि इस स्कूल के अतीत के बारे में उन्हें पूरी जानकारी नहीं है सिवा इस बात के कि इसका निर्माण 1937 में हुआ था और तब वो इस इलाक़े का एकमात्र स्कूल था.
वे बताते हैं कि स्कूल के पुराने काग़ज़ात भी मौजूद नहीं हैं.
स्कूल के एक और अध्यापक असलम राजपूत बताते हैं कि उन्होंने लोगों से सुना है कि स्कूल के दरवाज़े के पास स्कूल के उदघाटन के समय का पत्थर था जो अब दब गया है.
वहाँ दीवार पर लगी मिट्टी को कुरेदने पर दो तख़्तियाँ नज़र आईं जिन्हें साफ़ करने पर हिंदी में लिखावट मिलती है जिनसे पता चलता है कि इस भवन की आधारशिला बाबू राजेंद्र प्रसाद ने रखी थी और स्कूल का उदघाटन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया.
इन पत्थरों की हालत देखकर ऐसा लगता है मानो इंसान तो नफ़रत के शिकार हुए ही हैं, भाषा और इमारतें भी इस नफ़रत से नहीं बच सकी हैं.


धरोहर
स्कूल पर लगी पट्टी
स्कूल में एक और पत्थर पर लिखा है पंडित जवाहरलाल नेहरू का नाम



सिंधी और उर्दू के जाने-माने लेखक अमर जलील ने अपनी एक किताब में इस स्कूल का ज़िक्र किया है.
अमर जलील लिखते हैं - "1947 की एक शाम को ख़बर मिली कि रतन तलाव स्कूल को आग लगा दी गई है. मैं दौड़ता हुआ स्कूल के सामने पहुँचा तो स्कूल से धुआँ उठ रहा था.
"यह दृश्य देख कर मैं परेशान हो गया. रतन तलाव से निकले आग के शोले मेरे वजूद में बुझ नहीं सके हैं."
इस स्कूल के पास और भी कुछ ऐसी इमारतें हैं जो उस दौर में मंदिर या धर्मशाला हुआ करती थीं. लेकिन अब मंदिर इमामबाड़े में और धर्मशाला गाड़ियों के गैरेज में बदल चुके हैं.
लेकिन इन बदलावों के बीच भी एक तिरंगा झंडा आज भी एक इतिहास का एहसास दिलाता है. ये तिरंगा दोनों देशों के उस साझा इतिहास की धरोहर है.

    राष्ट्रीय विचार मंच की काव्यगोष्ठी संपन्न





    राष्ट्रीय विचार मंच की काव्यगोष्ठी संपन्न









    हैदराबाद, २० मई, 2009

    राष्ट्रीय विचार मंच के आंध्र प्रदेश प्रकोष्ठ के तत्वावधान में यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के संगोष्ठी कक्ष में एक विचार एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता प्रो. टी. मोहन सिंह ने की। टीकमगढ़ (मध्य प्रदेश) से पधारे वरिष्ठ गाँधीवादी कार्यकर्ता और लेखक हरिश्‍चद्र पुष्प मुख्य अतिथि के रूप में तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान के आचार्य डॉ. हेमराज मीणा, वरिष्ठ कवि डॉ. दिवाकर पांडेय तथा प्रतिष्ठित पत्रकार डॉ. रामजी सिंह उदयन विशेष अतिथि के रूप में मंचासीन हुए।

    आरंभ में विचार मंच की अध्यक्ष डॉ. कविता वाचक्नवी ने अतिथियों का स्वागत किया और उन्हें अंगवस्त्र से सम्मानित किया। उन्होंने राष्ट्रीय विचार मंच की गतिविधियों के बारे में बताते हुए कहा कि राष्ट्रीय अखंड़ता की चेतना प्रसारित करने के लिए समय-समय पर विचार विमर और रचना पाठ के आयोजन किए जाते हैं तथा दिल्ली से त्रैमासिक पत्रिका ‘विचार दृष्टि’ का प्रकाशन किया जाता है।

    ‘विचार दृष्टि’ (त्रैमासिक) के दो नए अंकों की सामग्री का विवेचन करते हुए डॉ. बलविंदर कौर ने कहा कि राष्ट्रीयता और वैचारिकता इस पत्रिका की स्थायी विशेषता है। उन्होंने पत्रिका की संपादकीय निर्भीकता और स्पष्ट कथन की विशेष प्रशंसा की।

    मुख्य अतिथि हरिश्‍चद्र पुष्प ने अपने संबोधन में हिंदी साहित्य के संवर्धन में अपनी जन्मभूमि बुंदेलखंड के योगदान की चर्चा की। उन्होंने दक्षिण भारत के हिंदी लेखकों के कार्य को इस दृष्टि से विशिष्ट बताया कि उसके माध्यम से हिंदी सही अर्थों में सामासिक संस्कृति की द्योतक बन सकी है।

    विचार गोष्ठी के अनंतर संपन्न काव्य गोष्ठी का संचालन प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्यकार वेणुगोपाल भट्टड़ ने किया। प्रो. टी. मोहन सिंह, प्रो. हेम राज मीणा, प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रो. पी.माणिक्यांबा ‘मणि’, डॉ. दिवाकर पांडेय, डॉ. रामजी सिंह उदयन, डॉ. कविता वाचक्नवी, डॉ. अहिल्या मिश्र, डॉ. पी.सी. जैन, गुरुदयाल अग्रवाल, लक्ष्मीनारायण अग्रवाल, कैलासनाथ, विजयकुमार, भँवरलाल उपाध्याय ‘भँवर’, एस.के.जैन लौंगपुरिया, अभिलाषा राठी, श्रद्धा तिवारी, गायत्री देवी, अर्पणा दीप्ति, पवित्रा अग्रवाल, कैलाशवती, वीर प्रकाश लाहोटी ‘सावन’ और वेणुगोपाल भट्टड़ ने अपनी उपस्थिति और सरस काव्य पाठ द्वारा कार्यक्रम को रोचक और सफल बनाया। डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने धन्यवाद प्रकट किया।


    - डॉ. कविता वाचक्नवी
    अध्यक्ष, राष्ट्रीय विचार मंच
    आंध्र प्रदेश प्रकोष्ठ, हैदराबाद





    आमंत्रण

    प्रभु जोशी जी के लेखक रूप से हिन्दी के पाठक अच्छी प्रकार परिचित हैं। हिन्दी भारत के पाठकों के लिए उनकी कहानी ( एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी ) लेखमाला (इसलिए बिदा करना चाहते हैं हिन्दी को हिन्दी के अखबार १, २, ३ ) तथा एक महत्त्वपूर्ण आलेखक्रम ( कंडोम प्रोमोशन कार्यक्रम ) को यहाँ प्रस्तुत किया गया था। जो मित्र उनकी कहानी व आलेख किन्हीं कारणों से नहीं पढ़ पाए वे इस पूरी सामग्री को यहाँ पढ़ सकते हैं।

    जोशी जी लंबे समय तक नई दुनिया के सम्पादक भी रहे। आजकल वे इंदौर दूरदर्शन का दायित्व सम्हाले हुए हैं।

    इन सब उत्तरदायित्वों व विविध पक्षों के बीच उनके व्यक्तित्व में निहित रंगों के चितेरे चित्रकार होने का एक ऐसा अद्भुत रूप है, जिसे देश - दुनिया में बड़े सम्मान से देखा माना जाता है। रंग-प्रयोग में विरलता उनकी विशेषता है. गत दिनों जयपुर में हुई उनकी चित्र प्रदर्शनी मीडिया में बहुत चर्चा का विषय रही व चित्रकला के मर्मज्ञों द्वारा अत्यन्त सराही गयी।

    जोशी जी के चित्रों की एक प्रदर्शनी मुम्बई की जहांगीर आर्ट गैलरी में (१५ एप्रिल से २१ एप्रिल तक ) आयोजित होने जा रही है, जिसका उद्घाटन १५ एप्रिल की सायं ६.३० बजे प्रसिद्ध पत्रकार प्रीतीश नंदी करेंगे। सभी सादर आमंत्रित हैं ।

    कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ नीचे देखें।






    बड़े आकार में देखने-पढने के लिए इमेज पर क्लिक करें











    कार्यक्रम : आमंत्रण


    परिचय

    २३ मार्च की चिट्ठाचर्चा : कही न जाए, का कहिए


    २३ मार्च की चिट्ठाचर्चा : कही न जाए, का कहिए

    कविता वाचक्नवी




    कल
    २३ मार्च बलिदान दिवस के दिन सोमवार होने के कारण चिट्ठाचर्चा का नियत दिन मेरा था,जिसके लिए मनोयोगपूर्वक तैयार की गयी सामग्री को प्रकाशित करने में नाकों चने चबाने पड़ गए। एक पोस्ट के लिए निरंतर लगभग ३२ घंटे की सिटिंग देना भी मेरा निरर्थक हो जाता, यदि अनूप जी ने अंत में उसे अपने यत्न से हल कर के रात को अंततः प्रकाशित करने में सफलता न पाई होती। जाने क्या तकनीकी समस्या आ गयी थी कि बार बार एरर और ब्लोगर की अक्षमता का संदेश आ रहा था तथा पब्लिश या सेव करने पर संदेश उड़ जाता था। अस्तु । संभवतः कोई अज्ञातशक्ति ऐन मौके पर लगन और प्रतिबद्धता की सच्चाई की परीक्षा ले रही होगी| २३ मार्च व्यतीत होने से कुछ पूर्व ही प्रविष्टि लग पाई।

    किंतु उस प्रविष्टि के जिस दूसरे भाग को कल सायं लगाने की दृष्टि से मैंने सँजो कर रख लिया था, वह चित्रावली थी। अब इसे आगामी सोमवार तक टालने की अपेक्षा यहीं प्रस्तुत कर रही हूँ। आशा है, सभी इस ऐतिहासिक महत्व की सामग्री को उपयोगी पाएँगे।










    भगतसिंह का परिवार (बाएँ से) -
    माता हुकमकौर (चाची), माता विद्यावती(माँ), माता जयकौर (दादी), माता हरनामकौर (चाची)








    माता विद्यावती का युवकों को संदेश






























    भगतसिंह को मृत्युदंड के आदेश
































    भगतसिंह के trial के आधिकारिक दस्तावेज़

































    भगतसिंह का पंजाबी(गुरुमुखी) में लिखा पत्र















    भगतसिंह का उर्दू में लिखा पत्र ----------------------भगतसिंह का गुरुमुखी पंजाबी में लिखा पत्र


























    क्रांतिकारी सुखदेव की माँ----------------- क्रांतिकारी राजगुरु की माँ




























    वीरबलिदानी चंद्रशेखर आजाद -------------------------------- चन्द्रशेखर आजाद की माँ




























    हिन्दी हस्तलेख में लिखा भगत सिंह का पत्र------------ उर्दू हस्तलेख में भगतसिंह की प्रिय पंक्तियाँ *

















    *
    उर्दू हस्तलेख में भगतसिंह की प्रिय पंक्तियों का देवनागरी पाठ


    यह न थी हमारी किस्मत जो विसाले यार होता
    अगर और जीते रहते यही इन्तेज़ार होता

    तेरे वादे पर जिऐं हम तो यह जान छूट जाना
    कि खुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता

    तेरी नाज़ुकी से जाना कि बँधा था अहदे फ़र्दा
    कभी तू न तोड़ सकता अगर इस्तेवार होता

    यह कहाँ की दोस्ती है (कि) बने हैं दोस्त नासेह
    कोई चारासाज़ होता कोई ग़म गुसार होता

    कहूँ किससे मैं के क्या है शबे ग़म बुरी बला है
    मुझे क्या बुरा था मरना, अगर एक बार होता
    (ग़ालिब)

    इशरते कत्ल गहे अहले तमन्ना मत पूछ
    इदे-नज्जारा है शमशीर की उरियाँ होना

    की तेरे क़त्ल के बाद उसने ज़फा होना
    कि उस ज़ुद पशेमाँ का पशेमां होना

    हैफ उस चारगिरह कपड़े की क़िस्मत ग़ालिब
    जिस की किस्मत में लिखा हो आशिक़ का गरेबाँ होना
    (ग़ालिब)

    मैं शमाँ आखिर शब हूँ सुन सर गुज़श्त मेरी
    फिर सुबह होने तक तो किस्सा ही मुख़्तसर है

    अच्छा है दिल के साथ रहे पासबाने अक़्ल
    लेकिन कभी – कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे

    न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
    कहीं सरेराह गुज़र बैठा सितमकशे इन्तेज़ार होगा

    औरौं का पयाम और मेरा पयाम और है
    इश्क के दर्दमन्दों का तरज़े कलाम और है
    (इक़बाल)
    अक्ल क्या चीज़ है एक वज़ा की पाबन्दी है
    दिल को मुद्दत हुई इस कैद से आज़ाद किया

    नशा पिला के गिराना तो सबको आता है
    मज़ा तो जब है कि गिरतों को थाम ले साकी
    (ग़ालिब)

    भला निभेगी तेरी हमसे क्यों कर ऍ वायज़
    कि हम तो रस्में मोहब्बत को आम करते हैं
    मैं उनकी महफ़िल-ए-इशरत से काँप जाता हूँ
    जो घर को फूँक के दुनिया में नाम करते हैं।

    कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहले महफ़िल
    चरागे सहर हूँ बुझा चाहता हूँ।

    आबो हवा में रहेगी ख़्याल की बिजली
    यह मुश्ते ख़ाक है फ़ानी रहे न रहे

    खुदा के आशिक़ तो हैं हजारों बनों में फिरते हैं मारे-मारे
    मै उसका बन्दा बनूँगा जिसको खुदा के बन्दों से प्यार होगा

    मैं वो चिराग हूँ जिसको फरोगेहस्ती में
    करीब सुबह रौशन किया, बुझा भी दिया

    तुझे, शाख-ए-गुल से तोडें जहेनसीब तेरे
    तड़पते रह गए गुलज़ार में रक़ीब तेरे।

    दहर को देते हैं मुए दीद-ए-गिरियाँ हम
    आखिरी बादल हैं एक गुजरे हुए तूफाँ के हम

    मैं ज़ुल्मते शब में ले के निकलूँगा अपने दर मांदा कारवाँ को
    शरर फशाँ होगी आह मेरी नफ़स मेरा शोला बार होगा

    जो शाख-ए- नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना पाएदार होगा।


    सौजन्य : प्रो.चमनलाल



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