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जर्मन क्यों?

इस समय केन्द्रीय विद्यालयों में जर्मन थोपने पर घमासान मचा हुआ है,  इसकी पृष्ठभूमि की भीतरी जानकारी रखने वाले जर्मन साहित्य के मर्मज्ञ प्रो. अमृत मेहता ने अपना यह आलेख हमें उपलब्ध कराया है - 




जर्मन क्यों?
- डॉ. अमृत मेहता 


इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैं जर्मन भाषा तथा साहित्य का अदम्य समर्थक हूँ, और अब तक मुझ द्वारा अनूदित 72 साहित्यिक कृतियों में से 66 का अनुवाद जर्मन से किया गया है।  हिंदी मेरी मातृभाषा है, इसका प्रमाण इसी में है कि 72 में से 70 कृतियों मे लक्ष्य भाषा हिंदी रही है, और दो में पंजाबी। अब तक मैं 208 जर्मनभाषी लेखकों की कृतियों का जर्मन से हिंदी में अनुवाद कर चुका हूँ, और कुल मिला कर 222 जर्मनभाषी लेखकों के पाठ प्रकाशित कर चुका हूँ।  काफ़ी हद तक अपना धन लगा कर भी।  अपनी पत्रिका “सार संसार” के माध्यम से मैंने 72 ऐसे नए अनुवादकों को जन्म दिया है, जो विदेशी भाषाओँ से सीधे हिंदी में अनुवाद करते हैं, जिनमें से 16 जर्मन-हिंदी अनुवादक हैं।  पूरे विश्व में इन आंकड़ों के बराबर कोई नहीं पहुँचा, और यह वक्तव्य मैं पूरी ज़िम्मेदारी से दे रहा हूँ। 


भारत के केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के स्थान पर केवल जर्मन को सुशोभित करना एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण है, और जिस तरह से इस भाषा को भारतीय बच्चों पर लादा गया है, वह न केवल असंवैधानिक है, बल्कि इस से यह भी उजागर होता है कि भारत को स्वयं में इतना ढीला-ढाला देश माना जाता है कि यहाँ पर कोई भी विदेशी शक्ति जो चाहे करवा सकती है, चाहे घूस के बल पर अथवा बहला-फुसला कर।  इस प्रकरण में कौन सा तरीका अपनाया गया है, यह तथ्यों की गहराई में जाने से मालूम पड़ सकता है। 


यह मामला 2014 में मानव संसाधन मंत्री सुश्री स्मृति ईरानी की सतर्कता से उजागर हुआ है, परन्तु तीन वर्ष में कुछ लोग इस सन्दर्भ में जो करने में सफल हुए हैं, वह हमारी शासन प्रणाली पर एक गंभीर प्रश्न-चिन्ह है।  मैं 2009 से जानता हूँ कि कोई संदिग्ध खिचड़ी पक रही थी, परन्तु मेरी जानकारी में केवल इतना ही था कि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओँ के अस्तित्व पर कुठाराघात करके कुछ जर्मनभाषी सांस्कृतिक दूत अंग्रेज़ी को भारत की मुख्य भाषा सिद्ध करने पर तुले हुए थे।  मैंने इसका जम कर विरोध किया है, बहुत कुछ लिखा है इस बारे में, और मुझे इसकी काफ़ी क़ीमत भी चुकानी पड़ी है। जर्मन का वर्चस्व जिस तरह से सरकारी स्कूलों में स्थापित किया जा रहा था, वह जुड़ा इसी सन्दर्भ से था, परन्तु मुझे यही भ्रम रहा कि यह भारत सरकार की इच्छा से हो रहा है, एक नीतिगत निर्णय है, अतः इसका विरोध करना निरर्थक होगा। 


2009 में मैं बर्लिन के साहित्य-सम्मेलन की ग्रीष्म-अकादमी में हिस्सा ले रहा था, जहाँ जर्मनी के अनेकों प्रकाशक तथा गोएथे-संस्थान के लोग भी उपस्थित थे।  सब मुझ से पूछ रहे थे कि क्या मैं नवीन किशोर को जानता हूँ।  किशोर कोलकाता के सीगल्ल-बुक्स-प्रकाशन के मालिक हैं, और तब तक अपना व्यापार लन्दन से चला रहे थे, क्योंकि वह पुस्तकें अंग्रेज़ी की प्रकाशित करते हैं।  सब मुझे बता रहे थे कि वे किशोर से मिलने कोलकाता जा रहे थे।  कारण पूछने पर मुझे बताया गया कि आगे से वे बहुत-सी जर्मन पुस्तकों के अंग्रेज़ी अनुवाद भारत से ही करवा कर वहीँ प्रकाशित करवाया करेंगे। यह एक बहुत ही चौंका देने वाली सूचना थी।  मेरे यह कहने पर कि कोई भी भारतीय जर्मन साहित्य का अनुवाद अंग्रेज़ी में कर पाने में समर्थ नहीं होगा, और वैसे भी अज्ञात जर्मन लेखकों की पुस्तकें पढ़ने में भारतीय दिलचस्पी नहीं लेंगे तो मुझ पर यह कह कर हँसा गया कि हर भारतीय अंग्रेज़ी जानता है, और मैं उन्हें भ्रमित कर रहा हूँ।  उनके इस विश्वास की पृष्ठभूमि में भारत में कुछ वर्षों से कतिपय सांस्कृतिक दूतों द्वारा चलाया रहा एक अंग्रेज़ी-समर्थक अभियान था।  इस बारे में मैं वेबज़ीन “सृजनगाथा” में मई 2010 में प्रकाशित अपने एक बहुचर्चित आलेख में विस्तार से लिख चुका हूँ।  यह भी कि मैंने जर्मनी के एक प्रमुख प्रकाशन “ज़ूअरकांप फर्लाग”  की प्रमुख पेट्रा हार्ट को एक मेल लिख कर अपना कड़ा विरोध जताया था तो उन्होंने मुझे जवाब में लिखा था कि ये पुस्तकें केवल अंग्रेज़ीभाषी देशों, जैसे अमरीका तथा इंगलैंड के लिए हैं, इन्हें छपवाया भारत में जायेगा, बेचा विदेश में जायेगा, और इनका अनुवाद भी अँगरेज़ करेंगे।  पेट्रा एक सीधी-सच्ची महिला हैं और उनके कथन में सत्य था.. जर्मन से अंग्रेज़ी में अनूदित, भारत में प्रकाशित पुस्तकें भारत में उपलब्ध नहीं हैं, अंग्रेज़ीभाषी देशों में ही बेचीं जा रही हैं।  इसका सीधा सा मतलब है: भारत में पुस्तकें सस्ती छपती हैं, तो इस से प्रकाशकों का मुनाफ़ा कई गुणा बढ़ जाता है।  परन्तु इसका चिंताजनक पहलू यह रहा कि इसके साथ ही भारत में, विशेषकर गोएथे संस्थान द्वारा, एक हिंदी-विरोधी अभियान भी शुरू हो गया, जिसके अंतर्गत, एक जर्मनभाषी सांस्कृतिक दूत के शब्दों में:  “दिल्ली से बाहर कदम रख कर देखो तो कोई भी हिंदी नहीं बोलता.” इस अज्ञान को क्षमा करने का कोई कारण नहीं है, लेकिन इसके मंतव्य को समझते हुए यह निस्सहाय रोष को जन्म देने वाला एक वक्तव्य है।  बहरहाल यह समझ में आने वाली बात है कि वैश्वीकरण के इस युग में कोई कम लागत में किसी दूसरे देश के सस्ते कामगारों का लाभ उठा रहा है, जबकि इस सांस्कृतिक दूत का कथन था कि वे यहाँ पर लोगों को रोज़गार उपलब्ध करवा रहे हैं.


लेकिन अभी तक जो एकदम अबोधगम्य रहा है, वह है भारत के संविधान की अवहेलना करते हुए जर्मन को भारत में बढ़ावा देना।  इससे क्या मिलने वाला है जर्मनी को, या किसी अन्य जर्मनभाषी देश, अर्थात आस्ट्रिया अथवा स्विट्ज़रलैंड को? उनके लिए भारतीय बच्चों को जर्मन सिखाना क्या इतना अधिक महत्व रखता है कि उन्होंने चुपचाप मानव संसाधन मंत्रालय को नज़रंदाज़ करते हुए गुप-चुप केन्द्रीय विद्यालय संगठन से इकरारनामा कर डाला और उसके बाद प्रति वर्ष लाखों यूरो जर्मन के प्रचार-प्रसार पर खर्च करते रहे।  यह तर्क किसी के गले नहीं उतरने वाला कि जर्मन सरकार चाहती है कि भारत के प्रतिभाशाली छात्र इससे जर्मन विश्वविद्यालयों में शिक्षा पाने को आतुर हो जायेंगे।  स्कूल में पढ़ी जर्मन बड़े होने के बाद कहाँ बची रह जाती है? मेरे छोटे बेटे ने स्कूल में तीसरी भाषा के तौर पर फ्रेंच ली थी, और अब वह ‘कोमा ताले वू?’ (कैसे हो?) के अलावा और कोई वाक्य नहीं जानता। मेरे ज्येष्ठ पुत्र ने कॉलेज में पढ़ते हुए गोएथे-संस्थान से दो सत्र में जर्मन सीखी थी, अपनी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था उसने, लेकिन अब वह “शुभ प्रातः” या “शुभ संध्या” तक ही सिमट कर रह गया है।  एक तर्क और है कि अभी तक जर्मन की शिक्षा केवल निजी स्कूलों के बच्चों तक, अर्थात अमीर बच्चों तक ही सीमित रही है, और केंद्रीय विद्यालयों में इसे लगा कर गरीब बच्चों के लिए जर्मन भाषा की शिक्षा उपलब्ध करवाई जा रही है, जो स्वयं में एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है, 20/11/14 को समाचारपत्रों में निकली एक खबर के अनुसार हमारे सांसद इन विद्यालयों में प्रति वर्ष 15 सीटों का कोटा अपने बच्चों के लिए आरक्षित करवाना चाहते हैं, इसी से मालूम पड़ जाता है कि इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे कितने गरीब हैं।  न जाने ऐसा कितना अज्ञान इनके आसपास घूमने वाले अंग्रेजीदाँ हिंदुस्तानियों ने इनके भेजे में भर दिया है कि ये लोग अपनी नाक के आगे ज़्यादा दूर तक नहीं देख पाते। 


कुल मिला कर यह एक अचरज में डालने वाला विषय है कि क्या जर्मन का भारतीय स्कूलों में पढ़ाया जाना गोएथे संस्थान या जर्मन दूतावास के या जर्मन सरकार के लिए इतना गंभीर विषय है कि उसके लिए संदिग्ध प्रणाली से एक समझौता करना, पानी की तरह पैसा बहाना तथा जर्मन चांसलर मैडम मेर्केल का भारतीय प्रधानमंत्री से एक महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन के दौरान बात करना अनिवार्य हो गया? किसी भी जर्मन या भारतीय नागरिक के लिए यह गोरखधंधा अबोधगम्य ही रहेगा।  सुप्रसिद्ध साहित्यकार ई.एम.फोस्टर ने एक बार कहीं लिखा था: If I had to choose between betraying my country and betraying my friend, I hope I should have the guts to betray my country, अर्थात यदि मेरे सामने अगर दुविधा हो कि मैं देश से गद्दारी करूँ या दोस्त से, तो उम्मीद रखता हूँ कि मुझमें देश से गद्दारी करने का साहस होगा.


जर्मनों तथा जर्मनभाषियों से मेरा संपर्क तथा मेरे सम्बन्ध गत 41 वर्षों से हैं, और मैं भली-भांति जानता हूँ कि जर्मेनिक नस्ल दोस्ती निभाने के मामले में मिसालें क़ायम कर सकती है, पर देश से गद्दारी? ...मैं सोच भी नहीं सकता था, परन्तु इस प्रकरण में कहीं जा कर यह उक्ति इन के सन्दर्भ में सार्थक प्रतीत होती है। यह तो मैं गत 15 वर्षों से जानता हूँ कि ये लोग भारतीय दोस्तों द्वारा बरगलाये जाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। 


गोएथे-संस्थान दशकों से भारत में निरंकुशता से जर्मन-भारतीय भाषा अनुवाद क्षेत्र में निरीह हिंदी पाठकों पर जर्मन साहित्य के घटिया अनुवाद थोप रहा है। विष्णु खरे इसके आधिकारिक अनुवादक रहे हैं, जो खुद मानते हैं कि उनका जर्मन-ज्ञान अल्प है।  संस्थान हिंदी में उत्तम अनुवाद नहीं होने देता, अगर कोई करता है तो उसे प्रताड़ित करता है, उससे उसके प्रकाशक छीन लेता है, अपने दोस्तों को प्रकाशकों पर थोप देता है, कि इनसे अनुवाद करवाओ।  जब उनके अनुवाद ऐसे होते हैं कि हिंदी पाठक उन्हें पढ़ते हुए अपना माथा पीट ले, तो भी प्रकाशक के साथ ज़बरदस्ती की जाती है कि उसे वही अनुवाद छापने होंगे।  यह उनके अपने साहित्य का अपमान नहीं है तो क्या है? इस विषय पर जर्मनी तथा आस्ट्रिया की दो शोध-पत्रिकाओं में मैं जर्मन भाषा में 14-15 पृष्ठों का एक विस्तृत लेख प्रकाशित कर चुका हूँ।  खेद का विषय है कि मुझे इस प्रवृत्ति को कड़े शब्दों में लताड़ना पड़ा है; किसी प्रश्न का कोई उत्तर तो इनके पास नहीं है, लेकिन लोगों से निजी वार्तालापों में इसके अधिकारी मेरे प्रति अपनी आक्रोश जताते रहते हैं।  इनकी निरंकुशता अब इस हद तक बढ़ चुकी है कि ये अनधिकृत रूप से देश से संस्कृत तथा अन्य भारतीय भाषाएँ मिटा कर जर्मन को स्थापित करने कि लिए दशकों से बने मधुर भारत-जर्मन संबंधों में दरार लाने पर भी उतारू हो गए हैं। 


बात जर्मनों के जिगरी दोस्त होने की हो रही थी।  50 वर्ष से अधिक समय से गोएथे-संस्थान का एक जिगरी दोस्त प्रमोद तलगेरी नाम का एक जर्मन पढ़ाने वाला प्रोफ़ेसर रहा है।  जर्मन भाषा और साहित्य के मामले में यह हमेशा उनका प्रमुख परामर्शदाता रहा है।  गत कुछ वर्ष ऐबरहार्ट वेल्लर संस्थान की दक्षिण एशिया-शाखा के भाषा-विभाग के प्रमुख रहे थे। उनके कार्यकाल के दौरान भारतीय विश्वविद्यालयों में जर्मन के वही शिक्षक फले-फूले, जो वेल्लर तथा तलगेरी की युगल-जोड़ी को दंडवत प्रणाम करते रहे। ...  और ये उन्हें बार-बार जर्मनी की सैर करवाते रहे.. लेकिन वेल्लर के ज़माने में भारत में जर्मन भाषा ख़ूब फली-फूली, भले ही इसकी उन्नति के तौर-तरीके संदिग्ध थे।  इन्हीं के ज़माने में हिंदी के प्रति संस्थान की शत्रुता खुल कर प्रकट हुई।  इन्होने देश के कई कोनों में जर्मन सेंटर खुलवाए, अपने पिच्छ्लग्गुओं को वहाँ नियुक्त कर दिया।  एक उदाहरण ही इनकी कार्यविधि को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त होगा।  इन्होंने चंडीगढ़ के सेक्टर 34 में एक गोएथे-सेंटर खुलवाया, जिसे पूरे उत्तर भारत में जर्मन भाषा सीखने के लिए एकमात्र सेंटर का दर्ज़ा प्रदान किया गिया, और जिसके बारे में घोषणा की गई कि दिल्ली की इंदिरा गाँधी ओपन यूनिवर्सिटी की भागीदारी इसके साथ होगी।  यहाँ उल्लेखनीय है कि इस निजी-सेंटर के कर्ता-धर्ता निदेशक सिर्फ़ एम.ए. हैं, तथा किसी कॉलेज या यूनिवेर्सिटी में शिक्षक की नौकरी नहीं पा सके, क्योंकि यू.जी.सी. की नेट परीक्षा पास नहीं कर सके, परन्तु, यदि हम वेल्लर के शब्दों पर विश्वास करें तो इन्हें – वेल्लर तथा तलगेरी की कृपा से - एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर का दर्ज़ा इन्हें संभवतः मिल चुका है।  यह अनिवार्य है कि जाँच की जाये: क्या इंदिरा गाँधी ओपन यूनिवर्सिटी से भी गोएथे-संस्थान ने ऐसा कोई अवैध समझौता किया है? यह स्वतःस्पष्ट है कि भारत में जर्मन का प्रचार-प्रसार बढ़ाने से वेल्लर की प्रतिष्ठा गोएथे-संस्थान के म्यूनिख मुख्यालय में बढ़ी और तलगेरी की जर्मन दूतावास इत्यादि में ; और इस प्रतिष्ठा की दरकार तलगेरी को बहुत बुरी तरह से थी। 


गोएथे-संस्थान, जर्मन दूतावास तथा अन्य जर्मनभाषी देशों के दूतावासों के घनिष्ठ मित्र प्रमोद तलगेरी भारत सरकार के अपराधी हैं, अतः इन्हें भारतीय यूनिवर्सिटी सिस्टम से बहिष्कृत किया जा चुका है और मानव संसाधन मंत्रालय ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग के आदेश पर एक यूनिवर्सिटी में इनके भ्रष्टाचार के मामलों को दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार की कड़ी नाराज़गी इनके प्रति प्रकट की है। यह कभी हैदराबाद में एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय के उपकुलपति होते थे, और अब अपने आप को इंडिया इंटरनेशनल मल्टीवेर्सिटी, पुणे, का उपकुलपति बताते हैं। वास्तव में यह “वेर्सिटी” न तो “यूनिवर्सिटी” है, न ही “इंटरनेशनल” है, और न ही यह इसके उपकुलपति हैं।  जर्मनों के यह घनिष्ट मित्र दशकों से मक्कारियों और घोटालों के लिए जाने जाते रहे हैं, और स्वयं पर हाल में हुए कुठाराघात से निज़ात पाने के लिए इनके लिए अपने मित्रों के लिए कुछ नया करना अनिवार्य था।  यह फ़रवरी 2014 में “अपनी यूनिवर्सिटी” में जर्मन, स्विस तथा आस्ट्रियाई दूतावास के सहयोग से “भारत में जर्मन के शिक्षण” के सौ वर्ष की जयंती” बड़ी धूमधाम से मनाने वाले थे।  मुझे जब यह सूचना स्विस दूतावास की सांस्कृतिक सचिव, ज़ारा बेरनास्कोनी, से मिली कि तीनों दूतावास इंडिया इन्टरनेशनल मल्टीवेर्सिटी में जा कर यह समारोह आयोजित करने जा रहे हैं तो मैंने उन्हें सच्चाई से परिचित करवाया. वह आश्चर्यचकित हुईं और उन्होंने मेरे कथन पर विश्वास नहीं किया।  मैनें उन्हें कोरिएर से प्रमाण भेजे तो उन्हें यकीन आया।  ये सब प्रमाण इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं।  तथ्य ये हैं -  :  

वेर्सिटी का पता कहीं पर कुछ है, कहीं कुछ और है, कुछ पता नहीं कि यह कब स्थापित हुई थी, 2000 से 2012 तक कई तारीखें हैं इसमें, वेर्सिटी में छात्रों की संख्या: 0, शिक्षकों की संख्या: 0, कमरों की संख्या: 0, कम्प्यूटरों की संख्या: 0, कुछ भी नहीं वहाँ पर, कुल मिला कर वेर्सिटी के पास 6,36,122 रूपये का बजट है, जो उन्हें किसी ने दान में दिये हैं, जिस में से 5,40,000रूपये कर्मचारियों में बाँटे गए हैं।  वेर्सिटी को न तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और न ही तकनीकी शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त है, जो हर सही यूनिवर्सिटी के लिए अनिवार्य होती है।  कहीं पर इसे कॉलेज बताया गया है, कहीं एक वाणिज्यिक संस्था, कहीं कल्याणकारी संस्था और कहीं गैर-सरकारी संगठन के रूप में इसका परिचय दिया गया है; विकिपीडिया में इसे एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बताया गया है, जिसे तलगेरी चला रहे हैं।  और कि इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी एक ग्रामीण यूनिवर्सिटी है, प्रमोद तलगेरी जिसके “Appily Adhikari” और “Principal” हैं।  स्विस राजदूत लीनुस फॉन कास्टेलमूर को भी मैंने आगाह किया कि ऐसे व्यक्तियों से बच कर रहें।  यथासंभव जर्मन से जुड़े हर व्यक्ति को देश-विदेश में आगाह किया।  समारोह अंततः पुणे यूनिवर्सिटी में संपन्न हुआ, वहाँ जर्मन राजदूत मिषाएल श्टाइनर ही उपस्थित थे, परन्तु उन्होंने तलगेरी को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद अवश्य दिया.... और सबसे अधिक हैरत की बात यह है कि इसी वर्ष अप्रैल में गोएथे-संस्थान ने तलगेरी को भारत तथा जर्मनी के मध्य सांस्कृतिक तथा साहित्यिक संबंधों को असाधारण प्रोत्साहन देने के लिए मेर्क-टैगोर पुरस्कार से सम्मानित किया है।  स्पष्ट है कि किस लिए दिया गया है यह सम्मान!


प्रमोद तलगेरी और गोएथे-संस्थान अर्थात माक्स-म्युलर भवन में, जैसा कि मैं बता चुका हूँ, हमेशा प्रगाढ़ सम्बन्ध रहे हैं, और कांग्रेस सरकार में भी तलगेरी की गहरी पहुँच थी, जिस कारण यह गुप-चुप क़रार सम्भव हुआ है। आधिकारिक तौर पर तलगेरी इंडाफ (भारतीय-जर्मन शिक्षक संघ) के अध्यक्ष हैं, इन्होने ही अवश्य दोनों पक्षों में इस अवैध समझौते को सम्भव बनाया है।  गोएथे-संस्थान की दिसंबर 2011 की यह विज्ञप्ति प्रमाण है तलगेरी कि गतिविधियों का :

“Destination Deutsch” was the slogan of the first Asian conference for German teachers. It took place in New Delhi from 3-5 December 2011, organized by the Indian German Teachers Association (InDaF) and the International German Teachers Association (IDV). Marianne Hepp, IDV president, was delighted to address more than 350 participants. This translates into the biggest regional conference in IDV history. The German ambassador noticed that there were not enough seats for everybody in the multi-purpose hall. The host and president InDaF Professor Pramod Talgeri, announced proudly: “This is a big moment for us.”


कई बार तो पता नहीं चलता कि इनकी निष्ठा भारत के प्रति है या जर्मनी के प्रति।  जर्मन दूतावास की 17/11/2009 की एक प्रेस विज्ञप्ति में तलगेरी को जर्मनी के प्रान्त बाडेन व्युर्त्तेमबेर्ग के मुख्यमंत्री ग्युंटर एच. अयोत्तिन्गेर के साथ आये प्रतिनिधिमंडल का सदस्य बताया गया है।  यदि जर्मन हमारे देश में अपनी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए दम लगते हैं तो यह एक स्वाभाविक बात है, यह उनका काम है, परन्तु यदि एक भारतीय के षड्यंत्र के कारण वैश्विक स्तर पर एक कूटनीतिक संकट की स्थिति आन खड़ी हो, जिसमें दो देशों मे सम्बन्ध बिगड़ जाने का खतरा हो, तो ऐसे अपराधी को देशद्रोह का दंड मिलना चाहिए। 


इससे पहले भी तलगेरी अनगिनत घोटाले कर चुके हैं, जिनका विवरण मैं यहाँ स्थानाभाव के कारण नहीं दूँगा, परन्तु इनके बारे में मैं बहुत कुछ पहले भी लिख चुका हूँ, इन घोटालों में भारत सरकार तथा अन्य कई संस्थाओं को ठगा गया था।  परन्तु यू.पी.ऐ. सरकार के समय में इन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। 


संक्षेप में,  वेल्लर का काम था भारत में जर्मन सीखने वाले छात्रों में वृद्धि करना, वह उसने किया, तलगेरी का काम था अपने कलंक को छुपाना, वह उसने किया, और म्यूनिख और भारत के गोएथे-संस्थान ने अपनी दोस्ती निभाई, अपनी भाषा तथा साहित्य की क़ीमत पर।  मुझे और कोई कारण नज़र नहीं आता इस गौण समस्या को इतना तूल देने का कि जर्मन प्रधानमंत्री को इस में हस्तक्षेप करना पड़े। 


वैसे वेल्लर तथा तलगेरी ने मिल कर यदि भारत में जर्मन भाषा सीखने वालों की संख्या में भारी वृद्धि की तो उसमें पैसे का बड़ा हाथ था।  शिक्षिका ने अभी पढाना शुरू ही किया और बच्चों ने सीखना तो उन्हें फटाफट जर्मनी की सैर करा दी।  स्कूली बच्चों पर इस तरह गैर-क़ानूनी रूप से तीसरी भाषा के रूप में जर्मन थोपना हास्यास्पद तथा अनर्गल है, क्या कोई कल्पना कर सकता है कि भारतीय इस तरह जर्मनी या किसी अन्य यूरोपीय देश में जा कर हिंदी या तमिल वहाँ के स्कूलों पर थोप सकते हैं?


देखा जाये तो केंद्रीय विद्यालय संगठन ने गोएथे-संस्थान से उक्त समझौता कर के अपने देश, अपनी भाषा के प्रति निष्ठा नहीं दिखाई।  त्रिभाषी सूत्र का मुख्य उद्देश्य था देश के सभी भाषाई क्षेत्रों को भावनात्मक स्तर पर एक दूसरे से जोड़ना, और यदि छात्र उत्तर में संस्कृत को वरीयता देते हैं तो भी यह उद्देश्य पूरा होता है. आखिरकार जर्मनी और दूसरे यूरोपीय देशों में भी तो बच्चे लातिन सीखते हैं।  यह एक कसौटी पर कसा तथ्य है कि लातिन सीखने वाले बच्चे यूरोप की किसी अन्य भारोपीय भाषा में आसानी से महारत प्राप्त कर सकते हैं। वही बात संस्कृत में है, जो न भारत की हर इन्डो-यूरोपीय भाषा से, बल्कि कन्नड़ और तेलुगु जैसी द्रविड़ भाषाओँ से भी छात्रों को जोड़ती है।  संस्कृत प्राचीन ग्रीक की माँ है, जो लातिन की माँ है, और जो भारत-जेर्मैनिक, भारत-आर्य, भारत-रोमांस तथा भारत-स्लाव भाषाओँ की माँ है।  इस में विरोध काहे का! हर भारोपीय भाषा में संस्कृत के शब्दों की भरमार है, अतः बेहतर होगा कि दोनों सम्बन्धी देश अपने-अपने देश में अपनी-अपनी भाषा के लिए काम करें तथा भाषा के नाम पर एक दूसरे की भावनाओं से खिलवाड़ न करे। 


शौकिया तौर पर जर्मन सिखाए जाने देने का भारत सरकार का निर्णय उचित है।  जर्मनी को भी चाहिए कि वह वहाँ संध्याकालीन-क्लासों में हिंदी पढाये जाने का इंतजाम करें। 


इस सन्दर्भ में मुझे अंग्रेज़ी मीडिया की भूमिका हर तरह से संदिग्ध लगती है।  बिना मामले की गहराई में गए जर्मन के पक्ष में सम्पादकीय तक लिख मारने में उनकी नीयत पर शक होना स्वाभाविक है।  



मोदी : हिन्दी और विदेश नीति

 मोदी : हिन्दी और विदेश नीति
 - वेद प्रताप वैदिक 


एक अंग्रेजी अखबार की इस खबर ने मुझे आह्लादित कर दिया कि दक्षेस देशों से आए नेताओं से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदी में वार्तालाप किया। वैसे नवाज शरीफ, हामिद करजई, सुशील कोइराला आदि तो हिंदी खूब समझते हैं। इन नेताओं से मेरी दर्जनों बार बात हुई है पर इन्होंने मुझसे कभी भी अंग्रेजी में बात नहीं की। किंतु मोदी ने श्रीलंकाई नेता महिंद राजपक्षे से भी हिंदी में बात की। राजपक्षे हिंदी बिल्कुल भी नहीं समझते। तो क्या ऐसा हुआ होगा कि मोदी बोलते रहे होंगे और राजपक्षे बगलें झांकते रहे होंगे? न ऐसा हुआ है और न कभी ऐसा होता है। जब भी दो राष्ट्रों के नेता मिलते हैं तो वे दोनों अपनी-अपनी राष्ट्रभाषा में बोलते हैं और दोनों पक्षों के अनुवादक उस वार्तालाप का तत्काल अनुवाद करते चलते हैं। कूटनीतिक वार्ताओं में अनुवाद का बड़ा महत्व होता है। जब तक अनुवादक अनुवाद करते हैं, वार्ताकार को सोचने का समय मिल जाता है। दूसरा, यदि कोई गलत शब्द मुंह से निकल जाए तो अनुवादक के मत्थे मढ़कर मुख्य वार्ताकार बच निकल सकता है। तीसरा, शीर्ष वार्ताओं में राष्ट्रभाषा के प्रयोग से राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता प्रदर्शित होती है।


भारत का सौभाग्य है कि उसे मोदी जैसा प्रधानमंत्री मिल गया है। उन्होंने अपने पहले हफ्ते में ही दो ऐसे काम कर दिए, जो आज तक कोई भी प्रधानमंत्री नहीं कर सका। दक्षेस नेताओं को बुलाना और उनसे राष्ट्रभाषा में बात करना। इन दोनों कामों के लिए मैं इंदिराजी से लेकर अभी तक सभी प्रधानमंत्रियों से कहता रहा हूं, लेकिन इसे क्रियान्वित किया, अकेले मोदी ने। जिस भाषा में मोदी ने वोट माँगे, उसी में वे राज चला रहे हैं। इससे बड़ी ईमानदारी क्या हो सकती है। गुजरात का यह सपूत दो अन्य गुजराती महापुरुषों महर्षि दयानन्द और महात्मा गांधी के मार्ग पर चल पड़ा है। कौन जाने, इसे भी देश कभी महान प्रधानमंत्री के तौर पर जानेगा।


यों तो अटलजी ने मेरे अनुरोध पर विदेश मंत्री के तौर पर संयुक्तराष्ट्र में अपना भाषण हिंदी में दिया था, लेकिन वह मूल अंग्रेजी का हिंदी अनुवाद था। चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री के रूप में मालदीव जाते समय हवाई अड्डे पर मुझसे वादा किया था कि वे दक्षेस-सम्मेलन में हिंदी में बोलेंगे। उनका वह आशु हिंदी भाषण विलक्षण और मौलिक था। उसे करोड़ों लोगों ने सुना और समझा, लेकिन दोनों प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल में नेहरूकालीन ढर्रे को बदल न सके। नरसिंह राव जब चीन गए तो एक चीनी प्रोफेसर को हिंदी अनुवाद के लिए तैयार किया गया, लेकिन जब मैंने उससे पूछा कि आपसे काम क्यों नहीं लिया गया तो वह बोला कि आपके प्रधानमंत्री अचानक अंग्रेजी में ही बोलने लगे। नरसिंह राव जैसा कई देशी और विदेशी भाषाओं का पंडित भी अंग्रेजी की गुलामी से छुटकारा न पा सका। मोदी भी अंग्रेजी बोल सकते हैं। वे कामराज की तरह नहीं हैं, लेकिन उन्होंने जानबूझकर राजभाषा का प्रयोग किया। उन्होंने संविधान का मान बढ़ाया, भारत का मान बढ़ाया और हिंदी का मान बढ़ाया।


भारत को आजाद हुए 67 साल हो गए, लेकिन इस देश में एक भी प्रधानमंत्री ऐसा नहीं हुआ, जो इस राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता का ध्यान रखता रहा हो। भारत आजाद भी हो गया और आप प्रधानमंत्री भी बन गए, लेकिन रहे गुलाम के गुलाम ही। विदेशियों से स्वभाषा में व्यवहार करना तो बहुत दूर की बात है, हमारे प्रधानमंत्रियों को अपनी संसद में भी अंग्रेजी बोलते हुए कभी शर्म नहीं आई। सभी प्रधानमंत्री अपने अफसरों के अंग्रेजी में लिखे भाषणों को संसद में पढ़ते रहे। विदेशी अतिथि चाहे चीन का हो, रूस का हो, ईरान का हो, जर्मनी का हो या पाकिस्तान का ही क्यों न हो, हमारे नेता उससे अंग्रेजी में ही वार्तालाप करते रहे हैं। हर शीर्ष विदेशी मेहमान को हैदराबाद हाउस में राज-भोज दिया जाता है। मैं अब तक दर्जनों राजभोजों में शामिल हुआ हूं। उस समय जो भाषण भारत की तरफ से दिया जाता है, मुझे याद नहीं पड़ता कि उनमें से कभी कोई हिंदी में दिया गया हो। इसके विपरीत, विदेशी शासनाध्यक्ष अपना राजभोज-भाषण और कूटनीतिक वार्तालाप अपनी राष्ट्रभाषा में ही करते हैं। उनका सद्य: अनुवाद कभी कभार हिंदी में हुआ है। वरना वे भी अपनी भाषा का अनुवाद हमारे पुराने मालिकों, अंग्रेजों की भाषा अंग्रेजी में करते हैं। जब हम खुद गर्व से कहते हैं कि हम अंग्रेजों के भाषायी गुलाम हैं तो दूसरों को हमें खुश रखने में क्या एतराज हो सकता है? ब्रिटिश राष्ट्रकुल के जो देश हमारी तरह अंग्रेजों के भूतपूर्व गुलाम हैं, उनमें से ज्यादातर की हालत हमारे जैसी ही है। श्रीलंका और पाकिस्तान हमारे जैसे हैं, लेकिन नेपाल और अफगानिस्तान का भाषायी आचरण स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्रों के जैसा है। यदि हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री विदेशी अतिथियों के साथ हिंदी में बात करें तो वे अपने साथ अंग्रेजी का अनुवादक क्यों लाएंगे? यदि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज चीनी विदेश मंत्री से हिंदी में बात करेंगी तो वे अपने साथ चीनी-हिंदी अनुवादक को लाएंगे, लेकिन अगर सुषमाजी अंग्रेजी बोलने पर अड़ी रहीं तो चीनी विदेश मंत्री तब भी चीनी में ही बोलेगा, लेकिन अपने साथ अनुवादक अंग्रेजी का लाएगा।


सुषमा स्वराज अगर चाहें तो वे नया इतिहास बना सकती हैं। वे हिंदी आंदोलन में मेरे साथ बरसों पहले काम कर चुकी हैं। डॉ. लोहिया और मधु लिमये की भाषा-नीति को वे निष्ठापूर्वक मानती रही हैं। एक अंग्रेजी अखबार की यह खबर यदि सही है कि उन्होंने विदेशी अतिथियों से अपनी औपचारिक बातचीत भी अंग्रेजी में की है तो मेरे लिए यह दुख की बात है। मैं समझ नहीं पाता कि सुषमाजी जैसी विलक्षण प्रतिभा और वाग्शक्ति की स्वामिनी महिला भी अंग्रेजी के आतंक से ग्रस्त हो सकती हैं। अंग्रेजी का सहारा तो प्राय: वही लोग लेते हैं, जो प्रतिभा, परिश्रम और निष्ठा की अपनी कमी की भरपाई करना चाहते हैं। मोदी जैसा प्रधानमंत्री और सुषमा जैसी विदेश मंत्री! वाह, क्या जोड़ी है? यह जोड़ी चाहे तो हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में भी चलवा सकती है, लेकिन इसके पहले हमारे विदेश मंत्रालय से अंग्रेजी के विदेशी प्रभाव को घटाना होगा और राज-काज में स्वभाषाएं लानी होंगी। कूटनीति के क्षेत्र में स्वभाषा के प्रयोग की उपयोगिता स्वयंसिद्ध है।


सभी महाशक्तियाँ अंतरराष्ट्रीय संधियाँ और अपने कानूनी दस्तावेज अपनी भाषा में तैयार करने पर जोर देती हैं। हाँ, यदि कोई अत्यंत गोपनीय वार्ता करनी हो, जिसमें अनुवादक का रहना भी खतरनाक हो सकता है, वहां दो नेता अंग्रेजी क्या, किसी अफलातूनी भाषा में भी बात करें तो वह अनुचित नहीं है। वैसे सारा काम-काज स्वभाषा में हो तो गोपनीयता बनाए रखना ज्यादा आसान होता है। सुषमाजी को चाहिए कि वे हमारे विदेश मंत्रालय के अफसरों से हिंदी में ही बात करें और अपना अंदरूनी काम-काज वे यथासंभव हिंदी में ही करें। अंग्रेजी का पूर्ण बहिष्कार न करें, लेकिन उसका इस्तेमाल अमेरिका, ब्रिटेन,कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे पांच-छह अंग्रेजीभाषी देशों तक ही सीमित रखें। शेष महत्वपूर्ण देशों के साथ यदि हम उनकी भाषाओं में व्यवहार करेंगे तो हमारी कूटनीति में चार चाँद लग जाएँगे। हमारी पकड़ उन देशों की आम जनता तक हो जाएगी। हमारा अंतरराष्ट्रीय व्यापार चार गुना हो जाएगा। भारत को महाशक्ति बनाने का रास्ता आसान हो जाएगा। नरेंद्र मोदी के राज में भारत महाशक्ति नहीं बनेगा तो कब बनेगा। 


करणीय-अकरणीय की पक्षधरताएँ व नए प्रधानमन्त्री

नए प्रधानमन्त्री : करणीय-अकरणीय की पक्षधरताएँ
- (डॉ.) कविता वाचक्नवी

मोदी प्रधानमन्त्री पद सम्हालने के लिए विजयी और फिर राष्ट्रपति द्वारा आमन्त्रित क्या हुए, लोगों ने अपनी अपनी पसन्द नापसन्द की सूचियाँ बनानी शुरू कर दीं। मोदी समर्थकों ने ही एक हस्ताक्षर अभियान शुरू किया कि वे संस्कृत में शपथ लें, गंगा से पहले यमुना की सफाई योजना उन्हें शुरू करनी चाहिए, पाकिस्तान को बुलाने से दु:खी हैं मोदी समर्थक और भी इसी तरह की कई कर्तव्य-सूचियाँ (माँग-सूचियाँ) और जाने क्या-क्या। 


लोगों को समझना चाहिए कि मोदी अब भाजपा कार्यकर्ता-मात्र नहीं है, वे भारत के प्रधानमन्त्री हैं, उन्हें मात्र पार्टी के एजेण्डे के अनुसार नहीं अपितु देश और कूटनीति के अनुसार निर्णय लेने हैं। प्रोटोकॉल, अंतरराष्ट्रीय संबंध, विदेश नीति जैसे हजारों मुद्दे इस से जुड़े हैं। प्रधानमंत्री को अपने एजेंडे पर चलाने की जिदों के चलते ही मोरारजी सरकार जैसी सशक्त रूप से आई सरकार दूसरे लिप्सा और अधिकार की इच्छा वालों द्वारा धराशायी कर दी गई थी। इसलिए प्रधानमन्त्री यह करें, वह न करें, यह करना चाहिए, वह नहीं करना चाहिए आदि उंगली पकड़ कर चलाने की कोशिश जैसे हैं, थोपने जैसा है, इनमें दूरगामी सोच व राष्ट्रीय चिन्तन का अभाव है। भगवान के लिए उन्हें अपने तरीके से काम कर लेने दें। उनका तरीका कितना सही है, यह गुजरात में प्रमाणित हो चुका है। इसलिए बच्चों की तरह नेशनल ओब्जेक्टिव्स का अभाव न दिखाएँ और न ही विवाद खड़े करने वाले मुद्दों को हवा दें, देश बहुत बड़े परिवर्तन के मुहाने पर खड़ा है, जनता की असीम आकांक्षाएँ अब किच-किच की राजनीति से उकता कर नयी कार्यप्रणाली के लिए एकजुट हुई हैं, उनका मान करें। 

देश अपनी पसन्द नापसन्द से बड़ी चीज होती है, यह समझने की जरूरत है। राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी पसंद नापसन्द न थोपें। जैसे प्रणव मुखर्जी भले ही कॉंग्रेस के व्यक्ति हैं किन्तु उस से पहले वे भारत के राष्ट्रपति हैं और उन्होने विचारधारा को भूल कर अपने राष्ट्रीय कर्तव्य को निभाते हुए नए प्रधानमंत्री का सहर्ष स्वागत सम्मान किया, क्योंकि जब आप पद पर होते हैं तो उसकी गरिमा और कर्तव्य आपकी निजी इच्छा-अनिच्छा व पसन्द-नापसन्द से बड़े होते हैं। मोदी जी भी पार्टी- विरोध को लेकर राष्ट्रपति की अवमानना नहीं कर सकते, वे सादर उनसे मिलने गए क्योंकि यही राज/राष्ट्र नीति है। बहुमत वाले दल के संसदीय नेता को राष्ट्रपति के पास जाना ही होता है। इसलिए इन सब मामलों में निजी इच्छा-अनिच्छा या निजी प्रेम-बैर / पसन्द -नापसन्द घुसाना बंद करें। 

यह बँटवारे की राजनीति है । इसलिए अपनी इच्छा-अनिच्छा को करणीय-अकरणीय का नाम देकर देश को चलाने में हस्तक्षेप की कोशिश न करें। जब सभी सार्क देशों को आमन्त्रित किया गया है तो किसी एक देश को आमन्त्रण न देना, उसका घोषित बहिष्कार व उसे स्थायी रूप से शत्रुश्रेणी में डालना है, जो देशहित में कदापि नहीं। यह क्रिकेट मैच नहीं है कि क्रिकेट टीम को आमन्त्रण का मुद्दा हो, यह राष्ट्राध्यक्ष के सम्मान का मामला है और कोई भी कभी देश दूसरे राष्ट्राध्यक्ष का अपमान नहीं कर सकता, जब तक कि प्रकट रूप में पूरी तरह युद्ध की स्थिति न हो। अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों, कूटनीति, विदेश नीति, राष्ट्रीय प्रोटोकॉल, औपचारिकताएँ आदि ढेरों चीजें इसमें संयुत हैं, उन्हें समझे बिना स्वयं को सर्वनिर्णयसम्पन्न समझना बंद करना चाहिए और जनता को विवाद में धकेलने का खेल नहीं खेलना चाहिए। राजनैतिक पूर्वाग्रहों को लेकर पार्टी की राजनीति हो सकती हैं, राष्ट्रनीति नहीं चल सकती। कॉंग्रेस ने यही सब कर तो देश को बर्बाद किया कि अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों और अपनी पसन्द-नापसन्द को पूरे देश पर थोपा। अब देश उस से ऊब चुका है। नई सरकार को नई तरह से और बड़प्पनपूर्वक निर्णय लेते हुए अपनी कार्यप्रणाली तय कर लेने दीजिए। अभी तो सरकार सत्ता में आई भी नहीं। 

और हाँ, जो लोग यह आशा लगाए बैठे हैं कि नई सरकार के पास कोई जादू की छड़ी है कि घुमाई और कायाकल्प हो जाएगा देश का, वे भ्रम में हैं। 60 वर्ष से अधिक तक ध्वस्त, बर्बाद व नष्ट किए गए देश को अधिक नष्ट होने से तो इस क्षण से रोका जा सकता है पर जो लुट और बर्बाद हो चुका है उसे लौटाना कभी संभव हो सकता है क्या ? वैसे भी तोड़ना और नष्ट करना किसी भी चीज को बहुत सरल होता है, निर्माण करना बहुत कठिन व समयसाध्य / श्रमसाध्य होता है ; एक मकान को बनाने और तोड़ने का उदाहरण देख लिया जाए। इसलिए यदि आप निर्माण में सहयोग देना चाहते हैं तो देश के इस कायाकल्प में नई सरकार का सहयोग करना चाहिए और सब से बढ़कर अपने दैनन्दिन जीवन में राष्ट्रनिर्माण के कर्तव्यों और अपने आचरण में राष्ट्रीय कर्तव्यों, मर्यादा और उच्चादर्शों का समावेश करना होगा यही हम सब का सहयोग होगा।


यह लोकतंत्र की अपूर्व विजय है

यह लोकतंत्र की अपूर्व विजय है
डॉ. वेदप्रताप वैदिक


यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की अपूर्व विजय है। टीवी चैनलों के कुछ एंकरों ने पूछा कि 2014 की विजय, 1971 और 1984 की विजय से भी बड़ी कैसे है? 1971 में इंदिरा गांधी को 352 सीटें मिली थीं और 1984 में राजीव गांधी को 410 सीटें मिली थीं। भाजपा और मोदी को तो अभी 350 सीटें भी नहीं मिलीं हैं और आप इस जीत को अपूर्व कह रहे हैं? इसका कारण क्या है?

ज़रा याद करें कि 1971 में क्या हुआ था? इंदिराजी पाँच साल तक भारत की प्रधानमंत्री रह चुकी थीं। नेहरु की बेटी थीं। कांग्रेस अध्यक्ष होने का भी उनका अनुभव था। इसके अलावा उन्होंने कांग्रेस के सारे खुर्राट नेताओं को पटकनी मारकर इंदिरा कांग्रेस खड़ी कर दी थी। बैंकों के राष्ट्रीयकरण और उसके बाद गरीबी हटाओ के नारे ने देश का ध्यान खींचा था। 1971 के चुनाव में क्या हुआ? वे कम सत्ता से ज्यादा सत्ता में आ गईं लेकिन मोदी मात्र मुख्यमंत्री थे। वे किसी प्रधानमंत्री के बेटे भी नहीं थे। वे पार्टी अध्यक्ष भी नहीं रहे। उनका अखिल भारतीय अनुभव भी अत्यंत सीमित था। वे एक ऐसी पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे, जो दस साल से सत्ता से बाहर थी और जिसका नेतृत्व भी एकजुट नहीं था। लेकिन 2014 के चुनाव में क्या हुआ? पहली बार एक प्रांतीय नेता ने देश का दौरा किया। कोई प्रांत नहीं छोड़ा। करोड़ों लोगों को साक्षात् संबोधित किया। लाखों कि.मी. यात्राएं कीं। दस साल प्रधानमंत्री रहने पर भी जितना देश को मनमोहनसिंह ने देखा, उससे भी ज्यादा देश को साल भर में जाना और पहचाना मोदी ने। मोदी की वजह से मतदान का जो प्रतिशत बढ़ा, वह अपूर्व था। मोदी की सभाओं में जैसा उत्साह का ज्वार उमड़ता था, वैसे मैंने 1952 से अब तक के किसी चुनाव में नहीं देखा। इसीलिए पिछले दो माह से मैं कहता रहा कि भाजपा-गठबंधन को 300 से ज्यादा सीटें मिलेंगी। सारे लोकमत और लगभग सभी मतदानों के अंदाजी घोड़े गलत साबित हुए। विपक्ष पहले भी हारा है लेकिन कांग्रेस जैसी महान पार्टी का आकार हाथी से सिकुड़कर बकरी का रह जाए, क्या यह अपूर्व नहीं है?

जहाँ तक 1984 की विजय का प्रश्न है, वह राजीव की नहीं, शहीद इंदिरा गांधी की विजय थी। शहीद इंदिराजी को विरोधी दलों के समर्थकों ने भी वोट दिए थे। वह चुनाव नहीं था। वह एक महान शहीद को राष्ट्र की श्रद्धांजलि थी। 2014 के वोट ने फिरोज गांधी-परिवार को राजनीतिक श्रद्धांजलि दे दी है। इंदिराजी चुनाव के पहले शहीद हुई थीं और फिरोज गांधी-परिवार चुनाव के बाद शहीद हो गया है। 2014 के चुनाव में लोगों को 1984 की तरह गुस्सा नहीं था। निराशा थी। देश को लगा कि वह ठगा गया है। उसने अपना देश अ-नेताओं को थमा दिया है। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे सज्जन में प्रधानमंत्री की कोई भी कुव्वत नहीं है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का श्रेय सबसे ज्यादा मैं किसी को देता हूँ तो वह सोनियाजी और मनमोहनसिंहजी को देता हूँ। राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो ज्ञानी जैलसिंह की कृपा से बने लेकिन नरेंद्र मोदी बन रहे हैं तो वे अपने पुरुषार्थ से बन रहे हैं। कांग्रेस को अपने किए और अनकिए का फल भुगतना ही था। उसे तो हारना ही था। नरेंद्र मोदी की खूबी यह है कि उन्होंने इस हार को अपूर्व और एतिहासिक बना दिया। कहा भी है कि ‘आशिक का जनाजा है, जरा धूम से निकले’।

इस चुनाव की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें 1971 की तरह कोई नाटकीयता नहीं थी और इसमें 1984 की तरह खौलता हुआ गुस्सा नहीं था। एक ठंडी समझ थी। इस गंभीर समझ के कारण भारत के लोगों ने भारतीय राजनीति के जातिवादी और सांप्रदायिक चरित्र को बदल दिया। प्रांतों के जातिवादी दिग्गजों ने जैसी पटकनी इस चुनाव में खाई, क्या इससे पहले किसी चुनाव में खाई? लालू, नीतिश, मुलायम, मायावती, देवेगौड़ा आदि कहाँ हैं? क्या हुआ, उनके जातीय वोट-बैंकों का? भारत के नागरिकों को मवेशियों की तरह थोकबंद वोट डालने से इस बार मुक्ति मिली हैं जहाँ तक वोटों के सांप्रदायिक बँटवारे का सवाल है, वह अपरिहार्य था। उसे टाला नहीं जा सकता था। लेकिन उसे ठीक से समझा जाना चाहिए। अल्पसंख्यकों ने मोदी को जिस वजह से वोट नहीं दिए, वह समझ में आती है लेकिन देश के अन्य सभी लोगों ने मोदी को जो वोट दिए, उसकी वजह अल्पसंख्यक नहीं थे। याने वास्तव में वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को वोट नहीं है। वह विकास का वोट था। आशा का वोट था। वह ठगी के विरुद्ध वोट था। उसके पीछे किसी प्रकार की सांप्रदायिक संकीर्णता या घृणा नहीं थी। सच पूछा जाए तो 2014 के चुनाव में सांप्रदायिकता कोई मुद्दा ही नहीं था। जाहिर है कि प्रधानमंत्री मोदी ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की राह पर निष्ठापूर्वक चलेंगे तो जो वोट उन्हें 2014 में नहीं मिले हैं, वे भी 2019 में उन्हें मिलेंगे।

इस चुनाव में भारतीय राजनीति की शक्ल को एक और ढंग से बदला है। इसने भाजपा को अखिल भारतीय दल और कॉंग्रेस को प्रांतीय दल बना दिया है। एकाध राज्य को छोड़कर सभी राज्यों में भाजपा का खाता खुल गया है जबकि कई राज्यों में कांग्रेस का सूंपड़ा ही साफ है। जहाँ वह बची है, वहाँ भी एकदम लहूलुहान होकर! महान से लहूलुहान, ऐसी दुर्गति पहली बार हुई है।

पहली बार ऐसा व्यक्ति भारत का प्रधानमंत्री बना है, जिसकी माँ घरेलू सेविका का काम करके अपने बच्चों का पोषण और शिक्षण करती रही है। वह स्वयं स्टेशन पर चाय बेचकर अपना गुजारा करता था। यह देश के 100 करोड़ गरीब और मजलूमों से तदाकार होना नहीं है तो क्या है? ला.ब. शास्त्रीजी के अलावा नरेंद्र मोदी ऐसे एकमात्र प्रधानमंत्री बने हैं, जिनकी अपनी माँ के चरणस्पर्श करके आशीर्वाद प्राप्त किया है। ऐसे प्रधानमंत्री को तो वर्ग-चेतना के हामी कम्युनिस्टों को भी क्या सलाम नहीं करना चाहिए?



सरबजीतों को यों मरने न दें


- डॉ. वेद प्रताप वैदिक 


'दो से ज्यादा रहे होंगे सरबजीत सिंह के हत्यारे'सरबजीत सिंह अगर भारतीय जासूस होता या आतंकवादी होता तो क्या हमारी सरकार को पता नहीं होता? सरकार को सरबजीत के बारे में सब कुछ पता था| पता ही नहीं था, उसे गहरा विश्वास था कि वह जासूस नहीं था और लाहौर में हुए बम विस्फोट से उसका कुछ लेना-देना नहीं था| यह तथ्य सरबजीत की हत्या के बाद आए प्रधानमंत्री और विदेश सचिव के बयानों से भी सिद्घ होता है तो फिर क्या वजह है कि सरबजीत की रिहाई और रक्षा के प्रति हमारी सरकार ने इतना ढुल-मुल रवैया अपना रखा था? पहचान की गड़बड़ी के कारण असली अपराधी मंजीतसिंह छूट गया और उसकी जगह सरबजीत फंस गया| उसने 22 साल कोट लखपत की जेल में काट दिए और अब उसकी हत्या भी हो गई| इस नृशंस कांड के लिए आखिर किसे जिम्मेदार ठहराया जाए?

हत्या और मृत्युदंड : शहीद सरबजीत और आतंकी कसाब

- कविता वाचक्नवी


सरबजीत की पाकिस्तान की जेल में कर दी गई हत्या के बाद  देश और देश की सरकार के कारिन्दे पहले से तैयार कर रखे गए बयान पढ़ने में मशगूल हैं। जो लोग कसाब को संवैधानिक ढंग से दिए गए दण्ड पर विलाप कर रहे थे, भारत को कोस रहे थे, वे कविता-कहानी और अपनी पुस्तकों और प्रकाशन के आयोजन की चर्चाओं में मस्त व्यस्त हैं। 



चीन की अशोभनीय पैंतरेबाजियाँ



- डॉ. वेदप्रताप वैदिक 



चीन गज़ब का पैंतरेबाज मुल्क है| एक ओर वह भव्य और गरिमामय महाशक्ति का आचरण करते हुए दिखाई देना चाहता है और दूसरी ओर वह ओछी छेड़खानियों से बाज नहीं आता| अभी 15 अप्रैल को उसकी फौज ने सीमांत के दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में घुसकर अपने तंबू खड़े कर दिए हैं| वे ​नियंत्रण-रेखा के पार भारतीय सीमा में 10 किमी तक अंदर घुस आए हैं| लगभग ऐसा ही उन्होंने जून 1986 में सोमदोरोंग चू में किया था|वहाँ से उन्होंने 1995 में अपने आप वापसी करके भारत को प्रसन्न कर दिया था|

Nathuram Godse's defense speech in court


2nd October 1869- 30th January 1948 .


More than six decades after his assassination Mohandas Karamchand Gandhi still remains,  the most iconic figure of modern India. He was one of the most widely photographed men of his time; an entire industry of nationalist prints extolled his life; and his statues abound throughout India and, increasingly, the rest of the world .

On 30 January 1948, Gandhi was shot while he was walking to a platform from which he was to address a prayer meeting. The assassin, Nathuram Godse, was a Hindu nationalist with links to the extremist Hindu Mahasabha, who held Gandhi guilty of favouring Pakistan and strongly opposed the doctrine of nonviolence.



SOME FACTS ABOUT NATHURAM GHODSE.

Nathuram Ghodse was often a misunderstood character. He was referred to as a Hindu fanatic. It was often hard to understand Godse because the Government of India had suppressed information about him. His court statements, letters etc. were all banned from the public until recently. Judging from his writings one thing becomes very clear – He was no fanatic. His court statements were very well read out and indicated a calm and collected mental disposition. He never even once speaks ill about Gandhi as a person, but only attacks Gandhi’s policies which caused ruin and untold misery to Hindus. Another interesting point to note was that Godse had been working with the Hindu refugees fleeing from Pakistan. He had seen the horrible atrocities committed on them. Despite this Godse did not harm even single Muslim in India which he could easily have. So it would be a grave mistake to call him a Hindu fanatic.


Nathu Ram Godse, touched his feet to pay respect to the Father of Nation prior to shooting Gandhi.  He was agitated over partition of India which Mahatma had agreed. Moreover, Gandhi was adamant to give Pakistan a sum of Rs 550 Million as compensation. Prime Minister Nehru and his cabinet had passed a resolution not to give Pakistan the said amount as the latter has waged tribal war against India in Kashmir. Gandhi went on fast to oppose this and ultimately cabinet had to revert its decision. This agitated Godse more.

The final remains (ashes) of Godse are still kept in his house according to his will which he wrote prior to being hanged.  Godse presented historic arguments during his case though he did not defend himself.


The judge was moved by his knowledge and commented "Though he was bound by the provisions of law to write death sentence for Godse, but if the public present in the court room was to pass a judgement, the decision would probably have gone in favor of the accused". According to the will of Godse, his ashes to be flown into Sindhu river, if ever and when India and Pakistan become one nation again. Until then they are to be preserved.


Nathuram Godse's defense speech in court

अफगानिस्तान में भारत की भूमिका


अफगानिस्तान में भारत की भूमिका
- डॉ. वेदप्रताप वैदिक



 बराक ओबामा ने घोषणा की है कि जुलाई 2011 यानी अगले महीने से अमेरिकी फौजों की अफगानिस्तान से वापसी शुरू हो जाएगी। इसका अर्थ यह हुआ कि पिछले दस वर्षों से दक्षिण एशिया में जो राजनीति चल रही है, उसमें कुछ बुनियादी बदलाव आने शुरू हो जाएँगे। ये बदलाव क्या-क्या हो सकते हैं? 


भारत बहुवचन में बदल जायेगा : कश्मीर को बनाया जा रहा है, प्रेत-प्रश्न

कश्मीर को बनाया जा रहा है, प्रेत-प्रश्न
-प्रभु जोशी




अब हमें यह स्वीकारने में कोई शर्म नहीं अनुभव होना चाहिए कि भारत एक निहायत ही कमजोर बौद्धिक आधार वाला बावला समाज है, जिसे इन दिनों ‘उदारीकरण‘ के उन्माद ने ऐसे गुब्बारे में बदल दिया है, जिसकी हवा किसी भी दिन आसानी से निकाली जा सकती है। बस इतना भर मान लेना चाहिए कि चूँकि अमेरिका उसे एक बड़े बाजार के रूप में देख रहा है, इसलिए उसका ‘फुगावा‘, हाथी के उन दाँतों की तरह बाहर दिख रहा है, जिनसे खाने का काम लेना असंभव है।


यहाँ यह नहीं भूल जाना चाहिए कि ‘रिंग-काम्बिनेशन‘ की तरह ख्यात सूचना के निर्माण, विपणन और वितरण वाली कम्पनियों द्वारा धीरे-धीरे उसे एक खोखले मुगालते में उतार दिया गया है कि वह इस भूमण्डलीकृत विश्व में स्वयं को सूचना-प्रौद्योगिकी का महारथी समझने लगा है, जबकि हकीकतन उसकी हैसियत स्वर्णाभूषणों की दूकानों के बाहर बैठे रहने वाले उन कारीगरों की-सी है, जो गहने चमकाने का काम करते हैं। दरअस्ल, माइक्रोसाफ्ट उत्पाद बनाता है और भारत उसको महज अपडेट कने की कारीगरी करता है। जहाँ तक चीन का सवाल है, उसके सामने इसकी हैसियत उस आत्मग्रस्त ऊँट की तरह है, जिसमें पहाड़ की तरफ देखने वाली सहज बुद्धि का अकाल पड़ गया है। उसकी सरकार भी देश की भूख और भूगोल को भूल कर भुलावे को ऐसी भोंगली में घुस गयी है, जहाँ से वह सिर्फ स्टाक एक्सचेंज के ग्राफ में डुंकरते साण्ड के सींगों के सहारे अर्थ-व्यवस्था में उछाल की उम्मीद करती रहती है। उसकी सफलता के सारे सूत्र ‘विकास दर‘ के दरदराते नांदीपाठ में समाहित है। वह लगातार ‘बाजार-निर्मित आशावाद‘ के आधार पर यह प्रचारित कर रही है कि जल्दी ही आंकड़ा दस के पार हुआ कि भारत मंदी की मारामारी में भी महाबली हो जायेगा, लेकिन असलियत यह कि वह बली नहीं, निर्बली है। इसका प्रमाण कश्मीर के मुद्दे पर उसकी सत्ता के कर्णधारों के वे उद्गार हैं, जो सांध्यभाषा में मूलतः लीपापोती की लीला में लगे हुए हैं।


अब यह समूचे देश को यह बात समझ में आ चुकी है कि केन्द्र के कर्णधारों ने अपनी भू-राजनीतिक समझ को ताक पर रखकर घाटी में फैलती आग के आगे पर्दा खींच दिया है- और उस पर्दे पर वह ‘गरीब भारत‘ के हिस्से की पूँजी को फूँकते वे, इण्डिया के जश्न, जोश और जुनून में है। उनके कानों में अभी तक एक ही धुन गूँजती रही है, जिसमें इंडिया के बुलाये जाने का खेलराग है। जबकि कूटनीति के कुरूक्षेत्र में असली खेल चीन का चल रहा है, जिसकी तरफ उनका ध्यान ही नहीं है।


पिछले दिनों जब कश्मीर की राजनीति के युवराज ने लगभग ‘हड़काऊ‘ शैली में यह कह दिया कि ‘कश्मीर को बार-बार भारत का अभिन्न अंग बताने के होहल्ले की जरूरत नहीं है, कश्मीर का भारत में ‘विलय‘ नहीं हुआ है‘, तो सत्ताधीशों द्वारा उल्टे मीडिया को कोसना शुरू हो गया कि ‘वे उमर की सहज-सरल बात को बतंगड़ बनाये दे रहे हैं ताकि वह ‘भड़काऊ‘ बन सके‘। वे तो विलय संबंधी ऐतिहासिक करार की तरफ इशारा भर कर रहे हैं। निश्चय ही यह समझ से परे है कि वे ऐसी भोली भाषा के आवरण में उमर की एक नादान नहीं बल्कि खतरनाक टिप्पणी के भीतर लपट बन सकने वाली चिनगारी को क्यों छुपा रहे हैं ? जबकि, उमर ‘इतिहास के प्रेत‘ को फिर से जगाने की कपटपूर्ण कोशिश कर रहे हैं। यह उनके दादा की आँख में जीवन भर ‘अर्द्धमृत से दफ्न स्वप्न‘ में पूर्ण प्राण  फूँकने की दबी हुई दुर्दान्त इच्छा का सिर उठाना ही है। क्योंकि उनके दादा में भी नेहरू से मैत्री के बावजूद सन् तिरेपन के आसपास ‘आजाद कश्मीर‘ का उमाला उठ पड़ा था।


कहने की जरूरत नहीं कि यह ऐसे ही नहीं हो गया क्योंकि उमर के दो वर्षीय शासन के दौरान ही ऐसा पहली बार हुआ कि छोटे-छोटे मासूम से दिखाई देने वाले किशारों तक के हाथों में पत्थर आ गये। उमर ने अपनी टिप्पणी में साफ लफ्जों में यह कह दिया कि कश्मीर के युवाओं द्वारा हिंस्र रास्ता चुन लेने के पीछे आर्थिक बदहाली या बेरोजगारी जैसे कारण नहीं है। यह शत-प्रतिशत सही भी है कि क्योंकि कश्मीर को पैकेज के रूप में केन्द्र अपना खजाना उदारता से उलीचता रहा है। सन् 89 से अभी तक वह अस्सी हजार करोड़ रूपये दे चुका है, जिसमें से लगभग सत्तर हजार करोड़ के खर्च का राज्य के पास कोई हिसाब-किताब ही नहीं है कि वह कहाँ और कैसे खर्च किया गया। और सर्वदलीय प्रतिनिधि मण्डल की अनुशंसा पर प्रधानमंत्री सौ करोड़ के पैकेज की घोषणा पहले ही कर चुके हैं।


कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘कन्ज्यूमरिज्म‘ की वकालत करने वाली हमारी इस सरकार को यह इलहाम हो चुका हो कि वह कश्मीर में शांति और साम्प्रदायिक-सौहार्द्र का इस तरह से पूँजी के बल पर ‘सुरक्षित सौदा‘ पटा लेगी। वह कदाचित यह भूल चुकी है कि कश्मीर अब देश का परम्परागत अर्थों में राज्य नहीं बल्कि अलगाववादियों की सुनियोजित रणनीति ने उसे एक ‘इस्लामिक इथनोस्केप‘ में बदल दिया है। कश्मीर से गैर-मुस्लिम आबादी के प्रतिशत को हिंसात्मक कार्यवाही से नृशंस अलगाववादियों ने जैसे ही कम किया, उसके अंदर शत-प्रतिशत की उतावली इतनी बढ़ चुकी है कि वे ‘कश्मीरी पण्डितों‘ के पश्चात् अब ‘सिक्खों‘ को भी कश्मीर से खदेड़ कर बाहर कर देना चाहते हैं। उन्हें अब किसी किस्म का कोई पैकेज नहीं ‘भूगोल के बंटवारे‘ के साथ ‘पूरी आजादी‘ चाहिए। अब वे जर्जर हो चुके पाकिस्तान के बलबूते पर नहीं, चीन के पाकिस्तान पर बढ़े वरदहस्त में संभावना देख रहे हैं। क्योंकि, चीन ने ‘पाक अधिकृत कश्मीर‘ में करोड़ों नहीं, अरबों डॉलर का निवेश किया है और उसे वह ‘उत्तरी पाकिस्तान‘ कहता है। हाल ही में अमेरिका ने वहाँ  लगभग दस हजार चीनी सैनिकों की उपस्थिति के बारे में सूचना दी थी।  हालाँकि चीन ने इसके प्रति-उत्तर में कहा कि वह वहाँ बाढ़ की संकटग्रस्त स्थिति में मानवीय मदद के लिए पहुँचा  है, लेकिन ये शत-प्रतिशत कूटनीतिक झूठ हैं। उसकी पूरी रूचि सामरिक आधार की वजह से है। उन्होंने पाकिस्तान और चीन के बीच आमदरफ्त के लिए कराकोरम राजमार्ग पूरा कर लिया है- स्मरण रहे यह वही इलाका है, जिसे पाकिस्तान ने जंग के जरिये हमसे हथियाया और सड़क निर्माण हेतु चीन के जिम्मे कर दिया। यह एक तरह से उस क्षेत्र का ‘सामरिक हस्तान्तरण‘ है।


बेचारे जाॅर्ज फर्नांडिस ने केन्द्र में रक्षामंत्री रहते हुए एक दफा यह कह भर दिया था, जो कि सौ-फीसदी सही भी था कि ‘पाकिस्तान नहीं, हमारा पहले नम्बर का शत्रु तो चीन है।‘ लेकिन, इस वक्तव्य से हंगामा मच गया। हालाँकि यह एक रक्षामंत्री की कूटनीतिक दृष्टि से एक असावधान टिप्पणी थी, लेकिन वही हमारी सीमाओं का कटु सत्य भी था, और है भी। उसने पिछले एक दशक में अपनी कूटनीतिक हैसियत ऐसी बना ली है कि हमारे सारे पड़ोसी अर्थात् नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार भी पूरी तरह से चीन की छत्रछाया में जा चुके हैं। आज स्थिति यह है कि सामरिक स्तर पर भारत एकदम अकेला है और परिणामस्वरूप वह बार-बार कश्मीर के बारे में जबानी जमा खर्च से ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। कश्मीर के मुद्दे पर अभी तक रूस की तरह कोई मुल्क स्पष्ट पक्षधरता के साथ सामने नहीं है।


मुझे याद है, बीबीसी आज तक के हमारे कश्मीर को औपनिवेशिक धूर्तता के चलते अपने प्रसारणों में ‘भारत अधिकृत कश्मीर‘ कहता है। एकदफा दिल्ली की एक कार्यशाला में आये बीबीसी के एक प्रोड्यूसर से मैंने बीबीसी की बहु-प्रचारित तटस्थता की नीति के विरूद्ध टिप्पणी करते हुए अपनी आपत्ति दर्ज की कि जिस निष्पक्ष प्रसारण की आप बार-बार बढ़-चढ़ कर बात करते हैं, मैं पूछना चाहता हूँ कि फ़ॉकलैण्ड के युद्ध के समय बीबीसी ने फ़ॉकलैण्ड में श्रीमती मार्गरेट थेचर द्वारा की कार्यवाही के विरोध में एक भी शब्द नहीं कहा। कश्मीर के मामले में बीबीसी हमेशा थोड़ा बहुत भू-भाग ले देकर झगड़ा निपटाने की बात करता है, लेकिन क्या आपने अभी तक फ़ॉकलैण्ड के बारे में सोचा, जिस पर आपने अब तक अपना कब्जा नहीं छोड़ा है, जबकि वह ब्रिटेन से लगभग ढाई हजार किलोमीटर दूर अर्जेन्टाइना के निकट है। और आप साढ़े सात सौ साल से वहाँ लड़ रहे हैं ? कश्मीर के संदर्भ में जब-तब इमनेस्टी इंटरनेशनल के बहाने से भारत की भर्त्सना की जाती रही है।


बहरहाल, कश्मीर में जिस तरह की स्थिति बन चुकी है, भारत को पश्चिम के नैतिकतावाद के झाँसे में आकर मुल्क को एक बार फिर विखण्डन की ओर धकेलने की सोचना भी नहीं चाहिए। ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल‘ भारत को अपनी रिपोर्ट में मानवाधिकार उल्लंघन के लिए धिक्कारती रहे, लेकिन हमने उसे यह तय करने का अधिकार कतई नहीं दिया है कि वह मानवतावाद का प्रश्न उठाते हुए हमारी भू-राजनीति समस्या को बढ़ा कर अधिक विराट बनाते हुए, पाकिस्तान के पक्ष में परोक्ष आधार गढ़ती रहे।


पश्चिम की प्रेस में जख्मी जहन और आँसूतोड़ भाषा में लिखे गये लेखों से जो मानवतावादी रूदन भारत की भर्त्सना में चलता चला आ रहा है, उसमें ढेर सारे भारतीय भी हैं, और ये ही लोग है, जिन्होंने भारत के इस अभिन्न भूभाग को ग्रीस-तुर्की, जर्मनी-चेकोस्लोवाकिया, पौलेण्ड-जर्मनी, बोसनिया-सर्बिया ही नहीं, क्यूबा और अमेरिका की तरह व्याख्यायित करने की धूर्तता शुरू कर रखी है। हमें इस तरह की व्याख्याओं के दबाव में आकर भारतीय सेना को कश्मीर से हटाये जाने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोचना चाहिए। क्योंकि कश्मीर एक बहुत संवेदनशील राज्य नहीं बल्कि खासा विस्फोटक सीमावर्ती राज्य है, जहां से सेना के हटाने का अर्थ कश्मीर को भारत से अलग करने की पूरी गारंटी दे देना है। यहाँ तक कि वहाँ सीमित स्वायत्ता की बात करना यानी दृष्टिहीन राजनीति के द्वारा रचा जाने वाला ‘पैराडाइज लास्ट‘ ही होगा।


अंत में मुझे एल्विन टाॅफलर द्वारा सातवें दशक के उत्तरार्द्ध में बड़े राष्ट्रों के विघटन की जो भविष्योक्ति अपनी पुस्तक ‘तीसरी लहर‘ में की गयी थी, उसकी याद आ रही है, कश्मीर से सेना के हराते ही वह सच सिद्ध हो जायेगी। क्योंकि, रूस में सबसे पहले आर्मेनिया में ही उथल-पुथल शुरू हुई थी। तब किसी पता था कि एक दिन महाशक्ति की तरह जाना-जाने वाला रूस मात्र दस वर्षों के भीतर सोलह टुकड़ों में विखण्डित हो जायेगा। लेकिन नब्बे के दशक में अचानक गोर्बाचोव नामक एक जनप्रिय नेता का उदय होता है और वह ‘ग्लासनोस्त‘ तथा ‘पेरोस्त्रोइका‘ जैसी उदारवादी धारणाओं को नवोन्मेष के नाम पर लागू करता है, जिसके चलते ‘आधार‘ (बेस) में परिवर्तन होता है और ‘अधिरचना‘ (सुपर स्ट्रक्चर) ढह जाती है। हमारे यहाँ भी परिवर्तन की शुरूआत ‘आधार‘ में की गई और अभी हमारी सारी ‘अधिरचना‘ की चूलें हिल चुकी हैं। एक चैतरफा बदहवासी है, भूख है, बढ़ती बेरोजगारी है, खाद्य सामग्री महँगाई है- भ्रष्टाचार की दर ऊँची है और विकास के ग्राफ की असमानता है, इसीलिए अब हमें हमारा बुन्देलखण्ड, हमारा बघेलखण्ड चाहिए। ऐसी माँगों के बीच यदि कश्मीर को स्वायत्ता देने की ओर हम बढ़ते हैं तो बहुत जल्दी भारत भी बहुवचन में बदल जायेगा।


निश्चय ही इसके टुकड़े रूस से कहीं ज्यादा होंगे। हम चाहेंगे कि ऐसे सोच से हमारी सरकार दूर ही रहे। क्योंकि, हम कभी नहीं चाहेंगे कि एक दिन इतिहास के सफों पर वक्त हमारे प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह को पगड़ी में गोर्बाचोव कहने को मजबूर हो जाये।



- 4, संवाद नगर
इन्दौर
prabhu.joshi@gmail.com

अरुणाचल में मिली दुर्लभ भाषा


अरुणाचल में मिली दुर्लभ भाषा

कोरो बोलने वाला अरुणाचल का एक आदिवासी परिवार
(तस्वीर: एपी/क्रिस रेनियर)
शोधकर्ताओं ने भारत के सुदूर इलाक़े में एक ऐसी भाषा का पता लगाया है, जिसका वैज्ञानिकों को पता नहीं था.
इस भाषा को कोरो के नाम से जाना जाता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अपने भाषा समूह की दूसरी भाषाओं से एकदम अलग है लेकिन इस पर भी विलुप्त होने का ख़तरा मंडरा रहा है.
भाषाविदों के एक दल ने उत्तर-पूर्वी राज्य अरुणाचल प्रदेश में अपने अभियान के दौरान इस भाषा का पता लगाया.
यह दल नेशनल जियोग्राफ़िक की विलुप्त हो रही देशज भाषाओं पर एक विशेष परियोजना 'एंड्योरिंग वॉइसेस' का हिस्सा है.

दुर्लभ भाषा

शोधकर्ता तीन ऐसी भाषाओं की तलाश में थे जो सिर्फ़ एक छोटी से इलाक़े में बोली जाती है.
उन्होंने जब इस तीसरी भाषा को सुना और रिकॉर्ड किया तो उन्हें पता चला कि यह भाषा तो उन्होंने कभी सुनी ही नहीं थी और यह कहीं दर्ज भी नहीं की गई थी.
इस शोधदल के एक सदस्य डॉक्टर डेविड हैरिसन का कहना है, "हमें इस पर बहुत विचार नहीं करना पड़ा कि यह भाषा तो हर दृष्टि से एकदम अलग है."
यदि हम इस इलाक़े का दौरा करने में दस साल की देरी कर देते तो संभव था कि हमें इस भाषा का प्रयोग करने वाला एक व्यक्ति भी नहीं मिलता
ग्रेगरी एंडरसन, नेशनल जियोग्राफ़ि
भाषाविदों ने इस भाषा के हज़ारों शब्द रिकॉर्ड  किए और पाया कि यह भाषा उस इलाक़े में बोली जाने वाली दूसरी भाषाओं से एकदम अलग है.
कोरो भाषा तिब्बतो-बर्मन परिवार की भाषा है, जिसमें कुल मिलाकर 150 भाषाएँ हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह भाषा अपने परिवार या भाषा समूह की दूसरी भाषाओं से बिलकुल मेल नहीं खातीं.
यह माना जाता है कि इस समय दुनिया की 6909 भाषाओं में से आधी पर विलुप्त हो जाने का ख़तरा मंडरा रहा है. कोरो भी उनमें से एक है.
उनका कहना है कि कोरो भाषा 800 से 1200 लोग बोलते हैं लेकिन इसे कभी लिखा या दर्ज नहीं किया गया है.
नेशनल जियोग्राफ़िक के ग्रेगरी एंडरसन का कहना है, "हम एक ऐसी भाषा की तलाश में थे जो या तो विलुप्त होने की कगार पर है."
उनका कहना है, "यदि हम इस इलाक़े का दौरा करने में दस साल की देरी कर देते तो संभव था कि हमें इस भाषा का प्रयोग करने वाला एक व्यक्ति भी नहीं मिलता."
यह टीम कोरो भाषा पर अपना शोध जारी रखने के लिए अगले महीने फिर से भारत का दौरा करने वाली है.
शोध दल यह जानने की कोशिश करेगा कि यह भाषा आई कहाँ से और अब तक इसकी जानकारी क्यों नहीं मिल सकी थी.

बीबीसी से साभार

    जनगणना से जात हटाओ: रविवार को उपवास और धरना

    (जनगणना से जात हटाओ)
    रविवार को उपवास और धरना
               देश भर में फैले अपने सभी साथियों से मैं अनुरोध करता हूं कि आप कृपया रविवार (18 जुलाई 2010) को अपने शहर या गांव में सार्वजनिक उपवास और धरने का आयोजन करें| यह उपवास आत्म-प्रेरणा और आत्म-शुद्घि के लिए है|
               यह कार्यक्रम सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक चलाएँ| शहर के जाने-माने लोगों को आमंत्रित करें| वे शाम तक न बैठ सकें तो उद्‍घाटन में ही शामिल हो जाएँ|
                इसकी परवाह न करें कि आपके साथ कितने लोग आ रहे हैं| उपवास के लिए तो एक व्यक्ति ही काफी है| अपने उपवास की सूचना अखबारों और टीवी चैनलों को पहले से दे दीजिए|
                यदि आप पोस्टर और स्टिकर लगवा सकें तो और भी अच्छा !
                 कृपया आयोजन की अगि्रम सूचना अवश्य भेजिए|
    कृपया इस संदेश को अपने सभी मित्रें को फार्वर्ड कर दें|

    आपका
    वेदप्रताप वैदिक

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    1962 में हमारी पराजय क्यों : सच्चाई से साक्षात्कार कराती पुस्तक : चर्चा


    Why we lost 1962 War:A book Review of true story


    Book Review: Himalayan Blunder

    Preface
    Oct 20, 1959, Ladakh:

    Havaldar Karam Singh and his 20-strong troop, doing their routine border patrolling rounds amid heavy snowfall. In an eyewink nine men in the patrol are buried dead under a hailstorm of bullets, and the rest including Karam Singh are taken prisoners. Courtesy the Chinese army. What stuns the Havaldar is not so much the unexpected onslaught as where it occurred: 40 kilometres right on this side of the border .



    The Army Chief, General Thimmayya’s worst fears about China stood confirmed. When he confronted the powers that be and requested an immediate modernisation of the Armed Forces, and special attention to Chinese designs, V.K. Krishna Menon, the Defence Minister, analysed the problem differently. In his view, General Thimmayya was a soldier of the Raj era who was alarmed easily. Pakistan, not China was India’s “number one” enemy, he opined. The General’s response was interesting: I understand our Defence Minister’s perspective. I have regards for his ability but I’m aggrieved at his foolishness. One does not rank enemies as first, second and the rest. Perhaps, it is done in Communist politics; as an Army Chief, I do not rank enemies.



    The General submitted his resignation when Menon’s interference breached tolerance. But a panic-stricken Nehru’s emotional entreaty charmed the General into withdrawing it. In Parliament however, Nehru rose in defence of Menon: I’ve spoken to General Thimmayya. He blows issues out of proportion. He has unnecessarily created a misunderstanding with Krishna Menon, a veteran diplomat. It is ridiculous to blame Menon for interference in the issue of promotions in the Armed Forces. Silly! I totally reject General Thimmayya’s allegations.




    Himalayan Blunder

    This rather lengthy recount is one of the several significant botches recorded in John P Dalvi’s Himalayan Blunder. The book is a Manual of War Failure, recommended reading for everybody who wants to know why exactly India lost the 1962 war with China.



    It was banned almost immediately on its release, in 1969. I read the abridged Kannada translation by Ravi Belagere. Which kind of struck me as funny. And unfortunate that I had to read a translated version because the original in English is banned. The excerpts I’ve quoted in this post are my (re)translatations from Kannada. Funny, isn’t it? Happens only in India.



    John Parashuram Dalvi was the Brigadier of the 7th Infantry formed to “fight” at the North-East Frontier Agency (NEFA), which is today’s Arunachal Pradesh and parts of Nagaland. His eyewitness account of the war, events that led to it, as well as his wonderful insights into the 1962 humiliation form Himalayan Blunder.



    Dalvi recounts a chilling precursor to 1962. During his days in the Wellington Defence Services Staff College in 1950, he quotes a colleague and army veteran, Joe of British origin: Friends, leaders of your country have no foresight. They are mum about the Chinese invasion of Tibet. They don’t understand the reality that India’s backdoor has been broken down…. Boys! Take it from me. Some of you folks sitting here will fight with the Chinese army before you retire.



    Foresight was least expected from Nehru who in those days hallucinated as the champion of world peace. Nehru’s stand on the invasion of Tibet was but a minor testimony to this: we don’t have any right to put our forces in Tibet irrespective of whether it is independent, or is part of China.



    Starting around 1951, China began its silent preparations: it laid roads capable of transporting army vehicles (supporting something like 4 tonnes), made airstrips to land its combat aircraft, set up telephones and communication networks… In parallel, it began marching its troops into the region and even gobbled up parts of Aksai Chin territory belonging to India.



    Meanwhile, Jawaharlal Nehru’s Hindi-Chini bhai bhai symphony had reached a crescendo. China played along–it had recently concluded a war with Korea and badly needed time and resources for what it had in mind.



    Brigadier Dalvi narrates with heart-rending precision the betrayal of the political leadership at every step. However, the principal culprits responsible for our defeat stand out clearly: Jawaharlal Nehru, Krishna Menon, and General B.M. Kaul who Nehru had handpicked to lead the war efforts against China.



    B.M. Kaul sitting in Delhi had no clue about the situation on the ground in Arunachal Pradesh. He had allowed himself to believe what–a mere month before the actual Chinese invasion–Nehru said: China is not a warmonger. They have a “minor border dispute” with us. Dhola Post was an unncessary outpost created at B.M. Kaul’s behest: it was an invitation to attack. Yet, on September 8 1962, when the first sparks of war flew, he was holidaying in Srinagar with his family. And he didn’t think it was important to cancel his vacation: after all, Pandit Nehru was abroad. B.M. Kaul finally landed at the spot on Oct 10, 1962. Says Dalvi,

    We watched the platoon of Punjabis under Major Chaudary’s leadership march towards Yum Sola….General Kaul stood next to me, weighing the success of his first stratagem. The platoon’s strength including Major Chaudary was 51. They’d barely covered a few feet when the sky came apart. Around 800 Chinese, positioned at the bank of Nam ka Chu [river] and atop the Thagla mountain began showering bullets. The first round hurt Major Chaudary’s legs. The Punjabi Platoon retaliated furiously, and dismembered and wounded a few hundred Chinese. Six of our men died in the first round. But General Kaul’s enthusiasm didn’t wither. As our men readied themselves for the second round of assault, a huge swarm of Chinese troops descended. Major Chaudary yelled to General Kaul to save his men. Never the men to turn their back from battle, our Punjabi Platoon looked at us, helplessly. All of us, including General Kaul understood what that meant. Our men had run out of ammunition.



    The courageous General who had roared reassuringly to the Indian public about teaching China a lesson, couldn’t stomach the reality he saw before him. Dalvi recounts Kaul’s true character.



    My God! You’re right. China has prepared itself for a full-scale war. It’s each man for himself from now on. You’re in charge of your Brigade. This is not in my reach. Only a Brigadier can execute this kind of war.



    And he turned and left, leaving Dalvi to helplessly watch the massacre of the whole platoon. Dalvi records several similar incidents where a grossly underprepared Indian army faced the Chinese who were superior to them in every single aspect. A most telling instance:

    …. a soldier saluted me as I stepped into the bunker and said, “Sahib, look there! the enemy is on the opposite slope. They’re burning firewood to beat the cold.” I felt a slap of humiliation. This was one of the rare instances this happened in thousands of wars throughout history. Burning a fire at night is a sure invitation for the enemy to attack. But then, this enemy on the slopes of the Thagla mountain was confident: both of his strength and our sorry state. He knew for certain that we would not attack: we could not.



    In his “final journey,” Dalvi pays pages of homage to every footsoldier, Major, signaller, Havaldar…small and big, who died defending the indefensible. And the reason? You can’t read this with a straight face:



    The Chinese used the same war strategies in vogue for centuries but…. their guns were more modern, and their clothes were warmer than ours…. out there, away from the warm world, the October chill doesn’t descend from the skies; it climbs from the depths of the spinal cord. All our men had to wear were cotton clothes suited for summer, shoes which slide on snow… the only colour my men could see was the ash-white colour of death. A flash of sunlight was enough to blind them. This blindness caused several men to walk directly into the waiting arms of the enemy. My request for snow glasses was granted, all right, but when they arrived, the air-dropped bag dropped somewhere in the abyss-like crevices…



    You need to read this book to believe the shamelessless of Nehru’s government, which failed to supply these unfortunate men with food. Towards the end, Dalvi and those that remained went without food for more than 48 hours.



    We descended the Dhola mountain after the Chinese disappeared from sight. We gave up the final hope of even sighting a small tukdi (regiment) of our men. I descended rapidly out of a sheer will to live. The slope ended in a forest…the path was even tougher to navigate. Meanwhile, I had lost four of the eleven men following me. I reached a clearing, which then led to a small mud road. It was all over.



    Dalvi had walked right into a full-fledged Chinese army camp. On October 22 1962, 9:22 A.M, John P. Dalvi was taken prisoner of war. He remained in Chinese custody from October 22 1962 till about May 1963. What’s more interesting is the aftermath.

    We landed in Dum Dum airport in Calcutta on May 4 1963. We were received cordially, appropriately. But the silence there was disquieting. I realized later. We had to prove we weren’t brainwashed by Chinese ideology. We had to prove we were still loyal to India. My own army maintained a suspicious distance. The irony cannot be harsher: this treatment from a country, which for more than a decade had brainwashed itself into holding the Chinese baton wherever it went.

    It is more apt to call the Indo-China War as the Battle of Thagla, the altar where Pandit Nehru sacrificed hundreds of unprepared, ill-equipped, and underfed Indian soldiers as the price of his ineptitude.

    Small wonder, the book is banned in India. I wager that even if it was not banned, we’d never learn because Himalayan Blunder has simply proven its contemporary relevance in the sense of history repeating itself: notice today’s Chinese cheerleaders who occupy disproportionate clout in the UPA government. Yet none of us seem to pay heed to their misdeeds–from escalated Naxalism/Maoism to their shenanigans in Nepal.

    By the way, the Battle of Thagla began on October 20, 1962 and lasted just over 3 hours, between 5 A.M and 8 A.M. An entire brigade was massacred.




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