- डॉ. वेद प्रताप वैदिक
Terror लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Terror लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सरबजीतों को यों मरने न दें
लेबल:
आसपास,
इंडिया,
देश,
विचार,
Citizens,
INDIANS,
LIFE,
Nation,
Pakistan,
Terror,
Ved Pratap Vaidik
हत्या और मृत्युदंड : शहीद सरबजीत और आतंकी कसाब
- कविता वाचक्नवी
सरबजीत की पाकिस्तान की जेल में कर दी गई हत्या के बाद देश और देश की सरकार के कारिन्दे पहले से तैयार कर रखे गए बयान पढ़ने में मशगूल हैं। जो लोग कसाब को संवैधानिक ढंग से दिए गए दण्ड पर विलाप कर रहे थे, भारत को कोस रहे थे, वे कविता-कहानी और अपनी पुस्तकों और प्रकाशन के आयोजन की चर्चाओं में मस्त व्यस्त हैं।
चीन की अशोभनीय पैंतरेबाजियाँ
- डॉ. वेदप्रताप वैदिक
स्थान:
London, UK
पुलिस अफसर हत्या : दूसरा पहलू
पुलिस अफसर हत्या : दूसरा पहलू
- डॉ वेदप्रताप वैदिक
लेबल:
आसपास,
डॉ. वेदप्रताप वैदिक INDIA,
देश,
नायक,
समाचार/सूचना,
INDIA,
INDIANS,
LIFE,
Nation,
NEWS,
Politics,
Terror,
Ved Pratap Vaidik
भारत के बड़े दोस्त थे रब्बानी
भारत के बड़े दोस्त थे रब्बानी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति प्रो. बुरहानुद्दीन रब्बानी की हत्या से अफगानिस्तान में चल रहे शांति-प्रयासों को गहरा धक्का लगेगा। वे अफगानिस्तान के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे। वे सिर्फ राष्ट्रपति ही नहीं रहे, उन्होंने लगभग 20 साल तक मुजाहिदीन-संघर्ष का भी नेतृत्व किया था। वे पठान नहीं थे। वे ताज़िक थे, फारसीभाषी थे और उनका जन्म बदख्शान में हुआ था, जो पामीर पहाड़ों का घर है। उसे दुनिया की छत भी कहा जाता है।
इस समय वे अफगानिस्तान की उच्च शांति समिति के अध्यक्ष थे। उनके नेतृत्व में ही अफगानिस्तान की सबसे कठिन समस्या का समाधान खोजा जा रहा था। यह रब्बानी साहब के शानदार व्यक्तित्व का ही कमाल था कि उनके नाम पर अफगानिस्तान के सभी नेता और अमेरिका, पाकिस्तान व ईरान आदि सभी देश सहमत थे। तालिबान से बात करने के लिए सबसे उपयुक्त नेता वही थे। उनकी हत्या इसीलिए हुई है कि बड़े-बड़े तालिबान नेताओं की दुकानें रब्बानी साहब की वजह से बंद होने लगी थीं।
आतंक के दो मसीहाओं का द्वंद्व
आतंक के दो मसीहाओं का द्वंद्व
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
11 सितंबर एक तारीख है लेकिन यह दुनिया में वैसे ही प्रसिद्ध हो गई है, जैसे 25 दिसंबर या 1 जनवरी! 11 सितंबर का मतलब वह दिन है, जब न्यूयार्क के ट्रेड टॉवर और वाशिंगटन के पेन्टेगॉन-भवन पर हवाई हमला हुआ था। इस हमले को हुए दस साल हो गए। इन दस वर्षों में अमेरिका और दुनिया ने क्या खोया और क्या पाया, इसका लेखा-जोखा जरूरी है।
लेबल:
9/11,
America,
Bin Laden,
OSAMA,
Pakistan,
Politics,
Terror,
Terrorism,
Ved Pratap Vaidik,
world trade center
पाठकों की अदालत में अपने दोषी या निर्दोष होने की अपील

आतंकवादी ऐसे बनाती है पुलिस
मुझे इस बात के लिए माफ किया जाए कि मैं कई बार अपने खिलाफ चल रहे मामले की चर्चा कर चुका हूँ । मामला अब भी अदालत में हैं और वहाँ जो फैसला होगा सो होगा, मैं अपने पाठकों की अदालत में अपने दोषी या निर्दोष होने की यह अपील कर रहा हूँ ।
2005 के फरवरी महीने में दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी थाने में मेरे खिलाफ एक मामला दर्ज हुआ था एफआईआर कहती है कि हेड कांस्टेबल मोहम्मद लोनी और हेड कांस्टेबल सलीम डिफेंस कॉलोनी क्षेत्र का दौरा कर रहे थे। वहाँ एक सिंह न्यूज एजेंसी पर उनकी नजर सीनियर इंडिया नामक पत्रिका पर पड़ी जिसके मुख पृष्ठ पर बापू की वासना शीर्षक से एक लेख छपा था। सलीम और लोनी को एफआईआर के अनुसार बहुत उत्सुकता हुई और उन्होंने पत्रिका पढ़ना शुरू कर दिया। अंदर सातवें पन्ने पर नीचे एक तीन पैराग्राफ का लेख था जिसका शीर्षक था `अपने अपने भगवान', जिसमें एक छोटी-सी फोटो भी छपी थी जिसमें पगड़ी पर पटाखा बना हुआ था।
एफआईआर के अनुसार फोटो बहुत छोटा था लेकिन फिर भी इन गुणी हवलदारों ने पढ़ लिया कि पगड़ी के माथे पर कुरान की पहली आयत ला इलाह इल्लिलाह, या रसूल अल्लाह अरबी भाषा में लिखा है। दिल्ली पुलिस में अरबी भाषा के इतने विद्वान को सिर्फ हवलदार बना कर रखा गया है। यह हैरत की बात है एफआईआर कहती है कि कार्टून छापना मुस्लिम समुदाय का अपमान करना है और लेख की भाषा भी मुस्लिम संप्रदाय के खिलाफ है। इसलिए यह धारा 295 के तहत किया गया गंभीर अपराध था। इसकी सूचना सब इंस्पेक्टर के पी सिंह को दी गई और के पी सिंह ने थाने से एक बजे रवानगी डाल कर 22 फरवरी 2006 को खुद डिफेंस कॉलोनी में यह पत्रिका देखी और अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी दी। वरिष्ठ अधिकारी यानी दिल्ली पुलिस के पुलिस आयुक्त डॉक्टर कृष्ण कांत पॉल तैयार बैठे थे। उन्होंने तुरंत दिल्ली के उप राज्यपाल के नाम एक संदेश बनाया जिसमें पत्रिकाएँ जब्त करने और संपादक यानी मुझे गिरफ्तार करने की अधिसूचना जारी करने का अनुरोध था। अधिसूचना फौरन जारी कर दी गई और इसे श्री पॉल ने गृह मंत्रालय से भी जारी करवा दिया।
मेरे जिस लेख पर मुस्लिम भावनाएँ भड़कने वाली थीं, उसके तीन पैरे भी लगे हाथ पढ़ लीजिए। मैने लिखा था- हाल ही में पैगंबर हजरत मोहम्मद जो इस्लाम के संस्थापक हैं, के डेनमार्क में कार्टून प्रकाशित होने पर बहुत हंगामा और बहुत जुलूस निकले। इस अखबार ने इसके पहले जीसस क्राइस्ड के कार्टून छापने से इंकार कर दिया था क्योंकि उसकी राय में यह आपत्तिजनक हैं।
इसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का बयान आया जिसमें कहा गया कि वे डेनमार्क के साथ है और यूरोप तथा अमेरिका मे रहने वाले सभी इस्लाम धर्म के अनुयायियों को स्थानीय जीवन शैली और रिवाज मानने पड़ेंगे। सिर्फ इस बयान से जाहिर हो जाता है कि अमेरिका के असली इरादे क्या है? अमेरिका अपने स्वंयभू बुद्विजीवियों की मदद से संस्कृतियों के टकराव का सिद्वांत प्रचारित करने में लगा हुआ है और इस तरह के बयानाें के बाद किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए कि और भी जगह चिंगारिया भड़के। तथ्य यह है कि धर्म का मूल प्रश्न तेल और जमीन के मामले से हट कर अब धर्म के मूल आधार का माखौल उड़ाने पर आ कर
टिक गया है और स्वाभाविक है इस्लामी शक्तियां इसे पसंद नहीं करेगी। यह ठीक है कि किसी भी धर्म की महानता इस बात में निहित है कि वह मजाक को कितना सहन कर सकता है मगर यदि कोई धर्म या उसके अनुयायी इसे मंजूर नहीं करते तो उन्हें अपने रास्ते छोड़ देना चाहिए।
यह वह लेख था जिसे इस्लामी भावनाए आहत करने वाला बताया जा रहा था। रातों रात मुझे गिरफ्तार किया गया, रात को तीन बजे तक पूछताछ की गई। पूछा गया कि डेनमार्क वाला यह कार्टून कितने में और कहां से खरीदा था? पूछने वाले एक पढ़े लिखे आईपीएस अधिकारी थे जिन्हें पता था कि इंटरनेट पर चार बटन दबाने से सारे कार्टून सामने आ जाते हैं और इन पर कोई कॉपीराइट नहीं है। मगर साहब तो बड़े साहब यानी के के पॉल का हुक्म बजा रहे थे और पॉल इसलिए दुखी थे क्योंकि हमने उनके वकील बेटे को दिल्ली पुलिस द्वारा वांछित तमाम अभियुक्तों को अदालत में बचाते और औकात से कई गुनी ज्यादा फीस वसूलते पकड़ लिया था।
तिहाड़ जेल में बारह दिन बंद रहने के बाद जमानत मिली और जमानत के आदेश में एक एक पैरा पर टिप्पणी की गई थी कि इससे कोई मुस्लिम भावना आहत नहीं होती। मगर पॉल तब भी दिल्ली पुलिस के आयुक्त थे और उनके आदेश पर जमानत रद्द करने की अपील की गई जो अब भी चल रही है। दिलचस्प बात यह है कि एफआईआर लिखवाने के लिए भी के के पॉल दो मुस्लिम हवलदारों को ले कर आए। अदालत में कहा गया कि इस लेख पर दंगा हो सकता है इसलिए अभियुक्त यानी मुझे सीधे तिहाड़ जेल भेज दिया जाए। यह सब गृह मंत्री शिवराज पाटिल की जानकारी में हो रहा था और यह बात खुद पाटिल ने बहुत बाद में अपने घर मेरे सामने स्वीकार की। संसद में सवाल किया गया मगर कोई जवाब नहीं मिला। कई पेशियाँ हो चुकी हैं। एक सीधे सपाट मामले में चौदह जाँच अधिकारी बदले जा चुके हैं। जो चार्ज शीट दाखिल की गई है उसे अदालत ने बहस के लायक नहीं समझा। सबसे गंभीर धारा 295 उच्च न्यायालय ने पाया कि इस मामले में लागू ही नहीं होती। मगर मामला चल रहा है।
मकबूल फिदा हुसैन के खिलाफ बहुत सारे मामले इन्हीं धाराओं में चले और खारिज होते रहे। हुसैन का बहुत
नाम हैं और उनका एक दस्तखत लाखों में बिकता है। मगर निचली से ले कर उच्च न्यायालय तक अब तक लाखों रुपए मैं अदालती ताम झाम में खर्च कर चुका हूँ । अब तो उच्च न्यायालय ने उस मामले को जिसमें मेरी गिरफ्तारी इतनी अनिवार्य मानी गई थी, साधारण सूची में डाल दिया है जिसमें तारीख दस साल बाद भी पड़ सकती है। आप ही बताए कि भारत की न्याय प्रक्रिया में मेरा विश्वास क्यों कायम रह जाना चाहिए? अभी तक तो कायम हैं लेकिन न्याय के नाम पर सत्ता और प्रतिष्ठान जिस तरह की दादागीरी करते हैं उसी से आहत और हताश हो कर लोग अपराधी बन जाते हैं।
दिलचस्प बात यह भी है कि मुझ पर इस्लाम के खिलाफ मामला भड़काने का आरोप लगा था। फिर भी तिहाड़ जेल में मुझे उस हाई सिक्योरिटी हिस्से में रखा गया जहाँ जैश ए मोहम्मद और लश्कर ए तैयबा के खूंखार आतंकवादी भी मौजूद थे। ईमानदारी से कहे तो आतंकवाद के आरोप में बंद ये लोग पुलिस से ज्यादा इंसानियत बरतते नजर आए और उन्होंने बहुत गौर से मेरी बात सुनी और अपने साथ बिठा कर खाना खिलाया। फिर भी भारत सरकार का मैं अभियुक्त हूँ । उस सरकार का जो उस संविधान से चलती हैं जहाँ अभिव्यक्ति की आजादी और न्याय नागरिक का मूल अधिकार है।
आलोक तोमर
लेबल:
आसपास,
पत्रकारिता,
हिंदी पत्रकारिता,
AALOK TOMAR,
INDIA,
Journalism,
NEWS,
Politics,
Terror,
Terrorism
द्वंद्व नहीं, प्रतिद्वंद्विता का सवाल : क्या युद्ध हमेशा सीमाओं पर ही लड़ा जाता है?
द्वंद्व नहीं, प्रतिद्वंद्विता का सवाल
दूसरी बात हाल ही में सामने आई है, जिसका श्रेय ‘माओ : द अननोन स्टोरी’ के लेखक द्वय जुंग चांग और जॉन हैलिडे को है। इस पुस्तक में विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर यह बताया गया है कि माओ त्से तुंग ने भारत पर इसलिए हमला करवाया कि वे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में जवाहरलाल नेहरू की बढ़ती हुई लोकप्रियता से चिढ़ने लगे थे। माओ का यह सपना भी पूरा हुआ, क्योंकि चीनी आक्रमण के बाद नेहरू की ख्याति और लोकप्रियता पर ग्रहण लग गया और सिर्फ दो वर्ष बाद उनका देहावसान भी हो गया। दरअसल, अतिशय महत्वाकांक्षी और सत्ता-कामी माओ का यह चेहरा भारतीय मीडिया और जनमत से छिपा रहा है, क्योंकि भारत के वामपंथ ने माओ के व्यक्तित्व को एक ‘क्रांतिकारी रहस्यवाद’ से ढक रखा है। इस बीच चीन ने अपने को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है, इसमें संदेह नहीं। दूसरी ओर, भारत सरकार और उसका चापलूस बुद्धिजावी वर्ग भारत को भी महाशक्ति के रूप में पेंट करता रहता है, पर चीन और भारत के बीच अभी भी कोई तुलना नहीं है – न सामरिक शक्ति के स्तर पर और न आर्थिक शक्ति के स्तर पर। हाँ, व्यापक गरीबी के मामले में जरूर दोनों एक-दूसरे के आसपास ही हैं। आर्थिक मंदी के परिणामस्वरूप इस समय चीन की राजधानी तथा अन्य शहरों से गरीबों को कुत्तों की तरह खदेड़ा जा रहा है। इसे ‘बैक टू विलेज’ अभियान बताया जा रहा है। उसके बावजूद, भारत में दरिद्रता का प्रकोप कहीं ज्यादा है। हो सकता है, चीन अगले बीस-पचीस सालों में गरीबी की समस्या सुलझा ले, पर भारत की आर्थिक प्रगति की दिशा और तैयारी को देखते हुए यह अवधि पचास वर्ष से आगे भी जा सकती है।
1962 और 2009 के बीच फर्क क्या है? तब हमारा मीडिया सोया हुआ था और आज वह कुछ ज्यादा ही जगा हुआ है। तब अखबारों में वही सब छपता था जो सरकार चाहती थी या मुहैया कराती थी। आज मीडिया हर जगह अपना एक एजेंडा तैयार कर लेता है। तब राष्ट्रभक्ति के मोह में असुविधाजनक सवाल नहीं पूछे जाते थे। आज सिर्फ असुविधाजनक सवाल ही पूछे जाते हैं और अकसर झूठी राष्ट्रभक्ति दिखाई जाती है। सनसनी की खोज केंद्रीय महत्व की वस्तु हो गई है और इसके लिए युद्ध का आधारहीन माहौल भी बनाया जा सकता है।
1962 और 2009 के बीच फर्क क्या है? तब हमारा मीडिया सोया हुआ था और आज वह कुछ ज्यादा ही जगा हुआ है। तब अखबारों में वही सब छपता था जो सरकार चाहती थी या मुहैया कराती थी। आज मीडिया हर जगह अपना एक एजेंडा तैयार कर लेता है। तब राष्ट्रभक्ति के मोह में असुविधाजनक सवाल नहीं पूछे जाते थे। आज सिर्फ असुविधाजनक सवाल ही पूछे जाते हैं और अकसर झूठी राष्ट्रभक्ति दिखाई जाती है। सनसनी की खोज केंद्रीय महत्व की वस्तु हो गई है और इसके लिए युद्ध का आधारहीन माहौल भी बनाया जा सकता है।
पिछले कुछ समय से मीडिया में चीन को ले कर खासा तनाव है। कई बार तो ऐसा वातावरण बनाने की कोशिश की गई कि अरुणाचल प्रदेश में चीन का आक्रमण अब हुआ कि तब हुआ। चीन अरुणाचल प्रदेश को अपने देश का हिस्सा मानता है और बताता है, यह कोई नई बात नहीं है। ऐसे ही कुछ बहानों से उसने भारत पर आक्रमण भी किया था। अरुणाचल प्रदेश में, जिसे तब नेफा कहते थे, वह दाखिल भी हो गया था। लेकिन आज यह यकीन कर पाना मुश्किल है कि वह अपने दावे को साबित करने के लिए सेना भेजने की सोच सकता है। अगर वह ऐसा करता है, तो उसे फायदा कम, नुकसान ज्यादा होगा। लेकिन यह चीन के राजनय का अनिवार्य हिस्सा है कि वह भारत को और दुनिया को अपने दावे की सतत याद दिलाता रहे। जब दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा का कार्यक्रम बना, तो स्वाभाविक था कि चीन की मुखरता कुछ और कर्कश हो जाती। यही हुआ और सनसनी की तलाश में हमारे मीडिया ने हुआँ हुआँ करना शुरू कर दिया।
यद्यपि भारत सरकार बार बार टीवी चैनलों को चेतावनी जारी करती रही है कि वे तिल का ताड़ बना कर जनता को गुमराह न करें, फिर भी मीडिया के नजरिए में कोई परिवर्तन नहीं आया है। कोई मामूली-सी घटना भी हो जाती है या चीन सरकार द्वारा रुटीन टाइप का बयान भी जारी होता है, तो कुछ चैनलों को जुकाम हो जाता है। अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर अरसे से हो रही घुसपैठों और सीमा पार चल रही सैनिक गतिविधियों को गरम से गरम बना कर पेश करनेवाले हमारे टीवी चैनल अपने इस अज्ञान का परिचय देते थक नहीं रहे कि सन बासठ के हमले का रहस्य क्या था। बासठ के समझे बिना दो हजार नौ को समझा नहीं जा सकता।
विभिन्न तथ्यों, विश्लेषणों और रहस्योद्घाटनों से छन कर जो बात सामने आती है, वह यह है कि बासठ की सैनिक कार्रवाई के पीछे चीन के दो इरादे थे – एक, भारत की सीमावर्ती जमीन का जितना बड़ा हिस्सा हड़पा जा सके, हड़प लिया जाए। चीन शुरू से ही विस्तारवाद की नीति का शिकार रहा है। पड़ोसियों की जमीन पर उसकी आँख बराबर लगी रहती है। यहाँ तक कि उसके सैनिक नदी के छोटे-छोटे द्वीपों तक पर कब्जा जमाने के लिए रूसी सैनिकों से टकराते रहते थे। बासठ में जब चीन का यह इरादा पूरा हो गया, तो उसने अपनी आगे बढ़ती हुई सेना को पीछे लौटने का आदेश दे दिया। युद्धों के इतिहास में यह एक विरल घटना थी कि एक शक्तिशाली और विजयी होता हुआ देश पराजित हो रहे देश की जमीन से अपने पाँव पीछे खींच ले।
दूसरी बात हाल ही में सामने आई है, जिसका श्रेय ‘माओ : द अननोन स्टोरी’ के लेखक द्वय जुंग चांग और जॉन हैलिडे को है। इस पुस्तक में विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर यह बताया गया है कि माओ त्से तुंग ने भारत पर इसलिए हमला करवाया कि वे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में जवाहरलाल नेहरू की बढ़ती हुई लोकप्रियता से चिढ़ने लगे थे। माओ का यह सपना भी पूरा हुआ, क्योंकि चीनी आक्रमण के बाद नेहरू की ख्याति और लोकप्रियता पर ग्रहण लग गया और सिर्फ दो वर्ष बाद उनका देहावसान भी हो गया। दरअसल, अतिशय महत्वाकांक्षी और सत्ता-कामी माओ का यह चेहरा भारतीय मीडिया और जनमत से छिपा रहा है, क्योंकि भारत के वामपंथ ने माओ के व्यक्तित्व को एक ‘क्रांतिकारी रहस्यवाद’ से ढक रखा है। इस बीच चीन ने अपने को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है, इसमें संदेह नहीं। दूसरी ओर, भारत सरकार और उसका चापलूस बुद्धिजावी वर्ग भारत को भी महाशक्ति के रूप में पेंट करता रहता है, पर चीन और भारत के बीच अभी भी कोई तुलना नहीं है – न सामरिक शक्ति के स्तर पर और न आर्थिक शक्ति के स्तर पर। हाँ, व्यापक गरीबी के मामले में जरूर दोनों एक-दूसरे के आसपास ही हैं। आर्थिक मंदी के परिणामस्वरूप इस समय चीन की राजधानी तथा अन्य शहरों से गरीबों को कुत्तों की तरह खदेड़ा जा रहा है। इसे ‘बैक टू विलेज’ अभियान बताया जा रहा है। उसके बावजूद, भारत में दरिद्रता का प्रकोप कहीं ज्यादा है। हो सकता है, चीन अगले बीस-पचीस सालों में गरीबी की समस्या सुलझा ले, पर भारत की आर्थिक प्रगति की दिशा और तैयारी को देखते हुए यह अवधि पचास वर्ष से आगे भी जा सकती है।
अब यह सूरज की रोशनी की तरह साफ हो चुका है कि बासठ में भारत की सीमाओं पर हमला करने के पीछे चीन का इरादा इस देश पर कब्जा करना नहीं था। सैनिक स्तर पर यह शायद असंभव न रहा हो, लेकिन व्यावहारिक यह किसी भी तरह से नहीं था। अगर सैनिक ताकत के बल पर कब्जा हो भी जाता, तो वह कितने दिनों तक टिक सकता था? जो देश सिर्फ पंद्रह साल पहले ब्रिटेन की गुलामी से मुक्त हुआ था, वह अपने पड़ोसी देश की अधीनता स्वीकार कर लेगा, यह बात किसी पागल के दिमाग में भी नहीं आ सकती थी। पर चीन पागल नहीं था, न है। उसकी कुछ नीतियों में शैतानी का तत्व जरूर रहा है और यह आज भी कायम है।
अब यह सूरज की रोशनी की तरह साफ हो चुका है कि बासठ में भारत की सीमाओं पर हमला करने के पीछे चीन का इरादा इस देश पर कब्जा करना नहीं था। सैनिक स्तर पर यह शायद असंभव न रहा हो, लेकिन व्यावहारिक यह किसी भी तरह से नहीं था। अगर सैनिक ताकत के बल पर कब्जा हो भी जाता, तो वह कितने दिनों तक टिक सकता था? जो देश सिर्फ पंद्रह साल पहले ब्रिटेन की गुलामी से मुक्त हुआ था, वह अपने पड़ोसी देश की अधीनता स्वीकार कर लेगा, यह बात किसी पागल के दिमाग में भी नहीं आ सकती थी। पर चीन पागल नहीं था, न है। उसकी कुछ नीतियों में शैतानी का तत्व जरूर रहा है और यह आज भी कायम है।विभिन्न तथ्यों, विश्लेषणों और रहस्योद्घाटनों से छन कर जो बात सामने आती है, वह यह है कि बासठ की सैनिक कार्रवाई के पीछे चीन के दो इरादे थे – एक, भारत की सीमावर्ती जमीन का जितना बड़ा हिस्सा हड़पा जा सके, हड़प लिया जाए। चीन शुरू से ही विस्तारवाद की नीति का शिकार रहा है। पड़ोसियों की जमीन पर उसकी आँख बराबर लगी रहती है। यहाँ तक कि उसके सैनिक नदी के छोटे-छोटे द्वीपों तक पर कब्जा जमाने के लिए रूसी सैनिकों से टकराते रहते थे। बासठ में जब चीन का यह इरादा पूरा हो गया, तो उसने अपनी आगे बढ़ती हुई सेना को पीछे लौटने का आदेश दे दिया। युद्धों के इतिहास में यह एक विरल घटना थी कि एक शक्तिशाली और विजयी होता हुआ देश पराजित हो रहे देश की जमीन से अपने पाँव पीछे खींच ले।
दूसरी बात हाल ही में सामने आई है, जिसका श्रेय ‘माओ : द अननोन स्टोरी’ के लेखक द्वय जुंग चांग और जॉन हैलिडे को है। इस पुस्तक में विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर यह बताया गया है कि माओ त्से तुंग ने भारत पर इसलिए हमला करवाया कि वे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में जवाहरलाल नेहरू की बढ़ती हुई लोकप्रियता से चिढ़ने लगे थे। माओ का यह सपना भी पूरा हुआ, क्योंकि चीनी आक्रमण के बाद नेहरू की ख्याति और लोकप्रियता पर ग्रहण लग गया और सिर्फ दो वर्ष बाद उनका देहावसान भी हो गया। दरअसल, अतिशय महत्वाकांक्षी और सत्ता-कामी माओ का यह चेहरा भारतीय मीडिया और जनमत से छिपा रहा है, क्योंकि भारत के वामपंथ ने माओ के व्यक्तित्व को एक ‘क्रांतिकारी रहस्यवाद’ से ढक रखा है। इस बीच चीन ने अपने को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है, इसमें संदेह नहीं। दूसरी ओर, भारत सरकार और उसका चापलूस बुद्धिजावी वर्ग भारत को भी महाशक्ति के रूप में पेंट करता रहता है, पर चीन और भारत के बीच अभी भी कोई तुलना नहीं है – न सामरिक शक्ति के स्तर पर और न आर्थिक शक्ति के स्तर पर। हाँ, व्यापक गरीबी के मामले में जरूर दोनों एक-दूसरे के आसपास ही हैं। आर्थिक मंदी के परिणामस्वरूप इस समय चीन की राजधानी तथा अन्य शहरों से गरीबों को कुत्तों की तरह खदेड़ा जा रहा है। इसे ‘बैक टू विलेज’ अभियान बताया जा रहा है। उसके बावजूद, भारत में दरिद्रता का प्रकोप कहीं ज्यादा है। हो सकता है, चीन अगले बीस-पचीस सालों में गरीबी की समस्या सुलझा ले, पर भारत की आर्थिक प्रगति की दिशा और तैयारी को देखते हुए यह अवधि पचास वर्ष से आगे भी जा सकती है।
इसलिए वास्तविकता यह है कि चीन के साथ हमारी असली समस्या सैनिक द्वंद्व की नहीं, आर्थिक प्रतिद्वंद्विता की है। आर्थिक विकास के तमाम दावों के बावजूद भारत चीन से बहुत पीछे है। विकसित देशों के तमाम औद्योगिक निर्माताओं के लिए चीन विनिर्माण और निर्यात का मक्का बना हुआ है। स्वयं चीन की सरकार अपने उद्योग-धंधों को अधिक से अधिक उत्पादन और निर्यात करने के लिए भारी मात्रा में प्रोत्साहन दे रही है। इस समय चीन में बने सामान से भारत के बाजार पटे हुए हैं। बिजली, इलेक्ट्रानिक्स, खिलौने, कपड़े, जूते, घडियाँ आदि कई क्षेत्र हैं जिनमें चीन का सस्ता सामान हमारे उपभोक्ताओं को लुभा रहा है। भारत में उत्पादन की स्थिति ऐसी है कि बहुत-से निर्माता अपने यहाँ माल तैयार करने के बदले चीन में कारखाना लगाने या वहाँ के उत्पादों का आयात करने में फायदा देखते हैं। राखी, होली और दीपावली जैसे त्योहारों पर तो हमारे बाजारों में चीन ही चीन नजर आता है।
सीमा पर जो भी होगा, हमारे सैनिक संभाल लेंगे, यह विश्वास अतार्किक नहीं है। आखिरकार मामला छोटी-मोटी झड़पों तक ही सीमित रहेगा। लेकिन आर्थिक क्षेत्र में जो परिघटना दिखाई पड़ रही है, वह गुरिल्ला कार्रवाइयों की नहीं, खुले युद्ध की है। इस युद्ध में हम लगातार पराजित हो रहे हैं और सरकारी स्तर पर, उद्योग-धंधों की दुनिया में या मीडिया के जंगल में इसकी कोई चर्चा तक नहीं है। क्या युद्ध हमेशा सीमाओं पर ही लड़ा जाता है?
000
चित्र : अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर का भाग भारत से पूरी तरह गायब है। राजकिशोर
असंभव के लिए निमंत्रण
असंभव के लिए निमंत्रण
राजकिशोर
पाकिस्तान विघटन के कगार पर
पाकिस्तान विघटन के कगार पर
ब्रिगेडियर चितरंजन सावंत, वी एस एम
ब्रिगेडियर चितरंजन सावंत, वी एस एम
पाकिस्तान का निर्माण भारत की स्वतंत्रता से एक दिन पहले १४ ऑगस्ट १९४७ को हुआ था. कराची में समारोह हुआ था. लॉर्ड मांउट्बेटन, जो अविभाजित भारत के अंतिम वाइसरॉय थे, और मोहम्मद अली जिन्नाह, जो पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरल थे, साथ साथ समारोह में पहुँचे थे। वाइसरॉय की बग्घीयात्रा सुखद नहीं रही क्योंकि आसूचना विभाग ने पूर्व चेतावनी दी थी कि उन पर कोई अँग्रेज़ विरोधी बम से हमला करेगा. अंतिम वाइसरॉय ने स्वयं लिखा है की बग्घी में बैठे बैठे वे लगातार भीड़ में उस आदमी को खोजने में व्यस्त रहे, जिसका हाथ ऊपर उठे बम फेंकने के लिए और वे स्वयं बचाओ मुद्रा में आते हुए अपने सुरक्षा कर्मियों को सतर्क कर दें। ईश्वर की कृपा से ऐसा कुछ नहीं हुआ. जिन्नाह को सत्ता सौंपने के बाद वो फ़ौरन नयी दिल्ली वापस आ गये और तब जा कर उन्हे चैन मिला। पाकिस्तान के अस्तित्व में आते ही असुरक्षा की भावना इतनी प्रबल थी की स्वयं लॉर्ड माउंटबैटन भी उस से बच नहीं सके, आम आदमी की कौन कहे. हिंदू और मुसलमान के बीच ऐसी मारकाट मची हुई थी कि लोग कहने लगे प्रशासन, क़ानून और व्यवस्था में, इस से अच्छे तो अँग्रेज़ ही थे.
पाकिस्तान किसे मिला
पाकिस्तान निर्माण में उस समय के युनाइटेड प्रॉविन्सस के मुसलमान अग्रणी थे. हिंदू विरोधी भी वही सबसे अधिक थे. अखंड भारत जैसा शब्द वे सुनने को राज़ी नहीं थे, उस मुद्दे पर विचार-विमर्श का प्रश्न ही नहीं उठता था. हज़ारों की संख्या में वे अपना घर-बार त्याग कर, सपरिवार पाकिस्तान गये. कराची पहुचें तो वहाँ के मुसलमानों ने न स्वागत किया, न सत्कार. उन्हे मोहाजिर नाम दिया गया. कल्पना के स्वर्ग में वे बने शरणार्थी. किन्ही किन्ही की बहू-बेटियों को भी स्थानीय मुसलमान भगा ले गये. अंततः उन्हें अपना राजनैतिक दल बनाना पड़ा और कम से कम कराची की राजनीति में वर्चस्व बनाना पड़ा. भारत से आ कर पाकिस्तान में बसने वाले मुसलमानों को, मारे गये और पलायन किए हुए हिंदुओं की ज़मीन जायदाद मिल गयी लेकिन कराची और आस-पास ही में. अन्य स्थानों पर वहाँ के स्थानीय मुसलमानों ने क़ब्ज़ा जमाया और मोहाजिर को तो घास भी नहीं डाली.
सेना हो या हो राजनीति - सभी विभागों में पाकिस्तानी पंजाब के मुसलमानों की तूती बोलती रही. सेना में उनकी संख्या प्रबल होने से सेना प्रमुख पंजाबी ही बनता रहा. जब जब लोकतंत्र का तख्ता पलटा गया और सेना का शासन हुआ तो मार्शल लॉ प्रशासक पंजाबी मुसलमान ही बना. असैनिक प्रशासनिक सेवा में भी उसी प्रांत का बोलबाला था. बलूच, सिंधी और पठान अपने को अलग-थलग समझने लगे. पठानों में से काई लोग तो मार्शल लॉ प्रशासक आदि उँचे ओहदे पर आसीन हुए, जैसे फील्ड मार्शल अयूब ख़ान लेकिन बलूच बेचारे कहीं के नहीं रहे. सिंध से प्रधान मंत्री हुए जैसे भुट्टो परिवार से दो और अब राष्ट्रपति ज़ारदारी लेकिन आम आदमी अपने को उपेक्षित पाता रहा. पाकिस्तान से अलग हो कर स्वतंत्र होने की भावना बलूचिस्तान के लोगों में सबसे प्रबल रही है. पाकिस्तानी सेना ने वहीं क़हर ढाया और ऐसा नृशंस अत्याचार किया कि हलाकू को भी शर्म आ जाए. जनरल टिक्का ख़ान को तो लोगों ने "बुचर ऑफ बलूचिस्तान" की उपाधि दे डाली. पाकिस्तान के बिखरने में और टूटने में बलूचिस्तान की भूमिका प्रमुख रहेगी.
पाकिस्तान कब टूट कर बिखर जाएगा ? यह एक महत्वपूर्ण बात है और इस पर शीघ्रता में कोई भविष्यवाणी नहीं कर देनी चाहिए जो बाद में झूठी साबित हो. सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि संसार के अधिकतर पत्रकार यह मानते हैं कि पाकिस्तान का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. अभी कोई चिकित्सक भी आस-पास नहीं है जो मर्ज़ जान कर सही दवा दे सके. पाकिस्तान का कोई शुभ चिंतक दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रहा है. अधिकतर लोग तो "नीम हकीम ख़तरये जान हैं" और वहाँ नीम मुल्ला ख़तरे इमान की भी कमी नहीं है. यदि परमात्मा कभी किसी सही मायने में पाकिस्तानी को जन्म देता है जो केवल दाढ़ी शरिया को ही इस्लाम का सही रूप ना समझ ले, तो हो सकता है कि पाकिस्तान विघटन के कगार से वापस लौट आए.
हम आने वाले कल की प्रतीक्षा करेंगे और आशा करेंगे कि नयी सुबह की नयी किरण नये जीवन का संचार करेगी. उम्मीद है कि पाकिस्तान के शासक और लोग अपने देश को आतंक मुक्त करने की कोशिश सही मायने मे करेंगे और आस पास के देशो में आतंकवाद का निर्यात करने में अब समय और ऊर्जा नष्ट नही करेंगे।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)