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वर्ष 2013 के 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' की घोषणा




वर्ष 2013 का 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' चर्चित कथा लेखिका उर्मिला शिरीष के कथा संग्रह "कुर्की और अन्य कहानियाँ' को प्रदान किया जाएगा।
 निर्णायकों द्वारा प्रशस्ति में कहा गया है कि -


" स्त्री के अधिकार की बात हो या स्त्री के मन के पुरुष की चाहत की बात हो , किसान की दीन दशा की बात हो या कि उसके शोषण की, आदमी की दृष्टिहीनता की बात हो, या उसके अपढ़ होने के नाते भ्रमित होने की बात हो, या समय व समाज की अराजक स्थिति हो, उर्मिला शिरीष की चेतन दृष्टि हर कहीं कुछ न कुछ बुनती दिखाई देती है। इनकी कहानी का पाठक इनकी भाषा और कथ्य से बंधा इनके इर्द गिर्द घूमता दिखाई देता है। अपने समय का दर्पण बनती ये कहानियाँ बदलाव की थोथी आकांक्षा-भर नहीं रखती हैं, बल्कि उसके लिए उत्तेजना भी जगाती हैं।"






निर्णायक  - सुश्री ममता कालिया, श्री विभूति नारायण राय, श्री दिनेश कुमार शुक्ल
संयोजक - नरेंद्र पुण्डरीक (सचिव केदार शोध पीठ, बाँदा), संतोष भदौरिया 


'गर्म हवा...' : सच्ची घटना पर आधारित

कहानी 

'गर्म हवा...' 
(एक सच्ची घटना पर आधारित)
ललित अहलूवालिया 'आतिश' 



फिलाडेल्फिया से न्यू योर्क वापसी पर रूट ८३ साउथ से आते हुए, पार्सिपनी से कुछ पहले, बांये हाथ पे एक एक्सिट है; जिसका रैम्प दूर तक उतर जाता है! ये रास्ता आगे से दाँए, गोल घूमता हुआ ८३ नोर्थ, यानी उलटे रास्ते हो लेता है; या सीधे जा कर फिर से ८३ साउथ में मिल जाता है! इस रास्ते पर दाँए गोल घूमने के बजाय यदि सीधा जाएं तो लगभग एक मील पर छोटा सा, पिछड़ा हुआ सा टाउन है! मील भर के इस फासले के बीच केवल दो पम्प वाला छोटा सा पट्रोल-पम्प है; और उसी में एक छोटी सी सिग्रट, सोडा, दूध इत्यादि की दूकान भी सटी है! इक्का दुक्का खरीदार कभी कभार शायद आ भी जाते होंगे; अन्यथा ऐसी जगह पर व्यवसाय का आईडिया जाने किस दिमाग की उपज था!



जुलाई के अंतिम सप्ताह, दोपहर लगभग एक बजे, चिलचिलाती धूप में, शायद ९० डिग्री तापमान रहा होगा; मैंने रास्ते पर पेट्रोल-पम्प का साइन देखा और अचानक ये सोच कर एक्सिट ले लिया की गाड़ी का टेंक भरवा लूँगा, और इतनी गर्मी में रास्ते के लिए कुछ बियर भी रख लूँगा! पहुँचने पर देखा, वहां तो दिन में ही उल्लू बोल रहे थे! दूकान का दरवाज़ा भी बंद था, और उस पर साइन लगा था, 'जुलाई और अगस्त' माह में पट्रोल-पम्प दोपहर १२ से ३ बजे तक बंद रहेगा'! मैं वापस आ कर गाड़ी में बैठ गया, और फिर से हाई-वे की ओर गाड़ी घुमा ली! मैं ज्यों ही चलने को हुआ, देखा पम्प से कुछ दूरी पर एक पुराने मॉडल की लेकिन साफ़, सिल्वर कार के पास लगभग ८० बरस की एक व्हाइट-अमेरिकेन बुढ़िया सड़क पर ही कार से टेक लगा कर बेठी थी! मैंने जैसे ही उसकी ओर देखा, उसने तुरंत ही हाथ हिला कर पास आने का संकेत किया! बुढ़िया की हालत देख कर मैं फ़ौरन ही गाड़ी से उतर कर उसके पास पहुंचा! धो कर निचोड़ी हुई चूनर जैसी चेहरे की बारीक झुर्रियों से पसीना, झूलती हुई गर्दन तक बह निकला था! पतली टहनी से पाँव में प्लास्टिक के बीच-सेंडल, और हलकी वन-पीस नारंगी ड्रेस के अन्दर इकहरा बदन मानो सूखे पत्ते सा लहरा रहा था!




"Is everything OK ma'm? What's the matter?" मैंने खैरियत पूछते हुए हाथ पकड़ कर कर उसे उठाया!



"Please save my Roxy, please, have somebody." उसके खुश्क होटों से आवाज़ नहीं निकल पाई!



इससे पहले के बुढ़िया बेहोश हो कर गिर पड़ती, मैंने उसे अपनी गाड़ी में बैठाया, और एयर-कंडीशन चला दिया! बोतल में कुछ पानी बचा था, जिसे पी कर उसकी सांस में सांस आयी! उसने अपना नाम एस्टेला बताया और हमारी तमाम बातचीत अंग्रेजी में ही हुई! एस्टेला ने बताया की एक घंटे पहले लगभग १२ बजे वो अपनी पोती बैक्की के साथ बीच के लिए निकली थी! बैक्की उसे कार में छोड कुछ सामान, जूस, सोडा वगैरा, लेने दूकान पर गयी थी, और अब तक वापस नही लौटी थी! इस दौरान, मेरे यहाँ पहुँचने से पहले, एस्टेला उसे दूकान पर देखने कार से बाहर निकली थी, गलती से चाबी अन्दर रह गयी और कार बहार से बंद हो गयी थी! दो घंटे होने को थे, और बैक्की का कुछ पता नही था! कार में बंद उसका कुत्ता रोक्सी गरमी से मरने को था! मैं तुरंत ही एस्टेला की सिल्वर कार की ओर दौड़ा! कार की खिड़की से मैंने अन्दर झाँक कर देखा, एक छोटा सा सफ़ेद बालों वाला झबरा कुत्ता रोक्सी शून्य आँखों से रहम की आस लगाये पिछली सीट पर बैठा था! मुझे अन्दर झांकता देख विनती के लिए उससे ठीक प्रकार से दुम्म भी नही हिल रही थी! बस आगे के दो पंजों पर मूह टिकाये देख भर रहा था! उसकी अंखों के कोयों पर जमी कीच की लीक, उसके सूख चुके आंसुओं की कहानी कह रही थी! सामने की सीटों के बीच पानी की एक बड़ी बोतल भी थी, लेकिन बोतल इतनी बड़ी थी की रोक्सी का मूंह उसमे दांत गड़ाने के लिए बहुत छोटा था! मैंने नज़र घुमा कर चारों ओर देखा, कहीं कोई आता जाता दिखाई नही पड़ा! तेज़ गर्म हवा आस-पास की धूल को घागर सा घुमाती चोट पे चोट कर रही थी! एस्टेला से बैक्की का सेल्ल नंबर ले कर फ़ोन भी किया, लेकिन उसका सेल्ल भी कार में ही बजता रहा! तीन बजने में अभी काफी समय था, सो दूकान खुलने की भी कोई उम्मीद नही थी!




जब कोई चारा न रहा, तो हार कर पुलिस को फ़ोन किया! पुलिस को लोकेशन समझाने में भी काफी समय लगा! लगभग चालीस मिनट बाद पुलिस वहां पहुंची! एस्टेला भी मेरी गाड़ी से निकल कर बहार आ पहुंची और पुलिस को फिर से कहानी दोहराने लगी! एस्टेला की कार का ख़ास मॉडल होने के कारण लम्बी कोशिश के बाद ही दरवाज़ा खुल पाया! दरवाज़ा खुलते ही रोक्सी ने एक लम्बी छलांग भरी और एस्टेला के पावों में आ गिरा! और फिर देखते ही देखते दम तोड़ दिया! पुलिस का एक मुलाजिम दुकान के पास गया! दरवाज़े पर लगे ताले को देख कर, कुछ सोच कर, वो दूकान के पिछले हिस्से की ओर चला गया! कुछ ही देर में एक लड़की के चीखने की आवाज़ सुनाई दी और पल भर में ही पुलिस के मुलाजिम के साथ एक युवा लड़की और एक अधेड़ युवक लड़खड़ाते हुए आते दिखाई दिए! 




बातों से पता चला की अधेड़ युवक दूकान का मालिक था, और वो लड़की बैक्की थी! दुकानदार, बैक्की को पहले से ही जानता था, और बैक्की अक्सर उसकी दूकान पर नशा करने आया करती थी! पुलिस ने बताया के नशे के सिलसिले में वो दोनों कई बार पहले भी पकड़े जा चुके थे! बैक्की नशे में इतनी धुत्त थी के एस्टेला से माफ़ी तक नही मांग सकी! पुलिस अधिकारियों ने पहले रोक्सी के मरने पर एस्टेला से अफ़सोस ज़ाहिर किया, और फिर मेरा शुक्रिया अता कर, बैक्की और दुकानदार को अपने साथ ले कर र'वाना हो गए! एस्टेला ने बैक्की को नज़र उठा कर भी नही देखा, बस रोक्सी की लाश पर हाथ फेरती रही और रोती रही! पुलिस के जाने के बाद मैंने एस्टेला से पूछा यदि मैं उसकी कुछ मदद कर सकता हूँ? उसने डबडबाई आँखों से देखते हुए बस इतना कहा... 



"मुझे पेट्ट सेमेट्री पहुँचा सकते हो?" 



***

एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी - प्रभु जोशी (अंतिम भाग)

अन्तिम भाग ()
गतांक (५) से आगे

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एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी
प्रभु जोशी


आँख खुली, तब सुबह हो चुकी थी। धूप चढ़ने लगी व चढ़ती चली गयी। मगर अमि नहीं उठी। रम्मी ऊपर आकर आवाज़ देने लगा। उसके जी में आया कि वह जवाब ही न दे और न ही दरवाज़ा खोले। आखि़ उठना ही पड़ा। झुंझलाहट में भरकर सिटकनी हटायी। पापा खड़े थे। अमि घबरा-सी गयी। यह पहला मौका था, जब पापा ने उसे ख़ुद उठाया था,‘‘अमि, क्यों क्या बात है, तबीयत तो ठीक है ?’’ पापा ने अतिरिक्त रुचि ली। अमि और भी अधिक असहज हो उठी। लड़खड़ाते हुए बोली-‘‘जी, नहीं, पापा जी, ...जी ठीक है।’’ पापा लौट गये। वह आगे कुछ बोले इसके लिए जगह ही नहीं बनने दी, उन्होंने। अमि सोचती रही। पहले तो पापा ने कभी नहीं पूछा कि अमि क्या करती है ? कैसी है ? अब ये आरोपित चिंताएँ, आरोपित आत्मीयता क्यों ? आखि़र क्यों ? यह अतिरिक्त परवाह और प्यार क्यों ?

अमि बेमन से नहाई। तैयार हुई और कॉलेज चली गई। यह वही महीना था, जब हवा ख़ुद ठिठुरती तथा ठिठुराती हुई घूमने लगती है। चारों तरफ। ऊपर-नीचे। बाहर-भीतर। लड़कियों की गुलाबी ऐड़ियों को दरकाती हुई। कॉलेज की लैब्स में शुरू हो जाती हैं, प्रैक्टिकल एक्साम्स की तैयारियाँ। कैम्पस में चारों ओर यूकेलिप्टस के पत्ते शाखों और टहनियों से अलग होकर उड़ने लगते हैं।

कॉलेज में कैमिस्ट्री व फिजिक्स के तो पीरियड्स भी अटैण्ड नहीं किए। देर तक लायब्रेरी की अल्मारियों और शेल्फों में कहानियों की किताबें उलटती-पलटती रही- फिर लेबोरेट्री में बैठ कर रिकार्ड बुक्स में डायग्राम्स बनाती रही। घर के लिए कॉलेज से ही देर से निकली। पापा, लोकेश व मिसेज नरूला रोज़ की तरह लॉन की अंतिम व दम तोड़ती धूप में बैठे बतिया रहे थे। रम्मी पौधों को पानी दे रहा था। वह उनकी उपस्थिति की उपेक्षा करती हुई
अपने कमरे की ओर जाने लगी। पापा ने आवाज़ दी। पापा की आवाज़ अमि को हमेशा आदेश लगती है। आदेश भी नहीं सिर्फ कॊशन । अमि चुपचाप उन लोगों के पास पहुँच गयी।


मिसेज नरूला पूछ बैठी, ‘‘अमिया, लोकेश और हम अंग्रेज़ी-पिक्चर देखने जाने की सोच रहे हैं, तुम भी चलोगी न ! गर्ल ऑन मोटर साइकिल।’’

अमि न कर गयी। पापा के चेहरे की ओर देखा। पापा का चेहरा एकदम सख़्त व आँखों में वर्जना की लाल रेखाएँ खिंच उठी थीं-जैसे, कहना चाहते हों कि वह ख़ुद के विषय में निर्णय लेने वाली ख़ुद कौन ? अमि अपने नकारात्मक उत्तर को लेकर भयभीत-सी हो उठी। हाय ! पापा के सामने वह ऐसा कैसे कह गयी। अमि ने अत्यन्त दयनीय मुद्रा में, अपराधी-मन से सफाई पेश करना चाही कि उसके कॉलेज में आज फंक्शन था। सो काफी थक गयी है। मगर, पापा ने उसका वाक्य भी पूरा कहाँ होने दिया। बीच में ही बोले-‘‘रहने दीजिए, मिसेज नरूला, इसके लिए तो इसके कमरे से बढ़ कर दुनिया में कोई भी चीज़ बेहतर नहीं है। चलिये हम चलते हैं।’’ और इन शब्दों के साथ पापा उठ कर अंदर कपड़े बदलने चले गये। तेज़ कदमों से। उनके कदम, कदम नहीं लग रहे थे, बल्कि जैसे मोर्चे की तरफ लपकता कोई बंदूक धारी हो।


अमि का मन डूब-सा गया। हाय, अब वह क्या करे। पापा को कहे कि नहीं, वह जाने को तैयार है या रोने लग जाये। पता नहीं, वह वाक्य कहते समय पापा का चेहरा कैसा विकृत व क्रूर रहा होगा। अमि केवल गर्दन नीचे किये लॉन की घास देखती रही और सामने की कुर्सियों पर बैठे लोकेश व मिसेज नरूला के अस्तित्व का तीखा व व्यंग्यात्मक एहसास करती रही। जूतों की आहट लौट आयी। पापा तैयार होकर लौट आये थे। तीनों हँसते हुए गेट की ओर बढ़ गये। अमि भीतर की तिलमिलाहट दबाये वहीं उसी मोढ़े में धँसी रही। कार की भरभराहट.... गेट छूटा.... और तीनों दूर हो गये। अमि चुपचाप थके कदमों से, आँखों का गीलापन लिये ऊपर अपने कमरे में आ गयी। कमरे में लौटना उसे अपने में लौटना लगता है। वह पलंग से सटी दीवार से पीठ टिका कर, काफी देर तक निर्विकार सी बैठी रही। उसके दिमाग में दीवार के उस पार का कमरा घूमता रहा, जो कभी माँ का था और जिसमें माँ की किताबें और कपड़ों की अल्मारियाँ थीं-जिन्हें वह आज तक नहीं देख पाई। उसे माँ की याद आई और आने लगी उसी के साथ ऊपर उठती हुई एक अदीप्त व्यथा, जिसको उसने कच्ची उम्र से ही अंतस के अछोर अंधेरे में रख छोड़ा था। सामने की खिड़की से अंधेरा और हवा का झोंका एक साथ दाख़िल हो रहा था, जिसमें दीवार पर लटका कैलेण्डर हिल रहा था- उसकी निगाह 28 फरवरी पर रूक गई, जिसे उसने स्याही से लाल घेरे में क़ैद कर दिया था। यह माँ की मृत्यु की तिथि थी- पापा, इस दिन प्रतिवर्ष मोमबत्ती जलाते हैं। उसने माँ के प्रति आर्द्रता के साथ सोचा-’काश माँ ने 29 फरवरी को आत्महत्या की होती तो उसकी पुण्यतिथि चार साल बाद आती। पापा को चार साल तक मोमबत्तियाँ जलाने से मुक्ति मिली रहती।


एक तेज़ भरभराहट। गाड़ी गैराज़ में रखी जा रही है। टिक-टिक, मिसेज नरूला के हाई-हील के सैंडल और इसी स्वर के साथ रिटायर्ड आई.पी.एस. अफसर के जूतों का ठण्डा मार्चिंग स्टेपवाला स्वर। शायद लोकेश नहीं है। फिल्म से लौट आये हैं। रात काफी बीत चुकी है।


अमि की आँख अभी तक नहीं लगी। फिर काफी देर तक ड्राइंग-रूम से बातचीत के अस्पष्ट-स्वर रात की ठण्डी और बेआवाज़ हवा में फैलते रहे। अमि के भीतर एक अज़ीब-सा सी.आई.डी. उभर आया। एकबारगी तो इच्छा हुई कि दबे-पाँव जीने में जाकर सुने कि आखि़र ये लोग क्या बातें करते हैं ? मगर, यह सिर्फ सोच ही पायी। उस स्थिति में
पापा द्वारा पकड़े जाने के बाद की कल्पना ने अमि के ज़िस्म में एक गहरा लिजलिजा कम्पन पैदा कर दिया। फिर कुछ देर बाद सब कुछ चुप। सब दूर अंधेरा। अमि के मन में भय की एक वीभत्स आकृति उभर कर बुरी तरह छाने लगी। उसकी इच्छा हुई कि बेड-स्विच ऑन कर के ख़ुद को स्वस्थ कर ले। मगर, ऐसे में उसका अभी तक जागते रहना उजागर हो जायेगा। अमि ने कँपकँपी रोकते हुए रज़ाई के पल्ले से कस कर ख़ुद को सुरक्षित अनुभव करने की कोशिश की। उसे अक्सर ऐसे त्रस्त क्षणों में भैया की याद आती है। वह आज कॉलेज में आये, भैया के खत की पंक्तियाँ दुहराने लगी, ‘‘अमि, तू चाहे तो एकाध हफ़्ते के लिए यहाँ चली आ न ! बम्बई देख-दाख कर लौट जाना।’’ अमि को भैया के चेहरे की आग्रह करती प्यारी-प्यारी मुद्राएँ याद आने लगीं। वह ज़रूर जायेगी। लेकिन, क्या पापा
उसके प्रस्ताव को अनुमति दे देंगे....? यह सवाल बार-बार अमि के उत्साह पर चोट करने लगा। ज़्यादा से ज़्यादा डाँटेंगे ही न ? भैया कहा तो करते थे-’डाँट पापा के पाठ्यक्रम का अनिवार्य अध्याय।’


और अब अमि घर से भी कतराने लगी थी। ‘घर’ शब्द उसके लिए निहायत ही त्रासद व अर्थहीन हो गया था। घर से कॉलेज के लिए निकलते समय, क्षण भर के लिए उसे लगता कि वह घुटते दायरों में से एक अज़नबी फैलाव के सुखद व आकारहीन अंतराल में आ गयी है। मगर, कुछ मिनटों बाद ही उसे कॉलेज भी एक तहख़ाना लगने लगता। धीरे-धीरे घर और कॉलेज दोनों से ही उसकी आसक्ति टूटने लगी थी। हर समय भैया के पास जाने का
ख़याल मँडराता रहता।


और आज एक हफ़्ते बाद कॉलेज गयी। आज भी न जाती, मगर, पापा ने पता नहीं किसे ‘इनवाइट’ किया था, जो सुबह से ही ‘ड्राइंगरूम’ को व्यवस्थित करने में लगे थे। पापा के परिचितों के बीच अमि हमेशा हीन-भाव से भर उठती है। पापा ने कॉलेज लिए निकलते समय आदेश दिया कि वह ठीक समय पर कॉलेज से लौट आये। अमि हामी में सिर हिला कर कॉलेज आ गयी।

अब पीरियड में बैठे-बैठे भी बोर होने लगी, तो उठ कर लायब्रेरी में आ गयी। वहाँ भी मन न लगा, तो कॉमन रूम में आ गयी। कॉमन रूम में पहुँचते ही अमि खिल उठी। बोर्ड पर उसके नाम का ख़त था। अमि ने बेकाबू उत्सुकता के साथ निकाल लिया। अमि के चेहरे पर फैली इतनी असामान्य उत्सुकता को देख कर पास ही बैठे लड़कियों के झुंड में से एक ने फब्ती कसी-‘‘कहो, अमि डियर, किसे उलझा रखा है, जो ख़त पर ख़त दागता रहता है ? घर के बजाय कॉलेज के पते पर।’’ अमि बिंध-सी गयी। एक चुप्पी थी, एक मौन था, जिसके भीतर कोई तीखी और धारदार चीज़ घोंप दी हो। जी में आया कि बढ़कर तड़ाक् से एक थप्पड़ जमा दे। मगर, सिर्फ ग्लानि-पूरित मन से उनकी तरफ देखती हुई बाहर निकल आयी।


बाहर आ कर उसने ख़ुद को फिर फटकारा कि उसने उस लड़की को डाँट क्यों नहीं दिया। आखि़र, इस प्रकार सब कुछ चुपचाप सहते जाना व एक घोंघे की जिंदगी में क्या फर्क़ रह जाता है ? वह, मुँह में ज़ुबान रखते हुए भी इतनी गूँगी क्यों है ? क्यों नहीं चीख़ पड़ती ? अमि की आँखें डबडबा आयीं। बहुत धीमे से भीतर खौलती वेदना को काबू करने की कोशिश में होठों का एक कोना दाँतों के नीचे दबा लिया और चुपचाप ख़त खोलने लगी। ख़त खोला, तो पता चला कि आठ दिन पहले का लिखा हुआ है। भैया ने बीमार रहते हुए लिखा था। वह आ जाये। उनकी अपनी छोटी बहन अमि से मिलने की बहुत इच्छा है। अमि पढ़ कर विचलित-सी हो उठी। मन शंका-कुशंकाओं की लहरों पर डूबने-उतराने लगा। वह तेज कदमों से टैक्सी स्टैंड पर आ गयी।कॉलेज से घर के रास्ते के बीच पूरे समय आँसुओं को रोकने की कोशिश करती रही। ड्रायवर न उसे सामने के मिरर में रोते देख लिया, तो अमि ने पर्स से गॊगल्स् निकाल कर आँखों पर चढ़ा लिये। अवचेतन में जमे, भैया से जुड़े न जाने कितने ममत्व भरे संदर्भ उभरते रहे। लगा, जैसे वे तेज़ बुखार में हैं और उसका नाम बड़बड़ा रहे हैं।


घर आते ही किराया चुका कर सीधी तेज़ कदमों से अपने कमरे में चढ़ आयी। अमि ने अंदर पहली बार पापा के सामने ख़ुद का निर्णय सुनाने का साहस भर आया था। ज़ल्दी से सूटकेस निकाल कर अपने तमाम ज़रूरी कपड़े जमा लिये। आंसुओं से तरबतर आँखें ऐसी लग रही थीं, जैसे खौलते खारे पानी में दो कच्ची कलियाँ उबल रही हों। बार-बार ख़त में भैया के हर्फ़ों से निकलकर एक आहत आग्रह आ रहा था।

पूरा सूटकेस तैयार हो गया।

अमि ने सूटकेस बंद करके एक गहरी साँस लेकर फेफड़ों में साहस भरने की कोशिश की। तभी उसने नीचे से पापा की गरजती आवाज़ सुनी। वे रम्मी को पता नहीं कौन-सी बात पर डाँट रहे थे, ‘‘नानसेंस, तुम्हें इतना नहीं समझता कि मेहमान आ रहे हैं, और तुमने इम्पोर्टेड ग्लास का फ्लावर पॊट तोड़ दिया, ब्लडी रास्कल।’ फिर एक आवाज़ आई सटाऽक !।’’ जैसे पुलिस के अधिकारी ने अपराधी से मनचाहा उत्तर पाने के लिए उसके जबड़े पर जड़ दिया
हो, ज़ोरदार तमाचा।


अमि भीतर ही भीतर डूबने लगी। रम्मी को थप्पड़ मारने के बाद, अब पापा फनफनाते ऊपर आ रहे हैं। यह सीढ़ियों पर गिरते बूटों की पदचापों से स्पष्ट हो रहा था। अमि के भीतर क्षण भर में ढेर सारी उथल-पुथल मच गयी। लो पापा आ ही गये। आते ही अपनी उस तिक्तता से भरे, स्वर में बोले। बोले नहीं, जैसे बस उसे आदेशित किया - ‘‘अमि, ज़रा ज़ल्दी से तैयार होकर नीचे आओ, हमें लोकेश के पापा-मम्मी को लिवाने स्टेशन चलना है।’’ पापा जिस तेजी से ऊपर आये थे, ठीक उसी तेज़ी से नीचे उतर गए। अपने बूटों की पदचापों के साथ।


अमि की समझ में ही न आया कि अब वह क्या करे ? सूटकेस का एक-एक कपड़ा निकाल कर फेंक दे या ज़ोर-ज़ोर से चीख़ कर रोना शुरू कर दे या ममी की तरह दौड़ कर टैरेस से फ्लैट के पिछले पथरीले फर्श पर कूद पड़े। फरवरी की एक और तारीख कैलेण्डर में फिर घिर जाएगी, लाल स्याही से, मोमबत्ती जलाने के लिए। अमि रोते-रोते साड़ी बदलने लगी। साड़ी बदलते हुए, इस पल में भी उसके सामने सब कुछ गड्डमड्ड था। यह भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं था कि साड़ी बदल कर, जब सीढ़ियाँ उतरेगी तो वह सूटकेस को हाथ में लेकर उतरेगी कि सूटकेस को वहीं छोड़कर।


4, संवाद नगर,
इन्दौर (म.प्र.)
भारत

आगामी अंक में पढ़ें - पहली कहानी के लिखे जाने की कहानी : प्रभु जोशी की ज़ुबानी







एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी (५)

गतांक (४) में आपने पढ़ा -

भैया ने जाने के तीसरे ही दिन बाद ख़त डाला था, अमि के नाम, जिसमें जिक्र था कि वे बम्बई में ही अपने एक इंजीनियर दोस्त के पास पवई के होस्टल में रुके हुए है।


अब आगे पढ़ें ..
एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी ()
प्रभु जोशी


कुछ दिनों बाद ही भैया ने अमि के लिए एक उपहार भेजा था। पापा ने उसे उठा कर खिड़की के बाहर फेंक दिया था। अमि रोने लगी थी, तो शाम को पापा ऑफिस से लौटते समय उसके लिए ढेर सारे स्कर्ट व कुर्तियों के पीसेज़ उठा लाये थे। और बाद इसके पापा हमेशा लाने लगे थे, कुछ न कुछ। अमि को खुश करने के लिए। मगर अमि को वे तोहफ़े कभी अच्छे नहीं लगे। उसे हमेशा लगता, जैसे पापा के द्वारा लायी गयी इन तमाम चीज़ों में, उनका तनाव और उनका निर्मम पितृत्व लिपटा है। उनकी संजीदगी और गुस्सा लिपटा है। फ़्रॊक से चल कर, इस वर्ष से वे साड़ियाँ लाने लगे हैं। उसे इन तोहफ़ों के बदलाव से अपनी बढ़ती उम्र का एहसास होने लगा है। मसलन अब वह बच्ची नहीं, बड़ी हो गयी है। अमि को लगता है ठीक इसी प्रकार साड़ियाँ लाते-लाते पापा उसके लिए ऑफिस से लौटते समय एक दिन कोई लड़का ला देंगे, संजीदगी व गुस्से से भर कर, `कर लो इससे शादी......। आय’म गिफ्टिंग यू अ ब्राइडग्रूम !..... देट्स ऑल !’

मगर, ऐसा नहीं हुआ। पापा में धीरे-धीरे बदलाव आता गया। चेहरे पर की संजीदगी का थक्का कभी-कभी पिघलता दीखने लगता। पापा कभी-कभी एकाएक बहुत खुश लगते। कई बार पापा के इस बदलाव की छाया के पीछे छुपे कारणों को जानने की तीव्र उत्कण्ठा ने अमि को काफी हद तक बेचैन बनाया है। भला ऐसा क्या काम्प्लेक्स या कन्फ्लिक्ट रहा होगा पापा व भैया के बीच, जो पापा ने उनको एकदम काट कर अलग फेंक दिया, जैसे हम फेंक देते हैं, त्वचा की भीतरी सतहों के भीतर से उगने वाला टूटा बाल या कि नाख़ून का सिरा। क्या पापा भैया की अनुपस्थिति से वाकई ख़ुश हैं ? कौन बतायेगा ? किससे पूछेगी यह सब? अमि बेकल हो उठती।

और आखि़र धीरे-धीरे अपने आप ही उम्र की यात्रा के ठहराव का ऐसा फोकल-प्वाइंट आ गया, जहाँ खड़े हो कर अमि को सारा यथार्थ एकदम साफ व उजला दीख गया। अब वह पूरी तरह इतने लम्बे समय से प्रश्नचिन्ह बनी आ रही स्थिति को बड़ी सरलता से समझ चुकी थी। ममी की पापा से दूसरी शादी थी व भैया पहली शादी के थे। यह जान कर अमि को एकाएक ऐसा पहली बार लगा था, जैसे वह अचानक सयानी और बड़ी हो गयी है। बड़ी व अकेली। पापा व भैया के होते हुए भी अकेली। भैया ने एक दिन अवसादग्रस्त आवाज़ में, आँसुओं को पलकों के भीतर ही रोक कर कहा था-‘अमि, कभी-कभी माँ को याद करते हुए लगता है कि मुझे इतनी ममतामयी माँ देकर ईश्वर ने कुछ ज़्यादा ही दे दिया- और बाद देने के ईश्वर को लगा होगा कि वह उतावली में कुछ अधिक उदार हो गया है, नतीज़तन उसने मुझसे माँ को वापस छीन लिया- बस यही समझ लो तुम।’

खट.... खट्..... खट्..... खट्....। शायद पापा अमि के कमरे की ओर चढ़े चले आ रहे थे। उसे समझ में नहीं आ पा रहा था कि अब वह क्या करे ? खिड़की में खड़ी-खड़ी इसी तरह बाहर देखती रहे या फिर बालों में कंघी करने लगे या चुपचाप यों ही खड़ी रहे। क्या वह पापा की उन तीखी नज़रों का सामना कर पायेगी ? इतने में पापा आ ही गये। अमि अपराधी मन में आतंकित भाव लिये फ़र्श की ओर ताकती रही। वहाँ एक चींटी सरकती चली जा रही थी।


चींटी सरकती गयी। क्षण भी सरकते गये। मगर पापा वहीं ठहरे रहे। इतने क्षणों तक कुछ भी नहीं बोले। ‘‘अमि, तुम्हारा कमरा कितना गंदा हो रहा है। रम्मी से कह के साफ करवा लो।’’ एक विराम के बाद यह वाक्य उगला और टैरेस की ओर मुड़ गये। अमि ने सोचा, भाषा, पापा और उसके बीच कितना छोटा पुल बनाती है। छोटा और अस्थायी कि अपने उपयोग के बाद अपने आप ही समाप्त हो जाता है। अमि ने अपने कमरे पर एक नज़र डाली। ग़ालिबन मुआयना कर रही हो। उसका पूरा कमरा साफ व व्यवस्थित ही तो है।

मगर, पापा को पुलिसवालों की-सी व्यवस्था चाहिए। पापा टैरेस की ओर मुड़े। अमि झट से नीचे उतर आयी। लेकिन, कुछ क्षणों के बाद ही पापा भी नीचे आ गये। अमि ऊपर जाने का रुख करने लगी, तो पापा बोले, ‘‘खाना लग गया है। पहले खाना खा लो।’’ एक विराम के बाद यह वाक्य उगला और अंदर ड्राइंग रूम की ओर निकल गए।


अमि ने चाहा कि वह कह दे, ‘‘पापा, मुझे अभी भूख नहीं है।’’ मगर चाह कर भी कुछ नहीं कह पायी। चुपचाप वॊश -बेसिन का नल खोल कर हाथ धोने लग गयी। हाथ धोते हुए सोचने लगी। वह इतना छोटा-सा प्रतिकार भी क्यों नहीं कर पाती ? ज़्यादा से ज़्यादा पापा का चेहरा तनाव भरा हो जाता। या डाँट देते। और अच्छा ही होता न यह सब। पापा का डाँटना पिछले समय से चले आ रहे तनाव को इस हद तक खींच देता, जहाँ आकर वह टूट भी सकता था।

अमि के भीतर कभी-कभी इसी तरह के प्रतिरोधों के ख़याल की लौ उठती है, जो लपट बनना चाहती है। वह ख़ुद को उकसाती भी है कि वह क्यों नहीं इस घर की दीवारों को तोड़ कर बाहर निकल जाती- जैसे कि परिन्दों के चूज़े तोड़ देते हैं, अण्डे की दीवारों को- पर, ऐसे ख़यालों की लौ धीरे-धीरे धुँधुआने लगती है। फिर चुपचाप बुझ जाता है, सब कुछ। अमि हाथ धोकर डाइनिंग-टेबुल के सामने बैठ गयी। पापा ड्राइंगरूम से लौट कर उसके सामने की कुर्सी पर बैठ गए। फिर खाना खाते हुए पापा बोले, ‘‘अमि बेटे, ख़ुद को सँभाल कर रखो। देख रहा हूँ, तुम दिन-ब-दिन बीमार-बीमार और सुस्त होती जा रही हो।’’ अमि ने पापा के मुख से ‘बेटा’ सम्बोधन सुनकर बहुत धीमे से सिर उठा कर उनकी ओर देखा। पापा का चेहरा पहली बार उसे इतना सपाट व निर्विकार लगा। ऐसा चेहरा देख कर उसे कॉलेज की लेबोरेटरी का वह फ्लास्क याद हो उठा, जो बाहर से सख़्त लेकिन भीतर कण-कण में टूट जाने वाले शीतल द्रव से भरा है। पापा के प्रति न चाहते हुए भी वह सहानुभूति से भर उठी। अमि की इच्छा होने लगी, देखे एक बार उस भीतर के द्रव को छूकर तो देखे। मगर, वह बाहर की सख़्ती की कल्पना से ही डर कर रह गयी। ‘बेटे’ सम्बोधन की अनुगूँज भी उसे फलाँग कर पापा के निकट जाने के लिए वाँछित हिम्मत नहीं भर पाई।

रम्मी ने एक चपाती और परोस दी। वह खाती रही। चुपचाप। प्लेट की चपाती ख़त्म हो गयी, तो दूसरी उठायी भी नहीं। और रम्मी ने आवश्यकता न होने पर भी रख दी, तो मना नहीं किया। अंत में उठ गयी। चढ़ कर फिर अपने कमरे में बंद हो गयी। फिर कॉलेज से लायी गई किताब में से एक कहानी पढ़ने की कोशिश की। मगर, उसमें भी ख़ुद को ज़्यादा देर तक न डुबो पायी। अमि को लगा, वह बरसों से उदास और चुप है तथा अब उदासी इतनी गहराई पकड़ चुकी है कि कम से कम पापा के साथ रहते हुए तो वह जनम भर न हँस सकेगी....। ग़ालिबन, अब वह हँसी को ग़ुमशुदा चीज़ों की फेहरिस्त में दर्ज़ कर चुकी है।

ऐसे समय में उसे भैया पर भी गुस्सा आता है। वे क्यों नहीं उबार लेते इस अंधेरे तहख़ाने से? क्यों नहीं लिख देते कि अमि, तू, यहाँ चली आ मेरे पास। बम्बई। पहली बार भैया का ख़त आया था, तब पापा का चेहरा कैसा-कैसा तो भी हो उठा था। अमि को लगा था अब तो वे उसे भी भैया की तरह पीट-पाट कर निकाल देंगे। तब वह क्या करेगी ? और उसने भीतर ही भीतर अपनी भीरूता को फलांगने की कोशिश में एक कमज़ोर निर्णय लिया था कि यदि पापा कुछ कहेंगे, तो वह भी बहस पर उतर आयेगी और कहेगी-‘पापा ये भाई-बहन के रिश्ते हैं। आप इसमें क्यों खाई पैदा करना चाहते हैं ?’ मगर, पापा कुछ नहीं बोले थे, तो उसने ख़ुद रह कर ही भैया को लिख दिया था कि आगे से ख़त वे उसके स्कूल के पते पर ही लिखा करें। और ख़त स्कूल से अब कॉलेज के पते पर आने लगे थे। स्कूल से कॉलेज तक की यात्रा के बीच भैया अपने ख़तों में वैसे ही थे। मगर, पापा बदल गये थे। अमि ने भैया को इस बदलाव का संकेत लिख भेजा था। मगर, भैया ने कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी। गोया उन्हें पहले से ही इस सारी परिणति का पता हो।

अमि सोचते-सोचते घुटने लगी, तो खिड़की पर खड़ी हो गयी। बाहर रोज़ की तरह धुँएली शाम उतर आयी थी। लॊन में कुर्सी डाले पापा व लोकेश बैठे बतिया रहे थे। अमि जब भी पापा व लोकेश को बातें करते देखती है, तो उसे लगता है, जैसे दोनों कोई भयंकर षड्यंत्र रचने में लगे हैं। लोकेश मिसेज नरूला के भाई का लड़का है। पिछले कुछ महीनों से यहीं है और अमि को घूर-घूर कर देखा करता है। अमि ने देखा, मिसेज नरूला भी लॊन में आकर एक खाली कुर्सी पर पसर गयी हैं। खिड़की में खड़े उसे देखा, तो मिसेज नरूला ने अमि को आवाज़ लगा ली, ‘‘अमिया, नीचे आओ न !’’ अमि बहुत अरूचि से नीचे पहुँच गयी। अमि को यह मार्क करके बहुत खीझ होती है कि ये मिसेज नरूला हमेशा ही पापा की ओर कैसे-कैसे तो भी देखा करती हैं ! हँसती भी तो कैसी-कैसी हैं ! मिसेज नरूला को हँसते हुए देखकर उसे हमेशा लगता है, जैसे प्रकृति किसी से जन्म के साथ ही कुछ चीज़ें निर्ममता से छीन लेती है। और, प्रकृति ने मिसेज नरूला से, जो चीज़ छीनी है, वह है, हँसी की निश्छलता। और पापा भी मिसेज नरूला की उपस्थिति में एकदम अजनबी व अनपहचाने-से लगते हैं। वह तअज़्जुब से घिर जाती है कि क्या पापा का मूँछोंवाला चेहरा इतना कोमल-कोमल व प्यारा भी लग सकता है ?

अमि चुपचाप रम्मी द्वारा लाये गये एक मोढ़े पर बैठ गयी।

मिसेज नरूला कह रही है, ‘‘अमिया, भई तुम कितनी रिज़र्व्ड नेचर की हो। बिल्कुल मिस्टिक-रिक्लूज़। घर से कॉलेज और कॉलेज से घर। चलो, आज शॊपिंग कर आओ, लोकेश के साथ।’’ मिसेज नरूला का यह वाक्य सुन कर अमि का चेहरा विकृत हो आया। भीतर से इच्छा हुई कि कह दे-‘भला आप मेरे लिए इतनी चिंतित क्यों हैं ? मुझे नहीं जाना शॊपिंग के लिए।’ क्या करूँगी कुछ ख़रीद कर। सब कुछ तो भरा है, मेरी अल्मारियों में। और दरअसल, जिस चीज़ की मुझे ज़रूरत है, उसके लिए शापिंग नहीं होती।’

अमि ने पापा की ओर देखा।

पापा की विस्फारित आँखों में लिखा पाया, एक सख़्त आदेश कि हो आओ और वह कपड़े बदल कर लोकेश के साथ चली गयी। सारी शाम लोकेश की बदबूदार पसीने से लथपथ पीठ से सटी स्कूटर पर घूमती रही। लोकेश ने कुछ सामान दिलवाया, तो अरुचि से पैक करवा लिया। बोली एक भी शब्द नहीं। भीतर ही भीतर उसका मौन तराशता रहा, उसके लिए कुछ शब्द, जिन्हें वह संकट की स्थिति में शस्त्र की तरह इस्तेमाल कर लेगी। शब्द भी शस्त्र होते हैं और उनके जरिए ही खींची जाती है। लक्ष्मण रेखाएँ।

पूरे समय अलगाव की तीव्र यातना भोग कर लौटी, तो पापा रसोई में थे। पापा का चेहरा अतिरिक्त प्रसन्न था। वे ख़ुद रम्मी के पास खड़े होकर गरम-गरम पकौड़े उतरवा रहे थे। अमि को देखते ही बोले, ‘‘अमि तुम्हें ये खूब पसंद हैं न ! आज मैंने तुम्हारे लिए ख़ुद खड़े रह कर बनवाये हैं। खाओगी न !’’ अमि क्षण भर को, यह दृश्य, पापा का यह वाक्य, यह आग्रह, देख कर स्तंभित रह गयी। अमि की समझ में ही न आया कि इन क्षणों में वह क्या करे ? खूब ज़ोरों से हँसना शुरू कर दे या कमरे में जाकर फूट-फूट कर रोना। उसे लगा, लेबोरेटरी का वह सख़्त फ्लास्क आज अचानक टूट गया है और वह उसकी ममताली तरलता में सराबोर हो उठी है। अमि ने ख़ुद को कोसा कि भला वह कितनी मूर्ख है, जो पापा से जानबूझ कर डरी-डरी व दूर रही। उनका इतना प्यार न पा सकी। पापा कितने प्यारे हैं ! अमि के आनन्द का यह एक अकल्पित चरम बिन्दु था। उसका मन होने लगा, शहर के सबसे ऊँचे मकान की छत पर चढ़ कर ज़ोर-ज़ोर से खिल खिलाकर हँसे। हाँ, खूब ज़ोर से। आकाश की ओर मुँह करके।

मगर, जब डाइनिंग टेबुल पर बैठे, तो पापा ने रम्मी से कह कर लोकेश व मिसेज नरूला को बुला लिया। अमि को लगा, जैसे अचानक गर्म काँच पर किसी ने पानी की बूँदें छींट दी हैं। कुछ क्षणों पहले पापा के विषय में उपजे ख़याल टूट कर छार-छार हो गये। उसे पापा के चेहरे पर रिसती आत्मीयता मात्र एक वहम लगी। एक स्पष्ट धोखा। पापा वही हैं। एकदम वही। अमि से अनकंसर्ड, अनलिंक्ड और षड्यंत्रकारी। अमि वापस ख़ुद की पहली स्थिति में लौट आयी। लोकेश व मिसेज नरूला ठहाकों के साथ पकौड़े खाते रहे। अमि को लगता रहा, यह सब अमि के लिए नहीं था, इनके लिए था। लोकेश व मिसेज नरूला के लिए। वह सोचने लगी, क्या उसके तमाम सुख ऐसे ही होते हैं कि उनके आखि़री सिरे से लटकता रहता है कोई न कोई अचीन्हा दुःख ?

अमि दो-चार पकौड़े उगल-निगल कर उठ गयी।
अमि सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर आ गई।
कमरा खोला तो अंधेरा उससे ऐसे लिपट गया, जैसे वह उससे लिपटने के लिए बहु-प्रतीक्षित हो। वह कमरे में बत्ती जलाए बिना खड़ी रही, जैसे अंधेरे को अनुमति दे रही हो कि वह उससे जितना लिपटना चाहे लिपट ले। वह चाहे तो उसकी देह के रन्ध्र-रन्ध्र में उतर कर उसकी आत्मा को भी लील जाए। बाद इसके बिस्तरे पर पड़ी-पड़ी पता नहीं कब तक रोती रही। काफी देर बाद उठ कर देखा, तो लॊन में ड्राइंग-रूम में जलती बत्ती के प्रकाश का हाशिया चुपचाप घास पर उसी तरह लेटा था। और अब केवल आ रही थीं, कुछ आवाज़ें, जिनमें शब्द थे, ध्वनि थी, मगर अर्थ नहीं थे। अमि को लगा, उसकी संवेदनाओं की गीली ज़मीन पर कोई भयंकर तीखी चीज़ घसीट रहा है। फिर पता नहीं, अमि कब सो गयी। अब सिर्फ सन्नाटे को गाते झींगुर- भर जाग रहे थे।

क्रमश:



आगामी अंक () में पढ़ें
आँख खुली, तब सुबह हो चुकी थी। धूप चढ़ने लगी व चढ़ती चली गयी। मगर अमि नहीं उठी। रम्मी ऊपर आकर आवाज़ देने लगा। उसके जी में आया कि वह जवाब ही न दे और न ही दरवाज़ा खोले। आखि़र उठना ही पड़ा। झुंझलाहट में भरकर सिटकनी हटायी.....





अ-मानव - एस. आर. हरनोट

-मानव
एस. आर. हरनोट



समय के विकराल जबड़ों में अपना अस्तित्व खोए वह एक उजाड़ गांव था। वहां न अब कोई घर था और न खेत खलिहान। किसी अजीब सी कंटीली झाड़ियों का साम्राज्य वहां फैला था। उसके आसपास और दूर-दूर तक जहां भी आंखें देखतीं वीरानगी के सिवा कुछ नजर न आता। घाटियां निपट नंगी दिखतीं। उन पर न घास, न हरी भरी झाड़ियां और न कहीं पेड़-पौधों का नामोनिशां। उनके पीछे के पर्वत डायनासोरों जैसे डरावने दिखते। उनके गर्भ से बाहर झांकती चट्टानें मगरमच्छों के जबड़ों की तरह दिखतीं। तराईयों में बहते नदी-नाले ऐसे सूखे थे मानों कोई भयंकर अजगर अपने शिकार की ताक में चुप पड़ा हो। यह पच्चीसवीं-छब्बीसवीं शताब्दी के बीच का कोई समय था।

कालांतर में वह गांव भारत के अन्य गावों की तरह सुन्दर और जीवन्त रहा होगा। उसके खेत और क्यार गेहूं, जौ, मक्की और धान की फसलों से लहलाते होंगे। खलिहान में बीनने के लिए रखी फसलों पर जब कोई चाचा, ताया या दादा बैलों को घुमाता होगा तो बैलों के गले की धण्टियों की मधुर आवाजों से वातावरण संगीतमय हो जाया करता होगा। आंगन और खलिहान की मुंडेर पर बैठा दादा हुक्का गुड़गुड़ाते जब खांसता होगा तो गांव की औरतों और बच्चों में एक उत्साह और सुरक्षा का भाव जाग जाता होगा। किम्मू और पीपल के पेड़ के नीचे दोपहर और ढलती शामों के वक्त जब चैपालें सजती होंगी तो गांव बड़े-बुजुर्गों के ठहाकों से आच्छादित हो जाया करता होगा। उसके साथ की कुफ्फर-पोखर के किनारे चरांदों से लौटते सुस्ताते, पानी पीते पशु और भेड़-बकरियांे के रेवड़ जब अपनी-अपनी गौ शालाओं को जाते होंगे तो पगडंडियांे में जीवन लौट जाता होगा। प्राइमरी स्कूल के बच्चे आधी छुट्टी में जब उस पोखर के किनारे तख्तियां धोते-सुखाते होंगे तो उनकी किलकारियां पंछियों की चहचाहटों के साथ मिलकर मधुर संगीत पैदा करती रहती होंगी। सुबह-शाम गांव की औरतों और लड़कियों के टोले जब घास काटने जाते होंगे तो उनकी बाहों में सजी कांच की चूड़ियां और पैरों में बंधी पायजेबों की खनखनाहट से घाटियां गूंज जाया करती होंगी। जब वे बांवड़ियों के पास पानी भरने जातीं होंगी तो सिर पर उठाए घड़े और तांबे की टोकणियों की खनखनाहटें भी मन को मोह लिया करती होंगी। किसी के घर जब कन्या जन्म लेती होंगी तो उसे लक्ष्मी या देवी मान कर उत्सव मनते रहते होंगे। गांव में वर्ष भर मेले और त्यौहार मनते होंगे। देवताओं की जातरे होती रहती होंगी। हर सक्रांत को देवता के मंदिर के पास देव पंचायतें लगती होंगी जहां गावों के लोग अपने दुख-दर्द की फरियादें देवता के पास सुनाते होंगे। फसल काटने के बाद जब दूसरी फसल बीजने का मौसम आता होगा तो किसान अपने बैलों को लेकर जब खेत जोतने जाते होंगे तो हलों की फाटों के बीच उनके शरीर से बहती पसीने की बूंदो से धरती नम हो जाया करतीं होंगी।

लेकिन अब ये सभी अतीत हो गया था और टाइम मशीन के जरिये कुछ लोग उस काल में जाने की तैयारियां कर रहे थे। लेकिन उससे पहले इस काल में एक चुनौती उनके सामने मुंह बाएं खड़ी हो गई थी।

अति आधुनिक व विकसित वैज्ञानिकों ने एक दिन उपग्रह से भेजी तस्वीरों से उस उजाड़ जगह को जब चिन्हित किया तो झंखाड़ों के बीच एक जगह उन्हें उसी तरह की मानव आकृति दिखी जैसे मंगल ग्रह पर कभी दिखी थी। मशीनों की मदद से यह पता लगा लिया गया कि वह इक्कीसवीं सदी का कोई मानव है जो अभी तक ज़िन्दा है। उन्होंने कुछ बची-खुची प्राचीन इतिहास की पुस्तकों से इक्कीसवीं सदी के भारत के बारे में जो कुछ जाना-समझा था उसकी हल्की फुल्की तस्वीरें उनके जहन में थीं। इस पांच-छः सौ साल की अवधि में देश की तस्वीर बिल्कुल बदल गई थी। पहले जहां भ्रष्ट और स्वार्थी राजनीति और धर्मान्धता ने सबकुछ नष्ट कर दिया था, वहां एक ऐसी नई पीढ़ी बिल्कुल नए दिमाग के साथ पैदा हो रही थी जो उम्र से पहले ही जवान और स्याने हो जाते थे। उनकी उम्र तीस से पैंतालीस साल मुश्किल से होतीं, लेकिन वे इतने जी लेते मानो कई सदियों के मानव हों। सब कुछ मशीनी। इक्कीसवीं सदी जैसा कुछ नहीं। न दिन और न रात। न कोई मौसम। न नींद न भूख। न धर्म न संस्कृति। न लेखक न कोई साहित्य। न दलित विमर्श न स्त्री विमर्श। न बाजारवाद न भूमंडलीकरण। मां और पिता भी नहीं। न दादी-नानी, न कोई चाची ताई। भाई-बहन भी नहीं। न किसान न उनके गांव। न कोई फसलें। न चैपालें न पोखरें। गरीब और बूढ़े भी नहीं। न पक्षियों के कलरव और न पशु-जानवरों की हुंकारे और दहाड़ें।

रहने-जीने के अति आधुनिक तरीके। हर व्यक्ति के पास भूख-प्यास बुझाने के लिए नए-नए साधन। बच्चे पैदा करने के लिए इंजैक्शन। उठने, बैठने और चलने के लिए इंजैक्शन। उस युग में औरतों की कोई जरूरत नहीं रह गई थी। वैसे भी पहले लड़कियों को पेट में मार दिया जाता था। इसलिए इस युग तक महिलाएं जैसे नदारद हो गईं थीं। किसी भी मर्द में जरूरत के मुताबिक इंजैक्शन ठूंसों और बच्चा पैदा कर लो। उनके कदकाठी भी बहुत छोटे होते। कुल मिलाकर वे रोबोट या एलियन की ही तरह लगते। सब के पास छोटी-छोटी जहाजनुमा उड़न तश़्तरियां थीं जो लेजर तकनीक से सम्पन्न होतीं। जहां चाहें जाएं। चांद-सितारे और दूसरे ग्रहों पर तो लोग ऐसे जाते मानो ससुराल जा रहे हों। इसके बावजूद भी सबकुछ नया-नया करने की होड़।

उस मानव की खोज में एक दल निकल पड़ा था। ....और एक दिन वे उस चिन्हित खंडहर में उतर गए। आवाज सुन कर एक बूढ़ा झाड़ियों के बीच से बाहर निकल आया। उसने देखा कि एक कटोरेनुमा कोई चीज उसके कुछ दूर उतरी है जिसने स्वतः ही वहां की झाड़ियों को जला कर एक साफ सुथरी जगह बना ली है। वह बिल्कुल भी विचलित नहीं हुआ। एक गहरी सांस ली। आंखों में खून तैर आया। सिर सहित पूरे बदन पर झाड़ों की तरह उगे बाल खड़े हो गए। तभी धीरे-धीरे उस कटोरे से पांच छोटे-छोटे लोग उतरे। उनके हाथों में सूक्ष्म लेजर बंदूकें थीं। वह बूढ़ा नहीं समझ पाया कि ये क्या चीजें हैं। सभी उसकी ओर बढ़ने लगे। जैसे वह कोई खतरनाक आतंकी हो। अपनी गनों को सावधान करते हुए। हांालाकि उन्हें किसी खतरे की आशंका नहीं थी फिर भी इस पांच सौ बरस से ज्यादा उम्र के उस आदमी से वे भीतर ही भीतर घबराए हुए थे। उसके पास कुछ नहीं था। न कोई हथियार और न कुछ और। वह तकरीबन सात फुट का आदमी था जिसके सिर और दाढ़ी के बाल घुटनों तक थे। उसके शरीर को उन्हीं बालों ने ढक रखा था। उसने कभी जो कपड़े पहने थे वे मोसमों के साथ गल-सड़ गए थे। पर अजीब बात थी कि उसके शरीर को कुछ नहीं हुआ था। आंखों की नजर ठीक थीं। सांस ठीक थीं। पर उसने पिछले पांच सौ सालों में न कुछ खाया था न बोला ही था। वह भूल गया था कि शब्द भी कोई चीज होते हैं। लेकिन उड़न तश्तरी के उतरते ही उसके कानों में इतने दिनों बाद कोई आवाज गूंजी थी।

वे लोग उसके पास पहुंचे और सभी ने अपनी-अपनी गनें उस निहत्थे पर तान दीं। उसने झटपट उन्हें ऐसे पटक दिया मानों अपने शरीर पर पड़ा घास-फूस झाड़ दिया हो। वे सभी हैरान परेशान। एक ने हिम्मत जुटाई और विनती के स्वर में कहने लगा,

’देखो, हम से डरो नहीं। हम तुम्हारे दोस्त हैं। हम तुम्हें नुकसान पहुंचाने नहीं आए हैं। बस हम यह जानना चाहते हैं कि क्या तुम्हारे पास अभी भी अनाज है ? क्योंकि तुम जिन हालातों में रहते हो, जरूर कोई ऐसी चीज होगी जो तुम्हें इतने बरसों ज़िन्दा रखे हुए है। देखो, हम अति आधुनिक युग के आदमी हैं। हमने अनाज के बारे में सुना है। रोटी के बारे में सुना है। पर उसका स्वाद नहीं चखा है। किसानों के बारे में सुना है। पर उन्हें कभी देखा नहीं है। हमने यह भी सुना है कि इस देश में कभी अनाज के लिए बहुत बड़ा गृहयुद्ध हुआ था। हम गांव नहीं जानते। हम पशु जानवर नहीं जानते। ये सभी हमने एक किताब में पढ़ा है जो मुश्किल से बची थीं।’

वह बूढ़ा उनकी बातों को सुन कर पहले हल्का सा मुस्कुराया और फिर इतनी जोर से हंसा कि मानो उसकी हंसी उस पूरे युग में छा गई हो। हंसी के साथ उसके भयानक और डरावने चेहरे पर कई सदियों की जमीं परतें अजीबो गरीग ढंग से उघड़ने लगीं। उसने अपने को संयत किया। संभाला। वे हतप्रद से उसे देखते रहे।

वह कुछ बोलना चाहता था पर तत्काल बोल नहीं पाया। उसका मुंह फूलता रहा जैसे कोई बड़े गुब्बारे में जबरदस्ती हवा भरने की कोशिश कर रहा हो। अचानक एक भारी भरकम आवाज निकली,

’तुम्हे अनाज चाहिए। पर क्यांे ? इस युग में तुम्हें उसकी क्या आवश्यकता..? तुम्हारे पास तो अति आधुनिक तकनीके हैं। मशीनी मानव है। सुइयां हैं। दवाईयां हैं। जिन्हें लगा-खाकर न भूख लगती है न प्यास। फिर तुम्हें अनाज-रोटी की क्या जरूरत..?’

उन में से एक ने उसकी बातों का जवाब दिया,

’जरूरत नहीं है, पर हम देखना चाहते हैं कि वह होता कैसा है ? उसका स्वाद कैसा है ? उसमें शक्ति कैसी है।’

बूढ़ा दहाड़ा,

’उसकी शक्ति ? देख नहीं रहे हो।’

उसने कुछ इस तरह से बाहें फैलाई जैसे उनकी इस दुनिया को वह अपनी बाहों में समेट लेगा। ऐसा करते ही उसकी बाहों से कई मन मिट्टी, घास, पत्थर नीचे गिरते रहे। उसने हुंकारते हुए कहना शुरू किया,

’तुम सभी ने उसकी शक्ति मिटा दी। नया और अति नया करने के चक्कर में सब कुछ नष्ट कर दिया। अपने देश को नया युग बनाने के लिए तुमने गरीबी के बदले गरीब मिटा दिए। कामगरों को नई-नई मशीने विकसित करके समाप्त कर दिया। देवता और भगवान बनने के लिए मन्दिर, मस्जिद और गुरूद्वारे नष्ट कर दिए। जवान दिखने के लिए बूढ़े नहीं रहने दिए। रिश्ते खो दिए। संस्कृति मिटा दी। धर्म नहीं रहने दिया। यहां तक कि अ-मनुष्य पैदा कर दिए। माताओं की ममता नहीं रहने दी, जो किसी भी युग में सर्वोपरि होती थीं। जो संसार की रचना करती थी। तुमने उस मां को भी नहीं रहने दिया। तुमने जो कुछ पाया वह अप्राकृतिक था और आज भी है......तुम यहां से चले जाओ.........नहीं तो तुम बचोगे नहीं।’

वे उसकी बातें सुन कर चुपचाप खड़े रहे। उन्हें कुछ समझ नहं आ रहा था। थोड़ी देर बाद उन सभी ने अपने हाथ जोड़ दिए। यह तरीका भी उन्होंने उस पुरानी किताब में कहीं पढ़ा था.........।

इस विनम्रता से उस बूढ़े के हृदय में वह पुराना सोया प्यार जाग गया। वह प्यार जो पिता या मां के हृदय में अपने बच्चों के लिए छिपा रहता है।

उसने अजीब तरीके से आंखों की पुतलियां घुमाई। फिर जमीन पर हाथ मारा। कई मन मिट्टी निकल कर बाहर आई, जिनमें असंख्य काली चींटियां थीं। वे सभी उन चींटियों को देख कर हैरान रह गए कि इस धरती पर आज भी कोई इतना सूक्ष्म जीव रहता है। पहले वे पगलाई सी बाहर आई। फिर जमीन के भीतर कहीं लोप हो गई। थोड़ी देर बाद कतारों में निकलने लगीं। सभी के मुंह में अनाज के दाने थे। किसी के मुंह में गेहूं का दाना, किसे के चावल का तो कोई बथ्थू-बाजरा लेकर आ रही थीं। देखते ही देखते उन्होंने एक तरफ अनाज का ढेर लगा दिया।

’लो! उठा लो, जितना चाहिए। उठा लो। यही अनाज है। इसी से रोटी बनती है। किसान इसे ही पैदा करता था। लेकिन तुमने सबकुछ खत्म कर दिया। बस, चींटियों ने अपने घरों में इसे बचाए रखा। याद रखो कोई भी युग, कोई भी समय, कोई भी मौसम बिना मेहनतकशों और किसानों के ज़िन्दा नहीं रह सकता। तुम अति आधुनिक विकसित देश के लोग तो हों पर बुतों से बढ़कर कुछ नहीं हो। अभागे हो तुम। जाओ अब, चले जाओ यहां से और ले जाओ इस अनाज को। हो सके तो भारत के उस किसान को ज़िन्दा करो जोे इस दुनिया के आधार हैं। जिसे तुमने बर्वाद कर दिया है।

यह कहते हुए उस बूढ़े नें अपनी आंखें बन्द कर दीं।

वे सभी बुत बने वहीं जैसे जड़ हो गए। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। वे यह देख कर हैरान थे कि अनाज के इतने छोटे दाने होते हैं और जिन्हें अभी तक इन छोटे-छोटे काले कीड़ों ने कहीं धरती के नीचे जमा कर रखा है। उनके मन में एकाएक खुराफात सूझी। वे उन कीड़ों को अपने साथ ले जाना चाहते थे। लेकिन इससे पहले कि वे कुछ योजना बनाते, चींटियां सारे का सारा अनाज लेकर गायब हो गई थी। वे कभी जमीन पर तो कभी उस बूढ़े की तरफ देखते। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या है। बूढ़े ने उनकी तरफ पीठ फेर ली थी। उन्हें लग रहा था जैसे उनके सामने कोई पहाड़ आकर खड़ा हो गया हो।

वे जैसे ही पीछे मुड़े तो यह देख कर हतप्रद रह गए कि असंख्य चींटियां उनकी उड़न तश़्तरी को धरती के नीचे घसीट रही थीं।



-ओम भवन, मोरले बैंक इस्टेट, निगम बिहार, शिमला-१७१००२


एक चुप्पी......

पिछले अंक (३) तक आपने पढ़ा -----


एक दिन भैया के संदर्भ में वे जैसे ख़ुद से जूझते हुए बड़बड़ाए थे -‘साला आखि़र, अपनी उस कमीनी व धोखेबाज़ माँ की तरह ही निकला।’ ममी के लिए पापा इतने गंदे शब्द भी इस्तेमाल कर सकते हैं, उसने पहली बार सुना था। अमि को पतानहीं, ममी कैसी रही होगी।


एक चुप्पी क्रॊस पर चढ़ी
- प्रभु जोशी


अब आगे पढ़ें - (४)

पापा ने ममी के तमाम फोटोग्राफ्स फाड़ डाले थे। भैया के मुँह से ही यह भी जाना था कि ममी को लिखने-पढ़ने का खूब शौक था। साड़ियाँ या सौंदर्य प्रसाधन की चीज़ों की जगह ममी पत्रिकाएँ किताबें भर लाती थीं और इसी बात को लेकर ममी पापा के बीच टेन्शन बढ़ता गया था। नतीज़तन पापा ने ममी को एक कमरा अलग से दे दिया था। ऊपरी मंज़िल का। जिसमें ममी अपनी किताबों और कपड़ों की अल्मारियों के साथ अलग-सी रहने लगी थी। पापा से लगभग अलग और असम्पृक्त।


भैया
ने ही बताया था ममी बहुत मर्मस्पर्शी कहानियाँ लिखा करती थीं और उनकी एक कहानी छपने पर पापा ने ममी को बूटों की ठोकरों थप्पड़ों से बहुत बेरहमी से पीटा था।भैया तब काफी छोटे थे और उन्होंने भी तब किसी आई।पी.एस. अफसर का गुस्सा पहली बार देखा था। ममी खूब रोयी थीं। और जब सुबह हुई, तो ममी की लाश दुमँज़िले फ्लैट के पिछले पथरीले फर्श पर मिली थी। ममी ने टैरेस पर से कूद कर आत्महत्या कर ली थी। और जब पापा भैया के बीच झगड़ा हुआ था, तो अमि को डर लगने लगा था, भैया भी किसी भी क्षण, उसकी आँख लगते ही फ्लैट के टैरेस से पथरीले फर्श पर कूद पड़ेंगे। वह रात भर सिसकती हुई भैया के सीने में दुबकी सोयी रही थी। पूरी रात उसकी आँखों में पापा की अँगुलियों जूतों कीटोही तैरती रही थी। चमकती हुई। अंधेरे में। किसी बनैल पशु की आँख-सी। अमि इतना सारा सोच कर घबरा-सी उठी। उठ कर उसने लाॅन की ओर की बंद खिड़की खोल दी। हवा का एक ठण्डा झोंका पीले गुलाबों से होता हुआ कमरे में गया। मगर, घुटन फिर भी कम नहीं हुई। अमि पीले गुलाबों की ओर टकटकी लगायेदेख रही थी। उसे याद आया, उस दिन अमि ने अपने बालों में पीला गुलाब लगा लिया था काॅलेज के लिए निकलते वक़्त पापा लाॅन में टकरा गये थे। और उन्होंने अमि को आवाज़ लगा कर अपने पास बुलाया था। और चुपचाप उसके बालों में से वह पीला गुलाब निकाल कर फेंकते हुए बोले थे, ‘हाऊ गाॅडी-कलर्ड फ्लावर इट इज़ अमि का चेहरा रुआँसा हो आया था। तब से अमि ने उन फूलों को हाथ नहीं लगाया। वे खिलते हैं और वहीं सूख जाते हैं। अमि को बहुत दिन बाद पता लगा था, ममी को पीले गुलाब और अशोक के पेड़ बड़े प्यारे लगा करते थे। इन्हें लाॅन में उन्होंने ख़ासतौर पर लगवाये थे। माली से कहकर अपने सामने। ख़ुद खड़े रह कर। वह पीले गुलाबों की तरफ देखने लगी। देखकर उसे लगा, जैसे धूप भी अब इन पर कुछ ज़्यादा बेरहमी से ही गिरती है। अमि के भीतर उठे इस निष्कर्ष ने, आँखें गुलाबों से हटा कर अशोक की तरफ कर दी। वहाँ देखते हुए पहली बार ख़याल आया, ग़ालिबन अशोक के पेड़ ने भी पापा केअटेंशनका कमाण्ड सुनकर अपनी शाखें अपनी देह से ऐसी चिपका ली कि आज तक खोल ही नहीं पाया। हमेशा सहमा सा, सीधा खड़ा रहता है। बिना हाथ के आदमी-सा।यक--यक उसके भीतर भैया की याद एक टीस की तरह उठी और वह सिहर सी गई।उसने विश्लेषित किया कि ममी को याद करते वक़्त भैया भैया को याद करते ही ममी याद आने लगती है.... भैया के चले जाने के बाद से उनके कमरे की ओर तो अमि से देखा तक नहीं जाता।


क्रमश:



आगामी अंक (५) में -
भैया ने जाने के तीसरे ही दिन बाद ख़त डाला था, अमि के नाम, जिसमें जिक्र था कि वे बम्बई में ही अपने एक इंजीनियर दोस्त के पास पवई के होस्टल में रूके हुए है। कुछ दिनोंबाद ही भैया ने अमि के लिए एक उपहार भेजा था। पापा ने उसे उठा कर खिड़की के बाहर फेंक दिया था। अमि रोने लगी थी, तो शाम को पापा आफिस से लौटते समय उसके लिए ढेर सारे स्कर्ट व कुर्तियों के पीसेज़ उठा लाये थे। ......


एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी - प्रभु जोशी (३)

गतांक से आगे
(३)
एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी
- प्रभु जोशी


कँघी उठा कर काफी देर तक यों ही उसे अपने घने और लम्बे बालों में घुमाती रही। अक्सर, अमि छुट्टी के दिन ऐसा ही करती है। रोज़मर्रा के अपने छोटे-छोटे कामों को अनावश्यक रूप से लम्बा करके उनमें ख़ुद को न चाहते हुए भी उलझाये रखती है। एक बार छुट्टी के दिन रोज़ की तरह ज़ल्दी निबट गयी थी, तो लगने लगा था कि दिन इतना लम्बा हो गया है कि शाम का इंतजार करते-करते तो वह पागल हो जायेगी। इस प्रकार का अनुभव करने का एकमात्र कारण पापा के सामने ज्यादा देर तक पड़ते रहना ही था। आज छुट्टी है। इसलिए अमि को यह दिन कल से ही बड़ा भयंकर व अनावश्यक रूप से लम्बा लग रहा है। उसने सोचा, आज का पूरा दिन बंदूक के सामने खड़े किसी शिकार की-सी घोर मानसिक यंत्रणा के बीच बीतेगा। लेकिन, उसने निष्कर्ष निकाला कि उसकी स्थिति तो शायद उस शिकार से भी बदतर है, क्योंकि, शिकार के लिए तो कुछ क्षणों बाद
ही ‘ठाँय’ होता है। और हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति ! एक चैन ! सब कुछ प्रलय। मगर, उसे तो हर क्षण मरते रहना पड़ता है। जीते हुए मरते रहना पड़ता है। उसे तब प्रगति पुस्तक भण्डार से ख़रीदी गई एक किताब का संदर्भ याद आया, जिसमें रूसी ज़ार द्वारा मोबेली नाम के एक शख़्स को सुबह गोली मार दी जानी होती है, तो रात भर में उसके सारे बाल सफेद हो गये थे। वह अपने इतने घने और लम्बे बालों के एकाएक सफेद हो जाने की कल्पना करके घबरा-सी उठी थी।......


अपनी स्थिति को इतने दयनीय निष्कर्ष की गोद में डाल कर वह ख़ुद के प्रति उपजी आत्मदया में भर कर काफी भावुक हो उठी। उसे लगा, उसके अंदर कोई एक और अमि है, जो उसकी स्थिति को हमेशा अतिरिक्त आत्मीयता और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण के साथ देखती है। ख़ुद की स्थिति का ऐसा विश्लेषण करने पर दोहरे व्यक्तित्व की उपस्थिति का एहसास अमि को भीतर तक असहज बना गया। आखि़र, उसमें यह दूसरी अमि कौन है ?हाँ, कौन है ? अंदर एक कुनमुनाती आवाज़ मन की भीतरी दीवारों से एक अनुगूँज की तरह
टकराने लगी....


बहरहाल, ठीक इस वक्त बँगले के पार्टीशन के उस पार के कमरों में भी टकरा रही थीं, दूसरी आवाज़ें..... प्रतिध्वनित होती, आवाज़ें जो पापा की व लोकेश की थीं। उसने कभी उनको सुनने की कोशिश नहीं की। करती भी नहीं कि पापा व लोकेश क्या बातें करते हैं ? उसे याद आया, घर का यह पार्टीशन भैया की अनिच्छा से हुआ था। पार्टीशन को लेकर पापा व भैया के बीच काफी कुछ अघट-सा घट गया था। तब उसने कुछ ख़ास नहीं समझा था कि पापा व भैया के बीच भी पार्टीशन थे। हज़ार-हज़ार पार्टीशन। भैया खूब नाराज़ होकर अपने एक दोस्त के पास बम्बई चले गये थे। और उनके जाने के एक हफ़्ते बाद ही पापा ने आधा फ्लैट किराये पर उठा दिया था, मिसेज नरूला के लिए......। अमि को लगा, भैया के ख़यालों का भीगा फाहा, उसे मन की भीतरी गहराइयों तक तर कर गया है। अमि उदास हो उठी। भैया के विषय में सोच कर उदास होते समय पापा उसे हमेशा एक बेहद क्रूर व षड्यंत्रकारी व्यक्ति लगते रहे हैं, जो बुनता रहता है, रेशम के कीड़े की तरह कोई तन्तु। एक दिन भैया के संदर्भ में वे जैसे ख़ुद से जूझते हुए बड़बड़ाये थे-‘साला आखि़र, अपनी उस कमीनी व धोखेबाज़ माँ की तरह ही निकला।’ ममी के लिए पापा इतने गंदे शब्द भी इस्तेमाल कर सकते हैं, उसने पहली बार सुना था।

क्रमश:>>>>>
आगामी अंक में समाप्य

उस दिन का गांधी

उस दिन का गांधी

राजकिशोर

गरमी का महीना था। दोपहर का समय। दिल्ली की गरमी अपने चरम पर थी। ड्राइवर बस को दौड़ाए लिए जा रहा था, जैसे वह कोई अपराध करके भागा हो। कंडक्टर पीछे से दरवाजे को ठक् ठक् ठोंकते हुए उसका हौसला बढ़ा रहा था। अचानक बस दिल्ली गेट के स्टॉप पर रुकी। एक अधेड़-सा आदमी कंडक्टर से लड़ते-झगड़ते उतरा और बस के सामने जा कर खड़ा हो गया। दोनों के बीच हो रहे वाक्य विनिमय से पता चला कि वह यात्री एक स्टॉप पहले एक्सप्रेस बिल्डिंग पर उतरना चाहता था, पर कंडक्टर ने वहां बस नहीं रुकवाई। यात्री का कहना था कि वह इस गरमी में पैदल वापस नहीं लौटेगा। उसकी मांग यह थी कि बस से वापस जाने के लिए उसे एक रुपया लौटाया जाए, जो उन दिनों बसों का न्यूनतम किराया था। कंडक्टर देना नहीं चाहता था। यात्री का कहना था कि या तो मुझे एक रुपया लौटाओ या मेरी देह पर से बस चलाओ। पांच-सात मिनट के बाद कंडक्टर ने ऊबी हुई हार मान ली और यात्री की तरफ एक रुपए का सिक्का इस तरह फेंका जैसे भिखारी की ओर फेंकते हैं। इसके पहले कि बस रफ्तार पकड़ती, मैं भी उतर गया -- उस पागल सरीखे आदमी को देखने के लिए, जो एक रुपए का अन्याय सहन कर पाने के परिणामस्वरूप अपनी जान देने पर आमादा था। दुबला-पतला शरीर, उस पर मामूली कुरता-पाजामा और पैरों में सस्ती-सी चप्पलें। चेहरे पर रहस्यमय आत्मतुष्टि और आंखों में चमक।


लगभग यही हुलिया उस आदमी का था जो किसी और दिन पता नहीं कहां से कर फुटपाथ के पांच-छह मलिन बच्चों के बीच खड़ा हो गया था। यह घटना रामकृष्णपुरम की है। शाम हुआ चाहती थी। उस वक्त मैं एक दुकान पर खड़ा हो कर चाय पी रहा था। आधी प्याली पी लेने के बाद ही चाय का मजा दुगुना करने के लिए सिगरेट सुलगा ली थी और अपने को व्यस्त रखने के लिए इधर-उधर आंखें दौड़ा रहा था। बीच सड़क पर बसें, कारें और तिपहिए आ-जा रहे थे। जब लाल बत्ती हो जाने से गाड़ियां रुक जातीं, तो वही मलिन लड़के कारों के आगे-पीछे भीख मांगने लगते थे। उस दूसरे अधेड़ आदमी के हाथ में पांच रुपए वाली कई चाकलेटें थीं। दृश्य के और दिलचस्प होने की उम्मीद में चाय का प्याला जल्दी-जल्दी खत्म कर मैं फुटपाथ पर उन लड़कों के निकट सरक आया।


चाकलेट वाले आदमी ने पता नहीं क्या इशारा किया कि सभी मलिन लड़के तेजी से आगे भागने लगे। मुसकराता हुआ अधेड़ उनके पीछे-पीछे। आगे एक चांपाकल था। देखते ही देखते वह सार्वजनिक हम्माम बन गया। अधेड़ ने एक-एक के हाथ में साबुन की छोटी-छोटी टिकिया रखी। लड़के रगड़-रगड़ कर नहाने लगे। उसके बाद हरएक को खादी का पतला-छोटा तौलिया दिया गया। उसे पहन कर लड़कों ने अपने कपड़े धोए। अब हरएक की हथेली पर एक-एक चाकलेट थी। थोड़ी देर बाद सभी को दो-दो केले मिले। मुझे देर हो रही थी। मैं आगे के दृश्य देखने की स्थिति में नहीं था। अपनी बस पकड़ने के लिए मैं उलटी दिशा में बढ़ चला। मेरी आंखें नम थीं और हृदय उत्फुल्ल।


तीसरी घटना समाचार अपार्टमेंट्स के पास की है। हम दो मित्र मार्क्सवाद और गांधीवाद पर बातचीत करते हुए मयूर विहार फेज - एक से पैदल रहे थे। तभी फुटपाथ पर एक किनारे बेसुध लेटी हुई नंगी औरत पर हमारी नजर पड़ी। लगातार नहाने से शरीर काला हो गया था। बाल उलझे हुए थे। या तो पागल थी या बीमार और कमजोर। कमर के आसपास उसने कुछ बांध रखा होगा, जो नींद या बेहोशी में खुल कर उड़ गया था। गनीमत यह थी कि उसका चेहरा रेलिंग की तरफ था। हमने कुछ क्षण उसकी तरफ देखा और अपनी-अपनी नजर झुका ली। उसका अस्तित्व मानो पूरी दिल्ली पर थूक-सा रहा था। इस थूक की बूंदें हमारे ऊपर भी पड़ रही थीं।


तभी वहां से एक चालीस-पैंतालीस साल की महिला गुजरी। उसने भी उस औरत की नग्नता को देखा। ठिठकी। उसके माथे पर ही नहीं, पूरे बदन पर बल पड़े। उसने पर्स से मोबाइल निकाल कर किसी को फोन किया। शायद सौ नंबर को। वहां से कोई और नंबर दिया गया। उस पर फोन किया। लगा, वहां से भी कोई और नंबर दिया गया। अब तक वह भली औरत परेशान हो चुकी थी। उसने खीज कर मोबाइल पर्स में रखा। अपना दुपट्टा उतार कर हाथ में लिया और उससे लेटी हुई औरत की नग्नता को ढक दिया। तभी उसे शक हुआ कि दुपट्टा हवा से उड़ जाएगा। उसने आसपास से तीन-चार पत्थर के टुकड़े उठाए और उनसे दुपट्टे को जहां-तहां से दबा दिया। इस बीच दस-पंद्रह तमाशबीन जमा हो गए थे। सबकी नजर से बचते हुए वह जिधर जा रही थी, जाने लगी। भीड़ के साथ-साथ हम भी छंटने लगे। अब हम दोनों अपने लिए ही काफी भारी हो चले थे।

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