अद्भूत मनीषा व विरल प्रतिभा के स्वामी डॉ. रामविलास शर्मा पर कथाकार उदय प्रकाश द्वारा निर्मित यह वृत्तचित्र महत्वपूर्ण व संग्रहणीय है -
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यशस्वी क्रान्तिकारी लेखक
यशस्वी लेखक यशपाल से कौन हिन्दी का सुधी पाठक परिचित न होगा। उनके बृहद् उपन्यास ‘झूठा सच’ से लेकर ‘परदा’ तक के गद्य में जो जादुई भावोन्मेष की शक्ति है वह आलोचकों को समीक्षा के लिए ही नहीं अपितु साधारण पाठक को भी पुनर्पाठ के लिए लुभाती, उकसाती है।
मेरे लिए यशपाल का एक अर्थ और है, हिन्दी का वह प्रतिष्ठित लेखक जो पंजाब के भाषायी विभाजन के साथ हिमाचल में हिन्दी के लिए लड़ते एक अकेले लेखक ( मेरे पिताश्री श्री इन्द्रजीत देव) को दिए जाते सरकारी/ गैरसरकारी उत्पीड़न की सुध लेने सुन्दरनगर हमारे यहाँ आए थे। .... और जिनके सान्निध्य का सुअवसर अपने बालपने में ही मुझे मिला था। साथ ही जिनके ‘झूठा सच’ में कितनी बार अपनी बुआ, दादी, दादा और उनके तत्कालीन समय, समाज व परिवेश को जीवन्त होते देखने के यत्न किए हैं.....
खैर ... आप देखें उन्हीं यशपाल पर केन्द्रित/निर्मित यह वृत्त चित्र , जो ३ भागों में है -
भाग १
भाग २
भाग ३
"सन्नाटे का छंद" : दुर्लभ डॉक्यूमेंट्री (अज्ञेय) : पहली बार नेट पर
सन्नाटे का छंद
अज्ञेय जी से सीधा दृश्य-संवाद : जन्मशताब्दी वर्ष पर विशेष
अज्ञेय जी से सीधा दृश्य-संवाद : जन्मशताब्दी वर्ष पर विशेष
कविता वाचक्नवी
गत दिनों स्वर- चित्रदीर्घा के पाठकों के लिए कवि अज्ञेय के स्वर में काव्यपाठ ( असाध्यवीणा ) प्रस्तुत किया था, जिसे मित्रों ने बहुत रोमांचकारी अनुभव की भाँति लिया| आज उस से और आगे बढ़ते हुए अज्ञेय जी को साक्षात देख - सुन पाने का यह क्रम प्रस्तुत कर रही हूँ | मुझे तो इन वीडियो में अज्ञेय जी को देखना अत्यंत दुर्लभ रोमांच से भर गया| उनकी कविता की प्रौढ़ता और गद्य की गंभीरता के अनुभवों के बीच से आगे बढ़ते आते, यकायक आज पर आ कर उन्हें अपने सृजन के बहाने मन में झाँकते देखने का यह विरल अवसर पहली बार देखने पर आप को भी मेरी तरह आलोड़ित करेगा व उनकी रचना प्रक्रिया को समझने की एक दृष्टि भी देगा | हर नए पुराने रचनाकार के लिए ये अनुभव पाथेय सिद्ध हो सकते हैं |
हिन्दी काव्यधारा के एक शीर्ष रचनाकार अज्ञेय की जन्मशताब्दी पर देश विदेश में बसे उनके प्रशसकों के लिए इला डालमिया की ओर से ( ५ भागों में प्रस्तुत यह वृत्तचित्र ( डॉक्यूमेंट्री ) एक विनम्र श्रद्धांजली तो है ही, साथ ही समूचे काव्यजगत् / साहित्यजगत् को एक अनूठी भेंट भी है|
उनके प्रति आभार व्यक्त करते हुए साहित्यिक सेवा में प्रस्तुत हैं क्रमशः वे पाँचों भाग -
1) : एक तनी हुई रस्सी है जिस पर मैं नाचता हूँ
2) : समाज में आने के लिए मुझे काफी प्रयत्न करना पड़ा
3) : मेरी घूमने की प्रवृत्ति और आज़ादी का आकर्षण
4) : कवि एक साथ ही पुरुष और स्त्री दोनों होता है
5) : यों मत छोड़ दो मुझे, सागर! यों मत छोड़ दो ...
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