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केदार सम्‍मान 2013



केदार सम्‍मान 2013 
‘रोशनी के रास्‍ते पर’ के लिए अनीता वर्मा सम्‍मानित

कविता अपराध बोध से मुक्‍त करती है – नरेश सक्‍सेना



अनीता वर्मा की कविताएँ सकारात्‍मक एवं संवेदनात्‍मक जीवन की माँग रचती कविताएँ हैं जो एक ऐसे आंतरिक विश्‍वास को मुट्ठी में कसकर आगे बढ़ती हैं कि ‘हत्‍यारे समय’ में भी घर और ‘पतझड़ समय’ में हरी संवेदना का अनुरोध बचा रहे। ये कविताएँ समाज की निस्‍तेज सतह के नीचे दबे पड़े अर्धपूर्ण अन्‍तर्विरोधों को उभारती हुई बृहत्‍तर समाज के दु:ख दर्द, निराशाओं उत्‍साहों, आवेगों की सहभागी होती हैं और उम्‍मीद का हाथ पकड़ कर दार्शनिक समयहीनता के वीरान में भटकने से बच जाती हैं। अनीता वर्मा की कविताएँ अभियानों में शामिल होने के आग्रह की कविताएँ हैं। वरिष्‍ठ कथाकार महेश कटारे ने अनीता वर्मा की कविताओं पर यह वक्‍तव्‍य उन्‍हें केदार सम्‍मान 2013 दिए जाने के अवसर पर दिया। 





महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के इलाहाबाद स्थित क्षेत्रीय केंद्र के सत्‍यप्रकाश मिश्र सभागार में इलाहाबाद के तमाम वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों एवं सुधीजनों के बीच वरिष्‍ठ कवि श्री नरेश सक्‍सेना एवं वरिष्‍ठ कथाकार श्री विभूति नारायण राय के द्वारा उन्‍हें प्रशस्ति पत्र, शॉल, स्‍मृति चिन्‍ह और सम्‍मान राशि प्रदान की गई। सम्‍मान समारोह के अध्‍यक्ष श्री नरेश सक्‍सेना ने कहा कि अपने से युवतर कवियों को सम्‍मानित होते देखना बहुत सुखद अनुभव है। अनीता वर्मा की कविताओं में जटिलता नहीं है। उन्‍हें लगातार मनुष्‍यता माँजती रहती है। उनकी कविताएँ अपराधबोध से मुक्‍त करती हैं। सम्‍मान समारोह के मुख्‍य अतिथि श्री विभूति नारायण राय ने कहा कि अनीता वर्मा की कविताएँ मुझे इसलिए प्रिय हैं, क्‍योंकि वे समय और अपने समाज से मुठभेड़ करती हैं। संकट के दौर में उनकी कविताएँ याद आती हैं यही इनकी ताकत है। 


सम्मान प्राप्‍त करने के उपरान्‍त सुश्री अनीता वर्मा ने अपने वक्‍तव्‍य में कहा कि कविता पढ़ने और पढ़ाने के क्रम में मेरा केदारनाथ अगवाल की कविता से गहरा परिचय हुआ। उनकी कविता के सहज मानवीय विंब मुझे प्रभावित करते हैं। जनता के चहेते ऐसे कवि के नाम पर स्‍थापित सम्‍मान को ग्रहण करना मेरे लिए सौभाग्‍य की बात है। उन्‍होंने कहा मेरे लिए कविता जीवन की तरह है, वह हृदय से निकलती हुई एक आवाज है। यह अन्‍तर के स्‍पंदनों के साथ-साथ बाहर की आवाजों की भीतर ले जाकर गुंजाने की एक छोटी- सी कोशिश है। 


केदार शोधपीठ (न्‍यास) बांदा द्वारा आयोजित इस गरिमापूर्ण सम्‍मान समारोह का संचालन डॉ. संजय श्रीवास्‍तव ने किया। अतिथियों का स्‍वागत प्रो. ए.ए. फातमी, श्री असरार गांधी, प्रो. अनीता गोपेश, सुश्री संध्‍या नवोदिता द्वारा किया गया। समारोह के अंत में समस्‍त अतिथियों एवं सुधीजनों का आभार केदार सम्‍मान समारोह के सह संयोजक प्रो. संतोष भदौरिया ने किया।


केदार सम्‍मान समारोह में प्रमुख रूप से जियाउल हक, रामजी राय, ए.ए. फातमी, असरार गांधी, हरीशचन्द्र पाण्डेय, उमेश नारायण शर्मा, असरफ अली बेग, अनीता गोपेश, अनुपम आनन्‍द, के.के. पाण्‍डेय, जयकृष्‍ण राय तुषार, नीलम शंकर, सालेहा जर्रीन, फखरूल करीम, संध्‍या नवोदिता, रामायन राम, सुभाष चन्‍द्र गांगुली, एहतराम इस्‍लाम, रतिनाथ योगेश्‍वर, श्रीरंग पाण्‍डेय, अनिल सिंह, अनिल रंजन भौमिक, आनंद मालवीय, पूर्णिमा मालवीय, सविता सक्‍सेना, निलय उपाध्‍याय, सुधीर सुमन सहित तमाम साहित्‍य प्रेमी उपस्थित रहे।

ध्यातव्य है कि 'केदार सम्मान' व 'केदार शोध पीठ न्यास' के सचिव नरेंद्र पुंडरीक गत दिनों हुए अपनी माताजी के निधन के कारण इस कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो पाए। 
              

वर्ष 2013 के प्रतिष्ठित 'केदार सम्मान' की घोषणा

 वर्ष 2013 के प्रतिष्ठित 'केदार सम्मान' की घोषणा 


वर्ष 2013 का प्रतिष्ठित 'केदार सम्मान' समकालीन हिन्दी कविता की चर्चित कवयित्री अनीता वर्मा को उनके कविता संकलन 'रोशनी के रास्ते पर' (2008, राजकमल प्रकाशन) के लिए प्रदान करने की घोषणा केदार शोध पीठ, बाँदा द्वारा की जाती है।

निर्णय की प्रशस्ति में कहा गया है कि - 

"अनीता वर्मा की कविता में हमारे समय की तमाम असंगतियों और त्रासदियों के बीच साधारण मनुष्य के अस्तित्व का एक अन्तरंग साक्षात्कार और उसकी मूल गरिमा को बचाए रखने की कशमकश बहुत प्रभावशाली ढंग से उभरी है। नारी मन के कोमल राग , उसके स्वप्न संसार और उसकी जीवन इच्छा को वे परिवेश की तमाम विडम्बनाओं, विवशताओं व विरोधाभासों के बीच बहुत कुशलता से रेखांकित करती हैं । एक अभिनव कल्पना शक्ति से उनकी काव्य उजास को बहुत ही विलक्षण ढंग से सँजोया है । यह कविता संकलन समकालीन हिन्दी कविता के परिदृश्य में अपनी एक विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराता है। "

यह सारे काव्य वैशिष्ट्य केदार नाथ अग्रवाल के निकट ठहराते हैं।

इस चर्चित एवं महत्वपूर्ण सम्मान के निर्णायकों में प्रो. मैनेजर पाण्डेय, श्री विभूति नारायण राय, श्री राजेश जोशी, श्री विजय कुमार एवं श्री भारत भारद्वाज हैं। इस से पूर्व 'केदार सम्मान' से 17 समकालीन हिन्दी कविता के कवियों को सम्मानित किया जा चुका है।

 - नरेन्द्र पुण्डरीक
(संयोजक) 
- संतोष भदौरिया 
(सह संयोजक)
- डॉ. कविता वाचक्नवी
(सदस्य : कार्यकारिणी )




रात यों कहने लगा मुझसे ......


आज 'सुपरमून' (जानकारी के लिए यहाँ देखें की रात है। प्रातः से ही बार-बार एक कविता स्मरण आ रही थी। अतः आज के इस विशेष दिन उसे बाँटने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही। 
आप सब भी इस कालजयी रचना को पढ़ें                                     












                                               "रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद"
- रामधारी सिंह "दिनकर"


रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, 
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है! 
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, 
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है। 

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ? 
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते; 
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी 
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते। 

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का;
आज उठता और कल फिर फूट जाता है;
किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो? 
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है। 

मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली, 
देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू? 
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी? 
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते, 
आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ, 
और उस पर नींव रखती हूँ नये घर की, 
इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ। 

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी 
कल्पना की जीभ में भी धार होती है, 
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल, 
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है। 

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे,
"रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे, 
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को, 
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।"

`अस्‍पताल के बाहर टेलीफोन’ के लिए पवन करण को `केदार सम्‍मान' प्रदान






`अस्‍पताल के बाहर टेलीफोन के लिए पवन करण को  `केदार सम्‍मान' प्रदान 




[Image(461).jpg] केदार शोध पीठ, बॉंदा द्वारा हिन्‍दुस्‍तानी एकेडमी, इलाहाबाद के सभागार में आयोजित भव्‍य समारोह में कल ‘अस्‍पताल के बाहर टेलीफ़ोन’ कविता संग्रह के लिए पवन करण को केदार सम्‍मान,1 2011 से सम्‍मानित किया गया। सम्‍मान समारोह में महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय,वर्धा के कुलाधिपति प्रो.नामवर सिंह, भारत भारद्वाज, दूधनाथ सिंह, पवन करण व महेश कटारे मंचस्‍थ थे। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय,वर्धा विश्‍वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने समारोह की अध्‍यक्षता की।

हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा बना शमशेर का स्‍थायी घर


हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा बना शमशेर का स्‍थायी घर

विश्‍वविद्यालय को मिला दुर्लभ पाण्‍डुलिपियों के अलावा शमशेर साहित्‍य का स्‍वत्‍वाधिकार भी, आज का दिन मील का पत्‍थर -कुलपति



                वर्धा में नागार्जुन सराय भी 
वर्धा दि. 12 मई 2012: महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के साथ आज एक और महापुरूष का नाम जुड़ गया। फादर कामिल बुल्‍के छात्रावास के पास नवनिर्मित अतिथि गृह नागार्जुन सराय का उदघाटन आज हिंदी के विख्‍यात कवि केदार नाथ सिंह ने किया। इस अवसर पर कुलपति विभूति नारायण राय, प्रतिकुलपति प्रो. ए. अरविंदाक्षन, कुलसचिव डॉ. के. जी. खामरे, विशेष कर्तव्‍य अधिकारी नरेन्‍द्र सिंह, आलोचक निर्मला जैन, प्रो. गंगाप्रसाद विमल, नरेश सक्‍सेना, रंजना अरगड़े, विजय मोहन सिंह समेत बड़ी संख्‍या में विश्‍वविद्यालय कर्मी एवं विद्यार्थी उपस्थित थे। अतिथियों ने इस मौके पर नागार्जुन की मूर्ति पर माल्‍यार्पण कर अपने श्रद्धासुमन अर्पित किये। सनद रहे कि हिंदी की कई विभूतियों के नाम से इस विश्‍वविद्यालय के विभिन्‍न भवनों और मार्गों का नामकरण किया गया है। अध्‍यापकों और कर्मचारियों के लिए बने आवासों को तीन संकुलों में बांटा गया है- अज्ञेय संकुल, शमशेर संकुल और केदार नाथ अग्रवाल संकुल। छात्रों के लिए गोरख पाण्‍डे और बिरसा मुण्‍डा छात्रावास है तो छात्राओं के लिए सावित्रीबाई फुले छात्रावास। केंद्रीय पुस्‍तकालय का नाम राहुल सांकृत्‍यायन के नाम पर है तो तीन सभागारों के नाम क्रमश: गौतम बुद्ध, डॉ. आंबेडकर और हबीब तनवीर के नाम पर। तीन मार्गो के नाम क्रमश: प्रेमचंद मार्ग, भारतेंदु मार्ग और निराला मार्ग हैं। दो पहाडियों का नामकरण गांधी हिल और कबीर हिल के नाम पर किया गया है।
वर्धा दि.12 मई 2012 ।
हिंदी के सुपरिचित कवि केदार नाथ सिंह ने कहा है कि शमशेर बहादुर सिंह विलक्षण दोआब के कवि हैं। उनकी रचनाओं में हिंदी और उर्दू की दोभाषिक संस्‍कृतियाँ मिलती हैं। शमशेर जितने हिंदी के कवि थे उतने ही उर्दू के। डॉ. केदार नाथ सिंह आज महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के स्‍वामी सहजानंद सरस्‍वती संग्रहालय में कालजयी कवि शमशेर बहादुर सिंह की 19वीं पुण्‍यतिथि पर आयोजित गरिमामय समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस समारोह में प्रसिद्ध लेखिका डॉ. रंजना अरगड़े ने शमशेर की प्रकाशित-अप्रकाशित रचनाओं की पांडुलिपियाँ, चित्रकृतियाँ और उनके निजी उपयोग की सामग्री तथा शमशेर की रचनाओं की कापीराइट विश्‍वविद्यालय को सौंपी। 

२०११ का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार अनुज लुगुन को



२०११ का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार 



समकालीन युवा कविता का सर्वाधिक प्रतिष्ठित सम्मान, भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार श्री अनुज लुगुन को उनकी कविता 'अघोषित उलगुलान' के लिए दिया जाएगा. इस वर्ष के निर्णायक श्री उदय प्रकाश ने इसका चयन किया है. यह कविता 'प्रगतिशील वसुधा' के अप्रैल -जून २०१० के अंक में प्रकाशित हुई थी.


भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार हर वर्ष किसी युवा कवि की श्रेष्ठ कविता को दिया जाता है. निर्णायक मंडल में अशोक वाजपेयी, अरुण कमल, उदय प्रकाश, अनामिका, और पुरषोत्तम अग्रवाल हैं. बारी-बारी से हर वर्ष एक निर्णायक पुरस्कार के लिए कविता का चुनाव करता है. इस बार के निर्णायक श्री उदय प्रकाश के शब्दों में "अनुज लुगुन की कविता "अघोषित उलगुलान" को वर्ष २०११ का प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार देते हुए मुझे गर्व और सार्थकता दोनों की अनुभूति हो रही है."


निर्णायक  का वक्तव्य

रामलीला मैदान में रावणलीला पर कवि श्री उदय प्रताप सिंह : ना तीर न तलवार से मरती है सचाई

रामलीला मैदान का महाभारत






कल रात रामलीला मैदान में जो रावणलीला हुई उस पर  श्रेष्ठ बुजुर्ग कवि श्री उदय प्रताप सिंह जी की आज ही लिखी ग़ज़ल - 


ना तीर न तलवार से मरती है सचाई
जितना दबाओ उतना उभरती है सचाई


ऊंची उड़ान भर भी ले कुछ देर को फरेब
आखिर में उसके पंख कतरती है सचाई


बनता है लोह जिस तरह फौलाद उस तरह
शोलों के बीच में से गुजरती है सचाई


सर पर उसे बैठाते हैं जन्नत के फ़रिश्ते
ऊपर से जिसके दिल में उतरती है सचाई


जो धूल में मिल जाय, वज़ाहिर ,तो इक रोज़
बाग़े-बहार बन के सँवरती है सचाई


रावण क़ी बुद्धि बल से न जो काम हो सके
वो राम क़ी मुस्कान से करती ही सचाई 
ग़ज़ल, आन्दोलन, सामयिक 




 

यह कैसे होगा ?




यह कैसे होगा ?
 

 

यह कैसे होगा ?

यह क्यों कर होगा?

नई-नई सृष्टि रचने को तत्पर

कोटि-कोटि कर-चरण

देते रहें अहरह स्निग्ध इंगित

और मैं अलस-अकर्मा

पड़ा रहूँ चुपचाप !

यह कैसे होगा ?

यह क्योंकर होगा ?




यथा समय मुकुलित हों

यथासमय पुष्पित हों

यथासमय फल दें

आम और जामुन, लीची और कटहल !

तो फिर मैं ही बाँझ रहूँ !

मैं ही न दे पाऊँ !

परिणत प्रज्ञा का अपना फल !

यह कैसे होगा ?

यह क्योंकर होगा ?




भौतिक भोगमात्र सुलभ हों भूरि-भूरि,

विवेक हो कुंठित !

तन हो कनकाभ, मन हो तिमिरावृत्त !

कमलपत्री नेत्र हों बाहर-बाहर,

भीतर की आँखें निपट-निमीलित !

यह कैसे होगा ?

यह क्योंकर होगा ?

- नागार्जुन

"क्या आयडियॉलॉजी के बिना कविता सम्भव है?"






अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर और फ़ैज़ की  जन्मशताब्दी पर आयोजित कार्यक्रमों की शृंखला  - २

-  डॉ. कविता वाचक्नवी








महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि. वर्धा द्वारा आयोजित अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर और फ़ैज़ की जन्मशताब्दी पर आयोजित कार्यक्रमों की शृंखला में दिनांक ३ अक्तूबर २०१० को प्रात:काल १० बजे से ‘नागार्जुन पर एकाग्र’  प्रथम सत्र  प्रारम्भ हुआ. जिसमें विषय-प्रवर्तन करते हुए प्रसिद्ध आलोचक विजेन्द्र नारायण सिंह ने कहा कि नागार्जुन संघर्ष व विद्रोह के कवि हैं.  उनका यायावरी जीवन उनके संघर्षशील जीवट का प्रमाण है. कई बार वे अतिरेक के कवि लगते हैं. वे नक्सलवाद और सम्पूर्ण क्रान्ति जैसी अराजक अवधारणा के कवि लगते हैं.



अवधेश मिश्र ने नागार्जुन के आमजन से जुड़ाव व संघर्षशीलता की प्रवृत्ति को रेखांकित किया.



दिल्ली वि.वि. के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. गोपेश्वर सिंह ने कहा कि -

 - वे अपना पक्ष स्पष्ट रूप से रखने वाले पारदर्शी कवि हैं, वे दुविधा के कवि नहीं हैं. 

- शीत युद्ध की १९५०-६० की आलोचना, जब दुनिया दो खेमों में है, उस समय आलोचना भी दो खेमों में हैं, साहित्य में यह वही दौर है जिस काल के कवियों की हम यहाँ बात कर रहे हैं. आलोचना की दृष्टि से उस दौर का संघर्ष द्वन्द्व का संघर्ष है. तमाम अन्तर्विरोधों के बावजूद कोई एक राय बनाई नहीं जा सकती.  

 - उन्होंने सम्भवत: व्यक्तियों पर केन्द्रित सर्वाधिक कविताएँ लिखीं.

- यदि हिन्दी कविता की पूरी परम्परा महामानवों की परम्परा है तब तो मुझे लगता है कि हिन्दी साहित्य के इतिहास को दुबारा पढ़ा जाना चाहिए.


हिन्दी आलोचना की दिक्कतों पर गोपेश्वर ने खुल कर विमर्श किया.


क्या कविता के कोई सार्वभौमिक प्रतिमान हो सकते हैं? हर जगह की अपनी मौलिक व भिन्न कविता है. उसके प्रतिमान भी उतने ही भिन्न हैं. कविता की अपनी स्थानीयता है और कविता की अपनी जातीयता है. मुझे लगता है कविता के प्रतिमानों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है. १९४० के बाद की अर्थत् प्रयोगवाद के बाद की कविता पर पुनर्विचार की अत्यन्त महती आवश्यकता है.  असल विवाद अज्ञेय के एक सुचिन्तत लेख के बाद प्रारम्भ हुआ, जिसमें उन्होंने ‘पाठक के एकान्त’ की बात कही.  और मेरे विचार से "  पाठक के एकान्त की कविता"     होना ही  वस्तुत: कविता का निकष है.




आगामी वक्ता के रूप में प्रो. शम्भुनाथ ने अपने सम्बोधन में कहा कि -

-  भले ही ऐसे आयोजन साहित्यिक कर्मकांड कहे जाते हों किन्तु ये ही हमें ऐसे अवसर देते हैं कि हम उन रचनाकरों के पाठ को पुन: देखें पढ़ें, नई तरह से अपनी धारणाओं का पुनर्गठन कर सकें.

एक समय था जब आलोचना इन चारों कवियों को आर-पार करके देखती रही या बाँट कर देखती रही, सामाजिकता की बात को लेकर अलगाते रहे. किन्तु आज भी क्या इन चारों कवियों के मूल्यांकन का कोई सामान्य तत्व नहीं हो सकता है?  अनुभव की स्वाधीनता चारों कवियों में सामान्य तत्व है. इन चारों कवियों ने अनुभव की सामुदायिक किलेबन्दी स्वीकार नहीं की. 

- नागार्जुन के काव्य में जेठ का ताप और पूर्णिमा का सौन्दर्य है.

 लेखक के स्वाभिमान के सन्दर्भ में उन्होंने नागार्जुन द्वारा इन्दिरा गाँधी द्वारा प्रदत्त सम्मान को ग्रहण करने के प्रसंग को नागार्जुन के शब्दों में सुनाया, जिस पर सभागार तालियों व ठहाकों से भर उठा.

- नागार्जुन किसानचित्त के कवि हैं, नागार्जुन का साहित्य हमारे लिए अन्न है अत: नागार्जुन अन्न के कवि हैं.



प्रो. नीरज सिंह ने मंच पर बैठे ‘समूचे बिहार’ को सम्बोधित करने के अपने वाक्य द्वारा वातावरण को सहज व हास्यपूर्ण बनाते हुए अपने वक्तव्य का प्रारम्भ किया. उन्होंने कहा कि -

- सर्वप्रथम मुझे गर्व है  कि नागार्जुन के सान्निध्य का सौभाग्य मिला. 

- भारतीय जनता की सम्पूर्ण मुक्ति के कवि हैं नागार्जुन. उनका स्वप्न था कि एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जहाँ मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण की कोई सम्भावना नहीं.



 डॉ. राम आह्लाद चौधरी व  उषाकिरण खान ने भी बाबा के रचनाकर्म के विविध पक्षों पर अपने विचार प्रस्तुत किए.  कार्यक्रम की अध्यक्षता  करते हुए खगेन्द्र ठाकुर ने  नागार्जुन के जीवन प्रसंगों को किन्हीं नए, अर्थों में खोलते हुए उनकी सहज किन्तु विशिष्ट जीवनशैली का मर्म सुनाया, साथ ही कलकत्ता के कुछ प्रसंगों को नई अर्थवत्ता दी.  सत्र का संचालन कॄष्ण कुमार सिंह ने किया.





शमशेर पर एकाग्र



जन्मशताब्दी वर्ष के इस कार्यक्रम के दूसरे दिन का दूसरा सत्र शमशेर के काव्यकर्म पर केन्द्रित था. कार्यक्रम की अध्यक्षता  कवि अरुण कमल ने और संचालन राकेश मिश्र ने किया.



डॉ. विनोद तिवारी  ने शमशेर की कविताओं के सन्दर्भ में विविध पक्षों पर  कुछ प्रश्न उठाते हुए अपनी बात रखी. कुछ बिन्दु हैं कि -


 - शमशेर का जनाधार या विभाव है या नहीं यह हम अज्ञेय व शमशेर के सन्दर्भ में देख सकते हैं. 

- क्या रचनाकार पार्टीबद्ध होकर रचना करता है?  नहीं, ऐसा नहीं. वह कर भी नहीं सकता है.

- इन कवियों के पास ऐसी भी बहुत सी कविताएँ हैं, कि उसी टोन या उसी तरह से आज का कोई कवि लिखे तो हमीं कहेंगे कि रद्दी हैं.

- क्या बोध गम्यता भी कविता की कोई शर्त है?

- कविता को समझने के क्या कोई प्रतिमान हैं, क्या शमशेर को समझने के लिए कोई प्रतिमान गढ़े जाएँगे? प्रतिमान के बतौर एक सूत्रीकरण कर के शमशेर का मूल्यांकन किया जाता रहा है. कविता के तनाव, उसकी आंतरिक संरचना आदि की दॄष्टि से शमशेर की कविताओं का पाठ आवश्यक है.




प्रो. रंजना अरगड़े ने एक वक्ता की प्रेम पर टिप्पणी के सन्दर्भ में चुटकी लेते हुए अपना वक्तव्य प्रारम्भ किया और "अपने समय के एल्बम को देखते हुए" शीर्षक आलेख का वाचन करते हुए कहा कि -

 - शमशेर की कविताएँ अपनी समकालीनता का एक एल्बम हैं। हमारे पहले की तस्वीर हमारे आज से कई बार इतनी भिन्न होती है कि हम स्वयं नहीं पहचान पाते. कई बार समूचा भोलापन खो चुका होता है.

उनके आलेख का प्रस्थानबिन्दु समकालीन मुद्दों के प्रति शमशेर की सम्वेदनशीलता की पड़ताल करना था. विशेषत: शमशेर की रचनाशीलता में भाषा के सन्दर्भों की अच्छी पड़ताल (रचनाभाषा सहित) उन्होंने अपने आलेख में की.

-  सूक्ष्म अभिव्यक्तियों के लिए जो भाषा शमशेर गढ़ते हैं वह आज की रचनाधर्मिता को उनकी देन है.




वि. वि. के शोधार्थी उमाकान्त चौबे  ने प्रश्न उठाया कि शमशेर की कविता में वाक्य की अपेक्षा शब्द का ईकाई होना पाठक और विद्यार्थी को नहीं खटकता. किन्तु जो कुछ दिक्कत आलोचना को उसके अर्थ के लिए आती है,  क्या वह दिक्कत आलोचना की है?



सत्र का अध्यक्षीय वक्तव्य  देते हुए अरुण कमल ने इस बात को रेखांकित किया कि -

-  आज जिस प्रकार शमशेर वाले इस सत्र में सबसे कम वक्ता, सब से कम श्रोता हैं, यही शमशेर के साथ आजीवन होता रहा कि बहुत कम लोग उनके साथ रहे, चले.

- जिन कवियों को आप प्यार करते हैं उनकी कोई शताब्दी नहीं होती.

- कवियों को पढ़ते समय आम पाठक यह नहीं सोचता कि इन कवियों की क्या ‘विचारधारा’ थी. सवाल यह नहीं कि कौन बड़ा कवि है, कौन छोटा. कभी किसी अवसर पर कोई कविता आपके दिल के साथ होती है, कभी कोई. मानो आप विभिन्न देशों की यात्रा पर हैं और आपकी जेब में विभिन्न देशों के सिक्के रखे हैं. जब आप जिस देश में होंगे, वहाँ उस देश के सिक्के को ही प्राथमिकता देंगे.

-  पाठक के लिए कविता पढते समय कवि की जीवनदृष्टि महत्वपूर्ण होती है, न कि उसका व्यक्तिगत जीवन.

- बिना मलयज की डायरी पढ़े आप शमशेर को नहीं समझ सकते.

- शब्दों को अत्यन्त सम्वेदनशीलता के साथ बरतने वाला कवि हिन्दी में निराला के बाद शमशेर ही हुए, दूसरा कोई नहीं.

 - हिन्दी साहित्य के इतिहास के झगडों को पाठक के लिए नहीं गिना माना जाना चाहिए.

अरुण कमल ने बाबा से उनकी पसन्द के रचनाकार पूछे जाने के अपने प्रश्न के उत्तर में बाबा द्वारा सुझाई दो पुस्तकों का नामोल्लेख करते हुए बताया कि वे हैं ‘सदुक्तिकरणामृत’, तथा ‘सुभाषितरत्नसंग्रह’.






 फ़ैज़ पर एकाग्र


दोपहर के भोजनोपरान्त तीसरा व अन्तिम सत्र फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की रचनाधर्मिता पर केन्द्रित था, जिसकी अध्यक्षता अली ज़ावेद ने  संचालन  राकेश ने किया.


 फ़ैज़ पर केन्द्रित अपने आलेख में डॉ. प्रीति सागर ने जानकारियाँ बाँटीं कि -

 - फ़ैज़ पर गालिब, मार्क्स और अपने दो उस्तादों शम्सुल अल्माह सैयद मीर हसन तथा प्रो. युसुफ़ सलीम चिश्ती का खासा असर था.


-उन्होंने गज़लों में उर्दू शायरी रवायत को पूरी तरह बरता, रवायती प्रतीकों को अपनी रचनाशीलता से जोड़ कर  प्रतीकों को नए अर्थ दिए.


- फ़ैज़ को अपनी भाषा से बहुत प्रेम था. वे अपनी भाषा के लिए अत्यन्त चिन्तित होने के साथ साथ गर्वित भी थे.

- ज़िन्दगी भर आम  आदमी के लिए सोचने वाले इस शायर ने जबरन शेर कहने की कोशिश कभी नहीं की


- गुलज़ार का कथन है - "फ़ैज़ की शायरी के रुक जाने का अर्थ है वक्त की नब्ज़ का रुक जाना"





 अगले वक्ता के रूप में  दिनेश कुशवाह के वक्तृत्व में जिन बिन्दुओं को रेखांकित किया गया, वे थे - 

- मानसिक व आर्थिक रूप से पिस रहा यन्त्रणाग्रस्त व्यक्ति उनकी कविता के केन्द्र में है.


- फ़ैज़ की प्रसिद्धि को उनके जेल जाने से जोड़ कर देखने वालों से उन्होंने पूछा कि अन्य जो कवि प्रसिद्ध हुए हैं वे भी क्या जेल गए हैं!


- प्राचीनता के साथ नवीनता का समन्वय व उसे कहने का अन्दाज़ कवि को विशिष्ट बनाता है. यह फ़ैज़  की कविता की विशिष्टता थी.


- आम आदमी को बहकाने वाले खयाली छद्मों का पर्दाफ़ाश फ़ैज़ ने किया.


- फ़ैज़ का आशिकाना मिज़ाज़ हमें ही नहीं बुजुर्गों को भी प्रभावित करता है, उन्होंने कहा मेरी दो ही प्रेमिकाएँ हैं, एक है मेरी महबूबा और दूसरा है मेरा देश.


-एक जगह उन्होंने लिखा मैंने तीन इश्क किए जिन्हें दर्ज़ किया जाना चाहिए;


- फ़ैज़ ने सिखाया कि जो रोमान है शायरी में, वही हमें फ़ाँसी के तख्ते से फन्दे चूमने तक को भी प्रेरित करता है. 



उपस्थितों के आग्रह के उपरान्त कवि आलोक धन्वा मंच पर आए व अपनी धाराप्रवाह शैली में संगोष्ठी के दो दिन के विमर्श पर अपनी टिप्पणी देते हुए अत्यन्त रोचक व सटीक ढंग से स्थापित किया कि - 


-  कवियों के पक्ष विपक्ष में बात करते समय यह जान लेना अनिवार्य है कि ये चारों कवि महान् जीवनेच्छाओं के कवि हैं.


- इन के पाठ से एकान्त व जीवन दोनों में ताकत मिलती है.


- प्रत्येक कवि किसी न किसी व्यक्ति की  इच्छा को पूरा करता है.


- आधुनिक लोकतन्त्र की चर्चा करेंगे तो अज्ञेय के पास जाना होगा. महत्वपूर्ण यह नहीं कि वे मार्क्सवादी थे या नहीं, महत्वपूर्ण यह है कि राष्ट्र की अवधारणा को जिन्होंने संगठित किया उनमें अग्रणी थे अज्ञेय.


- अज्ञेय को लेकर कोई कंजूसी नहीं होनी चाहिए, कोई एन्काऊंटर की स्थिति नहीं होनी चाहिए.


- फ़ैज़ आधुनिक लोकतन्त्र के कवि थे और आधुनिक लोकतन्त्र समाजवाद के बिना सम्भव नहीं.


- फ़ैज़ जहाँ जाते हैं वहाँ जाना भी हमारे लिए कठिन है.


- कवियों की तुलनात्मक चर्चा यहाँ यों हुई है जैसे आप उन्हें नम्बर दे रहे हों.


- नागार्जुन उतने ही बड़े व्यंग्यकार थे जितने बड़े ब्रेख्त.


- जो ऊँचाई हमें कबीर में मिलती है कि कबीर सत्य को जानने के लिए किसी भी स्टेबिलेटी, ताकत... जो एकाधिकार का रूप लेती है, को तोड़ते हैं. नागार्जुन भी वैसे ही कवि थे. उन्होंने सत्ता को तोड़ने और उसके विरुद्ध काम किया.



 अध्यक्षीय वक्तव्य के रूप में सत्र की अध्यक्षता कर रहे अली ज़ावेद ने संगोष्ठी को महत्वपूर्ण बताते हुए महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा को इस पहल के लिए साधुवाद दिया और कहा कि  -

- साझा संस्कृति की दिशा में व उसकी परम्परा में यह गोष्ठी विशेष महत्व रखती है.


- ऐसे आयोजनों का उद्देश्य हवा में बातें करना नहीं होता अपितु इन कवियों की भविष्य की प्रासंगिकता व मार्गदर्शक की भूमिका तय करना होता है.


- जब हम अमीर खुसरो को हिन्दी व उर्दू की रवायत का कवि मानते हैं तो तुलसी, नागर्जुन या फ़ैज़ क्यों नहीं उस साँझी सांस्कृतिक विरासत के कवि? लिपि को हटा दीजिए तो शेष बाधा क्या है? पहले भी प्रेमचन्द पर केन्द्रित आयोजन हुए और मुझे कभी नहीं लगा कि कोई हिन्दी का और कोई उर्दू का अलग अलग रचनाकार हैं.


- लोग कहते हैं कि आयडियॉलॉजी की बात मत कीजिए, बस शायरी की बात कीजिए, परन्तु क्या आयडियॉलॉजी के बिना शायरी सम्भव है? वाल्मीकी का रामायण-काव्य भी उत्पीड़न के विरुद्ध उठी कवि की कलम है. यही सच्ची कविता है, शायरी है.


- क्या नारेबाजी की भी कोई स्टैटिक्स होती है या नहीं. यदि नहीं तो भगत सिंह का इन्कलाब ज़िन्दाबाद कैसे विश्वभर में छा गया?

- मुझे दुनिया में "वसुधैव कुटुम्बकं "   से बड़ा कोई और नारा नहीं लगता. क्योंकि जो सारी दुनिया की बात करता है, वह किसी एक कौम या वर्ग की बात नहीं करता. 


 - सच के प्रति अपनी पक्षधरता दिखाने की दिशा में ऐसे आयोजन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.






ध्यातव्य है कि महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि., वर्धा द्वारा आयोजित जन्मशताब्दी कार्यक्रमों के प्रथम दिन उद्‍घाटन सत्र में एकत्र देश के विभिन्न भागों से आए साहित्यिकों, कलाकर्मियों, शब्दकर्मियों, अध्यापकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों ने  एक शोक सन्देश प्रस्तुत कर प्रख्यात रंगकर्मी,संगठनकर्ता, कवि एवं ‘अभिव्यक्ति’ पत्रिका के सम्पादक  शिवराम के असामयिक निधन पर सभागार में दो मिनट का मौन रख उन्हें श्रद्धांजलि दी व उनके शोक सन्तप्त परिजनों के प्रति हार्दिक सम्वेदना प्रकट की.




  
संगोष्ठी में माननीय संचार मन्त्री, भारत सरकार, नई दिल्ली के नाम एक पत्र भेजा गया, जिसमें हिन्दी के चार कवियों की स्मृति में डाक टिकट जारी करने की माँग करते हुए लेखकों साहित्यकारों ने हस्ताक्षर किए। पत्र में लिखा गया है कि -


" वर्ष २०१० हिंदी के लोकप्रिय एवं महान् कवियों - नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह तथा सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जन्मशताब्दी वर्ष है. ये चारों कवि भारतीय स्वातन्त्र्योत्तर साहित्यिक -सांस्कृतिक इतिहास के पुरोधा रहे हैं. न केवल हिन्दी अपितु अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं का बुद्धिजीवी एवं सामान्य जनसमुदाय इन चारों कवियों के कृतित्व से भली भाँति परिचित है तथा इनके बीच इनकी सम्माननीय स्मॄति प्रवहमान है. 

हम हिंदी के समस्त लेखक साहित्यकार महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के माध्यम से जिसके तत्वावधान में इन कवियों के शताब्दी कार्यक्रमों की शृंखला की उद्‍घाटन संगोष्ठी २-३ अक्‍तूबर २०१० को आयोजित की जा रही है, माँग करते हैं कि भारतीय रचनाशीलता एवम् मनीषा के प्रतिनिधि इन चारों कवियों पर भारतसरकार का संचार मन्त्रालय डाकटिकट जारी करे. यह न केवल राज्य का दायित्व है अपितु इन कवियों के अवदान के प्रति उसकी सच्ची श्रद्धाशीलता होगी."



इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में प्रमुख नाम  -  प्रो. नामवर सिंह (कुलाधिपति), विभूति नारायण राय ( कुलपति), प्रो. अरविन्दाक्षन (प्रतिकुलपति), विजेन्द्र नारायण सिंह, प्रो. नित्यानन्द तिवारी, प्रो. खगेन्द्र ठाकुर, प्रो. निर्मला जैन, आलोक धन्वा, प्रो. गंगाप्रसाद विमल, प्रो. शम्भु्नाथ, प्रो. बलराम तिवारी, अरुण कमल, दिनेशकुमार शुक्ल, रंजना अरगड़े, प्रो. गोपेश्वर सिंह, प्रो. नीरज सिंह, रामआह्लाद चौधरी, उषाकिरण खान, अखिलेश,  धीरेन्द्र अस्थाना, बोधिसत्व, विमल कुमार,  डॉ. कविता वाचक्नवी, विजय शर्मा, अवधेश मिश्र, नरेन्द्र पुण्डरीक, दिनेश कुशवाह, प्रो. सूरज पालीवल, डॉ. शम्भु गुप्त, डॉ. कृपाशंकर चौबे, प्रो. के.के सिंह, मनोज कुमार पाण्डेय, शशिभूषण, डॉ. सुशीला टाकभौरे, सुरेन्द्र वर्मा, डॉ. उमेश कुमार सिंह, प्रो. अजय तिवारी, अली जावेद आदि के हैं.



केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित सत्र के वक्ताओं नरेन्द्र पुण्डरीक  डॉ. कविता वाचक्नवी ने केदार जी की काव्यकला पर अपने अभिमत दिए. पुण्डरीक ने सोदाहरण स्थापित किया कि  केदार जी की काव्यभाषा के खिलने व खुलने की विशिष्टता उनकी रचनाशीलता की अद्भुत शक्ति है. केदार जैसे कवि की काव्यभाषा के प्रति बरती गई अतिरिक्त आत्मीयता तक की पहुँच अर्थ-विस्तार में नवीन उद्‍घाटन करती है. डॉ. वाचक्नवी ने "केदारनाथ अग्रवाल का काव्यशास्त्र" विषयक अपने आलेख में मुख्यतया ‘मित्र-संवाद’ व अन्य चार पुस्तकों की भूमिका के रूप में लिखे गए गद्य-मात्र के विश्लेषण द्वारा उनके काव्य-विमर्श की दृष्टि को प्रतिपादित किया. कविता व पाठक का सम्बन्ध, पठनीयता, साधारणीकरण, मुक्त छंद, शिल्प के स्तर पर रचनाकार की निजता, काव्यशिल्प, लोक, काव्यप्रेरणा, निरन्तरता, तुक, अन्तर्विरोध, सामासिकता, अर्थगाम्भीर्य, आलोचना की उपादेयता, कविता की आन्तरिक शक्ति, साहित्य में सत्य की प्रतिष्ठा, स्वाभावोक्ति, जनवादी प्रतिबद्धता, काव्यऊर्जा, सौन्दर्यबोध, समकालीनता का छद्म आदि जैसे शताधिक प्रश्नों पर गद्य में केदार के विमर्श को सामने रखा.





दो दिन चले इस साहित्यिक आयोजन के सभी वैचारिक सत्रों के समापन के उपरान्त कुलपति विभूति नारायण राय ने सभी आगतों का उनके वैचारिक अवदान के लिए धन्यवाद व्यक्त किया व समाहार करते हुए  कहा कि  संगोष्ठी में बहस का स्तर आशातीत रूप से सृजनात्मक रहा, ऐसी जीवन्त गोष्ठियों व बौद्धिक विमर्श का माहौल बना रहे, यह यत्न रहेगा.


दो दिन की उक्त संगोष्ठी में भाषा व साहित्य से जुड़े जिन अनेक गण्यमान्य व्यक्तियों ने अपनी भागीदारी से कार्यक्रम की शोभा  बढ़ाई, उनमें से प्रमुख व्यक्तित्व हैं -


डॉ. नामवर सिंह, डॉ. निर्मला जैन, डॉ. नित्यानन्द तिवारी, बलराम तिवारी, विनोद शुक्ला, अखिलेश, सुरेन्द्र वर्मा, मनोज कुमार पाण्डेय, मीता शर्मा (कोटा), धीरेन्द्र अस्थाना,  नरेन्द्र पुण्डरीक, अली जावेद, आलोक धन्वा, डॉ. कविता वाचक्नवी, अरुण कमल, अवधेश मिश्र, विभूतिनारायण राय, राकेश, सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, प्रो. सूरज पालीवाल, डॉ. शम्भु गुप्त, गंगाप्रसाद विमल, राजकिशोर, प्रो. सन्तोष भदौरिया, प्रो. गंगा प्रसाद विमल, प्रो. शम्भुनाथ, दिनेशकुमार शुक्ल, रंजना अरगडे, प्रो. गोपेश्वर सिंह, प्रो. नीरज सिंह, रामआह्लाद चौधरी, उषा किरण खान, बसन्त त्रिपाठी, धीरेन्द्र अस्थाना, बोधिसत्व, विमल कुमार, विजय शर्मा, दिनेश कुशवाह, डॉ. कॄपाशंकर चौबे, प्रो. के. के. सिंह, शशिभूषण, डॉ. सुशीला टाकभोरे,  डॉ. उमेशकुमार सिंह, प्रो. अजय तिवारी, अली जावेद आदि ।






विश्वविद्यालय के शोध छात्रों चित्रलेखा अंशु, ओमप्रकाश प्रजापति, रेणु, बच्चाबाबू, अमित बिस्वास तथा सन्तोष राय सहित विविध समितियों के संचालन में विवेक त्रिपाठी, संजय तिवारी, वैभव जी. सुशील, संदीप राय, आलोक श्रीवास्तव व  राजीव पाठक आदि ने सक्रिय सहयोग दे कर कार्यक्रम को अभूतपूर्व सफलता प्रदान की.  

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सम्बन्धित प्रविष्टियाँ

  1.  -  "क्या आयडियॉलॉजी के बिना कविता सम्भव है?" 
  2.  -"जिसमें जितना लोकपक्ष अधिक होगा, वह उतने अर्थों में जनकवि होने की ओर होता है"
  3.  - "हमारे साहित्य-समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है"
  4.  - फ़ादर कामिलबुल्के : प्रतिमा का अनावरण
  5.  - दो दिवसीय कार्यक्रम में होगा गम्भीर विमर्श

इन्हें भी अवश्य देखें -
  1. हिंदी विश्वविद्यालय में हिंदी महारथियों का जन्मशती उत्सव प्रारम्भ
  2.  लेखकों से मिलना सुखद रहा
  3. "बीसवीं शताब्दी हाशिए की शताब्दी थी"
  4. -  नामवर सिंह ने अज्ञेय को साहित्य क्षेत्र का नेहरू बताया था- निर्मला जैन
  5. - संघर्ष और विद्रोह के कवि हैं नागार्जुन
  6. - बीसवीं सदी का अर्थ- जन्मशती का संदर्भ
  7. - अपनी माटी

"जिसमें जितना लोकपक्ष अधिक होगा, वह उतने अर्थों में जनकवि होने की ओर होता है"



जनकविता व जनकवि के निर्माण में लोक सहभागी होता है”
:
केदारनाथ अग्रवाल पर एकाग्र

- डॉ. कविता वाचक्नवी





२-३ अक्तूबर २०१० को महात्मा गान्धी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि. वर्धा में आयोजित संगोष्ठी “बीसवीं सदी का अर्थ और जन्मशती का सन्दर्भ” के पहले दिन तीसरे सत्र के रूप में कवि केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित परिचर्चा का आयोजन किया गया. सत्र की अध्यक्षता प्रो. नित्यानन्द तिवारी ने एवम् संचालन अरुणेश शुक्ला द्वारा किया गया.



प्रथम वक्ता के रूप में प्रो. खगेन्द्र ठाकुर ने केदार की कविताओं की आलोचना के सन्दर्भ की चर्चा में कलावादी आलोचना की मीमांसा करते हुए कालिदास, भारवि, माघ व दण्डी के साहित्य के टीकाकारों का उल्लेख किया. पिछड़े, वंचित व उपेक्षित वर्ग के प्रति केदार की कविता की पक्षधरता, सामाजिकता व उनकी राजनीतिपरक कविताओं के अनेकानेक उदाहरणों से उन्होंने अपनी बात पुष्ट की.




प्रो. अजय तिवारी ने प्रगतिशील आलोचना पर पक्षपात के आरोपों का खण्डन करते हुए अज्ञेय व केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित मौलिक पुस्तकों का प्रश्न उठाया. साथ ही  रामविलास शर्मा द्वारा दी गई प्रगतिशीलता की ‘जनता की तरफ़दारी’ की परिभाषा को रेखांकित किया. स्त्री की अस्मिता का प्रश्न, परम्परा, परंपरा के पलायनवादी पक्ष आदि को अज्ञेय, नागार्जुन, केदार आदि के सन्दर्भ में उन्होंने व्याख्यायित किया और कहा कि इतिहास में जिसकी जो भूमिका व स्थान है, उसे वही दिया जाना चाहिए. उस से कम देना भी अन्याय होगा व उस से अधिक देना भी अन्याय. साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन में इस यथार्थ का बोध बहुत आवश्यक है. प्रगतिशील आलोचना पर लगाए जाते  आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि जिनमें यथोचित बल नहीं वे पंजा लड़ाने क्यों चले. अजय तिवारी ने जोड़ा कि नागार्जुन, केदार व शमशेर प्रतिबद्धता व संघर्ष के कवि हैं. जिस कवि में परम्परा अमरता का रूप पाती है, वही कवि अमर होता है. केदार इस अर्थ में अद्वितीय हैं.




“तद्‍भव” के सम्पादक अखिलेश का वक्तव्य केदार की कविताओं के स्त्री पक्ष, स्वकीय प्रेम, स्त्रीचेतना को आज इक्कीसवीं सदी के स्त्री विमर्श के समक्ष तुलनात्मक दृष्टि से मूल्यांकित करने से प्रारम्भ हुआ. विवाह और परिवार, संयुक्त परिवार का परिवेश, सौभाग्य के चिह्न आदि सन्दर्भों व उनके द्वन्द्व पर केन्द्रित उनके आलेख में केदार जी की कई बहुत सुन्दर कविताओं को आज के परिप्रेक्ष्य में पुनर्मूल्यांकित किया गया. केवल देह के शोषण के विरुद्ध या उसी की मुक्ति के अर्थ-मात्र में नहीं अपितु समग्र स्त्रीचेतना और स्त्री मुक्ति के रचनाकार के रूप में केदार के काव्य के उक्त पक्ष को उन्होंने सुचिन्तित ढंग से उद्‍घाटित किया.



अध्यक्षीय उद्‍बोधन में प्रो. नित्यानन्द तिवारी ने  अज्ञेय से सम्बन्धित कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण संस्मरण सुनाते हुए कई ऐतिहासिक तथ्यों का उद्घाटन किया. केदार व नागार्जुन के जनकवि होने व जनकवि होने की पक्षधरता के लिए उठाए खतरों का उल्लेख भी उन्होंने किया. उन्होंने कहा कि कविता यदि कवि की कार्यशाला में जाकर रची जाती है व एक रचनात्मक उत्पाद बनती है तो आप जनकवि नहीं हो सकते. भावबोध की अपेक्षा मनुष्यबोध व जनबोध इसकी प्राथमिक शर्तें हैं. जिसमें जितना लोकपक्ष अधिक होगा, वह उतने अर्थों में जनकवि होने की ओर होता है, इन अर्थों में अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल व नागार्जुन की कविताओं को देखा जाए तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है.




धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र को संक्षेप में समेट देना पड़ा. रात्रि में नागार्जुन की कविताओं की नाट्यप्रस्तुति के अत्यन्त्त रोचक व भावन कार्यक्रम के उत्साह व तैयारी को ध्यान में रखते हुए सत्र में होते विलम्ब को टालने की दॄष्टि से केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित सत्र के कुछ अन्य वक्ताओं को आगामी दिन के सत्रों में सम्मिलित करने का निर्णय लेना पड़ा.




 २ अक्तूबर के अन्तिम कार्यक्रम के रूप में नागार्जुन की कविताओं के रोमांचक नाट्यमंचन को खचाखच भरे सभागार ने खूब सराहा. देर रात तक चले २ अक्तूबर के समस्त कार्यक्रमों में दर्शकों, श्रोताओं व अध्येताओं का उत्साह देखते ही बनता था. वैचारिक सत्रों में श्रोताओं की भारी उपस्थिति ने विश्वविद्यालय की गरिमा बढ़ाई. मध्य रात्रि तक खुले प्रांगण में लेखकों की आत्मीय बैठक ने इस द्विदिवसीय संगोष्ठी को पारिवारिकता का-सा संस्पर्श प्रदान किया.





"हमारे साहित्य समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है"

"हमारे साहित्य समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है"
      अज्ञेय पर एकाग्र

- डॉ. कविता वाचक्नवी


 



महात्मा गाँधी  अंतरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि. में  २ व ३ अक्टूबर २०१०  को आयोजित संगोष्ठी (बीसवीं सदी का अर्थ और जन्मशती का सन्दर्भ )  के उद्घाटन सत्र के पश्चात आयोजित प्रथम सत्र दोपहर ३ बजे से  "अज्ञेय पर एकाग्र" के रूप में  संपन्न हुआ. कार्यक्रम की अध्यक्षता गंगा प्रसाद विमल ने व संचालन   डॉ शम्भु गुप्त ने किया.


 
 पटना से आए प्रो. बलराम तिवारी ने अज्ञेय पर केन्द्रित अपने संबोधन में जिन तथ्यों को रेखांकित किया, वे हैं  -
 - " अज्ञेय जिस रोमांटिक प्रवृत्ति के लिए बदनाम हैं, वह वस्तुतः उन में है ही नहीं उलटे वे तो एंटी रोमांटिक प्रवृत्ति से ग्रस्त हैं.
अपनी बात की पुष्टि के लिए उन्होंने कुछ उद्धरण भी दिए

- "यथास्थिति के प्रति विद्रोह ही अज्ञेय को अमर  बनाता है"

- "हमारे समाज में भाई बहन सम्बन्ध को लेकर जो टैबूज़ हैं शेखर भी उन टैबूज़ को तोड़ नहीं पाते..यह नैतिकतामूलक ग्रंथि का ही अवबोध है"

 - "अगर शिल्प व शास्त्र पर मार्क्सवादी विचारक ध्यान देते हैं तो यह अज्ञेय की देन  है"


 
आगामी वक्ता के  रूप में  युवा कथाकार शशिभूषण ने अपने वक्तव्य में कहा कि -
 - लेखक अपने  कृतित्व  द्वारा समाज को कितना आगे ले जाने का साहस रखता है यह उस लेखक की प्रतिबद्धता से ही प्रकट होता है.

......प्रश्न यह उठता है कि अज्ञेय अपनी प्रतिबद्धता पर अंतिम समय तक स्थिर क्यों नहीं रह पाए. 

ओम् थानवी को उद्धृत करते हुए शशि ने अज्ञेय पर हर समय लगाए जाते आरोपों का उल्लेख किया व एक पुत्र के पिता होने के आरोप को भी  उद्दृत करते हुए  समाज व आलोचना की विसंगतियों पर प्रहार किए. वक्तव्य के अंत में शशि ने खरे शब्दों में कहा कि सीमाएँ अज्ञेय में हैं, परन्तु उस मार्क्सवादी आलोचना में भी तो हैं, जो अज्ञेय को देखती हैं.


 
आगामी वक्तव्य  मनोज कुमार पाण्डेय ने दिया


 
जमशेदपुर से पधारीं विजय शर्मा ने प्रारम्भ में ही यह स्पष्ट किया कि मैं अज्ञेय को सबसे महान रचनाकार के रूप में स्थापित करने के लिए नहीं खडी हूँ.

- "अज्ञेय कान्तिकारी थे, जो बहुत प्रभावित  करने वाला तथ्य था किन्तु स्वयं अज्ञेय ने इस पर बहुत चुप्पी बनाए रखी है. एक समकालीन लेखक के सद्य : प्रकाशित  लेख में उनकी क्रांतिकारिता के अनेक विस्तार जानकर अज्ञेय पर बहुत गुस्सा आया कि वे स्वय चुप क्यों रहे".



 
गाँधीवादी चिन्तक राजकिशोर ने अज्ञेय की पत्रकारिता वाले पक्ष पर अब तक हिन्दी में किसी महत्वपूर्ण कार्य के न होने पर अत्यंत खेद प्रकट किया. उन्होंने व्यंग्यपूर्ण  ढंग से चुटकी लेते हुए कहा कि हमारे साहित्य समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है. दूसरी ओर इस पर क्षोभ जताया कि हमारे पत्रकारिता क्षेत्र में काम करने वालों से स्वयं जाकर पूछ लीजिए उनमें से बहुमत अज्ञेय को जानता तक न होगा. स्थिति इतनी शोचनीय है  कि कोई अज्ञेय के पत्रकारितावंश को  आगे बढ़ाने वाला तक नहीं है.

-"अज्ञेय जी की विचारधारा में अन्तर्विरोध सदा बने रहे किन्तु ये अन्तर्विरोध विचारधारा के अभाव में नहीं थे".


 
अज्ञेय की पत्रकारिता की भाषा पर केन्द्रित अपने सम्बोधन में कृपाशंकर चौबे ने राजकिशोर के वक्तव्य के कई तथ्यों का विरोध करते हुए पत्रकारिता के कुछ स्तम्भों के उल्लेख के साथ अज्ञेय की परम्परा के जीवित रहने के प्रमाण दिए. भाषा व लिपि सम्बन्धी कई नियमों को उन्होंने क्रमवार दोहराया.


अन्तिम वक्ता के रूप में प्रो. सुरेन्द्र वर्मा की उपस्थिति ने सभा को गरिमा प्रदान की.


 
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में गंगाप्रसाद विमल ने कहा कि -
"अज्ञेय के समक्ष हिन्दी आलोचना बौनी रही,आलोचना के पास वे औजार नहीं थे जो अज्ञेय की  रचनाधर्मिता को माप सकती".
- "अज्ञेय अपने समय के सबसे विरल व प्रतिभाशाली रचनाकार थे. हिन्दी आलोचना उनके बिना आगे बढ़ ही नहीं सकती" .
- "अज्ञेय ने पश्चिम के समक्ष भारतीय मनीषा व भाषा को अत्यन्त सम्मानजनक स्थान दिलाया".


 
धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र समाप्त हुआ.

दो दिवसीय कार्यक्रम में होगा गंभीर विमर्श



दो दिवसीय कार्यक्रम में अज्ञेय, केदारनाथ, नागार्जुन, शमशेर व 
फैज़ अहमद फैज़ की जन्‍मशती पर होगा गंभीर विमर्श
२-३ अक्टूबर,  म‍हात्‍मा गाँधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में
वर्धा, 01 अक्‍टूबर, 2010
                                       
    














 म‍हात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में हिंदी के ऐतिहासिक महत्‍व के बडे कवियों  -  अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर तथा उर्दू के विश्‍व विख्‍यात रचनाकार फैज़ अहमद फैज़ की जन्‍म शताब्‍दी तथा कवि रवीन्‍द्रनाथ टैगोर की डेढ़ सौवीं जयंती के अवसर पर उनके साहित्‍य पर चिंतन मनन करने तथा उनके शताब्‍दीपरक मूल्‍यांकन के सन्दर्भ  में गंभीर व दूरगामी विमर्श हेतु आयोजित शताब्‍दीसमारोह-शृंखला का उद्घाटन कल हिंदी के मूर्धन्‍य साहित्‍यकार व विश्‍वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. नामवर सिं‍ह करेंगे।



कल पूर्वाह्न 11 बजे प्रारंभ होने वाले उद्घाटन सत्र की अध्‍यक्षता प्रो. निर्मला जैन करेंगी। कुलपति विभूति नारायण राय स्‍वागत वक्‍तव्‍य देंगे तथा प्रतिकुलपति प्रो.ए. अरविंदाक्षन धन्‍यवाद ज्ञापित करेंगे। साहित्‍य विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता प्रो. सूरज पालीवाल समारोह का संचालन करेंगे। इस अवसर पर विश्‍वविद्यालय के संग्रहालय की वेबसाइट www.archive.hindivishwa.org , जिसकी संकल्‍पना स्‍वयं कुलपति विभूति नारायण राय ने तैयार की है, का लोकार्पण प्रो. नामवर सिंह द्वारा किया जाएगा। 




कल २ अक्टूबर सायं अज्ञेय एवं केदारनाथ अग्रवाल के साहि‍त्यिक अवदान पर दो संगोष्ठियाँ आयोजित होंगी, जिनकी अध्‍यक्षता क्रमश: प्रो.गंगा प्रसाद विमल एवं प्रो. नित्‍यानन्‍द तिवारी करेंगे तथा प्रो. शंभुनाथ एवं प्रो. खगेन्‍द्र ठाकुर मुख्‍य वक्‍ता होंगे। इन संगोष्ठियों में वक्‍ताओं के रूप में अखिलेश, धीरेन्द्र अस्थाना,  प्रो. बलराम तिवारी, राजकिशोर,  प्रो. अजय तिवारी,  बोधिसत्‍व,  विमल कुमार,  डॉ. कृपाशंकर चौबे,  डॉ. रति सक्‍सेना,  डॉ. कविता वाचक्नवी, डॉ. मीता शर्मा,  विजय शर्मा, डॉ. कृपाशंकर चौबे, वसंत त्रिपाठी, नरेन्‍द्र पुण्‍डरीक,  डॉ. वीणा दाढे, मनोज कुमार पाण्‍डेय तथा  शशिभूषण  भागीदारी करेंगे।
इन सत्रों का संचालन डॉ. शंभु गुप्‍त तथा प्रो. संतोष भदौरिया करेंगे। 






03 अक्‍टूबर को आयोजित तीन सत्रों में नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह तथा फैज़ अहमद फैज़ के कृतित्‍व एवं शताब्‍दीपरक महत्‍व पर अलग-अलग चर्चा होगी।


प्रात: 10 बजे नागार्जुन पर एकाग्र संगोष्‍ठी की अध्‍यक्षता प्रो. खगेन्द्र ठाकुर  करेंगे तथा प्रो. विजेन्‍द्र नारायण सिंह मुख्‍य वक्‍ता होंगे। प्रो. गोपेश्‍वर सिंह,  डॉ. नीरज सिंह, डॉ. राम आह्लाद चौधरी, प्रो.के.के. सिंह तथा अवधेश मिश्र वक्‍ता के रूप में अपने विचार रखेंगे। इस सत्र का संचालन प्रो.कृष्‍ण कुमार सिंह करेंगे। अपराह्न 12 बजे प्रारंभ होने वाले सत्र में शमशेर की रचना पर विमर्श होगा जिसकी अध्‍यक्षता अरूण कमल करेंगे। प्रो. रंजना अरगडे मुख्‍य वक्‍ता होंगी। उषा किरण खान, प्रो. माधव सोनटक्‍के, दिनेश कुमार शुक्‍ल, डॉ.विनोद तिवारी  डॉ. मीनाक्षी जोशी, वक्‍ता के रूप में उपस्थित रहेंगे।

 इस सत्र का संचालन राकेश मिश्र करेंगे।


अपराह्न 3 बजे फैज़ अहमद फैज़ पर केंद्रित सत्र का आगाज़ होगा जिसकी अध्‍यक्षता कवि आलोक धन्‍वा करेंगे। मुख्‍य वक्‍ता अली जावेद होंगे। दिनेश कुशवाह तथा कुछ अन्‍य साहित्‍यकार वक्‍ता होंगे। विश्‍वविद्यालय के विशेष कर्तव्‍या‍धिकारी राकेश सत्र का संचालन करेंगे।




२ अक्टूबर सायं  गांधी जयंती के अवसर पर आयोजित शताब्‍दी श्रृंखला के दौरान सांस्‍कृतिक संध्‍या कार्यक्रम में आमं‍त्रित कवियों का कविता पाठ तथा नागार्जुन की कविताओं पर बसंत त्रिपाठी के निर्देशन में नागपुर के कलाकार अपनी नाट्य प्रस्‍तुति देंगे। 


कवि-गोष्ठी के बहाने...



कवि-गोष्ठी के बहाने...
शब्द-शब्द सहेजी गयीं संवेदनाएँ, बयाँ हुआ स






हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर म.गा.अं.हिं.वि.वि. के इलाहाबाद स्थित क्षेत्रीय विस्तार केंद्र में इलाहाबाद शहर के ख्यातिनाम शब्दशिल्पी जब एकत्र हुए तो इस अवसर पर सच बयाँ हुआ और शब्द-शब्द सहेजी गयीं संवेदनाएँ । इस अनूठे कविता पाठ के आयोजन में रचनाकारों ने अपनी कविताओं के जरिए समय और समाज के सच सहित जिंदगी की कड़ुआहटों और खिलखिलाहटों के अर्थ बयाँ किए।


सोमवार १३ सितंबर की शाम आयोजित इस कविता पाठ कार्यक्रम की अध्यक्षता उर्दू के जाने माने रचनाकार एवं प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के साथी प्रो. अकील रिज़वी ने कहा कि विभिन्न भाव बोध की पढ़ी गयी कविताएं निश्चित रूप से हिंदी कविता के एक समृद्ध संसार को रूपायित करती हैं। इस अवसर पर नया ज्ञानोदय के संपादक एवं वरिष्ठ कथाकार व भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया मुख्य अतिथि थे। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि आज इस कार्यक्रम में पढ़ी गयी सभी रचनाएं हिंदी कविता के भविष्य के प्रति आश्वस्त करती हैं।


आयोजन में विशिष्ट अतिथि के तौर पर म.गा.हि.वि.वि. की अंग्रेजी पत्रिका Hindi Discourse की संपादिका एवं वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया ने काव्य पाठ को पूर्णतः सार्थक बताते हुए कहा कि एक अरसे बाद इतनी समृद्ध काव्य गोष्ठी में सिरकत करने का अवसर मुझे मिला।


लखनऊ से पधारे तद्‌भव के संपादक अखिलेश ने इलाहाबाद की समृद्ध साहित्यिक परम्परा के लिए इस गोष्ठी के महत्व को रेखांकित किया।


काव्यपाठ के लिए शहर के युवा एवं वरिष्ठ रचनाकारों ने भागीदारी की जिनमें हरिश्चन्द्र पांडे, बद्रीनारायण (प्रलेस), एहतराम इस्लाम (अध्यक्ष-प्रलेस, इलाहाबाद), यश मालवीय़ (नवगीतकार), अंशु मालवीय, सुरेश कुमार शेष (प्रलेस), नंदल हितैषी (इप्टा), जयकृष्ण तुषार, श्रीरंग पांडेय, संतोष चतुर्वेदी (जनवादी लेखक संघ), अजामिल (इलेक्ट्रॊनिक मीडियाकर्मी) अंशुल त्रिपाठी, संध्या निवेदिता आदि प्रमुख हैं।


गोष्ठी मे शेखर जोशी (जलेस) अनिता गोपेश (कथाकार एवं प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य-प्रलेस) ए.ए. फ़ातमी (प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य-प्रलेस), असरार गांधी (प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य-प्रलेस), सुरेन्द्र राही- सचिव प्रलेस, इलाहाबाद, अनिल रंजन भौमिक (नाट्य कर्मी- समानांतर-इलाहाबाद), अनुपम आनंद- नाट्य कर्मी, सुभाष गांगुली-कथाकार, डॉ कविता वाचक्नवी- कवयित्री व प्रतिष्ठित ब्लॉगर, प्रेमशंकर- जन संस्कृति मंच, रामायन राम (प्रदेश सचिव – आइसा), प्रकाश त्रिपाठी (सह संपादक-बहु वचन), रेनू सिंह, अल्का प्रकाश, हितेश कुमार सिंह, गोपालरंजन (वरिष्ठ पत्रकार), फखरुल करीम (उर्दू रचनाकार), शलभ भारती, श्लेष गौतम आदि  के अतिरिक्त बड़ी संख्या में इलाहाबाद के साहित्यप्रेमी, संस्कृतिकर्मी एवं छात्र उपस्थित थे।


 - (सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)


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