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केदार सम्‍मान 2013



केदार सम्‍मान 2013 
‘रोशनी के रास्‍ते पर’ के लिए अनीता वर्मा सम्‍मानित

कविता अपराध बोध से मुक्‍त करती है – नरेश सक्‍सेना



अनीता वर्मा की कविताएँ सकारात्‍मक एवं संवेदनात्‍मक जीवन की माँग रचती कविताएँ हैं जो एक ऐसे आंतरिक विश्‍वास को मुट्ठी में कसकर आगे बढ़ती हैं कि ‘हत्‍यारे समय’ में भी घर और ‘पतझड़ समय’ में हरी संवेदना का अनुरोध बचा रहे। ये कविताएँ समाज की निस्‍तेज सतह के नीचे दबे पड़े अर्धपूर्ण अन्‍तर्विरोधों को उभारती हुई बृहत्‍तर समाज के दु:ख दर्द, निराशाओं उत्‍साहों, आवेगों की सहभागी होती हैं और उम्‍मीद का हाथ पकड़ कर दार्शनिक समयहीनता के वीरान में भटकने से बच जाती हैं। अनीता वर्मा की कविताएँ अभियानों में शामिल होने के आग्रह की कविताएँ हैं। वरिष्‍ठ कथाकार महेश कटारे ने अनीता वर्मा की कविताओं पर यह वक्‍तव्‍य उन्‍हें केदार सम्‍मान 2013 दिए जाने के अवसर पर दिया। 





महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के इलाहाबाद स्थित क्षेत्रीय केंद्र के सत्‍यप्रकाश मिश्र सभागार में इलाहाबाद के तमाम वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों एवं सुधीजनों के बीच वरिष्‍ठ कवि श्री नरेश सक्‍सेना एवं वरिष्‍ठ कथाकार श्री विभूति नारायण राय के द्वारा उन्‍हें प्रशस्ति पत्र, शॉल, स्‍मृति चिन्‍ह और सम्‍मान राशि प्रदान की गई। सम्‍मान समारोह के अध्‍यक्ष श्री नरेश सक्‍सेना ने कहा कि अपने से युवतर कवियों को सम्‍मानित होते देखना बहुत सुखद अनुभव है। अनीता वर्मा की कविताओं में जटिलता नहीं है। उन्‍हें लगातार मनुष्‍यता माँजती रहती है। उनकी कविताएँ अपराधबोध से मुक्‍त करती हैं। सम्‍मान समारोह के मुख्‍य अतिथि श्री विभूति नारायण राय ने कहा कि अनीता वर्मा की कविताएँ मुझे इसलिए प्रिय हैं, क्‍योंकि वे समय और अपने समाज से मुठभेड़ करती हैं। संकट के दौर में उनकी कविताएँ याद आती हैं यही इनकी ताकत है। 


सम्मान प्राप्‍त करने के उपरान्‍त सुश्री अनीता वर्मा ने अपने वक्‍तव्‍य में कहा कि कविता पढ़ने और पढ़ाने के क्रम में मेरा केदारनाथ अगवाल की कविता से गहरा परिचय हुआ। उनकी कविता के सहज मानवीय विंब मुझे प्रभावित करते हैं। जनता के चहेते ऐसे कवि के नाम पर स्‍थापित सम्‍मान को ग्रहण करना मेरे लिए सौभाग्‍य की बात है। उन्‍होंने कहा मेरे लिए कविता जीवन की तरह है, वह हृदय से निकलती हुई एक आवाज है। यह अन्‍तर के स्‍पंदनों के साथ-साथ बाहर की आवाजों की भीतर ले जाकर गुंजाने की एक छोटी- सी कोशिश है। 


केदार शोधपीठ (न्‍यास) बांदा द्वारा आयोजित इस गरिमापूर्ण सम्‍मान समारोह का संचालन डॉ. संजय श्रीवास्‍तव ने किया। अतिथियों का स्‍वागत प्रो. ए.ए. फातमी, श्री असरार गांधी, प्रो. अनीता गोपेश, सुश्री संध्‍या नवोदिता द्वारा किया गया। समारोह के अंत में समस्‍त अतिथियों एवं सुधीजनों का आभार केदार सम्‍मान समारोह के सह संयोजक प्रो. संतोष भदौरिया ने किया।


केदार सम्‍मान समारोह में प्रमुख रूप से जियाउल हक, रामजी राय, ए.ए. फातमी, असरार गांधी, हरीशचन्द्र पाण्डेय, उमेश नारायण शर्मा, असरफ अली बेग, अनीता गोपेश, अनुपम आनन्‍द, के.के. पाण्‍डेय, जयकृष्‍ण राय तुषार, नीलम शंकर, सालेहा जर्रीन, फखरूल करीम, संध्‍या नवोदिता, रामायन राम, सुभाष चन्‍द्र गांगुली, एहतराम इस्‍लाम, रतिनाथ योगेश्‍वर, श्रीरंग पाण्‍डेय, अनिल सिंह, अनिल रंजन भौमिक, आनंद मालवीय, पूर्णिमा मालवीय, सविता सक्‍सेना, निलय उपाध्‍याय, सुधीर सुमन सहित तमाम साहित्‍य प्रेमी उपस्थित रहे।

ध्यातव्य है कि 'केदार सम्मान' व 'केदार शोध पीठ न्यास' के सचिव नरेंद्र पुंडरीक गत दिनों हुए अपनी माताजी के निधन के कारण इस कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो पाए। 
              

वसंत पंचमी और हरसिंगार के फूलों का केसरिया रंग


वसंत पंचमी और हरसिंगार के फूलों का केसरिया रंग 
- सुधा अरोड़ा






बसंत पंचमी के नाम से मन पचास साल पहले के बसंत के आने की धमक पर लौट लौट जाता है | बसंत पंचमी यानी पीले और केसरिया रंग के गेंदे के फूलों का मौसम ! बसंत पंचमी यानी कई किस्मों के बेर के फल आने का मौसम ! बसंत पंचमी यानी देवी सरस्वती की सुनहली और रुपहली, धवल सफेद और रंग बिरंगी कलात्मक प्रतिमाओं से कलकत्ता के फुटपाथों के अटे होने का मौसम ! बसंत पंचमी यानी सरस्वती पूजा के अनोखा स्वादिष्‍ट प्रसाद का दोना - शंखालू, केला, अमरूद, बेर यानी मौसमी सभी फलों का प्रसाद और इसके साथ ही खाकी कागज के एक अलग ठोंगे में मीठी केसरिया बूँदी में मिली हुई हल्दी रंग की नमकीन सेव । पूरे साल में इस मिश्रण का जो स्वाद सरस्वती पूजा पर आता, दूसरे किसी दिन नहीं । 


सरस्वती पूजा से पहले देवी सरस्वती की सुनहली, रुपहली और रंग बिरंगी कलात्मक प्रतिमाओं से कलकत्ता के फुटपाथ अंट जाते थे। हम दोनों बहनें अपने घर के लिये सरस्‍वती की एक प्रतिमा खरीदने जाते. प्रतिमाओं के सफेद, तांबई, बहुरंगी आकार प्रकार को निहार निहार कर अपनी पसंद की मूर्ति छाँटने में बड़ी परेशानी आती. मन होता कि सभी को उठा कर ले जायें। एक उठाते, एक रखते। आखिर अपनी जेब में रखे पैसों में समाती एक प्रतिमा पसंद कर उसकी कीमत कारीगर को देते. दूकानदार सरस्वती की प्रतिमा को अखबार के कागज में लपेट कर साथ साथ गणेश और लक्ष्मी की दो छोटी छोटी मूर्तियाँ हमें थमा देता. हम कहते - हमने तो देवी की एक ही प्रतिमा के पैसे दिये हैं. वह कहता - ए टा ओ निये जाओ माँ , पॉयशा दिते हबे ना ( ये भी ले जाओ, इसके लिये पैसे नहीं देने हैं ) ऐसा क्यों ? हमारी जिज्ञासा होती तो कहता - जहाँ ज्ञान की देवी जायेगी वहाँ विवेक और धन तो अपने आप रहने के लिये आ जाते हैं. इन विघ्न विनाशक और लक्ष्मी को भी रख लो. हम दोनों बहनें खुश खुश लौटते। आज का समय होता तो कहते -'' बाय वन, गेट टू फ्री ! '' 


सरस्‍वती पूजा से दो-चार दिन पहले से केसरिया रंग की फ्रॉक की तैयारी शुरु हो जाती . बसंत पंचमी यानी एक दिन के लिये स्कूल की सफेद पोशाक के बदले केसरिया, पीले रंग की फ्रॉक या सलवार कुरता और दुपट्टा पहनने का दिन ! हमारे पास स्कूल के लिये जो सफेद फ्रॉक होती, उसमें से थोड़ी सी घिसी हुई फ्रॉक को रंगने के लिये अलग कर लिया जाता. अपने घर के बगल में एक बंगाली सेन महाशय के बागान से हम दोनों बहनें सुबह सुबह जाकर हरसिंगार के झरे हुए फूल - पूरे बागान की हरी घास पर जिसकी चादर बिछी होती - चुन कर अपनी फूलों की डलिया भर लेते, तब भी फूल अगर कम लगते तो पेड़ के तने को दोनों हाथों से थामकर थोड़ा हिला भर देते और डालियों से हरसिंगार के फूल झमाझम बारिश की बूँदों की तरह झरने लगते - हमारे सिर माथे पर, हमारी डलिया में, हमारे कपड़ों पर. इतने ढेर सारे फूल लेकर फिर उन्हें आधी बाल्टी पानी में भिगोया जाता और उनके केसरिया रंग में फ्रॉक रंगी जाती. यह रंग एकसार होता - कहीं गहरा, कहीं हल्का नहीं जैसा आमतौर पर कपड़ों के रंगों में रंगने से हो जाता था. फिर फूलों की खुशबू भी फ्रॉक में रच-बस जाती .   


घर में भी हर साल सरस्वती की प्रतिमा आती और साल भर रहती, स्कूल में तो स्थायी प्रतिमा थी जिसका भव्य साज शृंगार सरस्वती पूजा के दिन किया जाता और विद्यार्थियों के रंगारंग कार्यक्रमों और गायन से पूरा वातावरण झंकृत हो उठता। वे 1955 से 1962 के बीच के साल थे जब मैं कक्षा पाँच से ग्यारहवीं तक कलकत्ता के श्री शिक्षायतन स्कूल में पढ़ रही थी. यह उस इलाके का हिन्दी माध्यम का सिर्फ लड़कियों का सबसे बेहतरीन स्कूल माना जाता था. सरस्वती पूजा हमारे स्कूल का एक बड़ा उत्सव था क्योंकि इस दिन विद्या की देवी की पूजा की जाती थी। महीने पहले से उत्सव की तैयारियाँ शुरु हो जातीं - नृत्य नाटिकाएँ, गायन-वाचन प्रतियोगिताएँ। 'वर दे वीणा वादिनी वर दे' से लेकर कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर का गीत '' आगुनेर परस दिए छोआओ प्राणे, ए जीबन पूर्ण करो दहन दाने '' सस्वर गाया जाता । पीले केसरिया गेंदे के फूलों से अल्पना का सुंदर गोलाकार वृत्त बनाया जाता और भीतर चावल के आटे से रंगोली आँकी जाती . नवीं और दसवीं कक्षा की लड़कियाँ अपने उस विषय की किताबें सरस्वती की प्रतिमा के पीछे रखतीं जो विषय उनको सबसे मुश्किल लगता और जिसको समझने के लिये देवी सरस्वती की विशेष अनुकंपा की ज़रूरत होती । 


नये नये स्कूलों का उद्घाटन वसंत पंचमी के दिन ही होता। हाथ में नयी स्लेट और नयी चॉक देकर सरस्वती पूजा के दिन ही बच्चों का विद्यारंभ करवाया जाता । उन दिनों ज्ञान और विद्या की देवी सरस्‍वती थी, इस देवी को नेट, गूगल और आइ पॉड ने रिप्‍लेस नहीं किया था । 


वसंत के आने की धमक के साथ बेर फल के आने का मौसम होता । स्कूल के बाहर बेर के खोमचे वाला बैठता जो आम तौर पर आमड़ा, इमली और अनारदाने के चूरन की गोलियाँ  रखता । माना जाता था कि लड़कियाँ इमली जैसी खट्रटी मीठी और चूरन जैसी चटपटी चीजें ही पसंद करती हैं। साल-भर के लिये यह स्थायी खोमचा था पर मौसमी फलों के आने के साथ वह अपने खोमचे पर तरह तरह के बेर सजाने लगता । हम उन बेरों को ललचाई नज़रों से देखते और चटखारे लेती जीभ को होंठों के भीतर कैद कर लेते कि बेर का पहला भोग सरस्वती मैया की प्रतिमा को लगेगा, तब जाकर हम मौसम का पहला बेर चखेंगे । अगर भोग से पहले चख लिया तो सरस्वती मैया नाराज़ हो जाएगी, फिर हम अच्छे नंबरों से पास नहीं होंगे, इसलिये प्रसाद के दोने का हाथ में आना मानो अब रोज़ बेर खाने का प्रवेश पत्र होता सो पहली बार फलों के प्रसाद के दोने में शंखालू, केले और अमरूद के साथ बेर चखने का मज़ा ही कुछ और था। सरस्वती पूजा के प्रसाद में मीठी बूँदी में नमकीन भुजिया मिले प्रसाद का पुड़ा भी हमें मिलता था । वह स्वाद याद कर आज भी मुँह में स्वादेन्द्रियाँ रस छलका रही हैं । 


कितना इंतजार करते थे हम इस सरस्वती पूजा का ! कैसा जुनून था किताबों का ! उन किताबों को सरस्वती की प्रतिमा के पीछे रखकर देवी से वरदान माँगने का ! और उत्साह से छलकते घर लौटते हुए, प्रसाद का थोड़ा सा हिस्सा बचाकर, माँ और पापा को देने का ! आज यह समय ही खो गया है । नहीं मालूम कोलकाता के स्कूलों में अब सरस्वती पूजा होती है या नहीं पर मुंबई में तो नहीं होती । बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा की जगह वेलेंटाइन डे होता है, जिसमें लड़कियाँ थोक में मित्रों को मित्रता की डोरी बाँधती हैं । यह रिवाज़ बुरा नहीं पर अपने पुराने उत्सवों को स्थगित कर इनका आना मन में अब एक टीस-सी पैदा करता है । क्या हमारे सारे त्यौहार, सारे जुड़ाव, किताबों के लिये ऐसा उछाह, गेंदे के फूलों की अल्‍पना और केसरिया बूँदी और नमकीन भुजिया का अनोखा प्रसाद, अब अतीत की चीज़ बनकर रह जायेगा ? 

 - सुधा अरोड़ा
1702 , सॉलिटेअर , डेल्‍फी के सामने,
हीरानंदानी गार्डेन्स, पवई,
मुंबई - 400 076 
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505

भारत भवन की 30वीं वर्षगाँठ का समारोह


भारत भवन की 30वीं वर्षगाँठ का समारोह गरिमापूर्ण ढंग से सम्पन्न


बहुकला केंद्र, भारत भवन की 30वीं वर्षगाँठ का समारोह 13 से 19 फरवरी 2012 तक आयोजित किया गया। इस समारोह में वैविध्य से परिपूर्ण कलात्मक आयोजन सम्पन्न हुए।

भारत भवन के वर्षगाँठ समारोह का शुभारम्भ मध्यप्रदेश के संस्कृति मन्त्री माननीय श्री लक्ष्मीकान्त शर्मा द्वारा किया गया। समारोह का शुभारम्भ करते हुए संस्कृति मन्त्री ने  भारत भवन को देश-दुनिया का अनूठा  कलाकेन्द्र कहा और उन्हानें  इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि भारत भवन की गरिमा और प्रतिष्ठा के अनुकूल  30वीं  वर्षगाँठ का समाराहे आयोजित हो रहा है और  देश के अग्रणी कलाकार इस समारोह में अपनी प्रस्तुतियाँ दे रहे हैं। संस्कृति मन्त्री ने यह सकंल्प प्रकट किया कि भारत भवन अपनी उत्कृष्ट कलात्मक गतिविधियों से देश का अग्रणी कला संस्थान बना रहेगा और कलाकारों की रचनाशीलता को यहाँ भरपूर सम्मान और मंच दिया जाता रहेगा। भारत भवन की गतिविधियों को  गरिमापूर्ण ढंग से आयोजित करने  में  किसी तरह से आथिर्क तंगी आड़े नहीं आने दी जाएगी इसका भी आश्वासन  संस्कृति मन्त्री ने सभागार में अपने सम्बोधन के दौरान प्रकट किया।

दीपपर्व अति मंगलमय हो !


दीपपर्व अति मंगलमय हो !

" असतो मा सद् गमय 
   तमसो मा ज्योतिर्गमय 
      मृत्योर्मा अमृतम् गमय "





हिंदी विवि में त्रि-दिवसीय फिल्‍म समारोह का उद्घाटन


हिंदी विवि में फिरोज अब्‍बास खान ने किया त्रिदिवसीय फिल्‍म समारोह का उद्घाटन
फिल्‍मोत्‍सव में कई फिल्‍मी हस्तियाँ थीं मौजूद, `गांधी माई फादर' रही उद्घाटन फिल्‍म  


वर्धा, 06 सितम्‍बर, 2011;

 महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में पहली बार आयोजित त्रिदिवसीय (6-8 सितम्‍बर, 2011) महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह का उद्घाटन कई फिल्‍मी हस्तियों की मौजूदगी में सुप्रसिद्ध फिल्‍म निर्देशक फिरोज अब्‍बास खान ने किया। फिरोज अब्‍बास खान की फिल्‍म गांधी माई फादर उद्घाटन फिल्‍म रही। फिल्‍म समारोह की अध्‍यक्षता वि‍श्‍वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने की।

यह चुस्ती .....


यह चुस्ती फिर कब दिखाई देगी? 
 -  राजकिशोर 



दूसरे सभी बुखारों की तरह आखिरकार कॉमनवेल्थ खेलों का बुखार उतर गया। दिल्ली के राजा लोग अपनी पीठ थपथपा सकते हैं कि वे एक कठिन परीक्षा में खरे उतरे हैं। जैसे ज्यादातर छात्र साल भर मौज-मस्ती करते हैं और आखिरी दिनों में परीक्षा की तैयारी जोर-शोर से करने लगते हैं, वैसे ही भारत सरकार शुरू में तो इस उम्मीद पर लगभग हाथ पर हाथ धरे बैठी रही कि ईश्वर की कृपा से सब कुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन जब परीक्षा की तारीखें नजदीक आने लगीं और सब कुछ गलत ही गलत होता नजर आने लगा, तब आला वजीर को खुद हस्तक्षेप करना पड़ा और तैयारी की गाड़ी टॉप स्पीड से चलने लगी। अब हम संतोष की सांस ले सकते हैं और यह दावा कर सकते हैं कि हम उतने जाहिल या काहिल नहीं हैं जितना अखबारों में काम करने वाले, जो व्यवस्था के जन्मजात आलोचक हैं, हमें बता रहे थे। अखबार हार गए, सरकार जीत गई। 


क्या यह प्रधानमंत्री की अचानक पैदा हुई नाराजगी का नतीजा था कि कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी समय पर पूरी हो गई और हम अपनी ही आंखों में गिरने से बच गए? विचार करने की बात यह है कि विशेषज्ञ वही थे, अमलाशाही वही थी, ठेकेदार और मजदूर वही थे, लेकिन वे तब तक कछुए की चाल से चलते रहे जब तक इन सभी पर ऊपर से एक अदृश्य मुक्का पड़ा। क्या इस मुक्के की थाप न लगने तक वे अपना-अपना काम संतोषप्रद रफ्तार से नहीं कर सकते थे? मुक्का खाने के बाद इन सब की कार्य कुशलता अचानक बढ़ गई और जो समय पर होता हुआ नहीं दिख रहा था, वह अचानक रास्ते पर आ गया। इससे क्या पता चलता है? 



पता यह चलता है कि भारत की अमलाशाही वास्तव में उतनी काहिल या कामचोर नहीं है जितनी आम तौर पर समझी जाती है। वह चाहे तो अपनी हर ड्यूटी को ठीक से और समय पर निपटा सकती है। लेकिन इसके लिए उसे चाबुक की फटकार चाहिए। चाबुक का डर न हो, तो सब कुछ बिखरा-बिखरा-सा पड़ा रहता है – फर्श की धूल, सड़कों के गड्ढे, शौचालयों की गंदगी, पेशाबखानों के दाग और दफ्तर की उद्देश्यहीन अस्तव्यस्तता। जब पता चलता है कि साहब दौरा करने वाले हैं, तब अचानक सभी अधीनस्थों की इंद्रियां – छठी इंद्रिय सहित - जाग उठती हैं और साहब जहां-जहां से गुजर सकते हैं, वहां-वहां सुंदरीकरण का अभियान शुरू हो जाता है। यह चुस्ती अचानक आसमान से टपक नहीं पड़ती, बल्कि भीतर सोई रहती है। जागती वह तब है जब निलंबित या बरखास्त होने का डर पैदा हो जाता है। शायद हमारा राष्ट्रीय चरित्र यही है। 



बेशक सरकारी दफ्तरों और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों की तुलना में निजी क्षेत्र के काम-काज में मजबूरी होने पर ही काम करने की प्रवृति बहुत कम दिखाई पड़ती है। इसका मुख्य कारण यह है कि सरकारी कर्मचारियों को नौकरी की सुरक्षा का अभेद्य कवच मिला हुआ है। उन्हें स्थानांतरित या मुअत्तल तो कभी भी किया जा सकता है, पर बरखास्त करना नाकों तले चने चबाना है। मंत्री आते-जाते रहते हैं, संत्री बने रहते हैं। दूसरी तरफ, निजी क्षेत्र में एक मिनट में छुट्टी हो जा सकती है – कर्मचारी की गलती हो चाहे न हो। यहां हर कर्मचारी अपनी पीठ पर चाबुक की छाया महसूस करता है और चाबुक की मार से नहीं, बल्कि मार के भय से सरपट दौड़ता रहता है - उसके पेट में पूरे दाने हों या नहीं। 



निश्चय ही, यह कोई अच्छी हालत नहीं है। इसी आधार पर निजी क्षेत्र को सार्वजनिक क्षेत्र से ज्यादा चुस्त और कार्यकुशल बताया जाता है। प्रतिद्वंद्विता को सहकार से ज्यादा कारगर भावना माना जाता है। सवाल उठता है कि मनुष्य क्या हमेशा डर से ही परिचालित होता रहेगा? क्या लोभ ही उसकी कार्यकुशलता का स्तर ऊंचा रख सकता है? बेशक साधारण आदमी के लिए संत होना कठिन है (सच तो यह है कि संतों के लिए भी संत होना कम कठिन नहीं है)। बेहतर से बेहतर संस्कृति में भी डर और लोभ की कुछ न कुछ भूमिका बनी रहेगी। इसके बावजूद उत्पादन के पूरे तंत्र की परिचालिका शक्ति अगर यही तत्व बने रहते हैं, तो ऐसे समाज को कोई सभ्य समाज नहीं कहा जा सकता। यह तो एक तरह से दास प्रथा की वापसी है। 



कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी का पूरापन एक और तथ्य की याद दिलाता है। वह तथ्य यह है कि भारत सरकार आम तौर पर भले ही लद्धड़ और सुस्त दिखाई देती हो, किसी बड़ी चुनौती का सामना करना हो, तो वह चीते की-सी फुर्ती के साथ टूट पड़ती है। कुछ ऐसी ही घटनाओं को याद कीजिए। तेलंगाना में सशस्त्र क्रांति के प्रयास को कितना जल्द कुचल गया था। इमरजेंसी में सरकारी तंत्र कितना चुस्त और कार्यकुशल हो गया था। बाबू दफ्तर में समय पर पहुंचने लगे थे और रेलें एकदम समय पर चलने लगी थीं। जब पंजाब में आतंकवाद पर निर्णायक चोट करनी थी और भिंडरांवाले को खत्म करना था, तब अकाल तख्त पर कितनी त्वरित कार्रवाई की गई थी। जब करगिल में भारतीय जमीन को पाकिस्तानी घुसपैठियों से आजाद कराना था, तो इस काम को कितनी जल्द और कितनी बहादुरी के साथ अंजाम दे दिया गया था। लेकिन यही फुर्ती माओवादियों का सफाया करने में (यह उचित है या नहीं, यह अलग सवाल है), दिखाई नहीं पड़ रही है। इसका प्रमुख कारण यही है कि सरकार ने घोषणा भले ही कर दी हो, पर वह अपनी पूरी ऊर्जा के साथ इस अजेंडा पर काम नहीं कर पा रही है। अगर सरकार सचमुच ठान ले, तो यह काम दो-तीन महीने से ज्यादा का नहीं है। 



इसीलिए यह प्रश्न करना जायज है कि कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन में जिस तरह की सक्रियता दिखाई दी, क्या वैसी ही सक्रियता अन्य सरकारी परियोजनाओं के क्रियावन्यन में क्यों दिखाई नहीं दे सकती? गरीबों के लिए सरकारी अनाज देर से पहुंचता है, बीपीएल कार्ड जारी करने में महीनों लग जाते हैं, सड़कें मरम्मत के इंतजार में बरसों बिलखती रहती हैं, बिजली के खंबे लग जाते हैं, पर बिजली को पहुंचने में कई साल लग जाते हैं, आदमी आज रिटायर होता है और उसकी पेंशन अगले या अगले के अगले साल शुरू हो पाती है आदि-आदि। स्पष्ट है कि सरकार ने खेलों के आयोजन में जैसी चुस्ती दिखाई, क्या वैसी ही चुस्ती वह अन्यत्र क्यों नहीं दिखा सकती है। लेकिन किसी को इसकी जरूरत ही क्या है? क्या इसके बिना भी देश ठीकठाक नहीं चल रहा है और दुनिया भारत में लोकतंत्र की सफलता के गीत नहीं गा रही है?



"जिसमें जितना लोकपक्ष अधिक होगा, वह उतने अर्थों में जनकवि होने की ओर होता है"



जनकविता व जनकवि के निर्माण में लोक सहभागी होता है”
:
केदारनाथ अग्रवाल पर एकाग्र

- डॉ. कविता वाचक्नवी





२-३ अक्तूबर २०१० को महात्मा गान्धी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि. वर्धा में आयोजित संगोष्ठी “बीसवीं सदी का अर्थ और जन्मशती का सन्दर्भ” के पहले दिन तीसरे सत्र के रूप में कवि केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित परिचर्चा का आयोजन किया गया. सत्र की अध्यक्षता प्रो. नित्यानन्द तिवारी ने एवम् संचालन अरुणेश शुक्ला द्वारा किया गया.



प्रथम वक्ता के रूप में प्रो. खगेन्द्र ठाकुर ने केदार की कविताओं की आलोचना के सन्दर्भ की चर्चा में कलावादी आलोचना की मीमांसा करते हुए कालिदास, भारवि, माघ व दण्डी के साहित्य के टीकाकारों का उल्लेख किया. पिछड़े, वंचित व उपेक्षित वर्ग के प्रति केदार की कविता की पक्षधरता, सामाजिकता व उनकी राजनीतिपरक कविताओं के अनेकानेक उदाहरणों से उन्होंने अपनी बात पुष्ट की.




प्रो. अजय तिवारी ने प्रगतिशील आलोचना पर पक्षपात के आरोपों का खण्डन करते हुए अज्ञेय व केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित मौलिक पुस्तकों का प्रश्न उठाया. साथ ही  रामविलास शर्मा द्वारा दी गई प्रगतिशीलता की ‘जनता की तरफ़दारी’ की परिभाषा को रेखांकित किया. स्त्री की अस्मिता का प्रश्न, परम्परा, परंपरा के पलायनवादी पक्ष आदि को अज्ञेय, नागार्जुन, केदार आदि के सन्दर्भ में उन्होंने व्याख्यायित किया और कहा कि इतिहास में जिसकी जो भूमिका व स्थान है, उसे वही दिया जाना चाहिए. उस से कम देना भी अन्याय होगा व उस से अधिक देना भी अन्याय. साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन में इस यथार्थ का बोध बहुत आवश्यक है. प्रगतिशील आलोचना पर लगाए जाते  आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि जिनमें यथोचित बल नहीं वे पंजा लड़ाने क्यों चले. अजय तिवारी ने जोड़ा कि नागार्जुन, केदार व शमशेर प्रतिबद्धता व संघर्ष के कवि हैं. जिस कवि में परम्परा अमरता का रूप पाती है, वही कवि अमर होता है. केदार इस अर्थ में अद्वितीय हैं.




“तद्‍भव” के सम्पादक अखिलेश का वक्तव्य केदार की कविताओं के स्त्री पक्ष, स्वकीय प्रेम, स्त्रीचेतना को आज इक्कीसवीं सदी के स्त्री विमर्श के समक्ष तुलनात्मक दृष्टि से मूल्यांकित करने से प्रारम्भ हुआ. विवाह और परिवार, संयुक्त परिवार का परिवेश, सौभाग्य के चिह्न आदि सन्दर्भों व उनके द्वन्द्व पर केन्द्रित उनके आलेख में केदार जी की कई बहुत सुन्दर कविताओं को आज के परिप्रेक्ष्य में पुनर्मूल्यांकित किया गया. केवल देह के शोषण के विरुद्ध या उसी की मुक्ति के अर्थ-मात्र में नहीं अपितु समग्र स्त्रीचेतना और स्त्री मुक्ति के रचनाकार के रूप में केदार के काव्य के उक्त पक्ष को उन्होंने सुचिन्तित ढंग से उद्‍घाटित किया.



अध्यक्षीय उद्‍बोधन में प्रो. नित्यानन्द तिवारी ने  अज्ञेय से सम्बन्धित कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण संस्मरण सुनाते हुए कई ऐतिहासिक तथ्यों का उद्घाटन किया. केदार व नागार्जुन के जनकवि होने व जनकवि होने की पक्षधरता के लिए उठाए खतरों का उल्लेख भी उन्होंने किया. उन्होंने कहा कि कविता यदि कवि की कार्यशाला में जाकर रची जाती है व एक रचनात्मक उत्पाद बनती है तो आप जनकवि नहीं हो सकते. भावबोध की अपेक्षा मनुष्यबोध व जनबोध इसकी प्राथमिक शर्तें हैं. जिसमें जितना लोकपक्ष अधिक होगा, वह उतने अर्थों में जनकवि होने की ओर होता है, इन अर्थों में अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल व नागार्जुन की कविताओं को देखा जाए तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है.




धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र को संक्षेप में समेट देना पड़ा. रात्रि में नागार्जुन की कविताओं की नाट्यप्रस्तुति के अत्यन्त्त रोचक व भावन कार्यक्रम के उत्साह व तैयारी को ध्यान में रखते हुए सत्र में होते विलम्ब को टालने की दॄष्टि से केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित सत्र के कुछ अन्य वक्ताओं को आगामी दिन के सत्रों में सम्मिलित करने का निर्णय लेना पड़ा.




 २ अक्तूबर के अन्तिम कार्यक्रम के रूप में नागार्जुन की कविताओं के रोमांचक नाट्यमंचन को खचाखच भरे सभागार ने खूब सराहा. देर रात तक चले २ अक्तूबर के समस्त कार्यक्रमों में दर्शकों, श्रोताओं व अध्येताओं का उत्साह देखते ही बनता था. वैचारिक सत्रों में श्रोताओं की भारी उपस्थिति ने विश्वविद्यालय की गरिमा बढ़ाई. मध्य रात्रि तक खुले प्रांगण में लेखकों की आत्मीय बैठक ने इस द्विदिवसीय संगोष्ठी को पारिवारिकता का-सा संस्पर्श प्रदान किया.





"हमारे साहित्य समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है"

"हमारे साहित्य समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है"
      अज्ञेय पर एकाग्र

- डॉ. कविता वाचक्नवी


 



महात्मा गाँधी  अंतरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि. में  २ व ३ अक्टूबर २०१०  को आयोजित संगोष्ठी (बीसवीं सदी का अर्थ और जन्मशती का सन्दर्भ )  के उद्घाटन सत्र के पश्चात आयोजित प्रथम सत्र दोपहर ३ बजे से  "अज्ञेय पर एकाग्र" के रूप में  संपन्न हुआ. कार्यक्रम की अध्यक्षता गंगा प्रसाद विमल ने व संचालन   डॉ शम्भु गुप्त ने किया.


 
 पटना से आए प्रो. बलराम तिवारी ने अज्ञेय पर केन्द्रित अपने संबोधन में जिन तथ्यों को रेखांकित किया, वे हैं  -
 - " अज्ञेय जिस रोमांटिक प्रवृत्ति के लिए बदनाम हैं, वह वस्तुतः उन में है ही नहीं उलटे वे तो एंटी रोमांटिक प्रवृत्ति से ग्रस्त हैं.
अपनी बात की पुष्टि के लिए उन्होंने कुछ उद्धरण भी दिए

- "यथास्थिति के प्रति विद्रोह ही अज्ञेय को अमर  बनाता है"

- "हमारे समाज में भाई बहन सम्बन्ध को लेकर जो टैबूज़ हैं शेखर भी उन टैबूज़ को तोड़ नहीं पाते..यह नैतिकतामूलक ग्रंथि का ही अवबोध है"

 - "अगर शिल्प व शास्त्र पर मार्क्सवादी विचारक ध्यान देते हैं तो यह अज्ञेय की देन  है"


 
आगामी वक्ता के  रूप में  युवा कथाकार शशिभूषण ने अपने वक्तव्य में कहा कि -
 - लेखक अपने  कृतित्व  द्वारा समाज को कितना आगे ले जाने का साहस रखता है यह उस लेखक की प्रतिबद्धता से ही प्रकट होता है.

......प्रश्न यह उठता है कि अज्ञेय अपनी प्रतिबद्धता पर अंतिम समय तक स्थिर क्यों नहीं रह पाए. 

ओम् थानवी को उद्धृत करते हुए शशि ने अज्ञेय पर हर समय लगाए जाते आरोपों का उल्लेख किया व एक पुत्र के पिता होने के आरोप को भी  उद्दृत करते हुए  समाज व आलोचना की विसंगतियों पर प्रहार किए. वक्तव्य के अंत में शशि ने खरे शब्दों में कहा कि सीमाएँ अज्ञेय में हैं, परन्तु उस मार्क्सवादी आलोचना में भी तो हैं, जो अज्ञेय को देखती हैं.


 
आगामी वक्तव्य  मनोज कुमार पाण्डेय ने दिया


 
जमशेदपुर से पधारीं विजय शर्मा ने प्रारम्भ में ही यह स्पष्ट किया कि मैं अज्ञेय को सबसे महान रचनाकार के रूप में स्थापित करने के लिए नहीं खडी हूँ.

- "अज्ञेय कान्तिकारी थे, जो बहुत प्रभावित  करने वाला तथ्य था किन्तु स्वयं अज्ञेय ने इस पर बहुत चुप्पी बनाए रखी है. एक समकालीन लेखक के सद्य : प्रकाशित  लेख में उनकी क्रांतिकारिता के अनेक विस्तार जानकर अज्ञेय पर बहुत गुस्सा आया कि वे स्वय चुप क्यों रहे".



 
गाँधीवादी चिन्तक राजकिशोर ने अज्ञेय की पत्रकारिता वाले पक्ष पर अब तक हिन्दी में किसी महत्वपूर्ण कार्य के न होने पर अत्यंत खेद प्रकट किया. उन्होंने व्यंग्यपूर्ण  ढंग से चुटकी लेते हुए कहा कि हमारे साहित्य समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है. दूसरी ओर इस पर क्षोभ जताया कि हमारे पत्रकारिता क्षेत्र में काम करने वालों से स्वयं जाकर पूछ लीजिए उनमें से बहुमत अज्ञेय को जानता तक न होगा. स्थिति इतनी शोचनीय है  कि कोई अज्ञेय के पत्रकारितावंश को  आगे बढ़ाने वाला तक नहीं है.

-"अज्ञेय जी की विचारधारा में अन्तर्विरोध सदा बने रहे किन्तु ये अन्तर्विरोध विचारधारा के अभाव में नहीं थे".


 
अज्ञेय की पत्रकारिता की भाषा पर केन्द्रित अपने सम्बोधन में कृपाशंकर चौबे ने राजकिशोर के वक्तव्य के कई तथ्यों का विरोध करते हुए पत्रकारिता के कुछ स्तम्भों के उल्लेख के साथ अज्ञेय की परम्परा के जीवित रहने के प्रमाण दिए. भाषा व लिपि सम्बन्धी कई नियमों को उन्होंने क्रमवार दोहराया.


अन्तिम वक्ता के रूप में प्रो. सुरेन्द्र वर्मा की उपस्थिति ने सभा को गरिमा प्रदान की.


 
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में गंगाप्रसाद विमल ने कहा कि -
"अज्ञेय के समक्ष हिन्दी आलोचना बौनी रही,आलोचना के पास वे औजार नहीं थे जो अज्ञेय की  रचनाधर्मिता को माप सकती".
- "अज्ञेय अपने समय के सबसे विरल व प्रतिभाशाली रचनाकार थे. हिन्दी आलोचना उनके बिना आगे बढ़ ही नहीं सकती" .
- "अज्ञेय ने पश्चिम के समक्ष भारतीय मनीषा व भाषा को अत्यन्त सम्मानजनक स्थान दिलाया".


 
धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र समाप्त हुआ.

फादर कामिल बुल्के : प्रतिमा का अनावरण

फादर कामिल बुल्के : प्रतिमा का अनावरण


विश्व प्रसिद्ध हिंदीसेवी व रामकथा  के विशेषज्ञ और शब्दकोषनिर्माता फादर कामिल बुल्के के जन्मशताब्दी वर्ष में उनकी प्रतिमा का आज यहाँ अनावरण किया गया तथा उनके नाम पर एक अंतरराष्ट्रीय छात्रावास का उद्घाटन भी किया गया. महात्मा गाँधी अन्तराष्ट्रीय हिन्दी वि. वि. के कुलाधिपति एवं प्रख्यात आलोचक डॉ नामवर सिंह ने वि.वि. परिसर में निर्मित फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास का उद्घाटन किया और उनकी आवक्ष प्रतिमा का भी अनावरण किया.


१ सितम्बर १९०९ में बेल्जियम के रामस्कापले गाँव में जन्मे कामिल बुल्के ने इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद कोलकाता से संस्कृत में एम ए किया तथा इलाहाबाद से हिन्दी में एम ए किया और रामकथा उत्पत्ति एवं विकास पर इलाहाबाद वि वि से पीएच डी की उपाधि प्राप्त की और राँची में रहकर अपना सम्पूर्ण जीवन हिन्दी की सेवा में लगा दिया. १९७४ में पद्मभूषण से अलंकृत श्री बुल्के भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में रामकथा के विषय-विशेषज्ञ के रूप में जाने गए और कामिल बुल्के हिन्दी- अंग्रेजी शब्दकोष निर्माता के रूप में वे अमर हो गए.


 प्रो. नामवर सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि  यीशु के महान उपासक होने के बावजूद कामिल बुल्के ने  रामकथा की सारी परम्पराओं के ज़रिए भारत की आत्मा को पहचाना था, उनके लिए राम का अर्थ किसी मंदिर-मस्जिद का विध्वंस या निर्माण नहीं, अपितु ज्ञान की सृजनात्मकता को रेखांकित करना था. पूरे भारत में पहली बार कामिल बुल्के की स्मृति में किसी भवन का उद्घाटन किया गया. 

कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय वि. वि. में विदेशों से आने वाले छात्रों के लिए छात्रावास का नामकरण कामिलबुल्के के नाम पर होना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है.


वि. वि. में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा का अनावरण पिछले दिनों सिक्किम के राज्यपाल  महामहिम बीपी सिंह के द्वारा किया गया था. इसी क्रम में समाजसेविका सावित्रीबाई फुले व प्रसिद्ध कवि गोरख पांडे की प्रतिमा का भी अनावरण होना है. इसके अतिरिक्त मुशी प्रेमचंद, भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाम  पर सड़कों का नामकरण भी किया गया और वि.वि. की पाँच पहाड़ियों में से दो का नामकरण  गाँधी हिल तथा कबीर हिल   के नाम से रखा गया. 


फादर कामिल बुल्के के स्मृति समारोह में वि. वि. के कुलपति विभूति नारायण राय, प्रतिकुलपति प्रो. ए अरविन्दाक्षन, कुलसचिव कैलाश खामारे, प्रो निर्मला जैन, प्रो. नित्यानंद तिवारी, प्रो. खगेन्द्र ठाकुर, प्रो. विजेंद्र नारायण सिंह, प्रो. सुरेन्द्र वर्मा, कवि आलोक धन्वा, अरुण कमल, प्रो.गंगाप्रसाद विमल, उषाकिरण खान, राजकिशोर, प्रो. सूरज पालीवाल,प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव, डॉ. शम्भू गुप्त  व डॉ.अनिल पांडे सहित अन्य अनेकानेक गण्यमान्य लेखक विचारक व साहित्यकार उपस्थित थे.


दो दिवसीय कार्यक्रम में होगा गंभीर विमर्श



दो दिवसीय कार्यक्रम में अज्ञेय, केदारनाथ, नागार्जुन, शमशेर व 
फैज़ अहमद फैज़ की जन्‍मशती पर होगा गंभीर विमर्श
२-३ अक्टूबर,  म‍हात्‍मा गाँधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में
वर्धा, 01 अक्‍टूबर, 2010
                                       
    














 म‍हात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में हिंदी के ऐतिहासिक महत्‍व के बडे कवियों  -  अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर तथा उर्दू के विश्‍व विख्‍यात रचनाकार फैज़ अहमद फैज़ की जन्‍म शताब्‍दी तथा कवि रवीन्‍द्रनाथ टैगोर की डेढ़ सौवीं जयंती के अवसर पर उनके साहित्‍य पर चिंतन मनन करने तथा उनके शताब्‍दीपरक मूल्‍यांकन के सन्दर्भ  में गंभीर व दूरगामी विमर्श हेतु आयोजित शताब्‍दीसमारोह-शृंखला का उद्घाटन कल हिंदी के मूर्धन्‍य साहित्‍यकार व विश्‍वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. नामवर सिं‍ह करेंगे।



कल पूर्वाह्न 11 बजे प्रारंभ होने वाले उद्घाटन सत्र की अध्‍यक्षता प्रो. निर्मला जैन करेंगी। कुलपति विभूति नारायण राय स्‍वागत वक्‍तव्‍य देंगे तथा प्रतिकुलपति प्रो.ए. अरविंदाक्षन धन्‍यवाद ज्ञापित करेंगे। साहित्‍य विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता प्रो. सूरज पालीवाल समारोह का संचालन करेंगे। इस अवसर पर विश्‍वविद्यालय के संग्रहालय की वेबसाइट www.archive.hindivishwa.org , जिसकी संकल्‍पना स्‍वयं कुलपति विभूति नारायण राय ने तैयार की है, का लोकार्पण प्रो. नामवर सिंह द्वारा किया जाएगा। 




कल २ अक्टूबर सायं अज्ञेय एवं केदारनाथ अग्रवाल के साहि‍त्यिक अवदान पर दो संगोष्ठियाँ आयोजित होंगी, जिनकी अध्‍यक्षता क्रमश: प्रो.गंगा प्रसाद विमल एवं प्रो. नित्‍यानन्‍द तिवारी करेंगे तथा प्रो. शंभुनाथ एवं प्रो. खगेन्‍द्र ठाकुर मुख्‍य वक्‍ता होंगे। इन संगोष्ठियों में वक्‍ताओं के रूप में अखिलेश, धीरेन्द्र अस्थाना,  प्रो. बलराम तिवारी, राजकिशोर,  प्रो. अजय तिवारी,  बोधिसत्‍व,  विमल कुमार,  डॉ. कृपाशंकर चौबे,  डॉ. रति सक्‍सेना,  डॉ. कविता वाचक्नवी, डॉ. मीता शर्मा,  विजय शर्मा, डॉ. कृपाशंकर चौबे, वसंत त्रिपाठी, नरेन्‍द्र पुण्‍डरीक,  डॉ. वीणा दाढे, मनोज कुमार पाण्‍डेय तथा  शशिभूषण  भागीदारी करेंगे।
इन सत्रों का संचालन डॉ. शंभु गुप्‍त तथा प्रो. संतोष भदौरिया करेंगे। 






03 अक्‍टूबर को आयोजित तीन सत्रों में नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह तथा फैज़ अहमद फैज़ के कृतित्‍व एवं शताब्‍दीपरक महत्‍व पर अलग-अलग चर्चा होगी।


प्रात: 10 बजे नागार्जुन पर एकाग्र संगोष्‍ठी की अध्‍यक्षता प्रो. खगेन्द्र ठाकुर  करेंगे तथा प्रो. विजेन्‍द्र नारायण सिंह मुख्‍य वक्‍ता होंगे। प्रो. गोपेश्‍वर सिंह,  डॉ. नीरज सिंह, डॉ. राम आह्लाद चौधरी, प्रो.के.के. सिंह तथा अवधेश मिश्र वक्‍ता के रूप में अपने विचार रखेंगे। इस सत्र का संचालन प्रो.कृष्‍ण कुमार सिंह करेंगे। अपराह्न 12 बजे प्रारंभ होने वाले सत्र में शमशेर की रचना पर विमर्श होगा जिसकी अध्‍यक्षता अरूण कमल करेंगे। प्रो. रंजना अरगडे मुख्‍य वक्‍ता होंगी। उषा किरण खान, प्रो. माधव सोनटक्‍के, दिनेश कुमार शुक्‍ल, डॉ.विनोद तिवारी  डॉ. मीनाक्षी जोशी, वक्‍ता के रूप में उपस्थित रहेंगे।

 इस सत्र का संचालन राकेश मिश्र करेंगे।


अपराह्न 3 बजे फैज़ अहमद फैज़ पर केंद्रित सत्र का आगाज़ होगा जिसकी अध्‍यक्षता कवि आलोक धन्‍वा करेंगे। मुख्‍य वक्‍ता अली जावेद होंगे। दिनेश कुशवाह तथा कुछ अन्‍य साहित्‍यकार वक्‍ता होंगे। विश्‍वविद्यालय के विशेष कर्तव्‍या‍धिकारी राकेश सत्र का संचालन करेंगे।




२ अक्टूबर सायं  गांधी जयंती के अवसर पर आयोजित शताब्‍दी श्रृंखला के दौरान सांस्‍कृतिक संध्‍या कार्यक्रम में आमं‍त्रित कवियों का कविता पाठ तथा नागार्जुन की कविताओं पर बसंत त्रिपाठी के निर्देशन में नागपुर के कलाकार अपनी नाट्य प्रस्‍तुति देंगे। 


१३ अप्रैल बैसाखी १९१९ को जलियाँवाला बाग के इस प्रांगण में






१३ अप्रैल बैसाखी १९१९ को जलियाँवाला बाग के इस प्रांगण में गोलियाँ खाकर बलिदान हुई हुतात्माओं को शत शत प्रणाम।






















गणतंत्र के अक्षुण रहने व समर्थ बनने/ बनाने हेतु











 !!भारत के सभी वीरगति पाए महानायकों व संस्कृति पुरुषों की स्मृति !!
 को



!! विनम्र प्रणाम !!





 गणतंत्र दिवस पर भारतीय गणतंत्र के अक्षुण रहने व समर्थ बनने/ बनाने  हेतु शुभकामनाएँ.


लम्बे समय बाद नेट पर बैठ कर कुछ संवाद का सुयोग हो पाया है.



वस्तुतः ३१ दिसंबर से यात्राओं और भारत- प्रवास पर हूँ. यात्राओं के इस क्रम में 11 जनवरी से 21 जनवरी तक दिल्ली ( + पानीपत व यमुनानगर) रह कर परसों हैदराबाद पहुँची हूँ,  29 जनवरी को बैंगलोर के लिए प्रस्थान करना है व पुनः 5 से 17 फरवरी दिल्ली में रहूँगी. पश्चात एक सप्ताह पुनः हैदराबाद.



 हैदराबाद में सत्यनारायण शर्मा कमल जी के सुपुत्र के निवास पर उनसे भेंट के क्षण अतीव हर्षदायक व सुखद रहे. लम्बे अरसे बाद उन से भेंट कर मन मानो खिल उठा. उनकी कर्मठता व निरंतरता श्लाघनीय है व प्रेरणाप्रद भी. वे इसी प्रकार निरंतर लेखन रत रहें व सक्रिय भी. प्रो. ऋषभ देव शर्मा जी, डॉ.राधेश्याम शुक्ला जी, द्वारका प्रसाद मायछ जी आदि स्नेही आत्मीयों से मिलना अतीव हर्षातिरेक से भरता रहा है.



अन्य भी कई गतिविधियाँ व कई मित्रों-परिचितों से ( सर्व श्री वेदप्रताप वैदिक जी, रमणिका गुप्ता जी, राजकिशोर जी, अनामिका जी, अशोक चक्रधर जी, ब्रजेन्द्र त्रिपाठी जी, प्रो. गोपेश्वर सिंह जी, सुरेश नीरव जी, सुभाष नीरव जी, सुरेश यादव जी, अविनाश वाचस्पति जी, हरेप्रकाश उपाध्याय जी, डॉ. स्मिता मिश्रा जी, कनिष्क कश्यप जी, योगेन्द्र मौदगिल जी, आदि से मेलजोल / गपशप व सार्थक प्रश्नों पर चर्चाएँ, काव्यास्वादन व कार्यशाला आदि हुईं. भारतीय भाषाओं के साहित्य में स्त्रीमुक्ति और स्त्री लेखन पर प्रतीक्षित २ पुस्तकों ( काव्य पक्ष व गद्य पक्ष) की अंतिम तैयारी के काम का आनंद लिया.



( सम्पूर्ण प्रवास पर फिर कभी, लन्दन लौट कर, समयानुसार, विस्तार से व सचित्र ) लिखूँगी. अभी जिस विशेष उद्देश्य से प्रथम अवसर व नेट मिलते ही यह सन्देश समूह पर भेज रही हूँ उसका कारण है, हैदराबाद के वयोवृद्ध व नितांत आत्मीय श्री चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद जी के विषय में आप सभी को सूचित करना. गत लगभग ६ माह से वे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझते हुए भी इंटरनेट पर अपनी उपस्थिति निरंतर पूर्ववत बनाए हुए थे. किन्तु लगभग १५-२० दिन से वे अत्यधिक रुग्ण हैं व कल तक ICU में भर्ती रहे हैं, कल उन्हें वहाँ से प्राईवेट कक्ष में स्थानांतरित कर दिया गया है. अभी लगभग ८-१० दिन वे और अस्पताल में रहेंगे. वे आँतों में अल्सर की गंभीर समस्या से लड़ रहे हैं व काफी क्षीण व दुर्बल हो चुके हैं. कल उनसे अस्पताल में भेंट करने के बाद से मन बहुत कष्ट पाता रहा है, वे वहाँ भी मुस्कुरा रहे थे. और सभी को अपना अभिवादन भी प्रेषित करने को कह रहे थे.



इस तात्कालिक नोट द्वारा मैं उनके शीघ्र स्वास्थ्य की कामना करते हुए पुनः आप सभी को गणतंत्र की शुभ कामनाएँ देती हूँ.





आत्मविश्वास और ऊपर उठाएँ








   आत्मविश्वास और ऊपर उठाएँ 


ब्रिगेडियर चितरंजन सावंत
विशिष्ट सेवा मैडल





मेरे अनेक मित्र मुझ से अक्सर पूछते हैं कि मेरे चेहरे पर मुस्कान सदैव कैसे बनी रहती है. मैं उनका उत्तर केवल एक और मीठी मुस्कान से देता हूँ. वे और भी चकित हो जाते हैं. आँखों ही आँखों में पुनः प्रश्न करते हैं - प्रभु, कुछ तो बताएँ. आत्म श्लाघा का दोष लगने के डर से मैं कुछ कह नहीं पाता. मेरे मौन को जिज्ञासु मेरा कोरा अभिमान न समझें, इस कारण कुछ स्वर स्फुटित होते हैं.

लक्ष्य क्षमता से परे न हो


मुझे पाकिस्तान का भारत के विरोध में विष वमन बिलकुल पसंद नहीं है. मैं अक्सर सोचता हूँ कि उनकी ईंट का जवाब पत्थर से दूँ. उनके ऊपर चढाई कर दूँ. लक्ष्य अच्छा है किन्तु उसे पाना मेरी क्षमता के बाहर है. यदि मैं अकेले ही वाघा सीमा की ओरे चल दूँ तो पहले तो अपने देश की पुलिस ही मुझे एक सिरफिरा समझ कर पकड़ लेगी. यदि उनसे बचते -बचाते सीमा पार कर लूँ तो पाकिस्तानी पुलिस पकड़ लेगी. मेरा लक्ष्य एक तरफ धरा रह जाएगा और दूसरी तरफ उनकी गालियाँ सुनने और लात-घूँसा खाने को मिलेगा. पुलिस तो सीमा के आर पार एक सामान है - क्रूर, असभ्य तथा विवेक शून्य. इस लिए मैं अपने को ही दोष दूँगा कि मैंने ऐसा लक्ष्य क्यों चुना जो केवल बुद्धिहीन ही चुन सकते थे. नित्य दो बार संध्या करते समय - "धियो यो नः प्रचोदयात" कहने से क्या लाभ?
यह हवा की चक्की के ऊपर भाले से आक्रमण करना हुआ जो विवेकी मनुष्य नहीं करते. इस काम से मेरा मनोबल नीचे गिरा और हताशा ने आ घेरा.


हताशा और निराशा ऐसे दो राक्षस हैं जिनका हनन करने के लिए राम बाण की आवश्यकता पड़ती है. ये दोनों जुड़वाँ भाई हैं. साथ-साथ रहते हैं और यदि कभी अलग हुए तो आस-पास ही मंडराते रहते हैं. इन्हें भगाना लोहे के चने चबाने सामान है. यह एक अलग प्रश्न है जिस पर और कभी विस्तार से चर्चा होगी . अभी तो हमें केवल इतना सोचना चाहिए कि हम ऐसा उल्टा-सीधा लक्ष्य न चुन लें जो सर दर्द बन जाए .


अपने सामर्थ्य के अनुसार लक्ष्य चुन कर उसे पाने के लिए प्रयास करें. यदि ज्ञान पाने की बात है तो पुस्तकालय जा कर मौलिक पुस्तके पढ़ कर जानकारी लें. यदि शारीरिक काम है तो अपने शारीर को हृष्ट-पुष्ट बनायें जिससे निर्धारित काम को पूरा करने में सफलता अवश्य मिले. हमारा प्रयास यह होना चाहिए की हमें कभी असफलता मिले ही नहीं. यदि मिले, तो हम पुनः प्रयास करके असफलता को सफलता में बदल दें.


एक सफल व्यक्ति के लिए सतत रूप से प्रयास करते रहना अनिवार्य है. प्रश्न यह उठता है कि प्रयास के बावजूद हम कभी कभी असफल हो जाते हैं तो क्या अपने भाग्य को दोष दें? बिलकुल नहीं. "देव देव आलसी पुकारा " और एक विवेकी एवं सफल मानव कभी आलसी नहीं हो सकता है. असफलता का कारण प्रयास में कमी हो सकता है.

असफलता की समीक्षा करते समय यह देखना आवश्यक है कि न्यूनता कहाँ रह गयी. अगले प्रयास में उसे दूर
करके सफलता प्राप्त करें. महाराणा प्रताप कई बार युद्घ हार गए किन्तु निराश नहीं हुए. दानवीर भामाशाह द्वारा दिए गए धन से पुनः सेना संगठित की और मुग़ल किले पर धावा बोल दिया. सभी दुर्ग वापस जीत लिए, केवल चित्तौड़गढ़ नहीं ले सके.

परिवार समर्थन


जीवन में सफलता पाने के लिए हमें परिवार और मित्रों का समर्थन भी प्राप्त करना चाहिए. जीवन में कोई सम्बन्ध एकतरफा नहीं होता. यदि हम सगे-सम्बन्धियों के लिए कुछ करते रहे तो वे भी हमारे लिए कुछ अवश्य करेंगे. - पति-पत्नी के प्रेम सम्बन्ध प्रगाढ़ होने के बावजूद, सांसारिक आराम और सुख-सुविधा के लिए पति और पत्नी को एक दूसरे के लिए नित्य काम करना चाहिए. इस से प्रेम प्रगाढ़ होगा और पति-पत्नी के बीच "वो" कभी भी नहीं आ सकेगा. द्वार पर दस्तक भी नहीं दे सकेगा. इस से हम निश्चिंत हो कर अपना काम कर सकेंगे और सफलता के सहारे अपना मनोबल और अपना आत्मा-विश्वास आकाश की ऊँचाइयों तक पहुँचा सकेंगे . छोटी-मोटी सफलता भी आत्म विश्वास बढ़ने के मार्ग पर एक मील का पत्थर है. हर सफलता एक सोपान है जो हमें आत्मविश्वास को ऊँचाई तक ले जाने में सहायता करती है.


आत्म विश्वास ऊँचा उठाने में तन-मन-आत्मा; इन सभी का योगदान रहता है, स्वस्थ तन में स्वस्थ मन और स्वस्थ आत्मा तथा सशक्त सोच. जब आप अच्छी तरह सोच कर योजना बनाएँगे तो सफलता आप के हाथ चूमेंगी. मार्ग में बाधाएँ  आएँगी, उन्हें पार करते रहे. यदि कहीं गिर पड़ते हैं तो फिर से उठिए और अपने मार्ग पर चलते रहिये. छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुग़लों की ताक़त को तलवारों पर तोला था और हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना की थी, एक बार मुग़ल बादशाह के बंदी भी बने. निराश नहीं हुए. मुक्ति-मार्ग की खोज करते रहे. अंततः उन्हें और उनके पुत्र संभाजी को मुक्ति मिली. आगरा से वापस महाराष्ट्र लौट कर छत्रपति शिवाजी महाराज ने पुनः अपना राज्य मुग़ल सेनापति से वापस जीत लिया. यह छत्रपति के ऊँचे आत्म विश्वास के कारण ही संभव हो सका, स्वामी दयानंद सरस्वती ने जब पहली बार कुम्भ मेले में वेद प्रचार आरम्भ किया तो सुन ने वालों की संख्या नहीं के बराबर थी. वे निराश नहीं हुए. स्वाध्याय किया, प्रवचन शैली में सुधार लाये और सरल हिंदी में प्रचार कार्य किया . महती सफलता मिली. आर्य समाज की स्थापना मुंबई में १८७५ में हुयी. फिर उन्हें मुड़ कर नहीं देखना पड़ा.



अंत में यह याद रखिये की विषम परिस्थिति में ईश्वर को याद करें. जैसा पहले अन्य लेखों में मैंने कहा है, आप और हम सदैव प्रार्थना एवं पुरुषार्थ का संगम करें. दोनों हमारे साथ हैं तो हमारे यज्ञ में राक्षस नहीं आएँगे. यदि राक्षस आ भी गए तो हमारे यज्ञ का विध्वंस नहीं कर पाएँगे. प्रार्थना और पुरुषार्थ से मिली शक्ति हमारे शस्त्रागार का ब्रह्मास्त्र है जो न केवल राक्षस को अपितु राक्षसी प्रभाव को भस्म कर देगी. फिर हमारा आत्म विश्वास आकाश को छूने लगेगा. तमस को, अन्धकार को हम अपने आत्म विश्वास से भेद कर प्रकाश का संचार कर सकेंगे और कहेंगे - तमसो मा ज्योतिर्गमय  










यह खुला पत्र सिद्धार्थ के लिए



इक खुला पत्र : सिद्धार्थ के नाम



प्रिय सिद्धार्थ!

तुमने आसपास के परिवेश व परिस्थितियों की सामान्य घटनाओं में से विचारणीय बिन्दु तलाश कर उन्हें विमर्श हेतु लाने का प्रयास जो प्रारम्भ किया है, वह श्लाघनीय है. जनमानस के भीतर बसी मध्ययुगीन परम्पराओं को लोग आदिकाल से चली आई, सनातन, वैदिक, धार्मिक और जाने क्या क्या माने ढोए चले जाते/जा रहे हैं। धर्मभीरु जनता का ९९.९५ प्रतिशत यह भी यह भी नहीं जानता कि धर्म होता क्या है, उसका स्वरूप क्या है। न वह यह जानता है कि धर्म का पूजा पद्धति से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे मे रेगिस्तान में उगे अरण्डी के पौधे ही सबसे बड़े पेड़ होने का दावा मनवाते रहते हैं। जिन्हें एक भी बात भूले -भटके कोई सीधी-सच्ची कह दे तो उसकी तो मानो शामत ही हो गई। हाथ जोड़कर, क्षमापूर्वक सत्य कहने वाले तक को भी लोग बहुधा तो शत्रु बनकर लतियाते हैं, या फिर कुछेक सच बोलने का सहूर सिखाते हैं।



उधर अधजल गगरी लिए छलक-छलक पड़ने वाले अपनी दुकान को दूना-चौगुना करने की वितण्डा इस सारे आत्मानुशासनविरत समाज पर फैलाते रहे हैं, कभी धर्म के ठेकेदार और पहरुए बनकर या कभी स्त्री-पुरुष/ ये जाति-वो जाति/ यह भाषा-वह भाषा/ यह क्षेत्र-वह क्षेत्र/ आदि आदि के द्वन्द्व को एजेण्डा बनाकर लोकप्रियता, गु्रुडम (नेतागिरी) की रोटियाँ सेंकते हैं। इसमें महाभारत काल (लगभग ५००० वर्ष) से प्रमाद व पतन के मारे भारत के जन को ह्रासमान ही होते चले जाने से तब कौन रोक सकता है? इसमें स्त्रियाँ, आबाल-वृद्ध सब दारुण दशा में हैं। धन बल, देहबल, सत्ताबल आदि जिसके पास हैं, सब अधिकार भी उसी के ,सब निर्णय भी। वैसे, यहाँ परिवर्तन वस्तुत: चाहता ही कौन है? कोई नहीं। परिवर्तन होते हैं विचार व कर्म की क्रान्ति से। और क्रान्ति का अर्थ है अपने को आमूलचूल बदलना (न कि बाह्य युद्ध)। जब कोई स्त्री-पुरुष अपने को आत्मानुशासी के रूप में ढालने को, परिवर्तित करने को तैयार ही नहीं तो समाज को बदलने की कल्पना उन ठेकेदारों की जेब में अन्तिम साँसे ले कर दम तोड़गी ही।



बात लम्बी हो गई। तुम्हारी सद्भावना इन अर्थों में भी नेक है कि स्वयं को झंडाबदार बताए बिना स्त्री को (उसके सामान्य मानवी होने के अधिकार तक को छद्म व प्रपंच से घेरे आई धूर्त मानसिकता से बचाने की इच्छा के चलते) मानवीय दृष्टि से देखने का उपक्रम किया।



अजब संयोग यह है कि कल ही मैंने अपनी फ़ेसबुक प्रोफ़ाईल पर स्टेटस मैसेज के रूप में एक ऐसा ही सन्देश लिखा (जिस पर वहाँ कुछ मित्रों ने अपनी राय भी दी)। जो मैंने कल वहाँ लिखा, उसका अविकल पाठ यह है -

"ध्यातव्य है कि भारतीय भाषासमाज में सबके सब आशीर्वाद, दिए भले स्त्री को जाएँ, किन्तु लगते/होते पुरुष के लिए हैं और सबकी सब गालियाँ, दी भले जा रही हों पुरुष को, किन्तु लगती/होतीं सब स्त्री के लिए हैं। यह है हमारी सोशियो-साइकॉलॉजी, हमारे समाज का असली चरित्र और इस समाज में स्त्री होने व पुरुष होने का अन्तर।"


Hari Joshi
Hari Joshi
कविता जी, ये ऐसा सच है जिसे सब जानते हैं। सनातन है। ...शायद कभी इसमें परिवर्तन आए। स्त्री और पुरुष जिंदगी के रथ के दो पहिए हैं जिनमें से एक भी निकल जाए तो जीवनरथ चल नहीं सकता लेकिन फिर भी हर नियम/परंपरा स्त्री पर ही हमला करता है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष।



Nutan Gairola
Nutan Gairola
Aadi kaal se, samaaj kee sanrachna isee tarah se hoti aayi hai, Purush Pradhaan , sakti.. Sab purush dimaag se chala hai. . Bhojan , sringaar, shiksha , vicharo ke aur kaun sa chetr nahi jaha mahila purus aik jaise rahe ho. Sabi jagah. . .nari ko devi roop de kar us se opekhsha kee gai jyada. . . Kavita jee kee baat se mai sehmat hoon. . .Haan aaj ... Read Moreka purus vaise in sab baato ko samajh raha hai, par vo in sadiyo se chali aa rahi vyavastha ko aik jhatke mai tod nahi tor sakta hai. . Hame intjaar karna hoga. .


Pratibimba Barthwal
Pratibimba Barthwal
आज सुबह ही रिया जी ने "मेरे अपने"मे यही च्रचा शुरु की है। ,इस पर थोडा सुबह लिखा था, अभी इतना कहना चाहूंगा कि "घर" को बनाने मे महिला का योगदान उसकी प्रक्रति मे शामिल है. पुरुष और महिलाओ की प्रकृति भी जिम्मेदार है॥आप इसे पुरुष प्रधान कहे लेकिन ये भी सच है कि आज इसमे परिवर्तन आया है दोनो ही इसे समझ रहे है-कुछ महिलाओ ने इसे खुद ही अंजाम दिया या फिर पुरुष वर्ग ने इसमे सह्योग दिया......


Pratibimba Barthwal



Ashok Kumar
Ashok Kumar
Yah sach hai ki stree aur purush ke beech jo bhinnta hai usse samajh ne hamesha hee alag tareeke se paribhasit kiya aur ussiee wajah se kabhee stree ko toh kabhee purush ko jyada mahatva mila.Agar hum yah maan le ki samaj ko dono ki utanee hee jaroorat hai jitani ek bhasha ko shabdo ki jaroorat hotee hai toh shayed yah samasya hee samapt ho jaye.....



Parul Yadav
Parul Yadav
mam bilkul sahi kaha, aaj b desh k sabse badi post per mahilaye hai fir b aaj k samaj me aurto ki condition me change nahi hua hai. aaj tak sansad me 50% ka bill tak pass nahi ho paya hai, uske bad k kamo ka bill pass ho gaya bt ye nahi........ humko khud jagna hoga.




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