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"हिन्दी सीखो और प्रांतीयता का त्याग करो" : बंगालियों को सुभाष चन्द्र बोस की सलाह

 "हिन्दी सीखो और प्रांतीयता का त्याग करो"
बंगालियों को सुभाष चन्द्र बोस की सलाह 





8 जुलाई 1939 के "हिंदुस्तान" समाचार पत्र में बाबू सुभाष चन्द्र बोस के विषय में एक समाचार छपा था जिसमें अन्य कई विषयों सहित सुभाष बाबू ने जबलपुर के बाङ्ला समाज को हिन्दी सीखने व प्रांतीयता का त्याग करने की सलाह दी।

आज सुभाष बाबू के जन्मदिवस (23 जनवरी) पर, अमर सेनानी को प्रणाम सहित, प्रस्तुत है उस ऐतिहासिक समाचार की रिपोर्ट - 







आदिवासी विमर्श पर खोजपूर्ण सामग्री


पुस्तक-चर्चा 






आदिवासी विमर्श पर खोजपूर्ण सामग्री : 
‘संकल्य’ का 
जनजातीय भाषा, साहित्य और संस्कृति विशेषांक

-  गुर्रमकोंडा नीरजा




भारत का समाज संभवतः दुनिया के सबसे पुराने समाजों में से एक है. यहाँ समय पर अनेक सभ्यताएँ आईं और धीरे धीरे यह देश एक संगम समाज के रूप में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक जाने कितने परिवर्तन लंबी यात्रा के दौरान घटित हुए होंगे. इतने बड़े देश में कोई भी ऐसा परिवर्तन संभव नहीं जो इसके हर कोने अँतरे को आमूल चूल बदल डाले. इस महादेश में व्यापक से व्यापक परिवर्तन में भी कुछ-न-कुछ अन-छुआ, अन-पलटा रह जाना स्वाभाविक है. और जो इस तरह अन-छुआ, अन-पलटा रह जाता है वह विकास की दौड़ में, सभ्यता के सफर में पीछे छूट जाता है. समाज के इस तरह पीछे छूटे हुए समुदाय आज की भूमंडलीय दुनिया में कहीं खो न जाए इसीलिए अनकी पहचान करना, उनकी समस्याओं से रू-ब-रू होना, उनकी सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करना और विकास के लाभ उन तक पहुँचना किसी भी चेतनाशील साहित्यकार के सरोकारों में शामिल होना चाहिए. 

महारानी झाँसी के चित्र से छेड़छाड़ : पत्रकारिता की शर्म





आज १७ जून को महारानी लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस पर विशेष


झाँसी की रानी के नकली चित्र का प्रचार  




आजकल झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के असली चित्र के नाम पर नेट पर एक अजीबोगरीब चित्र का प्रचार प्रसार किया जा रहा है | यह चित्र प्रथम दृष्टि से देखते ही उक्त महिला के झाँसी की रानी न होने की पुष्टि करता है | थोड़ी भी समझबूझ वाला व्यक्ति जो इतिहास, तत्संबंधी पहरावे, चित्र और चरित्र का तादात्म्य आदि  ..... जैसी कुछ मौलिक बातों की सूझ रखता होगा वह बिना एक भी क्षण गँवाए पहचान जाएगा कि महारानी  झाँसी का वास्तविक चित्र वह हो ही नहीं सकता |  

खबरों के आगे खिंचता नेपथ्य



खबरों के आगे खिंचता नेपथ्य
-प्रभु जोशी




दुनिया भर में, ‘विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र‘ की तरह ख्यात भारत ने, जब एक ‘नव-स्वतंत्र राष्ट्र‘ की तरह, विश्व-‘राजनीति में जन्म लिया, तब निश्चय ही न केवल ‘पराजित‘ बल्कि, लगभग हकाल कर बाहर कर दी गयी ‘औपनिवेशिक-सत्ता‘ के कर्णधारों की आँखें, इसकी ‘असफलता‘ को देखने के लिए बहुत आतुर थीं। चर्चिल की बौखलाहटों को व्यक्त करती हुई, तब की कई उक्तियाँ इतिहास के सफों पर आज भी दर्ज हैं। अलबत्ता, उनकी ‘अपशगुनी उम्मीदों‘ के बार-खिलाफ, जब-जब इस ‘महादेश‘ में संसदीय चुनाव हुए, तब-तब इस बात की पुष्टि काफी दृढ़ता के साथ हुई कि बावजूद ‘सदियों की पराधीनता‘ के, भारतीय-जनमानस में एक अदम्य ‘लोकतांत्रिक-आस्था‘ है, जो केवल उसके सोच भर में स्पंदित नहीं है, बल्कि, उसकी तमाम संस्थाओं में, वह लगभग ‘दहाड़ती‘ हुई उपस्थित है। कहने की जरूरत नहीं कि उसके ‘चौथे खंभे‘ में तो ‘नृसिंह‘ की-सी शक्ति है, जो सत्ता के पेट को चीर सकती है। आपातकाल में तो उसने यह पूरी शिद्दत से प्रमाणित कर दिया था कि न केवल ‘लिख कर‘ बल्कि इसके विपरीत ‘न लिखकर‘ भी वह अपनी आवाज को इस तरह बुलन्द कर सकती है, जो हजारों-हजार लिखे गए लफ्जों से कहीं ज्यादा प्रखर प्रतिरोध का रूप रख सकती है। सम्पादकीय की जगह खाली छोड़ने से ‘मौन की तीखी अनुगूँज‘ राष्ट्रव्यापी बन गयी थी।





बहरहाल, इन्दौर नगर में पिछले सप्ताह ‘गाँधी-प्रतिमा स्थल‘ पर कतिपय बुद्धिजीवियों ने देश भर के कोई बीस-बाईस हिन्दी समाचार पत्रों की एक-एक प्रति जुटाकर, तमाम अखबारों के द्वारा ‘अकारण‘ ही तेजी से किये जा रहे हिन्दी के हिंग्लिशीकरण बनाम ‘क्रिओलीकरण’ के जरिए, जिस ‘बखड़ैली भाषा‘ को जन्म देने में लगे है, उसके प्रति हिन्दी भाषाभाषी पाठकों की पीड़ा और प्रतिकार को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए, उनकी होली जलायी। निश्चय ही प्रतिकार की इस ‘प्रतीकात्मकता‘ से जो लोग असहमत थे, वे इसमें शामिल नहीं हुए। उनके पास अपने तर्क और अपनी स्पष्ट मान्यताएँ थीं, जबकि अखबारों की ‘होली‘ जलाने वालों के पास अपनी सिद्धान्तिकी थी। दोनों के पक्ष-विपक्ष में एक गंभीर विमर्श भी बन सकता था। 





बहरहाल, घटना छोटी-सी और निर्विघ्न सी थी, लेकिन भारतीय पत्रकारिता के विगत तिरेसठ साल के इतिहास में पहली बार घट रही थी। लेकिन देश के किसी भी हिन्दी अखबार ने (नईदुनिया को छोड़कर। हालांकि, जनसत्ता ने खबर तो नहीं, लेकिन, राजकिशोर के लेख में इस खबर को यथावत और विस्तार से दिया है।) यह खबर प्रकाशित नहीं की। इण्टरनेट के ब्लागों और ‘फेस बुक‘ पर अवश्य इस पर बहस के लिए अवकाश (स्पेस) निकला, लेकिन, आरंभ में उसका रूप जिस तरह की गंभीरता लिए हुए शुरू हुआ था, दूसरे दिन वह ‘भर्त्सना‘ और ‘भड़ास‘ की शक्ल अख्तियार कर चुका था। उसमें मनोरंजन और मसखरी भी शामिल हो चुकी थी। अतः पूरी बात विचार के दायरे से ही लगभग बाहर हो गयी। यहाँ यह बात गौर करने लायक है कि कदाचित् सम्पूर्ण हिन्दी समाचार-पत्रों ने, इस कार्यवाही को अपनी सत्ता के प्रति एक ‘बदअखलाक चुनौती‘ की तरह लिया है। हो सकता है समाचार-पत्रों ने, चूंकि वे समय और समाज में विचार के लिए वाजिब जगह बनाने की जिम्मेदारी अपने ही हिस्से में समझते हैं, अतः वे इस कार्यवाही के खिलाफ निस्संदेह ठोस बौद्धिक-असहमति रखते हैं। लेकिन प्रश्न उठता है कि जो समाचार पत्र, वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन, ’समय और समाज’ की खाल खींच कर उसमें नैतिकता का नमक डालने पर तत्पर रहता है, क्या वह तिरेसठ वर्ष के अपने जीवनकाल में मात्र एक दिन किसी एक शहर में अपने पाठक की असहमति और उसका प्रतीकात्मक प्रदर्शन तक बरदाश्त नहीं कर सकता? जबकि, वह इस महाकाय जनतंत्र की रक्षा का एक सर्वाधिक शक्तिशाली कवच है? क्या समूचा समाचार-जगत ’विचार’ के स्तर पर, व्यक्ति की सी स्वभावगत ’एकरूपता’ रखता है ? जबकि, वह व्यक्ति नहीं संस्था है। मुझे यहाँ याद आता है कि नेहरू के विषय में कहा जाता रहा है कि उनका अहम् काफी अदम्य था और वे अमूमन अपनी असहमति की अवमानना पर तिक्त हो जाते थे। एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है। ’टाइम्स आॅफ इण्डिया’ के तब के ख्यात सम्पादक मुलगांवकर प्रधानमंत्री आवास पर स्वल्पाहार हेतु आमंत्रित थे और जिस सुबह वे आमंत्रित थे, ठीक उसी दिन उन्होंने नेहरू तथा ’नेहरू-सरकार’ के विरूद्ध अपने अखबार में बहुत तीखी सम्पादकीय टिप्पणी छाप दी। लगभग आठ बजे प्रधानमंत्री-आवास से दूरभाष पर सूचना दी गयी कि किन्हीं अपरिहार्य कारणों से पूर्व में स्वल्पाहार के समय प्रधानमंत्री के साथ निर्धारित भेंट निरस्त की जा रही है। यह सूचना पाते ही श्री मुलगांवकर ने नेहरू को फोन किया कि ठीक है कि आज का सम्पादकीय आपके तथा आपकी सरकार के खिलाफ है, लेकिन इसका हमारे नाश्ते से क्या लेना-देना है ? 





बहरहाल, नेहरू ऐसे थे कि सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर रहते हुए भी ठिठक कर बुद्धिजीवियों द्वारा की गई अपनी आलोचना सुन सकते थे। कदाचित् उनके इसी जनतांत्रिक धैर्य को ध्यान में रखकर दुनिया भर की प्रेस उन्हें ’डेमोक्रेटिक प्राॅफेट’ के विशेषण से सम्बोधित भी करती थी।



बहरहाल, इन्दौर नगर में भारतीय समाचार पत्रों को उनकी भाषागत नीति को केन्द्र में रखकर उसके प्रतिरोध में होली जलाने वाली कार्यवाही को लेकर इतना आहत और क्रोधित नहीं होना चाहिए कि उनके द्वारा अकारण किये जा रहे क्रिओलीकरण के खिलाफ शुद्ध गाँधीवादी प्रतिकार की खबर को वे अपने पृष्ठों पर तिल भर भी जगह न दें। यह काम निश्चय ही सम्पादक का नहीं हो सकता। तो क्या हमारे समाचार-पत्रों में एक किस्म की ‘काॅरपोरेट सेंसरशिप‘ अघोषित रूप से आरंभ है ? जबकि, ठीक उसी दिन ‘दैनिक भास्कर‘ ने क्रिओलीकरण के विरूद्ध लिखी गयी मेरी तीखी टिप्पणी ससम्मान और प्रमुखता से छापी और ‘नईदुनिया‘ ने इसके दो दिन पूर्व ही ‘भाषा के खिलाफ हो रही साजिश को समझो‘ शीर्षक से हिन्दी के ‘क्रिओलीकरण‘ के खतरे की तरफ पाठकों नहीं, सम्पूर्ण हिन्दी भाषा-भाषियों को सचेत करने वाली उस टिप्पणी को एक ऐसी सम्पादकीय टीप के साथ प्रकाशित किया, जो ‘जन-आह्वान‘ के स्वर में थी। यह तथ्य दोनों ही अखबारों के ‘खुलेपन‘ और ‘जनतांत्रिक उदारता‘ के स्पष्ट प्रमाण हैं। तो अब प्रश्न यह उठता है कि क्या उनकी यह ‘उदारता‘ इतनी ज्वलनशील है कि प्रदर्शन की आँच की खबर से भस्म हो सकती है ? हाँ, राजनीतिक सत्ताएँ ‘विचार‘ को खतरा मानती हैं और उससे डरती भी हैं, लेकिन अखबर की ताकत तो ‘विचार‘ ही है। ‘विचार‘ तो उसके लगभग प्राण हैं ? फिर चाहे वे ‘सहमति‘ के रूप में हों, या ‘असहमति‘ के रूप में। मैं मानता हूँ कि आज हमारा समाज जितना ‘सूचना-सम्पन्न‘ हुआ है, उसके पीछे प्रमुख रूप से ‘लिखे-छपे शब्द‘ की बहुत बड़ी भूमिका है, ‘बोले गये‘ शब्द वाले माध्यम की तो प्राथमिकताएँ और प्रतिबद्धताएँ केवल मनोरंजन ही है। अतः मुझे उस माध्यम से कुछ नहीं कहना। वह अभी तक परिपक्व ही नहीं हो पाया है। अधिकांश का ‘समाचार-विवेक‘ तो साध्यकालीनों की सनसनी के समांतर ही है। वे ‘सचाई‘ के साथ फ्लर्ट (!) करते हैं। उनका ‘रिमोट‘ सच के किसी दूसरे ‘सनसनाते संस्करण‘ को बदलने का उपकरण है। लेकिन सुबह के दैनिक अखबार यह मानते हैं कि वह मालिकों का कम पाठकों का ज्यादा है। इसीलिए, यदि पाठकों का एक छोटा-समूह ‘संवादपरक प्रतिरोध‘ की संभावना के पूरी तरह निशेष हो जाने के बाद, यदि निहायत ही गाँधीवादी तरीके से अपना विरोध होली जलाकर प्रकट कर रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि समाचार-पत्रों में हो रही आयी उसकी आस्था का पूर्णतः से लोप हो गया है। गाँधीजी ने, जब विदेशी वस्त्रों की होली जलायी थी तो वे ‘वस्त्रोत्पादन‘ के विरूद्ध कतई नहीं थे। ना ही वस्त्र धारण करने के काम से उनकी आस्था उठ गयी थी। वे तो प्रतीकात्मक रूप से एक अचूक सूचना दे रहे थे कि हमें ‘औपनिवेशिक विचार‘ का विरोध करना है, जो वस्तुओं में शामिल है।





अंत में इन दिनों जिस ‘शक्ति-त्रयी‘ की बात की जा रही है, उसमें ‘सूचना‘ भी राज्य सत्ता के समानान्तर मानी जा रही है। ‘सूचना‘ का निर्माण और वितरण करने वाली दुनिया की चार पाँच संस्थाओं को ‘सत्ता‘ का सर्वोपरि रूप माना जा रहा है, क्योंकि वे ही ‘विश्वमत‘ गढ़ती या बनाती हैं। उनमें किसी भी मुल्क या उसकी सरकार को ध्वस्त करने की भी अथाह कुव्वत है, लेकिन वे अपने मुल्क के ‘प्रतिरोध की आवाजों‘ की अनसुनी नहीं करती वर्ना, नोम चाॅमस्की जैसे लोगों के विचारों की आहटें शेष संसार को सुनाई ही नहीं देती।




मुझे ब्रिटिश प्रधानमंत्री चेम्बर लेन के आक्सफर्ड विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में दिये गये उनके भाषण की याद आती है। उन्होंने कहा था, ‘आक्सफर्ड‘ ने हमें जब जब जैसा-जैसा करने को कहा हमने हमेशा ही ठीक वैसा-वैसा किया; लेकिन जब आक्सफर्ड को हमने अपने जैसा करने को कहा, उसने वैसा कभी नहीं किया और एक ब्रिटिशर की तरह मुझे इन दोनों बातों पर अपार गर्व है।




कुल मिलाकर चेम्बरलेन ने यही कहना चाहा हम ब्रिटिशर्स विचार के स्तर पर इतने उदार हैं हम अपनी प्रखरतम आलोचना का सम्मान करते हैं, लेकिन, हमें अपने मुल्क की बुद्धिजीवी बिरादरी पर भी गर्व है, जो असहमतियों को व्यक्त करने में भीरू नहीं है। किसी भी देश और समाज में भीरूता का वर्चस्व बौद्धिकों में व्याप्त होने लगे, तब शायद यह मान लेना चाहिए कि वह फिर से पराधीन होने के लिए तैयार हैं।




अंत में कुल जमा मकसद यही है कि लोहिया की विचारधारा में गहन आस्था रखने वाले श्री अनिल त्रिवेदी, तपन भट्टाचार्य और जीवनसिंह ठाकुर ने भारतीय भाषाओं के आमतौर पर तथा हिन्दी के क्रिओलीकरण (हिंग्लिशीकरण) को लेकर खासतौर पर एक शांत और नितान्त निर्विघ्न प्रदर्शन किया तो वस्तुतः वे निश्चय ही इसके दूरगामी खतरों की तरफ पूरे देश और समाज को चेतस करना चाहते हैं। वे ठीक ही कह रहे हैं ‘भाषा का प्रश्न‘ महज भाषा भर का नहीं होता, वह समूचे समाज को सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था का भी अनिवार्य अंग होता है। क्या हमें यह नहीं दिखाई दे रहा कि अमेरिका और ब्रिटेन ‘ज्ञान समाज‘ के नाम पर, मात्र अपने सांस्कृतिक उद्योग की जड़ें गहरी करने में लगे हैं। ‘कल्चरल इकोनॉमी‘ उनकी अर्थव्यवस्था का तीसरा घटक है, जो अँग्रेजी सीखने-सिखाने के नाम पर अरबों डाॅलर की पूंजी कमाना चाहते हैं। हिन्दी, यदि संसार की दूसरी सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा की चुनौतीपूर्ण सीमा लांघने को है, तब उसे एक धीमी मौत मारने के लिए उसका क्रिओलीकरण क्यों किया जा रहा है ? अभी षड्यंत्र की यह पहली अवस्था है, ‘स्मूथ डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि‘। अर्थात हिन्दी के शब्दों का चुपचाप अँग्रेजी के शब्दों द्वारा विस्थापन इसे सर्वग्रासी हो जाने दिया गया तो अंत में आखिरी प्रहार की अवस्था आ जाएगी और वह होगा, देवनागरी लिपि को बदलकर उसके स्थान पर रोमनलिपि को चला देना। यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि 5 जुलाई 1928 को ‘यंग इंडिया‘ में जब गाँधीजी ने लिखा कि ’अँग्रेजी साम्राज्यवादी भाषा है और इसे हम हटा कर रहेंगे’, तब गोरी हुकूमत अँग्रेजी के प्रसार प्रचार पर छः हजार पाऊण्ड खर्च करती थी (तब भी यह राशि बहुत ज्यादा थी)। गाँधीजी की इस घोषणा को सुनते ही उन्होंने लगे हाथ अँग्रेजी के प्रचार-प्रसार का बजट बढ़ा दिया। 1938 में बजट की राशि थी तीन लाख छियासी हजार पाऊण्ड। यदि अखबारों की होली जलाकर प्रकट किये गये इस विरोध के बाद हिन्दी के समाचार पत्रों मे भाषा के ‘क्रिओलीकरण‘ की गति तेज हो जाये तो यह स्पष्ट सूचना जायेगी कि भाषा संबंधी नीतियों के पीछे अँग्रेजी की ‘नवसाम्राज्यवादी‘ शक्तियाँ दृढ़ता के साथ काम कर रही हैं। 


4, संवाद नगर
इन्दौर



"हमारे साहित्य समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है"

"हमारे साहित्य समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है"
      अज्ञेय पर एकाग्र

- डॉ. कविता वाचक्नवी


 



महात्मा गाँधी  अंतरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि. में  २ व ३ अक्टूबर २०१०  को आयोजित संगोष्ठी (बीसवीं सदी का अर्थ और जन्मशती का सन्दर्भ )  के उद्घाटन सत्र के पश्चात आयोजित प्रथम सत्र दोपहर ३ बजे से  "अज्ञेय पर एकाग्र" के रूप में  संपन्न हुआ. कार्यक्रम की अध्यक्षता गंगा प्रसाद विमल ने व संचालन   डॉ शम्भु गुप्त ने किया.


 
 पटना से आए प्रो. बलराम तिवारी ने अज्ञेय पर केन्द्रित अपने संबोधन में जिन तथ्यों को रेखांकित किया, वे हैं  -
 - " अज्ञेय जिस रोमांटिक प्रवृत्ति के लिए बदनाम हैं, वह वस्तुतः उन में है ही नहीं उलटे वे तो एंटी रोमांटिक प्रवृत्ति से ग्रस्त हैं.
अपनी बात की पुष्टि के लिए उन्होंने कुछ उद्धरण भी दिए

- "यथास्थिति के प्रति विद्रोह ही अज्ञेय को अमर  बनाता है"

- "हमारे समाज में भाई बहन सम्बन्ध को लेकर जो टैबूज़ हैं शेखर भी उन टैबूज़ को तोड़ नहीं पाते..यह नैतिकतामूलक ग्रंथि का ही अवबोध है"

 - "अगर शिल्प व शास्त्र पर मार्क्सवादी विचारक ध्यान देते हैं तो यह अज्ञेय की देन  है"


 
आगामी वक्ता के  रूप में  युवा कथाकार शशिभूषण ने अपने वक्तव्य में कहा कि -
 - लेखक अपने  कृतित्व  द्वारा समाज को कितना आगे ले जाने का साहस रखता है यह उस लेखक की प्रतिबद्धता से ही प्रकट होता है.

......प्रश्न यह उठता है कि अज्ञेय अपनी प्रतिबद्धता पर अंतिम समय तक स्थिर क्यों नहीं रह पाए. 

ओम् थानवी को उद्धृत करते हुए शशि ने अज्ञेय पर हर समय लगाए जाते आरोपों का उल्लेख किया व एक पुत्र के पिता होने के आरोप को भी  उद्दृत करते हुए  समाज व आलोचना की विसंगतियों पर प्रहार किए. वक्तव्य के अंत में शशि ने खरे शब्दों में कहा कि सीमाएँ अज्ञेय में हैं, परन्तु उस मार्क्सवादी आलोचना में भी तो हैं, जो अज्ञेय को देखती हैं.


 
आगामी वक्तव्य  मनोज कुमार पाण्डेय ने दिया


 
जमशेदपुर से पधारीं विजय शर्मा ने प्रारम्भ में ही यह स्पष्ट किया कि मैं अज्ञेय को सबसे महान रचनाकार के रूप में स्थापित करने के लिए नहीं खडी हूँ.

- "अज्ञेय कान्तिकारी थे, जो बहुत प्रभावित  करने वाला तथ्य था किन्तु स्वयं अज्ञेय ने इस पर बहुत चुप्पी बनाए रखी है. एक समकालीन लेखक के सद्य : प्रकाशित  लेख में उनकी क्रांतिकारिता के अनेक विस्तार जानकर अज्ञेय पर बहुत गुस्सा आया कि वे स्वय चुप क्यों रहे".



 
गाँधीवादी चिन्तक राजकिशोर ने अज्ञेय की पत्रकारिता वाले पक्ष पर अब तक हिन्दी में किसी महत्वपूर्ण कार्य के न होने पर अत्यंत खेद प्रकट किया. उन्होंने व्यंग्यपूर्ण  ढंग से चुटकी लेते हुए कहा कि हमारे साहित्य समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है. दूसरी ओर इस पर क्षोभ जताया कि हमारे पत्रकारिता क्षेत्र में काम करने वालों से स्वयं जाकर पूछ लीजिए उनमें से बहुमत अज्ञेय को जानता तक न होगा. स्थिति इतनी शोचनीय है  कि कोई अज्ञेय के पत्रकारितावंश को  आगे बढ़ाने वाला तक नहीं है.

-"अज्ञेय जी की विचारधारा में अन्तर्विरोध सदा बने रहे किन्तु ये अन्तर्विरोध विचारधारा के अभाव में नहीं थे".


 
अज्ञेय की पत्रकारिता की भाषा पर केन्द्रित अपने सम्बोधन में कृपाशंकर चौबे ने राजकिशोर के वक्तव्य के कई तथ्यों का विरोध करते हुए पत्रकारिता के कुछ स्तम्भों के उल्लेख के साथ अज्ञेय की परम्परा के जीवित रहने के प्रमाण दिए. भाषा व लिपि सम्बन्धी कई नियमों को उन्होंने क्रमवार दोहराया.


अन्तिम वक्ता के रूप में प्रो. सुरेन्द्र वर्मा की उपस्थिति ने सभा को गरिमा प्रदान की.


 
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में गंगाप्रसाद विमल ने कहा कि -
"अज्ञेय के समक्ष हिन्दी आलोचना बौनी रही,आलोचना के पास वे औजार नहीं थे जो अज्ञेय की  रचनाधर्मिता को माप सकती".
- "अज्ञेय अपने समय के सबसे विरल व प्रतिभाशाली रचनाकार थे. हिन्दी आलोचना उनके बिना आगे बढ़ ही नहीं सकती" .
- "अज्ञेय ने पश्चिम के समक्ष भारतीय मनीषा व भाषा को अत्यन्त सम्मानजनक स्थान दिलाया".


 
धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र समाप्त हुआ.

शनैः शनैः की जा रही है, जिसकी बिदाई




शनैः शनैः की जा रही है, जिसकी बिदाई
-प्रभु जोशी 






जिस चिन्ता को केन्द्र में रख कर यह लेख लिखा जा रहा है, उसकी पूर्व-पीठिका के रूप में यह थोड़ा ज़रूरी हो गया है कि हम पहले अपने समय के ‘निकट अतीत’ की तरफ, तनिक गरदन मोड़ कर देख लें, क्योंकि, हम सब जानते ही हैं कि हमारे ‘वर्तमान-समय‘ में हरदम हमारा ‘अतीत-समय’ भी मौजूद रहता है और वही हमारे ‘भविष्य के जन्म’ का जिम्मेदार भी होता है।




बहरहाल, बीसवीं सदी निश्चय ही मनुष्य की त्रासद पीड़ाओं और उसके स्वप्नों की बेछोर उड़ानों की थी, इसीलिए उसके बिदा होने के सिर्फ कुछ वर्षों पूर्व, समूचे मानव-जगत और उसके ‘भविष्य’ को प्रभावित करने वाली घटनाएँ, लगभग श्रृंखलाबद्ध ढंग से घटीं, जिनमें सबसे दुर्भाग्यशाली घटना थी, ‘विचारधारा का लोप’। उसी में उसके ‘पतन की पटकथा’ और ‘संभावनाओं का भाष्य’ मौजूद था, जो अब हमारे सामने बेलिहाज होकर आ रहा है, जबकि इक्कीसवीं सदी ने अभी अपनी उम्र के दस वर्ष भी पूरे नहीं किये हैं।





कहना न होगा कि अब सबसे बड़ी दिक्कत यही होती जा रही है कि हमारे ‘वर्तमान’ में, जिस भंगिमा के साथ ‘भविष्य’ प्रवेश करता चला जा रहा है, ‘विचारधारा के लोप’ के चलते हमारे लिए उसकी पुख्ता परख और पहचान ही काफी जटिल हो गयी है। ‘बाजार-निर्मित आशावाद’ का एक ऐसा विचित्र दुष्चक्र चल रहा है, जिसमें अब हमारा ‘सर्वस्व’ फँस चुका है। समय की ‘पारस्परिक‘संबद्धता’ दम तोड़ रही है। वह अवसान के निकट है। भूमण्डलीकरण की जन्मपत्री बनाने वालों के द्वारा लगातार यह सिद्ध किया जा रहा है कि यह युग ‘अनिश्चितताओं का है। इसलिए ’विचारधारा’ की बात फूहड़ और फिजूल है। यह ‘पैराडाइम-शिफ्ट’ है।



भूमण्डलीकरण के इस दौर में, पूँजी की ‘वक्र-गति’ से जन्मे ‘अनिश्चय’ के चलते, आज हर संस्था, व्यक्ति और अनुशासन के समक्ष एक निष्करूण संदेह खड़ा हो गया है कि कब वह किधर या कहाँ चला जायेगा, ‘निश्चित’ नहीं है। अभी-अभी जो ‘विराट’ बन कर सामने खड़ा है, वह कभी भी ‘वामन’ बन कर भीड़ में खो सकता है। उसकी तमाम शिनाख्तें यक-ब-यक गायब हो सकती हैं। अब सारे ‘यूटोपिया’, ‘डिस-टोपिया’ में बदल गये हैं। सारे ‘इज्मों’ को ‘वाज्मों’ में अवघटित कर दिया गया है। ‘विचार' और ‘आदर्श’ के भग्नावशेष में, एक निहायत ही विलम्बित रुदन है, जो उस प्रौढ़ पीढ़ी के रुँधे हुए गले से निकल रहा है, जिसे ‘माध्यम-निर्मित नियतिवाद’ ने पहले अपमानित और अंत में अपदस्थ कर दिया है।



दरअस्ल यह ‘सर्वसत्तावाद’ और ‘केन्द्रीय नियोजन’ की मिली-भगत से रची गयी, वह त्रयी है, जो ‘सूचना’, ‘समृद्धि’ और ‘हिंसा’ का नया समीकरण गढ़ रही है। जाहिर है कि अब यह किसी से छुपा नहीं रह गया है कि अब समूची सूचना-प्रौद्योगिकी इन्हीं के चाकरी या टहल में पूरे मनोयोग से लगी हुई है। यह त्रयी ही उसका एकमात्र एजेण्डा बन गया है।



बहरहाल, विडम्बना यही है कि आज हमारा समाचार-पत्र उद्योग इसी के बर्बर-बवण्डर के हवाले हो गया है। इसीलिए, उसके ‘रूप‘, ‘स्वरूप' और ‘अन्तर्वस्तु’ में अराजक उलट-पुलट तथा तोड़-फोड़ चल रही है। वह समाज को सूचना सम्पन्न बनाने की आड़ में ‘विचार‘ और ‘बोध’ के नये संकट की तरफ धकेल रहा है, जिसके परिणाम आने में अब अधिक समय नहीं रह गया है। अब अखबार पूरी तरह से महानगरीय सांस्कृतिक अभिजन को ही सम्बोधित है- उन्हीं के रहन-सहन, जीवन-मरण के प्रश्न ही अखबारों के पृष्ठों की अन्तर्वस्तु पर छाये हुए हैं।



बहुत स्पष्ट बात यही है कि बुनियादी रूप से पश्चिम की आवारा पूँजी, वहाँ की ‘कल्चर-इंडस्ट्री‘ (संस्कृति-उद्योग) को भारत के परम्परागत समाज और सांस्कृतिक स्वरूप को निगलने के लिए तैयार कर रही है। क्योंकि इसी में ही भूमण्डलीकरण की सफलता निहित है। यह कल्चर-इकोनामी का कार्यभार है कि उसने ‘सूचना’ और ‘संस्कृति’ को गड्डमड्ड करके चौतरफा एक ऐसे विचार भ्रम का निर्माण कर दिया है कि किसी को ‘सम्पट’ नहीं बैठ पा रही है कि वस्तुतः ये सब हो क्या रहा है? वे ‘तकनीकीवाद’ को ‘सांस्कृतिक-नियतिवाद’ में बदल रहे हैं। इसीलिए, हमारे तमाम भाषायी अखबार अपने को ऐसी सामग्री से अंधाधुंध तरीके से कूट-कूट कर भरे जा रहे हैं, जो अब ‘विचार’ नहीं, ‘वस्तुओं’ के लिए जगह बनाने के काम में इमदाद करती हैं। वह ‘युवा‘ और ‘जीवनशैली के महिमा-मण्डन’ पर एकाग्र है। भूमण्डलीकरण को लागू करने के काम में जुते होने के कारण इनके लिए अर्थशास्त्र अनालोच्य बन गया है। वह उम्मीदों का पर्याय है। जनतंत्र निवेश है और वह सबसे ऊँची बोली लगाने वाली के जेब में है। समाचार-उद्योग इस सारे तह-ओ-बाल में एक शक्तिशाली घटक की हैसियत से शामिल हो चुका है। वह भी पूँजी के प्रवाह पर नौकायन करना चाहता है।



निश्चय ही ऐसे में उनके लिए अखबार में लगभग ‘आत्मा‘ की तरह मौजूद ‘सम्पादकीय संस्था’ को धीरे-धीरे अवसान की तरफ धकेलना जरूरी हो गया है। क्योंकि, अखबार के पृष्ठ पर कोने में छोटी-सी जगह में बैठा हुआ, वह गाहे-ब-गाहे अड़ जाता था कि मैं यह नहीं होने दूँगा । मैं वो नहीं होने दूँगा। वह उसी जगह खड़े हो कर रोज-रोज सम्पादक की आवाज में बोलता था, उसे सुन कर लगता था, वहाँ से राष्ट्र बोल रहा है, वहाँ से हजारों-हजार लोगों की आवाजें उठ रही हैं। वहाँ से ‘मूल्य’ और ‘आदर्श’ बोल रहे हैं। वहाँ से एक निर्भीक दहाड़ उठा करती थी, जो ‘विचार‘ या ‘विचारधारा’ के साहचर्य से उस सबको भयभीत करती थी, जो ‘अनैतिक’ या ‘मूल्यहीन’ और जनकल्याण से दूर था। उसकी दहाड़ की अनुगूंज अखबार के हर पन्ने पर बरामद होती थी। उस जगह की दहाड़ से ‘भय’ उपजता था। एक दिन यह तक हुआ कि उसके वहाँ से चुप हो जाने से भी सत्ता ‘भयभीत’ हो उठी। सम्पादकीय पृष्ठ की वह जगह खाली छोड़ देने से भी ‘विचार‘ की भय पैदा करती अनुगूँज देखी गयी। उस चुप्पी पर भी तलवारें खिंची। क्योंकि, तब अखबार का कागज, छपाई, स्याही मशीनें सब मालिक के थे, लेकिन अखबार जितना सम्पादक का था, उतना मालिक का नहीं। मालिक ने अपने अखबार को हिन्दी का अखबार नहीं, बल्कि अंग्रेजी के पाठकों की नर्सरी में बदलने के लिए उसमें भाषा का खतरनाक घालमेल शुरू कर दिया है।




कहना न होगा कि अब अखबार, सम्पादक का नहीं रहा गया है। उसके बौद्धिक वर्चस्व से मुक्त वह सिर्फ पाठक का है। ‘पाठक’ का भी नहीं, बल्कि उस ‘उपभोक्ता’ का जिसने ग्राहक बनते समय कुर्सी, टी-सेट, सिनेमा के टिकट या कोई अन्य सामान मुफ्त में पाया है। इसलिए फूल की पुड़िया के साथ सुबह-सुबह घर के दरवाजे से भीतर फेंक दिये गये इस ‘दैनंदिन-उत्पाद’ की उत्तरजीविता उसके छपने के साथ ही समाप्त हो चुकती है और कहने की जरूरत नहीं कि सम्पादक की हत्या इसी ‘पाठक बनाम ग्राहक’ ने की है। अब अखबार को भी सम्पादक नहीं चाहिए। उसे अब उत्पादन और वितरण के साथ ‘रेवेन्यू-जेनरेट’ करने वाला करिश्माई कारिन्दा चाहिए, जिसे पाठक नहीं ‘उपभोक्ता’ की रूचि को बदलते हुए, ऐसी रूचि का निर्माण करना है, जो पश्चिम के सांस्कृतिक मालों व जीवनशैली को स्वीकार ले। वे उन सूचना सम्राटों के अनुयायी बन रहे हैं, जो ‘सूचना‘ और ‘संस्कृति’ का घालमेल करके, तीसरी दुनिया में अपनी जीवन शैली बेचने के कारोबार में लगे हैं, जो ‘रिंग-काम्बीनेशन’ की तरह ख्यात हैं। ये हैं जर्मनी की ‘वुल्फ’, ‘ब्रिटेन की ‘रायटर’, अमेरिका की ‘न्यूज कार्पोरेशन’। वे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भेज कर हमारे समाचार उद्योग को ‘वैचारिक विकलांग’ बना रही हैं। वे सामाजिक आर्थिक और राजनीति के क्षेत्र की ऐसी सूचनाएँ देती हैं, जो न सच होती हैं, न झूठ-बल्कि, सिर्फ विश्वसनीय होती हैं। जिन पर तीसरी दुनिया के लोगों के पास विश्वास करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता।




तो कुल जमा मकसद यह कि अखबार से सम्पादक की बिदाई ऐसे ही नहीं हो रही है। यह शनैः शनैः एक चतुर प्रविधि के जरिये हुआ है। पहले सम्पादक को विदीर्ण करके दो टुकड़े किये। सम्पादक इकाई नहीं रह गया। वह ‘समाचार-सम्पादक’ और ‘विचार-सम्पादक’ में बँटा। वे दोनों टुकड़े एक-दूसरे के विरोधी हो गया। यह नयी ‘डायकाटमी’ (द्वैत) बनी, जिससे एक के जरिये सत्ता या व्यवस्था पर चोट की जाती, दूसरे से प्राथमिक चिकित्सा। यह दायें और बायें हाथ की पृथक-पृथक मुद्रा थी। अब अखबार के लिए अभीष्ट ‘सत्य‘ नहीं ,संतुलन था। वह वर्ग और वर्ग, सम्प्रदाय और सम्प्रदाय तथा अंत में राजा और प्रजा के बीच बनाने का काम करने लगा। ‘सम्पर्क’ और ‘विनिमय’ उसके दो नये दायित्व हुए। बाद इसके ‘सम्पादक’ चुनाव के मौसम में पन्ना-पन्ना पैसा-पैसा हुआ। हर पृष्ठ यानी अलग-अलग जोतदारों का रकबा। वे उपजायें और फसल मालिक को दें। कुछ, ‘वे‘ खुद भी रख लें। अब जमींदार वाली कृपण और क्रूरता के बजाय सेठ की उदारता। पन्ना-पन्ना पैसा बरसा।




नतीजतन, अब अखबार के पास सम्पादक नहीं है, अखबारी कर्मचारियों की एक बेचेहरा फौज है, जो सूचना के निर्माण, वितरण और प्रबंधन में सुंदर, सुखद और मनोरंजन के कारोबार को बढ़ाने में जोत दी गयी है। वे सूचना के प्रवाह नहीं, पूँजी के प्रवाह को लाने और बनाने के लिए अनुबंधित श्रमजीवी हैं। वे सचाई के साथ कितना फ्लर्ट कर सकते हैं, यही उनकी सम्पादकीय (?) कुव्वत को आँकने का असली पैमाना है। वहाँ, वही योग्य है, जो तुक्कड़ बुद्धि से हुए एक भयानक खबर का शीर्षक ऐसे बनायें कि वह खबर मनोरंजन में बदल जाये। खबर ठहाका बन जाये, मजा बन जाये, फन बन जाये। जरूरी और जायज गुस्से को मसखरी से नाथ सके। जिस तरह कहा गया कि गाँव के कल्याण के लिए कुल का त्याग जरूरी है, उसी तरह अब जरूरी है, अखबार के कल्याण के लिए सम्पादक का त्याग।




हकीकतन, अब वहाँ सम्पादक नहीं है और ना ही उसकी दहाड़। वहाँ से अब कोई दहाड़ सुनायी नहीं देती। वहाँ स्वर नहीं, दृश्य है। एक अदृश्य हो चुकी नस्ल का भाँय-भाँय करता दृश्य। वहाँ अब कोई शेर नहीं, किन्तु शेर की भूसा भरी खालें हैं। यह क्षेत्रीय ‘प्रेस‘ नहीं, सिर्फ ‘रेस‘ है। व्यावसायिक-स्पर्धा के बजाय, एक-दूसरे को मरने या मिटाने के लिए लपलपाती ईर्ष्या।





मच्छरदानी, जिस तरह मच्छर बाहर और दूर रखती है, ठीक उसी तरह अखबार सम्पादक को दूर और बाहर रखने के लिए है। बावजूद इसके यदि वह अंदर आने की आकांक्षा का शिकार है- तो अब वहाँ सम्पादक के चोले में प्रवेश निषेध है। वह स्तंभकार के गणवेश में आ सकता है। कभी-कभार, हफ्ते-पन्द्रह दिन में। उनके लिए उसका ‘प्रतिष्ठा मूल्य’ काम का है, ‘प्रतिबद्धता मूल्य’ नहीं। उन्हें सिद्धान्त बघारने वाले किसी समाजशास्त्री की तरह पेश आने पर आपत्ति होगी। क्योंकि, सिद्धान्त अखबार के पेट के लिए अपाच्य हैं। सिद्धान्त की मूलियों की डकारें उठाती हैं। स्पष्ट है कि उन्हें सिद्धान्त नहीं चाहिये। फण्डे चाहिये। फण्डे प्रबंधन के। अध्यात्म के। राजनीति के। दुनियादार किस्म की सफलता हासिल करने के। सफलता भी समाज की नहीं, सिर्फ व्यक्ति की।




नहीं जानता कि देश में सम्पादकों की नई-पुरानी नस्ल इस हकीकत को कैसे लेती और देखती है, लेकिन यह तो वह चाह ही रही होगी कि उनकी नस्ल को उन्होंने अपने सामने दम तोड़ते देखा और कुछ भी नहीं किया, इस लांछन से बचने की कोशिश करती हुई वह दूर और मूक बनी टकटकी लगाकर देखती हुई असहाय खड़ी है। पता नहीं उसके हाथ उठना चाहते हैं, प्रार्थना में, पीड़ा में या कि असहाय हो जाने की निराशा में।


4, संवाद नगर, इन्दौर




पाठकों की अदालत में अपने दोषी या निर्दोष होने की अपील

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आतंकवादी ऐसे बनाती है पुलिस



मुझे इस बात के लिए माफ किया जाए कि मैं कई बार अपने खिलाफ चल रहे मामले की चर्चा कर चुका हूँ । मामला अब भी अदालत में हैं और वहाँ जो फैसला होगा सो होगा, मैं अपने पाठकों की अदालत में अपने दोषी या निर्दोष होने की यह अपील कर रहा हूँ ।


2005 के फरवरी महीने में दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी थाने में मेरे खिलाफ एक मामला दर्ज हुआ था एफआईआर कहती है कि हेड कांस्टेबल मोहम्मद लोनी और हेड कांस्टेबल सलीम डिफेंस कॉलोनी क्षेत्र का दौरा कर रहे थे। वहाँ एक सिंह न्यूज एजेंसी पर उनकी नजर सीनियर इंडिया नामक पत्रिका पर पड़ी जिसके मुख पृष्ठ पर बापू की वासना शीर्षक से एक लेख छपा था। सलीम और लोनी को एफआईआर के अनुसार बहुत उत्सुकता हुई और उन्होंने पत्रिका पढ़ना शुरू कर दिया। अंदर सातवें पन्ने पर नीचे एक तीन पैराग्राफ का लेख था जिसका शीर्षक था `अपने अपने भगवान', जिसमें एक छोटी-सी फोटो भी छपी थी जिसमें पगड़ी पर पटाखा  बना हुआ था।


एफआईआर के अनुसार फोटो बहुत छोटा था लेकिन फिर भी इन गुणी हवलदारों ने पढ़ लिया कि पगड़ी के माथे पर कुरान की पहली आयत ला इलाह इल्लिलाह, या रसूल अल्लाह अरबी भाषा में लिखा है। दिल्ली पुलिस में अरबी भाषा के इतने विद्वान को सिर्फ हवलदार बना कर रखा गया है। यह हैरत की बात है एफआईआर कहती है कि कार्टून छापना मुस्लिम समुदाय का अपमान करना है और लेख की भाषा भी मुस्लिम संप्रदाय के खिलाफ है। इसलिए यह धारा 295 के तहत किया गया गंभीर अपराध था। इसकी सूचना सब इंस्पेक्टर के पी सिंह को दी गई और के पी सिंह ने थाने से एक बजे रवानगी डाल कर 22 फरवरी 2006 को खुद डिफेंस कॉलोनी में यह पत्रिका देखी और अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी दी। वरिष्ठ अधिकारी यानी दिल्ली पुलिस के पुलिस आयुक्त डॉक्टर कृष्ण कांत पॉल तैयार बैठे थे। उन्होंने तुरंत दिल्ली के उप राज्यपाल के नाम एक संदेश बनाया जिसमें पत्रिकाएँ जब्त करने और संपादक यानी मुझे गिरफ्तार करने की अधिसूचना जारी करने का अनुरोध था। अधिसूचना फौरन जारी कर दी गई और इसे श्री पॉल ने गृह मंत्रालय से भी जारी करवा दिया। 


मेरे जिस लेख पर मुस्लिम भावनाएँ भड़कने वाली थीं, उसके तीन पैरे भी लगे हाथ पढ़ लीजिए। मैने लिखा था- हाल ही में पैगंबर हजरत मोहम्मद जो इस्लाम के संस्थापक हैं, के डेनमार्क में कार्टून प्रकाशित होने पर बहुत हंगामा और बहुत जुलूस निकले। इस अखबार ने इसके पहले जीसस क्राइस्ड के कार्टून छापने से इंकार कर दिया था क्योंकि उसकी राय में यह आपत्तिजनक हैं। 


इसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का बयान आया जिसमें कहा गया कि वे डेनमार्क के साथ है और यूरोप तथा अमेरिका मे रहने वाले सभी इस्लाम धर्म के अनुयायियों को स्थानीय जीवन शैली और रिवाज मानने पड़ेंगे। सिर्फ इस बयान से जाहिर हो जाता है कि अमेरिका के असली इरादे क्या है? अमेरिका अपने स्वंयभू बुद्विजीवियों की मदद से संस्कृतियों के टकराव का सिद्वांत प्रचारित करने में लगा हुआ है और इस तरह के बयानाें के बाद किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए कि और भी जगह चिंगारिया भड़के। तथ्य यह है कि धर्म का मूल प्रश्न तेल और जमीन के मामले से हट कर अब धर्म के मूल आधार का माखौल उड़ाने पर आ कर
टिक गया है और स्वाभाविक है इस्लामी शक्तियां इसे पसंद नहीं करेगी। यह ठीक है कि किसी भी धर्म की महानता इस बात में निहित है कि वह मजाक को कितना सहन कर सकता है मगर यदि कोई धर्म या उसके अनुयायी इसे मंजूर नहीं करते तो उन्हें अपने रास्ते छोड़ देना चाहिए। 


यह वह लेख था जिसे इस्लामी भावनाए आहत करने वाला बताया जा रहा था। रातों रात मुझे गिरफ्तार किया गया, रात को तीन बजे तक पूछताछ की गई। पूछा गया कि डेनमार्क वाला यह कार्टून कितने में और कहां से खरीदा था? पूछने वाले एक पढ़े लिखे आईपीएस अधिकारी थे जिन्हें पता था कि इंटरनेट पर चार बटन दबाने से सारे कार्टून सामने आ जाते हैं और इन पर कोई कॉपीराइट नहीं है। मगर साहब तो बड़े साहब यानी के के पॉल का हुक्म बजा रहे थे और पॉल इसलिए दुखी थे क्योंकि हमने उनके वकील बेटे को दिल्ली पुलिस द्वारा वांछित तमाम अभियुक्तों को अदालत में बचाते और औकात से कई गुनी ज्यादा फीस वसूलते पकड़ लिया था।


तिहाड़ जेल में बारह दिन बंद रहने के बाद जमानत मिली और जमानत के आदेश में एक एक पैरा पर टिप्पणी की गई थी कि इससे कोई मुस्लिम भावना आहत नहीं होती। मगर पॉल तब भी दिल्ली पुलिस के आयुक्त थे और उनके आदेश पर जमानत रद्द करने की अपील की गई जो अब भी चल रही है। दिलचस्प बात यह है कि एफआईआर लिखवाने के लिए भी के के पॉल दो मुस्लिम हवलदारों को ले कर आए। अदालत में कहा गया कि इस लेख पर दंगा हो सकता है इसलिए अभियुक्त यानी मुझे सीधे तिहाड़ जेल भेज दिया जाए। यह सब गृह मंत्री शिवराज पाटिल की जानकारी में हो रहा था और यह बात खुद पाटिल ने बहुत बाद में अपने घर मेरे सामने स्वीकार की। संसद में सवाल किया गया मगर कोई जवाब नहीं मिला। कई पेशियाँ  हो चुकी हैं। एक सीधे सपाट मामले में चौदह जाँच अधिकारी बदले जा चुके हैं। जो चार्ज शीट दाखिल की गई है उसे अदालत ने बहस के लायक नहीं समझा। सबसे गंभीर धारा 295 उच्च न्यायालय ने पाया कि इस मामले में लागू ही नहीं होती। मगर मामला चल रहा है। 


मकबूल फिदा हुसैन के खिलाफ बहुत सारे मामले इन्हीं धाराओं में चले और खारिज होते रहे। हुसैन का बहुत
नाम हैं और उनका एक दस्तखत लाखों में बिकता है। मगर निचली से ले कर उच्च न्यायालय तक अब तक लाखों रुपए मैं अदालती ताम झाम में खर्च कर चुका हूँ । अब तो उच्च न्यायालय ने उस मामले को जिसमें मेरी गिरफ्तारी इतनी अनिवार्य मानी गई थी, साधारण सूची में डाल दिया है जिसमें तारीख दस साल बाद भी पड़ सकती है। आप ही बताए कि भारत की न्याय प्रक्रिया में मेरा विश्वास क्यों कायम रह जाना चाहिए? अभी तक तो कायम हैं लेकिन न्याय के नाम पर सत्ता और प्रतिष्ठान जिस तरह की दादागीरी करते हैं उसी से आहत और  हताश हो कर लोग अपराधी बन जाते हैं। 


दिलचस्प बात यह भी है कि मुझ पर इस्लाम के खिलाफ मामला भड़काने का आरोप लगा था। फिर भी तिहाड़ जेल में मुझे उस हाई सिक्योरिटी हिस्से में रखा गया जहाँ जैश ए मोहम्मद और लश्कर ए तैयबा के खूंखार आतंकवादी भी मौजूद थे। ईमानदारी से कहे तो आतंकवाद के आरोप में बंद ये लोग पुलिस से ज्यादा इंसानियत बरतते नजर आए और उन्होंने बहुत गौर से मेरी बात सुनी और अपने साथ बिठा कर खाना खिलाया। फिर भी भारत सरकार का मैं अभियुक्त हूँ । उस सरकार का जो उस संविधान से चलती हैं जहाँ  अभिव्यक्ति की आजादी और न्याय नागरिक का मूल अधिकार है।

आलोक तोमर 

प्रभाष जोशी के न होने का अर्थ



प्रभाष जोशी के बिना पहला एक दिन




"कोई हरकत नहीं है पंडित"। किसी बात को हवा में उड़ा देने के लिए हमारे प्रभाष जी का यह प्रिय वाक्य था। फिर कहते थे "अपने को क्या फर्क पड़ता है'। अभी एक डेढ़ महीने पहले तक इंटरनेट के बहुत सारे ब्लॉगों और आधी अधूरी वेबसाइटों पर प्रभाष जी को ब्राह्मणवादी, कर्मकांडी, रूढ़िवादी और कुल मिला कर पतित पत्रकार साबित करने की प्रतियोगिता चल रही थी। मैंने जितनी हैसियत थी उसका जवाब दिया और फिर उनके खिलाफ लिखे गए लेखों और अपने जवाब की प्रति उनको भेजी तो उन्होंने फोन कर के यही कहा था।

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