"अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु"

हिन्दी भारत

" - हिन्दी भारत - " (भारत व भारतीयता से जुड़े सभी साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक प्रयासों, हिन्दी में रचनात्मक लेखन (विविध विधाएँ), भाषिक मंतव्यों, जीवनमूल्यों, पारस्परिक आदान-प्रदान की अभिवृद्धि हेतु) ***** हिन्दी भारत ***** "

कहाँ हो हमारे बुद्धिजीवी

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कहाँ हो हमारे बुद्धिजीवी





मामला यह भी है कि उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से अँग्रेजी में विचार-विमर्श की परंपरा लगभग अक्षत बनी हुई है, पर भारतीय भाषाओं में यह परंपरा छिन्न-भिन्न हो गई है। एक समय मराठी में महात्मा फुले थे, बांग्ला में ईश्वर चन्द्र विद्यासागर थे और हिन्दी में भारतेंदु हरिश्चंद्र और दयानंद सरस्वती थे, पर आज उनके बौद्धिक उत्तराधिकारी कहीं दिखाई नहीं देते। इसका एक बड़ा कारण यह है कि अंग्रेजी से होनेवाले अनगिनत लाभों के कारण भारत की उत्कृष्ट प्रतिभाएँ अंग्रेजी में पर्यवसित होती गईं, जिससे भारतीय भाषाओं में बौद्धिक विकास को आघात पहुँचा। दूसरा बड़ा कारण यह है कि हिन्दी क्षेत्र में पुनर्जागरण की कोई बड़ी घटना नहीं हुई है।




पहली बात तो यह है कि भारत में जन बुद्धिजीवी हिन्दी में नहीं हैं और अँग्रेजी में हैं, यह बात ही सिरे से ही खारिज करने लायक है। अँग्रेजी के बुद्धिजीवियों का भारतीय जन से क्या रिश्ता है? कोई रिश्ता है भी या नहीं? बताते हैं कि अंग्रेजी समझनेवालों की संख्या भारत में तीन प्रतिशत के आसपास है। इन तीन प्रतिशत लोगों का प्रतिनिधित्व करनेवाले बुद्धिजीवी देश के 97 प्रतिशत लोगों से कैसे संवाद कर सकते हैं? आशीष नंदी या रामचंद्र गुहा या अमर्त्य सेन को भारत का जन बुद्धिजीवी किस तर्क से कहा जा सकता है? ये मुख्यतः या सिर्फ अँग्रेजी जाननेवाले वर्ग के लिए लिखते या बोलते हैं। निश्चय ही, इनके सरोकारों का संबंध भारत की स्थितियों से होता है, लेकिन विदेशों में रहनेवाले ऐसे दर्जनों विद्वान हैं जो अँग्रेजी में या अपनी-अपनी भाषाओं में भारत के बारे में लिखते रहते हैं।क्या इन विदेशी विद्वानों को भारत का जन बुद्धिजीवी माना जा सकता है? इन विद्वानों में और भारत में रहनेवाले भारतीय विद्वानों में मूलभूत फर्क क्या है? दोनों एक ही पाठक वर्ग के लिए लिखते हैं। दोनों एक ही तरह के परिसंवादों में भाग लेते हैं। उनकी पुस्तकें प्राय: एक ही वर्ग के प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित की जाती हैं। जैसे सिर्फ भारतीय मूल का होने से कोई विद्वान भारतीय नहीं हो जाता, वैसे ही जनता से दूर रहनेवाला बुद्धिजीवी किसी भी हाल में भारत का जन बुद्धिजीवी नहीं कहला सकता। इसलिए हमें इस जाल में पड़ना ही नहीं चाहिए कि कोई विदेशी पत्रिका किन्हें भारत के शीर्ष जन बुद्धिजीवियों में गिनती है और किन्हें नहीं। वास्तव में यह अंग्रेजी भाषा की नट लीला है, जिसकी ओर ध्यान देने से हम अपनी बौद्धिक समस्याओं का निदान नहीं निकाल सकते।



इस ट्रेजेडी के साथ एक बृहत्तर ट्रेजेडी भी जुड़ी हुई है। ऐसा नहीं है कि जन बुद्धिजीवी न होने के कारण भारत के अंग्रेजी बुद्धिजीवियों का योगदान कुछ कम महत्व का है। महत्व है, इसीलिए अफसोस होता है कि ये विद्वान अंग्रेजी में क्यों लिखते हैं जिसका भारत के आम पढ़े-लिखे वर्ग से कोई संबंध नहीं है। इसमें क्या संदेह है कि पिछले साठ वर्षों में ज्ञान और विद्वत्ता के क्षेत्र में जो ज्यादातर काम हुआ है, वह अंग्रेजी में ही हुआ है। उदाहरण के लिए, जाति, गरीबी, भूमंडलीकरण, धर्मनिरपेक्षता, राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र आदि में जितना महत्वपूर्ण काम हमारे देश में हुआ है, उसकी भाषा अँग्रेजी ही है। इसी से इसका फायदा अंग्रेजीवालों के बीच ही सीमित रहता है। अन्य भाषाओं के जिज्ञासु भी इन्हें पढ़ते हैं, पर इनकी संख्या ज्यादा नहीं है और इन बुद्धिजीवियों का व्यक्तित्व या कार्य शैली ऐसी नहीं है कि ये भारत के जन मानस को प्रभावित कर सकें। इस तरह, अंग्रेजी में उत्पादित और संग्रहीत ज्ञान भंडार भारत के अधिसंख्य लोगों के लिए किसी काम का नहीं होता। रामचंद्र गुहा या अरुंधति रॉय होंगे बहुत बड़े बुद्धिजीवी, पर उनके मुहल्ले के लोग भी नहीं जानते कि यहाँ हमारे समय का एक बड़ा बुद्धिजीवी रहता है। भारत का अँग्रेजी बुद्धिजीवी लंदन, पेरिस, हेडेलबर्ग की सैर करता होगा, अंतरराष्ट्रीय परिसंवादों में भाग लेता होगा, हर साल उसकी एक नई किताब प्रकाशित होती होगी, पर असल भारतीय समाज से वह उतना ही दूर है जितना इंग्लैंड या अमेरिका भारत से दूर हैं। इसलिए इनका ज्ञान भारतीय लोगों के उपयोग में नहीं आ पाता। ये इंटेलेक्चुअल हैं, पर पब्लिक इंटेलेक्चुअल नहीं।



फिर इन्हें भारत का जन बुद्धिजीवी क्यों मान लिया जाता है? क्योंकि एक छोटा-सा वर्ग ऐसा है, जो अपने को असली भारत माने बैठा है। इस छोटे-से वर्ग के सदस्य एक-दूसरे को संबोधित करते हैं और एक-दूसरे की बात का खंडन-मंडन करते रहते हैं। यह वर्ग जो लिखता है, उसे यही वर्ग पढ़ता है। इस वर्ग का अंग्रेजी के विदेशी बुद्धिजीवियों से भी संपर्क रहता है। यही कारण है कि संयुक्त राज्य अमेरिका की कोई पत्रिका जब भारत के जन बुद्धिजीवियों की सूची बनाने बैठती है, तो उसकी नजर मेधा पाटकर या अरुणा रॉय या नामवर सिंह या राजेंद्र यादव पर नहीं पड़ती। ये लोग उस मंडली से बाहर हैं जिसे भारत का बौद्धिक क्रीमी लेयर कहा जा सकता है। राजेंद्र यादव की टिप्पणियों को पढ़नेवालों की संख्या रामचंद्र गुहा के पाठकों से कई गुना ज्यादा होगी, पर यादव अमेरिकी पत्रिकाओं की नजर में पब्लिक बुद्धिजीवी नहीं हैं और रामचंद्र गुहा हैं। यह यथार्थ को सिर के बल खड़ा करना नहीं है, तो और क्या है?



नामवर सिंह, राजेंद्र यादव, सच्चिदानंद सिन्हा, अशोक वाजपेयी की भी सीमाएँ हैं। ये काम तो कर रहे हैं जन बुद्धिजीवी का, पर जन के बीच इनकी कोई खास मान्यता होने की बात को तो छोड़िए, आम हिन्दी भाषी इन्हें जानता तक नहीं है। जिस तरह अंग्रेजी बोलने और लिखनेवालों का एक छोटा-सा परिमंडल बना हुआ है, उसी तरह इन लेखकों और वक्ताओं का भी एक सीमित परिमंडल है। अंग्रेजी के बुद्धिजीवियों की तुलना में इनकी स्थिति ज्यादा ट्रेजिक कही जा सकती है, क्योंकि ये अपनी मातृभाषा में काम करते हैं, उसे समर्थ और सक्षम बनाते हैं, उसके जरिए तरह-तरह की बहसें छेड़ते हैं, पर इसकी आँच या महक अपने ही लोगों के बीच दूर तक नहीं जा पाती। अंग्रेजी के लेखक नदी के द्वीप हैं, तो ये लेखक छोटी-छोटी नदियाँ है, जिन्हें उस व्यापक जन क्षेत्र की प्रतीक्षा है, जहाँ ये वेग के साथ बह सकें।



मामला यह भी है कि उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से अँग्रेजी में विचार-विमर्श की परंपरा लगभग अक्षत बनी हुई है, पर भारतीय भाषाओं में यह परंपरा छिन्न-भिन्न हो गई है। एक समय मराठी में महात्मा फुले थे, बांग्ला में ईश्वर चन्द्र विद्यासागर थे और हिन्दी में भारतेंदु हरिश्चंद्र और दयानंद सरस्वती थे, पर आज उनके बौद्धिक उत्तराधिकारी कहीं दिखाई नहीं देते। इसका एक बड़ा कारण यह है कि अंग्रेजी से होनेवाले अनगिनत लाभों के कारण भारत की उत्कृष्ट प्रतिभाएँ अंग्रेजी में पर्यवसित होती गईं, जिससे भारतीय भाषाओं में बौद्धिक विकास को आघात पहुँचा। दूसरा बड़ा कारण यह है कि हिन्दी क्षेत्र में पुनर्जागरण की कोई बड़ी घटना नहीं हुई है। छिटपुट प्रयत्न जरूर हुए हैं, पर वे तृणमूल स्तर पर जन जीवन को प्रभावित नहीं कर सके। इसलिए तर्क-वितर्क का माहौल क्षीण हुआ है। साहित्य को ही प्रमुख बौद्धिक गतिविधि मान लिया गया। फिर भी, महात्मा गाँधी के बाद राममनोहर लोहिया, रामवृक्ष बेनीपुरी, विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण, किशन पटनायक, माहे·ार (आइपीएफ) आदि ने अपने-अपने समय में सार्वजनिक बहसें चलाईं और बहुत बड़ी संख्या में लोगों की बौद्धिक चेतना में खलबलाहट पैदा की। यह क्रम भी अब टूटता नजर आता है। अंग्रेजी का प्रभुत्व भारत की हर अच्छी चीज को नष्ट कर रहा है। इसलिए हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में जन बुद्धिजीवियों का आविर्भाव हो और उनका प्रभाव क्षेत्र फैले, इसके लिए आवश्यक है कि भारत के सार्वजनिक जीवन से अँग्रेजी को तुरंत विदा किया जाए।


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- राजकिशोर

पद्मश्री : नई दुनिया : अभय छजलानी : भाषायी(?) पत्रकारिता में हिंदी की भूमिका ?

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अभय
छजलानी की औ
कात क्या है?
- आलोक तोमर



बाबू लाभ चंद्र छजलानी गुजराती मूल के कारोबारी थे जो इंदौर आ कर बस गए थे। आजादी की लड़ाई में उन्होंने हिस्सा लिया और देश जब आजाद होने वाला ही था तो 1947 में अपने साथी बसंती लाल सेठिया के साथ मिल कर उन्होंने पहले साप्ताहिक और फिर दैनिक अखबार की शुरूआत की। नाम था नई दुनिया क्योंकि बाबूजी के अनुसार आजादी के बाद भारत एक नई दुनिया में प्रवेश कर गया था।


लाभ चंद्र छजलानी नई दुनिया निकालते थे लेकिन पुरानी दुनिया के इंसान थे। उन्हें अपना अखबार दुकानों तक साइकिल और बाद में स्कूटर के पीछे रख कर ले जाने में लाज नहीं आती थी। नई शैली थी और आजादी का सात्विक उन्माद था इसलिए नई दुनिया चल निकला। धीरे धीरे और सहयोगी जुड़े और नई दुनिया मालवा इलाके का एक सबसे बड़ा अखबार तो बन ही गया, पूरे देश के मानक हिंदी समाचार पत्र के तौर पर इसकी गिनती हुई।


सन सैतालीस में अखबार शुरू हुआ था और 1960 आते आते इसकी काफी प्रतिष्ठा हो गई थी। सर्वोदय की ओर जा चुके प्रभाष जोशी स्कूल की पढ़ाई छोड़ कर विनोबा भावे के काफिले में शामिल हो गए थे और रोज संत विनोबा की भूदान यात्रा का विवरण लिखते थे। अंग्रेजी में एमए कर रहे राजेंद्र माथुर नई दुनिया में हिंदी साहित्य का पन्ना देखते थे। शरद जोशी उस समय भी व्यंग लिखते थे और नई दुनिया के पाठकों के लिए आकर्षण का एक पात्र थे।


राहुल बारपुते के बारे में जितना सुना है, वे संत प्रवृत्ति के ज्ञानी थे और कुमार गंधर्व से ले कर उस्ताद आमीर खां और उस समय के क्रिकेट स्टार सीके नायडू के साथ उनका उठना बैठना था। नई दुनिया को प्रारंभिक भाषायी व्याकरण का संस्कार राहुल जी ने ही दिया।


अब नई दुनिया के पूरे देश से दर्जनों संस्करण हैं, रंगीन पन्नों पर छपता है और फिलहाल पत्रकारों को मोटी पगार दे रहा है। इसके संपादक आलोक मेहता ने पत्रकारिता का जीवन नई दुनिया से ही शुरू किया था और इसी साल उन्हें उनके व्यक्तिगत गुणों के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। प्रसंगवश पद्मश्री के प्रमाण पत्र पर जो भाषा लिखी होती है उस पर साफ शब्दों में लिखा होता है कि मैं भारत का राष्ट्रपति आपको आपके व्यक्तिगत गुणों के लिए पद्मश्री से अलंकृत करता हूं। आलोक जी के व्यक्तिगत गुण और प्रतिभा से सभी परिचित हैं लेकिन इस साल की पद्मश्री की सूची में किसी एक अभय छजलानी का भी नाम है जिनके व्यक्तिगत गुणों को भी भारत की महामहिम राष्ट्रपति ने अलंकृत करने लायक समझा है।


अभय छजलानी के व्यक्तिगत गुण क्या है यह या तो प्रतिभा पाटिल जानती हाेंगी या खुद छजलानी। लेकिन इतना जरूर है कि इस गुजराती लाला को पद्मश्री से विभूषित किया गया तो पूरे देश ने जय हो का नारा नहीं लगाया और इससे शायद लाला जी बहुत आहत हुए। उन्होंने पूरे देश के पत्रकारों को जिनमें बहुत सारे अल्लू पल्लू भी थे, हवाई जहाज का टिकट दे कर इंदौर बुलाया, बड़े होटलों में ठहराया, दावतें दी और बहाना बना रहे इसलिए इंदौर प्रेस क्लब को चंदा दे कर एक सेमिनार भी करवा डाला। लाला जी से भाषायी या पत्रकारिता के सरोकारों की उम्मीद करना व्यर्थ है मगर अपने जो साथी इस सेमिनार में उत्साहपूर्वक शामिल हुए थे और जिन्होंने नई दुनिया के बहाने अभय छजलानी की शान के झंडे गाढ़ दिए थे, उन्हें भी इस सेमिनार के विषय पर कोई ऐतराज नहीं हुआ। नई दुनिया जो अपने आपको अब भी देश का मानक हिंदी अखबार कहता है, ने विषय चुना था वह यह था भाषायी पत्रकारिता में हिंदी की भूमिका।




जिसने भी यह विषय चुना था उसको सूली पर चढ़ा देना चाहिए। जिन विद्वानों ने इस विषय पर अपनेउच्च विचार रखे थे उन्हें भी अपने आप से पूछना चाहिए कि अगर हिंदी सिर्फ एक भाषायी समाचारलिपि है तो फिर मैथिली और भोजपुरी क्या है? कायदे से तो इनका अपना व्याकरण है और इन्हें भाषाहोना चाहिए मगर वह बरस बाद में चलती रह सकती है। अपने को तो यह हजम नहीं हो रहा कि एक वहअखबार जो अपने को मानक सिद्व करने पर तुला हुआ है, हिंदी को राष्ट्रीय की बजाय भाषायी सिद्वकरने की कोशिश क्यों कर रहा है? राजभाषा और राष्ट्रभाषा के सरकारी विज्ञापन जब जारी होते हैं तोलेने में इन्हें शर्म नहीं आती। इनका एक मरियल सा वेब पोर्टल वेब दुनिया के नाम से चल रहा है औरहिंदी, अंग्रेजी के संकर नाम वाले इस पोर्टल के लिए विदेशों से पूंजी जुगाड़ते वक्त हिंदी का वर्णन देश कीसबसे बड़ी भाषा के तौर पर कारोबारी भीख मांगने वाले दस्तावेजों में किया जाता है। जब रोकड़ाचाहिए तो हिंदी महान वरना वह तो एक, जैसा इस प्रायोजित सेमिनार में कहा गया, हिंदी एकवर्नाक्युलर यानी देहाती और आदिवासी किस्म की भाषा है। भाषा भी नहीं वर्नाक्युलर का अनुवाद तोबोली होता है। जैसे अवधी है, बुंदेलखंडी हैं वैसे ही अभय छजलानी की राय में हिंदी भी हैं। इसी हिंदी कीकमाई से वे खुद को श्रध्दांजलि देने के लिए पूरे देश से पत्रकारों को जमा करते हैं, उनकी सेवा सत्कारकरते हैं और बुढ़ापे में पद्मश्री पा कर धन्य हो जाते हैं।


अभय छजलानी का दुस्साहस तो देखिए। वे कहते हैं कि नई दुनिया ने पत्रकारिता की कई पीढ़ियों कोबनाया। वे कहते हैं कि राजेंद्र माथुर को हमने बनाया। शरद जोशी को हमने बनाया। प्रभाष जोशी कोन वे याद करते हैं और न बुलाते हैं। इसलिए कि जब नई दुनिया कारोबार हो गया और अभय छजलानीडंडी मारने लगे तो इसका विरोध करने वालों में प्रभाष जोशी भी थे। नई दुनिया की यह औकात कभीनहीं थी कि वह राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी को बनाए। उल्टे इन लोगों ने नई दुनिया को आकारऔर सम्मान दिया है। राजेंद्र माथुर की विशाल दृष्टि और प्रभाष जोशी की भाषा ने नई दुनिया को रचाहै और लाला अभय छजलानी किराए पर बुलाई गई भीड़ की मौजूदगी में अगर यह बात मंजूर नहीं कररहे तो उनमें और एक परचूनिए में फर्क क्या रहा जाता है?


राजेंद्र माथुर ने तो लगभग जिंदगी भर इंदौर के गुजराती कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाई और अखबारों मेंहिंदी लिखी। रज्जू बाबू के बहुत सारे लिखे में ऐसे संदर्भ और इतनी प्रवाहमान कविता वाली भाषा होतीथी कि अभय छजलानी की समझ में भी नहीं आती होगी। लेकिन न राजेंद्र माथुर को पद्मश्री मिली औरन प्रभाष जोशी को। लाला अभय छजलानी को भी पद्मश्री इसलिए मिल गई क्योंकि उनके संपादकआलोक मेहता संपर्कशील प्राणी हैं और उनकी सरकार में इतनी चलती है कि वे अभय छजलानी तोक्या किसी मनोहर लिम्बूदिया को भी पद्मश्री दिलवा दें। पद्मश्री कैसे मिलती है ये सब जानते हैं। हमारेदोस्त सुधीर तैलंग को बयालीस साल की उम्र में पद्मश्री मिल गई थी और उन्होंने आज तक अपने कोदावत नहीं दी। उनके पास हराम का पैसा नहीं हैं।

Saturday, March 7, 2009

इन्दौर में हुआ दिग्गज पत्रकारों का जमावडा,प्रेस क्लबने किया सेमिनार का आयोजन, अभय छजलानी काहोगा सम्मान

इंदौर प्रेस क्लब की तरफ से आज इंदौर में एक सेमिनार और वर्कशॉप का आयोजन किया गया है इस आयोजन में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली और मुंबई से कई दिग्गज पत्रकार इंदौर पहुंचे हैं इन पत्रकारों में आईबीएन -7 के संपादक आशुतोष , शीघ्र प्रकाश्य अखबार चौथी दुनिया के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय , स्टार न्यूज के नेशनल अफेयर एडिटर दीपक चौरसिया , न्यूज 24 के मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम , दैनिक भास्कर के संपादक श्रवण गर्ग , वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ सचदेव , नई दुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहताअनिल सिंह समेत कई पत्रकार इंदौर में हो रहे इस भव्य समारोह और सेमिनार में हिस्सा लेने पहुंच चुके हैं
प्रेस क्लब द्वारा ये सेमिनार इनडोर हॉल अभय प्रसाल में किया गया है सुबह से शाम तक चलने वाले समारोह में हजारो लोग हिस्सा लेंगे और शाम को नई दुनिया के संपादकीय बोर्ड के अध्यक्ष अभय छजलानी का सम्मान किया जाएगा । अभय छजलानी को हाल में पद्म पुरस्कार से नवाजा गया है। जितने बड़े पैमाने पर ये आयोजन किया गया है , उतना बड़ा आयोजन पहले कभी नहीं हुआ आमतौर पर सेमिनारों में दो - चार सौ लोग होते हैं लेकिन इस समारोह में पांच से दस हजार लोगों के हिस्सा लेने की बात कही जा रही है
नोट - इस समारोह के बारे में विस्तार से हम आपको बताएंगे । आपमें से कोई अगरइस समारोह का चश्मदीद है तो आप हमें पूरा विवरण लिखकर भेज सकते हैं । हमआपके नाम के साथ पोस्ट करेंगे



अगर आप ये समझ रहे हैं कि अभय छजलानी से अपना कोई व्यक्तिगत बैर है तो आपकी जानकारी केलिए इस लाला की आज तक अपन ने छवि भी नहीं देखी। इंदौर सैकड़ों बार जाना हुआ है लेकिन नईदुनिया परिसर में घुसने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी। चलते चलते अभय छजलानी और उनके चमचोंको दो बातें कहनी हैं। एक तो हिंदी को वर्नाक्युलर यानी क्षेत्रीय भाषा मानने की भूल मत करना औरदूसरे मिल कर कामना करना कि अभय छजलानी को भारत रत्न मिल जाए। जो व्यक्ति पद्मश्री मिलनेपर इतना बड़ा तामझाम खड़ा कर सकता है वह भारत रत्न मिलने पर तो पूरे देश में इमरती बंटवाएगा।रही बात राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी को रचने की तो अभय छजलानी और नई दुनिया की येऔकात कभी नहीं रही कि वे हिंदी पत्रकारिता की किवदंतियों को रच सकें। वे ज्यादा से ज्यादा पंकजशर्मा और आलोक मेहता को रच सकते हैं।





आप मेरे जीवन में रंग भर सकते हैं ?

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कौन करेगा काली होली को रंगीली?




सभी ओर जब रंग ही रंग छितरा हो, उमंग ही उमंग भरी हो, ऐसे में जीवन की काली कारा में बन्दी -सा जीवन ढोने वालों का स्मरण कौन करता है, जिसने कभी रंग देखे तक न हों!


कोई विरला ही ऐसे जीवन को रंग से भर सकता है।

क्या हम में से कोई है ऐसा?


- कविता वाचक्नवी






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पाखंडी नैतिकता का अश्वमेध जारी है : `पहल' के बहाने

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पाखंडी
नैतिकता का अश्वमेध जारी है : `पहल' के बहाने






अभी कुछ समय पूर्व जबलपुर से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका पहल का घोषणा पूर्वक बंद हो जाना साहित्यिक जगत में काफी चर्चा का विषय रहा। नेट पर और ब्लॉग आदि के माध्यम से भी इस सन्दर्भ में काफी क्षोभ प्रकट किए गया। किसी भी पत्रिका का यकायक यों ठहर जाना /थम जाना, यद्यपि पाठकीय चेतना के ह्रास जैसे प्रश्नों पर आ कर ठहर जाता है, किंतु प्रकारांतर में कई अवांतर कथाएँ व सन्दर्भ भी इस मध्य उद्घाटित होते हैं जिन्हें साहित्यिक परिधि की उस सीमारेखा पर आकर ठहर जाने की आकुलता उद्घाटित करती है, जिसे व्यक्ति/ राजनीति/ छद्म या व्यापार जैसे विशेषण भी दिए जा सकते हैं। इस प्रकरण में यह किस परिधि पर, किन अनुत्तरित प्रश्नों के, कौन-से उत्तर हैं - इसे जानने के लिए संवाद प्रकाशन के आलोक श्रीवास्तव द्वारा प्रेषित इस आलेख को अवश्य पूरा पढ़ें। साहित्यिक परिदृश्य पर कौन-सी व कैसी शक्तियाँ काबिज हैं और किन उद्देश्यों को लेकर, यह जानने के लिए भी इस आलेख का पढ़ा जाना आवश्यक है। यह है - पहल के बंद होने के बाद की कथा ... और उस बहाने अपने समकालीन साहित्यिक चरित्र का वास्तविक लेखा-जोखा.


- कविता वाचक्नवी


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10 जनवरी, 2009


माननीय हरिनारायण जी


आशा है आप मजे में होंगे. जैसा कि फोन पर बात हुई थी, कथादेश के लिए लेख भेज रहा हूँ । लेख कुछ बेहद महत्वपूर्ण मसलों से वाबस्ता है, यद्यपि इसमें हिंदी साहित्य के कुछ स्वनामधन्यों के लिए कुछ कड़ी बातें कही गई हैं, परंतु उन बातों की सच्चाई के बारे में आप मुझसे अधिक और सप्रमाण जानते हैं. बल्कि सत्य की रोशनी में देखा जाए तो ये कड़ी बातें बहुत अपर्याप्त साबित होंगी. हिंदी में आपसी ले-दे के तहत तो अपशब्दों तक के इस्तेमाल से गुरेज नहीं है, परंतु किसी गहरे मुददे पर तथाकथित वर्चस्वियों के बारे में एक आम सहमति का माहौल है. आशा है यह लेख, हमेशा की तरह अविकल छापेंगे.

नवंबर के प्रथम सप्ताह में अपनी कविता कथादेश के लिए भेजी थी. अगर किसी कारण से न छाप सकें तो, सूचित अवश्य कर दीजिएगा, ताकि अन्यत्र भेज सकूँ.

आशा है स्वस्थ और प्रसन्न होंगे.

सादर आपका
आलोक श्रीवास्तव




07 मार्च, 2009

यह लेख कथादेश में छपा नहीं। पहले, संपादक महोदय लेख न मिलने की बात करते रहे, जब लेख ई.मेल, कूरियर, सीडी, पीडी एफ फाइल साथ ही प्रिंट आउट के हर संभव तरीके से भेज दिए गए, तो वे मौन साध गए. दो माह बाद फोन करने पर कहा कि लेख जमा नहीं, किस कारण, इसके जवाब में फिर मौन था. तो मित्रों यह हाल है हमारी भाषा के साहित्य-समाज का. कायरता, चुप्पी, निहित स्वार्थ, डर..... यह कहानी है हिंदी के मौजूदा दौर के साहित्य उसके रखवालों और उसके मठाधीशों की....


इसी कथादेश में मैंने बिना पारिश्रमिक लिए, संपादक के निरंतर दबाव भरे आग्रह के कारण बरसों एक स्तंभ लिखा -- ‘अखबारनामा’. वह भी तब लिखा, जबकि लिखने का समय निकाल पाना मुश्किल था, सिर्फ मीडिया से जुड़े मुददों के प्रति प्रतिबद्धता और साथ ही संपादक का अत्यधिक विनम्रतापूर्ण और निरंतर दबाव. जिन पाठकों ने इस लेखमाला को पसंद किया, कभी न लिख पाने की स्थिति में निरंतर फोन कर आग्रह किया, उनसे विनयपूर्वक क्षमायाचना के साथ कहना पड़ रहा है कि अब यह स्तंभ उन तक न पहुँच सकेगा -- क्योंकि मेरा जमीर गवारा नहीं करेगा कि ऐसी पत्रिका में लिखने के लिए जहाँ हिंदी साहित्य के एक अत्यधिक संवेदनशील मुददे के साथ ऐसी कुटिलता बरती जाए और वह भी इस शिल्प में कि आप नौ साल से अपने लिए नियमित लिख रहे लेखक को सूचित करने का साहस, सौजन्य और औपचारिकता बरतना भी जरूरी न समझें....


बहरहाल अब यह लेख ई-मेल, ब्लॉग आदि के जरिए हिंदी के पाठकों तक प्रेषित है और अतिशीघ्र इसकी बीस हजार प्रतियाँ पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कर वितरित की जाएँगी।




पाखंडी नैतिकता का अश्वमेध जारी है

- आलोक श्रीवास्तव


यह लेख पहल के बंद होने पर की गई प्रतिक्रियाओं पर लिखा गया है. पर यह इसका मूल विषय नहीं है. हिंदी का संसार साम्राज्यवाद द्वारा उत्पन्न परिस्थितियों के कारण जैसे जैसे तिरोहित होता जा रहा है -- अर्थात हिंदी में पाठक लगभग खत्म हो गए हैं, लेखन दोयम दर्जे का हो चुका है, उत्सव, पुरस्कार, जनसंपर्क आदि-आदि बढ़ते गए हैं, बौद्धिक परंपरा अस्तप्राय: है -- ऐसे में कुछ लोग नैतिकता का रोजगार कर रहे हैं. इन स्थितियों की जड़ों तक पहुँचने और हिंदी भाषा, उसके साहित्य और उसकी वैचारिकता को सुरक्षित रखने, पल्लवित करने के आधारभूत संघर्ष न कर अवसरवादी तरीके से और जड़ता के भरपूर आत्मविश्वास के साथ कुछ चुनी हुई चीजों को निशाना बनाते हैं और उसे इस तरह ध्वस्त कर देते हैं, जैसे उसका कुछ अर्थ ही न था. यह राजनीति कुछ के पक्ष में चुनी हुई चुप्पियों और कुछ के खिलाफ सोटा लेकर भागने वाले गुरू जी या गाँव के थानेदार की राजनीति है. यहाँ चीजों के वृहत्तर परिप्रेक्ष्य और संस्कृति की वास्तविक चिंताएँ नदारद हैं, है तो सिर्फ एक बहुत चालाक आत्मविश्वास जो चीजों का मूल्याँकन नहीं, अवमूल्यन करता है. यह लेख इस प्रवृत्ति के विरुद्ध है, पहल इसका एक तात्कालिक कारण मात्र है.


ज्ञानरंजन ने एक अपराध कर दिया है. उन्हें मृत्यु जब तक विवश न कर दे, तब तक पहल निकालते रहना चाहिए था ताकि हिंदी का साहित्यिक समुदाय यह कह सके कि जब वे दिवंगत हुए तो, वे पहल के आगामी अंक का प्रूफ मृत्युशैया पर भी देख रहे थे, वे अपने हाथों से लिफाफों पर पते लिख कर डाकखाने में डालने खुद जा रहे थे, वे हिंदी की एक महान आत्मा थे. अब चूँकि उन्होंने पहल को बंद करने का अपराध कर दिया है, तो हिंदी के बौद्धिक गण उन्हें सजा देना चाह रहे हैं. यह सजा कैसी हो, इस पर फिलहाल हिंदी के सार्वजनिक साहित्य क्षेत्र में बौद्धिकों का विमर्श जारी है.... मैंने उपरोक्त पंक्तियाँ लिखीं और सोचा कि इस पूरे मसले पर व्यंग्य की भाषा में पूरा लेख लिख दिया जाए. पर यह संभव नहीं हो पा रहा है. क्योंकि कुछ बहुत ठोस तथ्य सामने रखने पड़ेंगे. कुछ मुददे उठाने पड़ेंगे, कुछ टिप्पणियाँ देनी पड़ेंगी. कुछ प्रतिरोध करना पड़ेगा, और संभवतः हिंदी के आत्ममुग्ध बौद्धिकों के लिए कुछ ऐसी संज्ञाओं का सृजन करना पड़ेगा, जिसके वे उपयुक्त पात्र हैं. यह पूरा मसला इतना अश्लील, इतना कृतघ्नता से पूर्ण और इतना गर्हित है कि इसे नोटिस ही नहीं लिया जाना चाहिए था, पर चूंकि हिंदी की कुछ महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के संपादकों ने अपनी भरपूर मूढ़ता और अहंमन्यता जाहिर की है, अतः इसकी उपेक्षा संभव नहीं. मसला ज्ञानरंजन का नहीं है, मसला पहल का भी नहीं है. मसला हिंदी के उन बचे रह गए पाठकों का है, जो अब भी अपने कस्बों शहरों में हिंदी की इन पत्रिकाओं में छपने वाली चीजों से प्रभावित होते हैं. मैं इन पत्रिकाओं के संपादकों से सिर्फ यह पूछना चाहता हूँ कि इन पाठकों को आप बताना क्या चाह रहे हैं? ज्ञानरंजन और पहल पर आपकी टिप्पणियों का क्या अर्थ है? क्या आप सचमुच में हिंदी के पाठकों को इस योग्य समझते हैं, कि अपनी कोई भी लीद पूरे आत्मविश्वास के साथ उन पर कर ही देंगे, और सोचेंगे कि आपने एक बौद्धिक कर्म किया है. विचार किया है,चिंतन किया है और विमर्श में कुछ जोड़ा है?

राजेंद्र
यादव लिखते हैं --

  1. मैं भी सोचता हूँ, दो साल बाद क्या मैं भी ऐसी ही घोषणा हंस को लेकर कर दूँ ? आखिर पचीस वर्ष तक मैंने इसे अपनी साँस-साँस में जिया ही है. (महोदय, चूँकि यहाँ आप ज्ञानरंजन से अपनी तुलना कर रहे हैं तो आपको यह भी बताना चाहिए कि हँस आपने तब निकाली जब 55 की उम्र पार कर चुके थे, लेखक के रूप में आपका कुछ बन न पाया था और आपकी पत्नी मन्नू भंडारी कॉलेज में प्राध्यापक थीं, और अनेक मित्रों संस्थाओं का आपने भरपूर आर्थिक सहयोग प्राप्त किया था, जबकि पहल के साथ और ज्ञानरंजन के साथ ऐसी कोई परिस्थिति न थी. इस संदर्भ में तुलना के अनेक गंभीर बिंदु भी हैं, जिन्हें लिखना फिलहाल आपकी शान में गुस्ताखी होगा.)
  2. एक पत्रिका सिर्फ व्यक्तिगत प्रयास नहीं होती।
  3. पहलको बंद करना शायद पाठकों को ज्ञानरंजन का वैसा ही दंभ लगता है, जैसे आप राजधानी एक्सप्रेस में कलकत्ता जाने के लिए स्टेशन पर जाएँ तो पता लगे कि राजधानी हमेशा के लिए बंद हो गई है.
  4. कोई पत्रिका मरती तब है जब न नई स्थितियों की समझ हो, न नई रचनाशीलता के लिए सहानुभूति. यहाँ सबसे बड़ी बाधा बनती है अपनी पुरानी महानता और सिर्फ अपने को ही सही मानने की कुंठा. जब हर चीज पहले ही तय हो चुकी हो तो कहीं भी नया क्या होगा? (यहाँ फिर तुलना की गई है, तो आपको लगे हाथ यह भी बता देना चाहिए कि नई रचनाशीलता का अर्थ भी आप समझते हैं क्या? इसका अर्थ कुछ युवा लेखक-लेखिकाओं से तथाकथित दोस्ताना संबंध बनाना और उनकी रचनाओं को प्रमुखता से जगह देना ही नहीं है. आज के दौर में नई रचनाशीलता एक गहरे संकट से गुजर रही है, उसके रचनागत ही नहीं, सभ्यता और संस्कृतिगत गंभीर आयाम हैं, इसकी चिंता करना एक बात है और नए रचनाकारों को मंच मुहैया करना एक अलग बात. दोनों में घालमेल न करें. फिर आपको यह भी बताना चाहिए कि साठ वर्ष की उम्र तक आपके लेखन में जाति-चेतना और स्त्री-विमर्श का कतरा भी नजर नहीं आता, जबकि ज्योतिबा फुले, आंबेडकर आदि जाति-चेतना के लिए सैद्धांतिक कार्य कर चुके थे, इन दो बातों के लिए आपको यह इंतजार करना पड़ा कि जाति और पिछड़ों के नाम पर सत्ता और वर्चस्व की राजनीति का परिदृश्य बने और इसी प्रकार स्त्री-विमर्श के लिए ग्लोबलाइजेशन के तहत एक उठाईगीर संस्कृति स्त्री की छदम लिबरेटेड छवि उत्पन्न करे. महोदय आपकी रचनात्मक, वैचारिक और नैतिक बुनियादें बहुत कमजोर हैं, अतः दूसरों पर झूठे आरोप लगाने से बचें. आप ठीक से आत्मरक्षा तक नहीं कर पाएँगे.
    हंस आपने निकाला हिंदी संसार पर बहुत एहसान किया, परंतु इसके जरिए जो बड़े दावे आपने किए हैं, उनके परीक्षण का अधिकार भावी पीढ़ी के पास सुरक्षित है.)


समायांतर
में नवीन पाठक के नाम से पंकज बिष्ट लिखते हैं --

  1. अपनी सारी लोकप्रियता के बावजूद कोई नहीं जानता कि पहल वास्तव में कितनी छपती थी.
  2. अपने उच्च-भ्रू अंदाज और मंहगे दाम के कारण यह कभी भी आम हिंदी पाठक की पत्रिका नहीं बन पाई.
  3. पहल की सफलता का एक बड़ा कारण उसके लेखक थे, जो जाने-अनजाने प्रभावशाली वर्ग से आते थे, खासकर नौकरशाही से. इन कल्टीवेटेड ‘लेखकों’ ने पहल को जिलाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
  4. राजनीतिक संबंधों का भी इस सफलता में योगदान रहा है.
  5. पहल सदा से ही सॉफ्ट वाम की ओर झुकी पत्रिका रही है, पर शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि उनका संस्थानों से सीधा टकराव हुआ हो, या उन्होंने सरकारों का या सत्ता का सीधे और मुखर विरोध किया हो. (मान्यवर यहाँ आप सॉफ्ट वाम और हार्ड वाम का जो विभाजन कर रहे हैं, उसके बारे में थोड़ा विस्तार से आपको लिखना चाहिए था. आप किस हार्डवाम का प्रतिनिधित्व करते हैं? क्या हार्ड वाम की पत्रिका निकालने के लिए ही आपने एक महत्वपूर्ण सरकारी विभाग में जिंदगी भर बड़े पद पर नौकरी की और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर बाद के रिटायर्ड वर्षों में हार्ड वाम की सेवा को अपना मिशन बनाया? आपके आरोप ऊपर से सैद्धांतिक लगते हैं, पर अपनी अंतर्वस्तु में छिछोरे हैं)
  6. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा के होने के बावजूद कभी ऐसा नहीं हुआ कि उन्हें विज्ञापन लेने में किसी तरह की दिक्कत हुई हो.
  7. असल में पहल की बुनियाद में ही उसे सामान्य हिंदी पाठकों के लिए नहीं बनाया गया था.
  8. पहल ने पत्रिका को चलाने के जो तरीके अपनाए, उन्हें उनकी नकल करने वालों ने लगभग विकृति की हद तक पहुँचा दिया.
  9. पहल जैसी पत्रिकाओं से यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वे ऐसी व्यवस्था बनाएँ कि उनके संस्थापक संपादकों के बाद भी पत्रिका चलती रहे.
  10. असल में किसी भी संस्थान या सामाजिक प्रयत्न को बचाने के लिए ऐसी उदारता की जरूरत है, जो अपने परिवार जाति और संपद्राय से आगे बढ़ कर सोचने में समर्थ हो


रवींद्र
कालिया लिखते हैं --


हिंदी में लघुपत्रिकाओं की स्थिति विचित्र है. अनेक पत्रिकाएं ऐसी हैं, जिन्हें कुछ साहित्यानुरागी अथवा यशःप्रार्थी संपादक अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए प्रकाशित करते हैं. ऐसी पत्रिकाएँ भी बरसों बरस प्रकाशित होती रहती हैं और जब संपादक की इन्द्रियाँ शिथिल होने लगती हैं, तो पत्रिका एक दिन अचानक आँख मूँद लेती है.
उपरोक्त सारे कथन जो इन तीन विद्वानों ने लिखे हैं, न सिर्फ तर्क और तथ्य की कसौटी पर मिथ्या हैं, अपितु वैयक्तिक पूर्वग्रह और जबर्दस्त रूप से कमजहनी से उत्पादित हैं. पहल के बंद होने को ये विद्वान + एक्टिविस्ट संपादक गण कुछ दूर की कौड़ियों से जोड़ रहे हैं. पहल किसी संस्थान से नहीं निकलती थी, वह वैयक्तिक प्रयास थी. हिंदी में बहुत सी पत्रिकाएँ वैयक्तिक प्रयासों से निकली हैं और उन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी भूमिका निभाई है. पहल चूँकि हिंदी की लघुपत्रिकाओं में काफी पुरानी और सबसे महत्वपूर्ण पत्रिका रही, अतः उसका बंद होना पाठक, लेखक, शुभचिंतक किसी भी रूप में उससे जुड़े व्यक्तियों को निराशा और दुख से भर देने वाला है. इस दुख में हिंदी समाज की साझी अभिव्यक्ति होनी चाहिए. परंतु उपरोक्त कथनों से यह संकेत मिल रहा कि किन्हीं पुराने हिसाबों को चुकाने और किन्हीं कुंठाओं को अभिव्यक्त करने का अवसर पहल ने कुछ लोगों को दे दिया है, जो हिंदी के साहित्य समाज की ओर से स्वयंभुओं की तरह आप्त वाक्य बोल रहे हैं. पहल के बंद होने का इन्हें कोई रंज नहीं है. उपरोक्त कथनों में दो तरह की आपत्तियाँ हैं --
  1. पहल जब निकलती थी, तब उसके स्वरूप, उसके संचालन और उसके संपादक के पत्रिका को चलाने के तौर तरीके सही न थे.
  2. फिर भी पहल को बंद नहीं होना चाहिए था, उसके अनंत काल तक चलने का इंतजाम संपादक को कर देना चाहिए था, ऐसा न कर उसने घनघोर अनैतिकता, बेईमानी और दुष्टता का परिचय दिया है।


सबसे
पहले तो ये दोनों बातें उपरोक्त विद्वान गण एक साथ कह रहे हैं, जो अपने में एक बड़ा अंतर्विरोध है, और इस प्रकरण को इस तरह प्रस्तुत करने की उनकी मंशा को एकबारगी ही बहुत अच्छी तरह से उजागर कर देता है. परंतु फिर भी आइए मामले को थोड़ा तफसील में देखते हैं.



  1. पहल के चलने के दौरान विद्वान लोग उसके सॉफ्ट वाम, आम पाठकों की पत्रिका न होने और संपादक के तौर-तरीकों को लेकर खामोश रहे और 35 साल तक खामोश रहे, और अब उसके बंद होने पर वे इसे एक मुददे की तरह पेश कर रहे हैं. यह अवसरवाद नहीं तो, और क्या है?
  2. पहल मँहगी थी, इसलिए कभी आम पाठकों की पत्रिका नहीं रही. क्या हंस, ज्ञानोदय, समयांतर, वसुधा, वागर्थ, कथादेश आम पाठकों की पत्रिकाएँ हैं? आम पाठकों से आपका अभिप्राय क्या है? यह सभी जानते हैं कि ये सभी पत्रिकाएँ सीमित प्रसार वाली साहित्यिक वैचारिक पत्रिकाएँ हैं, जो दस प्रांतों के हिंदी क्षेत्र की 50 करोड़ की आबादी के बीच जो 5-7 हजार का साहित्य समाज बनता है, उसके बीच बिकती और पढ़ी जाती हैं. हम जिस समाज में रहते हैं, उसका ढांचा, सांस्कृतिक स्थिति और बहुत से कारणों के चलते हिंदी की गंभीर पत्रिकाओं को आम पाठक या विशाल पाठक नहीं खरीद पाते, पढ़ पाते. यह एक समस्या है, और समूचे युग की समस्या है, इसका निदान ढूँढने की बजाय, इससे चिंतित होने की बजाय इस तरह का गैरजिम्मेदारी पूर्ण निष्कर्ष पाठकों पर थोप देना इस किस्म की ओझागिरी ही है कि रोग इसलिए हुआ कि दक्षिण में हवा से पेड़ की एक टहनी टूटी.
  3. पहल मँहगी नहीं थी. बंद होने के समय लगभग 300 पृष्ठों की सामग्री, बेहतर कागज पर सुरुचिपूर्ण ढंग से छपकर हिंदी पाठकों तक 50 रुपए में पहुँचती थी. उन्हें यह कभी मँहगी न लगी, शायद समयांतर के संपादक न्यूजप्रिंट पर छपने वाली अपनी कम पेजी बुकलेटी पत्रिका के साथ पहल की तुलना कर रहे हैं., ‘समयांतर’ न्यूजप्रिंट पर छपती है. इसके पृष्ठ अत्यंत कम हैं, कवर सादा होता है. यदि उत्पादन लागत और बिक्री मूल्य की तुलना की जाएगी तो संभव है, समयांतर अधिक महंगी ठहरे.
  4. पहल ही क्यों हिंदी की कौन सी पत्रिका कितनी छपती है, यह कोई नहीं जानता, मुझे याद है कि 1988 में हंस कार्यालय में राजेंद्र यादव ने कहा था कि हंस 20 हजार छपता है, दो-एक साल पहले उन्होंने ही कहीं कहा कि 8 हजार. समयांतर जब शुरू हुआ तो उसके दो हजार छपने की बात संपादक ने स्वयं कही थी, अभी वह कितना छपता है, इसका ब्यौरा उन्हें हर अंक में छापना चाहिए, साथ ही समयांतर को मिलने वाले विज्ञापनों से आने वाली राशि का ब्योरा भी हर अंक में साथ ही प्रकाशित करना चाहिए, ताकि पहल की तरह की गलतफहमी समायांतर के पाठकों को न हो और जिस तरह की छिद्रान्वेषी नैतिकता के पैमाने पर वे दूसरों को कसते हैं, वे पैमाने उन पर भी लागू हों.
  5. यह काॅमनसेंस की बात है कि हिंदी में इस तरह की साहित्यिक / वैचारिक पत्रिकाएँ एक हजार से 2-3 हजार प्रकाशित होती हैं, हंस, कथादेश जैसे स्वरूप की हुईं तो शायद 7-8 हजार. देखिए तो सही इस साधारण सी बात को कैसा सनसनी का आशय देने वाले वाक्य के रूप में लिखा गया है -- अपनी सारी लोकप्रियता के बावजूद कोई नहीं जानता कि पहल वास्तव में कितनी छपती थी. यानी पाठक खुद निष्कर्ष निकाल लें कि या तो पहल नाममात्र को 200-300 प्रति छपती थी, ताकि विज्ञापनों की कमाई होती रहे. या फिर पचीसों-पचासों हजार छपती थी, और संपादक भरपूर कमाई करता था. हिंदी के परिदृश्य को जो भी व्यक्ति जानता है, और उपरोक्त कथन के निहितार्थ पर जो भी विचार करेगा, उसे यह तुरंत ही पता चल जाएगा कि यह बात किस कोटि की दुर्भावना और मैले मन से जन्मी है.
  6. पत्रिका अपने उच्च-भ्रू अंदाज के कारण हिंदी के आम पाठक की पत्रिका नहीं बन पाई. भाई साहब, लगे हाथ यह भी कह डालिए न कि दास कैपिटल अपने उच्च भ्रू अंदाज के कारण मजूदर वर्ग में लोकप्रिय नहीं हो पाया, उसे दार्शनिक, क्रांतिकारी, विद्वान लोग ही पढ़ते रहे. यह सच है कि समाज वर्गों से मिल कर बना है, और एक बहुत बड़ी आबादी ज्ञान से वंचित है, उसके समाजशास्त्रीय और ऐतिहासिक कारण हैं. इतना मूर्खतापूर्ण सरलीकरण, फिर बताता है कि टिप्पणीकार की कुछ प्रच्छन्न मंशाएँ हैं. पहल और समयांतर के हंस और कथादेश के पाठकवर्ग में बहुत फर्क नहीं है, आरा-छपरा से लेकर, इंदौर-भोपाल और दिल्ली-लखनऊ तक कमोबेश इन सभी पत्रिकाओं का एक कॊमन पाठक वर्ग ही है, जो बहुत हुआ तो 10-12 हजार का होगा. लोकप्रियता की यह गाज गिराएँगे तो सभी पत्रिकाएँ किसी न किसी तरह से उच्च-भ्रू ही ठहरेंगी. यदि आप स्तरीय सामग्री देने, गंभीर आलेख देने, दुर्लभ दस्तावेज प्रकाशित करने और दर्जनों महत्वपूर्ण विशेषांकों के प्रकाशन को उच्च-भ्रू अंदाज ठहराना चाहते हैं, तो यह दयनीय तो है ही, दुखद भी है. आप चाह रहे हैं, हिंदी में कोई गंभीर, कोई सुरुचिपूर्ण काम हो ही न. सिर्फ साहित्य अकादमी, अशोक वाजपेयी, ओम थानवी, गिरिराज किशोर, गोपीचंद नारंग और जनसत्ता से हिसाब चुकता किया जाए? (मान्यवर, राजेंद्र यादव, राजकमल-राधाकृष्ण प्रकाशन आदि पर गुजरे दस सालों में आपने कृपा क्यों नहीं की?)
  7. यदि आपका कहना यह है कि पहल के लेखक प्रभावशाली वर्ग से आते थे, और ये कल्टीवेटेड लेखक थे, तो महोदय 35 वर्षों में पहल में छपे लेखकों की एक संक्षिप्त सूची ही ‘समयांतर’ के भावी अंक में प्रकाशित कर दें, ताकि हिंदी के लोग जानें कि ये प्रभावशाली वर्ग के लेखक कौन हैं, जो कल्टीवेट किए गए. पहल में 35 वर्ष तक सैकड़ों लेखक छपे हैं। पाश, आलोकधन्वा, लीलाधर जगूड़ी, सव्यसाची, विष्णुचंद्र शर्मा,, राजेश जोशी, विजेंद्र, मधुरेश, वेणुगोपाल, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, मनमोहन, नरेंद्र जैन, देवीप्रसाद मिश्र, प्रदीप सक्सेना, भीष्म साहनी.... सूची लंबी है, मान्यवर, बेशक पहल में प्रभावशाली वर्ग के और कुछ अधिकारी वर्ग के लेखक भी छपे हैं. और क्या यह बात मुझे आपको बतानी चाहिए कि इनमें से अधिकांश साहित्य, लेखन और विचार के प्रति अपने समर्पण के कारण जाने जाते हैं, और जिन्हें आप प्रभावशाली वर्ग का कह रहे हैं, उनमें से अधिकांश अपने लेखन की गुणवत्ता के कारण ही पहल में छपे हैं, मैं इन लेखकों से तुलना नहीं कर रहा हूँ , परंतु आप का वश चले तो आप विश्व साहित्य से नेरुदा, आॅक्तावियो पाज जैसे लेखकों का नामोनिशान मिटा देंगे क्योंकि ये तो सुपरअधिकारी थे, अपने देशों के राजदूत. आप यहीं नहीं रुकते आप वस्तुतः कहना यह चाह रहे हैं, पहल के पाठकों और हिंदी के बौद्धिक समाज ने नहीं, इन कल्टीवेटेड नकली लेखकों ने अपनी रचनाएँ छपवाई और एवज में पहल को विज्ञापन आदि दिलवाकर उसे जिलाए रखा. मान्यवर यहाँ अश्लीलता और कुतर्कों की हद है. क्या आप विभिन्न सरकारों से समयांतर, हंस, आदि-आदि पत्रिकाओं को मिले विज्ञापनों का हिसाब और ब्यौरा देना चाहेंगे? आप कांग्रेसी धर्मनिरपेक्षता से पाए हुए विज्ञापनों को भाजपा की सांप्रदायिकता से पाए जाने वाले विज्ञापनों से श्रेष्ठ होने का तर्क देना चाहते हैं? भारतीय राजनीति की, महोदय, यह सबसे दुखती रग है, इस पाखंड की जनता के बीच तो खपच्चियाँ उड़ चुकी हैं, बौद्धिक वर्ग जनता से इतर अपने को द्वीप समझता हुए अपने ही कुतर्कों को इतिहास का और समय का सच समझे तो समझ ही सकता है.
  8. पहल की सफलता के पीछे राजनीतिक संबंधों का भी योगदान रहा है. यह सर्वाधिक गंभीर आरोप है. निश्चित रूप से जुमला बोल कर पाठकों को बरगलाना अनुचित है. आपको यहाँ तर्क, प्रमाण, कारण, संदर्भ सब कुछ देने ही चाहिए. कौन से राजनीतिक संबंध? किसके राजनीतिक संबंध? और क्या योगदान?
  9. पहल का सरकार से सत्ता से कभी सीधा टकराव नहीं हुआ. वाह जेहादी, वाह! आप कौन सी सरकार से और कौन सी सत्ता से टकरा रहे हैं? यह आप कह ही चुके हैं कि पहल आम पाठक की पत्रिका नहीं थी. और यह बात मैं कह रहा हूं कि हिंदी की कोई भी साहित्यिक पत्रिका या लघु पत्रिका आम पाठक की पत्रिका नहीं है. ये सभी पत्रिकाएँ एक सीमित बौद्धिक पाठकों के बीच संचरित होती और पढ़ी जाती हैं, इन पत्रिकाओं का सत्ता नोटिस तक नहीं लेती. कभी-कभी हंस और समयांतर में आप कतिपय अग्निमय लेख -- सत्ता से टकराने वाले लेख लिख देते हैं, महोदय तो -- इस पूरी आश्वस्ति के साथ, कि पत्रिका का एक क्लोज्ड सर्किल के बाहर नोटिस तक नहीं लिया जाता. यह क्लोज्ड सर्किल आपको बहुत बड़ा क्रांतिकारी एक्टिविस्ट मान लेगा, और आप गाँव-कस्बों के पाठकों के बीच सत्ता से टकराव का भ्रम पैदा कर अपनी छवि चमका लेंगे. बातें इतनी सीधी-सरल टू + टू नहीं, जैसा आप कह रहे हैं.
  10. छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार होने से कभी ऐसा नहीं हुआ कि पहल को विज्ञापन लेने में दिक्कत हुई हो. यह दुखद स्थिति है कि हिंदी की सारी पत्रिकाएं सरकारी विज्ञापनों पर आधारित हैं. समयांतर भी इसका अपवाद नहीं है और हंस तो बिल्कुल भी नहीं. यदि आप यह कहते हैं कि भाजपा सरकार होने से कभी ऐसा नहीं हुआ कि पहल को विज्ञापन लेने में दिक्कत नहीं हुई तो यह क्यों नहीं बताते कि यह कैसे हुआ कि हिंदी की बहुत सारी पत्रिकाओं की तुलना में बिल्कुल नई पत्रिका होने और कम प्रसार संख्या के बावजूद कांग्रेस सरकार के भरपूर विज्ञापन समयांतर को आरंभ से ही मिलते रहे? साम्राज्यवादी अर्थनीति द्वारा पैदा धर्मनिरपेक्षता की चाकरी को आप भाजपा की सांप्रदायिकता से श्रेष्ठ भले समझते हों, पर ये दोनों भुलभुलैयाएं हैं, इन दोनों से न निकल पाना इस राष्ट्र का एक गंभीर और करुण प्रसंग है. आप इसे सतही प्रगतिशील लफ्फाजी से निपटा कर अधिक से अधिक अपनी नकली छवि निर्मित कर सकते हैं.
  11. आप कह रहे हैं कि पहल को बुनियाद से ही आम पाठक के लिए नहीं बनाया गया था. आपकी ‘आम पाठक’ ग्रंथि का जवाब पहले दिया जा चुका है, पर यह काम आपकी पत्रिका ने क्यों नहीं किया? समयांतर कितनी छपती और बिकती है? फिर एक दूसरा संजीदा प्रश्न भी इससे जुड़ता है, कि न्यूज प्रिंट पर छपने और कम पृष्ठ होने के कारण समयांतर की लागत अत्यल्प है, पहल की तुलना में कई गुना कम. क्या यह नैतिकता का तकाजा नहीं है कि आप समयांतर को निरंतर मिलने वाले सरकारी विज्ञापनों का उपयोग समयांतर को कम से 10-20 हजार छाप कर आम पाठक के साथ न्याय करें. यहाँ यह कह देना समीचीन होगा कि समयांतर पर आने वाली लागत और विज्ञापनों से होने वाली आय के बीच के अनुपात की गणना करना बहुत मुश्किल काम नहीं है.
  12. आपको यह बताना चाहिए कि पहल ने पत्रिका को चलाने के लिए वे कौन से अनैतिक, गैरकानूनी, या गलत तरीके अपनाए. यह पूरा हिंदी बौद्धिक संसार जानता है कि पहल का प्रकाशन और उसका हिंदी की रचनात्मकता पर प्रभाव, पिछले पचास वर्षों के हिंदी साहित्य की सबसे ठोस, सबसे सम्माननीय घटनाओं में से है. आप इतना गंभीर आरोप किस जमीन पर खड़े हो कर लगा रहे हैं?
  13. इतनी सारी मिथ्या और अनर्गल बातों के बाद आप अंत में यह नसीहत देने से भी नहीं चूक रहे हैं: ‘‘पहल जैसी पत्रिकाओं से यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वे ऐसी व्यवस्था बनाएँ कि उनके संस्थापक संपादकों के बाद भी पत्रिका चलती रहे।’’ आप क्यों ऐसा चाहते हैं? एक पत्रिका जो आम पाठक के लिए नही है, जिसको निकालने के लिए गैरवाजिब तरीके अपनाए गए और यही नहीं जिसका लेखक वर्ग भी नकली है. उसके बंद होने पर तो आपको प्रसन्न होना चाहिए. यह दोहरापन क्यों? क्यों यह पाखंड? दरअसल आप निंदा का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते. आप चित भी मेरा पट भी मेरा वाली भाषा बोल रहे हैं. किसी पत्रिका को चलाए रखने की आपकी नेक मंशा को मान भी लिया जाए तो कई व्यावहारिक सवाल उठते हैं, आप बताएँ कि आप एक लेखक हैं, और आपकी संतानें हिंदी पढ़ने-लिखने में कितनी रुचि लेती हैं? उनका साहित्य और विचारों से कितना जुड़ाव है? हिंदी के पाखंडी लेखको! आपने अपने परिवारों में आगामी पीढ़ी को साम्राज्यवाद की चाकरी के लिए बड़े कौशल के साथ तैयार किया है, आप किस पाठक वर्ग के लिए हिंदी की पत्रिकाओं की अमरता चाहते हैं? दूर-दराज के कस्बो के गरीबों के बच्चों के लिए ताकि वे आपकी आदर्शवादी बातें पढ़ें और आपको अपना रहनुमा मानें? ये सारे जीवन के वे गंभीरतम सवाल हैं, जिनके बारे में हिंदी का अधिकांश लेखक समुदाय सोचना तक नहीं चाहता और आसमान पर बैठकर हवाई बातें करता है.
  14. आपने बड़ी आप्त शैली और वाक्य विन्यास में लिखा है, ‘‘असल में किसी भी संस्थान या सामाजिक प्रयत्न को बचाने के लिए ऐसी उदारता की जरूरत है, जो अपने परिवार जाति और संप्रदाय से आगे बढ़ कर सोचने में समर्थ हो।" शायद आपके इस समूचे विरोध की सबसे महत्वपूर्ण, सार्थक बात यही है. अब पहल तो बंद हो गई. और वह आम पाठकों की पत्रिका भी न थी. क्यों नहीं समयांतर के लिए ऐसा प्रबंध करते? ऐसी उदारता के साथ, जो अपने परिवार जाति और संप्रदाय से ऊपर उठी हुई हो! निजी बातें कहना शोभा नहीं दे रहा है. पर कुछ मसले ऐसी जगहों पर आकर अटक जाते हैं कि निजी का हवाला सत्य की एकमात्र कसौटी बन जाता है. बेचारे ज्ञानरंजन तो मध्यप्रदेश के कस्बाई शहर जबलपुर के एक मामूली से घर में रहते हैं. रुपया-पैसा भी उन्होंने नहीं जोड़ा, पहल को विज्ञापन जरूर मिलते रहे, पर ज्ञानरंजन की मूर्खता यह कि उत्तरोत्तर पहल को अधिक बेहतर कागज पर छापने, पृष्ठ बढ़ाने, सज्जित करने, फिर अलग से पुस्तिकाएँ छापने में इस सारे पैसे को जाया कर देते रहे. समयांतर के संपादक महोदय के दिल्ली में दो फलैट हैं. दोनों की कुल कीमत सवा करोड़ रुपए से अधिक है. इसके अलावा आपने सरकार के एक महत्वपूर्ण पद से ऐच्छिक सेवानिवृत्ति भी ली है. बाकी संसाधन भी कम नहीं हैं. इस सपंत्ति में से कम से कम आधे या फिर पूरे का भी उपयोग आप समयांतर के लिए एक ट्रस्ट बनाने में कर सकते हैं. और हिंदी को सचमुच एक ऐसी पत्रिका दे सकते हैं, जो कम से कम एक-दो करोड़ रुपए की मजबूत आर्थिक नींव पर खडी हो, जो जनता के मुददे उठाए, जो लाखों आम पाठकों तक पहुंचे, जिसका प्रसार कम से 2-3 लाख हो और जिसकी कही बातों का सामाजिक मूल्य बने और यह मूल्य उसे सत्ता और सरकार को सचमुच चुनौती देने की स्थिति में भी लाकर खड़ा कर दे.


पहल
जबलपुर जैसे छोटे कस्बाई शहर से एक ऐसे समय निकली जब उसकी सख्त जरूरत थी. जरूरत इसलिए थी कि मार्क्सवादी साहित्यिक मूल्यों पर आधारित समकालीन रचनाधर्मिता के लिए एक रचनात्मक केंद्र बन सके. पहल ने अपनी यह भूमिका पूरी गरिमा के साथ निभाई. मैं जानता हूँ कि हिंदी का हर संवेदनशील पाठक जो पहल की भूमिका को जानता है और ज्ञानरंजन को जानता है, वह भले पहल से असहमत हो, ज्ञानरंजन से उसकी असहमतियाँ हों, इस पूरे प्रकरण से आहत हुआ है -- देश भर में. क्या पहल की विदाई पर इस तरह की टुच्ची राजनीति शोभनीय लग रही है? क्या यह सचमुच कोई वैचारिक मसला है? पहल का बंद होना हिंदी के साहित्य समाज के लिए कितना बड़ी क्षति है, वह यह जानता है, पर क्या सचमुच इस प्रकरण का इस्तेमाल दमित कुठाओं को निकालने के लिए किया जाना चाहिए. मैं जानता हूँ इन प्रतिक्रियाओं के मनोवैज्ञानिक कारण क्या हैं. एक सुरक्षित जीवन जीते हुए, व्यवस्था से चैतरफा लाभ लेते हुए, संपत्ति और परिवार के ढांचे में तयशुदा व्यक्तित्व जीते हुए खुद की छवि रूसो, वाल्तेयर या प्रबोधन काल के बौद्धिकों जैसी कस्बाई पाठकों पर प्रक्षेपित करने की दयनीय चेष्टा ही इसका मनोवैज्ञानिक कारण है. हिंदी के ये पिददी बौद्धिक नहीं जानते कि विचारों और सिद्धांतों के लिए जीना एक दूसरी बात होती है और उन्हें इस्तेमाल करते हुए जीना एक दूसरी बात.


इन टिप्पणियों की सबसे बड़ी खामी यह है कि ये टिप्पणियाँ व्यक्तिवादी किस्म की हैं और चरित्र-हनन के प्रच्छन्न उद्देश्य से लिखी गई हैं. इन टिप्पणियों में इस बात की कोई चिंता नहीं है कि साम्राज्यवाद ने राष्ट्रों की संस्कृति के साथ, भाषा के साथ और मानवीय सर्जनात्मकता के साथ क्या कर दिया है. यानी यह कि आज हिंदी साहित्य, समाज और संस्कृति किस हाल में है. क्या पहल एक अकेले ज्ञानरंजन की जिम्मेदारी है? क्या हिंदी में बड़ी-बड़ी सैद्धांतिक और किताबी बातें बघारने वाले लोग वास्तव में इस बात से चिंतित हैं, कि इस भाषा और इसके साहित्य के साथ प्रकारांतर से इसकी वैचारिकता और सर्जनात्मकता के साथ क्या हो गया है? क्या इस गहरे सांस्कृतिक संकट को लेकर वे कर्म के स्तर पर कहीं सचमुच चिंतित हैं, संबद्ध हैं? क्या ये लोग कभी इस बात को सोचना भी चाहेंगे कि क्यों 35 वर्षों तक निकलने के बाद 50 करोड़ के हिंदी समाज में वह इतना क्यों नहीं बिक सकी कि एक बड़े संस्थान का रूप ले पाती और जिसकी अनंतजीविता एक व्यक्ति ज्ञानरंजन पर नहीं बल्कि उसके समाज की होती. क्यों हंस को एक संस्थान का रूप ग्रहण करने के लिए, प्रभा खेतान, गौतम नवलखा, आदि न जाने कितनों के पैसे पर अवलंबित रहना पड़ा ? इस समाज में इतनी शक्ति क्यों नहीं है? यह कैसा हिंदी समाज है? हिंदी की कोसों फैली उजाड़ भूमि के बीच यह कौन पंकज बिष्ट, कौन राजेंद्र यादव कौन रवींद्र कालिया हैं, जो ध्वंस के इतने महानाटय के बीच इतने आत्मविश्वास से इतनी कुतर्कपूर्ण बातें लिख देते हैं, और इस बात के लिए निश्चिंत हो जाते हैं, कि वे हिंदी के कमजहन पाठकों का प्रबोधन कर रहे हैं. हम क्यों नहीं संस्थाएँ पैदा कर पाते, हम क्यों नहीं उन्हें मजबूत आर्थिक आधार दे पाते, क्योंकि हम सब उन सेठों की तरह हैं, जिनकी जिंदगी के मूल कार्यस्थल और प्रेरणाएं कहीं और हैं, कुछ और हैं, और जो धर्मशालाए और प्याउ खुलवाकर अमरत्व पाना चाहते हैं, हमारे बुद्धिजीवीगणों का जीवन के प्रति ठीक यही नजरिया है, साहित्य और संस्कृति, विचार और प्रतिबद्धता उनके संपूर्ण जीवन का एक छोटा-सा कोना भर हैं, उसके बल पर वे काल से अमरत्व का सौदा करने चले हैं. आज जो संकट या संकट न कहें स्थिति कह लें, पहल के साथ हुई, वही कल हंस के साथ, समयांतर के साथ होगी ही। इसी भाषा में सांचा जैसी बेमिसाल पत्रिका हिंदी के साहित्यवादियों की जिन बेहूदगियों से बंद हुई उसकी स्मृतियाँ और प्रमाण बहुतों के पास अब भी होंगे. राजेंद्र यादव आज भी इस मसले पर पूरे आत्मविश्वास से झूठ का उत्पादन करते हैं. मेरा मानना है कि हिंदी के लिए पहल से ज्यादा जरूरी सांचा थी, छाती पीटने वाली इन विभूतियों ने सांचा को क्यों नहीं बचाया?


जिन दिनों सांचा बंद हुई, उन दिनों उसके किन्हीं आखिरी अंकों में छपी एक अपील आज भी मेरे पास सुरक्षित रखी है. इस अपील में हिंदी के पाठकों से सांचा को बचाने के लिए पुरजोर आहवान किया गया था और इस बात की पुकार की गई थी, कि पाठक चंदा भेज कर ट्रस्ट निर्माण में सहयोग दें, जो सांचा को जारी रख सके. मुझे उस समय भी इस अपील पर हैरत हुई थी, और आज इस तरह के तमाम पांखडों के एक-एक रेशे को मैं जानता हूँ। उस अपील पर हिंदी की बड़ी-बड़ी विभूतियों के हस्ताक्षर थे -- पचासों के. वे किन अनाम पाठकों से गुहार कर रहे थे? किनका वे आह्वान कर रहे थे? अगर उन आह्वानकर्ताओं ने, जिनमें से अधिकांशतः तब भी बहुत पुख्ता माली हालत में थे, अपनी गाँठ से 10-20 हजार भी निकाले होते तो एक मजबूत ट्रस्ट का निर्माण संभव था, और निश्चित रूप से दूर-दराज के पाठक भी धीमे-धीमें इसमें अपना योगदान देते. परंतु ऐसे प्रयासों की विश्वसनीयता ही स्थापित नहीं हो पाती. क्योंकि ये प्रयास नहीं पाखंड मात्र होते हैं. हंस की महानता का अनवरत ढिंढोरा पीटने वाले राजेंद्र यादव यह कभी नहीं बताएंगे कि क्यों हंस हिंदी पाठकों के लिए इतनी अनिवार्य थी, कि उसके लिए युवा छात्र नेता चंद्रशेखर के हत्यारों के संरक्षक मुख्यमंत्री के हाथों लिए गए गर्हित पुरस्कार से लेकर तमाम तरह के स्रोतों से धन लेने को वे बड़ी वीतरागिता से हंस के जीवन के के लिए जरूरी मानते हैं, उनके अक्षर प्रकाशन से ही निकली सांचा किस तर्क से हिंदी पाठकों के लिए कम जरूरी थी? सांचा के प्रकाशन को हिंदी के समस्त साहित्य समाज ने, समूचे बौद्धिक जगत ने एक ऐसी परिघटना के रूप में लिया था, जो हिंदी में एक ठोस क्रांतिकारी बौद्धिकता के निर्माण के लिए अनिवार्य स्रोत और प्रेरणा का काम करेगी. कुछ माह पूर्व ही, सांचा के बारे में वे हंस के संपादकीय में लिखते हैं कि वह गौतम नवलखा की किन्हीं वैयक्तिक महत्वाकांक्षा से जुड़ी चीज थी, फरवरी 1989 में हौजखास में मन्नू भंडारी के घर पर उन्होंने मुझसे और मेरे एक मित्र से कहा था कि हंस से जुड़े होने के बावजूद गौतम की अकादमिक महत्वाकांक्षा पूरी न हो पाने के कारण उन्होंने सांचा निकाली. देखिए तो झूठ और पाखंड की कैसी छटा है! हिंदी का संपूर्ण बौद्धिक समाज एक विराट पाखंड को जी रहा है. ऐसी स्थिति में पहल के बारे में कहे गए सारे आप्तवचन असत्य ही नहीं, अश्लील, गैरजिम्मेदारी से भरे और विद्वेषपूर्ण हैं. और ये सारे कथन आत्मश्लाघा की मानसिकता से उपजे हैं, न कि सचमुच किसी सर्जनात्मक चिंता से.


राजेंद्र यादव किस मुँह से पहल जैसी तीन-चार हजार छपने वाली पत्रिका का स्यापा विधवाओं की शैली में कर रहे हैं. क्या मैं इस बात को किसी भी दिन भूल पाऊँगा कि धर्मयुग के बंद होने पर किस तरह की अमानवीय चुप्पी उन्होंने ओढ़ी थी और अपने कार्यालय में कथाकार अखिलेश से मुझे बेइज्जत करवाया था, क्योंकि मैं उनसे एक मामूली से विरोध-पत्र पर हस्ताक्षर करने का अनुरोध करने के लिए मुंबई से हंस-कार्यालय गया था. जबकि धर्मयुग के बंद होने से वहाँ के कर्मचारी बेरोजगार हुए थे, और पूरे देश में यह मैसेज गया था कि हिंदी की पत्रिकाएँ चल ही नहीं सकतीं. कहाँ था तब राजेंद्र यादव का वह पत्रिका-प्रेम, जो पहल के बंद होने पर इस कदर बिलख उठा है!


मेरा मसला इन तथाकथित बौद्धिकों की आलोचना करना नहीं है, क्योंकि समय हर छद्म को एक दिन उधेड़ ही देता है, सुरक्षित संबंधों, सुरक्षित जिंदगियों वाली क्रांतिकारिता की पोल खुलती ही है. लोगों की वास्तविक मंशाएँ उजागर होती ही हैं. मैं सिर्फ इस बात को रेखांकित करना चाह रहा हूँ, कि हमारी भाषा के लिए यह संकट काल है, किसी भी पत्रिका का बंद होना, न चलना, कुछ बड़े सवालों से जुड़ता है, क्या हमें इस बात के बारे में नहीं सोचना चाहिए?


कृष्णा सोबती ने अहा जिंदगी में लिखा है कि लेखकों को पाँच पाँच हजार जमा कर एक ट्रस्ट जैसा बना कर पत्रिका निकालनी चाहिए. मैं हिंदी के बौद्धिक क्षेत्र में पिछले 20 सालों से वाकिफ रहा हूँ. मैं ऐसे सैकड़ों लेखकों को जानता हूँ , जो साहित्य के चेग्वेरा हैं, इतनी बड़ी बड़ी बातें, इतने गहन लेख, इतने विराट सेमिनार, चिंता का इतना बड़ा कारोबार! क्यों 5-5 हजार रुपए भाई? हिंदी के वरिष्ठ लेखकों, आपमें से कम से कम दस दर्जन लोगों को मैं जानता हूँ, जो राजधानियों में 50 लाख से एक करोड़ के फ्लैट में रहते हैं, जिनकी पूरी माली हालत का आकलन 2 से 3 करोड़ के बीच बैठेगा, जिनकी अगली पीढ़ी अमरीका में मोटा पैसा काट रही है, या काटने के लिए तैयार हो रही है, तो भाई साहित्य के नाम पर चिंता का कारोबार न कर क्यों नहीं 4-5 लाख प्रति लेखक चंदा किया जाए? हिंदी समाज में एक 3-4 हजार की बिक्री वाली पहल नहीं, बल्कि एकाध लाख के प्रसार वाली पत्रिका क्यों नहीं निकाली जा सकती? यह बात बहुतों को मजाक और अतिरेकी लगेगी. इतनी मोटी रकम भी भला गाँठ से कोई निकालता है? तो फिर बड़ी-बड़ी चिंताएँ मत करिए. सच की चाशनी में इतना झूठ मत परोसिए और चरित्र हनन को सैद्धांतिक भाषा में मत सजाइए.


अंत में यह कहना आवश्यक है कि पहल के बंद होने को जो रूप देने की कोशिश की जा रही है, वह जनता से कटे हिंदी के बौद्धिक वर्ग की उस प्रकृति को ही उजागर करती है, जो आत्मनिष्ठ है, और जिसके लिए विचारधारा और सृजन एक साफ्ट किस्म के वैयक्तिक रोजगार से ज्यादा महत्व नहीं रखते. यह लेख हिंदी साहित्य की दो परंपराओं -- कर्मठता, श्रम, और निवैयक्तिक प्रयत्न तथा दर्प, और छिछोरेपन के फर्क को रेखांकित करने और उसमें से एक धारा को अपने और अपनी पीढ़ी के लिए चुनने के लिए लिखा गया है, अन्यथा किसी ज्ञानरंजन या पहल को न तो ऐसे बचावों की जरूरत है, न अपने पक्ष में किन्हीं बयानों, तर्कों, दस्तावेजों की और न ही आत्ममुग्ध कुतर्कियों को अपने पराभव के लिए समय और काल के प्रहार के इतर किसी प्रहार की.




- आलोक श्रीवास्तव
, ईडन रोज़ ,वृन्दावन काम्प्लेक्स
एवर
शाइन सिटी,
वसई रोड (पूर्व), ( जिला- ठाणे )
पिन .. 401 208 ; (वाया मुंबई )
फ़ोन ०९३२००१-६६८४ / २५०- २४६२४६९
ईमेल - samvad.in@gmail.com





अब अगर आलोक तोमर को यह कविता न लगे तो

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अब अगर आलोक तोमर को यह कविता न लगे तो कोई क्या करे




आज कुछ घंटे पूर्व हिन्दी भारत याहू समूह पर आलोक तोमर जी ने अपनी एक कविता सदस्यों से बांटी और भेजते हुए अपनी विनम्रता में, ऊपर यह लिखा कि "अब अगर आलोक तोमर को यह कविता लगे तो कोई क्या करे "मुझे आश्चर्य हुआ कि इतनी बढ़िया कविता लिख कर आलोक जी यह विनम्रता बरत कर ठीक नहीं कर रहे हैं। सो, उस कविता को यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ आप सभी निश्चय करें कि आलोक जी वास्तव में कवि हैं ना!!

आलोक जी का परिचय तो राजनीति में रूचि रखने वाले सभी लोग बढ़िया से जानते ही होंगे , जो न जानते हों वे

परिचय यहाँ देखें

भाग -

भाग -








पराजय
का उत्सव गीत
( पता भी नहीं ये कविता है भी या नहीं)

- आलोक तोमर








मैं अचानक हार जाता हूँ
और तुमसे हारने का
एक, चुप
उत्सव मनाता हूँ



गुदगुदाता है यूँ तुमसे हारना
हार कर
खुद से उलझना
और फिर
भीगे पलों में
चंद्रमा की साक्षी में
किलक बतियाना
या तो सपना है
है या हकीकत
नहीं कोई दाम
न कोई कीमत



अपने अन्दर की नदी में
बिना तैरे
जिन तटों को कभी देखा ही नहीं
जिन द्वीप-टापू को नहीं जाना
हारने की ही शक्ति लेकर
नदी की हर लहर से सुलझ कर
तैरता हूँ
पार जाता हूँ
मैं अचानक हार जाता हूँ
और
तुमसे हारने का
एक, चुप
उत्सव मनाता हूँ






रस ही जीवन / जीवन रस है

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रस
ही जीवन / जीवन रस है






निष्प्रयास स्वीकृति प्रेम को आलसी बना देती है। इसीलिए अनेक समझदार लोगों ने सलाह दी है कि स्त्री-पुरुष को एक साथ नहीं रहना चाहिए और साथ रहने की मजबूरी हो तो रोज एक साथ एक ही बिछावन पर सोना नहीं चाहिए। पूरी तरह स्वकीय और पूरी तरह परकीय, दोनों बुरे हैं। हर स्त्री और हर पुरुष को थोड़ा स्वकीय और थोड़ा परकीय बने रहना चाहिए। नहीं तो आकर्षण की डोरी अतिशय तनाव से टूट कर गिर सकती है और बहुत ज्यादा ढीली हो जाने पर लुंज-पुंज हो जा सकती है। दोनों ही संस्करण घातक हैं। वे डोरी के गुण-धर्म को नष्ट कर डालते hain





भारत में होली सबसे सरस पर्व है। दशहरा और दीपावली से भी ज्यादा। दूसरे त्योहारों में कोई न कोई वांछा है। या वांछा की पूर्ति का सुख। होली दोनों से परे है। यह बस है, जैसे प्रकृति है। अस्तित्व के आनंद का उत्सव। वांछा और वांछा की पूर्ति, दोनों में द्वंद्व है। यह जय-पराजय से जुड़ा हुआ है। दोनों ही एक अधूरी दास्तान हैं। सच यह है कि दूसरा हारे, तब भी हमारी पराजय है। कोई भी सज्जन किसी और को दुखी देखना नहीं चाहता। किसी का वध करके उसे खुशी नहीं होती। करुणानिधान राम ने जब रावण पर अंतिम प्राणहंता तीर चलाया होगा, तो उनका हृदय विषाद से भर गया होगा। उनके दिल में हूक उठी होगी कि काश, रावण ने ऐसा कुछ न किया होता जो उसके लिए मृत्यु का आह्वान बन जाए; काश, उसने अंगद के माध्यम से भेजे गए संधि प्रस्ताव को मंजूर कर लिया होता; काश, उसने विभीषण की सत सलाह का तिरस्कार नहीं किया होता। अर्जुन का विषाद तो बहुत ही प्रसिद्ध है। युद्ध छिड़ने के ऐन पहले उसे अपने तीर-तूरीण भारी लगने लगे। उसके मन में उचित ही यह भाव पैदा हुआ कि अपने संगे-संबंधियों को मार कर सुख पाना एकदम अनैतिक है। यह भावना जितनी ज्यादा फैले, दुनिया के लिए उतना ही अच्छा है। श्मशान में सभ्यता का विकास नहीं होता। फिर भी महाभारत इसीलिए हो पाया, क्योंकि कृष्ण अपने सखा को यह समझा सके कि अन्याय का प्रतिरोध करना अगर जीवन-मरण का प्रश्न बन जाए, तब भी संघर्ष से भागना नहीं चाहिए। नतीजा यह हुआ कि कुरुवंश के लोग दिन में एक-दूसरे की जान लेते थे और रात को उनकी याद कर आँसू बहाते थे। इस तरह, द्वंद्व और उनका शमन जीवन प्रक्रिया को आगे बढ़ाता था। होली की विशेषता यह है कि यहाँ किसी प्रकार का द्वंद्व नहीं है; सामाजिक नैतिकता के नाम पर लादी हुई अनैतिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप द्वंद्व है भी, तो उसका शमन नहीं, समाहार है। हृदय की मुक्तावस्था को क्या कहते हैं, मुझे नहीं मालूम, पर यह अनुभव जरूर है कि होली को मन से मनाया जाए, तो कुछ ऐसी ही अवस्था पैदा होती है।


श्वसुर साल भर श्वसुर रहता है, पर होली के दिन वह देवर बन जाता है। (फागुन में ससुर जी देवर लगें) इसका मतलब यही है कि उसमें देवरपन हमेशा मौजूद था, पर वह उभरता तब है जब उसे आवश्यक उद्दीपन मिलता है। यह उद्दीपन बहू देती है। इसका मतलब यह भी है कि बहू में भी सनातन नारी साल भर जीवित रहती है, पर बाहर आने के लिए वह उचित मौसम का इंतजार करती है। यह मौसम फागुन के अलावा और क्या हो सकता है?



होली का त्यौहार मनाने के लिए वसंत ऋतु को चुना गया, तो इसके ठोस कारण हैं। इन कारणों से हर कोई अवगत है। ये कारण मुख्यत: बाहर से आते हैं। लेकिन वे प्रभावी तभी होते हैं जब भीतर संचित कोई अद्भुत चीज अंगड़ाई ले कर जाग उठती है। कामना, विचार, हर्ष. विषाद सब कुछ हमारे भीतर ही है। लेकिन जागते वे तब हैं जब बाहर से उन्हें उद्दीपन और आलंबन मिलता है। बाहर और भीतर का विभाजन वास्तविक से ज्यादा कृत्रिम है। तभी तो यह विभाजन अकसर चिटख जाता है। श्वसुर साल भर श्वसुर रहता है, पर होली के दिन वह देवर बन जाता है। (फागुन में ससुर जी देवर लगें) इसका मतलब यही है कि उसमें देवरपन हमेशा मौजूद था, पर वह उभरता तब है जब उसे आवश्यक उद्दीपन मिलता है। यह उद्दीपन बहू देती है। इसका मतलब यह भी है कि बहू में भी सनातन नारी साल भर जीवित रहती है, पर बाहर आने के लिए वह उचित मौसम का इंतजार करती है। यह मौसम फागुन के अलावा और क्या हो सकता है?



बताते हैं, प्रकृति हर्ष और विषाद से परे हैं। उसे न दुख होता है न सुख होता है। लेकिन क्या पता। प्रकृति के बारे में हमारी जानकारी इतनी संक्षिप्त है कि उसके आधार पर कोई बड़ा फैसला नहीं किया जा सकता। हम यह तो जान गए हैं कि कीट-पतंगों को, पेड़-पौधों को भी दुख-सुख होता है, वे हर परिवर्तन से संवेदित होते हैं। लेकिन सभी प्राणी, जिनमें उद्भिज भी शामिल हैं, अगर प्रकृति की कोख से ही जन्म लेते हैं, तो यह कोख किसी भी स्तर पर इतनी बाँझ नहीं हो सकती कि वह बिलकुल संवेदनहीन हो जाए। मार्क्स ने ठीक पहचाना था कि पदार्थ से ही चेतना पैदा होती है। तो फिर पदार्थ खुद अचेतन कैसे हो सकता है?



प्रकृति की यह सचेतनता वसंत ऋतु में पूरे शबाब में होती है। अन्य सभी ऋतुओं में कुछ न कुछ द्वंद्व होता है। गरमी, बारिश, जाड़ा -- सभी आवश्यक हैं और इस नाते प्रिय भी, पर अतिरेक में वे कष्ट भी देते हैं। वसंत ही एकमात्र ऋतु है जिसका कोई अतिरेक नहीं हो सकता। सभी चीजों का उत्कर्ष होता है, पर उत्कर्ष का उत्कर्ष क्या होगा? सागरमाथा (एवरेस्ट) अपनी ऊँचाई को कैसे लांघ सकता है? वसंत ऋतु परिवर्तन के पूरे चक्र का उत्कर्ष है। इसी के लिए प्रकृति साल भर तैयारी करती है, जैसे मानवी का शरीर सोलह साल तक साधना करता है ताकि उस पर यौवन का फूल खिल सके या जैसे जननी नौ महीने तक हर रंग से गुजरती है तब कोई शिशु धरती पर प्रगट होता है और सभी के दिलों पर छा जाता है। वसंत प्रकृति का यौवन भी है और उसकी रचनात्मकता का चरम उभार बिंदु भी। उसमें कोई द्वंद्व नहीं है। आनंद ही आनंद है। रस ही रस है। जीवन ही जीवन है। इसीलिए मनुष्य ही नहीं, संपूर्ण जीव जगत के साथ उसकी अनुकूलता है। वसंत में जैसे प्रकृति खुलती है, उसकी कंचुकियाँ छोटी पड़ जाती हैं, वैसे ही हम भी खुलते हैं, हमारे लिए हमारा परिवेश छोटा लगने लगता है। यह वह सर्वश्रेष्ठ उपहार है जो सृष्टि अपने आपको देती है। वरना तो बाकी सृष्टि में आँखों को जला देनेवाली रोशनी है -- जहाँ-जहाँ तारे हैं, या फिर उनके बीच का ठोस सघन अँधेरा, जिसमें कोई अपने आपको भी देख नहीं सकता। हम धरतीवालों को अपनी किस्मत पर इतराना चाहिए।


लेकिन सिर्फ अपनी पत्नी से होली खेल कर कौन उल्लास में डूब सकता है? सिर्फ अपने पति से होली खेल कर कौन बीरबहूटी बन सकती है? अतिशय निकटता नए आविष्कार करने की क्षमता को कुंद कर देती है। निष्प्रयास स्वीकृति प्रेम को आलसी बना देती है। इसीलिए अनेक समझदार लोगों ने सलाह दी है कि स्त्री-पुरुष को एक साथ नहीं रहना चाहिए और साथ रहने की मजबूरी हो तो रोज एक साथ एक ही बिछावन पर सोना नहीं चाहिए। पूरी तरह स्वकीय और पूरी तरह परकीय, दोनों बुरे हैं। हर स्त्री और हर पुरुष को थोड़ा स्वकीय और थोड़ा परकीय बने रहना चाहिए। नहीं तो आकर्षण की डोरी अतिशय तनाव से टूट कर गिर सकती है और बहुत ज्यादा ढीली हो जाने पर लुंज-पुंज हो जा सकती है। दोनों ही संस्करण घातक हैं।





धरती इसलिए अनोखी है, क्योंकि सृष्टि भर में यहीं जीवन है। यहीं रस है। यह रस सबसे ज्यादा नर-नारी के बीच पैदा होता है, क्योंकि प्रकृति की अभी तक की योजना यही है। उसने पशु-पक्षियों में भी, पेड़-पौधों में भी युग्म बनाए हैं, पर इन युग्मों में वह आकर्षण, वह ताकत, वह निरंतरता नहीं है, जो मानव युग्म में दिखाई देता है। हो सकता है, लाखों-करोड़ों वर्ष पहले हमारे पूर्वज स्त्री-पुरुष भी जब-तब ही एक-दूसरे की ओर प्यार और लालसा की निगाहों से देखते रहे हों, पर वह संस्कृति के ककहरे का युग था। संस्कृति के निरंतर विकास ने न केवल शरीर को कोमल और सुंदर बनाया है, बल्कि दो शरीरों के बीच कला का इतना बड़ा सागर पैदा किया है जिसमें हम निरंतर ऊभ-चूभ होते रहते हैं। इसीलिए हमारे एक पूर्वज ने आह भरते हुए कहा था कि जो मनुष्य साहित्य, संगीत और कला से विहीन है, वह सींग-पूँछ रहित जानवर की तरह है। होली इसी सांस्कृतिकता का उत्सव है। जो होली के दिन सूखे पेड़ की तरह अपना और दूसरों का मूड खराब किए रहता है, उसे नरक का अनुभव करने के लिए जीवनोत्तर जीवन की प्रतीक्षा नहीं करनी होती। वह आँख वाला हो कर भी अंधा है, कानवाला हो कर भी बहरा है और हृदय होते हुए भी पत्थर है। वह समाज में होते हुए भी समाज से बाहर है, अपने भीतर होते हुए भी अपने को नहीं पहचानता। खुदा ऐसे लोगों को माफ करे -- ये नहीं जानते कि ये क्या खो रहे हैं।



नर-नारी का आकर्षण एक विशिष्ट प्रकार का आकर्षण है, जिसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। इसीलिए सभी भक्त ईश्वर को अपना माशूक मान कर उसकी मादक अनुभूति से घिरे रहते हैं। कबीर को लगता था कि राम उनके प्रियतम हैं और वे राम की बहुरिया हैं। कृष्ण को तो पति मान कर ही भजने की प्रथा है। ईसाई संतों को ईश्वर की वधू होने का अनुभव होता था। ये सभी अभिव्यक्तियाँ प्रगाढ़तम संबंध की जानी-पहचानी अनुभूति हैं। लेकिन सिर्फ अपनी पत्नी से होली खेल कर कौन उल्लास में डूब सकता है? सिर्फ अपने पति से होली खेल कर कौन बीरबहूटी बन सकती है? अतिशय निकटता नए आविष्कार करने की क्षमता को कुंद कर देती है। निष्प्रयास स्वीकृति प्रेम को आलसी बना देती है। इसीलिए अनेक समझदार लोगों ने सलाह दी है कि स्त्री-पुरुष को एक साथ नहीं रहना चाहिए और साथ रहने की मजबूरी हो तो रोज एक साथ एक ही बिछावन पर सोना नहीं चाहिए। पूरी तरह स्वकीय और पूरी तरह परकीय, दोनों बुरे हैं। हर स्त्री और हर पुरुष को थोड़ा स्वकीय और थोड़ा परकीय बने रहना चाहिए। नहीं तो आकर्षण की डोरी अतिशय तनाव से टूट कर गिर सकती है और बहुत ज्यादा ढीली हो जाने पर लुंज-पुंज हो जा सकती है। दोनों ही संस्करण घातक हैं। वे डोरी के गुण-धर्म को नष्ट कर डालते हैं। जब स्वकीयता के साथ परकीयता होगी और परकीयता के साथ स्वकीयता, तब हमें होली जैसे अद्भुत त्यौहार की महत्ता समझ में आएगी, जो स्वकीय और परकीय के विभाजन की दीवार को अपने रंग-गीले हाथों से गिरा देता है। फागुन के नशे में कौन स्वकीय रह जाता है या रह जाती है और कौन इस बोध से घिरा रहता है या घिरी रहती है कि वह परकीय है? जैसे प्रकृति की व्यवस्था अभिन्न है, हर जर्रा हर जर्रे का मायका या ससुराल है, वैसे ही सभी स्त्री-पुरुष एक नैसर्गिक व्याकरण की संज्ञाएँ, विशेषण और क्रियापद बन जाते हैं। अब इससे आगे क्या कहूँ, तू मुझमें है, मैं तुझमें हूँ। अगर यह प्रेम है, तो अध्यात्म भी यही है।

रस ध्वनि में है, स्पर्श में है, रंग में है। होली में हम तीनों का मधुर उत्तान देखते हैं। होली गाई जाती है, होली खेली जाती है और होली पर हम गले भी मिलते हैं। कुछ लोग होली के रंग में खुशबू भी मिला देते हैं। होली पर पकवान तो गरीब से गरीब के घर भी बनते हैं, जो हमारी स्वादेंद्रिय को तृप्त करते हैं। इस तरह होली ऐंद्रिय जगत की संपूर्णता का उत्सव बन जाता है। लेकिन इन तीनों में रंग का स्थान अन्यतम है।


रस ध्वनि में है, स्पर्श में है, रंग में है। होली में हम तीनों का मधुर उत्तान देखते हैं। होली गाई जाती है, होली खेली जाती है और होली पर हम गले भी मिलते हैं। कुछ लोग होली के रंग में खुशबू भी मिला देते हैं। होली पर पकवान तो गरीब से गरीब के घर भी बनते हैं, जो हमारी स्वादेंद्रिय को तृप्त करते हैं। इस तरह होली ऐंद्रिय जगत की संपूर्णता का उत्सव बन जाता है। लेकिन इन तीनों में रंग का स्थान अन्यतम है। इंद्रियों के सभी विषयों में रंग ही दूर से चमकता है। सूर्य की लालिमा हमें कितनी दूर से दिखाई पड़ती है। चंद्रमा का प्रकाश निकटतर है, लेकिन वह भी कम दूर नहीं है। यह गुण किसी और तत्व में नहीं है। शायद इसीलिए रंग को होली का मुख्य दूत माना गया। प्रकृति भी इस मौसम में अपने रंगों का पूरा खजाना खोल देती है। एक-दूसरे के शरीर और उसके जरिए आत्मा पर गीला रंग फेंक कर हम मानो इस रंगीनियत का ही इजहार करते हैं। यही वह रस है जो हमारे तन-मन को आह्लादित कर देता है और हमारी भौगोलिक तथा मानसिक दूरियों को पाट देता है। हर कोई फूल और हर कोई भौंरा बन जाता है।


स्त्री-पुरुष का आकर्षण बारहों महीने चौबीसों घंटे बना रहता है, पर पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच प्रगाढ़ता में तरह-तरह के अवरोध पैदा होते रहते हैं और जीवन रस को सोखते रहते हैं। कहा जा सकता है कि हमने जो सभ्यता गढ़ी हुई है, वह हमारे सहज सुखों का सोख्ता है। यह सोख्ता स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक संबंधों के रस को भी सोखता रहता है और जीवन को उतना रसमय नहीं होने देता जितना वह वास्तव में है और आज भी हो सकता है। विषमता की तरह-तरह की दीवारें खड़ी कर हमने अपनी जिंदगियों को दुखपूर्ण बना डाला है।



मेरी उलझन यह है कि जो रस स्त्री-पुरुष के बीच पैदा होता है, उसका कुछ हिस्सा पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच क्यों नहीं पैदा होता? स्त्रियाँ भी स्त्रियों के साथ होली खेलती हैं और पुरुष भी पुरुषों के साथ होली खेलते हैं। पुरुषों की बनिस्बत स्त्रियों की अपनी होली ज्यादा मजेदार, ज्यादा चुहल भरी होती है, क्योंकि उनमें प्राकृतिक लालित्य होता है और उनकी आपस की प्रतिस्पर्धा उतनी तीव्र और बहुआयामी नहीं होती जितनी पुरुषों के आपसी संबंधों में। इसीलिए युवाओं की होली ज्यादा खुली हुई होती है : वे इतने परिपक्व नहीं हुए होते हैं कि जिंदगी के द्वंद्वों को कुछ घड़ी के लिए भुला न सकें और अपने को रंगीनी के हाथों निश्शर्त सुपुर्द न कर सकें। शोक की बात यह है कि होली का यह सहज उल्लास साल भर हमारा साथ नहीं देता। स्त्री-पुरुष का आकर्षण बारहों महीने चौबीसों घंटे बना रहता है, पर पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच प्रगाढ़ता में तरह-तरह के अवरोध पैदा होते रहते हैं और जीवन रस को सोखते रहते हैं। कहा जा सकता है कि हमने जो सभ्यता गढ़ी हुई है, वह हमारे सहज सुखों का सोख्ता है। यह सोख्ता स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक संबंधों के रस को भी सोखता रहता है और जीवन को उतना रसमय नहीं होने देता जितना वह वास्तव में है और आज भी हो सकता है। विषमता की तरह-तरह की दीवारें खड़ी कर हमने अपनी जिंदगियों को दुखपूर्ण बना डाला है। होली हर साल हमें यह याद दिलाने आती है कि यारो, यह जीना भी कोई जीना है जिसमें जीवन का रस द्वंद्वों की आँच में भाप बन कर उड़ता रहता है और हम जितना दूसरों से, उतना ही अपने आपसे बेगाना होते जाते हैं।



इस विसंगति में ही हम पहचान सकते हैं कि होली का दिन मजाक और हास-परिहास का दिन क्यों बन जाता है। जब हिरण्यकश्यप की बहन उसके संतनुमा बेटे प्रह्लाद को ले कर आग के कुंड में बैठ गई थी और बालक प्रह्लाद जल कर भस्म हो जाने के बजाय उससे पूरी तरह अक्षत और साबुत निकल आए, तो उसके तुतलाते होंठों पर एक ऐसी मुसकान जरूर होगी जिसने उस क्रूर-कपटी राजा का दिल तार-तार कर दिया होगा। यह मुसकान अन्याय और जुल्म के विरुद्ध विजय की शाश्वत मुसकान है। बाद की पीढियाँ इतनी किस्मतवाली नहीं रहीं कि वे इस विध्वंसक आग से अपने को भस्म न होने दें। पर ऐसी हर आग के खिलाफ गाने तो गाए ही जा सकते हैं, प्रहसन तो किया ही जा सकता है, उसका मजाक तो उड़ाया ही जा सकता है। यह भी एक प्रकार की विमुक्ति है : साल भर हमारे कोमल मनों में जो तनाव जमा होते रहते हैं, उनसे उल्लासपूर्ण विमुक्ति का दुर्लभ मौका, जब आप कोयले को कोयला और कीचड़ को कीचड़ कह सकते हैं। होली के दिन कोई किसी का गुसैयाँ नहीं रह जाता। किसी से भी प्यार किया जा सकता है और किसी पर भी छींटाकशी की जा सकती है। लेकिन यह छींटाकशी भी विनोद भाव के परिणामस्वरूप मृदु और सहनीय हो जाती है। बल्कि जिसका परिहास किया जाता है, वह भी बुरा न मानने का अभिनय करते हुए बरबस हँस पड़ता है। शायद यही 'बुरा न मानो होली है' के हर्ष-विनोद घोष का उद्गम स्थल है।



होली एक ऐसा स्वच्छ दर्पण है जिसके हम, हमारा समाज, हमारी तथाकथित संस्कृति सब निर्वस्त्र हो कर खड़े हो जाते हैं और अपने पर जितना इतराते हैं उतना ही सकुचाते भी हैं। क्या ही अच्छा हो कि हम रोज एक घंटा होली के मूड में आ जाया करें और दिन भर के गर्दो-गुबार को झटक कर साफ चित्त से प्रकृति की उस नियामत की सुरमई गोद में बच्चों की तरह लेट जाया करें जिसे नींद कहते हैं



होली वह अनोखा दिन है जब जिसे बहुमत से बुरा समझा जाता है, वह भी बुरा नहीं रह जाता। जिसे बहुमत से अच्छा माना जाता है, उसकी सार्वजनिक ऐसी-तैसी की जाती है। कह सकते हैं कि होली एक ऐसा स्वच्छ दर्पण है जिसके हम, हमारा समाज, हमारी तथाकथित संस्कृति सब निर्वस्त्र हो कर खड़े हो जाते हैं और अपने पर जितना इतराते हैं उतना ही सकुचाते भी हैं। क्या ही अच्छा हो कि हम रोज एक घंटा होली के मूड में आ जाया करें और दिन भर के गर्दो-गुबार को झटक कर साफ चित्त से प्रकृति की उस नियामत की सुरमई गोद में बच्चों की तरह लेट जाया करें जिसे नींद कहते हैं और जो मृत्यु का एक लघु संस्करण है, ताकि अगली सुबह के बाल सूर्य की तरह हम भी ताजादम हो कर जीवन में वापसी का सुख अनुभव करते हुए अपने दिन भर के कामकाज में लग सकें।

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-राजकिशोर




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