"अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु"

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अब अगर आलोक तोमर को यह कविता न लगे तो

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अब अगर आलोक तोमर को यह कविता न लगे तो कोई क्या करे




आज कुछ घंटे पूर्व हिन्दी भारत याहू समूह पर आलोक तोमर जी ने अपनी एक कविता सदस्यों से बांटी और भेजते हुए अपनी विनम्रता में, ऊपर यह लिखा कि "अब अगर आलोक तोमर को यह कविता लगे तो कोई क्या करे "मुझे आश्चर्य हुआ कि इतनी बढ़िया कविता लिख कर आलोक जी यह विनम्रता बरत कर ठीक नहीं कर रहे हैं। सो, उस कविता को यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ आप सभी निश्चय करें कि आलोक जी वास्तव में कवि हैं ना!!

आलोक जी का परिचय तो राजनीति में रूचि रखने वाले सभी लोग बढ़िया से जानते ही होंगे , जो न जानते हों वे

परिचय यहाँ देखें

भाग -

भाग -








पराजय
का उत्सव गीत
( पता भी नहीं ये कविता है भी या नहीं)

- आलोक तोमर








मैं अचानक हार जाता हूँ
और तुमसे हारने का
एक, चुप
उत्सव मनाता हूँ



गुदगुदाता है यूँ तुमसे हारना
हार कर
खुद से उलझना
और फिर
भीगे पलों में
चंद्रमा की साक्षी में
किलक बतियाना
या तो सपना है
है या हकीकत
नहीं कोई दाम
न कोई कीमत



अपने अन्दर की नदी में
बिना तैरे
जिन तटों को कभी देखा ही नहीं
जिन द्वीप-टापू को नहीं जाना
हारने की ही शक्ति लेकर
नदी की हर लहर से सुलझ कर
तैरता हूँ
पार जाता हूँ
मैं अचानक हार जाता हूँ
और
तुमसे हारने का
एक, चुप
उत्सव मनाता हूँ






रस ही जीवन / जीवन रस है

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रस
ही जीवन / जीवन रस है






निष्प्रयास स्वीकृति प्रेम को आलसी बना देती है। इसीलिए अनेक समझदार लोगों ने सलाह दी है कि स्त्री-पुरुष को एक साथ नहीं रहना चाहिए और साथ रहने की मजबूरी हो तो रोज एक साथ एक ही बिछावन पर सोना नहीं चाहिए। पूरी तरह स्वकीय और पूरी तरह परकीय, दोनों बुरे हैं। हर स्त्री और हर पुरुष को थोड़ा स्वकीय और थोड़ा परकीय बने रहना चाहिए। नहीं तो आकर्षण की डोरी अतिशय तनाव से टूट कर गिर सकती है और बहुत ज्यादा ढीली हो जाने पर लुंज-पुंज हो जा सकती है। दोनों ही संस्करण घातक हैं। वे डोरी के गुण-धर्म को नष्ट कर डालते hain





भारत में होली सबसे सरस पर्व है। दशहरा और दीपावली से भी ज्यादा। दूसरे त्योहारों में कोई न कोई वांछा है। या वांछा की पूर्ति का सुख। होली दोनों से परे है। यह बस है, जैसे प्रकृति है। अस्तित्व के आनंद का उत्सव। वांछा और वांछा की पूर्ति, दोनों में द्वंद्व है। यह जय-पराजय से जुड़ा हुआ है। दोनों ही एक अधूरी दास्तान हैं। सच यह है कि दूसरा हारे, तब भी हमारी पराजय है। कोई भी सज्जन किसी और को दुखी देखना नहीं चाहता। किसी का वध करके उसे खुशी नहीं होती। करुणानिधान राम ने जब रावण पर अंतिम प्राणहंता तीर चलाया होगा, तो उनका हृदय विषाद से भर गया होगा। उनके दिल में हूक उठी होगी कि काश, रावण ने ऐसा कुछ न किया होता जो उसके लिए मृत्यु का आह्वान बन जाए; काश, उसने अंगद के माध्यम से भेजे गए संधि प्रस्ताव को मंजूर कर लिया होता; काश, उसने विभीषण की सत सलाह का तिरस्कार नहीं किया होता। अर्जुन का विषाद तो बहुत ही प्रसिद्ध है। युद्ध छिड़ने के ऐन पहले उसे अपने तीर-तूरीण भारी लगने लगे। उसके मन में उचित ही यह भाव पैदा हुआ कि अपने संगे-संबंधियों को मार कर सुख पाना एकदम अनैतिक है। यह भावना जितनी ज्यादा फैले, दुनिया के लिए उतना ही अच्छा है। श्मशान में सभ्यता का विकास नहीं होता। फिर भी महाभारत इसीलिए हो पाया, क्योंकि कृष्ण अपने सखा को यह समझा सके कि अन्याय का प्रतिरोध करना अगर जीवन-मरण का प्रश्न बन जाए, तब भी संघर्ष से भागना नहीं चाहिए। नतीजा यह हुआ कि कुरुवंश के लोग दिन में एक-दूसरे की जान लेते थे और रात को उनकी याद कर आँसू बहाते थे। इस तरह, द्वंद्व और उनका शमन जीवन प्रक्रिया को आगे बढ़ाता था। होली की विशेषता यह है कि यहाँ किसी प्रकार का द्वंद्व नहीं है; सामाजिक नैतिकता के नाम पर लादी हुई अनैतिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप द्वंद्व है भी, तो उसका शमन नहीं, समाहार है। हृदय की मुक्तावस्था को क्या कहते हैं, मुझे नहीं मालूम, पर यह अनुभव जरूर है कि होली को मन से मनाया जाए, तो कुछ ऐसी ही अवस्था पैदा होती है।


श्वसुर साल भर श्वसुर रहता है, पर होली के दिन वह देवर बन जाता है। (फागुन में ससुर जी देवर लगें) इसका मतलब यही है कि उसमें देवरपन हमेशा मौजूद था, पर वह उभरता तब है जब उसे आवश्यक उद्दीपन मिलता है। यह उद्दीपन बहू देती है। इसका मतलब यह भी है कि बहू में भी सनातन नारी साल भर जीवित रहती है, पर बाहर आने के लिए वह उचित मौसम का इंतजार करती है। यह मौसम फागुन के अलावा और क्या हो सकता है?



होली का त्यौहार मनाने के लिए वसंत ऋतु को चुना गया, तो इसके ठोस कारण हैं। इन कारणों से हर कोई अवगत है। ये कारण मुख्यत: बाहर से आते हैं। लेकिन वे प्रभावी तभी होते हैं जब भीतर संचित कोई अद्भुत चीज अंगड़ाई ले कर जाग उठती है। कामना, विचार, हर्ष. विषाद सब कुछ हमारे भीतर ही है। लेकिन जागते वे तब हैं जब बाहर से उन्हें उद्दीपन और आलंबन मिलता है। बाहर और भीतर का विभाजन वास्तविक से ज्यादा कृत्रिम है। तभी तो यह विभाजन अकसर चिटख जाता है। श्वसुर साल भर श्वसुर रहता है, पर होली के दिन वह देवर बन जाता है। (फागुन में ससुर जी देवर लगें) इसका मतलब यही है कि उसमें देवरपन हमेशा मौजूद था, पर वह उभरता तब है जब उसे आवश्यक उद्दीपन मिलता है। यह उद्दीपन बहू देती है। इसका मतलब यह भी है कि बहू में भी सनातन नारी साल भर जीवित रहती है, पर बाहर आने के लिए वह उचित मौसम का इंतजार करती है। यह मौसम फागुन के अलावा और क्या हो सकता है?



बताते हैं, प्रकृति हर्ष और विषाद से परे हैं। उसे न दुख होता है न सुख होता है। लेकिन क्या पता। प्रकृति के बारे में हमारी जानकारी इतनी संक्षिप्त है कि उसके आधार पर कोई बड़ा फैसला नहीं किया जा सकता। हम यह तो जान गए हैं कि कीट-पतंगों को, पेड़-पौधों को भी दुख-सुख होता है, वे हर परिवर्तन से संवेदित होते हैं। लेकिन सभी प्राणी, जिनमें उद्भिज भी शामिल हैं, अगर प्रकृति की कोख से ही जन्म लेते हैं, तो यह कोख किसी भी स्तर पर इतनी बाँझ नहीं हो सकती कि वह बिलकुल संवेदनहीन हो जाए। मार्क्स ने ठीक पहचाना था कि पदार्थ से ही चेतना पैदा होती है। तो फिर पदार्थ खुद अचेतन कैसे हो सकता है?



प्रकृति की यह सचेतनता वसंत ऋतु में पूरे शबाब में होती है। अन्य सभी ऋतुओं में कुछ न कुछ द्वंद्व होता है। गरमी, बारिश, जाड़ा -- सभी आवश्यक हैं और इस नाते प्रिय भी, पर अतिरेक में वे कष्ट भी देते हैं। वसंत ही एकमात्र ऋतु है जिसका कोई अतिरेक नहीं हो सकता। सभी चीजों का उत्कर्ष होता है, पर उत्कर्ष का उत्कर्ष क्या होगा? सागरमाथा (एवरेस्ट) अपनी ऊँचाई को कैसे लांघ सकता है? वसंत ऋतु परिवर्तन के पूरे चक्र का उत्कर्ष है। इसी के लिए प्रकृति साल भर तैयारी करती है, जैसे मानवी का शरीर सोलह साल तक साधना करता है ताकि उस पर यौवन का फूल खिल सके या जैसे जननी नौ महीने तक हर रंग से गुजरती है तब कोई शिशु धरती पर प्रगट होता है और सभी के दिलों पर छा जाता है। वसंत प्रकृति का यौवन भी है और उसकी रचनात्मकता का चरम उभार बिंदु भी। उसमें कोई द्वंद्व नहीं है। आनंद ही आनंद है। रस ही रस है। जीवन ही जीवन है। इसीलिए मनुष्य ही नहीं, संपूर्ण जीव जगत के साथ उसकी अनुकूलता है। वसंत में जैसे प्रकृति खुलती है, उसकी कंचुकियाँ छोटी पड़ जाती हैं, वैसे ही हम भी खुलते हैं, हमारे लिए हमारा परिवेश छोटा लगने लगता है। यह वह सर्वश्रेष्ठ उपहार है जो सृष्टि अपने आपको देती है। वरना तो बाकी सृष्टि में आँखों को जला देनेवाली रोशनी है -- जहाँ-जहाँ तारे हैं, या फिर उनके बीच का ठोस सघन अँधेरा, जिसमें कोई अपने आपको भी देख नहीं सकता। हम धरतीवालों को अपनी किस्मत पर इतराना चाहिए।


लेकिन सिर्फ अपनी पत्नी से होली खेल कर कौन उल्लास में डूब सकता है? सिर्फ अपने पति से होली खेल कर कौन बीरबहूटी बन सकती है? अतिशय निकटता नए आविष्कार करने की क्षमता को कुंद कर देती है। निष्प्रयास स्वीकृति प्रेम को आलसी बना देती है। इसीलिए अनेक समझदार लोगों ने सलाह दी है कि स्त्री-पुरुष को एक साथ नहीं रहना चाहिए और साथ रहने की मजबूरी हो तो रोज एक साथ एक ही बिछावन पर सोना नहीं चाहिए। पूरी तरह स्वकीय और पूरी तरह परकीय, दोनों बुरे हैं। हर स्त्री और हर पुरुष को थोड़ा स्वकीय और थोड़ा परकीय बने रहना चाहिए। नहीं तो आकर्षण की डोरी अतिशय तनाव से टूट कर गिर सकती है और बहुत ज्यादा ढीली हो जाने पर लुंज-पुंज हो जा सकती है। दोनों ही संस्करण घातक हैं।





धरती इसलिए अनोखी है, क्योंकि सृष्टि भर में यहीं जीवन है। यहीं रस है। यह रस सबसे ज्यादा नर-नारी के बीच पैदा होता है, क्योंकि प्रकृति की अभी तक की योजना यही है। उसने पशु-पक्षियों में भी, पेड़-पौधों में भी युग्म बनाए हैं, पर इन युग्मों में वह आकर्षण, वह ताकत, वह निरंतरता नहीं है, जो मानव युग्म में दिखाई देता है। हो सकता है, लाखों-करोड़ों वर्ष पहले हमारे पूर्वज स्त्री-पुरुष भी जब-तब ही एक-दूसरे की ओर प्यार और लालसा की निगाहों से देखते रहे हों, पर वह संस्कृति के ककहरे का युग था। संस्कृति के निरंतर विकास ने न केवल शरीर को कोमल और सुंदर बनाया है, बल्कि दो शरीरों के बीच कला का इतना बड़ा सागर पैदा किया है जिसमें हम निरंतर ऊभ-चूभ होते रहते हैं। इसीलिए हमारे एक पूर्वज ने आह भरते हुए कहा था कि जो मनुष्य साहित्य, संगीत और कला से विहीन है, वह सींग-पूँछ रहित जानवर की तरह है। होली इसी सांस्कृतिकता का उत्सव है। जो होली के दिन सूखे पेड़ की तरह अपना और दूसरों का मूड खराब किए रहता है, उसे नरक का अनुभव करने के लिए जीवनोत्तर जीवन की प्रतीक्षा नहीं करनी होती। वह आँख वाला हो कर भी अंधा है, कानवाला हो कर भी बहरा है और हृदय होते हुए भी पत्थर है। वह समाज में होते हुए भी समाज से बाहर है, अपने भीतर होते हुए भी अपने को नहीं पहचानता। खुदा ऐसे लोगों को माफ करे -- ये नहीं जानते कि ये क्या खो रहे हैं।



नर-नारी का आकर्षण एक विशिष्ट प्रकार का आकर्षण है, जिसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। इसीलिए सभी भक्त ईश्वर को अपना माशूक मान कर उसकी मादक अनुभूति से घिरे रहते हैं। कबीर को लगता था कि राम उनके प्रियतम हैं और वे राम की बहुरिया हैं। कृष्ण को तो पति मान कर ही भजने की प्रथा है। ईसाई संतों को ईश्वर की वधू होने का अनुभव होता था। ये सभी अभिव्यक्तियाँ प्रगाढ़तम संबंध की जानी-पहचानी अनुभूति हैं। लेकिन सिर्फ अपनी पत्नी से होली खेल कर कौन उल्लास में डूब सकता है? सिर्फ अपने पति से होली खेल कर कौन बीरबहूटी बन सकती है? अतिशय निकटता नए आविष्कार करने की क्षमता को कुंद कर देती है। निष्प्रयास स्वीकृति प्रेम को आलसी बना देती है। इसीलिए अनेक समझदार लोगों ने सलाह दी है कि स्त्री-पुरुष को एक साथ नहीं रहना चाहिए और साथ रहने की मजबूरी हो तो रोज एक साथ एक ही बिछावन पर सोना नहीं चाहिए। पूरी तरह स्वकीय और पूरी तरह परकीय, दोनों बुरे हैं। हर स्त्री और हर पुरुष को थोड़ा स्वकीय और थोड़ा परकीय बने रहना चाहिए। नहीं तो आकर्षण की डोरी अतिशय तनाव से टूट कर गिर सकती है और बहुत ज्यादा ढीली हो जाने पर लुंज-पुंज हो जा सकती है। दोनों ही संस्करण घातक हैं। वे डोरी के गुण-धर्म को नष्ट कर डालते हैं। जब स्वकीयता के साथ परकीयता होगी और परकीयता के साथ स्वकीयता, तब हमें होली जैसे अद्भुत त्यौहार की महत्ता समझ में आएगी, जो स्वकीय और परकीय के विभाजन की दीवार को अपने रंग-गीले हाथों से गिरा देता है। फागुन के नशे में कौन स्वकीय रह जाता है या रह जाती है और कौन इस बोध से घिरा रहता है या घिरी रहती है कि वह परकीय है? जैसे प्रकृति की व्यवस्था अभिन्न है, हर जर्रा हर जर्रे का मायका या ससुराल है, वैसे ही सभी स्त्री-पुरुष एक नैसर्गिक व्याकरण की संज्ञाएँ, विशेषण और क्रियापद बन जाते हैं। अब इससे आगे क्या कहूँ, तू मुझमें है, मैं तुझमें हूँ। अगर यह प्रेम है, तो अध्यात्म भी यही है।

रस ध्वनि में है, स्पर्श में है, रंग में है। होली में हम तीनों का मधुर उत्तान देखते हैं। होली गाई जाती है, होली खेली जाती है और होली पर हम गले भी मिलते हैं। कुछ लोग होली के रंग में खुशबू भी मिला देते हैं। होली पर पकवान तो गरीब से गरीब के घर भी बनते हैं, जो हमारी स्वादेंद्रिय को तृप्त करते हैं। इस तरह होली ऐंद्रिय जगत की संपूर्णता का उत्सव बन जाता है। लेकिन इन तीनों में रंग का स्थान अन्यतम है।


रस ध्वनि में है, स्पर्श में है, रंग में है। होली में हम तीनों का मधुर उत्तान देखते हैं। होली गाई जाती है, होली खेली जाती है और होली पर हम गले भी मिलते हैं। कुछ लोग होली के रंग में खुशबू भी मिला देते हैं। होली पर पकवान तो गरीब से गरीब के घर भी बनते हैं, जो हमारी स्वादेंद्रिय को तृप्त करते हैं। इस तरह होली ऐंद्रिय जगत की संपूर्णता का उत्सव बन जाता है। लेकिन इन तीनों में रंग का स्थान अन्यतम है। इंद्रियों के सभी विषयों में रंग ही दूर से चमकता है। सूर्य की लालिमा हमें कितनी दूर से दिखाई पड़ती है। चंद्रमा का प्रकाश निकटतर है, लेकिन वह भी कम दूर नहीं है। यह गुण किसी और तत्व में नहीं है। शायद इसीलिए रंग को होली का मुख्य दूत माना गया। प्रकृति भी इस मौसम में अपने रंगों का पूरा खजाना खोल देती है। एक-दूसरे के शरीर और उसके जरिए आत्मा पर गीला रंग फेंक कर हम मानो इस रंगीनियत का ही इजहार करते हैं। यही वह रस है जो हमारे तन-मन को आह्लादित कर देता है और हमारी भौगोलिक तथा मानसिक दूरियों को पाट देता है। हर कोई फूल और हर कोई भौंरा बन जाता है।


स्त्री-पुरुष का आकर्षण बारहों महीने चौबीसों घंटे बना रहता है, पर पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच प्रगाढ़ता में तरह-तरह के अवरोध पैदा होते रहते हैं और जीवन रस को सोखते रहते हैं। कहा जा सकता है कि हमने जो सभ्यता गढ़ी हुई है, वह हमारे सहज सुखों का सोख्ता है। यह सोख्ता स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक संबंधों के रस को भी सोखता रहता है और जीवन को उतना रसमय नहीं होने देता जितना वह वास्तव में है और आज भी हो सकता है। विषमता की तरह-तरह की दीवारें खड़ी कर हमने अपनी जिंदगियों को दुखपूर्ण बना डाला है।



मेरी उलझन यह है कि जो रस स्त्री-पुरुष के बीच पैदा होता है, उसका कुछ हिस्सा पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच क्यों नहीं पैदा होता? स्त्रियाँ भी स्त्रियों के साथ होली खेलती हैं और पुरुष भी पुरुषों के साथ होली खेलते हैं। पुरुषों की बनिस्बत स्त्रियों की अपनी होली ज्यादा मजेदार, ज्यादा चुहल भरी होती है, क्योंकि उनमें प्राकृतिक लालित्य होता है और उनकी आपस की प्रतिस्पर्धा उतनी तीव्र और बहुआयामी नहीं होती जितनी पुरुषों के आपसी संबंधों में। इसीलिए युवाओं की होली ज्यादा खुली हुई होती है : वे इतने परिपक्व नहीं हुए होते हैं कि जिंदगी के द्वंद्वों को कुछ घड़ी के लिए भुला न सकें और अपने को रंगीनी के हाथों निश्शर्त सुपुर्द न कर सकें। शोक की बात यह है कि होली का यह सहज उल्लास साल भर हमारा साथ नहीं देता। स्त्री-पुरुष का आकर्षण बारहों महीने चौबीसों घंटे बना रहता है, पर पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच प्रगाढ़ता में तरह-तरह के अवरोध पैदा होते रहते हैं और जीवन रस को सोखते रहते हैं। कहा जा सकता है कि हमने जो सभ्यता गढ़ी हुई है, वह हमारे सहज सुखों का सोख्ता है। यह सोख्ता स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक संबंधों के रस को भी सोखता रहता है और जीवन को उतना रसमय नहीं होने देता जितना वह वास्तव में है और आज भी हो सकता है। विषमता की तरह-तरह की दीवारें खड़ी कर हमने अपनी जिंदगियों को दुखपूर्ण बना डाला है। होली हर साल हमें यह याद दिलाने आती है कि यारो, यह जीना भी कोई जीना है जिसमें जीवन का रस द्वंद्वों की आँच में भाप बन कर उड़ता रहता है और हम जितना दूसरों से, उतना ही अपने आपसे बेगाना होते जाते हैं।



इस विसंगति में ही हम पहचान सकते हैं कि होली का दिन मजाक और हास-परिहास का दिन क्यों बन जाता है। जब हिरण्यकश्यप की बहन उसके संतनुमा बेटे प्रह्लाद को ले कर आग के कुंड में बैठ गई थी और बालक प्रह्लाद जल कर भस्म हो जाने के बजाय उससे पूरी तरह अक्षत और साबुत निकल आए, तो उसके तुतलाते होंठों पर एक ऐसी मुसकान जरूर होगी जिसने उस क्रूर-कपटी राजा का दिल तार-तार कर दिया होगा। यह मुसकान अन्याय और जुल्म के विरुद्ध विजय की शाश्वत मुसकान है। बाद की पीढियाँ इतनी किस्मतवाली नहीं रहीं कि वे इस विध्वंसक आग से अपने को भस्म न होने दें। पर ऐसी हर आग के खिलाफ गाने तो गाए ही जा सकते हैं, प्रहसन तो किया ही जा सकता है, उसका मजाक तो उड़ाया ही जा सकता है। यह भी एक प्रकार की विमुक्ति है : साल भर हमारे कोमल मनों में जो तनाव जमा होते रहते हैं, उनसे उल्लासपूर्ण विमुक्ति का दुर्लभ मौका, जब आप कोयले को कोयला और कीचड़ को कीचड़ कह सकते हैं। होली के दिन कोई किसी का गुसैयाँ नहीं रह जाता। किसी से भी प्यार किया जा सकता है और किसी पर भी छींटाकशी की जा सकती है। लेकिन यह छींटाकशी भी विनोद भाव के परिणामस्वरूप मृदु और सहनीय हो जाती है। बल्कि जिसका परिहास किया जाता है, वह भी बुरा न मानने का अभिनय करते हुए बरबस हँस पड़ता है। शायद यही 'बुरा न मानो होली है' के हर्ष-विनोद घोष का उद्गम स्थल है।



होली एक ऐसा स्वच्छ दर्पण है जिसके हम, हमारा समाज, हमारी तथाकथित संस्कृति सब निर्वस्त्र हो कर खड़े हो जाते हैं और अपने पर जितना इतराते हैं उतना ही सकुचाते भी हैं। क्या ही अच्छा हो कि हम रोज एक घंटा होली के मूड में आ जाया करें और दिन भर के गर्दो-गुबार को झटक कर साफ चित्त से प्रकृति की उस नियामत की सुरमई गोद में बच्चों की तरह लेट जाया करें जिसे नींद कहते हैं



होली वह अनोखा दिन है जब जिसे बहुमत से बुरा समझा जाता है, वह भी बुरा नहीं रह जाता। जिसे बहुमत से अच्छा माना जाता है, उसकी सार्वजनिक ऐसी-तैसी की जाती है। कह सकते हैं कि होली एक ऐसा स्वच्छ दर्पण है जिसके हम, हमारा समाज, हमारी तथाकथित संस्कृति सब निर्वस्त्र हो कर खड़े हो जाते हैं और अपने पर जितना इतराते हैं उतना ही सकुचाते भी हैं। क्या ही अच्छा हो कि हम रोज एक घंटा होली के मूड में आ जाया करें और दिन भर के गर्दो-गुबार को झटक कर साफ चित्त से प्रकृति की उस नियामत की सुरमई गोद में बच्चों की तरह लेट जाया करें जिसे नींद कहते हैं और जो मृत्यु का एक लघु संस्करण है, ताकि अगली सुबह के बाल सूर्य की तरह हम भी ताजादम हो कर जीवन में वापसी का सुख अनुभव करते हुए अपने दिन भर के कामकाज में लग सकें।

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-राजकिशोर




जरा खुल कर जय हो

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जरा खुल कर जय हो




हम उत्सवधर्मा हैं, पर हमें खुशी मनाने में मुश्किल होती है। खुशी के पलों में अचानक हम पहले गंभीर हो जाते है, फिर आलोचक और फिर थोड़े उदास, थोड़े कुंठित। हम सोचने लगते हैं कि हम बेवजह खु्श हो रहे हैं, जबकि कायदे से तो यह गंभीर विमर्श का मौका है। सोचते-सोचते फिर हमारा मन बोझिल हो जाता है और हम गहरी उदासी में उतरने लगते हैं। हमारे साथ कुछ ऐसा ही हुआ हाल में। हमें ऒस्कर मिल गया। अंग्रेजी के एक हिंदुस्तानी लेखक और राजनयिक विकास स्वरूप ने एक उपन्यास लिखा। किसी अंग्रेज निदेशक को उसका कथानक जमा। एक पटकथा लिखी गयी। फिर एक जटिल फिल्म बनी, जिसमें गंदगी और गरीबी के माहौल में भी एक फंतासी रची गयी। कहानी के एक मोड़ पर भाग्य के पट खुले और एक नाकुछ करोड़पति बन गया। उस पर शक भी किया गया-मानो जो गरीब और वंचित है वह ज्ञान के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता। कुछ ऐसे सरलीकरण और कुछ अद्भुत फिल्मीकरण, कुछ फार्मूले और कुछ नए अंदाज -इन सबको एक फिल्म का स्वरूप मिला। इसमें कोई एक बंबइया अनिल कपूर तथा लंदन में होने के बावजूद एक औसत स्कूल विटमोर हैरो का एक साधारण युवक देव पटेल आमने सामने बैठ कर ’’कौन बनेगा करोड़पति’’ खेलने लगे। इन दोनों में से कोई भी अभिनय की दुनिया के दिलीप कुमार नहीं है।



जैसा कि सब जानते हैं फिल्म वैसे भी एक संश्लिष्ट, दुरूह एवं बहुविधात्मक कला माध्यम है- उसमें तकनीक भी है और कला भी, ग्लैमर भी है और संवेदना भी, चाक्षुष भी है और श्रव्य भी, शब्द भी हैं और सुर भी, और अभिनय तो है ही। अब ’स्लमडॊग मिलियेनेयर’ में भी यह सब ब्रिटिश और भारतीय कलाकारों तथा कामकारों के संयुक्त संयोजन मे हुआ है। रेसूल पुकुट्टी का स्वर संयोजन तकनीक और कला का एक उत्कृष्ट बिंदु है, वरना अनुराग कश्यप की आधुनिक फिल्म ’नो स्मोकिंग’ में अर्थमय गानों और प्रभावी संगीत होने के बावजूद साउंड ट्रैक में कुछ रुखड़ा-सा फॅंसा-फॅंसा सा लगता है। वहाँ भी गुलजार ने कई अनोखे प्रयोग किए थे -’’लंबे धागे धुएँ के, साँस सिलने लगे हैं, प्यास उधड़ी हुई है, ओठ छिलने लगे हैं’’ या फिर ऐश-ट्रे में ’’बहुत से आधे बुझे हुए दिन पड़े हैं इसमें, बहुत सी आधी जली हुई रातें गिर पड़ी है।’’ और भी जैसे ’’धुआँ लिपटता है बाजीगर की तरह हवा से, वो बल पे बल खा के उठ रहा है, तमाम करतब दिखा रहा है, ये ऐश-ट्रे भरती जा रही है।’’ इतने खूबसूरत कविता-तत्व फिल्म की सफलता-असफलता के धुएँ में धुंधले हो गए और उन गीतों का वह असर न हो सका, जो होना चाहिए था।



स्लमडॊग में इन्हीं गुलजार ने ’’रत्ती-रत्ती सच्ची मैंने जान गॅंवाई है, नच-नच कोयलों पे रात बिताई है, अखियों की नींद मैंने फॅंकों से उड़ा दी, गिन-गिन तारे मैंने उँगली जलाई है’’ जैसे बिम्ब जरीवाले नीले आसमान के तले बिखेरे है और पूरी दुनिया में इसका जादू सर चढ़ कर बोल रहा है।



यह कोई नहीं कहता कि ’’स्लमडॊग’’ गुलजार का सर्वश्रेष्ठ है, पर यह भी उनकी रचनात्मक का एक ऐसा योगदान है जिसने रहमान के संगीत में हिंदुस्तानी लफ्ज दिए जिसकी वजह से एकेडमी अवार्ड के मंच पे सबने एक स्वर में कहा- जय हो! रहमान के सरगम की उमगती चढ़ाई पर गुलजार की कविता ने कुछ ठोस पड़ाव दिए और इस अदभुत समां को अंतर्राष्टीªय मंच पर उद्घोष मिला-जय हो! हमारे मंदिरों, चैपालों, गोष्ठियों से उठ कर एक रोजमर्रा की अभिव्यक्ति गूँज उठी - जय हो!



तो मुद्दा यह नहीं कि ’लगान’, ’ब्लैक’, या ’तारे जमीं पर’ को ऒस्कर क्यों नहीं मिला? मिलना चाहिए था। यदि लगान को मिल जाता तो भाई लोग उसमें भी गुगली फेंकते कि कबड्डी और गुल्ली-डंडा खेलने वालों के बीच क्रिकेट का बुखार फैले, इसलिए लगान को ऒस्कर मिला। न मिलने पर कहने वाले कहते कि अमेरिका का ऒस्कर बेसबॊल या फुटभॊल पर आधारित कहानी पर मिल सकता था, क्रिकेट तो वहाँ का पॊपुलर खेल है नहीं। ’’ब्लैक’’ या ’’तारे जमीं पर’’ भी उम्मीद की लौ जलाने वाली फिल्मे हैं, फिर क्यों स्लमडॊग की उम्मीद को ही ऒस्कर से नवाजा गया? मुद्दा इन सवालों का नहीं हैं, दरअसल मुद्दा यह है कि ऒस्कर मिलने पर हम खुशी क्यों न मनाएँ? पप्पू के पास होने पर चॊकलेट खाएँ या लड्डू, कुछ मीठा तो होना चाहिए न। हो सकता है कि इसे ऒस्कर नहीं मिलता तो फिर भी हम रहमान के सुर में सुर मिलाकर ’जय हो’ तो गाते ही, क्योंकि यह खूबसूरत रचना बन पड़ी है। या फिर जैसा मैंने शुरुआत में कहा कि हम उदास हो कर एक बोझिल विमर्श करने लगते कि फिल्मों में किस थीम पर लिखा जाना चाहिए और किस पर नहीं। दरअसल फिल्में बनाते समय कोई इतना दूरदर््शी नहीं हो पाता होगा कि वह ऒस्कर की जीत को दिमाग में रख कर फिल्म बनाए। फिल्म बनने के बाद जरूर अपेक्षित श्रेणी में नामांकन की कोशिश होती होगी और जीतने की ख्वाहिश। ’स्लमडोग’ को ऒस्कर मिला तो क्यों मिला, और भी बेहतर फिल्में बनती हैं? न मिला तो क्यों न मिला, इतनी अच्छी फिल्म थी- यह रोना निदा फाजली के खयाल को पुख्ता करना है-’’दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।’’ तो दोस्तो, हर वक्त का रोना भी बेकार का रोना है।



यह मौका पॊपुलर बनाम गंभीर के विवाद का भी नहीं। जिस तरह पॊपुलर होना हमेषा श्रेष्ठ होने का पर्याय नहीं, उसी तरह सिर्फ गंभीर होना हमेशा रचनात्मकता का पर्याय भी नहीं। फिर सिनेमा जैसे माध्यम में कौन चाहेगा कि वह पॊपुलर और सफल न हो। वैसे भी रहमान रोजा के जमाने से और गुलजार बंदिनी या काबुलीवाला के जमाने से जो कुछ लगातार रच रहे हैं, वह सिर्फ पॊपुलर होना नहीं है। पुकुट्टी ने भी जो ध्वनि संयोजन किया है, वह जाहिर है कि पूना इंस्टीट्यूट के दिनों से उनकी सतत साधना का ही परिणाम है। यह अलबत्ता संयोग है कि एकेडमी अवार्ड के मापदंडों पर बनी और अमेरिका में प्रदर्शित एक अंग्रेजी फिल्म में होने की वजह से इन सबको ऒस्कर मिला, वरना हिंदुस्तानी संदर्भ में सब मानेंगे कि रहमान या गुलजार की पहचान पुरस्कारों की मोहताज नहीं।





तो आइए, जो हुआ उसका जश्न मनाएँ और जो होना चाहिए उसके लिए आगे कोशिश करें। किसने रोका है इससे बेहतर लिखने से, इससे बेहतर संगीत की रचना करने से, और इससे बेहतर फिल्म बनाने से। न तो ऒस्कर का यह आखिरी साल है, न ही ऒस्कर इकलौता सम्मान है और न ही जिंदा शामियाने के तले लफ्जों, धुनों, इंसानी हुनर और दानिशमंदी की महफिल अभी खत्म हुई है। फिलहाल दबे मन से नहीं, सुखविंदर की तरह खुले गले से रहमान, गुलजार, रेसूल पुकुट्टी, लवलीन टंडन, राज आचार्य, रूबीना, इस्माइल, आयुष, तनय, तन्वी, इरफान खान, अनिल कपूर तथा डेनी ब्वायल के लिए कोरस में बोलने का वक्त है- जय हो!



- विनोद खेतान
429, हवा सिंह ब्लॊक, खेल गाँव,
नई दिल्ली-110049.

उसे न भुलाया जाए जो नहीं है पर हो सकता है

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जो है जो नहीं है



ऑस्करों की खुशी से देश दीवाना है, तो यह उचित ही है। इनमें से कई हमारे नहीं हैं। हमारे असली ऑस्कर वे हैं जो संगीत के लिए दिए गए हैं। इसके बावजूद यह कम गर्व की बात नहीं है कि दूसरी बार किसी भारतीय प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय फिल्म सम्मान मिला है। पहला ऑस्कर एक भारतीय को शेखर कपूर की फिल्म 'एलिजाबेथ' में कॉस्ट्यूम के लिए मिला था। इस बार संगीत के लिए तीन ऑस्कर सम्मान मिले हैं। इसके नशे में देश झूम रहा है। यह और बात है कि फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनर' को ले कर तरह-तरह के विवाद खड़े हो गए हैं। इस विवाद में कुछ दम भी है। फिर भी ए.आर. रहमान का सम्मान भारत की प्रतिभा का सम्मान है और इससे हम सभी गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं, तो इसमें कुछ भी बेजा नहीं है। सब कुछ के बावजूद सम्मान सम्मान है।


खुशी की यह दीवानगी पहली बार नहीं देखी जा रही है। क्रिकेट में जब भारत की टीम ने विश्व कप जीता था, तब भी ऐसी दीवानगी दिखाई पड़ी थी। कपिल देव राष्ट्रीय हीरो बन गए थे। क्रिकेट का विश्व कप जीतने पर और ज्यादा दीवानगी दिखाई पड़ी, क्योंकि क्रिकेट हमारे देश के मध्य वर्ग को कुछ ज्यादा ही भाता है। गर्व की ऐसी ही लहर तब भी उठी थी, जब सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या राय के सौंदर्य को विश्व स्तर की मान्यता मिली थी। अर्मत्य सेन को जब नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, तो भारत का कद अचानक फिर बढ़ गया। जब 'फॉर्ब्स' पत्रिका द्वारा दुनिया के अमीरतम व्यक्तियों की सूची प्रकाशित की जाती है, तो उसमें भारतीयों की संख्या पढ़ कर हमें कुछ खुशी तो होती ही है। भारतीय सिर्फ साहित्य, खेल, सौंदर्य और अर्थशास्त्र की विद्वत्ता में आगे नहीं हैं, बल्कि दौलत कमाने में भी पीछे नहीं है, यह जान कर अच्छा लगना कहीं से भी अस्वाभाविक नहीं है।



इसके साथ ही, क्या यह भी विचारणीय नहीं है कि जो है, उसकी रोशनी में जो नहीं है, उसका गम और गाढ़ा हो जाता है? बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि जो नहीं है, उसकी मात्रा इतनी ज्यादा और इतनी दुखदायी है कि जो थोड़ा-बहुत मिल जाता है, उस पर हम झूमने लगते हैं। दुनिया के भ्रष्टतम देशों की सूची छपती है, तो उसमें भारत का स्थान काफी ऊपर होता है। मानव विकास की कसौटी पर सभी देशों के हालात की जाँच की जाती है, तो यही भारत बहुत नीचे चला जाता है। शिक्षा में, साक्षरता में, स्वास्थ्य सुविधाओं में, पौष्टिकता में, बाल मृत्यु दर में, स्त्रियों की सामाजिक हैसियत में, स्त्री विरोधी आचरण में, मानव अधिकारों के सम्मान में -- कौन-सा क्षेत्र ऐसा है, जहाँ हम सिर ऊँचा कर खड़े हो सकते हैं? कुल मिला कर स्थिति यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति को देखते हुए हमें कई बार भारतीय होने में शर्म आने लगती है।



यह सच है कि दक्षिण एशिया में भारत का कद उसके आकार और उसकी आबादी के अनुरूप ही ऊँचा है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश एक साथ ही आजाद हुए थे -- तब वे एक ही देश थे। इन तीनों टुकड़ों में भारत ही राजनीतिक और आर्थिक रूप से स्थिर रहा है और जीवन के सभी क्षेत्रों में कुछ न कुछ प्रगति की है। लोकतंत्र भी यहाँ कमोबेश अक्षुण्ण रहा है। इस तरह भारत उपमहादेश में भारत हर तरह से अग्रणी है। दक्षिण एशिया के पूरे संदर्भ में हम दावा कर सकते हैं कि श्रीलंका, नेपाल, भूटान आदि की तुलना में हमारा रिकॉर्ड प्रशंसनीय रहा है।



लेकिन एशिया के स्तर पर ? इसी एशिया में चीन है, जापान है, कोरिया है तथा अन्य कई देश हैं जिन्होंने प्रगति की दिशा में शानदार रिकॉर्ड बनाए हैं। यहाँ तक कि कुछ मामलों में श्रीलंका भी हमसे आगे है। सवाल यह है कि हम अपने विकास की तुलना सिर्फ दक्षिण एशिया के परिदृश्य से क्यों करें, वरन पूरे एशियाई संदर्भ में क्यों न करें ? और एशिया में क्या रखा है? जब तुलना ही करनी है, तो विश्व स्तर पर अपनी तुलना क्यों न करें? भारत के लोग अपने को इतना हीन क्यों मानें कि दुनिया के विकसिततम देशों से प्रतिद्वंद्विता करने की सोच ही न सकें?


शुरू में हमने जिन उदाहरणों का हवाला दिया है, उनसे पता चलता है कि व्यक्तिगत स्तर पर भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। ज्ञान-विज्ञान और कला का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें कोई न कोई भारतीय सितारा न जगमगा रहा हो। लेकिन ये सभी क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ व्यक्तिगत प्रतिभा और साधना से खास-खास व्यक्तियों ने शिखर की ऊँचाई छू ली है। हुसेन और ए.आर. रहमान बनने में परिस्थितियों का योगदान अवश्य है, पर मुख्य योगदान इन कलाकारों का अपना ही है। ध्यान देने की बात यह भी है कि इन दोनों कलाकारों का बचपन अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में बीता था, लेकिन इन्होंने लगातार तपस्या कर अपने को बनाया और नाम हासिल किया। हम फेल वहाँ होते हैं, जहाँ सामाजिक नियोजन और सामूहिक कर्म की चुनौती आती है। तो क्या हमारी सामाजिक दृष्टि और सामाजिकता में कोई भारी कमी है जिसकी वजह से हम समूह के तौर पर उल्लेखनीय विकास नहीं कर पा रहे हैं? व्यक्ति के स्तर पर उत्कर्ष हासिल करना हमारे लिए आसान रहता है, पर राष्ट्र के स्तर पर विकास करने में हम अपने महादेश एशिया के ही अनेक देशों से पिछड़ जाते हैं। इस सवाल पर गहराई से विचार नहीं किया गया और हमने अपनी आदतें नहीं बदलीं, तो हमारे चमकते हुए सितारों की छवि भी धूमिल होने को बाध्य है।


इसके अलावा, सामूहिक विकास का संबंध व्यक्तिगत विकास से भी है। इतने बड़े फिल्म उद्योग में अभी तक सिर्फ चार ही ऑस्कर क्यों ? नोबेल पुरस्कारों की बारी आती है, तो हम मुँह देखने लगते हैं। इतने विशाल देश में कुछ ही चित्रकार, कुछ ही संगीतकार, कुछ ही खिलाड़ी, कुछ ही अभिनेता, कुछ ही विद्वान और कुछ ही वैज्ञानिक क्यों चर्चित हो कर रह जाते हैं? पश्चिमी जगत का कोई भी देश, रूस को छोड़ कर, आबादी में हमसे बड़ा नहीं है। किसी भी देश की सभ्यता-संस्कृति हमसे ज्यादा पुरानी नहीं है। अगर हम सामूहिक रूप से विकास करने में सफल होते हैं, तो इनसे सौ गुना ज्यादा कलाकार और ज्ञानी-विज्ञानी हम पैदा कर सकते हैं। जो है, उसकी मात्रा बताती है कि जो नहीं है, उसमें कितनी बड़ी संभावनाएँ छिपी हुई हैं। इसलिए निवेदन यह है कि जो है, उस पर उत्सव मनाते समय उसे न भुलाया जाए जो नहीं है पर हो सकता है।


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- राजकिशोर

हिंदी काव्य-नाटक और युगबोध

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पुस्तक चर्चा : ऋषभदेव शर्मा




हिंदी काव्य-नाटक और युगबोध*





साहित्य विमर्श की ऐतिहासिक कसौटी के रूप में प्रायः परंपरा, युगबोध और रचनाक्षण की चर्चा की जाती है। विशेष रूप से युगबोध को किसी रचना की शाश्वतता और समकालीनता को जोड़ने वाली कड़ी माना जाता है। युगीनपरिस्थिति यों और उनके प्रभावस्वरूप परिवर्तित जनता की चित्तवृत्ति साहित्यिक आंदोलनों, विधाओं तथा प्रवृत्तियों के परिवर्तन के लिए आधार प्रदान करती हैं। यही कारण है कि आधुनिक काल में तीव्रता से बदलते हुए परिवेश और उसके प्रति सामान्य नागरिक से लेकर रचनाकार तक की प्रतिक्रियाके परिवर्तनशील स्वरूप के कारण अनेक प्रकार के बदलाव हिंदी साहित्य में परिलक्षित किए जा सकते हैं। इसीलिए किसी विधा विशेष और युगबोध के आपसीसंबंध का अध्ययन करना अत्यंत रोचक और चुनौतीपूर्ण कार्य है। डॉ. मृगेंद्र राय ने अपने शोधग्रंथ ‘हिंदी काव्य-नाटक और युगबोध’ (2008) में इसी चुनौती का सामना किया है और आधुनिक काव्य नाटकों को पारंपरिक नाट्य प्रवृत्तियों के साक्ष्य पर परीक्षित करते हुए इस विधा के भावी संकेतों को समझने की कोशिश की है।



इस कृति में हिंदी के महत्वपूर्ण काव्य नाटकों के स्वरूप, उनमें निहित युगबोध, उनकी विशिष्ट रचनात्मक भूमिका और मंचन की संभावनाओं के विविध आयामों पर विशद विवेचन किया गया है और यह प्रतिपादित किया गया है कि स्वातंत्र्योत्तर हिंदी काव्य नाटकों में कथ्य और शिल्प की अन्यान्य नूतन सरणियों के साथ युगचेतना की गहन संपृक्ति और दायित्वपूर्ण सरोकारों पर विशेष बल दिया गया है।


स्वातंत्र्योत्तर काव्य नाटकों का ऐतिहासिक दृष्टि से मूल्यांकन करने के लिए डॉ. मृगंेद्र राय ने समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण उपजे युगबोध को सफलतापूर्वक कसौटी बनाया है। वे मानते हैं कि इस
काल में जैसे-जैसे मोहभंग की स्थिति स्पष्ट होती गई वैसे-वैसे काव्य नाटकों के रचनाकार भी तत्कालीन परिस्थिति से असंतुष्ट और क्षुब्ध होकर युगीन विसंगतियों और विकृतियों को रूपायित करने के प्रति सचेत होते गए। इसमें संदेह नहीं कि इस काल में युवा पीढ़ी ने जिस बेचैनी और छटपटाहट का अनुभव किया, देश के आम जन के मन में भ्रष्ट राजनीति के प्रति जो आक्रोश क्रमशः उग्र होता गया, परंपरागत मूल्यों और नैतिक आस्थाओं के प्रति जिस प्रकार की भ्रमपूर्ण स्थिति बनती गई, उस सबसे निर्मित बीसवीं शती के उत्तरार्ध के युगबोध को तत्कालीन हिंदी काव्य नाटकों में सफल और सशक्त अभिव्यक्ति मिली। लेखक के अनुसार डॉ. धर्मवीर भारती का ‘अंधायुग’ इस विकास क्रम में सर्वाधिक सशक्त काव्य नाटक है।


इस के बाद 1960 से 1975 के मध्य मोहभंग के साथ बौद्धिक आग्रह के बढ़ने का परिणाम यह हुआ कि लोग विज्ञान, वैश्विकता और स्थानीयता के संदर्भ में भारतीय परंपराओं और मूल्यांें के पुनः परीक्षण की जरूरत महसूसने लगे। दूसरी ओर जनवाद के आकर्षण ने साहित्य में आमआदमी को प्रतिष्ठित किया। यही वह समय था जब मनोविज्ञान से लेकर अस्तित्ववाद तक की विविध विचारधाराएँ स्वतंत्र भारत को आंदोलित कर रही थीं। इससे निर्मित नए युगबोध को नरेश मेहता ने ‘संशय की एक रात’ और ‘महाप्रस्थान’, दुष्यंत कुमार ने ‘एक कंठ
विषपायी’ तथा विनोद रस्तोगी ने ‘सूत पुत्र’ जैसे काव्य नाटकों के माध्यम से व्यक्त किया। लेखक ने दिखाया है कि इन रचनाकारों ने युद्ध की समस्या, शासन और जनता के संबंध, निरंकुश सामंती व्यवस्था के विरुद्ध जनतंत्र की
चेतना तथा जातिगत रूढ़ियों के दारुण परिणामों को गहरी संसक्ति के साथ उभारा है।


1975 के बाद व्यवस्था और जनता का संघर्ष जिस रूप में भारतीय लोकतंत्र में मुखर हुआ, लेखक ने तत्कालीन काव्य नाटकों में उसकी अभिव्यक्ति के उदाहरण के रूप में प्रभात कुमार भट्टाचार्य के ‘काठमहल’, ‘पे्रत शताब्दी’, ‘आगामी आदमी’, महेंद्र कार्तिकेय के ‘प्रतिबद्ध’ और ‘खंडित पांडुलिपि’ तथा अनूप अशेष के ‘अंधी यात्रा में’ जैसे काव्य नाटकों को युगीन सत्य की मार्मिक अभिव्यंजना में समर्थ माना है। इसी प्रकार वे यह स्पष्ट करते हैं कि देवेंद्र दीपक कृत ‘भूगोल राजा का खगोल राजा का’ आपात्काल की त्रासदी को बड़ी सफलता से व्यंजित करता है।


इस प्रकार लेखक ने यह प्रतिपादित किया है कि हिंदी काव्य नाटकों में विशेष रूप से स्वातंत्र्योत्तर काल में सामाजिक संपृक्ति, दायित्व चेतना, वैज्ञानिक बोध, नारी मुक्ति, जनचेतना, शोषितों की पक्षधरता, कुशासन के प्रति विद्रोह, परंपरा और मूल्यांे के पुनर्परीक्षण तथा इतिहास चेतना की कार्य कारण प्रक्रिया पर पुनर्विचार जैसी प्रवृत्तियों के माध्यम से युगबोध को व्यापक अभिव्यक्ति का अवसर मिला है।


इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि यद्यपि अपने समकालीन परिवेश की विशेषताओं से अवगत होने को युगबोध कहा जाता है तथापि साहित्य का युगबोध एकांतिक नहीं होता, वह अतीत और भविष्य दोनों में आवाजाही करता दीखता है। यही कारण है कि युगबोध से गहरे जुड़े हुए काव्य नाटक साहित्य का न तो विषय क्षेत्र ही सीमित या एकायामी है और न ही रूप किसी एक खाँचे में बँधा हुआ है। बल्कि अपने समय की जमीन पर पैर जमाए हुए ये रचनाकार अपनी वस्तु का चयन पौराणिक, मिथकीय, ऐतिहासिक, लोककथात्मक, यथार्थवादी और वैज्ञानिक क्षेत्रों से करते हैं और उसके सहारे किसी युगीन समस्या को उद्घाटित करते हैं। यह समस्या ‘अंधायुग’ की तरह वैश्विक और राजनैतिक भी हो सकती है तथा ‘उर्वशी’ की तरह मानसिक और आध्यात्मिक भी।


लेखक ने विचारधाराओं और युगबोध के संबंध को भी ध्यान में रखा है। माक्र्सवाद, अस्तित्ववाद,मनोविश्लेषणवाद आदि की जो ध्वनियाँ इन काव्य नाटकों में सुनाई पड़ती हंै वे इस बात का उदाहरण है कि कोई सिद्धांत जब रचनात्मक रूप में कृति में गुँथा हुआ होता है तो उसकी संपे्रषणीयता बढ़ जाती है। यहाँ दिनकर की रचना ‘उर्वशी’ का उल्लेख किया जाता है कि नर नारी संबंध के विषय में इस कृति में रचनाकार ने कामाध्यात्म के जटिल दर्शन को सहज संपे्रषणीय बनाकर प्रस्तुत किया है। अपने समय की अन्य कृतियों के बीच ‘उर्वशी’ इसलिए भी विशिष्ट है कि इसके कवि की रचनात्मक मानसिकता छायावादोत्तर काल की है और उसमें राष्ट्रीय सांस्कृतिक दृष्टियों का घनत्व लक्षित किया जा सकता है। यही कारण है कि इसमें मिथकीय पात्रों की संवेदना का वह आधुनिक रूप नहीं मिलता जो ‘अंधायुग’, ‘महाप्रस्थान’ और ‘संशय की एक रात’ जैसी रचनाओं में मिलता है। लेखक की मान्यता है कि दिनकर की ‘उर्वशी’ का कामाध्यात्म पुनरुत्थान के संदर्भ में एक नया बोध है, एक स्वतंत्र नवीन मूल्य की स्थापना है, जिसमें अतीत की ग्राह्य सामग्री ‘अनासक्ति’ और ‘निष्काम भाव’, नवीन की भौतिकता में अपने लौकिक प्रवृत्तिमय रूप के साथ मिलकर ‘विश्वबंधुत्व’ के विस्तार का आलोक समेटे हुए है।


जैसा कि आरंभ में ही कहा गया कि युगबोध की अभिव्यक्ति वस्तु चयन के स्तर पर ही नहीं होती, बल्कि शिल्पगत प्रयोग भी उसे प्रकट करते हंै। आधुनिक मानसिकता का यह प्रतिफलन काव्य नाटकों के शिल्प में भी दिखाई देता है। आधुनिक काव्य नाटकांे के मुख्यतः तीन वर्ग हंै जो क्रमशः पुराकथा, इतिहास और वर्तमान समस्याओं के यथार्थ पर आधारित हंै। ये आधार निश्चय ही आधुनिक युगबोध से पे्ररित हैं। इसी प्रकार ये काव्य नाटक मंच विधान संबंधी नए प्रयोगों को ध्यान में रखकर रचे गए है जिस कारण आधुनिक युगबोध इनमें शिल्पित दिखाई देता है। लेखक ने लक्षित किया है कि मंच की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए आधुनिक काव्य नाटकों में स्वगत कथनों के बहिष्कार की प्रवृत्ति बढ़ी है। साथ ही कविता की लयात्मकता और गद्य की प्रभावशीलता को अर्थ पर विशेष बल देते हुए साधने का प्रयास दिखाई देता है। इतना ही नहीं, भाव के आधार पर पात्र की लय का परिवर्तन भी अत्यंत महत्वपूर्ण शिल्पगत प्रयोग है। इसी प्रकार समकालीन विषय पर आधारित काव्य नाटकों में भाषा की काव्यात्मकता क्रमशः कम होती गई है और गद्यात्मकता का आधिक्य दिखाई देता है। लेखक का मत है कि भाषा की बिंबात्मकता ऐसे अवसर पर विशेष नाटकीयता उत्पन्न करती है। इस प्रकार डॉ. मृगेंद्र राय की ‘‘हिंदी काव्य-नाटक और युगबोध’’ शीर्षक इस कृति को वस्तु और शिल्प के स्तर पर स्वातंत्र्योत्तर काव्य नाटकों की उपलब्धियों को युगबोध के निकष पर परखने वाली प्रामाणिक शोध कृति माना है। इसमें संदेह नहीं कि लेखक के निष्कर्ष मौलिक और भावी शोध को नई दिशा प्रदान करने वाले हंै। निश्चय ही, हिंदी जगत में इस वैदृष्यपूर्ण ग्रंथ को पर्याप्त सम्मान प्राप्त होगा।


*हिंदी काव्य-नाटक और युगबोध /
डॉ.मृगेंद्र राय /
नेशनल पब्लिशिंग हाउस,
23, दरियागंज, दिल्ली-110 002 /
संस्करण 2008 / 595 रुपये /
३३२ पृष्ठ सजिल्द।


एक पत्र पढने का सुयोग

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एक पत्र पढने का सुयोग




अभी एक पत्र पढने का सुयोग हुआ। आप भी उसे अविकल रूप में अवश्य पढ़ें

क.वा.





मित्रो



“नरसी भगत” नाम की फिल्म में हेमंत कुमार आदि का गाया “दरशन दो घनश्याम नाथ” भजन बहुत लोकप्रिय हुआ है। रचनाकार जाने माने कवि गोपाल सिंह नेपाली हैं। इस भजन के बोल पत्र के अन्त में दे रहा हूं।


नेपाली जी द्वारा गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचना “उर्वशी” का बंगला से हिन्दी में सुन्दर अनुवाद/भाष्यांतर १९६० में साप्ताहिक हिन्दुस्तान में देखा तो मुझे इतना अच्छा लगा कि पूरी लम्बी कविता को कण्ठस्थ कर लिया। तब मुझे बंगला नहीं आती थी। नेपाली जी ने कई हिन्दी फिल्मों के लिये गाने लिखे हैं और उनका नाम बम्बई के साहित्यकारों में अनजाना नहीं होना चाहिये।


इधर लगभग ६-८ सप्ताह से एक फिल्म “स्लमडौग मिलियनेयर” की बहुत चर्चा सुन रहा था। लोग कहते थे कि इसे सर्वश्रेष्ठ चलचित्र की श्रेणी में ऑस्कर के लिये मनोनीत किये जाने की संभावना है। सो, चार दिन पहले अपने राम बहुत दिनों के बाद एक सिनेमा हॉल में घुस गये इसे देखने के लिये।


संभव है कि यह औसत हिन्दी फिल्मों की अपेक्षा अच्छी फिल्म कहलाये। कुछ कैमरा तकनीक के आधार पर, कुछ निर्देशन के कारण। लेकिन कुछ बातें ऐसी खलीं कि सिनेमा हॉल से निकलते समय मन थोड़ा खिन्न था कि ऐसा अनुभव नहीं हुआ जिसकी भीतर जाते समय कल्पना की थी।


बाकी बातें अलग, ई-कविता में यह सब लिखने का उद्देश्य यह है कि फिल्म में एक प्रश्न उठाया गया कि “दरशन दो घनश्याम नाथ” यह भजन लिखने वाले कवि कौन थे। चार विकल्प दिये गये: सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, और कबीर। फिर बताया गया कि सही उत्तर है: सूरदास। ऐसा लगता है कि फिल्म के साहित्यिक सलाहकार (ऐसा कोई व्यक्ति होता होगा, नहीं तो होना चाहिये) महाशय ने सूरदास की रचना “अँखियां हरि दर्शन की प्यासी” कभी देखी होगी और वो उससे भ्रमित हो गये। कारण चाहे जो हो, एक गंभीर व महत्त्वाकांक्षी चलचित्र के निर्माता से ऐसी भूल अपेक्षित नहीं है। एक ओर तो नेपाली जी को उनकी रचना के लिये उपयुक्त श्रेय नहीं मिल, दूसरी ओर अब इस फिल्म के माध्यम से और तत्पश्चात अन्तर्जाल पर लोगों को तथ्य से दूर रखा जा रहा है।

पाठकों से निवेदन है कि वे विचार करें कि क्या इसका प्रतिवाद करना उचित व आवश्यक है और, यदि हां, तो किस प्रकार?

- घनश्याम




दरशन दो घनश्याम नाथ मोरी, अँखियाँ प्यासी रे

मन मंदिर की ज्योति जगा दो, घट घट बासी रे

मंदिर मंदिर मूरत तेरी

फिर भी ना दीखे सूरत तेरी

युग बीते ना आई मिलन की

पूरणमासी रे ...

द्वार दया का जब तू खोले

पंचम सुर में गूंगा बोले

अंधा देखे लंगड़ा चल कर

पहुँचे कासी रे ...

पानी पी कर प्यास बुझाऊँ

नैनों को कैसे समझाऊँ

आँख मिचौली छोड़ो अब

मन के बासी रे ...

निबर्ल के बल धन निधर्न के

तुम रखवाले भक्त जनों के

तेरे भजन में सब सुख पाऊँ

मिटे उदासी रे ...

नाम जपे पर तुझे ना जाने

उनको भी तू अपना माने

तेरी दया का अंत नहीं है

हे दुख नाशी रे ...

आज फैसला तेरे द्वार पर

मेरी जीत है तेरी हार पर

हार जीत है तेरी मैं तो

चरण उपासी रे ...

द्वार खड़ा कब से मतवाला

मांगे तुम से हार तुम्हारी

नरसी की ये बिनती सुनलो

भक्त विलासी रे ...

लाज ना लुट जाये प्रभु तेरी

नाथ करो ना दया में देरी

तीन लोक छोड़ कर आओ

गंगा निवासी रे ...



तालिबान पर मेहरबान

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15 लाख लोग अब 8वीं और 9वीं शताब्दी में धकेल दिए जाएँगे। लड़कियों के स्कूल बंद कर दिए जाएँगे। सारी औरतों को बुर्का पहनना पड़ेगा। सड़क पर वे अकेली नहीं जा सकेंगी। स्कूटर और कार चलाने का तो सवाल ही नहीं उठता। छोटी-मोटी चोरी करनेवालों के हाथ काट दिए जाएँगे। मर्द चार-चार औरतें रख सकेंगे। बात-बात में लोगों को मौत की सजा दी जाएगी। ये सारे काम स्वात में पहले से हो रहे हैं। स्वात के मिंगोरा नामक कस्बे में एक चौक का नाम ही खूनी चौक रख दिया गया है, जहाँ लगभग एक-दो सिर कटी लाशें रोज ही टाँग दी जाती हैं।

तालिबान पर मेहरबान
डॉ. वेदप्रताप वैदिक

पाकिस्तान सरकार की क्या इज्जत रह गई है ? क्या कोई उसे संप्रभु राष्ट्र की सरकार कह सकता है ? राष्ट्रपति जरदारी अमेरिकी टीवी चैनल से एक दिन कहते हैं कि तालिबान पाकिस्तान पर बस अब कब्जा करनेवाले ही हैं। वे सबसे बड़ा खतरा हैं। और दूसरे दिन वे तालिबान के आगे घुटने टेक देते है। स्वात घाटी में तालिबान के साथ 10 दिन के युद्ध-विराम समझौते पर दस्तखत कर देते है। पता ही नहीं चलता कि वे आतंकवाद से युद्ध लड़ रहे है या हाथ मिला रहे है। या तो पहले दिन वे झूठ बोल रहे थे या अब वे कोरा नाटक कर रहे हैं।


शायद वे दोनों कर रहे हैं। पहला बयान झूठा इसलिए था कि पाकिस्तानी फौज के मुकाबले तालिबान आतंकवादी मच्छर के बराबर भी नहीं है। अफगानिस्तान, पाकिस्तान और कश्मीर के सभी आतंकवादियों की संख्या कुल मिलाकर 10 हजार भी नहीं है। उनके पास तोप, मिसाइल, युद्धक विमान आदि भी नहीं हैं। वे फौजियों की तरह सुप्रशिक्षित भी नहीं हैं। लगभग 14 लाख फौजियों और अर्द्ध-फौजियोंवाली पाकिस्तानी सेना दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी सेना है। इतनी बड़ी सेना को 10 हजार अनगढ़ कबाइली कैसे पीट सकते हैं ? जो सेना भारत जैसे विशाल राष्ट्र के सामने खम ठोकती रहती है, जिसने धक्कापेल करके अफगानिस्तान को अपना पाँचवाँ प्रांत बना लिया था, जो जोर्डन के शाह की रक्षा का दम भरती रही है, वह तालिबान के आगे ढेर कैसे हो सकती है ? जिस सेना को बलूचिस्तान और सिंध के लाखों बागी डरा नहीं सके, वह क्या कुछ पठान तालिबान के आगे से दुम दबाकर भाग खड़ी होगी ? जरदारी का बयान सच्चाई का वर्णन नहीं कर रहा था, वह अमेरिकियों को धोखा देने के लिए गढ़ा गया था। जरदारी यदि तालिबान का डर नहीं दिखाएँगे तो अमेरिकी सरकार पाकिस्तान को मदद क्यों देगी ? तालिबान का हव्वा खड़ा करके भीख का कटोरा फैलाना जरा आसान हो जाता है।


यदि तालिबान सचमुच इतने खतरनाक थे तो जरदारी सरकार को चाहिए था कि वह उन पर टूट पड़ती, खास तौर से तब जबकि ओबामा के विशेष प्रतिनिधि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में थे। लेकिन हुआ उल्टा ही। स्वात घाटी और मलकंद संभाग के क्षेत्र में अब शरीयत का राज होगा। तहरीके-निफाजे-शरीयते-मुहम्मदी के नेता सूफी मुहम्मद को इतनी ढील बेनजीर और नवाज ने कभी नहीं दी थी, जितनी जरदारी ने दे दी है। सूफी ने अपना शरीयत आंदोलन तालिबान के पैदा होने के पहले से शुरू कर रखा था। अफगानिस्तान में अमेरिकियों के आने के बाद सूफी की तहरीक में हजारों लोग शामिल हो गए। मुशर्रफ-सरकार ने सूफी को पकड़कर जेल में बंद कर दिया था। लेकिन उसे पिछले साल एक समझौते के तहत रिहा कर दिया गया। पाकिस्तानी सरकार मानती है कि सूफी नरमपंथी है और उसे थोड़ी-सी रियायत देकर पटाया जा सकता है। उसे मलकंद के तालिबान के खिलाफ भी इस्तेमाल किया जा सकता है। मलकंद के तालिबान के नेता हैं, मौलाना फजलुल्लाह, जो कि सूफी के दामाद हैं। पिछले साल पाकिस्तान सरकार के साथ हुए छह सूत्री समझौते को जब फजलुल्लाह ने तोड़ा तो सूफी ने फजलुल्लाह से कुट्टी कर ली लेकिन लगता है कि ससुर-दामाद ने अब यह नया नाटक रचा है।



स्वात के समझौते का यह नाटक पाकिस्तान की सरकार को काफी मँहगा पड़ेगा। इस समझौते के तहत सरकारी अदालतें हटा ली जाएँगी। उनकी जगह इस्लामी अदालतें कायम होंगी। जजों की जगह काजी बैठेंगे। वे शरीयत के मुताबिक इंसाफ देंगे। उनके फैसलों के विरूद्ध पेशावर के उच्च-न्यायालय या इस्लामाबाद के उच्चतम न्यायालय में अपील नहीं होगी। दूसरे शब्दों में स्वात के लगभग 15 लाख लोग अब 8वीं और 9वीं शताब्दी में धकेल दिए जाएँगे। लड़कियों के स्कूल बंद कर दिए जाएँगे। सारी औरतों को बुर्का पहनना पड़ेगा। सड़क पर वे अकेली नहीं जा सकेंगी। स्कूटर और कार चलाने का तो सवाल ही नहीं उठता। छोटी-मोटी चोरी करनेवालों के हाथ काट दिए जाएँगे। मर्द चार-चार औरतें रख सकेंगे। बात-बात में लोगों को मौत की सजा दी जाएगी। ये सारे काम स्वात में पहले से हो रहे हैं। स्वात के मिंगोरा नामक कस्बे में एक चौक का नाम ही खूनी चौक रख दिया गया है, जहाँ लगभग एक-दो सिर कटी लाशें रोज ही टाँग दी जाती हैं। लगभग पाँच लाख स्वाती लोग अपनी जान बचाकर वहाँ से भाग चुके हैं। तालिबान ने घोषणा कर रखी है कि उस क्षेत्र के दोनों सांसदों के सिर काटकर जो लाएगा, उसे 5 करोड़ रू. और जो सात विधायकों के सिर लाएगा, उसे दो-दो करोड़ का इनाम दिया जाएगा। स्वात के जो निवासी ब्रिटेन और अमेरिका में नौकरियाँ कर रहे हैं, उनके रिश्तेदारों को चुन-चुनकर अपहरण किया जाता है और उनसे 5-5 और 10-10 लाख की फिरौती वसूल की जाती है। तालिबान के आतंक के कारण स्वात, जिसे एशिया का स्विटजरलैंड कहा जाता था, अब लगभग सुनसान पड़ा रहता है। पर्यटन की आमदनी का झरना बिल्कुल सूख गया है। यह स्वात, जिसे ऋग्वेद में सुवास्तु के नाम से जाना जाता था और जो कभी आर्य ऋषियों की तपोभूमि था, आज तालिबानी कट्टरपंथ का अंधकूप बन गया है। प्राचीन काल के अनेक अवशेषों को कठमुल्ले तालिबान ने ध्वस्त कर दिया है। इस्लाम के नाम पर वे इंसानियत को कलंकित कर रहे हैं। वे सिर्फ स्वात पर ही नहीं, पूरे पाकिस्तान, अफगानिस्तान और भारत पर भी अपना झंडा फहराना चाहते हैं। स्वात के तालिबान कोई अलग-थलग स्वायत्त संगठन नहीं हैं। वे बेतुल्लाह महसूद के तहरीक़े-तालिबाने-पाकिस्तान के अभिन्न अंग है। यह महसूद वही है, जिसे बेनजीर भुट्टो का हत्यारा माना जाता है। आसिफ जरदारी की मजबूरी भी कैसी मजबूरी है ? अपनी बीवी के हत्यारों से उसे हाथ मिलाना पड़ रहा है।


इससे भी ज्यादा लज्जा की बात यह है कि यह समझौता सरहदी सूबे की नेशनल आवामी पार्टी की देख-रेख में हुआ है। आवामी पार्टी अपने आपको सेक्युलर कहती है। यह बादशाह खान, उनके बेटे वली और उनके पोते असफंदयार की पार्टी है। इस पार्टी ने हमेशा मजहबी कट्टरवाद के खिलाफ जमकर लड़ाइयाँ लड़ी हैं। पिछले साल के आम चुनावों में अवामी पार्टी ने सारी मजहबी पार्टियों के मोर्चे को पछाड़कर पेशावर में अपनी सरकार कायम की है। यह सरकार पीपल्स पार्टी के समर्थन से चल रही है। जनता का इतना बड़ा समर्थन होते हुए भी आवामी पार्टी को तालिबान के आगे घुटने क्यों टेकने पड़ रहे हैं ? अवामी पार्टी का कहना है कि इस समझौते के कारण आम आदमियों को न्याय मिलने में आसानी होगी और प्रशासन सुचारू रूप से चल सकेगा।


आवामी पार्टी का यह आशावाद साबुन के झाग-जैसा है। इसमें कोई दम दिखाई नहीं देता। यह तर्क बहुत बोदा है कि इस पहल के कारण तालिबान में फूट पड़ जाएगी और यह समझौता पाकिस्तान में नई सुबह का आगाज करेगा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी कह रहे हैं कि यह संवाद, विकास और सजा की त्रिमुखी नीति है। इस समझौते के कारण तालिबान से संवाद कायम हो रहा है। वास्तव में यह समझौता पाकिस्तान और अफगानिस्तान के अन्य तालिबान की हौसला-आफजाई करेगा। वजीरिस्तान के जिन तालिबान ने पिछले साल डेढ़ सौ फौजियों को गिरफ्तार कर लिया था, अब उनके हौंसले पहले से भी अधिक बुलंद हो जाएँगें। तालिबान को अब समझ में आ गया है कि पाकिस्तानी फौज के घुटने कैसे टिकाएँ जाते हैं। ध्यान रहे कि पिछले तीन-चार साल में जितने भी समझौते तालिबान के साथ हुए हैं, वे सब बीच में ही टूटते रहे और उस ढील का फायदा उठाकर तालिबान ने अफगानिस्तान में अपनी आतंकी गतिविधियों को काफी जोर-शोर से बढ़ा दिया।


इस समझौते से अमेरिका और भारत दोनों ही खुश नहीं हो सकते। ओबामा ने अपने विशेष प्रतिनिधि रिचर्ड होलब्रुक को पाकिस्तान, अफगानिस्तान और भारत आखिर किसलिए भेजा था ? क्या इसलिए नहीं कि वे मालूम करें कि अल-क़ायदा और तालिबान का समूलोच्छेद कैसे करें ? पाक और अफगान सरकार के हाथ कैसे मजबूत करें लेकिन होलबु्रक क्या सबक अपने साथ लेकर गए ? तालिबान का नाश करनेवाली पाकिस्तानी सरकार उन्हीं तालिबान के साथ बैठकर एक ही थाल में जीम रही है। होलब्रुक को बताया गया कि अफगानिस्तान में फौजें बढ़ाने की क्या जरूरत हैं ? देखिए न, स्वात में तो हमने तालिबान को पटा ही लिया है। अब यही मॉडल हम पूरे सरहदी सूबे और बलूचिस्तान में भी लागू कर देंगे और हामिद करजई चाहें तो वे भी अपने तालिबान-प्रभावित प्रांतों में यही कर सकते हैं। जो काम बोली से हो सकता है, उसके लिए गोली क्यों चलाई जाए ? यह चकमा ओबामा-प्रशासन क्यों खाएगा ? होलब्रुक को पता चल गया है कि तालिबान और पाकिस्तानी फौज का चोली-दामन का साथ है। उनकी मिलीभगत है। वे कभी-कभी नूरा कुश्ती का नाटक भी रचाते हैं ताकि दुनिया उन पर पैसे उछाले लेकिन यह खेल अब लंबा चलनेवाला नहीं है। यह असंभव नहीं कि होलब्रुक पर इस मामले का उलटा असर पड़ा हो। यदि वे पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान की चालबाजी ठीक से समझ गए तो अब उन्हें पाक-अफगान गुत्थी को सुलझाने के लिए एकदम नई रणनीति पर विचार करना होगा। ओबामा-प्रशासन ने दक्षिण एशियाई विशेषज्ञ ब्रूस राइडल को 60 दिनों में जो नई पाक-अफगान नीति तैयार करने का ठेका दिया है, उस काम में स्वात-समझौता अपना अलग योगदान करेगा। स्वात-समझौता फौज और तालिबान की मिलीभगत का ठोस प्रमाण हैं। ब्रूस राइडल को यह अच्छी तरह समझ लेना होगा कि पाकिस्तान की फौज और सरकार तालिबान आतंकवादियों से अपने दम-खम पर कभी नहीं लड़ेगी। वह उनसे खुले या गुप्त समझौते करते रहेगी।


जैसे मुंबई-हमले के सवाल पर अमेरिकी डंडा बजते ही जरदारी-सरकार ने सच उगल दिया, वैसे ही जब तक अमेरिकी सरकार पाकिस्तान को सीधी कार्रवाई की धमकी नहीं देगी या मदद बंद करने का डर पैदा नहीं करेगी, तालिबान दनदनाते रहेंगे। यह कड़वा सच है लेकिन इसे ओबामा-प्रशासन को मानना होगा कि पाकिस्तान का सत्ता-प्रतिष्ठान और तालिबान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उनमें गहरी सांठ-गाँठ है। पाकिस्तान की बेकसूर जनता और भोले नेताओं में इतना दम नहीं कि वे इस सांठ-गाँठ को तोड़ सकें। वे बेचारे तो अपने उच्चतम न्यायालय में इतिखार चौधरी को भी वापस नहीं ला पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में अमेरिका को यह भूलना होगा कि पाकिस्तान आतंकवादी-विरोधी युद्ध में उसका सहयोद्धा है। वास्तव में वह आतंकवाद-विरोधी युद्ध में भितरघाती की भूमिका निभा रहा है। भितरघाती को सहयोद्धा समझने की भूल बुश-प्रशासन निरंतर करता रहा। इसी का परिणाम है कि मुशर्रफ की बिदाई के बावजूद पाकिस्तान के लोगों पर फौज का शिकंजा अभी तक ढीला नहीं पड़ा है। अमेरिका उसी फौज की मांसपेशियों का मजबूत बनाता रहा, जो तालिबान को प्रश्रय देती रही और पाकिस्तान के लोकतंत्र की जड़ें खोदती रही। यदि अमेरिका चाहता है कि दक्षिण एशिया से आतंकवाद का उन्मूलन हो, पाकिस्तान में स्वस्थ लोकतंत्र कायम हो और पाकिस्तान की जनता सुख-चैन से जी सके तो उसे पाकिस्तान के सत्ता-प्रतिष्ठान को गहरे शक की नजर से देखना होगा। इस सैन्य-प्रतिष्ठान ने पाकिस्तान की संप्रभुता को तालिबान और अल-क़ायदा के हाथों गिरवी रख दिया है। इस पैंतरे का इस्तेमाल करके पाकिस्तान भारत से बदला निकालता है और अमेरिका से अरबों डॉलर झाड़ता है। इसलिए ओबामा प्रशासन को जरा भी नहीं झिझकना चाहिए। उसे आतंकवादियों के विरूद्ध सीधी कार्रवाई करनी चाहिए। पाकिस्तान की संप्रभुता तो कोरी कपोल-कल्पना है। उसे सच्चे अर्थों में पुनर्जीवित करने और उसे पाकिस्तान की जनता को सौंपने के लिए अमेरिकी नीतियों में बुनियादी परिवर्तन की जरूरत है।


(लेखक पाक-अफगान मामलों के विषेषज्ञ हैं)

मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में

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गतांक से आगे


मणिपुरी कविता :
मेरी दृष्टि में
- डॉ. देवराज
(२१)


द्वितीय समरोत्तर मणिपुरी कविता: एक दृष्टि
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विश्व युद्ध के दौरान मणिपुर वासियों में एक अजब सी दुविधा थी। एक ओर तो वे अंग्रेज़ों के विरुद्ध स्वतंत्रता की लडा़ई लड रहे थे तो दूसरी ओर अंग्रेज़ी सेना के साथ विश्व युद्ध में भाग ले रहे थे! इसी कशमकश को डॉ। देवराज ने यूँ बयान किया:"द्वितीय विश्व युद्ध का एक हिस्सा मणिपुर की भूमि पर लडा़ गया। उस युद्ध के अनेक प्रत्यक्षदर्शी अभी भी जीवित हैं और वे उस समय के लोमहर्षक वर्णन सुनाते हैं। इम्फ़ाल निवासी दूर-दूर गाँवों की ओर भाग गये थे। युद्ध समाप्ति पर जब लोग अपने घरों को लौटे तो उनका बहुत कुछ नष्ट हो चुका था। फ़िर से उन्हें अपने को व्यवस्थित करने में लम्बा समय लगा। "विश्वयुद्ध लड़ने वाले देशों को मित्र-राष्ट्र और शत्रु-राष्ट्र कहा गया था। मणिपुर में युद्ध करनेवाला मित्र-राष्ट्र ब्रिटेन था और शत्रु-राष्ट्र जापान। अब ज़रा मणिपुर के सन्दर्भ में इन देशों की स्थिति को देखा जाए। ब्रिटेन, जिसे मित्र राष्ट्र कहा गया [यह शब्द ब्रिटेन ने इसे अपने लिए गढा़ और वह न्याय के लिए फासीवाद के विरुद्ध दूसरे देशों का अगुआ बन गया], मणिपुर की सम्प्रभुता का विनाशक था। इस कारण मणिपुर की आम जनता अपने मन में अंग्रेज़ों के विरुद्ध घृणा रखती थी। अतः ब्रिटेन से उसका कोई मानसिक लगाव नहीं था। उधर जापान, जिसे शत्रु देश घोषित किया गया था, सुभाषचन्द्र बोस के भारतीय स्वतन्त्रता संघर्ष का सबसे बडा़ सहायक था। सुभाषचन्द्र बोस, भारतीय की अंग्रेज़ों से मुक्ति के लिए, स-शस्त्र संघर्ष कर रहे थे और माणिपुर की जनता उस संघर्ष के द्वारा अंग्रेजी साम्राज्यवाद से अपनी मुक्ति भी देख रही थी। यदि उस समय जापान पर बमबारी न की जाती और सुभाष अंग्रेज़ों के विरुद्ध युद्ध जीत जाते तो सबसे पहले मणिपुर राज्य ही गुलामी से मुक्त होता। इस स्थिति में यहाँ की जनता किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई; क्योंकि उसके लिए एक ओर ब्रिटेन था, जिसे केवल गांधीजी के आग्रह पर सारे भारत ने मित्र राष्ट्र माना था। दूसरी ओर जापान था, जो भारतीय स्वतन्त्रता के लिए लड़ रहा था, किन्तु जिसे शत्रु राष्ट्र की कोटि में रखा गया था और फासीवाद का हिमायती देश माना गया था। ऐसे मोड़ पर मणिपुर की आम जनता की शारीरिक और मानसिक किसी भी स्तर पर युद्ध में भागीदारी नहीं रही।"
....क्रमशः



प्रस्तुति सहयोग : चंद्र मौलेश्वर प्रसाद


मेरी आहत भावनाएँ

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दुनिया मेरे आगे


मेरी आहत भावनाएँ




मंगलूर में पेयशाला में स्त्रियों के जाने और कोलकाता में धार्मिक रूढ़ियों की आलोचना से लोगों की भावनाएँ आहत हुईं। कोलकाता में पुलिस ने आहत भावनाओं को शांत करने के लिए संपादक और प्रकाशक को गिरफ्तार कर लिया, तो मंगलूर में जिनकी भावनाएँ आहत हो रही थीं, वे खुद हाथ-पैर चलाने लगे। यह देख कर मैं सोचने लगा कि मुझे भी अपनी आहत भावनाओं का कुछ करना चाहिए। ज्यादा कुछ नहीं कर सकता, तो उनकी सूची बना कर जनता जनार्दन के समक्ष पेश तो कर ही सकता हूँ।


सुबह उठते ही मेरी भावनाओं के आहत होने का सिलसिला शुरू हो जाता है। दिन की पहली चाय के साथ अखबारों का बंडल जब बिस्तर पर धमाक से गिरता है, तो तुरंत खयाल आता है कि सुबह-सवेरे मेरे घर के दरवाजे पर अखबार पहुँचाने के लिए लिए कितने लोगों को रात भर काम करना पड़ा होगा। सबसे ज्यादा अफसोस होता है अपने हॉकर पर। वह बेचारा चार-पाँच बजे तड़के उठा होगा, अखबारों के वितरण केंद्र पर गया होगा, वहाँ से अखबार उठाए होंगे और अपनी साइकिल पर रख कर उन्हें घर-घर पहुँचाता होगा। यहाँ तक कि साप्ताहिक अवकाश भी नहीं मिलता, जिसे दुनिया भर में मजदूरों का मूल अधिकार माना जाता है।


अखबार पढ़ने लगता हूं, तो कम से कम दो चीजें मुझे आहत करती हैं। पहली चीज हत्या और आत्महत्या के समाचार हैं। सभी हत्याओं को रोका नहीं जा सकता, लेकिन ऐसी हत्या-निरोधक संस्कृति तो बनाई ही जा सकती है जिसमें रोज इतनी मारकाट न हो। आत्महत्याओं का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसे व्यक्ति की नहीं, समाज की विफलता के रूप में चिह्नित किया जा सकता है। व्यवस्था को सुधार कर ये आत्महत्याएँ भी रोकी जा सकती हैं। जो दूसरी चीज मेरी भावनाओं को आहत करती है, वह है देशी-विदेशी सुंदरियों की सुरुचिहीन तसवीरें। यह देख कर मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं कि भगवान द्वारा दिए गए सौंदर्य के अद्भुत उपहार का कैसा भोंडा इस्तेमाल करने के लिए इन्हें प्रेरित और विवश किया जा रहा है।


जब तैयार हो कर काम पर निकलता हूँ, तो भावनाओं का आहत होना फिर शुरू हो जाता है। जब अपनी सोसायटी के सफाईकर्ता पर नजर उठती है, तो शर्मशार हो जाता हूँ। वह दिन भर घर-घर से कूड़ा-कचरा जमा करता है, सोसायटी की सीढ़ियों और सड़कों को झाड़ू से बुहारता है और बदले में उसे महीने में तीन-चार हजार भी नहीं मिलते। यही दुर्दशा चौकीदारों की है, जो सोसायटी में रहनेवाले परिवारों की सुरक्षा का खयाल रखते हैं। सोसायटी से बाहर आने पर गली में कई ऐसे बच्चे मिलते हैं जिन्हें देख कर कुपोषण की राष्ट्रीय समस्या का ध्यान आता है। वे कामवालियाँ भी दिखाई देती हैं जो एक ही दिन में कई घरों की साफ-सफाई, चौका-बरतन आदि करती हैं और हमारा जीवन आसान बनाती हैं, फिर भी जिन्हें देख कर लगता नहीं है कि इससे होनेवाली आमदनी से उनके परिवार का काम अच्छी तरह चल जाता होगा।


सड़क पर आने के बाद दाएँ-बाएँ कचरे के ढेर मेरी भावनाओं को आहत करते हैं। फिर मिलती हैं सिगरेट और गुटके की एक के बाद एक चार दुकानें। इन्हें देखते ही गुस्सा आ जाता है कि हमारा स्वास्थ्य मंत्री अपना काम क्यों नहीं कर रहा है। वह सिगरेट और गुटकों के कारखाने बंद नहीं करा सकता, तो कम से कम इतना तो कर ही सकता है कि इन दुर्पदार्थों की दो दुकानों के बीच कम से कम एक किलोमीटर का फासला रखे। दफ्तर जाने के लिए ऑटोरिक्शा लेने की कोशिश करता हूं, तो पाँच में से चार मीटर पर चलने से इनकार कर देते हैं। हर बार मेरी भावनाएँ बुरी तरह आहत होती हैं। तब तो होती ही हैं जब मैं देखता हूं कि पाँच-पाँच, छह-छह लाख की बड़ी-बड़ी गाड़ियों में लोग अकेले भागे जा रहे हैं और उनसे तीन गुना बड़े आकार की बसों में सौ-सौ आदमी-औरतें ठुंसे हुए हैं। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब सड़क पर हफ्तों से नहाने के अवसर से वंचित, दीन-हीन चहरे कुछ बेचते हुए या सीधे भीख माँगते हुए न दिखाई पड़ते हों। फुटपाथ पर लेटी हुई ऐसी मानव आकृतियाँ भी दिखाई देती रहती हैं जिनका अहस्ताक्षरित बयान यह है कि इस दुनिया में हमारे लिए कोई जगह नहीं है।


क्या-क्या बयान करुँ। रास्ते में कई आलीशान होटल पड़ते हैं। इनके एक कमरे का एक दिन का किराया आठ-दस हजार रुपए है। यह याद कर मेरा खून खौलने लगता है। एक सरकारी अस्पताल भी पड़ता है। उसमें दाखिल रोगियों के हालात की कल्पना कर मन अधीर हो जाता है। कभी-कभी रास्ता कुछ देर के लिए बंद कर दिया जाता है, क्योंकि कोई वीआइपी गुजर रहा होता है। दफ्तर में कुछ लोगों को पाँच हजार रुपए महीना मिलता है, तो कुछ को पचास हजार। शाम को घर लौटता हूं, तो जगह-जगह जाम मिलता है। घर पहुँच कर टीवी खोलता हूँ तो फिर भावनाएँ आहत होने लगती हैं। इस बेईमान, बदमाश, अपराधी, फूहड़ और विज्ञापनी दुनिया में रहने के लिए हमें कौन बाध्य कर रहा है?


- राजकिशोर




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चाटुकारिता के बदले : अपील? सर, एव्रीबॉडी इज हैप्पी.....

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राग दरबारी


चाटुकारिता के बदले





काँग्रेस के केंद्रीय कार्यालय में राहुल गाँधी पार्टी के काम-काज में मशगूल थे। बायीं ओर की दीवार पर तरह-तरह के रंग-बिरंगे चार्ट लग हुए थे। एक चार्ट में लोक सभा के चुनाव क्षेत्रों का नक्शा था। दूसरे चार्ट में पिछले दो चुनावों में काँग्रेस पार्टी के हारने-जीतने का ब्यौरा था। तीसरे चार्ट पर कुछ नारे लिखे हुए थे, जैसे झोपड़ियों में जाएँगे, भारत नया बनाएँगे; दलित जगेगा देश जगेगा, बेशक इसमें वक्त लगेगा; काम करेंगे, नाम करेंगे, चाटुकार आराम करेंगे आदि-आदि। सामने तीन लैपटॉप खुले हुए थे। राहुल गाँधी कभी इस लैपटॉप पर, कभी उस लैपटॉप पर काम करने लगते। मेज पर दो मोबाइल फोन रखे हुए थे। तीसरा उनकी जेब में था। हर चार-पाँच मिनट पर कोई न कोई मोबाइल बज उठता। काम करते-करते राहुल गाँधी मोबाइल पर बात भी करते जाते थे। वे सुनते ज्यादा थे, बोलने के नाम पर हाँ, हूँ, क्यों, कैसे, कब, अच्छा कहते जाते थे। चेहरे पर मुसकराहट कभी आती, कभी चली जाती।

तभी इंटरकॉम बज उठा। उधर से आवाज आई -- सर, एक नौजवान आपसे मिलना चाहता है।

राहुल गाँधी – कह दो, इस समय मैं किसी से नहीं मिल सकता।

उधर से -- सर, मैं कई बार कह चुका हूँ। पर मानता ही नहीं है।

राहुल गाँधी – नो वे। इस वक्त बहुत बिजी हूँ।

उधर से -- सर, इसे दो मिनट टाइम दे दें। नहीं तो यह यहीं पर सत्याग्रह पर बैठ जाएगा। प्रेसवाले इधर-उधर घूमते ही रहते हैं ....

राहुल गाँधी -- ओके, ओके, भेज दो। पर दो मिनट से ज्यादा नहीं।


दरवाजा खटखटा कर नौजवान ने कमरे में प्रवेश किया। देखने से ही छँटा हुआ गुंडा लग रहा था। झक्क सफेद खादी का कुरता-पाजामा। गले में सोने की चेन। कलाई पर मँहगी घड़ी। चप्पलें ऐसी मानो अभी-अभी कारखाने से आई हों। नौजवान ने पहले राहुल गाँधी को सैल्यूट जैसा किया और मेज पर फूलों का गुलदस्ता रख दिया। राहुल गांधी सिर उठा कर एकटक देखे जा रहे थे।

नौजवान कुछ बोल नहीं रहा था। उसकी नजर राहुल के सौम्य चेहरे पर टँगी हुई थी, जैसे वह आह्लाद के आधिक्य से चित्र-खचित हो गया हो। इसके पहले उसने किसी बड़े नेता को इतनी नजदीकी से नहीं देखा था। एक मिनट इसी में बीत गया।

राहुल ने मुसकरा कर पूछा – टिकट चाहिए? कहाँ के हो?

नौजवान -- अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। आपके दर्शन पाने के बाद मेरी हर इच्छा पूरी हो गई।

राहुल – चापलूसी कहाँ से सीखी? क्या तुम्हारा परिवार पुराना काँग्रेसी है?

नौजवान -- सर, हम लोग तीन पुश्तों से काँग्रेसी है। मेरे दादा ने साल्ट मार्च में हिस्सा लिया था।

राहुल -- साल्ट मार्च? यह कब की बात है?

नौजवान -- सर, द फेमस दांडी मार्च...

राहुल -- ओह। अब तुम जा सकते हो। दो मिनट हो गए।

नौजवान – थैंक्यू सर। लेकिन असली बात तो रह ही गई।

राहुल – तीस सेकंड में बोलो और चलते बनो। मैं बहुत बिजी हूँ।

नौजवान -- सर, मैं अपने क्षेत्र की तरफ से आपको बधाई देने आया हूँ कि...

राहुल – किस बात की बधाई?

नौजवान – कि आपने चापलूसी कल्चर के खिलाफ आह्वान कर एक क्रांतिकारी काम किया है। यह तो महात्मा गाँधी भी नहीं कर सके।

राहुल – तो तुम्हें यह बात पसंद आई?

नौजवान -- बहुत, बहुत पसंद आई। मैं तो शुरू से ही आपकी रिस्पेक्ट करता आया हूँ। लोक सभा में आपका भाषण सुनने के बाद तो मैं आपका मुरीद हो गया। सर, आपका भाषण सबसे डिफरेंट रहा। मैंने तो उसका वीडियो बनवा कर रख लिया है।

राहुल -- हूँ...

नौजवान -- सर, आप एकदम नई लाइन पर जा रहे हैं। दलितों की झोपड़ियों में जाना, वहाँ खाना खाना, रात भर सोना... काँग्रेस में नई जान फूँक दी है आपने।

राहुल गाँधी असमंजस में पड़ जाते हैं। कभी दीवार पर लगे चार्टों को देखते हैं कभी सामने पड़े लैपटॉप पर।

नौजवान -- सर, चापलूसी खत्म करने की आपकी बात तो एकदम निराली है। आज तक किसी भी दल के नेता ने इतनी ओरिजिनल बात नहीं कही है। देश से चापलूसी का कल्चर खत्म हो जाए तो हम देखते-देखते अमेरिका और जापान से कंपीट कर सकते हैं।

राहुल – तुम्हारा मतलब है, आम जनता को मेरा यह मेसेज अपील कर रहा है?

नौजवान -- अपील? सर, एव्रीबॉडी इज हैप्पी। चापलूसी के चलते ही हमारा देश आगे नहीं बढ़ पा रहा है। जैसे खोटा सिक्का अच्छे सिक्के को चलन से बाहर कर देता है, वैसे ही चापलूस लोग योग्य आदमियों को पीछे धकेल देते हैं। ऐसे में तरक्की कैसे होगी?

राहुल -- अच्छा, ठीक है। अब तुम...

नौजवान – नो सर, इस मामले में आपको लीड लेना ही होगा। आप ही काँग्रेस से चापलूसी का कल्चर खत्म कर सकते हैं। देश का यूथ आपके साथ है। आप सिर्फ नेतृत्व दीजिए। काम करने के लिए हम लोग हैं न।

राहुल – यू आर राइट। यूथ को एक्टिव किए बिना कुछ नहीं होगा।

नौजवान -- सर...

राहुल -- ओके, योर टाइम इज ओवर।

नौजवान राहुल के पाँवों की धूल लेने के लिए गुजाइश खोजता है। पर राहुल जहाँ बैठे हैं, उसे देखते हुए यह मुश्किल लगता है। सो वह प्रणाम-सा करते हुए दरवाजे की ओर मुड़ता है।

राहुल -- बाइ द वे, तुम अपना सीवी सेक्रेटरी के पास छोड़ते जाना। देखता हूँ...

नौजवान पहले से अधिक आत्म-विभोर हो जाता है। कार्यालय के बाहर उसके दोस्त-यार उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। नौजवान अपनी दो उँगलियों को वी की शक्ल में उन्हें प्रदर्शित करता है। सभी एक बड़ी गाड़ी में बैठते हैं। नौजवान ड्राइवर को आदेश देता है -- होटल अशोका।


- राजकिशोर


क्यों डरें महर्षि वैलेंटाइन से ?

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क्यों डरें महर्षि वैलेंटाइन से ?


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पब,शराबबंदी, गुंडागर्दी और गांधीगीरी : लड़कियाँ और विरोध

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"राम के नाम पर यह कैसा काम ? लड़के पिएँ तो कुछ नहीं और लड़कियाँ पिएँ तो हराम ? पब से सिर्फ़ लड़कियों को पकड़ना, घसीटना और मारना - इसका मतलब क्या हुआ? क्या यह नहीं कि हिंसा करने वाले को शराब की चिंता नहीं है बल्कि लड़कियों की चिंता हैवे शराब-विरोधी हीं हैं, स्त्री-विरोधी हैं। यदि शराब पीना बुरा है, मदिरालय में जाना अनैतिक है, भारतीय सभ्यता का अपमान है, तो क्या यह सब तभी है, जब स्त्रियाँ वहाँ जाएँ? यदि पुरुष जाए तो क्या यह सब ठीक हो जाता है? इस पुरुषवादी सोच का नशा अंगूर की शराब के नशे से ज्यादा खतरनाक है. शराब पीकर पुरुष जितने अपराध करते हैं, उस से ज्यादा अपराध वे पौरुष की अकड़ में करते हैंइस देश में पत्नियों के विरूद्ध पतियों के अत्याचार की कथाएँ अनंत हैंकई मर्द अपनी बहनों और बेटियों की हत्या इसलिए कर देते हैं कि उन्होंने गैर-जाति या गैर- मजहब के आदमी से शादी कर ली थीजीती हुई फौजें हारे हुए लोगों की स्त्रियों से बलात्कार क्यों करती हैं ? इसलिए कि उन पर उनके पौरुष का नशा छाया रहता हैबैगलूर के तथाकथित राम-सैनिक भी इसी नशे का शिकार हैंउनका नशा उतारना बेहद जरूरी हैस्त्री-पुरुष समता का हर समर्थक उनकी गुंडागर्दी की भर्त्सना करेगा"


सामयिक घटना पर केंद्रित विचारोत्तेजक संतुलित लेख -


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