समस्या का समाधान, बच्चों का दृष्टिकोण



समस्या का समाधान, बच्चों का दृष्टिकोण
सुधा सावंत

 
 
 
बात 1996 की है। मैं एक विद्यालय में प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाती थी। सीनियर सैकेण्डरी के विद्यार्थियों को पढ़ाने के बाद इन नन्हे मुन्नों को पढ़ाने में बड़ा आनन्द आ रहा था। उन के विचार और तर्कों को सुन कर कभी कभी मैं चमत्कृत रह जाती थी और मन ही मन इन मेधावी बच्चों की प्रगति के लिये ईश्वर से प्रार्थना करती थी ।  


एक दिन मैं कक्षा पाँच में विद्यार्थियों को महाभारत की कहानी सुना रही थी। वह पुस्तक में एक पाठ के रूप में लिखित थी। एक स्थान पर लेखक ने लिखा था कि गांधारी बहुत पतिव्रता स्त्री थी| उनके पति अंधे थे अत: गांधारी सोचती थी कि यदि उनके पति महाराजा धृतराष्ट्र अंधे है यदि वे सृष्टि की सुन्दरता नहीं देख सकते तो वे भी इस सुन्दरता को नहीं देखेंगी। पाठ में आगे वर्णन था कि कौरव और पांडव गुरु द्रोणाचार्य से शस्त्र-संचालन की शिक्षा लेते थे। पांडव आरंभ से ही बड़ी विनम्रता पूर्वक अध्ययन करते थे, शस्त्र संचालन का अभ्यास करते थे। उनका व्यवहार भी सब के साथ बहुत स्नेहपूर्ण था। परन्तु कौरवों में दुर्योधन दुश्शासन आदि सभी से बुरा व्यवहार करते थे। भीम को एक बार उन्होंने विषाक्त खीर खिला दी थी।  


पाठ पूर्ण हुआ। प्रश्नोत्तर का समय आया ।एक विद्यार्थी ने पूछा – अध्यापिका जी, पतिव्रता का क्या अर्थ होता है। मैंने सामान्य सा उत्तर दिया – पति के अनुकूल काम करने वाली, या पति के व्रतों को पूरा करने वाली स्त्री। विद्यार्थी अपने प्रश्न का उत्तर खोज रहा था। उसने अपनी शंका स्पष्ट की- पूछा अध्यापिका जी अगर गांधारी अपनी आंखों पर पट्टी नहीं बांधतीं  और अपने बच्चों को ठीक से पढ़ातीं, होमवर्क करातीं तो उनके बच्चे दुर्योधन, दुश्शासन आदि इतने उद्दण्ड और क्रूर न होते।  


मैं दंग रह गई। आज बच्चे पौराणिक कहानियों को अपने संदर्भ में देखना - परखना चाहते हैं। पाँचवीं कक्षा के विद्यार्थी के लिये माता की भूमिका यही है कि वह बच्चों का सही मार्ग दर्शन करे। केवल पतिव्रता बन कर वह माता का दायित्व नहीं निभा सकतीं। वह छोटा सा पाँचवीं कक्षा का छात्र जीवनदर्शन का एक महत्वपूर्ण पाठ मुझे समझा रहा था। मैं आश्चर्य-चकित थी। आज के समाज में व्याप्त अव्यवस्था को सुधारने का यही एक उपाय है कि माता पिता के रूप में वे पहले अपना दायित्व ठीक से निभायें। बच्चों की जरूरतों को पूरा करें व सही शिक्षा दें।  


बहुत वर्षों बाद 2009 में एक दिन मैं कक्षा छह के विद्यार्थियों के साथ दैनिक हवन कर रही थी। मैनें हवन करने का महत्व, छात्रों को समझाया। इदन्न मम – का अर्थ समझाया और बताया कि मिल कर खाने खिलाने का आनंद ही निराला है। दीपावली का त्यौहार समीप था। इसलिए श्री राम के जीवन चरित पर भी थोड़ी सी चर्चा की। मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम ने किस प्रकार अहंकारी, दुराचारी रावण का नाश किया इस बात पर भी चर्चा की। विद्यार्थी भी बता रहे थे कि श्री राम ने तो शांतिपूर्वक युद्ध टालने का प्रयत्न किया था। बालि पुत्र अंगद को शांति प्रस्ताव के साथ रावण के पास भेजा भी था यह कहते हुए कि रावण सीता जी को सम्मान सहित श्री राम के पास लौटा दे और क्षमा माँगले तो युद्ध टाला जा सकता है। किंतु रावण ने श्री राम के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। इसके बाद भीषण युद्ध हुआ और रावण वध के बाद श्री राम सीता जी को लेकर वापस अयोध्या आ गए। लेकिन फिर सीता जी को वनवास भी हुआ।


हवन संपन्न हुआ। पूर्णाहुति व शांति पाठ के बाद सभी विद्यार्थी अपनी कक्षा की ओर जाने लगे परंतु एक छात्र रुका रहा। मैंने उसकी ओर देखा तो वह बोला – अध्यापिका जी, मेरे मन में एक शंका है। मैंने उसकी तरफ प्रश्न भरी दृष्टि से देखा। वह बोला- अध्यापिका जी, श्री राम ने धोबी के कहने पर ही माता सीता को क्यों महल से निकाल दिया और वनवास दिया। मुझे भी यह बात कहीं न कहीं खटकती थी। फिर भी मैंने उत्तर दिया कि श्री राम उस स्थिति में राजा का कर्तव्य निभा रहे थे। वे चाहते थे कि प्रजा संतुष्ट रहे। वह गलत आचरण न करें – प्रजा में व्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्होंने सीता जी का त्याग किया था। विद्यार्थी इस उत्तर से संतुष्ट नही हुआ। उसका तर्क था -अध्यापिका जी, जिस व्यक्ति के सोचने का ढंग गलत है या जो गलत काम कर रहा है राजा को उसे समझाना चाहिए या दंड देना चाहिए। श्री राम ने निर्दोष सीता को दंड क्यों दिया जबकि सीता जी तो अग्निपरीक्षा भी दे चुकीं थी।


मैं इस तर्क के सामने निरुत्तर सी हो रही थी। फिर भी कुछ दार्शनिक बातें समझाने की कोशिश की। राजा संपूर्ण प्रजा की भलाई के लिए सोचता है। उसे अपना स्वार्थ त्यागना पड़ता है। परंतु मन में यही बात आ रही थी कि शायद श्री राम जी का चरित्र भी यही सत्य स्पष्ट करता है कि मनुष्य जीवन धारण करने पर मनुष्य की शक्तियां और बुद्धि सीमित हो जाती है और गलतियां हो ही जाती हैं। मनुष्य का जीवन निरंतर सुधार करते रहने की प्रक्रिया है।



उपवन, 609, सेक्टर 29
अरूण विहार, नोएडा – 201303. भारत

4 comments:

  1. बच्चे मन के सच्चे होते हैं। उनकी तार्किक बातों को तर्क के आधार पर ही संतुष्ट करना होगा। मेरी बेटी प्रायः मुझे साँसत में डाल देती है। लेकिन कभी भी उसे डाँट कर चुप नहीं कराता। बच्चों से लगातार बात करने पर हम स्वयं भी सुव्यवस्थित ढंग से सोचने लगते हैं।

    ReplyDelete
  2. बाल सुलभता से बडे-बडे विद्वान भी अचम्भित होते हैं। जब वैज्ञानिक अंतरिक्ष के लिए किसी ऐसे पेन की खोज कर रहे थे जो वहां लिख सके और इस परीक्षण में विफ़ल हो रहे थे तब शोध करते वैज्ञानिक के पुत्र ने पिता की उलझन का समाधान बताया कि क्यों न पेंसिल का प्रयोग हो। पिता बालक के इस सरल समाधान से चकित रह गया:)

    ReplyDelete
  3. गंधारी आंखो पर पट्टी नहीं बांधती तो कौरवों को होमवर्क ठीक से करा पाती..:) क्या बात है...

    ReplyDelete

आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

Comments system

Disqus Shortname