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दुर्गम मृत्यु-चक्र में जीवन



बचपन में सर्कस देखने जाते समय जैसा कौतूहल व अवाक् भाव लिए लौटते थे, उसमें "मौत का कुआँ" जैसे "खेले" बंद गोले में होने और मेले-ठेले में दिखाए जाने के बावजूद भी लगभग अविश्वसनीय-से और भयोत्पादक हुआ करते थे| आप सबने भी देखा ही होगा वह "मौत का कुआँ "| 

मौत का वह कुआँ इस दुर्गम अभ्यास के आगे कहाँ ठहरता है, आप भी देखिए और बताइये  -





दुर्गम मृत्यु-चक्र में जीवन दुर्गम मृत्यु-चक्र में जीवन Reviewed by Kavita Vachaknavee on Wednesday, October 14, 2009 Rating: 5

5 comments:

  1. जबरदस्त!! सांस रुक गई देखने में ही... :)

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  2. बहुत बढ़िया रोमाचक प्रस्तुति

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  3. ''कर्मचक्र सा घूम रहा है
    यह गोलक बन नियति प्रेरणा
    सबके पीछे लगी हुई है
    कोइ व्याकुल नई एषणा '' [कामायनी]

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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