प्रवासी हिन्दी साहित्य : परिचर्चा में आए मित्रों के पत्र और विचार (1)




प्रवासी हिन्दी साहित्य


परिचर्चा में आए मित्रों के पत्र और विचार (1)


गत दिनों हिन्दी भारत समूह पर आरम्भ हुई परिचर्चा का उल्लेख करते हुए हिन्दी के प्रवासी साहित्य को परिभाषित करने के एक उपक्रम की जानकारी दी थी।

उसी क्रम में प्राप्त प्रतिक्रियाओं को यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है व सभी पाठकों से भी आग्रह है कि वे भी अपने विचार आलेख रूप में या प्रतिक्रिया रूप में अवश्य दें।

अब तक ७-८ आलेख हमें मिल चुके हैं जिन्हें क्रम से यहाँ प्रस्तुत करना आज से आरम्भ कर रही हूँ। ये प्रतिक्रियाएँ जिस क्रम से आई हैं उसी क्रम से प्रस्तुत की जा रही हैं.

- कविता वाचक्नवी



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डॉ.दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी ने लिखा
Thursday, April 2, 2009 10:32:05 PM



विचार के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।

पहली बात तो मुझे यह लगती है कि प्रवासी साहित्य को ठीक उस तरह से नहीं देखा जा सकता है जैसे हम दलित साहित्य को या महिला लेखन को देखते हैं। दूसरी बात, क्या प्रवासी साहित्य को साहित्य से अलग करके देख भी जाना चाहिए?


कभी कभी मुझे लगता है कि जब हम प्रवासी साहित्य की बात करते हैं तो उन लेखकों का भला नहीं, बल्कि उनका अहित ही करते हैं। कभी मन में यह बात होती होगी, कि ये लोग देश से दूर रहकर हिन्दी में लिख रहे हैं, तो इन्हें थोड़ी रियायत दी जाए. जैसे कभी कभी दलित साहित्य के सन्दर्भ में होता है, कि इन लेखकों से भाषा के उसी परिष्कार की अपेक्षा न की जाए. और यह सोच मुझे तो ठीक नहीं लगता. दलित साहित्य के सन्दर्भ में भी और प्रवासी साहित्य के सन्दर्भ में भी. साहित्य को साहित्य की तरह ही देखा जाना चाहिए.


हां, यह अवश्य है कि जिस साहित्य में प्रवासी भारतीयों की ज़िन्दगी का चित्रण है, उसे एक अलग वर्ग के रूप में विश्लेषित किया जा सकता है. लेकिन ऐसा करना असल में विषय वस्तु के आधार पर एक अंश का विश्लेषण करने जैसा होगा. यह तो वैसे भी होता है. जैसे हिन्दी की ग्रामीण जीवन की कहानियां, या हिन्दी उपन्यासों में कामकाजी महिला, वगैरह. इउसी तरह हिन्दी कहानी में प्रवासी भारतीय जैसी कोई बात की जा सकती है. लेकिन महज़ इस आधर पर कि एक व्यक्ति अमरीका में रह कर कुछ लिख रहा है, उसके साहित्य को अलग करके देखना मुझे तो उपयुक्त नहीं लगता. यह व्यावहारिक भी नहीं है. लोग कभी भारत से विदेश चले जाते हैं, कभी विदेश से भारत आ जाते हैं. भीष्म साहनी और निर्मल वर्मा लम्बे समय तक विदेश में रहे. क्या उनके साहित्य को प्रवासी भारतीयों का साहित्य कहा जाना चाहिए? मैं अभी कुछ महीनों के लिए अमरीका में हूं. यहां रहकर अगर कुछ लिखता हूं तो क्या उसे प्रवासी भारतीय साहित्य के खाते में डाला जाएगा?
क्या हर्ज़ है, साहित्य को साहित्य ही रहने दिया जाए?





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चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी ने कहा
Thursday, 2 April, 2009, 8:56 PM



प्रवासी साहित्य वही होगा जो प्रवासी भारतीय लिख रहे हैं और जिस में वे ऐसी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं जो सभी को सम्प्रेषित हो- भले ही उसमें देशज शब्द हों या विदेशी शब्द जो समझ में आएं। यहां भारत में ही अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि दलित साहित्य क्या है-वो जो दलित साहित्यकार लिख रहा है या वह जो दलित परिस्थितियों पर लिखा जा रहा है!! यह तो आवश्यक नहीं लगता कि मानक हिंदी ही हो। हां, सम्प्रेषणीय अवश्य हो।
शुभकामनाएँ
चंद्र मौलेश्वर

प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता


पुस्तक चर्चा : ऋषभ देव शर्मा



प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता*






भाषा रूपों का अध्ययन करने की आधुनिक प्रणालियों में एक यह मान कर चलती है कि प्रयोजनवती होकर ही कोई भाषा व्यापक प्रचार-प्रसार को प्राप्त होती है. ये प्रयोजन मोटे तौर पर दो प्रकार के हो सकते हैं.एक हैं सामान्य प्रयोजन ,जैसे दैनंदिन व्यवहार में वार्तालाप द्वारा विचारों का आदान -प्रदान . इन प्रयोजनों की सिद्धि के लिए प्रयुक्त भाषा को 'सामान्य प्रयोजनों की भाषा' कहा गया है. दूसरे प्रकार का सम्बन्ध विशिष्ट व्यवहार क्षेत्र में प्रयुक्त भाषा रूपों से है, जैसे अलग अलग विज्ञान शाखाओं में अलग अलग भाषा रूप का प्रयोग होता है अथवा कार्यालय या प्रशासन के कामकाज को अंजाम देने के लिए खास तरह के भाषाप्रयोग में दक्ष होना ज़रूरी होता है. अलग अलग प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले इन विशिष्ट भाषा रूपों को 'विशिष्ट प्रयोजनों की भाषा ' या प्रयोजनमूलक भाषा कहा जा सकता है.किसी प्रयोजनक्षेत्र की भाषा के वैशिष्ट्य के आधार पर उसकी प्रयुक्ति [रजिस्टर] का निर्धारण होता है. प्रयुक्ति विशेष के अभ्यास द्वारा उस क्षेत्रविशेष या ज्ञानशाखाविशेष के भाषिक व्यवहार में दक्ष हुआ जा सकता है. यहाँ यह भी साफ़ करना उचित होगा कि सामान्य प्रयोजन की भाषा को निष्प्रयोजन या प्रयोजनातीत नहीं कहा जा सकता ,बल्कि वह भी प्रयोजनाधारित एक प्रकार ही है. इसी तरह ललित या साहित्यिक भाषा को भी अलगाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह कहना अधिक सटीक होगा कि साहित्य भी एक विशिष्ट प्रयोजन है तथा उसकी अपनी अनेक प्रयुक्तियाँ और उपप्रयुक्तियाँ हैं.



यहाँ तनिक रुक कर भारत के स्वातंत्र्योत्तर भाषिक परिवेश पर विचार करें तो पाते हैं कि यद्यपि भारत में राजभाषा के रूप में जनभाषाओं के प्रयोग का लम्बा इतिहास रहा है ,तथापि ब्रिटिश काल में उन्हें अपदस्थ करके अंग्रेजी को कार्यालय, प्रशासन और शिक्षा की भाषा बना दिया गया . ऐसा करना सर्वथा अवैज्ञानिक था परन्तु भारतीयों को गुलाम बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया था. अतः स्वतंत्रताप्राप्ति के साथ ही यह आशा जगी कि अब भारत की राजभाषा हिंदी होगी.संविधान ने हिंदी को भारत संघ की राजभाषा घोषित कर भी दिया. लेकिन जहाँ जहाँ जिन जिन प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता था वहां वहां उन उन प्रयोजनों के लिए देश भर में हिंदी के प्रयोग को संभव बनाने की चुनौती आज भी हमारे सामने विद्यमान है. कार्यालयों में, व्यवसायों में, शिक्षालयों में और न्यायालयों में जब तक हिंदी प्रतिष्ठित नहीं हो जाती तब तक यही समझना चाहिए कि यह देश भाषिक तौर पर आजाद नहीं हुआ है. इस भाषिक आजादी को हासिल करने के लिए विविध प्रयोजनों की हिंदी के व्यापक अध्ययन और प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है.



संभावनाओं से परिपूर्ण व्यवहार क्षेत्र के रूप में राजभाषाक्षेत्र अर्थात कार्यालय और प्रशासन का अपना महत्व है ,लेकिन लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ के रूप में पत्रकारिता ने हिंदी की विविध प्रयुक्तियों को लोकप्रिय बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई है. आज यदि खेल के मैदान से लेकर राजनीति के मैदान तक और व्यापर-वाणिज्य से लेकर कम्प्युटर के भूमंडलीय स्वरूप तक को सहेजने में हिंदी के विविध प्रयोजनमूलक रूप सक्षम दिखाई दे रहे हैं तो इसका श्रेय बड़ी सीमा तक हिन्दी पत्रकारिता को जाता है क्योंकि उसने राजकाज, शिक्षा,न्यायव्यवस्था और अन्य अनेक क्षेत्रों में राजभाषा हिंदी की घोर उपेक्षा के बावजूद जनभाषा के रूप में उसकी व्यापक जनसंचार की शक्ति को पहचाना तथा नित-नूतन प्रसार पाते ज्ञानाधारित समाज की स्थापना में हिंदी को समृद्ध करते हुए स्वयं समृद्धि प्राप्त की.



वस्तुतः हिंदी के प्रयोजनमूलक रूपों के सन्दर्भ में पत्रकारिता की हिंदी के वैशिष्ट्य को समझना समसामयिक संचारयुग मेंअत्यंत प्रासंगिक विषय है. इसीलिए नीलम कपूर और सुनीता भाटिया ने अपनी पुस्तक ''प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता''[२००७] में इस विषय का सांगोपांग विवेचन किया है जो भाषा और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए ही नहीं वरन सामान्य अध्येता के लिए भी रोचक और उपयोगी है.






*प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता ,
नीलम कपूर एवं सुनीता भाटिया ,
कान्ती पब्लिकेशन्स ,ए - ५०७/१२, साउथ गांवडी एक्सटेंशन , दिल्ली - ११००५३,
२००७, ४९५ रुपए ,सजिल्द. ३५० पृष्ठ .

प्रवासी साहित्य की परिभाषा क्या होनी चाहिए?




प्रवासी साहित्य की परिभाषा? भाषा?
क्षेत्र? सरोकार? ...?



मित्रो एवं साथियो !



अभी दिन पूर्व प्रो. कृष्णकुमार जी (यूके) ने अपने एक ईमेल सन्देश में बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है, बल्कि कहना चाहिए कि विचार करने की आवश्यकता बताई है. उन्होंने "प्रवासी हिन्दी साहित्य" की परिभाषा पर अपने विचार लिख भेजने, एक परिचर्चा आयोजित करने की आवश्यकता व इच्छा प्रकट की है । परस्पर विचार करने के लिए आप सभी अपने अपने मत को देवनागरी में टंकित कर भेजें ताकि आलेखात्मक विचारों को समूह से इतर पाठकों के लिए उपलब्ध करवाने की दृष्टि से पुन: समूह के ब्लॊग पर भी प्रकाशित किया जा सके।

प्रो. कृष्ण कुमार जी ने लिखा है कि -

" एक व्यापक परिभाषा की जरूरत है।

१) क्या जब तक प्रवासी रचनाओं में रचनाकार के स्थान के सरोकार न हों, तब तक वह प्रवासी साहित्य नहीं होगा?

२) क्या प्रवासी हिन्दी को तथाकथित मानक हिन्दी ही होना चाहिए ? या फिर जन-जन की हिन्दी?"

उन्होंने एक अन्य सन्देश में थोड़ा और स्पष्ट करते हुए यह प्रश्न भी उठाया है कि-

‘विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा भारत की आँचलिक बोलियों में लिखे गए साहित्य को क्या इसकी परिधि में रखा जाना चाहिए या उसे इसकी परिधि से निष्कासित रखा जाए?’


मैं आप सभी से प्रो. कृष्णकुमार जी द्वारा आहूत विषय पर अपने विचार प्रकट करने का आग्रह करती हूँ, कि कृपया उपर्युक्त बिन्दुओं को पढ़ें व हम से अपना मत बाँटें कि क्षेत्र, भाषा, सरोकार या कुछ अन्य वे तत्व क्या हैं, जो हिन्दी के प्रवासी साहित्य को परिभाषित कर सकते हैं।

आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी।


- कविता वाचक्नवी


पुनश्च-
इस सन्देश के जो पाठक हिन्दीभारत समूह के सदस्य नहीं हैं, वे सीधे मेरे आईडी पर( साईडबार में एकदम ऊपर बने contact me द्वारा ) भी अपने विचार लिख कर भेज सकते हैं, उनके आलेखात्मक विचारों को भी प्रकाशित किया जाएगा व चर्चा समूह पर सभी को पठनार्थ अग्रेषित किया जाएगा।
.वा.
Thursday, 2 April, 2009, 6:35 PM





From: Prof. Dr Krishna Kumar <.........>



Dear Kavita Jee
pata naheeN kyoN Hindi meiN type naheeN ho rahaa hai. Kyaa aap ek charcha praarambh karaa saktee haiN. pravasi Hindi Saahitya kee paribhaashaa kyaa honee chaahiye. Ek vyaapak definition kee zaroorat hai. Kyaa jab tak pravasi rachnaaoN meiN rachnaakar ke sthaan ke sarokaar naa hoN tab tak woh pravasi saahitya naheeN hogaa. Kyaa pravasi Hindi ko tathaa kathit Maanak Hindi hee honaa chaahiye yaa phir jan-jan kee Hindi. Time has come to look at it more seriously and academically.
with regards.
Krishna

आमंत्रण

प्रभु जोशी जी के लेखक रूप से हिन्दी के पाठक अच्छी प्रकार परिचित हैं हिन्दी भारत के पाठकों के लिए उनकी कहानी ( एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी ) लेखमाला (इसलिए बिदा करना चाहते हैं हिन्दी को हिन्दी के अखबार , , ) तथा एक महत्त्वपूर्ण आलेखक्रम ( कंडोम प्रोमोशन कार्यक्रम ) को यहाँ प्रस्तुत किया गया थाजो मित्र उनकी कहानी आलेख किन्हीं कारणों से नहीं पढ़ पाए वे इस पूरी सामग्री को यहाँ पढ़ सकते हैं

जोशी जी लंबे समय तक नई दुनिया के सम्पादक भी रहेआजकल वे इंदौर दूरदर्शन का दायित्व सम्हाले हुए हैं

इन सब उत्तरदायित्वों विविध पक्षों के बीच उनके व्यक्तित्व में निहित रंगों के चितेरे चित्रकार होने का एक ऐसा अद्भुत रूप है, जिसे देश - दुनिया में बड़े सम्मान से देखा माना जाता हैरंग-प्रयोग में विरलता उनकी विशेषता है. गत दिनों जयपुर में हुई उनकी चित्र प्रदर्शनी मीडिया में बहुत चर्चा का विषय रही चित्रकला के मर्मज्ञों द्वारा अत्यन्त सराही गयी

जोशी जी के चित्रों की एक प्रदर्शनी मुम्बई की जहांगीर आर्ट गैलरी में (१५ एप्रिल से २१ एप्रिल तक ) आयोजित होने जा रही है, जिसका उद्घाटन १५ एप्रिल की सायं .३० बजे प्रसिद्ध पत्रकार प्रीतीश नंदी करेंगेसभी सादर आमंत्रित हैं

कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ नीचे देखें






बड़े आकार में देखने-पढने के लिए इमेज पर क्लिक करें











कार्यक्रम : आमंत्रण


परिचय

हंगरी और हिंदी



हंगरी और हिंदी


प्रमोद कुमार शर्मा, बुदापैश्त




हंगरी में हिंदी अध्ययन-अध्यापन की परंपरा से पहले भारोपीय अध्ययन की और संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन की परंपरा थी। इसकी शुरुआत 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में हुई थी। इस परंपरा की शुरुआत करने का श्रेय ऑलैक्सांदैर चोमा को जाता है। प्रारंभ में संस्कृत की पुस्तकों का अनुवाद संस्कृत से न करके तुर्की, लैटिन और अंग्रेजी भाषाओं के अनुवादों से किया जाता था। पर अब स्थिति बदल गई है। आजकल हिंदी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं से सीधे अनुवाद कार्य किए जा रहे हैं। इसके साथ ही हिंदी में भी सीधे ही हंगेरियन भाषा से अनुवाद किए जा रहे हैं। संस्कृत अध्ययन की परंपरा की शुरुआत और उसका विकास ओत्वोश लोरांद विश्वविद्यालय के भारोपीय अध्ययन विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रो। तोत्तोशि चाबा के प्रयासों से हुआ।


हिंदी अध्ययन-अध्यापन की परंपरा पाँचवें दशक में हुई थी। हंगेरी के भारतीय दूतावास में कार्यरत डॉ.दैबरैत्सैनी आर्पाद ने स्वयं हिंदी सीखकर विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापन करने का कार्य किया था। हिंदी अध्ययन अध्यापन की परंपरा के विकास का पूरा श्रेय सुश्री मारिया नेज्यैशी को जाता है। पिछली शताब्दी के नौवें दशक में जब उन्होंने पढ़ाना प्रारंभ किया था तब विश्वविद्यालय में पाठ्यपुस्तकों का अभाव था। न तो हंगेरियन में न ही हिंदी या अंग्रेजी में कोई भी पाठ्यपुस्तक उपलब्ध थी। उस समय बुदापैश्त में हिंदी बोलने वालों की संख्या नहीं के बरावर थी। मारिया नेज्यैशी ने कुआँ खोदकर पानी पीने जैसा कार्य किया। वे हर सप्ताह पढ़ाने के लिए नया पाठ तैयार करती थीं और फिर उस पाठ की सहायता से अध्यापन कार्य करती थीं।


भारत सरकार आईसीसीआर के माध्यम से विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए छात्रवृत्ति भी प्रदान करता है। हंगरी के एक या दो छात्र प्रतिवर्ष यह छात्रवृत्ति लेकर केंद्रीय हिंदी संस्थान में हिंदी का अध्ययन करने के लिए जाते हैं।


इस दौरान भारत सरकार और राजदूतावास के सहयोग से हिंदी की पुस्तकें ऐल्ते विश्विद्यालय के हिंदी विभाग को मिलने लगीं। इससे हिंदी अध्ययन और अध्यापन का कार्य थोड़ा सा आसान हो गया। 1992 में एक महत्वपूर्ण घटना घटी। इस वर्ष भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से ऐल्ते विश्वविद्यालय के भारोपीय भाषाविज्ञान विभाग में हिंदी के एक अतिथि प्रोफेसर के पद का सृजन किया गया। हिंदी के एक जाने माने साहित्यकार डॉ. असगर वजाहत ने हिंदी के साथ-साथ उर्दू पढ़ाने का कार्य प्रारंभ किया और मारिया नेज्यैशी के साथ मिलकर हिंदी अध्यापन की पाठ्यपुस्तक का निर्माण किया। इस परंपरा को डा. लक्ष्मण सिंह बिष्ट “बटरोही”, डा. रविप्रकाश गुप्ता, डॉ. उमाशंकर उपाध्याय और आजकल डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा आगे बढ़ा रहे हैं। डॉ. बटरोही ने आधुनिक काव्य संकलन, डॉ. रविप्रकाश गुप्ता ने बोलचाल की हिंदी और डॉ. उपाध्याय ने मध्यकालीन काव्य संकलन शीर्षक पाठ्यपुस्तकों का निर्माण किया। डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा विभाग के लिए उच्च स्तरीय वार्तालाप पुस्तक का निर्माण कर रहे हैं। गत शैक्षिक सत्र (2007-08) में एक नए प्रयोग के तौर पर छात्रों को कंप्यूटर का हिंदी अध्ययन-अध्यापन में प्रयोग करना सिखाया गया । वर्तमान सत्र (2008-09) में उच्च स्तर के छात्रों को मीडिया की भाषा का अध्ययन कर उसकी समझ विकसित की गई। इस वर्ष के छात्रों ने मारिया नेज्यैशी के निर्देशन में भीष्म साहनी की अनेक कहानियों का हिंदी से हंगेरियन अनुवाद कार्य भी किया। वर्तमान सत्र में छात्रों ने हंगेरियन भाषा से हिंदी में अनुवाद करना भी प्रारंभ कर दिया है। अपने ग्रीष्मावकाश के दौरान भी कुछ छात्रों ने हिंदी के अन्य लेखकों की कुछ प्रसिद्ध कहानियों का अनुवाद किया। इस सत्र की विशेषता यह रही विभाग ने पहली बार छात्रों व हिंदी प्रेमियों में हिंदी में साहित्य सृजन की रुचि का विकास करने के लिए एक त्रैमासिक भित्ति पत्रिका “प्रयास” प्रारंभ कर दी है। इसका लोकार्पण हंगरी में भारत के राजदूत महामहिम रंजीत रे ने विश्व हिंदी दिवस के अवसर (हंगरी में मार्च में आयोजित) पर किया।


विभाग के प्रतिभाशाली छात्रों में मारिया नेज्यैशी, इम्रे बंघा, फैरेस रुज़ा, दानियल बलोग, युदित तोरजोक, कोरत्वैयेशी तिबोर, जुजाना रेनर, दैजो चाबा, किश चाबा और शांतो पेतर आदि के नाम उल्लेखनीय है, ये सभी आजकल यूरोप के विभिन्न देशों व हंगरी के विभिन्न महत्पूर्ण संस्थानों में उच्च पदों पर पदस्थ या शोधरत हैं। मारिया नेज्यैशी आजकल ऐल्ते विश्व विद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्षा हैं। इम्रे बंघा ऑक्सफोर्ड विश्विद्यालय में हिंदी भाषा और साहित्य का अध्यापन करते हैं। इसके अलावा चीकसैरैदा (रोमानिया) के सपिऐंत्सिया विश्वविद्यालय में भी अध्यापन कार्य करते हैं। ऐल्ते विश्वविद्यालय मे इम्रे बंघा के निर्देशन में एक महत्वपूर्ण शोध कार्य जारी है। इसमें तुलसीदास कृत कवितावली के पाठालोचन का कार्य किया जा रहा है। वर्ष 2007 से ऐल्ते विश्विद्यालय में आईसीसीआर की और से टैगोर फैलोशिप आरंभ की गई है। इस विभाग के ही एक अन्य छात्र हिदाश गैर्गैय इस फैलोशिप के अंतर्गत शोध कार्य कर रहे हैं।


ऐल्ते विश्वविद्यालय के स्नातक व स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के अलावा बुदापैश्त में भारतीय दूतावास के सहयोग से तीन स्तरों पर हिंदी अध्यापन की नियमित कक्षाएँ चलती हैं। ये कक्षाएँ भी ऐल्ते विश्वविद्यालय के प्रांगण में आयोजित की जाती हैं। इन कक्षाओं की शोभा हिंदी प्रेमी ही नहीं बल्कि भारत-प्रेमी भी बढ़ाते हैं। इन तीन कक्षाओं का स्तर क्रमशः प्रारंभिक, माध्यमिक और उच्च है।


पिछले 16 वर्षों से चल रही इन कक्षाओं में लगभग 1500 लोग हिंदी के साथ-साथ भारत और भारतीय संस्कृति से परिचय प्राप्त कर चुके हैं। इसके अलावा दूतावास के सहयोग से भारतीय समाज और संस्कृति से संबंधित विषयों पर व्याख्यानमाला को भी आयोजन किया जाता है। इस व्याख्यानमाला मे भारतीय व हंगेरियन भारतविद् भारतीय संस्कृति से संबंधित विभिन्न विषयों पर चर्चापरक व्याख्यान देते हैं। व्याख्यान के बाद श्रोता और छात्र अपनी जिज्ञासाओं को प्रश्न पूछकर शांत कर सकते हैं। इस व्याख्यानमाला में भारतीय दर्शन, इतिहास, समाज, कला, खान-पान, पहनावा आदि जैसे विषयों पर बल दिया जाता है। इन कक्षाओं में पढ़नेवाले छात्र प्रतिवर्ष विश्व हिंदी दिवस (या हिंदी दिवस) के अवसर पर हिंदी कविताओं को पाठ करते हैं व लघु नाटकों का मंचन करते हैं।


इन कक्षाओं के छात्र 1995 व 2000 में भारत की शैक्षणिक यात्राएँ भी कर चुके हैं।

हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की इस परंपरा के अलावा कुछ और भी तथ्य ऐसे हैं जिनका उल्लेख इस प्रपत्र में करना आवश्यक है-

-हंगरी में अनेक लोग योग सीखकर इसे अपने जीवन का अनिवार्य अंग बना चुके हैं। यह प्रक्रिया निरंतर जारी है। हंगरी में अनेक योग सिखाने वाली संस्थाएँ हैं।

-हंगरी में कुछ हंगेरियन भारतीय शास्त्रीय व लोक नृत्य करने वाली नृत्यांगनाएँ हैं जिनके अपने विद्यालय भी हैं, जिनमें हंगेरियन लोग भारतीय शास्त्रीय नृत्य सीखते हैं।

-हंगेरियन लोगों में भारतीय व्यंजन लोकप्रिय हैं। भारतीय रेस्तराओं में हंगेरियन लोगों की भरमार रहती है।

-बुदापेश्त में लगभग प्रतिमाह एक बॉलीवुड पार्टी होती है, जिसमें अनेक हंगेरियन युवक-युवतियाँ (भारतीय भी) हिंदी के लोकप्रिय हिंदी पंजाबी फिल्मी गानों पर देर रात तक थिरकते रहते हैं।


-इसी तरह बुडापेस्ट में दूतावास की कक्षाओं से जुड़ा एक हिंदी फिल्म क्लब भी है जो प्रति माह एक हिंदी फिल्म का प्रदर्शन करता है। इसमें दर्शकों की संख्या पर्याप्त होती है।

-हंगेरियन दूरदर्शन पर हिंदी फिल्में डब करके दिखाने की एक लंबी परंपरा है।

-हंगरी में रहने वाले भारतीयों व हंगेरियन लोगों में एक याहू ग्रुप (indianinhungary.com) भी लोकप्रिय है। इसके सदस्य भारतीय भी हैं और हंगेरियन भी। हंगेरियन भाषा की भारत विषयक एक साइट हंगरी में बहुत ही लोकप्रिय है। इसका वेब पता है- ये इंडिया (http://jeindia.hu)

-कभी-कभी हंगेरियन एफ.एम. रेडियो पर भी हिंदी गाने सुनने को मिल जाते हैं पर यह यदा-कदा ही होता है। एक दिन अपने परिवार के साथ बुदापैश्त की सड़कों पर घूमते हुए एक दृश्य देखा जिसकी चर्चा हिंदी फिल्मों व गानों के संदर्भ में जरूरी है। हमने देखा कि एक हंगेरियन युवती अपनी कनवर्टिबल मर्सीडीज़ में गैंगस्टर फिल्म का गाना ‘या अली मदद या अली’ सुनती जा रही है। हम लोग आश्चर्य से उसे देखते ही रह गए और उसकी कार फुर्र से निकल गई।


-इस्कोन, साईंबाबा और प्रजापिता ब्रह्मकुमारी जैसे संप्रदायों व बुद्ध धर्म को मानने वाले लोगों की हंगरी में संख्या पर्याप्त है। इनके शिष्य हिंदी व भारतीय संस्कृति को अपनाने की ओर अग्रसर हैं। हंगरी में एक बुद्धधर्म की आस्थाओं पर आधारित एक महाविद्यालय भी है जिसमें संस्कृत व पालि आदि का अध्यापन किया जाता है।

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