छायारूप

छायारूप 
- ओम थानवी 
(कवि अज्ञेय संबंधी संस्मरण )


Chhaya Roop (छायारूप)

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  1. स्वप्न :

    नदी में नाव में चला जा रहा हूँ। और भी यात्री हैं : एक स्त्री है, एक लडक़ी है, दो-एक और हैं, नाविक है। नदी से हम लोग एक तीर्थ की ओर जा रहे हैं। उसका पक्का घाट दीख रहा है।
    एकाएक पाता हूँ कि मैं एक बालक को गोद में उठाए हुए हूँ। नाव घाट के किनारे आती है तो मन्दिर दीखने लगता है। बालक उसकी ओर उँगली उठता है। मैं देखता हूँ, पर वह मन्दिर नहीं दिखा रहा है, कुछ विशिष्ट संकेत कर रहा है। मैं समझ जाता हूँ। वह मन्दिर के शिखर की ओर इशारा कर रहा है : शिखर में तीन छत्र हैं, इसी की ओर उसका संकेत है। मैं कहता हूँ, ‘हाँ, ठीक जैसे तुम्हारे मस्तक पर है,’-क्योंकि बालक भी जो टोप या मुकुट पहने है वह भी इसी तरह तीन छत्र वाला है।

    बालक पूछता है; ‘तो क्या मुझे इस मन्दिर के देवता का शासन मानना होगा? क्या मैं उसकी प्रजा हूँ?’

    मैं उत्तर देता हूँ; ‘‘नहीं, इसका अर्थ है कि तुम स्वयं भी चक्रवर्ती हो जैसे उस मन्दिर का देवता है।’’

    नाव घाट लगती है। हम उतरते हैं। लोग हमारे लिए ससम्भ्रम रास्ता छोड़ देते हैं। जिस बालक को मैं गोद लिए हूँ, उसमें शक्ति है, लोग उसके मार्गसे हट जाते हैं...
    घाट के पार फिर सीढिय़ाँ हैं। इधर से चढक़र उधर हम उतर जाते हैं और फिर नाव पर सवार हो जाते हैं। नाव चल पड़ती है : ऊपर स्रोत की ओर।

    थोड़ी दूर पर नाव का अगला हिस्सा टूट कर अलग हो जाता है-वह अलग एक छोटी नाव है जो किनारे लग जाती है। वह स्त्री और लडक़ी यहाँ उतर जाते हैं। पिछला हिस्सा-बड़ी नाव-आगे बढ़ती जाती है। लडक़ी और स्त्री चिन्तित-से देखते हैं : वे क्या पीछे छूट गये-क्या मैं भी वहीं नहीं उतर रहा हूँ? मैं समझ रहा हूँ कि बड़ी नाव यहाँ उथले घाट पर किनारे नहीं लग सकती थी, आगे घाट पर जा लगेगी-उन्हें आश्वस्त रहना चाहिए। पर घाट के बराबर आकर भी नाव किनारे की ओर नहीं बढ़ती; ठीक मझधार में ऊपर की ओर चलती जाती है।
    ... ... ...
    पाट सँकरा हो जाता है; छहेल पेड़ किनारों से झुक कर छा जाते हैं जैसे नाव एक हरी सुरंग में बढ़ी जा रही हो। नाव निरन्तर ऊपर स्रोत की ओर बढ़ती जा रही है।
    ... ... ...

    (थोड़ा और भी था; भूल गया हूँ।) -
    अज्ञेय (डायरी)

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