विष्णु प्रभाकर जी की पार्थिव देह दान की गई



विष्णु प्रभाकर जी का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ़्फ़रनगर जिले के मीरापुर गाँव में २९ जनवरी १९१२ को हुआ। पिता दुर्गाप्रसाद धार्मिक व रूढ़िवादी संस्कारों वाले थे जबकि माता महादेवी कुल की सबसे अधिक पढ़ी-लिखी स्त्री थीं, जिन्होंने पारम्परिक हिन्दू परिवार में घूँघट प्रथा का विरोध करने का साहस दिखाया।


विष्णु प्रभाकर जी ने १२ वर्ष की आयु तक प्राईमरी शिक्षा मीरापुर में ही रह कर ली। पश्चात् उनकी माता जी ने उन्हें तत्कालीन पंजाब के हिसार ( अब हरयाणा में ) में उनके मामा के पास भेज दिया, जहाँ १९२९ में १६ वर्ष की आयु में इन्होंने मैट्रिक उतीर्ण किया। मीरापुर के अपने परिवार की आर्थिक स्थिति के कारण आगे पढ़ने की अपनी इच्छा को इन्हें विराम देना पड़ा। मामा की सहायता से एक सरकारी नौकरी ली, जिसका वेतन उन दिनों मात्र १८ रुपए हुआ करता था। अपनी पढ़ाई को समानान्तर जारी रखते हुए इन्होंने हिन्दी से प्रभाकर व हिन्दीभूषण की उपाधि अर्जित की,साथ ही संस्कृत से प्राज्ञ भी किया। तत्पश्चात अंग्रेज़ी में बी.ए.भी हुए।


नौकरी व शिक्षार्जन के मध्य अपनी साहित्यिक रुचि को बनाए रखते हुए ये हिसार में एक नाटक कम्पनी से भी जुड़े़। १९३९ में इनका पहला नाटक ‘हत्या के बाद’ लिखा गया। २७ वर्ष की वय तक मामा के परिवार के साथ ही रहे व १९३८ में सुशीला प्रभाकर जी से वैवाहिक बन्धन में बँधे। विष्णु प्रभाकर जी के दो पुत्र और दो पुत्रियाँ हैं।


इस बीच भी कुछ समय ये पूर्णकालिक लेखन से जुड़े रहे। कहानियाँ, उपन्यास, नाटक व यात्रा वृतान्त विधाओं में विष्णु प्रभाकर जी ने अमर साहित्य रचा है।


स्वातंत्र्योत्तर भारत में (सितम्बर १९५५ से मार्च १९५७ तक) इन्होंने नाटक -निर्देशक के रूप में आकाशवाणी दिल्ली में कार्य किया। तत्पश्चात् वे पूर्णत: पूर्णकालिक लेखक के रूप में कार्य करने लगे।


२००५ में राष्ट्रपति भवन के कर्मचारियों के दुर्व्यवहार के परिणामस्वरूप जब इन्होंने अपने पद्मभूषण को लौटाने की इच्छा व्यक्त की तो तत्कालीन राष्टपति अब्दुल कलाम ने स्वयं आकर इन्हें सम्मानित किया। किसी भी हिन्दी लेखक के स्वाभिमान का ऐसा उदाहरण २१वीं शती की पीढ़ी के सामने कोई दूसरा नहीं है।


इनके उपनाम प्रभाकर बनने के पीछे एक रोचक कथा है। वस्तुत: मीरापुर के प्राईमरी विद्यालय में इनका नाम विष्णु दयाल के रूप में दर्ज़ हुआ। पश्चात् आर्यसमाज के विद्यालय में वर्ण पूछे जाने पर इन्होंने अपना वर्ण वैश्य बताया, तो वहाँ इनका नाम विष्णु गुप्ता के रूप में लिख लिया गया। सरकारी नौकरी में आने पर अधिकारी ने अपनी सुविधा के लिए इनका नाम विष्णु धर्मदत्त इसलिए लिख दिया क्योंकि वहाँ पहले से ही कई विष्णु गुप्ता कार्यरत थे।

इन सब के बीच वे अपने लेखकीय नाम विष्णु के रूप में निरन्तर लेखन करते रहे। एक बार एक सम्पादक द्वारा इतने छोटे नाम के प्रयोग का कारण जानने के लिए हुए वार्तालाप में सम्पादक ने इनकी परीक्षा और उपाधि की बात पूछी व हिन्दी में प्रभाकर उपाधि प्राप्त किए हुए जानकर इनका नाम विष्णु प्रभाकर के रूप में लिखना आरम्भ कर दिया।

विष्णु प्रभाकर जी का समस्त लेखन राष्ट्रीयता, देशभक्ति व सामाजिक उत्थान को समर्पित व्यक्ति का लेखन है।


‘अर्द्धनारीश्वर’ के लिए इन्हें साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित किया गया। २००५ में पद्मभूषण से सम्मानित हुए। इसके अतिरिक्त इन्हें सोवियत लैंड नेहरु अवॉर्ड भी प्रदान किया गया।


११ अप्रैल को तड़के दिल्ली के एम्स अस्पताल में इनका स्वर्गवास हो गया।

विष्णु प्रभाकर जी अपनी देहदान करना चाहते थे। अत: उनके पुत्र ने पिता द्वारा व्यक्त इच्छा के कारण एम्स अस्पताल को इनकी पार्थिव देह दान कर दी है।


कृतियाँ

ढलती रात , स्वप्नमयी, नव प्रभात, डॉक्टर, संघर्ष के बाद, प्रकाश और परछाइयाँ, बारह एकांकी, अशोक, जाने-अनजाने, आवारा मसीहा, मेरे साक्षात्कार, मेरा वतन, और पंछी उड़ गया, मुक्त गगन में, एक कहानी का जन्म, पंखहीन (आत्मकथा -३ खंडों में), सुनो कहानी आदि ४० पुस्तकों की रचना की| ३ पुस्तकें अभी प्रकाशनाधीन भी हैं।

`अर्द्धनारीश्वर' तो उर्दू, पंजाबी, तमिल, कन्नड़ व तेलुगु आदि भाषाओं में अनूदित भी हो चुका है।

ईश्वर उनकी पवित्र सात्विक आत्मा को चिर शान्ति प्रदान करे।


5 टिप्‍पणियां:

  1. पद्मभूषण विष्णु प्रभाकर जी की आत्मा को शांति मिले, ईश्वर से यही प्रार्थना है।

    जवाब देंहटाएं
  2. ईश्‍वर उनकी आत्‍मा को शांति दे

    जवाब देंहटाएं
  3. है यही विधाता की मंशा सबको ही इक दिन जाना है
    (विष्णु प्रभाकर जी के प्रति श्रद्धांजलि)



    है यही विधाता की मंशा सबको ही इक दिन जाना है
    जो जाते हैं उनमें बिरलों को करता याद ज़माना है

    यूँ तो जाने वाले को इससे कुछ भी फ़र्क़ नहीं पड़ता
    मक़्सद करने का याद फ़कत अपना आभार जताना है

    जो काम बड़े कर जाते हैं धरती पर अपने जीवन में
    वे जीते हैं जन-मानस में, मरना तो एक बहाना है

    जिनको हम करते याद उन्हें परवाह न थी सम्मानों की
    उनको तो चिंता सदा रही बेहतर संसार बनाना है

    सुख से हम कैसे जियें ख़लिश मत करो यही चिंता हर दम
    सोचो दुख से जीने वालों का कैसे दर्द घटाना है.

    • ९७ वर्षीय वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी का ११ अप्रैल २००९ को दिल्ली में देहावसान हो गया।

    डा० महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
    ११ अप्रेल २००९
    mcgupta44@gmail.com

    http://www.writing.com/main/view_item/item_id/1240497#sw

    http://www.writing.com/main/view_item/item_id/1510547

    जवाब देंहटाएं
  4. है यही विधाता की मंशा सबको ही इक दिन जाना है
    (विष्णु प्रभाकर जी के प्रति श्रद्धांजलि)

    है यही विधाता की मंशा सबको ही इक दिन जाना है
    जो जाते हैं उनमें बिरलों को करता याद ज़माना है

    यूँ तो जाने वाले को इससे कुछ भी फ़र्क़ नहीं पड़ता
    मक़्सद करने का याद फ़कत अपना आभार जताना है

    जो काम बड़े कर जाते हैं धरती पर अपने जीवन में
    वे जीते हैं जन-मानस में, मरना तो एक बहाना है

    जिनको हम करते याद उन्हें परवाह न थी सम्मानों की
    उनको तो चिंता सदा रही बेहतर संसार बनाना है

    सुख से हम कैसे जियें ख़लिश मत करो यही चिंता हर दम
    सोचो दुख से जीने वालों का कैसे दर्द घटाना है.

    • ९७ वर्षीय वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी का ११ अप्रैल २००९ को दिल्ली में देहावसान हो गया।

    डा०महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
    ११ अप्रेल २००९
    mcgupta44@gmail.com

    http://www.writing.com/main/view_item/item_id/1240497#sw

    http://www.writing.com/main/view_item/item_id/1510547

    जवाब देंहटाएं
  5. कलाम वाली बात पता नहीं थी। लेकिन वे खुद राष्ट्रपति होते हुए कब हिन्दी के पक्ष में आए या हिन्दी सीखी?

    जवाब देंहटाएं

आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

Comments system

Disqus Shortname