माखनलाल चतुर्वेदी और अज्ञेय


माखनलाल चतुर्वेदी और अज्ञेय 
- कविता वाचक्नवी

बच्चे-बच्चे द्वारा पहचानी जाने वाली कविता 'पुष्प की अभिलाषा' के प्रणेता राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी (4 अप्रैल 1889-30 जनवरी 1968) का आज जन्मदिवस है और आज ही भारतीय परम्परा, संस्कृति व आधुनिकता के सम्मिश्रण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" (7 मार्च, 1911- 4 अप्रैल, 1987) जैसे रचनाकार का प्रयाण दिवस भी। 

दोनों की कविता के साथ उनका पुण्य-स्मरण -

पुष्प की अभिलाषा
- माखनलाल चतुर्वेदी 
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चाह नहीं मैं सुर बाला के गहनों में गूँथा जाऊँ 
चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ

चाह नहीं सम्राटों के शव पर, हे हरि डाला जाऊँ
चाह नहीं देवों के शिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ 

मुझे तोड़ लेना वन माली ! उस पथ पर देना तुम फेंक 
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक 







वर्षा ने आज विदाई ली
('बीजुरी काजल आँज रही')

- माखनलाल चतुर्वेदी 


वर्षा ने आज विदाई ली जाड़े ने कुछ अंगड़ाई ली
प्रकृति ने पावस बूँदो से रक्षण की नव भरपाई ली।

सूरज की किरणों के पथ से काले काले आवरण हटे
डूबे टीले महकन उठ्ठी दिन की रातों के चरण हटे।

पहले उदार थी गगन वृष्टि अब तो उदार हो उठे खेत
यह ऊग ऊग आई बहार वह लहराने लग गई रेत।

ऊपर से नीचे गिरने के दिन रात गए छवियाँ छायीं
नीचे से ऊपर उठने की हरियाली पुन: लौट आई।

अब पुन: बाँसुरी बजा उठे ब्रज के यमुना वाले कछार
धुल गए किनारे नदियों के धुल गए गगन में घन अपार।

अब सहज हो गए गति के वृत जाना नदियों के आर पार
अब खेतों के घर अन्नों की बंदनवारें हैं द्वार द्वार।

नालों नदियों सागरो सरों ने नभ से नीलांबर पाए
खेतों की मिटी कालिमा उठ वे हरे हरे सब हो आए।

मलयानिल खेल रही छवि से पंखिनियों ने कल गान किए
कलियाँ उठ आईं वृन्तों पर फूलों को नव मेहमान किए।

घिरने गिरने के तरल रहस्यों का सहसा अवसान हुआ
दाएँ बाएँ से उठी पवन उठते पौधों का मान हुआ।

आने लग गई धरा पर भी मौसमी हवा छवि प्यारी की
यादों में लौट रही निधियाँ मनमोहन कुंज विहारी की।




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भारत में कभी मेरे बगीचे में कनकचंपा का एक पेड़ हुआ करता था । कमरे में उसके फूल रख दिए जाते तो सूखने के कई दिन बाद तक घर में सुगंध आती रहती थी और अज्ञेय की एक कविता की पंक्तियाँ बार बार अनायास गूँजती थीं .... "...दूर से ही स्वप्न में भी गंध देती है.... "
लगभग तीन बरस पूर्व ऐसे ही अमूर्त बिंबों वाले कवि अज्ञेय के साथ बनी 'सन्नाटे का छंद' नामक डॉक्यूमेंटरी यहाँ प्रस्तुत की थी, वह सच में देखने लायक है, आज उसे अवश्य देखें - 


                            "सन्नाटे का छंद" : दुर्लभ डॉक्यूमेंट्री (अज्ञेय) : पहली बार नेट पर
                          (http://photochain.blogspot.in/2010/03/blog-post_16.html)



नई कविता : एक संभाव्य भूमिका 

  - अज्ञेय

आप ने दस वर्ष हमें और दिये
बड़ी आप ने अनुकम्पा की। हम नत-शिर हैं।
हम में तो आस्था है : कृतज्ञ होते
हमें डर नहीं लगता कि उखड़ न जावें कहीं।
दस वर्ष और! पूरी एक पीढ़ी!
कौन सत्य अविकल रूप में जी सका है अधिक?

अवश्य आप हँस लें :
हँस कर देखें फिर साक्ष्य इतिहास का जिस की दुहाई आप देते हैं।
बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण को कितने हुए थे दिन
थेर महासभा जब जुटी यह खोजने कि सत्य तथागत का
कौन-कौन मत-सम्प्रदायों में बिला गया!

और ईसा-(जिन का कि एक पट्ट शिष्य ने
मरने से कुछ क्षण पूर्व ही था कर दिया प्रत्याख्यान)
जिस मनुपुत्र के लिए थे शूल पर चढ़े-
उसे जब होश हुआ सत्य उन का खोजने का
तब कोई चारा ही बचा न था
इस के सिवा कि वह खड्गहस्त दसियों शताब्दियों तक
अपने पड़ोसियों के गले काटता चले!
('प्यार करो अपने पड़ोसियों को आत्मवत्'-कहा था मसीहा ने!)

'सत्य क्या है?' बेसिनी में पानी मँगा लीजिए :
सूली का सुना के हुक्म हाथ धोये जाएँगे!
बुद्ध : ईसा : दूर हैं।

जिस का थपेड़ा स्वयं हम को न लगे वह कैसा इतिहास है?
ठीक है। आप का जो 'गाँधीयन' सत्य है
उस को क्या यही सात-आठ वर्ष पहले
गाँधी पहचानते थे?

तुलना नहीं है यह। हम को चर्राया नहीं शौक मसीहाई का।
सत्य का सुरभि-पूत स्पर्श हमें मिल जाय क्षण-भर :
एक क्षण उस के आलोक से सम्पृक्त हो विभोर हम हो सकें-
और हम जीना नहीं चाहते :
हमारे पाये सत्य के मसीहा तो
हमारे मरते ही, बन्धु, आप बन जाएँगे!
दस वर्ष! दस वर्ष और! वह बहुत है।

हमें किसी कल्पित अमरता का मोह नहीं।
आज के विविक्त अद्वितीय इस क्षण को
पूरा हम जी लें, पी लें, आत्मसात् कर लें-
उस की विविक्त अद्वितीयता आप को, कमपि को, कखग को
अपनी-सी पहचनवा सकें, रसमय कर के दिखा सकें-
शाश्वत हमारे लिए वही है। अजर अमर है
वेदितव्य अक्षर है।

एक क्षण : क्षण में प्रवहमान व्याप्त सम्पूर्णता।
इस से कदापि बड़ा नहीं था महाम्बुधि जो पिया था अगस्त्य ने।
एक क्षण। होने का, अस्तित्व का अजस्र अद्वितीय क्षण!
होने के सत्य का, सत्य के साक्षात् का, साक्षात् के क्षण का-
क्षण के अखंड पारावार का
आज हम आचमन करते हैं। और मसीहाई?
संकल्प हम उस का करते हैं आप को :
'जम्बूद्वीपे भरतखंडे अमुक शर्मणा मया।'

इलाहाबाद, 6 फरवरी, 1955

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जनसत्ता के सम्पादक श्री ओम थानवी के अज्ञेय सम्बन्धी संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें - "छायारूप"


अज्ञेय की अमर रचना 'असाध्य वीणा' का पाठ उनके अपने ही स्वर में सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें - 

अज्ञेय जी के स्वर में उनकी अमर रचना "असाध्य वीणा" का पाठ 
http://photochain.blogspot.co.uk/2010/03/blog-post.html


4 comments:

  1. कविता जी हिंदी के दो बडो दिगज्जों को आपने याद किया। उनकी चर्चित कविताओं को भी पाठकों के सम्मुख रखा। साथ ही अज्ञेय की दुर्लभ डाकुमेंट्री भी साहित्य जगत् के लिए उपलब्ध करवा कर दी। आभार, आपने सच में कविता नाम को सार्थक बनाया।

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  2. इतिहास के पूरी जीवन्तता के साथ श्रवण व दर्शन करवाने हेतु आभार...

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  3. मैं अभी 'असाध्यवीणा' का पाठ सुनते हुए आपको यह मेल भेज रहा हूँ।अपनी प्रिय कविता को उसके सर्जक के स्वर में सुन सकना कितना विलक्षण अनुभव है !!
    मेरी अशेष कृतज्ञता।।

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  4. इन अमूल्य कविताओं की प्रस्तुति के लिए धन्यवाद!

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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