"अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु"

हिन्दी भारत

" - हिन्दी भारत - " (भारत व भारतीयता से जुड़े सभी साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक प्रयासों, हिन्दी में रचनात्मक लेखन (विविध विधाएँ), भाषिक मंतव्यों, जीवनमूल्यों, पारस्परिक आदान-प्रदान की अभिवृद्धि हेतु) ***** हिन्दी भारत ***** "

डॉ. अब्दुल कलाम की सुनें

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डॉ. अब्दुल कलाम की सुनें
- डॉ. वेदप्रताप वैदिक



पूर्व राष्ट्रपति डॉ.अब्दुल कलाम कोई नेता नहीं हैं कि वे किसी पार्टी या सरकार के पक्ष में बोलेंगे। उन्होंने कूडनकुलम के परमाणु-संयंत्र के पक्ष में अपनी राय देकर सारे विवाद का पटाक्षेप कर दिया है। उस संयंत्र के विरूद्ध जो लोग प्रदर्शन कर रहे थे, उनमें से यद्यपि कई संदेहास्पद चरित्र के लोग भी थे लेकिन उस क्षेत्र के लोगों की चिंता स्वाभाविक ही थी। चेर्नोबिल और फुकुशिमा की दिल दहला देनेवाली दुर्घटनाओं ने सारे संसार को परमाणु-ऊर्जा के बारे में पुनर्विचार के लिए बाध्य कर दिया था। ऐसी स्थिति में हमारी सरकार भी हतप्रभ हो रही थी। उसकी जुबान हकला रही थी। इसी कारण 13 हजार करोड़ रू. की लागत से बना यह संयंत्र ठप्प होने जा रहा था।


दीपपर्व अति मंगलमय हो !

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दीपपर्व अति मंगलमय हो !

" असतो मा सद् गमय 
   तमसो मा ज्योतिर्गमय 
      मृत्योर्मा अमृतम् गमय "





भाषा के सच्चे अनुरागी : स्वर्गीय प्रो.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव

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जयंतीवर्ष एवं जयंतीमाह पर विशेष 





भाषा के सच्चे अनुरागी 
स्वर्गीय प्रो.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव
- गुर्रमकोंडा नीरजा 




हिंदी भाषाविज्ञान के शिखर पुरुष प्रो.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव (9 जुलाई, 1936 - 3 अक्‍तूबर, 1992) का यह 75 वाँ जयंती वर्ष है. 

प्रो.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव का जन्म 9 जुलाई, 1936 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हुआ. उनकी प्राथमिक शिक्षा - दीक्षा गाँव में ही संपन्न हुई. वे वस्तुतः विज्ञान के विद्‍यार्थी थे. लेकिन उन्होंने साहित्य की ओर अपना कदम बढ़ाया. साहित्य से उनकी रुचि भाषाविज्ञान की ओर बढ़ी. उन्होंने लेनिनग्राद विश्‍वविद्‍यालय (सोवियत संघ) से भाषाविज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्‍त की. फिर उन्होंने कैलिफोरनिया से पोस्ट डॉक्टरेट किया. उन्होंने विभिन्न अंतरराष्‍ट्रीय परंपराओं में हुए चिंतनों को भारतीय भाषाओं के परिप्रेक्ष्य में व्यापक दृष्‍टिकोण प्रदान किया. उन्होंने अपने गंभीर लेखन एवं वैचारिकता से भारतीय भाषाविज्ञान के संपूर्ण परिदृश्‍य को बदल डाला.


प्रायश्चित करें किरण बेदी

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 प्रायश्चित करें किरण बेदी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक



किरण  बेदी पर उंगली कौन उठा सकता है? क्या कोई नेता? बिल्कुल नहीं। देश में कोई ऐसा नेता नहीं होगा, जो सार्वजनिक या सरकारी पैसे का सही-सही हिसाब देता होगा। हर चुनाव लड़नेवाला नेता चुनाव आयोग को खर्च का जो हिसाब देता है, क्या वह सही होता है? किरण बेदी का दोष इतना ही है न, कि वह साधारण श्रेणी में यात्रा करती थीं और उच्च श्रेणी का किराया ले लेती थीं लेकिन हमारे नेता, मंत्री और मुख्यमंत्रीगण आदि क्या करते हैं? वे यात्रा किए बिना ही यात्रा का किराया (और भत्ता भी) वसूल लेते हैं। सड़क बनी ही नहीं और उसके नाम पर करोड़ों रु. डकार जाते हैं। इसलिए किरण बेदी के मामले में हमारे नेतागण अपनी जुबान ज़रा सम्हालकर चला रहे हैं।

‘उदारीकरण का उन्माद और आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन : सरलता के सहारे हत्या की हिकमत

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आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन


सरलता के सहारे हत्या 




पिछले दिनों राजभाषा के नीति-निर्देशों को लेकर गृह मंत्रालय का एक जो नया ‘ परिपत्र ' प्रकाश में आया है (क्लिक - "हिन्दी पर सरकारी हमले का आखिरी हथौड़ा" ) , उसने भाषा के संबंध में निश्चय ही एक नये ‘विमर्श‘ को जन्म दे दिया है। क्योंकि, भाषा केवल ‘सम्प्रेषणीयता‘ का माध्यम भर नहीं है, बल्कि वह मनुष्य का सामाजिक-सांस्कृतिक आविष्कार भी है। फिर क्या किसी भी राष्ट्र की भाषा की संरचना में मनमाने ढंग से छेड़छाड़ की जा सकती है ? क्या वह मात्र एक सचिव और समिति के सहारे हाँकी जा सकती है ? निश्चय ही इस प्रश्न पर समाजशास्त्री, शिक्षा-शास्त्री, संस्कृतिकर्मी और राजनीतिक विद्वानों को बहस के लिए आगे आना चाहिए। यहाँ प्रस्तुत है , इस प्रसंग में एक बौध्दिक-जिरह को जन्म देने वाली कथाकार प्रभु जोशी की टिप्पणी


सरलता के सहारे हत्या की हिकमत
प्रभु जोशी 



भारत-सरकार के गृह-मंत्रालय की सेवा-निवृत्त होने जा रही एक सचिव सुश्री वीणा उपाध्याय ने जाते-जाते राजभाषा संबंध नीति-निर्देशों के बारे में एक ताजा-परिपत्र जारी किया कि बस अंग्रेजी अखबारों की तो पौ-बारह हो गयी। उनसे उनकी खुशी संभाले नहीं संभल पा रही है। क्योंकि, वे बखूबी जानते हैं कि बाद ऐसे फरमानों के लागू होते ही हिन्दी, अंग्रेजी के पेट में समा जायेगी। दूसरी तरफ हिन्दी के वे समाचार-पत्र, जिन्होंने स्वयं को ‘अंग्रेजी-अखबारों के भावी पाठकों की नर्सरी‘ बनाने का संकल्प ले रखा है, उनकी भी बांछें खिल गयीं और उन्होंने धड़ाधड़ परिपत्र का स्वागत करने वाले सम्पादकीय लिख डाले। वे खुद उदारीकरण के बाद से आमतौर पर और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हासिल करने के बाद से खासतौर पर अंग्रेजी की भूख बढ़ाने का ही काम करते चले आ रहे हैं।


षडयंत्र है या अनभिज्ञता

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 षडयंत्र है या अनभिज्ञता

 - प्रो. सुरेन्द्र गंभीर








मान्यवर प्रभु जोशी जी और राहुलदेव जी ने एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर हमारा ध्यान खींचा है।
भारत में हिन्दी की और न्यूनाधिक दूसरी भारतीय भाषाओं की स्थिति गिरावट के रास्ते पर है। ऐसी आशा थी कि समाज के नायक भारतीय भाषाओं को विकसित करने के लिए स्वतंत्र भारत में क्रान्तिकारी कदम उठाएँगे परंतु जो देखने में आ रहा है वह ठीक इसके विपरीत है। यह षडयंत्र है या अनभिज्ञता इसका फ़ैसला समय ही करेगा।




भाषा के सरलीकरण की प्रक्रिया स्वाभाविक है परंतु वह अपनी ही भाषा की सीमा में होनी चाहिए। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आज अंग्रेज़ी और उर्दू के बहुत से शब्द ऐसे हैं जिसके बिना हिन्दी में हमारा काम सहज रूप से नहीं चल सकता। ऐसे शब्दों का हिन्दी में प्रयोग सहज और स्वाभाविक होने की सीमा तक पहच चुका है और ऐसे शब्दों के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए किसी को कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। यह भी ठीक है कि हिन्दी में भी कई बातों को अपेक्षाकृत सरल तरीके से कहा जा सकता है। परंतु यह सब व्यक्तिगत या प्रयोग-शैली का हिस्सा है। विभिन्न शैलियों का समावेश ही भाषा के कलेवर को बढ़ाता है और उसमें सर्जनात्मकता को प्रोत्साहित करता है।

हिन्दी का ताबूत

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कल यहीं प्रकाशित  " हिन्दी पर सरकारी हमले का आखिरी हथौड़ा"   पर  वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव जी ने अपनी जो  प्रतिक्रिया व्यक्त की है, उसका अविकल पाठ यहाँ दे रही हूँ। 





हिन्दी का ताबूत
 - राहुल देव 

हिन्दी के ताबूत में हिन्दी के ही लोगों ने हिन्दी के ही नाम पर अब तक की सबसे बड़ी सरकारी कील ठोंक दी है। हिन्दी पखवाड़े के अंत में, 26 सितंबर 2011 को तत्कालीन राजभाषा सचिव वीणा ने अपनी सेवानिवृत्ति से चार दिन पहले एक परिपत्र (सर्कुलर) जारी कर के हिन्दी की हत्या की मुहिम की आधिकारिक घोषणा कर दी है। यह हिन्दी को सहज और सुगम बनाने के नाम पर किया गया है। परिपत्र कहता है कि सरकारी कामकाज की हिन्दी बहुत कठिन और दुरूह हो गई है। इसलिए उसमें अंग्रेजी के प्रचलित और लोकप्रिय शब्दों को डाल कर सरल करना बहुत जरूरी है। इस महान फैसले के समर्थन में वीणा जी ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली केन्द्रीय हिन्दी समिति से लेकर गृहराज्य मंत्री की मंत्रालयी बैठकों और राजभाषा विभाग द्वारा समय समय पर जारी निर्देशों का सहारा लिया है। यह परिपत्र केन्द्र सरकार के सारे कार्यालयों, निगमों को भेजा गया है इसे अमल में लाने के लिए। यानी कुछ दिनों में हम सरकारी दफ्तरों, कामकाज, पत्राचार की भाषा में इसका प्रभाव देखना शुरु कर देंगे। शायद केन्द्रीय मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के उनके सहायकों और राजभाषा अधिकारियों द्वारा लिखे जाने वाले सरकारी भाषणों में भी हमें यह नई सहज, सरल हिन्दी सुनाई पड़ने लगेगी। फिर यह पाठ्यपुस्तकों में, दूसरी पुस्तकों में, अखबारों, पत्रिकाओं में और कुछ साहित्यिक रचनाओं में भी दिखने लगेगी।

अधर में लटकी अन्ना टीम

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अधर में लटकी अन्ना टीम
डॉ. वेदप्रताप वैदिक



अन्ना आंदोलन के दो सशक्त स्तंभ तो ढह ही चुके हैं और एक पहले से ही हिल रहा है। स्वामी अग्निवेश ने अपने विरोध और मोहभंग को मोबाइल फोन से निकालकर अब लाउडस्पीकर पर चढ़ा दिया है। प्रशांत भूषण ने कश्मीर पर मुँह खोलकर अपने लिए दरवाजा बंद कर लिया है। अन्ना की टिप्पणी के बावजूद अगर वे इस आंदोलन का हिस्सा बने रहते हैं तो उनकी इज्जत कितनी बची रह पाएगी, यह वे स्वयं समझ सकते हैं। जस्टिस हेगड़े पहले दिन से ही अपनी बीन अलग बजाते रहे हैं। यहाँ अगर इस बहस में न पड़ा जाए कि कौन सही और कौन गलत तो भी यह मूल प्रश्न तो उठना ही चाहिए कि अभी इस आंदोलन को शुरू हुए छह माह ही हुए हैं और इसमें इतनी दरारें क्यों पड़ती जा रही हैं?
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