पाप वृत्ति का उन्मूलन







पाप वृत्ति का उन्मूलन


पापमयी वृत्ति के उन्मूलन के लिए प्रार्थना : ऋग्वेद से



ऋ1/97 ध्रुव पंक्ति
..... अप न:शोशुचदधम्




ओम् अप न: शोशुचदमग्ने शुशुग्ध्यारयिम् !
अप न: शोशुचदधम् !! 
ऋ/1/97/1

हे प्रभु! हमारे आलस्यरूपी रोग बार बार यज्ञाग्नि मे दग्ध हों. अच्छे प्रकार के शुद्ध धन का प्रकाश कराइये.




सुक्षेत्रिया सुगातुया वसूया च यहामहे !
अप न: शोशुचदधम् !!
ऋ1/97/2

उत्तम देश मे रहने की इच्छा, चलने के लिए उत्तम मार्ग की इच्छा, उत्तम धन प्राप्त करने की इच्छा से हम प्रेरित हैं. हमारी शत्रु जन्य दु:ख रूप पाप वृत्तियाँ यज्ञाग्नि मे दग्ध हों.



प्र यद् भन्दिष्ठ एषां प्रास्माकासश्च सूरय: !
अप न: शोशुच्दधम् !!

ऋ1/97/3

साधारण प्रजाजनों मे उत्तम बुद्धि वाले, अधिक प्रयास करने वाले सब से आगे निकल जाते हैं, उस प्रकार के साधनों को प्राप्त कराने के लिए, हमारी शत्रु जन्य दु:ख रूप पाप वृत्तियाँ यज्ञाग्नि मे दग्ध हों.



प्र यत्ते अग्ने सूरयो जायेमहि प्र ते वयम् !
अप न: शोशुचदधम् !!
ऋ1/97/4
उत्तम बुद्धि से प्रेरित हम आगे भी ऐसी संतान को उत्पन्न करें (जो उन्नति के मार्ग पर चलती रहे ), इस लिए हमारी शत्रु जन्य दु:ख रूप पाप वृत्तियाँ यज्ञाग्नि मे दग्ध हों.



प्र यदग्ने सहस्वतो विश्वतो यंति भानव: !
अप न: शोशुचदधम् !! 
ऋ1/97/5
हमारा तेज भी इस अग्नि की भांति चारों ओर प्रकाशमान हो. इस लिए हमारी शत्रु जन्य दु:ख रूप पाप वृत्तियाँ यज्ञाग्नि मे दग्ध हों.



त्वं हि विश्वतोमुख विश्वत: परिभूरसि !
अप न: शोशुचदधम्!!
ऋ1/97/6
सब ओर से विराजमान आप द्वारा प्रदत्त सद्बुद्धि का प्रकाश अंतर्मुखि भी हो ,इस लिए हमारी शत्रु जन्य दु:ख रूप पाप वृत्तियां यज्ञाग्नि मे दग्ध हों.


द्विषोनो विश्वतोमुखाति नावेव पारय !

अप न: शोशुचदधम् !!

 ऋ1/97/7
हे अन्तर्यामी! हमारी जीवन नौका को शत्रुओं के पार ले जावो. इस लिए हमारी शत्रु जन्य दु:ख रूप पाप वृत्तियाँ यज्ञाग्नि मे दग्ध हों.


स न: सिन्धुमिव नावयाति पर्षा स्वस्तये !
अप न: शोशुचदधम् !!
ऋ1/97/8
हमारे कल्याण के लिए हमे दुर्गति से पार ले जावो. इस लिए हमारी शत्रु जन्य दु:ख रूप पाप वृत्तियाँ यज्ञाग्नि मे दग्ध हों.

  -   सुबोध कुमार 


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5 comments:

  1. बहुत सुन्दर सरगार्वित प्रस्तुति....आभार

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  2. इसका तो ज्ञान ही नहीं था ...और जानना बहुत आवश्यक था :-)
    सादर

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  3. "पाप वृत्तियाँ सभी शत्रु हैं,यज्ञ अग्नि में जल जाएँ
    तपोपूत पावन इच्छाएँ ,संध्यादीप सी बल जाएँ"

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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