ज़रूर आएँ


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1 comment:

  1. जो काम चोरी छिपे निजी तौर पर हर आदमी करना चाहता है, खासकर राजनैतिक दलों के लोग जिन्हें जातिगत समीकरण बनाकर चुनाव लड़ने हैं, उस काम को आधिकारिक रूप से करा लेने में हर्ज ही क्या है? हम अपने जीवन और रहन-सहन के बारे में, रिश्तेदारी और मित्रता स्थापित करने के बारे में या किसी व्यक्ति के व्यवहार के उचित-अनुचित होने के सम्बन्ध में बहुत से महत्वपूर्ण निर्णय जाति के आधार पर लेते हैं। इस सच्चाई से जिसे इन्कार हो वही इस विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने हेतु नैतिक रूप से अर्ह है।

    काश हम अपने भीतर के जातिगत संस्कारों का विरोध कर पाते। पहले हम इस प्रवृत्ति को मिटाने की दिशा में कदम बढ़ाएं तो बेहतर है।

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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