"अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु"

हिन्दी भारत

" - हिन्दी भारत - " (भारत व भारतीयता से जुड़े सभी साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक प्रयासों, हिन्दी में रचनात्मक लेखन (विविध विधाएँ), भाषिक मंतव्यों, जीवनमूल्यों, पारस्परिक आदान-प्रदान की अभिवृद्धि हेतु) ***** हिन्दी भारत ***** "

अभी न होगा मेरा अंत

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प्रभाष जोशी- एक युग का अवसान


 


गुरुवार की रात और रातों जैसी नहीं थी। इस रात जो हुआ उसके बाद आने वाली कोई भी रात अब वैसे नहीं हो पाएगी। रात एक बजे के कुछ बाद फोन बजा और दूसरी ओर से एक मित्र ने कहा, बल्कि पूछा कि प्रभाष जी के बारे में पता है?आम तौर पर इस तरह के सवाल रात के इतनी देर में, जिस मकसद से किए जाते हैं वह जाहिर होता है। मित्र ने कहा कि प्रभाष जी को दिल का दौरा पड़ा और वे नहीं रहे।



काफी देर तो यह बात मन में समाने में लग गई कि प्रभाष जी अतीत हो गए हैं। अभी तीन दिन पहले तो उन्हें स्टूडियो में बुलाने के लिए फोन किया था तो पता चला था कि वे पटना जा रहे हैं- जसवंत सिंह की किताब का उर्दू संस्करण लोकार्पित करने। पटना से वे कार से वाराणसी आए और कृष्णमूर्ति फाउंडेशन में रूके। वहाँ से हमारे मित्र और मूलत: वाराणसी वासी हेमंत शर्मा को फोन किया और कहा कि गेस्ट हाउस में अच्छा नहीं लग रहा। हेमंत ने गाड़ी भेज कर उन्हें घर बुला लिया। घर पर उन्हें इतना अच्छा लगा कि एक दिन और रूक गए। इसके बाद लखनऊ मे गोष्ठी थी। हिंद स्वराज को ले कर, उसमें भी गोविंदाचार्य के साथ कार से गए। वहाँ से जहाज से दिल्ली लौटे थे और बहुत थके हुए थे।




मेरे गुरु प्रभाष जोशी क्रिकेट के दीवाने थे। इतने दीवाने कि क्रिकेट के महापंडित भी कहते थे कि अगर पेशेवर क्रिकेट खेलते तो भारत की टीम तक जरूर पहुँच जाते। क्रिकेट का कोई महत्वपूर्ण मैच चल रहा हो तो प्रभाष जोशी को फोन करना अपनी आफत बुलाने जैसा था। गुरुवार की रात भी क्रिकेट का मैच ही था और भारत आस्ट्रेलिया से सीरीज छीनने के लिए खेल रहा था। सचिन तेंदुलकर ने वनडे क्रिकेट में 17000 रन का रिकॉर्ड बना लिया था और प्रभाष जी उत्साहित थे मगर तभी विकेट गिरने शुरू हो गए और भारत हार की ओर बढ़ने लगा। प्रभाष जी बेचैन हुए। ब्लड प्रेशर की गोली खाई। टीम हार गई तो बेचैनी और बढ़ी और आखिरकार और दवाई लेने से भी लाभ नहीं हुआ तो बेटा संदीप उन्हें पास में गाजियाबाद के नरेंद्र देव अस्पताल में ले गया। मगर वहां तक पहुँचते पहुँचते काया शांत हो चुकी थी। प्रभाष जी के प्रिय, कुमार गंधर्व के गाए निगुर्णी भजन से शब्द उधार लें तो हंस अकेला उड़ गया था।



प्रभाष जी के सारे प्रिय जन एक एक कर के संसार से जा रहे थे और प्रभाष जी हर बार उन पर रुला देने वाला लेख लिखते थे। सिर्फ एक बार रामनाथ गोयनका के निधन पर उनका लेख नहीं आया और जब पूछा तो उन्होंने कहा कि मेरे मन में अब तक समाया नहीं हैं कि आरएमजी नहीं रहे। उनके हर लेख में एक तरह का आत्मधिक्कार होता था कि सब जा रहे हैं तो मैं क्यों जिंदा हूँ। बार बार यह पढ़ कर जब आपत्ति का एक पत्र लिखा तो उन्होंने बाकायदा कागद कारे नाम के अपने कॉलम में इसका जवाब दिया और कहा कि राजेंद्र माथुर, राहुल बारपुते, शरद जोशी, कुमार गंधर्व और सगे छोटे भाई की मौत में मुझे अपना एक हिस्सा मरता दिखता है और जो प्रतीत होता है वही मैं लिखता हूँ।



प्रभाष जी के कई चेहरे थे। एक क्रिकेट को भीतर से / बाहर से जानने वाला और कपिल देव को देवीलाल से पहली बार दो लाख रुपए का इनाम दिलवाने वाला, कपिल, सचिन, अजहर, गावस्कर, विशन सिंह बेदी से दोस्ती के बावजूद रणजी और काउंटी खेल चुके बेटे संदीप को भारत की टीम में शामिल करने की सिफारिश नहीं करने वाला, एक्सप्रेस समूह की प्रधान संपादकी ठुकरा कर जनसत्ता निकालने वाला, जनसत्ता को समकालीन पत्रकारिता का चमत्कार बना देने वाला, सरोकारों के लिए लड़ने वाला, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी से दोस्ती के बावजूद उनकी धर्म ध्वजा छीनने वाला, कुमार गंधर्व के भजनो में डूबने वाला, अपने हाथ से दाल वाफले बना कर दावत देने वाला, पूरे देश में घूम कर पत्रकारिता में आई खोटों के खिलाफ अलख जगाने वाला, जय प्रकाश आंदोलन में शामिल होने वाला और उसके भी पहले बिनोवा भावे के भूदान आंदोलन में घूम घूम कर रिपोर्टिंग करने वाला, हाई स्कूल के बाद पढ़ाई बंद करने के बावजूद लंदन के एक बड़े अखबार में काम करने वाला, धोती कुर्ता से ले कर तीन पीस का सूट पहन कर खाटी ब्रिटिश उच्चारण में अंग्रेजी और शुद्व संस्कृत में गीता के श्लोक समझाने वाला, प्रधान संपादक होते हुए डेस्क पर सब एडिटर बन कर बैठ जाने वाला, अनवरत यात्रा करने वाला, एक्सप्रेस समूह के मालिक को पत्रकारिता की आचार संहिता याद दिलाने वाला और सबसे अलग घर परिवार वाला एक चेहरा जिसमें यह भी शामिल है कि मेरे लिए लड़की माँगने लड़की वालों के घर वे पत्नी के साथ मिठाई का डिब्बा ले कर खुद पहुँचे थे।



प्रभाष जी के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है और बहुत कुछ खुद उन्होंने लिखा है। लेकिन आदि सत्य यह है कि हिंदी पत्रकारिता के ऋषि कुल के वे आखिरी संपादक थे। संपादक और सफल संपादक अब भी हैं मगर अब प्रभाष जोशी कोई नहीं है। प्रभाष जी की माँ अभी हैं और कल्पना कर के कलेजा दहलता है कि अपने यशस्वी बेटे की देह को वे देखेंगी तो कैसा लगेगा? याद आता है कि कागद कारे कॉलम कभी स्थगित नहीं हुआ। याद यह भी आता है कि बांबे हास्पीटल में ऑपरेशन के बाद प्रभाष जी इंटेसिव केयर यूनिट से बाहर आए थे और डॉक्टरों के लाख विरोध के बावजूद बोल कर मुझसे अपना कॉलम लिखवाया था। उस कॉलम में उन्होंने निराला की पक्ति लिखवाई थी- अभी न होगा मेरा अंत। आज वह पक्तिं याद आ रही है।



प्रभाष जी का जाना एक युग का अवसान है। एक ऐसा युग जहाँ सरोकार पहले आते थे और बाकी सब बाद में। उनके सिखाए पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी हैं और बड़े बड़े पदों पर बैठी है। उनमें से ज्यादातर को प्रभाष जी के दीक्षा में मिले संस्कार और सरोकार याद हैं। तिहत्तर साल की उम्र बहुत होती है लेकिन बहुत ज्यादा भी नहीं होती। प्रभाष जी कहते थे कि वे गांधीवाद पर एक किताब लिखना चाहते हैं और एक और किताब भारत की समकालीन राजनीति के विरोधाभासों पर लिखना चाहते हैं। काल ने उन्हें इसका अवसर नहीं दिया।



लिखना प्रभाष जी का शौक नहीं था। शानदार हिंदी और शानदार अंग्रेजी लिखने वाले प्रभाष जी ने सरोकारो की पत्रकारिता की और कई बार ऐसा भी हुआ कि सरोकार आगे चले गए और पत्रकारिता पीछे रह गई। जनसत्ता के प्रभाव के कम होने की एक वजह यह भी थी कि प्रभाष जोशी का ज्यादातर समय विश्वनाथ प्रताप सिंह की तथाकथित गैर कांग्रेसी सरकार बनाने में लग रहा था और वे कभी देवीलाल तो कभी चंद्रशेखर तो कभी अटल बिहारी वाजपेयी को साधने में जुटे हुए थे।



प्रभाष जी जैसा अब कोई नहीं है। ईश्वर करे कि मेरा यह विश्वास गलत हो कि उन जैसा कोई और नहीं होगा। लेकिन प्रभाष जोशी बनने के लिए कलेजा चाहिए। घर फूँक कर निकलने की हिम्मत चाहिए। जो सच है उस पर अड़े रहने की जिद चाहिए। इससे भी बड़ी बात यह है कि प्रभाष जी ने हिंदी पत्रकारिता को भाषा के जो संस्कार दिए, एक नया व्याकरण दिया और सबसे आगे बढ़ कर पत्रकारिता की प्रतिष्ठा से कोई समझौता नहीं होने दिया। वैसा करने वाला फिलहाल कोई नजर नहीं आता। बहुत पहले प्रभाष जी के साठ साल पूरे होने पर राहुल देव और मैंने एक किताब संपादित की थी और उसके आखिरी वाक्य से यहाँ विराम देना चाहूँगा। मैंने लिखा था कि प्रभाष जी समुद्र थे और उन्होंने खुल कर रत्न बाँटे मगर मैं ही अंजुरी बटोर कर उन्हें समेट नहीं पाया।
- आलोक तोमर

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वन्दे मातरम् : "विशिष्ट सेवा पदक" गृहीता बिगेडियर सावंत

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वन्दे मातरम् :  "विशिष्ट सेवा पदक" गृहीता बिगेडियर सावंत  





"वन्दे मातरम्'  के विरुद्ध अभी हाल ही देवबंद में दिए गए फतवे के समाचार से कौन भारतीय परिचित अथवा आक्रोशित / दु:खी न होगा | उस कार्यक्रम से सम्बंधित 2 समाचार मेरे दृष्टि में आए हैं, जिन्हें क्रमशः यहाँ, यहाँ, यहाँ, यहाँ  यहाँ और यहाँ देखा जा सकता है | यदि किसी के पास रामदेव जी की वन्देमातरम के विरुद्ध जारी हुए फतवे पर उस कार्यक्रम में दी गई  किसी प्रतिक्रिया की कोई जानकारी हो तो कृपया यहाँ बाँटें |

इस  बीच मुझे राष्ट्रपति द्वारा "विशिष्ट सेवा पदक " प्राप्त ब्रिगेडियर चित्तरंजन सावंत जी का अंग्रेजी में लिखा एक सुचिंतित आलेख उनसे प्राप्त हुआ है, जिसे सभी के लाभार्थ यहाँ प्रकाशित कर रही हूँ|

ब्रिगेडियर चित्तरंजन सावंत जी का परिचय तो यों काफी विशद है, उनके सेना के कार्य अनुभव के साथ साथ; किन्तु हिन्दी-भारत के अपने पाठकों के लिए यहाँ यह बताना अनिवार्य है कि गत ३६ वर्ष से प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस पर पर लालकिले की प्राचीर तथा राजपथ से "आँखों देखा हाल " का हिन्दी में गूँजता स्वर  ब्रिगेडियर सावंत जी का ही होता है, जिसकी गहराई, उच्चारण, गति, ओज, राष्ट्रनिष्ठा लोगों को चुम्बक की तरह खींचती है (पहले दूरदर्शन से एवं अब Zee तथा सहारा समय ) | .... तो सब के चहेते व राष्ट्र एवं संस्कृति संबन्धी विमर्शों में निरंतर रत रहने वाले सावंत जी की लेखनी से प्रसूत यह आलेख पढें| अपने विचारों से अवगत कराएँ व इस  पर अपनी राय भी दें| 

- कविता वाचक्नवी 






VANDE MATARAM


By Brig Chitranjan Sawant,VSM 


Vande Mataram had indeed worked like a Ved mantra. This is what the author and poet, Bankim Chandra Chattopadhyaya had prophesied in answer to the criticism that the words used in the song were too difficult to pronounce. He said to his critics "I may not live to see its popularity, but this song will be sung by every Indian like a Ved mantra". How true his words were. The history of the Indian freedom struggle bears a testimony to it. Vande Mataram has spontaneity and emotional appeal to arouse patriotism even in a slavish heart. The song has the capability to transcend barriers of caste, creed, region and religion. It was sung with gusto by patriotic Indians throughout the length and breadth of Bharat. When the song was sung , with the fading notes of the last stanza, the emotionally surcharged crowd of men and women would raise the slogan : Bharat Mata Ki Jai. The sound and the echo shook the mighty British Empire to its foundation.








Bankim babu wrote Vande Mataram in one sitting in his native village, Naihati, just a few miles away from the metropolis, Calcutta..It was Akshay Naomi which fell on a Sunday on 7 November 1875 and Bankim babu, a Deputy Collector of the British Raj was relaxing in his ancestral home. His mind and heart were in turmoil. The English masters were forcing their own national anthem, God Save the Queen, down the throat of all Indians. Bankim babu felt the divine inspiration and words came pouring out of his heart and on to his pen. An immortal song, Vande Mataram, stood composed. It was seven years later that Vande Mataram was incorporated in the famous novel of the author, Anand Math, dealing with the history of the Sanyasi uprising in Dacca, North Bengal and other places from 1763 to 1780. The Dharm Yudh was against the foreign domination. The English and their collaborators were targeted. The saints uprising has inspired the youth of Bengal ever since. Indeed, it was a never fading source of inspiration for the patriots all over Bharat




No less a person than Gurudev Ravindra Nath Tagore lent his voice to Vande Mataram when he sang it in the session of the Indian National Congress in Calcutta in 1896. It was a stirring moment, although the tempo was rather slow compared to that of the rendering of Vande Mataram by Lata Mangeshkar in the movie, Anand Math. Nevertheless, Vande Mataram had come out of the rural landscape to play its all important role on the national stage. Bengal loved the song and the rest of India was not far behind. Vande Mataram was sung in many tunes, in many languages by many men and women voluntarily. North, South, East and West of India were equally involved.


1905 was the high noon of the national fervour that Vande Mataram generated. Lord Curzon, the then Viceroy, passed a decree dividing Bengal into two parts, east and west. The British are at their best when they play the game called, Divide and Rule. However, it was rather unfortunate for the rulers that the Bang Bhang united India as a whole. Men and women of all faiths walked the streets of towns and talukas of Bengal singing Vande Mataram with religious fervour. It was a sight to be seen to be believed. The decree of Curzon was rescinded. But the British were back to their game of dividing the united people. They made some elements believe that singing Vande Mataram was a sign of Hindu domination. Their trick worked. The bogey of religion took its toll. The Muslim League was born. No one was happier than the British masters.





The Indian National Congress, at its Varanasi session , adopted Vande Mataram as the national song on 7th September 1905. The cohesive spirit that the song generated could not be lost sight of by the national leaders. The momentous decision was taken unanimously a century ago. Since then the national song is sung at all sessions not only of the Congress but also the Bhartiya Janata Party and some others. It is sung in the closing session of the parliament too. Truly national in word and deed.



Vande Mataram has all along been a song of patriotism and unification. Gandhi and Jinnah sang it together on the Congress platform till the latter quit the Congress as he was a non-believer in the principle of Swaraj . Of course, Maulana Abul Kalam Azad and Shri Purshottam Das Tandon, born rivals, were in the forefront in singing Vande Mataram at the beginning of the session everywhere. Shri Rafi Ahmad Kidwai , out and out a nationalist, never had a second thought about singing Vande Mataram. Nevertheless, the divisive forces were working overtime at the behest of their British masters to upset the applecart. How sad, the mischief mongers had their way. The rest is history. Is history repeating itsef ? Time alone will tell.




Singing Vande Mataram the Indian people had waged the war of Independence non-violently. The song was all along the National Anthem to the rank and file of freedom fighters. A committee comprising Nehru, Azad, Subhash Bose and Narendra Dev had said that the first two stanzas of the song had no reference to any religion and should be our anthem. It came as a rude shock when the controversial decision to make Jana Gana Mana the national anthem was announced on 24 January 1950. However, the words of Dr Rajendra Prasad, President of the Constituent Assembly, came as a soothing balm. He said, "…the song Vande Mataram , which has played a historic part in the struggle for Indian freedom, shall be honoured equally with Jana Gana mana and shall have equal status with it."



Taking a look at the English translation of Vande Mataram, done by Shree Aurobindo, one may safely surmise that the storm in a tea cup brewing at the behest of separatists will blow away and patriotism will prevail. The stanzas of the song are given below :




Mother, I bow to Thee !
Rich with thy hurrying streams
Bright with orchard gleams.
Cool with thy winds of delight
Green fields waving Mother of might,
Mother free.
Glory of moonlight dreams,
Over thy branches and lordly streams,
Clad in thy blossoming trees,
Mother, giver of ease
Laughing low and sweet!
Mother I kiss thy feet,
Speaker sweet and low!
Mother, to thee I bow




Indeed the original song in Bangala with a rich dose of Sanskrit words is soul stirring. Although the British government in India had banned the national song Vande Mataram, it surfaced and resurfaced. The British failed in suppressing the spirit of independence. The Indians won their freedom. Let us now all sing in unison the song of the People,

VANDE MATARAM.

________________________
Upvan, 609, Sector 29, NOIDA – 201303, INDIA 







''कविता के पक्ष में नहीं'' : जयंत महापात्र

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पुस्तक-चर्चा






''कविता के पक्ष में नहीं''
: जयंत महापात्र की कविता*
ऋषभदेव शर्मा







''कविता के पक्ष में नहीं '' [ २००९ ] के रचनाकार जयंत महापात्र [१९२८] भारतीय अंग्रेजी साहित्य के सर्वाधिक चर्चित हस्ताक्षरों में सम्मिलित हैं। उनकी पहचान कविता के एक ऐसे प्रशांत स्वर के रूप में है जिसमें सदा भारतीयता अनुगुंजित होती रहती है। उनकी प्रकाशित कृतियों में १७ अंग्रेजी काव्यसंग्रह, ५ ओडिया काव्यसंग्रह, ८ अनूदित काव्यसंग्रह, १ कहानीसंग्रह [ग्रीन गार्डनर ] तथा १ निबंधसंग्रह [डोर आफ पेपर ] सम्मिलित हैं. साहित्य अकादेमी सहित अनेक देशी-विदेशी संस्थाओं द्वारा सम्मानित और पुरस्कृत साहित्यकार जयंत महापात्र की दृष्टि में मानव मन को सर्वाधिक प्रभावित करने वाली शक्ति कविता है, इसीलिए वे चाहते हैं कि कवि को मानव जीवन की परिस्थितियों पर दूसरी तमाम चीजों से अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने अपने काव्य में ऐसा ही किया है और इसीलिए वे सही अर्थों में मनुष्यता के कवि हैं । उनकी कविता में प्रेम है तो प्रेम से मोहभंग भी है। वे वर्तमान काल के एकाकीपन और उससे जुड़े भय तथा यातना को अपनी कविता में वाणी प्रदान करने वाले समर्थ, तथा सही अर्थों में समकालीन, कवि हैं। जीवनराग विविध रूपों में उनकी कविता में फूट पड़ता दिखाई देता है - और जीवन से जुड़े भय तथा भ्रम भी, चाहे वे बुढ़ापे से संबंधित हों या मृत्यु से, भूख से संबंधित हों या आतंक से। उन्होंने सुनहरे अतीत के गीत गाए हैं लेकिन उसके व्यामोह में वे नहीं फँसते। बल्कि अतीत की स्मृतियाँ वर्तमान की व्याख्या करने में उनकी सहायता करती हैं और भविष्य के स्वप्न की प्रेरणा भी बनती हैं । ओडिशा की मिट्टी में पले-पुसे इस महान कवि ने अपनी रचनाओं में स्थानीयता के रंगों को भी खूब उकेरा है - सुंदर भी और विद्रूप भी।


जयंत महापात्र के निकट काव्यरचना परिवेश के वजन के दबाव को स्वीकार करने का, सहनीय बनाने का, एक यत्न है - इस तरह कि वह पोशाक जैसा हल्का हो जाए। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उससे उत्पन्न होने वाली पीड़ा समाप्त हो जाती हो। नहीं, वह तो ज्यों की त्यों रहती है, हर शाम मंदिर की घंटियों की तरह जागती है और रचनाकार की हड्डियों पर अपना वजन लाद देती है । यह स्वाभाविक भी है क्योंकि कवि न तो उस स्त्री की उपेक्षा कर सकता है जो घुटनों को छाती से लगाए लुटी-पिटी सी बैठी है और न ही उस हवा की आवाज सुनने से इनकार कर सकता है जो माँ की बाँहों में मरती बच्ची की चीख को उठाए फिर रही है। यह पीड़ा धरती से आकाश तक फैली है - धरती फट गई है, उसके हर टुकड़े से उड़ चिडिया दूर चली गई है, और बारिश का तो कहीं अता-पता ही नहीं। ऐसे में जीवन को चारों ओर से घेरता हुआ अनंत भय नाई की दुकान के समानांतर आइनों में प्रतिबिंबित होता नित्य बढ़ता चला जाता है, सुबह प्रकाशमान न होकर ताप भरे कूडे करकटोंवाली भर रह जाती है और सूरज के तले केवल धुँआ-धुँआ बच रहता है। परिणामस्वरूप व्यर्थताबोध आम आदमी की तरह कवि को भी डसने लगता है। दीवारों पर छिपकलियाँ हँसती हैं धीरे धीरे और नम धरती पर कुकुरमुत्ते उगते हैं, जगने पर न रात का बोध होता है न दिन का - लगता है जीवन झूठा है और इस झूठ में समय बीत रहा है। कवि ने इस निरर्थकता और व्यर्थता को गहराई से पकड़ा है और उससे जुड़े खीझ और ऊब के मनोभावों को सटीक अभिव्यक्ति प्रदान की है।


जयंत महापात्र ने अपनी कविताओं में भूख और बदहाली के जो चित्र उकेरे है संभवतः उनकी प्रेरणा ओडिशा की जनजातियों की जीवनस्थितियों से मिली होगी। इसीलिए गोल चक्कर काटते नर्तकों की परिधि पर नृत्य के आवेग के चरम क्षण में कवि ने बीते युगों के क्षण, धरती की शक्ति, पेड़ों की छाया और स्फटिक सबको टूटते देखा है - भुखमरी की शक्तिहीन खामोशी के समक्ष। भूख के साथ ही रात और आतंक के भी अनेकविध चित्रांकन जयंत महापात्र की कविता में मिलते हैं जो इतिहासबोध और समकालीनताबोध की संधिरेखा पर अवस्थित हैं -


‘‘रात आ रही है
केवल समुद्र की मरणांतक शांति
जिसमें एक नाव डूब गई
शहर की अंधी गली ने
बचपन के पेट को चबा लिया
और युवक की आंतों को छलनी कर दिया
मांस के खिलाफ भिंची मुट्ठी सा
फूट पड़ता है जीने का स्वाद
यहाँ कोई अंत नहीं,
हदय की निःशब्द चीखों का,
केवल पवित्र जल्लाद तनकर खड़ा है
इतिहास को हड्डियों की गहराई में काटते हुए।’’ 



अपने बचपन से लेकर देश और मनुष्यता के इतिहास तक का मंथन करके कवि ने यह निष्कर्ष पाया है कि


‘‘हमारे जाये हर एक बच्चे के भीतर अंधकार का एक टुकडा है 
जो उसका पीछा करता है जहाँ भी जाए, दिन-रात।’’


अंधकार का यह टुकड़ा सर्वव्यापी है। बाहर भी है और भीतर भी। इसीलिए इससे बचने की खातिर खिड़की बंद करने से कोई लाभ नहीं होता क्योंकि कमरे में भी रात है। रात कमरे में ही नहीं, व्यक्ति के भीतर भी है जिसके अंधेरे में उसे बरसों गुम रहना पड़ता है - अपना रास्ता ढूँढ़ निकालने से पहले। अंधेरा परिवेश में भी है और देश में भी। पर कोशिश करने पर भी रास्ता इसलिए नहीं मिलता कि हम अंधकार से लड़ने के लिए अंधकार का ही सहारा लेते रहते हैं। धरती की परछाइयों के आगे आकाश का रंग शर्मसार होता है क्योंकि हम इतनी सी बात नहीं समझ पाते कि

‘‘मानव का वैर खुद हमसे कैसे हिफाजत करेगा हमारी ?’’ 


परिणाम स्पष्ट है कि पृथ्वी ग्रह हिंसा और असुरक्षा से घिरा हुआ है। आज हर आदमी की आत्मा एक दूसरे की हत्या करने के कारण भारी है। इस युद्ध और आतंकवाद से भरी हुई दुनिया में बुद्ध और ईसा के बाद सर्वाधिक प्रासंगिक यदि कुछ है तो वह है गांधी की अहिंसा का दर्शन। जयंत महापात्र ने अपनी कविताओं में महात्मा गांधी को कई तरह से याद किया है, पुकारा है -


"ईसा के इतने सालों बाद
तुम रो पड़े तो क्या तुमने रुदन को पुकारा?
तुम सभी चीजों की एकता को छूते हो
दिन का लालित्य आता और जाता है
ताकि तुम्हारे शरीर से आसानी से जिंदगी बहे
साथ में खून भी जो कि हमारी नियति को भविष्यवाणी देता है"
ताकि हम यह समझें कि यह देश तुम्हारा कितना साथ देता है।’’




महात्मा गांधी और उनके स्वप्न का स्वराज्य इसलिए भी कवि को बार-बार याद आते हैं कि पिछली आधी शताब्दी में भारत में प्रतिदिन महात्मा गांधी की हत्या हुई है और उनके स्वप्न के साथ बलात्कार हुआ है। लोकतंत्र की विफलता को लक्षित करते हुए कवि एक साधारण जागरूक नागरिक के रूप में स्वयं को भी इस सबके लिए उत्तरदायी मानते हैं -


‘‘छोटी बच्ची का हाथ अंधकार से बना है
मैं इसे कैसे थामूँ ?
सड़क की बत्तियाँ कटे हुए सिर की तरह लटक रही हैं
खून हमारे बीच के उस डरावने दरवाजे को खोलता है
देश का चैड़ा मुँह दर्द से जकड़ा है
और शरीर काँटों की सेज पर
कराह रहा है
इस नन्ही बच्ची के पास बचा है बस बलात्कार किया हुआ शरीर
ताकि मैं उसके पास पहुँचूँ
मेरे अपराध का बोझ
मुझे रोक नहीं पाता उसे बाँहों में भरने से।‘‘ 



इतने पर भी कवि को तब कुछ सांत्वना मिलती है जब इस कीचड़ में से, आत्माओं की एकत्र अस्थियों में से, कमल के ऐसे फूल के खिलने का संकेत मिलता है जो आँसू जैसा पवित्र है । इस फूल की पंखुडियों में से शताब्दियों के अंधकार का खून बह रहा है तथापि संतोष का विषय है कि कब्र के बाहर रोशनी की चोंच खुलती है और पड़ोसी के घर में बच्चा रोने लगता है तो भविष्य के इन शुभ संकेतों के बीच जागरण की संभावनाएँ रूपायित होती दिखाई देती हैं।



अंधकार में बजती टेलीग्राफ की कुंजियों की ठकठकाहट में जीवन का मर्म खोजने वाले रचनाकार जयंत महापात्र की ये अंग्रेजी कविताएँ हिंदी के पाठकों को उपलब्ध कराने के लिए अनुवादक संतोष अलेक्स [१९७१] बधाई के पात्र हैं । मलयालम मातृभाषी संतोष अलेक्स बहुभाषी अनुवादक हैं। वे अंग्रेजी, हिंदी, मलयालम और तेलुगु में परस्पर अनुवाद द्वारा भारतीय भाषाओं और भारतीय साहित्य की निरंतर सेवा में लगे हुए हैं। विशेष रूप से मलयालम साहित्य को हिंदी में उपलब्ध कराने के प्रति वे प्रतिबद्ध और संकल्पित हैं। जयंत महापात्र की कविताओं का यह अनुवाद उन्होंने अत्यंत परिश्रम और निष्ठापूर्वक संपन्न किया है।



मुझे विश्वास है कि समकालीन भारतीय साहित्य के प्रमुख कवि जयंत महापात्र की अंग्रेजी कविताओं के इस अनुवाद का हिंदी जगत में हार्दिक स्वागत होगा तथा संतोष अलेक्स भविष्य में भी इसी प्रकार हिंदी की सेवा करते रहेंगे।

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 * कविता के पक्ष में नहीं  [ कविता संग्रह] ,
अंग्रेजी मूल : जयंत महापात्र ,
 हिंदी अनुवाद : संतोष अलेक्स ,
 शब्दसृष्टि, एस - ६५८ ए, गली न. ७, स्कूल ब्लाक , शकरपुर, दिल्ली - ११० ०९२,
२००९,
 रु.१२५/-,
 ८० पृष्ठ, सजिल्द.



द्वंद्व नहीं, प्रतिद्वंद्विता का सवाल : क्या युद्ध हमेशा सीमाओं पर ही लड़ा जाता है?

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द्वंद्व नहीं, प्रतिद्वंद्विता का सवाल

दूसरी बात हाल ही में सामने आई है, जिसका श्रेय ‘माओ : द अननोन स्टोरी’ के लेखक द्वय जुंग चांग और जॉन हैलिडे को है। इस पुस्तक में विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर यह बताया गया है कि माओ त्से तुंग ने भारत पर इसलिए हमला करवाया कि वे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में जवाहरलाल नेहरू की बढ़ती हुई लोकप्रियता से चिढ़ने लगे थे। माओ का यह सपना भी पूरा हुआ, क्योंकि चीनी आक्रमण के बाद नेहरू की ख्याति और लोकप्रियता पर ग्रहण लग गया और सिर्फ दो वर्ष बाद उनका देहावसान भी हो गया। दरअसल, अतिशय महत्वाकांक्षी और सत्ता-कामी माओ का यह चेहरा भारतीय मीडिया और जनमत से छिपा रहा है, क्योंकि भारत के वामपंथ ने माओ के व्यक्तित्व को एक ‘क्रांतिकारी रहस्यवाद’ से ढक रखा है। इस बीच चीन ने अपने को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है, इसमें संदेह नहीं। दूसरी ओर, भारत सरकार और उसका चापलूस बुद्धिजावी वर्ग भारत को भी महाशक्ति के रूप में पेंट करता रहता है, पर चीन और भारत के बीच अभी भी कोई तुलना नहीं है – न सामरिक शक्ति के स्तर पर और न आर्थिक शक्ति के स्तर पर। हाँ, व्यापक गरीबी के मामले में जरूर दोनों एक-दूसरे के आसपास ही हैं। आर्थिक मंदी के परिणामस्वरूप इस समय चीन की राजधानी तथा अन्य शहरों से गरीबों को कुत्तों की तरह खदेड़ा जा रहा है। इसे ‘बैक टू विलेज’ अभियान बताया जा रहा है। उसके बावजूद, भारत में दरिद्रता का प्रकोप कहीं ज्यादा है। हो सकता है, चीन अगले बीस-पचीस सालों में गरीबी की समस्या सुलझा ले, पर भारत की आर्थिक प्रगति की दिशा और तैयारी को देखते हुए यह अवधि पचास वर्ष से आगे भी जा सकती है।








1962 और 2009 के बीच फर्क क्या है? तब हमारा मीडिया सोया हुआ था और आज वह कुछ ज्यादा ही जगा हुआ है। तब अखबारों में वही सब छपता था जो सरकार चाहती थी या मुहैया कराती थी। आज मीडिया हर जगह अपना एक एजेंडा तैयार कर लेता है। तब राष्ट्रभक्ति के मोह में असुविधाजनक सवाल नहीं पूछे जाते थे। आज सिर्फ असुविधाजनक सवाल ही पूछे जाते हैं और अकसर झूठी राष्ट्रभक्ति दिखाई जाती है। सनसनी की खोज केंद्रीय महत्व की वस्तु हो गई है और इसके लिए युद्ध का आधारहीन माहौल भी बनाया जा सकता है।































1962 और 2009 के बीच फर्क क्या है? तब हमारा मीडिया सोया हुआ था और आज वह कुछ ज्यादा ही जगा हुआ है। तब अखबारों में वही सब छपता था जो सरकार चाहती थी या मुहैया कराती थी। आज मीडिया हर जगह अपना एक एजेंडा तैयार कर लेता है। तब राष्ट्रभक्ति के मोह में असुविधाजनक सवाल नहीं पूछे जाते थे। आज सिर्फ असुविधाजनक सवाल ही पूछे जाते हैं और अकसर झूठी राष्ट्रभक्ति दिखाई जाती है। सनसनी की खोज केंद्रीय महत्व की वस्तु हो गई है और इसके लिए युद्ध का आधारहीन माहौल भी बनाया जा सकता है।


पिछले कुछ समय से मीडिया में चीन को ले कर खासा तनाव है। कई बार तो ऐसा वातावरण बनाने की कोशिश की गई कि अरुणाचल प्रदेश में चीन का आक्रमण अब हुआ कि तब हुआ। चीन अरुणाचल प्रदेश को अपने देश का हिस्सा मानता है और बताता है, यह कोई नई बात नहीं है। ऐसे ही कुछ बहानों से उसने भारत पर आक्रमण भी किया था। अरुणाचल प्रदेश में, जिसे तब नेफा कहते थे, वह दाखिल भी हो गया था। लेकिन आज यह यकीन कर पाना मुश्किल है कि वह अपने दावे को साबित करने के लिए सेना भेजने की सोच सकता है। अगर वह ऐसा करता है, तो उसे फायदा कम, नुकसान ज्यादा होगा। लेकिन यह चीन के राजनय का अनिवार्य हिस्सा है कि वह भारत को और दुनिया को अपने दावे की सतत याद दिलाता रहे। जब दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा का कार्यक्रम बना, तो स्वाभाविक था कि चीन की मुखरता कुछ और कर्कश हो जाती। यही हुआ और सनसनी की तलाश में हमारे मीडिया ने हुआँ हुआँ करना शुरू कर दिया।


यद्यपि भारत सरकार बार बार टीवी चैनलों को चेतावनी जारी करती रही है कि वे तिल का ताड़ बना कर जनता को गुमराह न करें, फिर भी मीडिया के नजरिए में कोई परिवर्तन नहीं आया है। कोई मामूली-सी घटना भी हो जाती है या चीन सरकार द्वारा रुटीन टाइप का बयान भी जारी होता है, तो कुछ चैनलों को जुकाम हो जाता है। अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर अरसे से हो रही घुसपैठों और सीमा पार चल रही सैनिक गतिविधियों को गरम से गरम बना कर पेश करनेवाले हमारे टीवी चैनल अपने इस अज्ञान का परिचय देते थक नहीं रहे कि सन बासठ के हमले का रहस्य क्या था। बासठ के समझे बिना दो हजार नौ को समझा नहीं जा सकता।


अब यह सूरज की रोशनी की तरह साफ हो चुका है कि बासठ में भारत की सीमाओं पर हमला करने के पीछे चीन का इरादा इस देश पर कब्जा करना नहीं था। सैनिक स्तर पर यह शायद असंभव न रहा हो, लेकिन व्यावहारिक यह किसी भी तरह से नहीं था। अगर सैनिक ताकत के बल पर कब्जा हो भी जाता, तो वह कितने दिनों तक टिक सकता था? जो देश सिर्फ पंद्रह साल पहले ब्रिटेन की गुलामी से मुक्त हुआ था, वह अपने पड़ोसी देश की अधीनता स्वीकार कर लेगा, यह बात किसी पागल के दिमाग में भी नहीं आ सकती थी। पर चीन पागल नहीं था, न है। उसकी कुछ नीतियों में शैतानी का तत्व जरूर रहा है और यह आज भी कायम है।
अब यह सूरज की रोशनी की तरह साफ हो चुका है कि बासठ में भारत की सीमाओं पर हमला करने के पीछे चीन का इरादा इस देश पर कब्जा करना नहीं था। सैनिक स्तर पर यह शायद असंभव न रहा हो, लेकिन व्यावहारिक यह किसी भी तरह से नहीं था। अगर सैनिक ताकत के बल पर कब्जा हो भी जाता, तो वह कितने दिनों तक टिक सकता था? जो देश सिर्फ पंद्रह साल पहले ब्रिटेन की गुलामी से मुक्त हुआ था, वह अपने पड़ोसी देश की अधीनता स्वीकार कर लेगा, यह बात किसी पागल के दिमाग में भी नहीं आ सकती थी। पर चीन पागल नहीं था, न है। उसकी कुछ नीतियों में शैतानी का तत्व जरूर रहा है और यह आज भी कायम है।


विभिन्न तथ्यों, विश्लेषणों और रहस्योद्घाटनों से छन कर जो बात सामने आती है, वह यह है कि बासठ की सैनिक कार्रवाई के पीछे चीन के दो इरादे थे – एक, भारत की सीमावर्ती जमीन का जितना बड़ा हिस्सा हड़पा जा सके, हड़प लिया जाए। चीन शुरू से ही विस्तारवाद की नीति का शिकार रहा है। पड़ोसियों की जमीन पर उसकी आँख बराबर लगी रहती है। यहाँ तक कि उसके सैनिक नदी के छोटे-छोटे द्वीपों तक पर कब्जा जमाने के लिए रूसी सैनिकों से टकराते रहते थे। बासठ में जब चीन का यह इरादा पूरा हो गया, तो उसने अपनी आगे बढ़ती हुई सेना को पीछे लौटने का आदेश दे दिया। युद्धों के इतिहास में यह एक विरल घटना थी कि एक शक्तिशाली और विजयी होता हुआ देश पराजित हो रहे देश की जमीन से अपने पाँव पीछे खींच ले।



दूसरी बात हाल ही में सामने आई है, जिसका श्रेय ‘माओ : द अननोन स्टोरी’ के लेखक द्वय जुंग चांग और जॉन हैलिडे को है। इस पुस्तक में विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर यह बताया गया है कि माओ त्से तुंग ने भारत पर इसलिए हमला करवाया कि वे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में जवाहरलाल नेहरू की बढ़ती हुई लोकप्रियता से चिढ़ने लगे थे। माओ का यह सपना भी पूरा हुआ, क्योंकि चीनी आक्रमण के बाद नेहरू की ख्याति और लोकप्रियता पर ग्रहण लग गया और सिर्फ दो वर्ष बाद उनका देहावसान भी हो गया। दरअसल, अतिशय महत्वाकांक्षी और सत्ता-कामी माओ का यह चेहरा भारतीय मीडिया और जनमत से छिपा रहा है, क्योंकि भारत के वामपंथ ने माओ के व्यक्तित्व को एक ‘क्रांतिकारी रहस्यवाद’ से ढक रखा है। इस बीच चीन ने अपने को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है, इसमें संदेह नहीं। दूसरी ओर, भारत सरकार और उसका चापलूस बुद्धिजावी वर्ग भारत को भी महाशक्ति के रूप में पेंट करता रहता है, पर चीन और भारत के बीच अभी भी कोई तुलना नहीं है – न सामरिक शक्ति के स्तर पर और न आर्थिक शक्ति के स्तर पर। हाँ, व्यापक गरीबी के मामले में जरूर दोनों एक-दूसरे के आसपास ही हैं। आर्थिक मंदी के परिणामस्वरूप इस समय चीन की राजधानी तथा अन्य शहरों से गरीबों को कुत्तों की तरह खदेड़ा जा रहा है। इसे ‘बैक टू विलेज’ अभियान बताया जा रहा है। उसके बावजूद, भारत में दरिद्रता का प्रकोप कहीं ज्यादा है। हो सकता है, चीन अगले बीस-पचीस सालों में गरीबी की समस्या सुलझा ले, पर भारत की आर्थिक प्रगति की दिशा और तैयारी को देखते हुए यह अवधि पचास वर्ष से आगे भी जा सकती है।



इसलिए वास्तविकता यह है कि चीन के साथ हमारी असली समस्या सैनिक द्वंद्व की नहीं, आर्थिक प्रतिद्वंद्विता की है। आर्थिक विकास के तमाम दावों के बावजूद भारत चीन से बहुत पीछे है। विकसित देशों के तमाम औद्योगिक निर्माताओं के लिए चीन विनिर्माण और निर्यात का मक्का बना हुआ है। स्वयं चीन की सरकार अपने उद्योग-धंधों को अधिक से अधिक उत्पादन और निर्यात करने के लिए भारी मात्रा में प्रोत्साहन दे रही है। इस समय चीन में बने सामान से भारत के बाजार पटे हुए हैं। बिजली, इलेक्ट्रानिक्स, खिलौने, कपड़े, जूते, घडियाँ आदि कई क्षेत्र हैं जिनमें चीन का सस्ता सामान हमारे उपभोक्ताओं को लुभा रहा है। भारत में उत्पादन की स्थिति ऐसी है कि बहुत-से निर्माता अपने यहाँ माल तैयार करने के बदले चीन में कारखाना लगाने या वहाँ के उत्पादों का आयात करने में फायदा देखते हैं। राखी, होली और दीपावली जैसे त्योहारों पर तो हमारे बाजारों में चीन ही चीन नजर आता है।


सीमा पर जो भी होगा, हमारे सैनिक संभाल लेंगे, यह विश्वास अतार्किक नहीं है। आखिरकार मामला छोटी-मोटी झड़पों तक ही सीमित रहेगा। लेकिन आर्थिक क्षेत्र में जो परिघटना दिखाई पड़ रही है, वह गुरिल्ला कार्रवाइयों की नहीं, खुले युद्ध की है। इस युद्ध में हम लगातार पराजित हो रहे हैं और सरकारी स्तर पर, उद्योग-धंधों की दुनिया में या मीडिया के जंगल में इसकी कोई चर्चा तक नहीं है। क्या युद्ध हमेशा सीमाओं पर ही लड़ा जाता है?




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चित्र : अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर का भाग भारत से पूरी तरह गायब  है।
राजकिशोर 

असंभव के लिए निमंत्रण

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असंभव के लिए निमंत्र
राजकिशोर  


7 दिन शेष हैं केवल : मौलिक काव्यलेखन के लिए चुने जा रहे ब्लॉग

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मौलिक काव्यलेखन के लिए चुने जा रहे ब्लॉग को वोट दें

वागर्थ भी यहाँ नामित है आप उचित समझें तो वागर्थ को भी वोट दे सकते हैं 
7  दिन शेष हैं केवल 




Vaagartha
in Hindi by Dr. Kavita Vachaknavee from United Kingdom
Post #1 | Post #2 | Post #3 | Post #4 | Post #5



इंडी ब्लोगर द्वारा आयोजित ब्लॉग-चयन की प्रक्रिया में इस बार का विषय है - "मौलिक काव्यलेखन"
नामित होने की प्रक्रिया के पश्चात कुल १८५ ब्लॉग इसके लिए नामित / स्वीकृत किए गए हैं| इनमें अंग्रेजी व कई भारतीय भाषाओं के ब्लॉग हैं| 


हिन्दी के भी कई ब्लॉग इसमें सम्मिलित हैं| 
वहाँ ब्लॉग रजिस्टर्ड होने के कारण हर बार उनका सन्देश आता था कि अमुक अमुक चयन के लिए अपने ब्लॉग की प्रविष्टियाँ दूँ. पर कभी इस ओर रूचि ही नहीं ली क्योंकि हर बार संख्याबल व प्रचार में पिछड़ने का अनुमान है मुझे| लोकप्रियता के सोपान पर बहुत पीछे रहने वाले ब्लोग्स हैं अपने तो, और फिर समय और ऊर्जा लगाने का मन ही नहीं बना कभी| औचित्य का प्रश्न और भी बड़ा था|


इस बार उनका सन्देश आया व पढ़ा तो पता चला कि इस बार काव्य के लिए नामित होने का आमंत्रण है| मुझे केवल अपनी कविताओं के कुछ लिंक उन्हें देने थे| तो सोचा, चलो इस बार लॉटरी खेली ही जाए| अपने ब्लॉग वागर्थ से कुछ लिंक्स भेज कर भूल गयी| कई दिन बाद उधर से उत्तर आया कि वागर्थ को नामित कर लिया गया है. 


इस प्रकार अब वागर्थ वहाँ है| 


आप यदि उचित समझें तो वागर्थ को यहाँ जाकर वोट कर सकते हैं| 
एक व्यक्ति अधिकतम ५ वोट दे सकता है|



Vaagartha
in Hindi by Dr. Kavita Vachaknavee from United Kingdom
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September 2009 | Original Poetry

185 nominations

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वियोगी बाबा रामदेव

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वियोगी बाबा रामदेव
- राजकिशोर

बाबाओं के प्रति मेंरे मन में शुरू से ही श्रद्धा रही है। सच तो यह है कि मैं बचपन में खुद भी बाबा बनना चाहता था। उन दिनों बाबा-सम्राट रजनीश की बहुत धूम थी। मैंने देखा कि हर्रे-फिटकरी लगे बिना भी रंग कितना चोखा आ सकता है। पार्ट-टाइम काम मुझे बहुत पसंद हैं। नौकरी की नौकरी, आजादी की आजादी। बाबावाद में इसकी पूरी गुंजायश दिखती थी। सुबह या शाम दो घंटे भाषण दो, बाकी समय मस्त रहो। अपनी एक कमी के कारण मैं इस धंधे में जाते-जाते बचा। कमी यह थी कि मैं बहुत कम उम्र में एक समाजवादी के असर में आ चुका था। रोज झूठ बोलने का पेशा अपनाने की हिम्मत नहीं हुई।
 
 
इसलिए जब भी टीवी के रंगीन परदे पर बाबा रामदेव को देखता हूँ, तो उनके प्रति सहज ही श्रद्धा उमड़ आती है। सबसे बड़ा कमाल यह है कि उन्होंने योग को देश भर में चर्चा का विषय बना दिया है। हर कोई जानता है कि भारत वियोग का नहीं, योग का देश रहा है। सीता-राम, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती ... अहा, कितनी सुंदर जोड़ियाँ हैं। पूजा बजरंगबली की भी होती है, पर अपने कारण नहीं, उस युगल-मूर्ति के कारण जिसकी सेवा में उन्होंने अपनी जवानी होम कर दी। पंत जी ने (आज की पीढ़ी के लिए : गोविंद वल्लभ पंत नहीं, सुमित्रानंदन पंत) ने कहा, वियोगी होगा पहला कवि....। यह कविता वियोग की नहीं, योग को महत्व देने की कविता है। जब दो जन मिलते हैं, तब अपने आप कविता पैदा हो जाती है। वियोग में वह सिर्फ लिखी जाती है।
 
 
योग का असीम महत्व जानते हुए भी पता नहीं क्यों बाबा रामदेव समलैंगिकों को वियोग की स्थिति में देखना चाहते हैं। पहले समाजवाद के और बाद में बाबा रामदेव के प्रभाव से मैं यह मानने लगा था कि मनुष्य-मनुष्य सब एक हैं। क्या स्त्री, क्या पुरुष। दोनों को ही भगवान ने बनाया है। इनमें भेद हो सकता है, विभेद नहीं। इसलिए पुरुष-स्त्री साथ रहें, जैसा कि वे रहते आए हैं, या पुरुष-पुरुष या स्त्री-स्त्री, इससे क्या फर्क पड़ता है। साथ ही रहते हैं, एक-दूसरे के साथ थुक्का-फजीहत तो नहीं करते। आपस में प्यार ही तो करते हैं, लड़ते-झगड़ते तो नहीं। फिर समलैंगिकों को आशीर्वाद देने के पहले बाबा उनके खिलाफ अदालत जाने की क्यों सोच रहे हैं, समझ में नहीं आता।

 
बाबा को क्या यह पता नहीं कि अदालत में सत्य का परीक्षण नहीं हो सकता? अदालत का सत्य जो भी हो, वह क्षणिक होता है। भारत की एक अदालत ने भगत सिंह को फाँसी पर चढ़वा दिया था। आज उस अदालत के जज दिखाई पड़ जाएँ, तो जनता उन्हें मार-मार कर भरता बना देगी। विदेश की दर्जनों अदालतों ने ‘लेडी चैटर्ली’ज लवर’ को अश्लील करार दिया था। लोग छिप-छिप कर इस किताब को पढ़ते थे। फिर वह अदालत आई जिसने कहा कि इस उपन्यास में कहीं भी अश्लीलता नहीं है। इसलिए मैं तो ईश्वर की अदालत को छोड़ कर और किसी अदालत में विश्वास नहीं करता। मैं समझता था कि बाबा रामदेव भी ईश्वरवादी हैं। इसलिए यह देख कर बड़ी हैरत हुई कि वे ईश्वर से ज्यादा वेतनभोगी जजों पर भरोसा करते हैं। क्या जजों में भी समलैंगिकता नहीं हो सकती ?

 
बाबा रामदेव का कहना है, समलैंगिक संबंध अप्राकृतिक है। बाबा अपनी जिम्मेदारी पर ऐसा कहते हैं तो होगा। पर इस दुनिया में सर्वज्ञ कौन है? अंतिम तौर पर यह जानने का दावा कौन कर सकता है कि क्या प्राकृतिक है और क्या सांस्कृतिक। विद्वान लोग बताते हैं कि जो सांस्कृतिक है, वह प्राकृतिक भी है। यदि मानव प्रकृति में सांस्कृतिक होने की स्वाभाविक चाह न होती, तो संस्कृति का इतना बड़ा ताना-बाना कैसे खड़ा होता? फिर मानव अपनी गलतियों से सीखता भी है। सौ साल पहले तक राजशाही प्राकृतिक लगती थी। आज लोकशाही ही प्राकृतिक लगती है। आज जो राजशाही का समर्थन करेगा, उसे पागल करार दिया जाएगा।


इसी तरह, हो सकता है, आज समलैंगिकता ऊटपटांग चीज लगती हो, पर कल यही स्वाभाविक लगने लगे। स्त्रियों के जोड़े एक तरफ, पुरुषों के जोड़े एक तरफ। अभी भी धार्मिक सत्संग में, क्लबों में, शादी-ब्याह के मौकों पर क्या स्त्री-पुरुष अलग-अलग नहीं बैठते? विषमलैंगिकता को आग और फूस के साथ की तरह खतरनाक माना जाता है। इससे बेहतर है कि आग आग के साथ रहे और फूस फूस के साथ। या आग में फूस के गुण पैदा हो जाएँ और फूस में आग के। फिर, कौन किसके साथ घर बसाता है, इससे पड़ोसियों को क्या मतलब? दूसरों के बेडरूम में झाँकना  शिष्टाचार के विरुद्ध है। सोच रहा हूँ, बाबा से जल्द ही मिलूँ और उनसे पूछूँ कि योग अच्छा है या वियोग। 
 
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पाकिस्तान विघटन के कगार पर

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पाकिस्तान विघटन के कगार पर

ब्रिगेडियर चितरंजन सावंत, वी एस एम

पाकिस्तान का निर्माण भारत की स्वतंत्रता से एक दिन पहले १४ ऑगस्ट १९४७ को हुआ था. कराची में समारोह हुआ था. लॉर्ड मांउट्बेटन, जो अविभाजित भारत के अंतिम वाइसरॉय थे, और मोहम्मद अली जिन्नाह, जो पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरल थे, साथ साथ समारोह में पहुँचे थे। वाइसरॉय की बग्घीयात्रा सुखद नहीं रही क्योंकि आसूचना विभाग ने पूर्व चेतावनी दी थी कि उन पर कोई अँग्रेज़ विरोधी बम से हमला करेगा. अंतिम वाइसरॉय ने स्वयं लिखा है की बग्घी में बैठे बैठे वे लगातार भीड़ में उस आदमी को खोजने में व्यस्त रहे, जिसका हाथ ऊपर उठे बम फेंकने के लिए और वे स्वयं बचाओ मुद्रा में आते हुए अपने सुरक्षा कर्मियों को सतर्क कर दें। ईश्वर की कृपा से ऐसा कुछ नहीं हुआ. जिन्नाह को सत्ता सौंपने के बाद वो फ़ौरन नयी दिल्ली वापस आ गये और तब जा कर उन्हे चैन मिला। पाकिस्तान के अस्तित्व में आते ही असुरक्षा की भावना इतनी प्रबल थी की स्वयं लॉर्ड माउंटबैटन भी उस से बच नहीं सके, आम आदमी की कौन कहे. हिंदू और मुसलमान के बीच ऐसी मारकाट मची हुई थी कि लोग कहने लगे प्रशासन, क़ानून और व्यवस्था में, इस से अच्छे तो अँग्रेज़ ही थे.


पाकिस्तान किसे मिला

पाकिस्तान निर्माण में उस समय के युनाइटेड प्रॉविन्सस के मुसलमान अग्रणी थे. हिंदू विरोधी भी वही सबसे अधिक थे. अखंड भारत जैसा शब्द वे सुनने को राज़ी नहीं थे, उस मुद्दे पर विचार-विमर्श का प्रश्न ही नहीं उठता था. हज़ारों की संख्या में वे अपना घर-बार त्याग कर, सपरिवार पाकिस्तान गये. कराची पहुचें तो वहाँ के मुसलमानों ने न स्वागत किया, न सत्कार. उन्हे मोहाजिर नाम दिया गया. कल्पना के स्वर्ग में वे बने शरणार्थी. किन्ही किन्ही की बहू-बेटियों को भी स्थानीय मुसलमान भगा ले गये. अंततः उन्हें अपना राजनैतिक दल बनाना पड़ा और कम से कम कराची की राजनीति में वर्चस्व बनाना पड़ा. भारत से आ कर पाकिस्तान में बसने वाले मुसलमानों को, मारे गये और पलायन किए हुए हिंदुओं की ज़मीन जायदाद मिल गयी लेकिन कराची और आस-पास ही में. अन्य स्थानों पर वहाँ के स्थानीय मुसलमानों ने क़ब्ज़ा जमाया और मोहाजिर को तो घास भी नहीं डाली.


सेना हो या हो राजनीति - सभी विभागों में पाकिस्तानी पंजाब के मुसलमानों की तूती बोलती रही. सेना में उनकी संख्या प्रबल होने से सेना प्रमुख पंजाबी ही बनता रहा. जब जब लोकतंत्र का तख्ता पलटा गया और सेना का शासन हुआ तो मार्शल लॉ प्रशासक पंजाबी मुसलमान ही बना. असैनिक प्रशासनिक सेवा में भी उसी प्रांत का बोलबाला था. बलूच, सिंधी और पठान अपने को अलग-थलग समझने लगे. पठानों में से काई लोग तो मार्शल लॉ प्रशासक आदि उँचे ओहदे पर आसीन हुए, जैसे फील्ड मार्शल अयूब ख़ान लेकिन बलूच बेचारे कहीं के नहीं रहे. सिंध से प्रधान मंत्री हुए जैसे भुट्टो परिवार से दो और अब राष्ट्रपति ज़ारदारी लेकिन आम आदमी अपने को उपेक्षित पाता रहा. पाकिस्तान से अलग हो कर स्वतंत्र होने की भावना बलूचिस्तान के लोगों में सबसे प्रबल रही है. पाकिस्तानी सेना ने वहीं क़हर ढाया और ऐसा नृशंस अत्याचार किया कि हलाकू को भी शर्म आ जाए. जनरल टिक्का ख़ान को तो लोगों ने "बुचर ऑफ बलूचिस्तान" की उपाधि दे डाली. पाकिस्तान के बिखरने में और टूटने में बलूचिस्तान की भूमिका प्रमुख रहेगी.



पाकिस्तान कब टूट कर बिखर जाएगा ? यह एक महत्वपूर्ण बात है और इस पर शीघ्रता में कोई भविष्यवाणी नहीं कर देनी चाहिए जो बाद में झूठी साबित हो. सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि संसार के अधिकतर पत्रकार यह मानते हैं कि  पाकिस्तान का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. अभी कोई चिकित्सक भी आस-पास नहीं है जो मर्ज़ जान कर सही दवा दे सके. पाकिस्तान का कोई शुभ चिंतक दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रहा है. अधिकतर लोग तो "नीम हकीम ख़तरये जान हैं" और वहाँ नीम मुल्ला ख़तरे इमान की भी कमी नहीं है. यदि परमात्मा कभी किसी सही मायने में पाकिस्तानी को जन्म देता है जो केवल दाढ़ी शरिया को ही इस्लाम का सही रूप ना समझ ले, तो हो सकता है कि पाकिस्तान विघटन के कगार से वापस लौट आए.


हम आने वाले कल की प्रतीक्षा करेंगे और आशा करेंगे कि नयी सुबह की नयी किरण नये जीवन का संचार करेगी. उम्मीद है कि पाकिस्तान के शासक और लोग अपने देश को आतंक मुक्त करने की कोशिश सही मायने मे करेंगे और आस पास के देशो में आतंकवाद का निर्यात करने में अब समय और ऊर्जा नष्ट नही करेंगे।




आत्मविश्वास और ऊपर उठाएँ

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   आत्मविश्वास और ऊपर उठाएँ 


ब्रिगेडियर चितरंजन सावंत
विशिष्ट सेवा मैडल





मेरे अनेक मित्र मुझ से अक्सर पूछते हैं कि मेरे चेहरे पर मुस्कान सदैव कैसे बनी रहती है. मैं उनका उत्तर केवल एक और मीठी मुस्कान से देता हूँ. वे और भी चकित हो जाते हैं. आँखों ही आँखों में पुनः प्रश्न करते हैं - प्रभु, कुछ तो बताएँ. आत्म श्लाघा का दोष लगने के डर से मैं कुछ कह नहीं पाता. मेरे मौन को जिज्ञासु मेरा कोरा अभिमान न समझें, इस कारण कुछ स्वर स्फुटित होते हैं.

लक्ष्य क्षमता से परे न हो


मुझे पाकिस्तान का भारत के विरोध में विष वमन बिलकुल पसंद नहीं है. मैं अक्सर सोचता हूँ कि उनकी ईंट का जवाब पत्थर से दूँ. उनके ऊपर चढाई कर दूँ. लक्ष्य अच्छा है किन्तु उसे पाना मेरी क्षमता के बाहर है. यदि मैं अकेले ही वाघा सीमा की ओरे चल दूँ तो पहले तो अपने देश की पुलिस ही मुझे एक सिरफिरा समझ कर पकड़ लेगी. यदि उनसे बचते -बचाते सीमा पार कर लूँ तो पाकिस्तानी पुलिस पकड़ लेगी. मेरा लक्ष्य एक तरफ धरा रह जाएगा और दूसरी तरफ उनकी गालियाँ सुनने और लात-घूँसा खाने को मिलेगा. पुलिस तो सीमा के आर पार एक सामान है - क्रूर, असभ्य तथा विवेक शून्य. इस लिए मैं अपने को ही दोष दूँगा कि मैंने ऐसा लक्ष्य क्यों चुना जो केवल बुद्धिहीन ही चुन सकते थे. नित्य दो बार संध्या करते समय - "धियो यो नः प्रचोदयात" कहने से क्या लाभ?
यह हवा की चक्की के ऊपर भाले से आक्रमण करना हुआ जो विवेकी मनुष्य नहीं करते. इस काम से मेरा मनोबल नीचे गिरा और हताशा ने आ घेरा.


हताशा और निराशा ऐसे दो राक्षस हैं जिनका हनन करने के लिए राम बाण की आवश्यकता पड़ती है. ये दोनों जुड़वाँ भाई हैं. साथ-साथ रहते हैं और यदि कभी अलग हुए तो आस-पास ही मंडराते रहते हैं. इन्हें भगाना लोहे के चने चबाने सामान है. यह एक अलग प्रश्न है जिस पर और कभी विस्तार से चर्चा होगी . अभी तो हमें केवल इतना सोचना चाहिए कि हम ऐसा उल्टा-सीधा लक्ष्य न चुन लें जो सर दर्द बन जाए .


अपने सामर्थ्य के अनुसार लक्ष्य चुन कर उसे पाने के लिए प्रयास करें. यदि ज्ञान पाने की बात है तो पुस्तकालय जा कर मौलिक पुस्तके पढ़ कर जानकारी लें. यदि शारीरिक काम है तो अपने शारीर को हृष्ट-पुष्ट बनायें जिससे निर्धारित काम को पूरा करने में सफलता अवश्य मिले. हमारा प्रयास यह होना चाहिए की हमें कभी असफलता मिले ही नहीं. यदि मिले, तो हम पुनः प्रयास करके असफलता को सफलता में बदल दें.


एक सफल व्यक्ति के लिए सतत रूप से प्रयास करते रहना अनिवार्य है. प्रश्न यह उठता है कि प्रयास के बावजूद हम कभी कभी असफल हो जाते हैं तो क्या अपने भाग्य को दोष दें? बिलकुल नहीं. "देव देव आलसी पुकारा " और एक विवेकी एवं सफल मानव कभी आलसी नहीं हो सकता है. असफलता का कारण प्रयास में कमी हो सकता है.

असफलता की समीक्षा करते समय यह देखना आवश्यक है कि न्यूनता कहाँ रह गयी. अगले प्रयास में उसे दूर
करके सफलता प्राप्त करें. महाराणा प्रताप कई बार युद्घ हार गए किन्तु निराश नहीं हुए. दानवीर भामाशाह द्वारा दिए गए धन से पुनः सेना संगठित की और मुग़ल किले पर धावा बोल दिया. सभी दुर्ग वापस जीत लिए, केवल चित्तौड़गढ़ नहीं ले सके.

परिवार समर्थन


जीवन में सफलता पाने के लिए हमें परिवार और मित्रों का समर्थन भी प्राप्त करना चाहिए. जीवन में कोई सम्बन्ध एकतरफा नहीं होता. यदि हम सगे-सम्बन्धियों के लिए कुछ करते रहे तो वे भी हमारे लिए कुछ अवश्य करेंगे. - पति-पत्नी के प्रेम सम्बन्ध प्रगाढ़ होने के बावजूद, सांसारिक आराम और सुख-सुविधा के लिए पति और पत्नी को एक दूसरे के लिए नित्य काम करना चाहिए. इस से प्रेम प्रगाढ़ होगा और पति-पत्नी के बीच "वो" कभी भी नहीं आ सकेगा. द्वार पर दस्तक भी नहीं दे सकेगा. इस से हम निश्चिंत हो कर अपना काम कर सकेंगे और सफलता के सहारे अपना मनोबल और अपना आत्मा-विश्वास आकाश की ऊँचाइयों तक पहुँचा सकेंगे . छोटी-मोटी सफलता भी आत्म विश्वास बढ़ने के मार्ग पर एक मील का पत्थर है. हर सफलता एक सोपान है जो हमें आत्मविश्वास को ऊँचाई तक ले जाने में सहायता करती है.


आत्म विश्वास ऊँचा उठाने में तन-मन-आत्मा; इन सभी का योगदान रहता है, स्वस्थ तन में स्वस्थ मन और स्वस्थ आत्मा तथा सशक्त सोच. जब आप अच्छी तरह सोच कर योजना बनाएँगे तो सफलता आप के हाथ चूमेंगी. मार्ग में बाधाएँ  आएँगी, उन्हें पार करते रहे. यदि कहीं गिर पड़ते हैं तो फिर से उठिए और अपने मार्ग पर चलते रहिये. छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुग़लों की ताक़त को तलवारों पर तोला था और हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना की थी, एक बार मुग़ल बादशाह के बंदी भी बने. निराश नहीं हुए. मुक्ति-मार्ग की खोज करते रहे. अंततः उन्हें और उनके पुत्र संभाजी को मुक्ति मिली. आगरा से वापस महाराष्ट्र लौट कर छत्रपति शिवाजी महाराज ने पुनः अपना राज्य मुग़ल सेनापति से वापस जीत लिया. यह छत्रपति के ऊँचे आत्म विश्वास के कारण ही संभव हो सका, स्वामी दयानंद सरस्वती ने जब पहली बार कुम्भ मेले में वेद प्रचार आरम्भ किया तो सुन ने वालों की संख्या नहीं के बराबर थी. वे निराश नहीं हुए. स्वाध्याय किया, प्रवचन शैली में सुधार लाये और सरल हिंदी में प्रचार कार्य किया . महती सफलता मिली. आर्य समाज की स्थापना मुंबई में १८७५ में हुयी. फिर उन्हें मुड़ कर नहीं देखना पड़ा.



अंत में यह याद रखिये की विषम परिस्थिति में ईश्वर को याद करें. जैसा पहले अन्य लेखों में मैंने कहा है, आप और हम सदैव प्रार्थना एवं पुरुषार्थ का संगम करें. दोनों हमारे साथ हैं तो हमारे यज्ञ में राक्षस नहीं आएँगे. यदि राक्षस आ भी गए तो हमारे यज्ञ का विध्वंस नहीं कर पाएँगे. प्रार्थना और पुरुषार्थ से मिली शक्ति हमारे शस्त्रागार का ब्रह्मास्त्र है जो न केवल राक्षस को अपितु राक्षसी प्रभाव को भस्म कर देगी. फिर हमारा आत्म विश्वास आकाश को छूने लगेगा. तमस को, अन्धकार को हम अपने आत्म विश्वास से भेद कर प्रकाश का संचार कर सकेंगे और कहेंगे - तमसो मा ज्योतिर्गमय  










शक्ति संग्रह के अभाव में प्रेम सिर्फ कविता है, सत्य मात्र सुभाषित है

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गरीब के पास जाओ वह राह दिखाएगा

राजकिशोर


गरीब का घर आधुनिक भारत की सबसे बड़ी पाठशाला है। वहाँ अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र से ले कर धर्म, दर्शन और समाजशास्त्र सब की शिक्षा मिल सकती है। अगर चंद्रमा का वास्तविक रहस्य उसकी सतह की चट्टानों में नहीं, उसके बड़े-बड़े गह्वरों में छिपा हुआ है, तो गरीब के घर में ही भारत की वर्तमान दशा-दिशा को समझने की कुंजी का वास है। गरीब से हम क्या सीखते हैं, यह उस गरीब पर नहीं, उस गैर-गरीब पर निर्भर है जो उसके पास जाता है। गरीब इसलिए भी गरीब है क्योंकि उसके पास अपना और अपनी स्थिति का विश्लेषण करने की क्षमता नहीं है। उससे ज्यादा पढ़ा-लिखा, उससे ज्यादा समझदार उसके पास जाता है तो उसके पास ऐसे औजार होते हैं जिनसे वह गरीबी के सत्व को आत्मसात कर सकता है। याद रखना जरूरी है कि जब महात्मा गाँधी निलहे किसानों की समस्याओं का अध्ययन करने के लिए चंपारण गए, तब जा कर उन्हें भारतीय स्थिति का मर्म समझ में आया। यहीं उन्हें वे तीन स्त्रियाँ मिलीं जो उनकी जाँच टीम के सामने गवाही देने के लिए एक साथ नहीं आ सकती थीं क्योंकि उनके घर में एक ही साबुत साड़ी थी जिसे पहन कर बाहर निकला जा सकता था। उस परिवार की इस स्थिति को देखा, जाना और समझा उन अनेक व्यक्तियों ने भी जो गाँधी जी की जाँच टीम में शामिल थे, पर भविष्य में कम से कम कपड़े पहनने का निर्णय अकेले गाँधी ने किया। कहने की जरूरत नहीं कि बाकी सभी महानुभावों की नजर निलहे किसानों पर जुल्म की समस्या तक सीमित थी, जब कि गाँधी इसके साथ-साथ या कहिए इसके आईने में और भी बहुत कुछ देखने के लिए उत्सुक और आत्म-प्रशिक्षित थे। हर चीज हर चीज से जुड़ी हुई होती है – कहीं मित्र भाव से और कहीं शत्रु भाव से, यह हम न देखना चाहें, तो कोई क्या कर सकता है?



महात्मा गाँधी के उदाहरण से यह सबक मिलता है, अगर सबक लेने में हमारी कोई दिलचस्पी रह गई है, कि गरीब के पास जाओ, तो किस तरह जाओ। तुम जैसा जाओगे, वैसा ही वहाँ पाओगे। अगर नेतागीरी करने जा रहे हो, तो गरीब के घर जा कर नेतागीरी करोगे तथा बाहर से फूल कर, कुप्पा हो कर लेकिन भीतर से कुछ और दीन-हीन हो कर वहाँ से लौटोगे। ऐसी यात्राओं को अगर दलित पर्यटन का नाम दिया जा रहा है, तो क्या गलत है! पर्यटक आनंद प्राप्त करने के लिए ही कहीं जाता है। वह अगर गम वाली, तकलीफ वाली जगह पर जाता है, तो डॉक्टर की तरह, स्वयंसेवक की तरह नहीं जाता है। वह बाद में दूसरों को यह बताने के लिए जाता है कि उसने दुख और अभाव की कैसी दर्दनाक बस्तियाँ देखी हैं। तो नेतागीरी करने के लिए गरीब के घर जाओगे, तो वहाँ कुछ देख कर नहीं, बल्कि अपना कुछ दिखा कर वहाँ से लौटोगे। इससे न तुम्हारा भला होगा, न गरीब का। वह बेचारा शुरू में अपने घर में बड़े आदमियों का स्वागत करने के अवसर से भले ही थोड़ा गौरव-दीप्त हो ले, पर धीरे-धीरे यह सब उसके लिए एक और बोझ बनता जाएगा। एक ही नौटंकी रोज देखी जाए, तो एक समय के बाद हँसी नहीं आती, गुस्सा आता है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को गरीबनिवाजी के लिए जिस तरह निर्देश जारी किए जा रहे हैं और इसे आत्म-शिक्षण का नहीं, लोक शिक्षण का कार्यक्रम बनाने का यत्न किया जा रहा है, उसके बाद राहुल गाँधी को भी अपनी ऐसी व्यक्तिगत यात्राओं के बारे में पुनर्विचार करना पड़ सकता है।



गरीब के पास जाने का एकमात्र तरीका वही हो सकता है जो किसी और के पास जाने का है : प्यार से जाओ। तुम सेंसस के कर्मचारी नहीं हो। तुम चकबंदी अधिकारी नहीं हो। न ही मलेरिया इंस्पेक्टर हो। तुम्हें वहाँ जा कर कुछ सूचनाएँ नहीं जुटानी हैं न कुछ सूचनाओं का प्रसारण करना है। सीमित प्रयोजन वाली यात्राएँ सीमित परिणाम ही दे सकती हैं। गरीब के पास जाओ, तो इसलिए जाओ कि उसके प्रति तुम्हारे मन में प्रेम है। प्रेम ही उसकी झोपड़ी में और उसके माहौल में तुम्हारी आँखें खोले रखेगा और तुम्हें वह सब कुछ देखने को बाध्य करेगा जिसके कारण तुम्हारे और उसके बीच तरह-तरह की दूरी बनी हुई है। प्रेमिल हृदय के बिना तुम्हारे लौट आने के बाद यह दूरी कम नहीं होगी। बल्कि बढ़ती रहेगी, क्योंकि वर्तमान व्यवस्था सफल और विफल के बीच अलंघ्य दूरियाँ पैदा करने के सिद्धांत पर ही टिकी हुई है। तुम्हारे भीतर अगर पहले से ही गरीब के प्रति प्रेम से भरा हुआ नहीं है, तुम सिर्फ उत्सुकतावश वहाँ जाते हो, तब भी अगर तुम्हारा दिल खुला हुआ है और तुम्हारा दिमाग साफ है, तो ज्यादा संभव है कि तुम्हें गरीब से प्रेम हो जाए। उसकी अभावग्रस्तता देख कर, उसकी वैचारिक असंगतियों पर गौर कर यह भावना तुम्हारे भीतर उमड़ने-घुमड़ने लगेगी कि तुम्हारे प्रेम का सच्चा पात्र अगर कोई है, तो यही है, यही है, यही है।



तब तुम गरीब से धड़ाधड़ सीखने भी लगोगे। उसका घर देख कर तुम्हारे मन में यह विचार आएगा कि निवास की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें सबको अपने लिए थोड़ी खुली जगह मिले। तब तुम्हें बड़े-बड़े फ्लैटों और कोठियों पर गुस्सा आने लगेगा। तुम्हें लगेगा कि रहने की जमीन और घर बनाने के साधनों का मौजूदा बँटवारा दुष्टता और पाप से भरा हुआ है। जब तुम उसके घर में पड़े अनाज की किस्मों और मात्रा पर नजर डालोगे, तो तुम्हें दिल्ली, मुंबई और दूसरे शहरों में खाद्य और पेय पदार्थों की गुणवत्ता, विविधता और उपलब्धता पर ग्लानि होने लगेगी। जब तुम देखोगे कि गरीब के घर में नहाने-धोने और पीने के पानी का इंतजाम कैसा है, बिजली है या नहीं और है तो कितनी है, बच्चे पढ़ने के लिए जाते हैं कि नहीं और जाते हैं तो क्या पढ़ कर लौटते हैं, स्त्रियों की स्थिति कैसी है, उनकी सहनशीलता को किस असंभव लंबाई तक खींच कर ताना हुआ है, तब तुम गहरे सोच में पड़ जाओगे। तुम्हारा दिमाग चकरघिन्नी खाने लगेगा कि हे भगवान, नागरिकों का एक छोटा-सा वर्ग किस संवैधानिक, धार्मिक, नैतिक या लोकतांत्रिक अधिकार से नागरिकों की इतनी विशाल आबादी को दबोच कर, एक अंधे कुएँ में औंधे लटका कर रखे हुए है। तब तुम्हारा हृदय विद्रोह कर उठेगा और तुम अपने ही वर्ग के विरोधी बन जाओगे। लुटेरों के साथ रहते हुए, घूमते-फिरते हुए, उनका हँसी-मजाक सुनते हुए तुम्हारा रोआँ-रोआँ जलने लगेगा।



गरीबी सिर्फ भौतिक ही नहीं होती। वह वैचारिक भी होती है। जब तुम गरीब के घर में रहोगे, उस घर में रहनेवालों और आने-जानेवालों से बातचीत करोगे, उनकी भावनाओं को अपने हृदय में स्थान दोगे, उनकी तर्क प्रणाली पर विचार करोगे, तब भी तुम्हारा दिल किसी जलते हुए मकान की तरह प्रज्वलित हो उठेगा। तुम्हारे अंधेरे दिमाग में ये चिनगारियाँ दीपावली के आसमान की तरह भेदने लगेंगी कि दुनिया में ज्ञान-विज्ञान का इतना विस्फोट हो चुका है, मनुष्य और उसकी स्थिति के बारे में इतना कुछ जाना-समझा जा चुका है, ईश्वर और धर्म की हकीकतें सामने आ चुकी हैं, विषमता के अधिकांश स्रोत हथेली पर रखे हुए आँवले की तरह एकदम स्पष्ट हैं, दुख और सुख को स्रोत बहुत ज्यादा गोपनीय नहीं रह गए हैं, आजादी और गुलामी के रेशे करीब-करीब पहचान लिए गए हैं, मानव अधिकारों के नक्शे में रेखाएँ और रंग एक पर एक भरते ही जा रहे हैं, तब भी, हाँ, तब भी मानवता के इतने बड़े हिस्से का वैचारिक अस्तित्व इतना धूसर क्यों है? सूचना का अधिकार दे दिया गया है, पर ज्ञान पर अभी भी मुट्ठी भर लोगों का कब्जा है। लड़ते तो हाथ-पैर ही हैं, पर लड़ने की प्रेरणा और ताकत दिमाग से मिलती है। जब तुम गरीबी के इन पहलुओं से साक्षात्कार करोगे, तब बाहर ही नहीं, भीतर भी बहुत कुछ बदलने के लिए आकुल हो उठोगे। जो ज्ञान समाज में फैल नहीं सका या फैलाया नहीं जा सका, वह अंतत: शोषण के औजार के रूप में ही अस्तित्व में बना रह सकते है। जब तुम सच्चे दिल से यह अनुभव करोगे, तब, अपने जीवन में शायद पहली बार, यह अनुभव कर सकोगे कि गरीब का घर एक बहुत बड़ी पाठशाला है। जब तुम अमीर के घर जाते हो, तो सिर्फ जानकारी बढ़ा कर लौटते हो। हो सकता है, तुम्हारे भीतर द्वेष भी पैदा हो। जब तुम गरीब के घर जाते हो, तो तुम्हारे व्यक्तित्व के दबे हुए, मुरझाए फूल खिल उठते है। यथार्थ के उन पहलुओं से तुम्हारी नजदीकी कायम होती है जिनके अभाव में तुमने अपने आपको कुएँ का मेढ़क या एक्वेरियम की मछली बना रखा था।



लेकिन कुछ भी होने के लिए प्रेम अकेला काफी नहीं है। वह प्रेरणा दे सकता है, शक्ति पैदा नहीं कर सकता। शक्ति के लिए तो लोगों के पास जाना होगा। एकाकी की शक्ति पूजा देह बल या शस्त्र बल पैदा करता है। ये पाशविक शक्ति की अभिव्यक्तियाँ या उसका विस्तार हैं। सच्ची शक्ति का जन्म तो लोगों के साथ मिलने से होता है। जब लोगों का जुड़ाव होता है, तब हिंसा अनावश्यक या अर्थहीन हो जाती है। सत्य में सामर्थ्य आ जाती है। इस सामर्थ्य के हिस्सेदार के रूप में ही व्यक्ति भी तेजस्वी और बलशाली हो उठता है। जो जनता से जुड़े बिना, उसके साथ सघन रिश्ता बनाए बगैर अनशन पर बैठ जाते हैं या सत्याग्रह करने लगते हैं, उन्हें समय से पहले ही नींबू-पानी पी कर उठ जाना पड़ता है। शक्ति संग्रह के अभाव में प्रेम सिर्फ कविता है, सत्य मात्र सुभाषित है।



इसलिए जब तुम गरीब के घर जाते हो, तो वहाँ सिर्फ प्रेम का जागरण नहीं होता, शक्ति का भी संधान होता है। तुम देख पाते हो कि शक्ति का सच्चा स्रोत कहाँ है। तब तुम खुद को भी शक्तिशाली महसूस करते हो। तुम्हारा असहायपन दूर होने लगता है। गरीब से दूर रह कर तुम अपने ही सत्य के सामने निरुपाय अनुभव करते हो, अपने ही प्रेम के सामने नपुंसक बन जाते हो। गरीब के साथ एकाकार होना प्रेम की शक्ति को पहचानना है, उस शक्ति का संचार करना है। तब पाठशाला एक अद्वितीय शस्त्रागार भी बन जाती है। इस शस्त्रागार की सबसे बड़ी महिमा यह है कि इसमें किसी के प्रति घृणा या द्वेष के लिए कोई जगह नहीं होती। प्रेम ही परिवर्तन का औजार बन जाता है। यह रास्ता कहीं और दिखाई नहीं देगा। बाकी रास्ते किसी न किसी बिंदु पर जा कर रुक जाते हैं। यह रास्ता सीधा, प्रशस्त और अंतहीन है।

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