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केदार सम्मान (२००८) समारोह और "ललमुनिया की दुनिया"

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केदार सम्मान (२००८) समारोह और "ललमुनिया की दुनिया"









प्रगतिशील हिन्दी कविता के शीर्षस्थ कवि केदारनाथ अग्रवाल की स्मृति में दिया जानेवाला " केदार सम्मान" ( २००८ ) २२-२३ अगस्त २००९ को इलाहाबाद में संपन्न भव्य कार्यक्रम में समकालीन हिन्दी कविता के चर्चित कवि दिनेशकुमार शुक्ल को उनके कविता संकलन "ललमुनिया की दुनिया" के लिए, प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह के हाथों प्रदान किया गया।



"केदार व्याख्यानमाला " में सम्बोधित करते हुए प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने केदार जी के व्यक्तित्व पर बोलते हुए कहा कि केदार नैसर्गिक सौन्दर्य के विश्वजनीय कवि हैं। "जवान होकर गुलाब / गा रहा है फाग " जैसी संश्लिष्ट बिम्ब की कविता हिन्दी, अंग्रेज़ी में कहीं नहीं । एन्द्रिकता केदार की कविता का बड़ा गुण है। कविता की दुनिया में केदार ने एक नई नैतिकता की नींव रखी। केदार, मनुष्य और प्रकृति जहाँ संयुक्त रूप से मिलते हैं, वहाँ के कवि हैं। नदी ,पहाड़ आदि के बहाने, अपनी धरती के बहाने, केदार दबी हुई जनता की बात बोलते हैं। अपने व्याख्यान में डॉ.नामवर सिंह ने केदार की अनेक कविताओं का उल्लेख किया। इस व्याख्यानमाला के सत्र का संचालन महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय विस्तारकेन्द्र (इलाहाबाद) के निदेशक सन्तोष भदौरिया ने क्षेत्रीय परिसर के सत्यप्रकाश मिश्र सभागार में किया। इस अवसर पर वि. वि. के कुलपति विभूति नारायण राय विशेष रूप से उपस्थित रहे। उपस्थितों में मार्कण्डेय सिंह, दिनेशकुमार शुक्ल, प्रो. फ़ातमी, अजीत पुष्कल, अनुपम आनन्द, रामजी राय, प्रणय कृष्ण, नरेन्द्र पुण्डरीक,श्रीप्रकाश मिश्र, जयप्रकाश धूमकेतु, प्रकाश त्रिपाठी, नीलम राय, सूर्यनारायण सिंह, मुश्ताक अली, विनोद कुमार शुक्ल, महेन्द्रपाल जैन, हरिश्चन्द्र पाण्डेय, विभूति मिश्र, चन्द्रपाल कश्यप, लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी आदि के नाम उल्लेनीय हैं।


कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में समकालीन हिन्दी कविता का विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण सम्मान "केदार सम्मान-२००८" समकालीन हिन्दी कविता के चर्चित कवि दिनेश कुमार शुक्ल को उनके कविता संग्रह "ललमुनिया की दुनिया " के लिए प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह एवम् कुलपति बी.एन.राय के हाथों प्रदान किया गया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत सुधीर कुमार सिंह द्वारा किया गया। दिनेशकुमार शुक्ल की कविताओं पर बोलते हुए प्रणय कृष्ण ने कहा कि दिनेश कुमार शुक्ल की कविताएँ इस भूमंडलीय समय पर एक बहुत बड़ा हस्तक्षेप करती हैं। इनका यह हस्तक्षेप भाव और सम्वेदना के स्तर पर सीमित न रह कर विचार के स्तर पर पहुँच कर पाठक को झकझोरता है। इस अवसर पर सम्मानित कवि दिनेश कुमार ने अपने वक्तव्य में बाँदा में कवि केदारनाथ अग्रवाल के अपने सान्निध्य के दिनों का स्मरण किया, बाँदा की धरती को याद किया, नदी, पहाड़, खेती और किसानों को याद किया।


इस अवसर पर रामजीराय ने अपने वक्तव्य में कहा कि दिनेश कुमार शुक्ल बड़े कवि हैं, इनकी कविताएँ बाज़ारवाद से उत्पन्न त्रासदियों के विरुद्ध हर कहीं खड़ी दिखाई देती हैं। विषय के वैविध्य के साथ शिल्प के स्तर पर भी इनकी कविताएँ चमत्कृत करती हैं।


अवसर पर अपने वक्तव्य में डॉ. नामवर सिंह ने कहा कि दिनेश कुमार शुक्ल वास्तव में समकालीन हिन्दी कविता के बड़े कवि हैं। बाज़ारवाद के महासमुद्र में फँसी डूबती दुनिया के लिए गहन अंधेरे में प्रकाश स्तम्भ की तरह हैं। दिनेश कुमार शुक्ल की कविताएँ केदार जी की परम्परा की कविताएँ हैं। वाकई वह इस सम्मान के सही अधिकारी ठहरते हैं।


कार्यक्रम के अन्त में दिनेशकुमार शुक्ल ने अपनी कविताओं का बहुत प्रभावी पाठ किया, जिसे सुनकर श्रोताओं को निराला और शिवमंगल सिंह सुमन के प्रभावी अद्भुत काव्यपाठों की स्मृति हो आई।


"केदार सम्मान" - सत्र का संचालन ‘बहुवचन’ के सहसम्पादक प्रकाश त्रिपाठी ने और धन्यवाद ज्ञापन विशेष कर्तव्य अधिकारी राकेश ने किया।

- नरेन्द्र पुण्डरीक
सचिव,
केदार शोध पीठ न्यास, बाँदा




यह खुला पत्र सिद्धार्थ के लिए

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इक खुला पत्र : सिद्धार्थ के नाम



प्रिय सिद्धार्थ!

तुमने आसपास के परिवेश व परिस्थितियों की सामान्य घटनाओं में से विचारणीय बिन्दु तलाश कर उन्हें विमर्श हेतु लाने का प्रयास जो प्रारम्भ किया है, वह श्लाघनीय है. जनमानस के भीतर बसी मध्ययुगीन परम्पराओं को लोग आदिकाल से चली आई, सनातन, वैदिक, धार्मिक और जाने क्या क्या माने ढोए चले जाते/जा रहे हैं। धर्मभीरु जनता का ९९.९५ प्रतिशत यह भी यह भी नहीं जानता कि धर्म होता क्या है, उसका स्वरूप क्या है। न वह यह जानता है कि धर्म का पूजा पद्धति से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे मे रेगिस्तान में उगे अरण्डी के पौधे ही सबसे बड़े पेड़ होने का दावा मनवाते रहते हैं। जिन्हें एक भी बात भूले -भटके कोई सीधी-सच्ची कह दे तो उसकी तो मानो शामत ही हो गई। हाथ जोड़कर, क्षमापूर्वक सत्य कहने वाले तक को भी लोग बहुधा तो शत्रु बनकर लतियाते हैं, या फिर कुछेक सच बोलने का सहूर सिखाते हैं।



उधर अधजल गगरी लिए छलक-छलक पड़ने वाले अपनी दुकान को दूना-चौगुना करने की वितण्डा इस सारे आत्मानुशासनविरत समाज पर फैलाते रहे हैं, कभी धर्म के ठेकेदार और पहरुए बनकर या कभी स्त्री-पुरुष/ ये जाति-वो जाति/ यह भाषा-वह भाषा/ यह क्षेत्र-वह क्षेत्र/ आदि आदि के द्वन्द्व को एजेण्डा बनाकर लोकप्रियता, गु्रुडम (नेतागिरी) की रोटियाँ सेंकते हैं। इसमें महाभारत काल (लगभग ५००० वर्ष) से प्रमाद व पतन के मारे भारत के जन को ह्रासमान ही होते चले जाने से तब कौन रोक सकता है? इसमें स्त्रियाँ, आबाल-वृद्ध सब दारुण दशा में हैं। धन बल, देहबल, सत्ताबल आदि जिसके पास हैं, सब अधिकार भी उसी के ,सब निर्णय भी। वैसे, यहाँ परिवर्तन वस्तुत: चाहता ही कौन है? कोई नहीं। परिवर्तन होते हैं विचार व कर्म की क्रान्ति से। और क्रान्ति का अर्थ है अपने को आमूलचूल बदलना (न कि बाह्य युद्ध)। जब कोई स्त्री-पुरुष अपने को आत्मानुशासी के रूप में ढालने को, परिवर्तित करने को तैयार ही नहीं तो समाज को बदलने की कल्पना उन ठेकेदारों की जेब में अन्तिम साँसे ले कर दम तोड़गी ही।



बात लम्बी हो गई। तुम्हारी सद्भावना इन अर्थों में भी नेक है कि स्वयं को झंडाबदार बताए बिना स्त्री को (उसके सामान्य मानवी होने के अधिकार तक को छद्म व प्रपंच से घेरे आई धूर्त मानसिकता से बचाने की इच्छा के चलते) मानवीय दृष्टि से देखने का उपक्रम किया।



अजब संयोग यह है कि कल ही मैंने अपनी फ़ेसबुक प्रोफ़ाईल पर स्टेटस मैसेज के रूप में एक ऐसा ही सन्देश लिखा (जिस पर वहाँ कुछ मित्रों ने अपनी राय भी दी)। जो मैंने कल वहाँ लिखा, उसका अविकल पाठ यह है -

"ध्यातव्य है कि भारतीय भाषासमाज में सबके सब आशीर्वाद, दिए भले स्त्री को जाएँ, किन्तु लगते/होते पुरुष के लिए हैं और सबकी सब गालियाँ, दी भले जा रही हों पुरुष को, किन्तु लगती/होतीं सब स्त्री के लिए हैं। यह है हमारी सोशियो-साइकॉलॉजी, हमारे समाज का असली चरित्र और इस समाज में स्त्री होने व पुरुष होने का अन्तर।"


Hari Joshi
Hari Joshi
कविता जी, ये ऐसा सच है जिसे सब जानते हैं। सनातन है। ...शायद कभी इसमें परिवर्तन आए। स्त्री और पुरुष जिंदगी के रथ के दो पहिए हैं जिनमें से एक भी निकल जाए तो जीवनरथ चल नहीं सकता लेकिन फिर भी हर नियम/परंपरा स्त्री पर ही हमला करता है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष।



Nutan Gairola
Nutan Gairola
Aadi kaal se, samaaj kee sanrachna isee tarah se hoti aayi hai, Purush Pradhaan , sakti.. Sab purush dimaag se chala hai. . Bhojan , sringaar, shiksha , vicharo ke aur kaun sa chetr nahi jaha mahila purus aik jaise rahe ho. Sabi jagah. . .nari ko devi roop de kar us se opekhsha kee gai jyada. . . Kavita jee kee baat se mai sehmat hoon. . .Haan aaj ... Read Moreka purus vaise in sab baato ko samajh raha hai, par vo in sadiyo se chali aa rahi vyavastha ko aik jhatke mai tod nahi tor sakta hai. . Hame intjaar karna hoga. .


Pratibimba Barthwal
Pratibimba Barthwal
आज सुबह ही रिया जी ने "मेरे अपने"मे यही च्रचा शुरु की है। ,इस पर थोडा सुबह लिखा था, अभी इतना कहना चाहूंगा कि "घर" को बनाने मे महिला का योगदान उसकी प्रक्रति मे शामिल है. पुरुष और महिलाओ की प्रकृति भी जिम्मेदार है॥आप इसे पुरुष प्रधान कहे लेकिन ये भी सच है कि आज इसमे परिवर्तन आया है दोनो ही इसे समझ रहे है-कुछ महिलाओ ने इसे खुद ही अंजाम दिया या फिर पुरुष वर्ग ने इसमे सह्योग दिया......


Pratibimba Barthwal



Ashok Kumar
Ashok Kumar
Yah sach hai ki stree aur purush ke beech jo bhinnta hai usse samajh ne hamesha hee alag tareeke se paribhasit kiya aur ussiee wajah se kabhee stree ko toh kabhee purush ko jyada mahatva mila.Agar hum yah maan le ki samaj ko dono ki utanee hee jaroorat hai jitani ek bhasha ko shabdo ki jaroorat hotee hai toh shayed yah samasya hee samapt ho jaye.....



Parul Yadav
Parul Yadav
mam bilkul sahi kaha, aaj b desh k sabse badi post per mahilaye hai fir b aaj k samaj me aurto ki condition me change nahi hua hai. aaj tak sansad me 50% ka bill tak pass nahi ho paya hai, uske bad k kamo ka bill pass ho gaya bt ye nahi........ humko khud jagna hoga.




डोर दाँतों से छूट रही हो तो आप उसे ओंठों से....

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डोर दाँतों से छूट रही हो तो आप उसे ओंठों से....


कल
प्रमोद कौंसवाल जी ने एक चर्चा आहूत की| यह चर्चा जीवन संबन्धी मनुष्य के व्यावहारिक दृष्टिकोण और उत्तरोत्तर समयानुसार बदलते जाते परिवेश परिस्थिति की अनुकूलता प्रतिकूलता के साथ मनुष्य के तादात्म्य साधने के कौशल और जिजीविषा के समन्वय जैसे प्रश्न उठाती हैइस पर कई मित्रों ने अलग अलग राय दीयहाँ यथावत प्रस्तुत है, उस परिचर्चा में प्रस्तुत मित्रों के विचार | आप की राय भी महत्वपूर्ण है, अत: निवेदन है कि अपनी राय दे कर चर्चा को अधिक जीवंत व कारगर बनाएँ।
सादर
- ( कविता वाचक्नवी )



Pramod Kaunswal

माज और व्यवस्था में तमाम जटिलताएं हैं, फिर भी क्या आप मेरी तरह से यह मानते हैं कि जीवन की डोर दांतों से छूट रही हो तो आप उसे आंठों से थाम सकते हैं । ...नए साथी राय देंगे, वरिष्ठ साथी सीख...................................................... ......................................................
(पोस्ट का नेचर मज़ा-मज़ाकनहीं...सादर)


Pramod Kaunswal
Pramod Kaunswal
यह बात मैंने अपने एक साथी और उनके साथियों से सवाल के तौर पर पूछी..लेकिन कुछ साथी इसे मज़े के लिए लिखा मान बैठे तो यहां लिख रहा हूं।...सादर।



Dr.Kavita Vachaknavee
Dr.Kavita Vachaknavee
मेरे विचार से यह सही ही है। पर अपनाने में दुर्गम भी। व्यक्ति (स्वयं हम) स्वभाव कहाँ छोड़ पाते हैं? जिन्दगी- भर जिन्होंने पंजे पैने किए हों वे तो दाँतों के साथ उनका भी इस्तेमाल करने की ताक में रहते हैं।अपनी ताकत के रहते कोई विरला ही उसका उपयोग (?) नहीं करता।
Dr.Kavita Vachaknavee
Dr.Kavita Vachaknavee
हाँ, जीवन के साँसों की डोर छूटने तक तो स्वत: ही ऐसे हथियार और ऐसी ताकतें आदमी का साथ छोड़ चुकती हैं,तब दान्तों की बजाय होंठों से थामने की विवशता के चलते तो अपनाना ही होगा। काश इस पकड़ ढीली होने की नौबत आने से पहले हम ये सीख पाएँ और जिन्दगी को दान्तों की जगह होंठों से थामना सीख लें तो जिन्दगी लम्बी,सुहानी और जाने कितनी बेहतर हो जाए।आमीन!!



Rakesh Agarwal
Rakesh Agarwal
Aap hamein Hindi mein yahan type karna sikhayen toh hum rai aur seekh donon hi denge!



Saurabh Sengupta
Saurabh Sengupta
मैं आप कि ही बात रखता हूँ — "जीवन की डोर दांतों से छूट रही हो तो..." — इसका अर्थ श्वास-विक्रय से जुड़ा है ... जो अब अपनी समाप्ति कि और है| इसका अर्थ वृधावस्ता से भी है| आपका कहना ... उसे "आंठों" से थाम सकते है... समझ नहीं आया "आंठों" ??? "होठों" या "हाथों" तो नहीं है ... ?



Saurabh Sengupta
Saurabh Sengupta
होठों से ... मुकेशजी का एक बड़ा प्यारा गीत याद आया —
"होठों से छूलो तुम ... मेरा गीत अमर कर दो|"



Pratibimba Barthwal
Pratibimba Barthwal
जीवन की डोर दांतो से तात्पर्य कि हम हमेशा कुछ ना कुछ ना कुछ हालातो को जबरदस्ती थामे हुये है और ये अक्सर हर वयक्ति के साथ होता है अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिये हर क्षेत्र मे...होंठो से थामना यानि सहजता पूर्वक जिन्दगी के मायनो को समेटना...और ये कार्य आज की परिस्थित्यो मे जटिल है...( आपने किस संदर्भ मे लिखा है ये जानना भी जरुरी है)... शुभकामना।



Ashok Kumar
Ashok Kumar
Daton tak pahuchane ka rasta hothon se hoker hee jata hai.Jahan tak jeevan ki dor daton se thamane ki bat hai toh itna yaad rakhna chahiye ki jindagi apne aap mei ek paheli hai aur jeevan mei jo kuchh bhee hota hai uss per AAPKA PURA niyantran ho, yah katai mumkin nahee.Atah Jeevan ki dor daton se dabane ki jagah usse waisa hee rahne de jaisa wo swabhavik rup mei hai........
Bighn Vinashak ka naam lijiye.....aur naye josh ke saath jindagi ko apnee raftaar se chalne dijiye.....




Sayeed Ayub
Sayeed Ayub
यह "आंठों" क्या है साहब?




Pramod Kaunswal
Pramod Kaunswal
कृपया॥आंठों... को ओंठों या होंठों- जैसा आप कहते हों पढें ...(सैयद भाई खूब मिला आज कानमरोड़ी का..धन्यवाद सादर)..क्लीयर ..? अब कुछ लिखें भी, तो अच्छा लगेगा..।

Pramod Kaunswal
Pramod Kaunswal
धन्यवाद कविता जी...आपने अपनी बात में ... होंठों का इस्तेमाल किया...साथियों के को समझना चाहिए था कि टाइपिंग की गलती को हम नजरअंदाज कर दें...। यह बड़प्पन और साथियों ने दिखाया धन्यवाद...




Gurnam Singh Shergill
Gurnam Singh Shergill
jeewan kaa lakshya nirantar cheishtha karte janaa hona chahye-dori chhot=ti hai chhotney do-hontoN ko try karne दो



Sayeed Ayub
Sayeed Ayub
आप मुझे सईद लिख सकते हैं, सैयद की जगह। यह कानमरोड़ी नहीं था, मैं सच में नहीं समझ पाया कि यह कौन सा शब्द है। जीवन की डोर अगर छूट रही है तो उसे दाँतो या ओंठों से पकड़ने का प्रश्न नहीं रह जाता है, प्रश्न होता है बस उसको किसी तरह पकड़ने का लेिकन उससे भी अहम प्रश्न यह है कि जीवन की डोर हाथों के बजाय दाँतों में कैसे आ गयी और वहाँ से भी छूट क्यों रही है?




Pramod Kaunswal
Pramod Kaunswal
जी सईदभाई....लोग जब मैं एक चार पेजी अखबारी संस्करण का संपादक था कौंसवाल तो क्या कन्सवाल लिखते थे-एक साहब ने भौंसवाल तक लिख डाला था (लेकिन मैं समझ गया था कि यह उन्होंने किसी के मुंह से सुना ही होगा..)...मूल बात पर आएं ओर अपने विचार रखे...
भूल के लिए माफी॥

Pramod Kaunswal
Pramod Kaunswal
हरिजोशी जी के पेज से...मजदूर का क्या रविवार और क्या सोमवार प्रमोदजी। आपने किसी लंगड़े आदमी को कलकत्ता में रिक्शा चलाते देखा है।चक्रधर ने एक बार देखा था और जब रिक्शा वाला चक्रधर के पास पंहुचा तो उससे पूछा कि भाई रिक्शा कैसे चलाते हो॥रिक्शे वाला बोला; बाबूजी रिक्शा पैर से नहीं पेट से चलता है।..प्रमोद जी शायद मैं आपके मर्म के आसपास ही हूं...:



Pramod Kaunswal
Pramod Kaunswal
हरिजी को मैंने लिखा- कुछ इस तरह भी समझें कि॥अस्तित्व का संकट है तो पैर या कंधे से क्या.. पेट से भी चलाता है...आपके आशावाद को सलाम। अशोक जी ने यह रचना तब लिखी थी जब मैं जामिया में पढ़ता था...। ..उस रचना ने अशोक चक्रधर को मानवीय सरोकारों वाला बड़ा कवि बनाया था..बाद में भी उनकी रचनाएं काफी गहरी -..कोई उनको कवि मंचीय या हंसोड़ कवि कहे इस पर किसी कवि के मूल रचनाकर्म पर क्या फर्क पड़ता है..। धन्यवाद



Surendra Verma
Surendra Verma
Pramod ji ,really I cudnt get u, sorry..iws in a light mood !



Pramod Kaunswal
Pramod Kaunswal
-राकेश जी जल्द ही..बल्कि तुरंत..
- सरेंद्र भाई...आप क्यों शर्मिदा कर रहे हैं सर...हरिभाई के पेज पर बात आई गई हो गई...। मैं आपका बड़ा सम्मान करता हूं और यह बात- भले कहने वाली नहीं- लेकिन मैंने फिर भी वहां इस आदरभाव का साफ लिखा है... हर बार जरूरी नहीं सब एक जैसी मनस्थिति में हों॥सादर



Surendra Verma
Surendra Verma
........जिजीविषा अंतिम साँसों तक संघर्ष करती है प्रमोद जी ...इसलिए मेरा तो यही मानना है कि दांतों से छूट रही जीवन की डोर होठों से पकडी जा सकती है॥



Hari Joshi
Hari Joshi
कवि के शब्दों को तौलने से पहले उसके भाव को ग्रहण करना ही बेहतर होता है। कभी-कभी शब्द जाल बन जाते हैं। कभी शब्दों पर तर्क की दीवार मन-मस्तिष्क पर काला पर्दा भी चढ़ा देती है।
Hari Joshi
Hari Joshi
कुछ मित्रों ने कहा कि डोर तो हाथ में होनी चाहिए वह दांतों में कैसे पंहुच गई। हो सकता है कि मौत देने वाले ने हाथ बांध रखे हों या कुछ भी....दांतों में पंहुचने का अर्थ ही है कि विपरीत/कठिन परिस्थितियों में...ऐसे में जब बात और आगे बढ़ जाए तो फिर ओंठ भी कटार बन सकते हैं। यही जिजीविषा है। यही संघर्ष है। यही हौंसला भी और यही जंग जीतने की कशिश।



Pramod Kaunswal
Pramod Kaunswal
हरिभाई- धन्यवाद।और इसलिए भी कि खासकर आपके पेज पर मेरी नजर थी तो जीवन के हरे घास के मैदान को मुश्किल बनाता यह एक तरह का मुहावरा मुझे सूझा था॥ या याद आया- मेरे पिताजी ने,जब छोटा था तो कहा था- कि बेटे इसे कभी भूलना नहीं..आज लगता है हम उम्र में बड़े हो गए लेकिन कुछ बातें पसोपेश में डाले रखती हैं..दोस्तों के साथ साझी कर लेनी चाहिए..आपकी पैनी निगाह पड़ जाए तो क्या कहने



Dr.Kavita Vachaknavee
Dr.Kavita Vachaknavee
मित्र लोग जीवन की डोर छूटना का अर्थ मात्र मृत्यु से ही जोड़ कर देखते प्रतीत होते हैं। जीवन स्वयं में आयु / जीवित रहने के अवधि मात्र ही नहीं है।वह मनुष्य के अस्तित्व और उपस्थिति के संयोग से बना उसका एक स्पेस भी है। जिसमें/ पर उसकी निजता और अन्यता तथा अन्यों की निजता व अन्यता में सन्तुलन का द्वन्द्व सदैव विद्यमान रहता है।

Dr.Kavita Vachaknavee
Dr.Kavita Vachaknavee
मेरे विचार से इन व ऐसे अनेक अर्थों में जीवन की डोर दाँतों से छूटना और होंठों से थामना एक ऐसी स्थिति का वाचक भी है (अधिक व्यंजनात्मक अर्थ में) कि जहाँ/जब मनुष्य को जीवन/जगत् या अन्यों के स्पेस पर से अपना नियन्त्रण और पकड़ कम होती

Dr.Kavita Vachaknavee
Dr.Kavita Vachaknavee
प्रतीत हो, अपनी किसी व्यवहारजन्य (विशेषत: वर्चस्वकामी व्यवहार के चलते) तब संबन्धों/दूसरों के स्पेस के अतिक्रमण व वर्चस्ववादी रवैये के बदले उसे व्यवहार की मृदुलता (होंठों से जीवन डोर थामना) का व्यवहार करना चाहिए।

Dr.Kavita Vachaknavee
Dr.Kavita Vachaknavee
सीधे शब्दों में कहें तो जब हमारी क्रूरता/ कुटिलता/ चालाकी या दूसरों से/के अधिकार या कुछ भी छीनने आदि की असीमित वाँछा.अधिकारभाव आदि के चलते सम्बन्ध छीजते प्रतीत हों

Dr.Kavita Vachaknavee
Dr.Kavita Vachaknavee
या अपनी नकार दीखे तो उसका एक ही उपाय है कि जीवन में समरसता, व्यवहार, कोमलता व सम्बन्धों में इसी प्रकार के अधिक मृदु उपादानों को अपना कर जीवन को जीने योग्य बनाएँ। दाँत व ओंठ के प्रतीक का मेरे तईं यही अधिक व्यंजनात्मक व विस्तृत अर्थ है।





वह झुकें ना झुकें तुम सर झुकाते चलो.....

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प्रभाष जोशी के लेख " अपने आप से पूछिए" पर एक प्रतिक्रिया

- कमल




शायद भारतीयों को एकता नाम से ही चिढ़ है | भोगोलिक, जातीय , भाषाई और कबीलाई बंटवारों के आन्दोलन हर प्रदेश में मुखर हैं, पर नेता प्रकट में एकता की दुहाई दे रहे हैं | हर प्रदेश सरकार स्वायत्तता चाहती है | इसमें संदेह है की भारत नाम की कोई चीज़ बचेगी भी ? चीन, अमरीका, पाकिस्तान तो पृथकतावादियों की मदद भर कर रहे हैं | अकेले चीन का क्या दोष अगर देश की मीडिया ही देश का हिस्सा नक्शों में देश के बाहर दिखाना शुरू कर दे |






प्रभाष जोशी जी का आलेख पढ़ा |

भारत के कई टुकड़े करने के नेक काम में चीन ही क्या स्वयं भारत सरकार और सभी अन्य राजनीतिक पार्टियाँ जुटी हैं | किसी भी देश के समाज को अगर टुकडों में बाँट दिया जाय तो राष्ट्र के टुकड़े होने में क्या देर लगती है ? समाज के टुकड़े करने वालों के हीरो पू० प्रधान मंत्री वी० पी० सिंह तो चले गए | खुद रोगी बने पर समाज को ऐसा रोग लगा गए जो खाज में कोढ़ कि तरह फैलता जा रहा है | भारत वास्तव में कई टुकडों में बाँट चुका है | महाराष्ट्र मराठो का, बंगाल बंगालियों का, तमिलनाडु तमिलों का और कश्मीर मुसलमानों का आदि आदि | असम, मणिपुर, मिजोरम आदि इसी प्रकार राष्ट्र से कटे हुए हैं | बंगलादेशी मुसलमानों को असम में बसा कर अगर बांग्लादेश के माध्यम से चीन भारत को ब्रह्मपुत्र के पश्चिमी तट तक फेंकने का षड़यंत्र कर रहा है तो भारत सरकार को क्या आपत्ति है | भारत-चीन भाई भाई, हिन्दू-मुस्लिम भाई भाई | देश बाँटना काँग्रेस कि पुरानी परंपरा है | देश का शेष भाग जातीय प्रांतीय टुकडों में बँटा है | सरकार क्या कोई भी राजनैतिक दल इन टुकडों को बटोर कर एक राष्ट्र बनाने में समर्थ नहीं| सब अपने स्वार्थ के लिए टुकड़े करो और राज करो ( Divide and rule ) की नीति पर चल रहे हैं | जो प्रक्रिया जिन्ना और काँग्रेस ने भारत का बँटवारा करके आरम्भ की थी, वह जारी है |



अपनी एकता खोने के बाद हम अब ऐसे अंतर्राष्ट्रीय भँवर में पड़ चुके हैं जहाँ पड़ोसियों के कुचक्रों से छुटकारा संभव नहीं रहा | अगर सरदार पटेल की चली होती तो आज कश्मीर समस्या न होती | यह समस्या तो तत्कालीन प्रधान-मंत्री की देन है | आगे के प्रधान-मंत्री चाहे भा० ज० पा० के हों चाहे कांग्रेस के किसी न किसी रूप में बँटवारे की राजनीति का ही पालन कर रहे हैं | भला हुआ जो भाजपा के हाथ सत्ता नहीं गई। दोनों ही जिन्ना के पदचिन्हों पर चल कर सहर्ष देश बाँट देते | अब काँग्रेस वही काम अप्रत्यक्ष रूप से कर रही है फर्क इतना ही की उसने इसका नाम बदल कर जिन्नावाद की जगह अल्पसंख्यकवाद कर दिया है |
अगर सरदार पटेल की चली होती तो आज कश्मीर समस्या न होती | यह समस्या तो तत्कालीन प्रधान-मंत्री की देन है | आगे के प्रधान-मंत्री चाहे भा० ज० पा० के हों चाहे कांग्रेस के किसी न किसी रूप में बँटवारे की राजनीति का ही पालन कर रहे हैं | भला हुआ जो भाजपा के हाथ सत्ता नहीं गई। दोनों ही जिन्ना के पदचिन्हों पर चल कर सहर्ष देश बाँट देते | अब काँग्रेस वही काम अप्रत्यक्ष रूप से कर रही है फर्क इतना ही की उसने इसका नाम बदल कर जिन्नावाद की जगह अल्पसंख्यकवाद कर दिया है |



शायद भारतीयों को एकता नाम से ही चिढ़ है | भोगोलिक, जातीय , भाषाई और कबीलाई बंटवारों के आन्दोलन हर प्रदेश में मुखर हैं, पर नेता प्रकट में एकता की दुहाई दे रहे हैं | हर प्रदेश सरकार स्वायत्तता चाहती है | इसमें संदेह है कि भारत नाम की कोई चीज़ बचेगी भी ? चीन, अमरीका, पाकिस्तान तो पृथकतावादियों की मददभर कर रहे हैं | अकेले चीन का क्या दोष अगर देश की मीडिया ही देश का हिस्सा नक्शों में देश के बाहर दिखाना शुरू कर दे |



अगर नेहरु जी कश्मीर विभाजन रेखा पर संयुक्त राष्ट्र में अपनी मुहर लगा आये है तो मनमोहन सिंह ने बिलोचिस्तान की समस्या में भारत को लपेटने का वादा कर दिया तो क्या बुरा किया ? अमरीका और पाकिस्तान के अनुसार अगर हम कश्मीर उन्हें सौंप दें तो विश्व में तालिबान और अलकायदा आतंकवाद की समस्या ही हल हो जाय | साथ ही अगर अपने यहाँ अमरीकी सैनिक अड्डे भी बनवा दें तो चीन के खतरे की समस्या भी हल हो जाय | |विश्व-शांति के ऐसे समाधान में कांग्रेस माहिर है | आखिर पाकिस्तान कश्मीर ही तो मांग रहा है, पंजाब या तमिलनाडु तो नहीं ?



अब अमरीका के होनहार राष्ट्रपति बिचारे ओबामा की समझ में पाकिस्तान और तालिबान/अलकायदा की नूरां कुश्ती समझ में नहीं आरही है तो भारत को क्या पड़ी है कि दोनों से मोर्चा ले | बातचीत के नाटक से काम चल जायगा | डींगें तो हम बड़ी बड़ी मार लेंगे पर लड़ने को सीमा पर फौजें भेज कर फिर वापस लौटा लाना और कुछ जीता है तो वापस कर देना हमें बखूबी आता है | सरकार के अनुसार अपनी भलाई इसी में है कि अकड़ते रहो फिर मोम कि तरह पिघल कर हर छूट देते रहो और माँगें मानते रहो, देश के टुकडें हों तो हुआ करें | आपकी सत्ता को ललकारने की स्थिति में कोई दल नहीं तो हर तरह का समझौता कर लेने की आपको पूरी छूट है |


"वह झुकें ना झुकें तुम सर झुकाते चलो दिल मिले ना मिले हाथ तो मिलते चलो "



अपने आपसे पूछिए : कुछ दिन बाद ही सही (How dare China...)

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एक दिन बाद ही सही
प्रभाष जोशी



पंद्रह अगस्त के दिन मैं अपने से पूछता रहा कि अपना देश और अपनी आज़ादी क्या इतनी भुरभुरी और रेतीली है कि चीन जैसा पडोसी देश चाहे तो हमें तीस-पैंतीस टुकड़ों में तोड़ के रख दे? हम क्या सचमुच मिट्टी के माधो हैं कि जो चाहे हमें बनाए-बिगाड़े और हम उसके हाथों में लोंदे बने पड़े रहें? बहुत चाहकर भी अपने को ऐसा दयनीय मैंने तो नहीं पाया। फिर क्यों मान लेते हैं कि हमारी एकता-अखंडता में कोई दम नहीं है। हम यों ही सवा सौ करोड़ लोग एक भौगोलिक परिस्थितियों में साथ रह रहे हैं। भूमि,संस्कृति,इतिहास और परंपराएँ हमें बाँधती नहीं। जैसे हम निरीह पशुओं के समूह हों और जिसके पास ताक़त हो हमें हंकाल कर ले जाए। अपने बाड़े में बाँधे या चरने को छुट्टा छोड़ दे। इधर-उधर हुए भी तो हम फिर एक रेवड़ में आ खड़े होंगे।



हम राष्ट्र नहीं हैं और हमारे पास ऐसा कुछ नहीं है जो हमें एक बनाकर रखे, ऐसा कभी अँग्रेज़ माना करते थे। अपने मानने को सही साबित करने के लिए हमारे अंदर के भेदों को वे तिल का ताड़ बनाकर दिखाते थे। इससे कुछ तो उनका संतोष होता था और कुछ यूरोपीय दंभ का कि उनके सवाय सभ्यता और संगठित-व्यवस्थित मानव समाज संभव नहीं है। यूरोप के इन देशों ने दूसरों को सभ्य करने के नाम पर एशिया, अफ्रीका और लेटिन अमेरिका में अपने साम्राज्य कायम किए और उन्हें लूटकर विकसित और समृद्ध देश बने। फिर भारत में एक नंगा फकीर खड़ा हुआ और निहत्थे ही उसने बलशाली साम्राज्यों को यूरोप में सिमटने को मजबूर कर दिया। वे फिर भी मानते रहे कि कब तक भारत आज़ाद और एक रहेगा। बिखरेगा और हमें फिर बुलाया जाएगा। और हम फिर उसके लोगों का उद्धार करेंगे।


बासठ साल हो गए उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई। अब चीन की इच्छा जगी है कि वह पुराने साम्राज्यवादियों की जगह ले। भारत को खंड-खंड करने में सहायक हो और इतिहास को क्रम पूरा करते देखे। चीन बेचारा साम्यवादी देश है। यूरोप के पूँजीवादी-साम्राज्यवादी देशों की तरह विस्तारवादी नहीं है। लेकिन ऐतिहासिक प्रक्रिया के अनवरत् और अटूट चलते रहने के मार्क्सवादी सिद्धांत को मानता है। हमेशा ही इतिहास का निमित्त बनने के लिए तैयार रहता है। अब उसे लग रहा है कि भारत तीस से पैंतीस टुकड़ों में बिखरने को बेताब है। हिमालय के पार से उसे धक्का भर देना है। इतिहास अपना काम करेगा। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, बर्मा, श्रीलंका आदि से भी छोटा हो जाएगा। तब फिर पूरे एशिया और फिर संसार में इतिहास चीन की इच्छा पूरी करेगा। जो इतिहास की इच्छा पूरी करता है उस देश की मनोकामना पूरी करने का जिम्मा खुद इतिहास लेता है। महाकाल अपने सेवक को कभी निराश नहीं करता।


चीन ने सन बासठ में जब भारत से लगी अपनी सीमाओं को ठीक करने की शांतिपूर्ण कार्रवाई की थी तो अपने यहाँ ऐसे सच्चे कम्युनिस्ट हुआ करते थे जिनके लिए अंतरराष्ट्रीय साम्यवाद भारत नामक राष्ट्र से ज़्यादा ज़रूरी और महत्वपूर्ण था। वे मानने को तैयार थे कि आक्रामक तो भारत है जिसने चीन की पवित्र लाल पुण्यभू पर नाजायज़ कब्ज़ा कर लिया है। साम्राज्यवादी अँग्रेज़ों ने जो सीमाएं मनमाने ढंग से खींच रखी थीं उन्हें आज़ाद होते ही भारत को खुद ठीक कर देना चाहिए था। नहीं की तो चीन ने उन्हें सुधारकर भारत पर उपकार ही किया है। वे सच्चे कम्युनिस्ट सोवियत संघ के विघटन और चीन के नवउदार पूँजीवादी कम्युनिस्ट तानाशाही के साथ इतिहास की शरण में चले गए हैं। इसलिए वेबसाइट पर प्रकट हूई चीन की मनोकामना का स्वागत करने वाला भारत में कोई नहीं है। माओवादी अब भी भारत के आदिवासी इलाकों में सशस्त्र क्रांति करने में लगे हुए हैं, पर उन्हें विश्वास नहीं है कि चीन में माओ को मानने वाला कोई बचा है या नहीं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का राज पश्चिम बंगाल में अब भी चल रहा है और वे अब भी चीन को अपना चेयरमैन नहीं तो सहोदर तो मानते ही हैं. लेकिन अकेली ममता बनर्जी ने उनकी नाक में दम कर रखा है इसलिए विदेशी मामलों पर ध्यान देने की उन्हें फुरसत नहीं है। चीन की मनोकामना इसलिए बिना समर्थन के भारत के दरवाज़े पर भय की तरह लटकी हुई है।


लेकिन अब दूसरे किस्म के भयवादी भारत में सक्रिय हैं। इन लोगों को तालिबान भारत के माथे पर चढ़े हुए दिख रहे हैं। श्रीलंका की क्रिकेट टीम पर लाहौर में हमला हुआ तो ये लोग बताने लगे कि अमृतसर से लाहौर कितनी दूर है। तालिबान जब लाहौर पहुँच गए तो वाघा सीमा पार करने में उन्हें कितना वक्त लगेगा? जैसे जिस तरह पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजंसी आईएसआई तालिबान और अलकायदा की मददगार है वैसे ही भारत की सेना और उसके लोग तालिबान का स्वागत करने को उठ खड़े होंगे। तब भारत को कौन बचाएगा? अमेरिका बचाएगा और कौन? उसी ने इराक की जनता को सद्दाम हुसैन से बचाया और अफगानिस्तान को तालिबान से। वही पाकिस्तान को तालिबान और अल कायदा से बचा रहा है। भारत को भी सबसे बड़ा ख़तरा पाकिस्तान और उसके बनाए आतंकवादी संगठनों से नहीं, तालिबान से है। वही पाकिस्तान को एक राष्ट्र के नाते नष्ट करने पर तुले हुए हैं। पाकिस्तान के बाद वे भारत को पाकिस्तान का साथ देकर तालिबान को ख़त्म करने में अमेरिका के साथ होना चाहिए।


यानी हमारे देखते-देखते और हमारे अणुशक्ति संपन्न देश होते हुए भी तालिबान हमारा सबसे बड़ा शत्रु हो गया। वह हमारे माथे पर पाकिस्तानी पंजाब और सिंध में आकर बैठ गया है। उसे रोकने में हम अगर पाकिस्तान की मदद नहीं करेंगे तो वह हमें भी लील जाएगा। जैसे हम अफगानिस्तान और पाकिस्तान से भी गए गुज़रे हों। किसने हमें समझा दिया कि हम पाकिस्तान से निपट नहीं सकते? पाकिस्तान ने? वह हमें क्या समझाएगा? हम उसे तीन बार समझा चुके हैं। फिर किसने हमें समझा दिया कि तालिबान हम पर पाकिस्तान से भी बड़ा ख़तरा है? अमेरिका ने? वही कमज़ोर देशों का रक्षक है और आतंकवाद से उसने विश्वयुद्ध छेड़ रखा है। तालिबान अल कायदा के बाद सबसे बड़ा और आतंकवादी संगठन है। भारत पर लगातार हमले करने वाले आतंकवादी संगठन पाकिस्तान के किए में नहीं हैं। वे तालिबान और अल कायदा के कहे भारत पर हमले करते हैं। पाकिस्तान तो खुद इन आतंकवादियों का शिकार है। भारत से भी बड़ा शिकार। इसलिए भारत को आतंकवादी हमलों के लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार मानने के बजाय तालिबान और अल कायदा को मानना चाहिए। जिस तरह पाकिस्तान इन आतंकवादियों से निपटने में अमेरिका की मदद कर रहा है, वैसे ही भारत को भी करनी चाहिए। आतंकवादी हमलों से उसे छुटकारा अमेरिका ही दिलवाएगा।


जैसे सन बासठ में सच्चे भारतीय कम्युनिस्ट चीन के साथ थे वैसे ही आतंकवाद के सच्चे शत्रु भारतीय अमेरिका के साथ हैं। दूसरे महायुद्ध में फासीवाद के विरुद्ध असली लड़ाई स्तालिन का रूस लड़ रहा था इसलिए भारतीय कम्युनिस्ट-भारत छोड़ो-आंदोलन के खिलाफ़ अँग्रेंज़ो की मदद कर रहे थे। तब फासीवाद से यूरोप की लड़ाई उनके लिए भारतीयों की अँग्रेज़ों से लड़ाई से ज़्यादा बड़ी और महत्वपूर्ण थी। आज अपने देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो आतंकवाद से अमेरिका के विश्वयुद्ध को भारत की पाकिस्तान प्रेरित आतंकवादी लड़ाई से ज़्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं। चूँकि अमेरिका को पाकिस्तान का पूरा सहयोग चाहिए, ये लोग भारत को कहते हैं कि पाकिस्तान से फालतू का झगड़ा छोड़ो और दोनों मिलकर अमेरिका की मदद करो। अमेरिका की नज़र में और हित में तालिबान से लड़ाई सबसे महत्वपूर्ण है इसलिए वह चाहता है कि भारत पाकिस्तान आपस में लड़ने के बजाय एक होकर अमेरिका के साथ तालिबान से लड़ें। इसलिए भारत ने भले ही घोषणा कर रखी हो कि जब तक पाकिस्तान मुंबई पर हमला करने और करवाने वालों को सज़ा नहीं देता, हम उससे बात नहीं करेंगे। अमेरिका भारत से कहता है कि मुंबई के हमलावरों को हम सज़ा दिलवाएंगे, आप पाकिस्तान से बात करो।


भारत ने न सिर्फ पाकिस्तान से बात करना शुरू किया, अमेरिका के पाकिस्तान को मनाने की कोशिशों में मददगार होना भी मान लिया है। शर्म-अल-शेख़ में बलूचिस्तान पर बात करने को भी भारत राज़ी हो गया, क्योंकि पाकिस्तान कह रहा था कि मुंबई के हमलों में हमारा हाथ होना आपने मनवाया है तो बलूचिस्तान में भारत का हाथ मनवाइए ताकि हम अपनी जनता को कह सकें कि वहाँ भारत उपद्रव करवा रहा है। भारत बलूचिस्तान में उपद्रव करवा रहा है कि नहीं इसे भारतवासी नहीं जानते। लेकिन अमेरिका के दबाव में उसने बलूचिस्तान का जिक्र करना मान लिया। तीन दिन संसद में हंगामा होता रहा. मनमोहन सिंह बार-बार बयान देते रहे। लेकिन वे देश के गले नहीं उतार सके कि शर्म-अल-शेख़ में उनने बलूचिस्तान का ज़िक्र साझा बयान में क्यों आ जाने दिया। भारत का अगर बलूचिस्तान में कोई हाथ नहीं है तो वहाँ के उपद्रव पर पाकिस्तान से हम बात क्यों करेंगे? सरकार की एक भी बात देश के गले नहीं उतरी। सब मानते हैं कि बलूचिस्तान का पत्थर अमेरिका ने नाहक भारत के गले में लटकवा दिया है क्योंकि वह भारत से बराबरी के पाकिस्तानी आग्रह को मानता है।


बलूचिस्तान का ज़िक्र तो खुद मनमोहन सिंह ने होने दिया,जो आपके-मेरे सामूहिक सौभाग्य से भारत के प्रधानमंत्री हैं। मनमोहन सिंह अमेरिकी हितों और रवैये की अनदेखी नहीं कर सकते। अमेरिका से अणु सहयोग संधि करते हुए उनने अमेरिका का स्ट्रेटजिक पार्टनर भारत को बना दिया है। अमेरिकी अफ-पाक रणनीति में पाकिस्तान अमेरिका के लिए भारत से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। अमेरिका उसे तालिबान के विरूद्ध लड़ाए रखना चाहता है और पाकिस्तान इसकी कीमत भारत से बराबरी करने में वसूल कर रहा है। बलूचिस्तान का जिक्र इसी का परिणाम है। अमेरिकी हित के लिए मनमोहन सिंह भारत के हित की अनदेखी नहीं कर सकते हैं। कम्युनिस्टों ने रूस के लिए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अंतिम लड़ाई से दगा किया और सन बासठ में चीनी हमले को भारत के हमले का जवाब मान लिया। कम्युनिस्टों को हम भारतीय इनके लिए माफ नहीं करते। अमेरिकी हितों के लिए भारत के स्वायत्त हितों को कुरबान करने वालों को आप कैसे माफ कर सकते हैं।


चीन को क्यों लगता है कि वह कोशिश करे तो भारत के तीस से पैंतीस टुकड़े किए जा सकते हैं? क्या इसलिए कि उस मालूम है कि भारत में अंतरराष्ट्रीय हितों के लिए भारतीय हितों को कुरबान करने वाले उदार चरित लोगों की कमी नहीं है। आज के दिन अपने आपसे पूछिए।

(देशकाल )




एक भले आदमी का......

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एक भले आदमी का राज्यपाल न बन पाना

प्रभाष जोशी



धीरे धीरे वे दिल्ली के राजनीतिक, बौध्दिक और पत्रकारीय इलाकों में एक ट्रैजिक फिगर हो गये। मनमोहन सिंह के नव उदार राज के खुले खेल फर्रूखाबादी में राजनीति ऐसी बदली कि उद्योग व्यापार का ही बोलबाला हो गया। प्रमोद महाजन और अमर सिंह जैसे दलालों के हाथ में सत्ता की चाभी आ गयी।



बाजार और उद्योग की किसी लाबी के साथ आप नहीं हैं तो राजनीति में टिके रहना भी मुश्किल हो गया है। पैसा इतना हावी हो गया है कि लोक राजनीति की बात करनेवाले या तो शोहदे माने गये या फिर लोगों को पटाने वाले ठग। जाति, संप्रदाय और उद्योग व्यापार को तरकीब और करामात से साधनेवाली राजनेताओं की नयी पौध पनपी। उनके बीच देवेन्द्र द्विवेदी न तो राजनीति के थे और न वकालत के।



उनने हेमंत शर्मा से कहलवाया था कि जब वे 24 जुलाई को गांधीनगर में गुजरात के राज्यपाल की शपथ लेंगे तो मुझे वहां रहना है। मैं धर्म संकट में था। शताब्दी की ओर बढ़ती माताराम की तबीयत जब भी जब भी नाजुक होती है वे भाई बहनों से पूछती हैं कि दादो आने वालो थो, आयो को नी? मैंने घरवालों को बार बार आश्वस्त किया था कि जो भी मैं बाईस को वहां रहूंगा। पहुंच भी गया। पहले ही मालूम कर लिया था कि आजकल इंदौर से अहमदाबाद सीधी फ्लाईट जाती है। तय भी कर लिया था कि जब संदेश आयेगा तो 23 को सीधे गांधीनगर पहुंच जाऊंगा।



संदेश आया और सुनकर विचलित हो गया। राम बहादुर राय ने बताया कि अभी वे किसी से बात कर रहे थे तो उनने सुना कि देवेन्द्र जी के बेटे बहुत चिंतित अस्पताल की तरफ जा रहे थे। देवेन्द्र द्विवेदी को गंभीर हालत में गंगाराम अस्पताल में भर्ती कराया गया है। दिल्ली घर से मालूम किया तो पता चला कि हेमंत के कई फोन आये थे लेकिन आप तक कहां कोई फोन पहुंचता है।



इंदौर से काफी कोशिश करने के बाद ठीक ठीक पता नहीं चल पाया कि उन्हें हुआ क्या है। रायपुर होता हुआ दिल्ली आया तो पहली खबर ही यह मिली कि देवेन्द्र जी की हालत बहुत खराब है। वे अभी पंद्रह जुलाई (यह प्रभाष जी का जन्मदिन है) को आये थे तो फूल लेकर आये थे। थोड़े दुबले पर स्वस्थ और प्रसन्न लग रहे थे। पथ्य के कारण उस दिन खाना तो नहीं खाया लेकिन वैसे खाना पानी ठीक चल रहा था।



उनके राज्यपाल बनने की खबर आयी तो उनको तो नहीं लेकिन उनकी सबसे छोटी बहन वीणा को फोन करके बधाई दी। वीणा अपनी बहू और बेटी दोनो है। द्विवेदी जी को जानने के कोई पच्चीस साल बाद हेमंत के व्याह में गये तो मालूम हुआ कि वधू देवेन्द्र द्विवेदी की सबसे छोटी बहन है। और कहीं हो न हो, वीणा और हेमंत के घर तो उनसे मुलाकात होती ही थी। मैं चाहता था कि वीणा ही उनके राज्यपाल होने का भोज दे, जहां हम सब इकट्ठे होकर उनका अभिवादन करें। वीणा कह रही थी कि वे आने को मान ही नहीं रहे हैं। इक्कीस जुलाई को हम इंदौर के लिए रवाना हुए तब तक तो देवेन्द्र द्विवेदी बहन के घर नहीं जा पाये थे।



वीणा रोज उनके घर जाती थी। हम चाहकर भी नहीं जा पाये। जब गये तब 40, मीना बाग की बैठक में उनकी पार्थिव देह रखी हुई थी। गंगाराम के आईसीयू में देख सकते थे पर हिम्मत नहीं हुई। किस्मत की बात देखिए, टूटी कहां कमंद दो चार हाथ जबकि लबे बाम रह गया। या भेन जी ने पछताऊ कहा- फूटे भाग फकीर के भरी चिलम ढुल जाए। अठारह को उनकी नियुक्ति की घोषणा हुई थी और चौबीस को वे शपथ लेनेवाले थे। कोई पचास साल के राजनीतिक जीवन में यह पहली बार हुआ था कि उन्हें एक ऐसा सम्मानजनक पद मिला था जो दूसरों को सारे घाटों पर पानी पीने के बाद विश्राम के लिए दिया जाता है। देवेन्द्र द्विवेदी की सत्ता का राजनीतिक जीवन तो इससे शुरू हो रहा था।



और सुनता हूं यह पद भी उन्हें उन सोनिया गांधी के पौव्वे के कारण मिला था जिनका राज परिवार देवेन्द्र द्विवेदी को कोई कृपा की दृष्टि से नहीं देखता था। वे छात्र राजनीति करते हुए प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के दिनों से ही चले गये थे। जैसे नारायणदत्त तिवारी भी प्रसोपा से कांग्रेस में आये थे। समाजवादी संस्कारों ने द्विवेदी जी को इंदिरा गांधी की एकछत्र और चापलूसी को वफादारी समझनेवाली पार्टी में हाशिये पर ही रखा।



फिर राजनीति में संजय गांधी का उदय हुआ। और इंदिरा गांधी की शह पर उन्होंने कांग्रेस को लुंपन लोगों की पार्टी बनाया। तब कांग्रेस में पढ़े लिखे और लोकतांत्रिक स्वभाव के लोगों को लल्लू समझा जाने लगा। संजय गांधी के रोड रोलर रवैये से बहुत से लोग आक्रोशित हुए थे। देवेन्द्र द्विवेदी तब कोई तोप नहीं थे जो उनकी कोई सुनता और सम्मान की जगह देता। माना जाता था कि इमरजंसी में संजय गांधी भी उनसे नाराज थे।





संजय की अकाल मौत ने राजीव गांधी को राजनीति में धकेला और सिख आतंकवाद की शिकार हुई इंदिरा गांधी की मृत्यु ने उन्हें जबरन सत्ता में बैठा दिया। राजीव गांधी को लुंपन लोगों और राजनीतिक अड्डेबाजों से समान रूप से छड़क पड़ती थी। उनने नये किस्म के प्रोफेशनल लोगों को राजनीति और सत्ता में प्रतिष्ठित किया जो न भारत की जमीनी राजनीति में न पले पनपे थे न मध्यवर्ग के उस बौध्दिक वर्ग से आये थे जो जोरदार बहस के बिना कोई बात मानता नहीं था।



बनारस के हिन्दू विश्वविद्यालय की ठेठ छात्र राजनीति और समाजवादी पार्टी की अराजक बौध्दिकतावाद में से निकले देवेन्द्र द्विवेदी में वह नफासत नहीं थी जिसे अंग्रेजी स्नाबरी कहा जाता है। उनकी बौध्दिकता पश्चिम खासकर अमेरिकी छिछलेपन की नकल से इतराने वाले लोगों को बहुत कंटीली और कोनेवाली लगती थी। राजीव गांधी के जमाने में सफारी पहननेवाले स्मूद आपरेटरों में देवेन्द्र द्विवेदी कुछ देशी लाल बुझक्कड़ जैसे माने जाते थे।



अमेरिका के कारनेल लॉ स्कूल में कानून पढ़कर आये देवेन्द्र जी वकालत करने लगे थे और सन 74 से 80 तक राज्यसभा में भी रहे। लेकिन उनका असली समय सत्ता में नरसिंहराव के दुर्घटना उदय के साथ होना चाहिए था। नहीं हुआ। नरसिंहराव को लगता था कि कांग्रेसी सत्ता की सच्ची हकदार तो सोनिया गांधी को मानते हैं। मैं तो इंपोस्टर हूं। इसलिए वे ज्यादातर कांग्रेसियों पर भरोसा नहीं करते थे। उत्तर प्रदेश और बिहार के नेताओं के बारे में उन्हें लगता था कि सारे नेता मिलकर उनकी कुर्सी हिलाने में लगे हुए हैं।



फिर भी नरसिंहराव मानते थे कि मंडल ताकतों को अपनाए बिना भाजपा के हिन्दुत्व से निपटना मुश्किल है। भाजपा हिन्दी इलाकों में ही पनपी थी और कांग्रेस का पर्याय बन गयी थी। ऐसे में नरसिंहराव ने देवेन्द्र द्विवेदी को साथ लिया था जो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पहली पंक्ति के नेता नहीं थे। नरसिंहराव के लिए देवेन्द्र जी उपयोगी राजनीतिक आपरेटर थे। वे द्विवेदी के जरिए प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं को मैनुपुलेट करने की कोशिश करते थे। हिन्दी इलाके के लिए नरसिंहराव की कोई नयी राजनीति नहीं थी जिसकी हरकारी देवेन्द्र जी करते।



देवेन्द्र द्विवेदी के पास अपना कोई व्यापक और शक्तिशाली आधार भी नहीं था जिस पर वे नरसिंहराव की अध्यक्षता में कोई नयी राजनीति खड़ी करते। फिर कांशीराम, मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश को ऐसे राजनीतिक अखाड़े में उतार दिया था जहां देवेन्द्र द्विवेदी जैसे राजनेताओं को बल और दांव-पेंच के लिए गुंजाईश नहीं थी। नरसिंहराव चाहते तो देवेन्द्र द्विवेदी को महत्वपूर्ण राजनीतिक जिम्मेदारी सौंप सकते थे लेकिन वे शायद जानते थे कि वे तो स्टाप गैप की भूमिका में है और गोटियां बैठाकर उन्हें अपना काम निकाल लेना है।



सच पूछिये तो देवेन्द्र द्विवेदी उनके लिए कितने ही उपयोगी रहे हों लेकिन नरसिंहराव ने उन्हें कुछ नहीं बनाया। बनाया भी तो अतिरिक्त महाधिवक्ता। यानी वे दिल्ली में रहें, कानूनी लोगों में घूमें फिरें और नरसिंहराव के छोटे-मोटे संकट मोचक बने रहें। राजनीति में काम करनेवाले और सत्ता में भागीदारी चाहनेवाले लोग ही इन दिनों ज्यादा आते हैं। उन्हें सिध्दांतों, नीतियों और विमर्श से कुछ लेना देना नहीं होता है। ऐसे में देवेन्द्र जी कोई काम के नहीं थे। नरसिंहराव के विश्वासी वृत्त में होने के बावजूद राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों में अब भी बाहरी और हाशिये के आदमी बने रहे।



इन्हीं वर्षों में उन्हें लगने लगा कि उनके लिए चिलम तो भरती है लेकिन हथेलियों में दबाकर सुट्टा मारने के लिए मुंह तक लाने से पहले ही ढुल जाती है। धीरे धीरे वे दिल्ली के राजनीतिक, बौध्दिक और पत्रकारीय इलाकों में एक ट्रैजिक फिगर हो गये। मनमोहन सिंह के नव उदार राज के खुले खेल फर्रूखाबादी में राजनीति ऐसी बदली कि उद्योग व्यापार का ही बोलबाला हो गया। प्रमोद महाजन और अमर सिंह जैसे दलालों के हाथ में सत्ता की चाभी आ गयी।



बाजार और उद्योग की किसी लाबी के साथ आप नहीं हैं तो राजनीति में टिके रहना भी मुश्किल हो गया है। पैसा इतना हावी हो गया है कि लोक राजनीति की बात करने वाले या तो शोहदे माने गये या फिर लोगों को पटाने वाले ठग। जाति, संप्रदाय और उद्योग व्यापार को तरकीब और करामात से साधने वाली राजनेताओं की नयी पौध पनपी। उनके बीच देवेन्द्र द्विवेदी न तो राजनीति के थे और न वकालत के। राजनीति के लोगों को लगता था कि उनका समय कब का निकल गया है, अब या तो वे एक भग्नावशेष हैं या तो स्मारक।



तभी अचानक उन्हें गुजरात का राज्यपाल बना दिया गया। उन्हें क्या लगा मैं नहीं जानता। उन्हें बुखार था। क्रोसिन खा खा कर वे टिके रहे। न उनने और न किसी और ने उनकी सेहत का ख्याल नहीं रखा। इक्कीस जुलाई तक उनके लीवर में तगड़ा इन्फेक्शन हो गया। गंगाराम अस्पताल लीवर के इलाज में खासा नाम रखता है। वहां तीस जुलाई को उनकी किडनी ने काम करने से इंकार कर दिया। इतने प्रपंच कि शरीर जवाब दे गया। गांधीनगर में राज्यपाल पद की शपथ धरी रह गयी। भगवान ने चौहत्तर साल की उमर में उनकी चिलम ढोल दी। कुछ लोगों के साथ भगवान बहुत जालिम होता है। क्यों?



(आलोक तोमर के सौजन्य से )


मधुशाला : अमिताभ के स्वर में

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रंग कभी उतरा ही नहीं

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पहली बार "जागृति" बहुत बालपने में देखी थी। लगा जैसे इस-सी दूसरी कोई हो ही नही सकती। कई दिन तक उसी दुनिया में खोए बीत गए। गीत तो जैसे मानसपटल से कभी हटने की ही न ठान बैठे थे। वे धुनें, चित्रांकन, अपनी-सी दुनिया, अपने लोग, लगभग सभी रसों का समावेश -----------------जैसी शब्दावली आज प्रयोग करनी आती है किंतु तब न शब्द थे, न उनके प्रयोग की सामर्थ्य, न उनकी शक्तियों का परिज्ञान। था तो केवल प्रभाव ! एक आह्लाद का आभास ---प्रेरणा की विद्युत का संचार! बार-बार देख्नने को जी मचलता । पर वह युग भी क्या ऐसा था? एक दीवार पर परदा लगाया जाता था। लगाने वाले भी जाने किस देश से आते लगते थे क्योंकि उन्हें बुलावा भेजने के पहले चरण की भी टोह नहीं लगा पाते थे हम। तो वे आते । सप्ताह भर पहले पता पड़ जाता था कि अमुक दिन तय हुआ है। सो उस दिन सुबह से ही उत्सव उमड़ रहा होता उमंगों का। खैर! इस पर फिर कभी सही।


मूल बात यह कि इस फ़िल्म का रंग कभी उतरा ही नहीं। गीत तो आज भी रटे हुए से ही लगते हैं। भारत जब अपने स्वातन्त्र्य की तमक के प्रकाश के इस सोपान पर आ पहुँचा है और इस बार के स्वतन्त्रता दिवस की छटा बिखरने को उद्यत है तो मन ने चाहा यह भारत-दर्शन फिर किया जाए। अपने सारे पूर्वजों, परम्परा व थाती को प्रणाम निवेदित करते हुए इसे यहाँ टाँक रही हूँ, सहेज रही हूँ।

- कविता वाचक्नवी





वन्देमातरम् के रचयिता बंकिमचंद्र

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वन्देमातरम् के रचयिता बंकिमचन्द्र

भगवानदेव ’चैतन्य‘

राष्ट्र-गान ’वन्देमातरम्‘ के रचयिता बंकिमचन्द्र जी का नाम इतिहास में युगों-युगों तक अमर रहेगा क्योंकि यह गीत उनकी एक ऐसी कृति है जो आज भी प्रत्येक भारतीय के हृदय को आन्दोलित करने की क्षमता रखती है। बंकिम जी का जन्म २६ जून, १८३९ को हुआ। इनके पिता का नाम यादवचन्द्र चैटर्जी था। बंकिम जी ने साहित्य जगत् को ऐसी कालजयी कृतियाँ प्रदान की जिनके लिए उन्हें सदैव स्मरण किया जाता रहेगा। उनसे पूर्व जो भी उपन्यास लिखे गए वे या तो वर्णनात्मक शैली में लिखे गए या फिर उनकी विषयवस्तु पौराणिक कथा-कहानियों पर आधारित होती थीं। इसीलिए उन कृतियों को न तो जनसाधारण अपने जीवन के समीप देखता था और न ही वे किसी प्रकार की जनचेतना का आधार बन सकीं। हम यह बात निश्चित रूप से कह सकते हैं कि बंकिमचन्द्र जी भारतवर्ष के प्रथम ऐसे उपन्यासकार हैं जिनकी रचनाओं ने जनमानस को राष्ट्रीय नवजागरण का संदेश दिया तथा यह कार्य उन्होंने उस समय किया जब भारतवर्ष की जनता अपनी अस्मिता एवं अपने गौरव को विस्मृत करके स्वयं को परवश तथा असहाय सी अनुभव कर रही थी। बंकिम जी ने अपना साहित्यिक सफर अंग्रेजी लेखन से किया था। इस भाषा में उनकी प्रथम कृति ’राजमोहन‘स स्पाउूज‘ थी मगर इसका प्रकाशन नहीं हो पाया क्योंकि बंकिम जी को इस बात का अहसास हो गया कि जब तक अपने देश की भाषा में सृजन कार्य नह किया जाएगा तब तक यहाँ के जनमानस को उद्वेलित करना संभव नहीं होगा इसीलिए उस अंग्रेजी उपन्यास को उन्होंने आधा-अधूरा ही छोडकर अपनी भाषा में साहित्य सृजन आरंभ कर दिया।



उन्होंने वर्णनात्मक शैली या पौराणिक कल्पनाप्रसूत कथानकों के स्थान पर ऐतिहासिक घटनाओं को अपनी रचनाओं का आधार बनाया। ’दुर्गेशनन्दिनी‘, ’आनन्दमठ‘, ’कपालकुण्डला‘, ’मृणालिनी‘, ’राजसिंह‘, ’विषवृक्ष‘, ’कृष्णकान्त का वसीयतनामा‘, ’सीतारराम‘, ’चन्द्रशेखर‘, ’राधारानी‘, ’रजनी और इन्दिरा‘ उनकी कृतियाँ अपने आप में अद्वितीय एवं श्लाघनीय हैं। उन्होंने ऐतिहासिक या समाज में घटित होने वाली एवं जनमानस से जुडी घटनाओं को लेकर इन सभी उपन्यास की रचना की है। उस काल में इतनी सटीकता और तथ्यात्मकता को लेखनीबद्ध करना अपने आप में एक अद्भुत् कृत्य था जिसका बंकिम जी ने सफलतापूवक निर्वहन किया है। उन्होंने अपने उपन्यास ’दुर्गेशनन्दिनी‘ में अकबरकालीन बंगाल का सटीक एवं सजीव चित्रण किया है। ’आनन्दमठ‘ उनकी सबसे उत्कृष्ट कृति मानी जाती है तथा इसी उपन्यास में उन्होंने ’वन्देमातरम्‘ गीत का भी समावेश किया है। इस उपन्यास एवं गीत का अपना एक अलग ही स्थान है क्योंकि यह उपन्यास १८५७ की महाक्रांति से पूर्व हुए संन्यासी विद्रोह को केन्द्र बिन्दु बनाकर लिखा गया था। यह संन्यासी विद्रोह १७७२ से आरंभ होकर लगभग बीस वर्षों तक चला था। संन्यासी विद्रोह को आधार बनाकर लिखे गए इस उपन्यास की मूलकथा उन्होंने कहाँ से प्राप्त की यह तो नहीं कहा जा सकता मगर ’आनन्दमठ‘ उपन्यास के तृतीय संस्करण में यह स्वीकार किया था कि ग्लैस की कृति ’वारेन हेस्टिंग के जीवन संस्मरण‘ और सर विलिमय हण्टर के ’एनल्स ऑफ रूरल बंगाल‘ से तथ्यों का संग्रह किया है। इस सम्बन्ध में उनके छोटे भाई श्री पूर्णचन्द्र चैटर्जी ने अपने एक लेख ’बंकिम प्रसंग‘ में लिखा है -’हमारे चचेरे पितामह एक सौ आठ वर्ष तक जीवित रहे। उनके निकट हम सब यानी बंकिमचन्द्र भी कहानियाँ सुना करते थे। पितामह ने पहले खेती-बाडी की चर्चा की फिर अकाल का वर्णन करने लगे। पिछले ३-४ सालों में खेती खराब हो रही थी और सन् १७७० ई. में फसल पैदा नहीं हुई।..... सच तो यह है कि अनाज कहीं नहीं था इसमें हर वर्ग के लोग थे। बाद में ये लोग डकैती करने लगे। मैं कहानी को भूल गया था। सन् १७८६ ई. में उडसा में भयंकर अकाल पडा तब इस कहानी को उनकी जबानी सुना। शायद इस अकाल को लेकर एक उपन्यास लिखने की इच्छा उनके मन में थी।‘ यदि ’वन्देमातरम्‘ लिखने का प्रेरणास्रोत ढूँढा जाए तो इस सम्बन्ध में डॉ. भूपेन्द्रनाथ दत्त जी के अनुसार-संन्यासी विद्रोह के समय विद्रोहियों ने ’ओ३म् वन्देमातरम् का नारा लगाया था। इस उपन्यास के माध्यम से बंकिम जी ने पुनः भारत के जनमानस को दासता की बेडयों से मुक्त होने के लिए अंगडाई लेने हेतु प्रेरित करने का सार्थक प्रयास किया था। उपन्यास में लिखे गए ’वन्देमातरम्‘ के सम्बन्ध में योगी अरविन्द ने ’इन्दु प्रकाश‘ में लिखा था - ’बत्तीस वर्ष पूर्व बंकिम ने अपना यह महान् गीत लिखा था और कुछ ही लोगों ने उसे सुना किन्तु लम्बी मोहनिद्रा में आकस्मिक जागरण के क्षण में बंगाल के लोगों ने सत्य के लिए इधर-उधर देखा और उसी सौभाग्य क्षण में कोई ’वन्देमातरम्‘ गा उठा। मन्त्र दिया गया और एक दिन समूचा राष्ट्र देशभक्ति धर्म का अनुयायी बन गया।‘ गीत के रचयिता ने स्वयं भविष्यवाणी करते हुए कहा था -’’एक दिन ऐसा आएगा कि बंगभूमि इस गीत को सुनकर नाचने लगेगी। एक बंगाल क्या सारा हिन्दुस्तान इस गीत से प्रेरणा ग्रहण करेगा। सारा देश एक सुर से यह गीत गाने लगेगा।‘‘ उनकी यह भविष्यवाणी अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई। बंकिम स्मृति मन्दिर के संग्रहाध्यक्ष प्रख्यात लेखक श्री गोपालचन्द्र राय के अनुसार वन्देमातरम् अगस्त सन् १८७५ से मार्च सन् १८७६ के बीच लिखा गया है क्योंकि उन दिनों बंकिम जी अपने कार्य से अवकाश लेकर अपने घर में स्थित ’बंग दर्शन प्रेस‘ पत्रिका के प्रकाशन का कार्य देख रहे थे। इस पत्रिका का प्रकाशन बंकिम जी के सम्पादन में १८७३ से मार्च सन् १८७६ तक होता रहा। ’आनन्दमठ‘ का प्रथम प्रकाशन धारावाहिक रूप में ’बंग दर्शन‘ पत्रिका में १८८० से १८८२ के मध्य हुआ था।



उनका उपन्यास ’कपालकुण्डला‘ भी अकबरकालीन बंगाल पर आधारित है। ’मृणालिनी‘ प्रारंभिक मुगल आततायियों एवं आक्रमण के अत्याचारों को लेकर रचा गया है। ’राजसिंह‘ राजपूतों की शौर्यगाथाओं और औरंगजेब की मजहबपरस्ती तथा अन्यायपूर्ण शासन को लेकर लिखा गया उपन्यास है। ’सीताराम‘ मुर्शिदाबाद के नवाबी शासनकाल में हिन्दू पीडतों द्वारा की गई कुटिलताओं का विस्तृत लेखा-जोखा है। इन समस्त रचनाओं में उन्होंने विगत या तत्कालीन परस्थितियों एवं घटनाओं को लेकर अपनी लेखनी द्वारा किसी न किसी प्रकार अत्याचार और अनाचार से लोहा लेने की ही प्रेरणा दी है। उनका लक्ष्य मात्र तथ्य को उजागर करना भर नहीं था बल्कि भारतीय जनमानस को उन परिस्थितियों का सामना करने तथा अपनी अस्मिता के प्रति पूर्णतया जागरूक करना था इसीलिए एक कथाकार होने के नाते उनका ध्यान ऐतिहासिकता की प्रमाणिकता पर अधिक नहीं था। इस बात को उन्होंने अपने उपन्यास ’राजसिंह‘ के प्राक्कथन में स्वीकार करते हुए लिखा है -’उपन्यासकार को अपने कथानक के प्रवाह की सुरक्षा ही अभीष्ट होनी चाहिए मात्र ऐतिहासिक तथ्यों के पीछे उसे अपने पूरा ध्यान केन्दि्रत करना उचित नहीं है।‘



’कृष्णकान्त का वसीयतनामा‘, ’राधारानी‘, ’देवी चौधरानी‘ , ’विषवृक्ष‘, ’रजनी और इन्दिरा‘ नामक कृतियों को हम उनके सामाजिक उपन्यासों की श्रेणी में रख सकते हैं। इन कृतियों में भले ही उन्होंने किसी ऐतिहासिक प्रसंग को न छुआ हो मगर ये उपन्यास भी तत्कालीन परिस्थितियों और सामाजिक परिवेश पर आधारित हैं क्योंकि कोई भी रचनाकार तत्कालीन समाज से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है और यदि उसकी रचनाओं में तत्कालीन परिवेशादि का विवेचन नहीं है तो उसे साहित्यकार कहना ही अप्रासांगिक होगा। उनके सामाजिक उपन्यासों में भी हम यह उत्कृष्टता देखते हैं कि उन्होंने यौनाकर्षण या सतही प्रेम-प्रसंगों को आधार बनाकर कथानक का ताना-बाना नहीं बुना है बल्कि भारतीय संस्कृति की गरिमा तथा चारित्रिक उत्कृष्टता को अक्षुण्ण बनाए रखा है। उनके नारी पात्रों में भी हमें भारतीय परम्पराओं के अनुरूप नैसर्गिकता एवं सच्चरित्रता के दिग्दर्शन होते हैं। वे अपने आदर्शों, पवित्रता और सतीत्व के प्रति हमेशा जागरूक दिखाई देती हैं।



बंकिम जी हिन्दू-मुसलमानों की एकता के प्रबल पक्षधर थे। ’बंग दर्शन‘ में वे लिखते हैं - ’बंगाल हिन्दू-मुसलमानों का प्रदेश है, अकेले हिन्दुओं का नहीं। पर आजकल हिन्दू-मुसलमान अलग हैं, आपस में सहृदयता नहीं है। बंगाल की भलाई के लिए जरूरी है कि हिन्दू-मुसलमान में एकता हो। जब तक उच्चवर्ग के मुसलमानों में यह भावना रहेगी कि दूसरे मुल्क के हैं, बांगला उनकी भाषा नहीं है, वे न तो बांगला लिखेंगे, न सीखेंगे, सिर्फ उर्दू-फारसी से काम चलाएँगे तब तक एकता स्थापित नहीं हो सकती क्योंकि राष्ट्रीय एकता की जड में भाषा की एकता होती है।‘ अपने ’राजसिंह‘ उपन्यास में लिखा -’हिन्दू होने से अच्छा नहीं होता, मुसलमान होने से ही खराब नहीं होता अथवा हिन्दू होने से ही बुरा नहीं होता, मुसलमान होने पर ही अच्छा नहीं होता। अच्छा-बुरा दोनों में बराबर ही है। दूसरे गुणों के साथ जो धार्मिक हैं - हिन्दू हो या मुसलमान - निकृष्ट हैं।‘ उनके इस कथन से स्पष्ट होता है कि वे मूलतः राष्ट्र-भक्त एवं मानवतावादी थे तथा अच्छे या बुरे होने की उनकी कसौटी भी यही थी। श्री अरविन्द घोष ने अपने लेख ’ऋषि बंकिमचन्द्र‘ में लिखा-’संभव है कि भविष्य में साहित्य आलोचक ’कपालकुण्डला‘, ’विषवृक्ष‘ और ’कृष्ण कांतेर विल‘ को उनकी उत्कृष्ट कलाकृतियाँ माने और सापेक्ष प्रशंसा के साथ ’देवी चौधरानी‘, ’आनन्दमठ‘, ’कृष्ण चरित्र‘ या ’धर्म तत्त्व‘ की चर्चा करें। फिर भी इन्हीं बाद में लिखी कृतियों का बंकिम न कि प्रथमोक्त महान् सृजनात्मक उत्कृष्ट कृतियों का स्रष्टा बंकिम आधुनिक भारत के निर्माताओं की श्रेणी में रखा जाएगा। पूर्वोक्त बंकिम केवल कवि और शैलीकार था - दूसरा बंकिम ऋषि और राष्ट्रनिर्माता था।‘



श्री अरविन्द जी का कथन पूर्णतः सत्य है क्योंकि बंकिम जी प्रथम ऐसे रचनाकार थे जिन्होंने अपने उपन्यासों के माध्यम से भारतीय जनमानस को यह संदेश दिया कि अपनी अस्मिता और स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए उत्सर्ग होना सीखें। उन्होंने उस समय भारतीयों को यह संदेश दिया जिस समय वे स्वयं को असहाय और परवशता की बेडयों में जकडा हुआ अनुभव करते हुए किंकत्व्यविमूढ थे। इसलिए बंकिम जी मात्र एक साहित्यकार ही नहीं थे बल्कि भारत के राष्ट्रीय नवजागरण के पुरोधा और अभ्युत्थान के महानायक भी थे। अन्ततः ८ अप्रैल, १८९४ को इस महानायक का देहावसान हो गया मगर उसके द्वारा सुलगाई गई चिंगारी ने ज्वाला बनकर परवशता की बेडयों को भस्म करके ही दम लिया था.... उनके देहावसान पर श्री अरविन्द घोष ने बम्बई से प्रकाशित ’इन्दु प्रकाश‘ में एक लेखमाला के अन्त में जो शब्द लिखे थे, वे आज भी स्मरण करने योग्य हैं -’और भावी पीढी भारत के निर्माताओं को जब प्रशस्ति अर्पित करने बैठेगी, तब उस प्रशंसा की श्रेष्ठ पुष्पमाला किसी पदलोलुप राजनीतिज्ञ के वास्ते नहीं होगी, भाषण गर्जन करते समाज सुधारक के वास्ते भी नहीं होगी, परन्तु सत्ता या पद की कोई भी लालसा बिना, अपने अन्दर जो कुछ भी श्रेष्ठ था, उसे समर्पित करने वाले इस गौरवशाली बंगाली के वास्ते ही होगी जिसने केवल कर्त्तव्य की भावना से, शान्तिपूर्वक, चुपचाप कार्य करते रहकर सृजन किया था एक भाषा-एक साहित्य का-एक राष्ट्र का।



राजस्थान की पाक सीमा पर आतंक

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राजस्थान की पाक सीमा पर आतंक का राज
अवधेश आकोदिया

अजमेर के सहायक पुलिस अधीक्षक राहुल प्रकाश के अनुसार भर्ती घोटाले के अनुसंधान में पता चला कि कुछ सैन्य लिपिकों ने फर्जी दस्तावेज के बूते कुछ लोगों को सेना में भर्ती कराया है। उनके संबंध आईएसआई से होने की आशंका है। जिला पुलिस की यह आशंका निर्मूल नहीं। उत्तर-पूर्व इलाकों की सेना भर्ती में ऐसा फर्जीवाड़ा उजागर हो चुका है।


पाकिस्तान से लगी राजस्थान की एक हजार किलोमीटर लंबी अंतर्राष्ट्रीय सीमा आतंकवादियों के लिए स्वर्ग साबित हो रही हैं। सूबे की इस पश्चिमी सीमा के रास्ते धडल्ले से आतंकवादी, जाली नोट, मादक पदार्थ और अवैध हथियार आ रहे हैं, जिनका उपयोग देश में आतंक फैलाने के लिए किया जा रहा है। राजस्थान की सीमा के सहारे आ रहे खतरे का खुलासा करती रिपोर्ट!


राजस्थान का पश्चिम इलाका। दूर-दूर तक रेत के टीलों के बीच कुछ घर। यहां गुजर-बसर करना किसी जंग जीतने से कम नहीं है। गंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों को छोड़ दें तो खाना और पानी सरीखी मूलभूत जरूरतों को हासिल करने के लिए भी कड़े जतन करने होते हैं। थार के इस रेगिस्तान में पश्चिम की ओर आगे बढ़ते हैं तो पाकिस्तान की सीमा आ जाती है।


तारबंदी के बीच बीएसएफ के जवानों की चौकसी को देखकर लगता है कि यहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता, पर सच्चाई कुछ ओर है। सीमा के सहारे बड़ी संख्या में घुसपैठिए, जाली नोट, मादक पदार्थ और अवैध हथियार इधर-उधर हो जाते हैं और किसी को भनक तक नहीं लगती है। घुसपैठियों और तस्करों के लिए पाकिस्तान से सटी राजस्थान की सीमा आसान रास्ता बन गई है। एक हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी इस अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर कई ऐसी जगह हैं, जहां घुसपैठियों और तस्करों को रोकने वाला कोई नहीं है। सीमा की सुरक्षा के लिए तारबंदी और गश्त जैसे परंपरागत तरीके फ्लाप साबित हो रहे हैं।



राजस्थान से लगती अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तान से घुसपैठ तो कई सालों से होती आ रही है, पर सुरक्षा एजेंसियों को इस आशंका ने परेशानी में डाल दिया है कि पाकिस्तान घुसपैठियों के वेश में तालिबानियों को भारतीय सीमा में घुसाने की कोशिश कर रहा है। इस सिलसिले में पिछले कुछ महीनों में हुई घटनाएँ पेशानी पर बल डालने वाली हैं।



अप्रैल में फरीदसर सीमा चौकी के जवानों ने पाकिस्तान के लियाह निवासी 26 वर्षीय घुसपैठिए जुल्फिकार को पकड़ा। उससे पाकिस्तानी टेलीकॉम कंपनियों के आठ सिम कार्ड और एक मोबाइल फोन मिला है। लियाह पंजाब प्रांत के अंतिम छोर पर है, जहाँ से नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर शुरु होता है। यहाँ पर तालिबानियों का साम्राज्य फैल गया है। इसी तरह 23 मार्च को गंगानगर सेक्टर के करणपुर क्षेत्र में सीमा सुरक्षा बल की मांझीवाला सीमा चौकी के जवानों द्वारा आत्मसमर्पण की चेतावनी की अनदेखी करने वाले 17 और 21 वर्ष के दो घुसपैठियों को मार गिराने के बाद पाँच सिम कार्ड और एक नक्शा मिलना सचमुच चौंकाने वाला है। फरवरी में 41 आरएस।



सीमा चौकी पर तारबंदी पार करने पर मारे गए घुसपैठिए की एक जैकेट और 11 प्लास्टिक गेंदों की रहस्यमय गुत्थी भी अभी तक सुलझ नहीं पाई है। सीमा सुरक्षा बल गंगानगर सेक्टर के उप-महानिरीक्षक सीआर चौहान का कहना है कि मांझीवाला सीमा चौकी क्षेत्र में मारे गए दोनों पाक घुसपैठिए निश्चितरूप से आतंकवादी थे। इनसे मिले पाँच पाकिस्तानी सिम कार्डों र्से जाहिर है कि इन्हें किसी खास मकसद से भारतीय सीमा में भेजा गया था।


सीमापार से घुसपैठ के इस नए तौर-तरीकों और बढ़ती घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। सूत्रों का कहना है कि इस बात पर आश्चर्य है कि एकदम शांत रहने वाली राजस्थान से लगी अंतर्राष्ट्रीय सीमा को जानबूझ कर अशांत एवं संवेदनशील क्यों बनाया जा रहा हैं। सीमा सुरक्षा बल के अधिकारियों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर के साथ राजस्थान गुजरात से सटी सीमा के पास चल रहे शिविरों से आतंकवादी घुसपैठ की फिराक में है। इसके लिए बल को मजबूत एवं हाईटेक करने के लिए आधुनिकीकरण की प्रक्रिया पूरी होने वाली है। राजस्थान में बीकानेर में नया फ्रंटियर मुख्यालय बनाया जा रहा है। नई 19 सीमा चौकियाँ भी स्थापित की जायेंगी।


पाकिस्तान के नापाक इरादों की वजह से अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर घुसपैठ की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर केन्द्रीय गृहमंत्री पी। चिदम्बरम ने भी लोकसभा चुनाव से पहले बीकानेर सेक्टर की सीमा चौकियों का दौरा करके सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया था। राजस्थान फ्रंटियर के उप-महानिरीक्षक आर. सी. ध्यानी का कहना है कि गृहमंत्री के निर्देशानुसार सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी करने के साथ सुरक्षाबलों को अत्यधिक सतर्क किया गया है। सीमा के रास्ते देश में आने वाले ये आतंकवादी आईएसआई के इशारे पर काम करते हैं और आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए पूरा नेटवर्क खड़ा करते हैं।



इसके लिए नए-नए तरीके भी अपनाए जा रहे हैं। पिछले दिनों अजमेर में सेना भर्ती घोटाले के उजागर होने के बाद की जा रही जाँच में मिले संकेतों से देश की सुरक्षा से जुड़े आला अधिकारियों के पैरों तले से जमीन खिसक गई है। जाँच में पता चला है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के कुछ एजेंट भारतीय सेना का हिस्सा बन गए हैं।



अजमेर के सहायक पुलिस अधीक्षक राहुल प्रकाश के अनुसार भर्ती घोटाले के अनुसंधान में पता चला कि कुछ सैन्य लिपिकों ने फर्जी दस्तावेज के बूते कुछ लोगों को सेना में भर्ती कराया है। उनके संबंध आईएसआई से होने की आशंका है। जिला पुलिस की यह आशंका निर्मूल नहीं। उत्तर-पूर्व इलाकों की सेना भर्ती में ऐसा फर्जीवाड़ा उजागर हो चुका है।



राहुल प्रकाश ने साफ तौर पर कहा कि प्रारंभिक पड़ताल में ऐसे संकेत मिले हैं कि आईएसआई ने कुछ लोगों को विशेष मकसद से सेना में भर्ती कराया है। शारीरिक रूप से तंदुरुस्त लोग सीधी भर्ती में आवश्यक दस्तावेज की मदद से आसानी से भर्ती हो सकते हैं। देश की सुरक्षा के लिए इससे बड़ा खतरा और क्या हो सकता है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने हमारी सेना में ही घुसपैठ कर ली है।



पाकिस्तान से सटी राजस्थान की सीमा से आतंक फैलाने वाले दरिंदे ही नहीं, बल्कि देश को आर्थिक आतंकवाद की गिरफ्त में लेने के मकसद से भारी मात्रा में जाली नोटों की खेप भी आ रही हैं। हाल ही में जयपुर में नकली नोट चलाने के आरोप में पकड़े गए अभियुक्त आसिफ खान और सैयद सलीम हसन की राजस्थान में नकली नोटों के कारोबार का जाल फैलाने की साजिश थी। वे राज्य में कई एजेन्ट बनाना चाहते थे, लेकिन इससे पहले ही एसओजी ने उन्हें दबोच लिया। अभियुक्तों के कई राज्यों में रहने वाले लोगों से संबंधों का खुलासा हुआ है। इसके बाद एसओजी ने अन्य एजेन्सियों की मदद लेने की तैयारी कर ली है।



एसओजी के उप महानिरीक्षक राजेश निर्वाण ने बताया कि सलीम एवं आसिफ ने पूछताछ में खुलासा किया कि वे राजस्थान में बड़े पैमाने पर नकली नोट चलाने वाला गिरोह खड़ा करने की तैयारी में थे। इसके लिए उन्होंने कुछ लोगों से बातचीत भी की थी। अभियुक्तों का कहना है कि वे पहली बार नकली करेंसी लाए थे, जबकि पुलिस को अब तक की तफ्तीश से लगता है कि वे कई बार नकली नोट बाजार में चला चुके हैं।


सलीम के असम, बिहार एवं पश्चिम बंगाल में कई लोगों से सम्पर्क थे। इस आधार पर एसओजी का मानना है कि उसके सम्पर्क में आए लोग भी अवैध धंधों में लिप्त हो सकते हैं। इनकी तहकीकात के लिए एसओजी अन्य राज्यों की पुलिस एवं एजेंसियों से सम्पर्क कर रही है।



जाली नोटों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। हर वर्ष देशभर में औसतन 6 करोड़ के जाली नोट बरामद होते है। इसका बड़ा हिस्सा राजस्थान की सीमा के जरिए देश में आता है। पिछले दिनों इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) ने केन्द्र सरकार को एक रिपोर्ट सौपी थी, जिसमे कहा गया था कि भारत 'आर्थिक आतंकवाद की चपेट में है। आईबी के मुताबिक तकरीबन 51 अरब डॉलर के बराबर जाली मुद्रा प्रचलन में चल रही है। इससे भी भारत में आतंककारी गतिविधियों को वित्तपोषण हो रहा है।


लगता यही है कि जो लोग आतंकवादी गिरोहों को चंदा देते है, उन्हें बदले में दुगुनी नकली मुद्रा का प्रलोभन दिया जाता है। यही कारण है देश में इतने ज्यादा जाली नोट आ गए है कि सरकार को उसी शृंखला के छपे अपने असली नोट बदलने पड़ रहे हैं। शुरुआत में सरकार ने 1000 रुपये व 500 रुपये के नोट ही बदलने का निर्णय किया है। इससे यही लगता है कि 10, 20, 50 और 100 के जाली नोट भी बाजार में काफी संख्या में चल रहे है। इनका बैंक चेस्ट में उनका पहुँचना तो अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है।



सीमापार से जाली नोट ही नहीं भारी मात्रा में मादक पदार्थ और अवैध हथियारों की भी तस्करी होती है। सुरक्षाबलों की लाख कोशिशों के बावजूद सीमा से तस्करों की सेंधमारी जारी है। इस बार अफगानिस्तान में अफीम की रिकॉर्ड पैदावार के चलते स्मगलिंग की घटनाएं अचानक बढ़ गई हैं और ड्रग माफिया का नेटवर्क सक्रिय हो गया है। राजस्थान सीमा से आने वाली हेरोइन मुंबई होते यूरोप जा रही है। तस्करी पर लगाम लगाने के लिए नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो जोधपुर के बाद अब अजमेर में भी इंटेलीजेंस सेल शुरू कर रहा है।


अफगानिस्तान में तालिबान का दबदबा बढने से पाकिस्तान के रास्ते बड़े पैमाने पर हेरोइन भारत पहुंचाने की कवायद चल रही है, ताकि उसे यूरोपीय देशों में सप्लाई किया जा सके। पाकिस्तान से लेकर राजस्थान, दिल्ली व मुंबई तक इसका नेटवर्क सक्रिय है। राजस्थान सीमा पर तारबंदी के बाद मादक पदार्थ तस्करी पर काफी अंकुश लगा था, लेकिन अब फिर से सीमा पार और बाड़मेर, जैसलमेर व गंगानगर के सीमावर्ती गाँवों में पुराने तस्कर इस धंधे में जुट गए हैं।


खुफिया सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान के कुख्यात तस्कर पाक गुप्तचर एजेंसी आईएसआई के मदद से सीमा पार हेरोइन पहुंचाने में सक्रिय है। बाड़मेर व जैसलमेर में दो साल पूर्व हेरोइन की बड़ी खेप पकड़े जाने के बाद बीते साल गडरा रोड से दो खेप आने का खुलासा हो चुका है। बाड़मेर व जैसलमेर सीमा से आने वाली हेरोइन जोधपुर से कोरियर के माध्यम से मुंबई भेजने का खुलासा बीते महीनों तीन नाइजीरियाई कोरियर पकड़े जाने से हो चुका है।


बीते सालों एक मंत्री पुत्र की नशीले टेबलेट की फैक्ट्री पकड़े जाने पर जोधपुर से मुंबई के रास्ते यूरोप तक ड्रग माफिया के तार जुड़े होने का खुलासा हो चुका है। बीकानेर व गंगानगर के रास्ते आने वाली हेरोइन अजमेर से मुंबई भेजने का नेटवर्क सक्रिय है। जोधपुर और कराची को जोडने वाली 'थार एक्सप्रेस' पाकिस्तान के लिए तस्करी का आसान जरिया बन गया है। राजस्थान सरकार ने एक खुफिया रिपोर्ट भारत सरकार को सौंपी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस ट्रेन के जरिए भारत में नकली नोट, नशीले पदार्थ और हथियार भेजे जाते हैं।



राज्य से लगती अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) दुश्मनों पर निगाह रखने का काम कर रही है। बीएसएफ की 78 कंपनियाँ यहाँ चौकसी रखती हैं, पर इसमें कुछ स्थानों पर इसमें ढील साफ तौर पर देखी जा सकती है। एक हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी इस सीमा पर तारबंदी की हुई है और फ्लड लाइट लगी हुई हैं। बीएसएफ की एक चौकी से दूसरी चौकी आसानी से नजर आती है। ऐसे में आतंकवादियों और तस्कारों की सेंधमारी सरकार और सुरक्षा बलों के लिए सिरदर्द बनी हुई है। सुरक्षा बलों के सूत्रों की मानें तो घुसपैठ के लिए आधुनिक हथियारों और तकनीक का अभाव है। वे इसके लिए लगातार सरकार को लिखते रहे हैं, पर अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है।


जनवरी में दिल्ली में हुए मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सीमापार से हो रही घुसपैठ को प्रमुखता से उठाया था। बैठक में प्रधानमंत्री ने ठोस रणनीति बनाने का आश्वासन भी दिया था। कुछ इसी प्रकार को आश्वासन लोकसभा चुनाव से ऐन पहले राजस्थान आए गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने भी दिया था, लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। इसमें जितनी देरी होती जाएगी, आतंकवादियों के हौंसले उतने ही बुलंद होते जाएँगे।




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