"अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु"

हिन्दी भारत

" - हिन्दी भारत - " (भारत व भारतीयता से जुड़े सभी साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक प्रयासों, हिन्दी में रचनात्मक लेखन (विविध विधाएँ), भाषिक मंतव्यों, जीवनमूल्यों, पारस्परिक आदान-प्रदान की अभिवृद्धि हेतु) ***** हिन्दी भारत ***** "

व्यंग्य का समय

4 COMMENTS
 
परत-दर-परत


व्यंग्य का समय

राजकिशोर
हमारे हाजी साहब बहुत काम के आदमी हैं। उनसे किसी भी विषय पर राय ली जा सकती है और वे किसी भी विषय पर टिप्पणी कर सकते हैं। सुबह-सुबह पढ़ा कि दिल्ली की हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष एक व्यंग्यकार को बनाया गया है, तो उनके पास दौड़ गया। हाजी साहब की एक खूबी और है। कई बार वे मन की बात भाँप लेते हैं। उन्होंने ठंडे पानी के गिलास से मेरा स्वागत किया और बोले, ‘बैठो, बैठो। मैं समझ गया कि कौन-सी बात तुम्हें बेचैन कर रही है।’ मैंने आपत्ति की, ‘हाजी साहब, मैं किसी राजनीतिक मामले पर चरचा करने नहीं आया हूँ।’ हाजी साहब – ‘हाँ, हाँ, मैं भी समझता हूँ कि तुम जी-5, जी-8 और जी-14 पर बात करने नहीं आए हो। ये पचड़े मेरी भी समझ में नहीं आते। इस तरह सब अलग-अलग बैठक करेंगे, तो संयुक्त राष्ट्र का क्या होगा? कुछ दिनों के बाद तो वहाँ कुत्ते भी नहीं भौंकेंगे। लेकिन तुम आए हो राजनीतिक चर्चा के लिए ही, यह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ।’ मुझे हक्का-बक्का देख कर उन्होंने अपनी बात साफ की, ‘तुम्हें यही बात परेशान कर रही है न कि हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष पहली बार एक व्यंग्यकार को बनाया गया है!’


मैं विस्फारित नेत्रों से उनकी ओर देखता रह गया। वे बोले जा रहे थे, ‘बेटे, यह मामला पूरी तरह से  राजनीतिक है। यह तो तुम्हें पता ही होगा कि दिल्ली की मुख्यमंत्री ही यहाँ की हिन्दी अकादमी की अध्यक्ष हैं। वे साहित्यकर्मी नहीं, राजनीतिकर्मी हैं। साहित्यकर्मी होतीं, तो इस प्रस्ताव पर ही उनकी हँसी छूट जाती। राजनीतिकर्मी हैं, सो आँख से नहीं, कान से देखती हैं। उनके साहित्यिक सलाहकारों ने कह दिया होगा कि इस समय एक व्यंग्यकार से ज्यादा उपयुक्त कोई अन्य व्यक्ति नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री जी ने बिना कुछ पता लगाए, बिना सोचे-समझे ऑर्डर पर हस्ताक्षर कर दिए होंगे। इसमें परेशान होने की बात क्या है? बेटे, दुनिया ऐसे ही चलती है। हमारा राष्ट्रीय मोटो भी तो यही कहता है - सत्यमेव जयते। आज का सत्य राजनीति है। सो राजनीति ही सभी अहम चीजों का फैसला करेगी। वाकई कुछ बदलाव लाना चाहते हो, तो तुम्हें राजनीति ज्वायन कर लेना चाहिए।’


मेरे मुँह का स्वाद खट्टा हो आया। मैंने यह तो सुना था कि साहित्य में राजनीति होती है, पर यह नहीं मालूम था कि राजनीति में भी साहित्य होता है। आजकल राजनीति की  मुख्य खूबी यह है कि मेसेज छोड़े जाते हैं और संकेत दिए जाते हैं।
    हाजी साहब से पूछा, ‘फिर तो आप कहेंगे कि एक शीर्ष व्यंग्यकार के हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनने में भी कुछ संकेत निहित हैं !’ हाजी साहब ने मुसकराते हुए कहा, ‘तुम मूर्ख हो और मूर्ख ही रहोगे। संकेत बहुत स्पष्ट है कि यह व्यंग्य का समय है। पहले दावा किया जाता था कि यह कहानी का समय है, कोई कहता था कि नहीं, कविता का समय अभी गया नहीं है, तो कोई दावा करता था कि उपन्यास का समय लौट आया है। हिन्दी अकादमी का नया चयन बताता है कि यह व्यंग्य का समय है। व्यंग्य से बढ़ कर इस समय कोई और विधा नहीं है।’


मैंने अपना साहित्य ज्ञान बघारने की कोशिश की, ‘हाजी साहब, आप ठीक कहते हैं। आज हर चीज व्यंग्य बन गई है। हिन्दी में तो व्यंग्य की बहार है। कविता में व्यंग्य, कहानी में व्यंग्य, उपन्यास में व्यंग्य, संपादकीय टिप्पणियों में व्यंग्य -- व्यंग्य कहां नहीं है? एक साहित्यिक पत्रिका ने तो अपने एक विशेषांक के लेखकों का परिचय भी व्यंग्यमय बना दिया था। क्या इसी आधार पर आप कहना चाहते हैं कि व्यंग्य इस समय हिन्दी साहित्य की टोपी है -- इसके बिना कोई भी सिर नंगा लगता है। शायद इसीलिए सभी लेखक एक-दूसरे पर व्यंग्य करते रहते हैं। कभी सार्वजनिक रूप से कभी निजी बातचीत में।’

हाजी साहब बोले, ‘तुम कहते हो तो होगा। पर मेरे दिमाग में कुछ और बात थी। हिन्दी में तो दिल्ली शुरू से ही व्यंग्य का विषय रही है। इस समय मुझे दिल्ली पर दिनकर जी की कविता याद आ रही है - वैभव की दीवानी दिल्ली ! /  कृषक-मेध की रानी दिल्ली ! / अनाचार, अपमान, व्यंग्य की / चुभती हुई कहानी दिल्ली ! डॉ. लोहिया ने लिखा है कि दिल्ली एक बेवफा शहर है। यह कभी किसी की नहीं हुई। पूरा देश दिल्ली की संवेदनहीनता पर व्यंग्य करता है। लेकिन दिल्ली पहले से ज्यादा पसरती जाती है। हड़पना उसके स्वभाव में है। इसी दिल्ली में कभी हड़पने को ले कर कौरव-पांडव युद्ध हुआ था। इसलिए अगर आज दिल्ली में व्यंग्य को इतना महत्व दिया जा रहा है, तो इसमें हैरत की बात क्या है? तुम भी मस्त रहो और जुगाड़ बैठाते रहो। यहाँजुगाड़ बैठाए बिना जीना मुश्किल है।’


मैंने कहा, ‘हाजी साहब, लगता है, आज आपका मूड ठीक नहीं है। मुझ पर ही व्यंग्य करने लगे ! मेरा जुगाड़ होता, तो मैं मुँह बनाए आपके पास क्यों आता?’ हाजी साहब – ‘नहीं, नहीं, मैं तुम्हें अलग से थोड़े ही कुछ कह रहा था। मैं तो तुम्हें युग सत्य की याद दिला रहा था। हर युग का सत्य यही है कि युग सत्य को सभी जानते हैं, पर उसे जबान पर कोई नहीं लाता। अपनी रुसवाई किसे अच्छी लगती है?’

मैंने हाजी साहब का आदाब किया और चलने की ख्वाहिश जाहिर की। हाजी साहब का   आखिरी कलाम था – ‘आदमी की  फितरत ही ऐसी है। फर्ज करो, तुमसे पूछा जाता कि जनाब, आप हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनेंगे, तो क्या तुम इनकार कर देते? क्या तुम यह कहने की हिम्मत दिखाते कि ‘मुआफ कीजिए, दिल्ली में बड़े बड़े काबिल लोग बैठे हैं। मैं तो उनके पाँवों की धूल हूँ। मुझसे पहले उनका हक है।’ आती हुई चीज को कोई नहीं छोड़ता। यहाँ तो लोग तो जाती हुई चीज को भी बाँहों में जकड़ कर बैठ जाते हैं। और जब आना-जाना किसी नियम से न होता हो, तो अक्लमंदी इसी में है कि हवा में तैरती हुई चीज को लपक कर पकड़ लिया जाए। सागर उसी का है जो उठा ले बढ़ाके हाथ।’  

बुर्के से क्‍यों डरता है फ्रांस

8 COMMENTS
 
 
 
बुर्के से क्‍यों डरता है फ्रांस
    डॉ. वेदप्रताप वैदिक
 



बुर्के के पक्ष में जितने तर्क हो सकते हैं, उससे कहीं ज्यादा उसके विरूद्घ हो सकते हैं लेकिन बुर्के पर प्रतिबंध लगाने का तर्क काफी खतरनाक मालूम पड़ता है। फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सारक़ोजी यदि अपनेवाली पर उतर आए तो कोई आश्चर्य नहीं कि वे बुर्का-विरोधी कानून पास करवा ले जाएँगे।बुर्के पर प्रतिबंध लगानेवाले सारकोजी पहले समाज सुधारक नहीं हैं। अब से लगभग 85 साल पहले तुर्की के महान नेता कमाल पाशा ने बुर्के पर प्रतिबंध ही नहीं लगाया था बल्कि कहा था कि केवल वेश्याएँ ही बुर्का ओढ़ें। भले घर की औरतें अपना चेहरा क्यों छुपाएँ ? मिस्र की प्रसिद्घ समाज-सुधारिका हौदा चाराउई ने अपनी सैकड़ों सहेलियों के साथ मिलकर बुर्के का बहिष्कार किया और 1923 में समारोह-पूर्वक सारे बुर्के समुद्र में बहा दिए। 1927 में सोवियत उज़बेकिस्तान में लगभग एक लाख मुस्लिम महिलाओं ने बुर्के के बहिष्कार की शपथ ली थी। 1928 में अफगानिस्तान के साहसी बादशाह अमानुल्लाह की पत्नी महारानी सुरय्रया ने खुले-आम बुर्का उतार फेंका था। 1936 में ईरान के रिज़ा शाह पहलवी ने भी बुर्के या चादर पर प्रतिबंध लगा दिया था। ये मिसाले हैं, मुस्लिम राष्ट्रों की लेकिन यूरोपीय राष्ट्रों ने भी इस दिशा में पहले से कई कदम उठा रखे हैं।



     2004 में फ्रांस ने कानून बनाया कि स्कूलों में छात्राएँ और शिक्षिकाएँ न तो बुर्का पहन सकती हैं और न चेहरे पर स्कार्फ लपेट सकती हैं। जर्मनी के अनेक शहरों में इसी तरह के प्रतिबंध लागू हैं। बेल्जियम के एक शहर में सड़कों पर कोई औरत बुर्का या नक़ाब पहनकर नहीं निकल सकती। हालैंड के पिछले चुनाव में बुर्का काफी महत्वपूर्ण मुद्रदा बन गया था। ब्रिटेन के स्कूलों को कानूनी अधिकार है कि वे ऐसी अध्यापिकाओं को निकाल बाहर करें, जो अपना चेहरा नक़ाब या बुर्के में छिपा कर आती हैं। 1981 से ट्रयूनीसिया में बुर्के पर प्रतिबंध है। यह भी उत्तर अफ्रीका का मुस्लिम देश है|


     कहने का मतलब यही है कि बुर्के पर प्रतिबंध लगानेवाले सारकोजी पहले नेता नहीं होंगे लेकिन बुर्के पर प्रतिबंध लगाकर न तो वे फ्रांस का भला करेंगे और न ही मुस्लिम औरतों का ! बुर्के से फ्रांस की संस्कृति कैसे चौपट होती है, क्या वे बताएँगे ? बुर्के से फ्रांस की संस्कृति नष्ट होती है और बिकिनी से उसकी रक्षा होती है, यह कौनसा तर्क है ? बुर्का ज्यादा बुरा है या बिकिनी ? बुर्का पहननेवाली औरतें खुद को नुकसान पहुँचाती हैं लेकिन चोली-चड्रडीवाली औरतें सारे समाज को चौपट करती है।| फ्रांस ने औरत को वासना का थूकदान बनाने के अलावा क्या किया है ? फ्रांसीसी समाज में स्वतंत्र्ता और मानव अधिकार के नाम पर औरत मर्दों की उद्रदाम वासना का पात्र बनकर रह गई है। बुर्के पर प्रतिबंध लगाने के पहले बिकिनी पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाता ? यदि बुर्का पुरुषों की दमित वासना का पिटारा है तो क्या बिकनी उनकी नग्न-वासना को निमंत्रण नहीं है ?


       सारक़ोजी का यह तर्क भी गलत है कि बुर्का फ्रांस की धर्म-निरपेक्ष व्यवस्था के विरूद्घ है। धर्म-निरपेक्ष या सेक्यूलर होने का अर्थ क्या है ? क्या यह कि जो अपने-जैसा न दिखे, वह सेक्यूलर नहीं है। सेक्यूलर होने के लिए क्या सबको एक-जैसा दिखना जरूरी है ? क्या विविधता और सेक्यूलरिज्म एक-दूसरे के दुश्मन हैं ? यदि बुर्का इस्लाम का प्रतीक है, संप्रदाय-विशेष का प्रतीक है तो टाई क्या है, क्रॉस क्या है, यहूदी-टोपी क्या है ? क्या ये धार्मिक और सांप्रदायिक प्रतीक नहीं हैं ? इन पर प्रतिबंध क्यों नहीं है ? फ्रांसीसी नागरिक होने के बावजूद यदि सिख पगड़ी नहीं पहन सकते तो फ्रांसीसी सरकार आखिर चाहती क्या है ? इसके पहले कि वह फ्रांस के सिखों और मुसलमानों को बदले, वह फ़्रांस को ही बदल डालेगी। यह प्रतिबंधोंवाला फ्रांस लोकतांत्रिक नहीं, फाशीवादी फ्रांस बन जाएगा। फ्रांसीसी राज्य क्रांति अब शीर्षासन करती दिखाई पड़ेगी। सारकोजी राबिस्पियर के नए संस्करण बनकर अवतरित होंगे।


   बेहतर तो यह होगा कि मुस्लिम औरतों को बुर्का पहनने की पूरी छूट दी जाए, जैसी कि कैथोलिक सिस्टर्स को शिरोवस्त्र रखने की छूट है। क्या सारकोजी मदर टेरेसा का पल्लू हटवाने की भी हिमाकत करते ? यदि कोई घोर पारंपरिक हिंदू महिला फ्रांस की नागरिक है और वह एक हाथ लंबा घूंघट काढ़े रखना चाहती है तो उसे वैसा क्यों नही करने दिया जाए ? उसके नतीजे वह खुद भुगतेगी। उन्हें कई नौकरियाँ बिल्कुल नहीं मिलेंगी। उन्हें कोई ड्राइवर या पायलट कैसे बनाएगा ? वे शल्य-चिकित्सा कैसे करेंगी ? वे ओलंपिक खेलों में हिस्सा कैसे लेंगी ? वे समाज में मज़ाक और कौतूहल का विषय बनेंगी। वे तंग आकर खुद तय करेंगी कि उन्हें बुर्का या पर्दा रखना है या नहीं। नागरिक को अपने लिए जो फैसला करना चाहिए, वह अधिकार सरकार क्यों हथियाना चाहती है ?



     इस पहल के पीछे सारकोज़ी का इरादा कुछ और ही हो सकता है| वे बुर्के से नहीं, मुसलमानों से डर रहे होंगे। अल्जीरिया, तुर्की, ईरान आदि देशों से आकर फ्रांस में बसे 30-40 लाख मुसलमानों ने अपनी आवाज़ में कुछ दम भी पैदा कर लिया है। कुल आबादी का 7-8 प्रतिशत होना मामूली बात नहीं है। अब संसद और मंत्रिमंडल में भी उनके लोग हैं। फ्रांसीसी मुसलमानों ने पिछले कुछ वर्षों में दंगे और आगज़नी में भी जमकर भाग लिया। डेनमार्क में उठे पैगम्बर के कार्टून-विवाद ने सारे यूरोप की नसों में सिहरन दौड़ा दी थी ।फ्रांस को यह डर भी है कि बुर्का आतंकवाद को बढ़ाने में सहायक हो सकता है। बुर्के में छिपा चेहरा किसी का भी हो सकता है, पुरूष आतंकवादी का भी। अल्जीरिया के क्रांतिकारियों ने बुर्के की ओट में कभी काफी धमाके किए थे। ऐसे बुर्काधारियों पर सरकार कड़ी निगरानी रखे, यह जरूरी हैं लेकिन उन पर प्रतिबंध लगाने की कोई तुक नहीं है। कुल 30 लाख मुसलमानों में औरतें कितनी हैं और उनमें भी बुर्केवालियाँ कितनी होंगी ? कुछेक हजार बुर्केवाली औरतों पर निगरानी रखने के लिए सारक़ोजी अपने लोकतंत्र को फाशीवादी राज्य में क्यों बदलना चाहते हैं ? फ्रांस अपने आपको सउदी अरब और ईरान के स्तर पर क्यों उतारना चाहता है ? इन देशों में बुर्का या चादर पहनना अनिवार्य है। यह उलट-प्रतिबंध है। इन राष्ट्रों में औरतों ने लाख बगावत की लेकिन उनकी कोई सुननेवाला नहीं है। यदि फ्रांस अपनी मनमानी करेगा तो इस्लामी जगत की औरतों पर प्रतिबंधों का शिकंजा ज्यादा कसेगा। जो मुस्लिम औरतें बुर्का, चादर, हिजाब आदि को मध्ययुगीन पोंगापंथ मानती हैं, वे भी बुर्के के पक्ष में बोलने लगेंगी। सारक़ोजी अपने दुराग्रह के कारण बुर्के को मजबूत बना देंगे।



सारक़ोजी का दुराग्रह इस्लाम के पुनर्जागरण की बाधा बनेगा| जो मुल्ला-मौलवी कुरान-शरीफ की प्रगतिशील व्याख्या कर रहे हैं और मुस्लिम औरतों को अरबी मध्ययुगीनता से बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं, सारक़ोजी उन्हें कमज़ोर करेंगे| सारकोजी की पहल के पीछे चाहे कोई दुराशय न हो लेकिन उनका यह कदम बुर्के पर नहीं, इस्लाम पर प्रहार माना जाएगा| विश्व-आतंकवाद के कारण इस्लाम पहले से ही सकपकाया हुआ है| अब सारकोजी का यह कदम उसे हमलावर बनने के लिए उकसाएगा|


 



भाषा की मर्यादा की रक्षा के लिए *

5 COMMENTS
पुस्तक चर्चा  
भाषा की मर्यादा की रक्षा के लिए *
 


निस्संदेह समय बदल गया है और हम नवजागरण काल में नहीं उत्तरआधुनिक काल में जी रहे हैं , तथापि जिन कुछ चीज़ों की प्रासंगिकता आज भी नहीं बदली है उनमें एक है राष्ट्र और राष्ट्रभाषा का वह संबंध जिसे पारिभाषित करते हुए भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा था - निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति कौ मूल / बिन निज भाषा ज्ञान के , मिटे न हिय कौ सूल. भारतेंदु की चिंता का आधार था हम भारत के लोगों का अंग्रेजी-मोह. वह अंग्रेजी-मोह अपने विकट रूप में आज भी जीवित है और भारतीय जीवनमूल्यों को हानि पहुँचाने के साथ हमारे भाषायी गौरव को लगातार क्षीण कर रहा है.यह देखकर किसी भी देशप्रेमी भारतीय को खेद ही हो सकता है कि हमारा भाषायी स्तर दिनोदिन गिरता जा रहा है तथा हमारे समाज की भाषायी समझ कुंठित हो रही है. इसमें संदेह नहीं कि हिंदी आज अंतरराष्ट्रीय भाषा है और वैधानिक रूप से विश्व भाषा की सारी योग्यताएँ उसमें हैं . प्रसन्नता की बात यह है कि अंग्रेजी - मोह के बावजूद हिंदी का प्रचार - प्रसार भी बढ रहा है. अधिक उचित यह कहना होगा कि आज के तकनीकी क्षेत्रों में उसका व्यवहार बढ़ रहा है, इससे एक बार फिर हिंदी को निर्भ्रांत रूप में व्याकरणसम्मत सिद्ध करने की चुनौती सामने है.



हिंदी भाषा के उज्ज्वल स्वरूप का भान कराने के लिए यह आवश्यक है कि उसकी गुणवत्ता, क्षमता, शिल्प-कौशल और सौंदर्य का सही-सही आकलन किया जाए, इस आकलन में एक बड़ी बाधा यह रही है कि भाषा के स्वरूप का ज्ञान करानेवाला हमारा व्याकरण अंग्रेजी भाषा के व्याकरणिक ढाँचे से आवश्यकता से अधिक जकड़ा हुआ है. ज़रूरत इस चीज़ कि है कि हिंदी व्याकरण को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाए कि वह अंग्रेजी की अनुकृति लगने के स्थान पर हिंदी की प्रकृति और प्रवृत्ति का आइना बन सके. यदि ऐसा किया जा सके तो सहज ही सब की समझ में यह आ जाएगा कि -


१. संसार की उन्नत भाषाओं में हिंदी सबसे अधिक व्यवस्थित भाषा है, 
२. वह सब से अधिक सरल भाषा है, 
३. वह सब से अधिक लचीली भाषा है,  
४, वह एक मात्र ऐसी भाषा है जिसके अधिकतर नियम अपवादविहीन हैं तथा 
५. वह सच्चे अर्थों में विश्व भाषा बनने की पूर्ण अधिकारी है, 
 
 
लंबे समय से महसूस किए जा रहे इस अभाव की पूर्ति के लिए व्यक्तिगत और संस्थागत स्तर पर कई तरह के प्रयास हुए हैं , परंतु डॉ. बदरीनाथ कपूर द्वारा प्रस्तुत 'नवशती हिंदी व्याकरण' इस दिशा में सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सफल प्रतीत होता है. डॉ. बदरीनाथ कपूर हिंदी के वरिष्ठतम भाषाविदों में से हैं. वे प्रतिष्ठित कोशकार हैं तथा भाषाचिंतन के क्षेत्र में आज भी सक्रिय है. उन्होंने कई वर्ष के दीर्घ अध्यवसाय से यह व्याकरण तैयार किया है, यह जानना रोचक होगा कि कुछ समय पूर्व जब वे शारीरिक उत्पातों और व्याधियों से इस प्रकार त्रस्त थे कि ३-४ वर्ष तक उन्हें शय्याग्रस्त रहना पड़ा, तब उन्होंने व्याकरण सम्बन्धी चिंतन -मनन में ही संबल प्राप्त किया , कदाचित ऐसा संबल जिसने जीवनरक्षक औषधि का काम किया. इससे व्याकरण चिंतन के साथ उनके गहन तादात्म्य का अनुमान किया जा सकता है. विवेच्य पुस्तक उनके इसी चिंतन से प्रकट नवनीत है. यह आधुनिक हिंदी का वैज्ञानिक पद्धति से तैयार किया गया अकेला व्याकरण है जो नियमों और प्रयोगों को आमने सामने रख कर उदाहरणों के साथ सही और गलत भाषा व्यवहार की पहचान कराता है. डॉ. बदरीनाथ कपूर की यह स्थापना प्रेरणास्पद है कि - 
 
 
"व्याकरण नियमों का पुलिंदा भर नहीं होता, वह भाषाभाषियों की ज्ञान गरिमा, बुद्धि वैभव , रचना कौशल, सौंदर्य बोध, सजग प्रवृत्ति और सर्जनक्षमता का भी परिचायक होता है. अकेली 'अष्टाध्यायी' ने संस्कृत भाषा को विश्व में जितना गौरव दिलाया उतना किसी अन्य विधा के ग्रंथ ने नहीं. अतः व्याकरण पर नाक-भौंह सिकोड़ना नहीं चाहिए बल्कि उसके प्रति पूज्य भाव रखना चाहिए. व्याकरण भाषा की मर्यादा की रक्षा के लिए समाज को प्रेरित करता है."

विवेच्य पुस्तक में कुल अस्सी पाठ हैं, जिनमें व्याकरण संबंधी सभी विषय और तथ्य समाहित हैं. खास बात यह है कि हर पाठ में बाएँ पृष्ठ पर नियम और उदाहरण हैं, तथा दाहिने पृष्ठ पर अभ्यास दिए गए हैं , जिसके कारण यह पुस्तक स्वयं-शिक्षक बन गई है. आरम्भ में ही 'कुछ नवीन तथ्य' शीर्षक से हिंदी की प्रक्रति और प्रवृत्ति के उस वैशिष्ट्य को उजागर किया गया है जो इस भाषा को संस्कृत और अंग्रेजी दोनों की रूढ़ व्यवस्थाओं से स्वतंत्र अपनी व्यवस्था के निर्माण के लिए प्रेरित करता है. चाहे कर्ता की पहचान हो या कर्म की, क्रियापदों के वर्गीकरण की बात हो या संयुक्त क्रियाओं की, वाच्य की चर्चा हो या काल की - इन सभी स्तरों पर हिंदी के निजीपन को रेखांकित और व्याख्यायित करने के कारण यह व्याकरण छात्रों और अध्यापकों के साथ ही सामान्य पाठकों के लिए भी हिंदी का ठीक प्रयोग सीखने में बहुत मददगार साबितहोगा, इसमें दो राय नहीं. 
 
 
लेखक ने अब तक चले आ रहे व्याकरणों में दिए जाने वाले रूढ़ हो चुके उदाहरणों से आगे बढ़ कर हर पाठ में आधुनिक जीवन संदर्भ वाले ऐसे उदाहरण शामिल किए हैं जो पर्याप्त रोचक और सरस हैं. जैसे - वह हमारा सलामी बल्लेबाज है./वह हमारे देश की प्रधानमंत्री थीं/हमें ठंडी आइसक्रीम खाने के लिए नहीं मिली थी/मोबाइल काम कर रहा है/आतंकियों ने सिपाही पर गोली चलाई/जिनके घर जले, उन्होंने प्रदर्शन किया.



यद्यपि लेखक ने भाषा मिश्रण को खुले मन से स्वीकार किया है, तथापि ऐसे प्रयोगों की व्याकरणिकता पर भी विचार करने की आवश्यकता थी जो मानक के रूप में स्वीकृत न होते हुए भी शैलीभेद के रूप में प्रचुरता में प्रयुक्त हैं. ऐसे तमाम प्रयोगों को समेटे बिना हिंदी के बोलीय आधार को पूरी तरह संतुष्ट नहीं किया जा सकता. संभवत: चूक से ही सही पर एक ऐसा वाक्य पुस्तक में आ भी गया है -' क्रिकेट खेलने वाले देशों के लोग सचिन तेंदुलकर का नाम अवश्य सुने होंगे'.



पुस्तक की उपादेयता को तीन परिशिष्टों में दी गई शब्द सूचियों, अभ्यासों के उत्तर और विवेचित विषयों की अनुक्रमणिका ने और भी बढा दिया है. इस यथासंभव परिपूर्ण , नवीन, सरल और सरस व्याकरण को सामने लाने के लिए राजकमल प्रकाशन बधाई के पात्र हैं.



- ऋषभ देव शर्मा


*नवशती हिंदी व्याकरण /

डॉ. बदरीनाथ कपूर / 
राजकमल प्रकाशन , १-बी , नेताजी सुभाष मार्ग, 
नई दिल्ली - ११० ००२ /
२००६ / ९५ रुपये / २३६ पृष्ठ.  


यहीं हैं, यहीं कहीं हैं शैलेंद्र सिंह : आलोक तोमर

4 COMMENTS




यहीं हैं, यहीं कहीं हैं शैलेंद्र सिंह

आलोक तोमर


अक्सर नोएडा में अपने टीवी चैनल सीएनईबी के दफ्तर जाते वक्त आम तौर पर यह संयोग होता ही था कि फोन बजे और दूसरी ओर से शैलेंद्र सिंह बोल रहे हो। पहले इधर उधर की बातें, फिर अपनी कोई ताजा कविता और आखिरकार टीवी चैनलों की दुनिया से हुआ मोहभंग, जिसका सार यह होता था कि कौन सी दुनिया में आ कर फँस गए?


शैलेंद्र सिंह से करीब बीस साल पहले मुलाकात हुई थी जब वे काम तलाशते हुए कनॉट प्लेस में शब्दार्थ फीचर एजेंसी के दफ्तर में आए थे। पतला दुबला लड़का और पतली आवाज। उन दिनों मैं अपराध का एक स्तंभ लिखता था वह उन्हें पढ़ने को दिया। अगले दिन शैलेंद्र प्रकट हुए और दो लेख लिख कर लाए थे और मेरे लेख का अंग्रेजी अनुवाद भी कर लाए थे। अंग्रेजी ऑक्सफोर्ड वाली नहीं थी मगर अच्छी थी। इसके बाद वे शब्दार्थ से जुड़े रहे और कहने में अटपटा लगता है लेकिन पाँच हजार रुपए महीने में काम करते रहे।


इसके बाद जब इंटरनेट प्रचलित हुआ तो डेटलाइन इंडिया की स्थापना की। शैलेंद्र वहाँ भी साथ थे और बहुत टटकी भाषा में बहुत जल्दी लेख और खबरें लिखते थे और मुझे याद है कि उन दिनों हमारे साथ काम कर रहे दीपक वाजपेयी से, जो अब एनडीटीवी में है, उनकी प्रतियोगिता चलती थी। दीपक की भी अंग्रेजी अच्छी है। दीपक कानपुर और शैलेंद्र बिहार के लहजे में अंग्रेजी बोलते थे।
फिर एक दिन शिद्वार्थ बसु के साथ तय हुआ कि अंग्रेजी के मशहूर कार्यक्रम हू विल वी दि मिलियनायर की तर्ज पर स्टार प्लस के लिए कार्यक्रम बनाया जाए। स्टार के तब के वाइस प्रेसीडेंट समीर नायर कार्यक्रम संचालक के तौर पर अमिताभ बच्चन को लेना चाहते थे। अमिताभ लिए भी गए और कौन बनेगा करोड़पति के नाम से इस कार्यक्रम ने इतिहास रच दिया। प्रश्न बनाने और पटकथा लिखने की टीम में शैलेंद्र फिर हमारे साथ थे। याद आता है कि मुंबई में स्टार की मास्टर पीस बिल्डिंग में रिहर्सल चल रही थी और फोटोग्राफर मौजूद था। मैने शैंलेद्र से कहा कि अमिताभ बच्चन के साथ फोटो खिंचवाने का ये अच्छा मौका है। शैलेंद्र का जवाब मुझे चकित कर गया। उसने कहा कि फोटो खिंचवा कर महान बनने से अच्छा है कि अपने फील्ड में ऐसा काम किया जाए अमिताभ बच्चन खुद हमारे साथ फोटो खिंचवाने आए।


वक्त की कमी और बार बार मुंबई जाने की असुविधा के कारण मैंने केबीसी छोड़ा और स्टार प्लस के लिए ही एनडीटीवी द्वारा बनाए गए कार्यक्रम जी मंत्री जी की पटकथा लिखने में जुट गया। शैंलेद्र केबीसी में बने रहे। इस बीच आज तक से बुलावा आया और कुछ महीनों के लिए मैं आज तक में था और शैलेंद्र रोज शाम को ऑफिस के रिसेप्शन पर मिलते थे कि उन्हें टीवी की पत्रकारिता करनी है। उदय शंकर से कह कर उनका इंटरव्यू हुआ और अपनी प्रतिभा के आधार पर ही वे आज तक में पहुंचे। उदय जब स्टार में गए तो शैलेंद्र को साथ ले गए। शैलेंद्र मुंबई में शायर बन गए। निदा फाजली जैसे बड़े लोगों के साथ उठने बैठने लगे। एक किताब भी उनकी आई। बाद में दूसरी भी आई।


शैलेंद्र बहुत भावुक और एक हद तक बात बात में रो पड़ने वाले इंसान थे। अपनी बेटी के जन्मदिन पर बुलाया और नहीं जा पाया तो रो पड़े। बेटे आयाम का नाम तय करने में देर लगा दी तो रो पड़े। जान लेने वाली इस दुर्घटना के पहले एक बार और गाड़ी ठोक ली थी और जब डाँट लगाई तो भी रो पड़े। अपने सरोकारों के प्रति जिद्दी इंसान इतना भावुक भी हो सकता है यह शैलेंद्र को देख कर ही जाना जा सकता है।


एक जमाने में होम टीवी हुआ करता था। उसके एक कार्यक्रम की पटकथा तो मैं लिखता था और फैक्स कर देता था लेकिन सेट पर भी एक लेखक चाहिए था तो शैलेंद्र को आजमाया और वे सफल हुए। जहाँ तक याद आता है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संसार से शैलेंद्र का यह पहला वास्ता था।


जैसा कि पहले कहा शैलेंद्र के फोन बहुत बेतुके और अकारण होते थे। आप बैठक में हैं, फोन नहीं उठा पा रहे मगर शैलेंद्र सिंह घंटी बजाते रहेंगे। आखिरकार आप जब फोन सुनेंगे तो वे कहेंगे कि भैया आपकी आवाज सुनने के लिए फोन किया था। आप ठीक तो है? जब राजदीप सरदेसाई शैलेंद्र को आईबीएन-7 में लाए तो लाख से ज्यादा वेतन की पर्ची ले कर उन्होंने मुझे इंडिया टीवी के बाहर बुलाया और कंपनी की ओर से मेरी स्विफ्ट कार भी गर्व से दिखाई। इसी कार ने आखिरकार उनकी जान ली।


मुझे अब तक समझ में नहीं आता कि शैलेंद्र इतने बेतुके काम क्यों करता था? उसके साथी बताते हैं कि रात साढ़े ग्यारह बजे का बुलेटिन प्रसारित होने के बाद अगले दिन का कार्यक्रम बनाते बनाते डेढ़ बज गए और दो बजे वे ऑफिस से निकले। घर गाजियाबाद के वैशाली में हैं मगर वैसे ही ठंडी हवा खाने के लिए वे एक्सप्रेस हाइवे पर मुड़ गए। उल्टी दिशा में। शराब वे इन दिनों नहीं पीते थे लेकिन जहाँ तक मुझे लगता है, पूरा दिन और सुबह तक काम करने के बाद शैलेंद्र को नींद का झोका आया होगा और उन्होंने एक खड़े ट्रक में गाड़ी घुसा दी। ये उनकी अंतिम यात्रा थी।


शैलेंद्र सिर्फ बयालीस साल के थे। इस बीच उन्होंने दो टीवी कार्यक्रमों और तीन चैनलों में काम किया। गजलों और कविताओं की दो किताबें लिख डालीं। गीता का अपनी तरफ से भाष्य कर डाला और उसे सुनाने के लिए वे बहुत उतावले थे, अक्सर फोन पर शुरू हो जाते थे और जैसा उनके साथ रिश्ता था, डाँट खा कर फोन बंद करते थे। आखिरी फोन मौत के दो दिन पहले आया था जिसमें उनका प्रस्ताव था कि मुंबई चल कर सीरियल और फिल्में मैं लिखूँ और उनमें गाना शैलेंद्र लिखेंगे। ऑफिस के गेट पर पहुँच चुका था इसलिए हाँ बोल कर फोन काट दिया। कमरे में पहुँचा तो फोन फिर बजा। शैलेंद्र ही थे और कह रहे थे कि भैया आप अपने आपको गंभीरता से नहीं लेते।


अगर शैलेंद्र आज होते तो मैं पूछता कि बेटा तुमने खुद अपने आपको गंभीरता से कहाँ लिया हैं? इतनी सारी प्रतिभा, काम के प्रति अनुशासन और मेहनत करने की अपार शक्ति के बावजूद अगर शैलेंद्र सिंह ने अपनी जिंदगी के साथ इतना बड़ा निर्णायक खिलवाड़ कर डाला तो वे सिर्फ अपने और हिंदी पत्रकारिता के नहीं, अपनी पत्नी, बेटे आयाम और बेटी आस्था के भी अपराधी है।


यह लिखने के ठीक बाद मैं शैलेंद्र की अंतिम क्रिया में निगमबोध घाट जाऊँगा और उस सपने को जलता हुआ देखूँगा जिसके एक बड़े हिस्से का साक्षी मैं भी रहा हूँ। शैलेंद्र सिंह का फोन नंबर अपने मोबाइल से डिलिट करने की मेरी हिम्मत नहीं है क्योंकि मेरे लिए शैलेंद्र यहीं है, यहीं कहीं हैं। पता नहीं कितने दिनों तक लगेगा कि फोन बजेगा और शैलेंद्र अपना कोई किस्सा कहानी सुनाने लगेगा। सपनों के भी कहीं अंत होते है?





हिन्दी हास्य-परिवार पर एक और संकट ( कवि सुरेन्द्र शर्मा के परिवार में)

6 COMMENTS


हिन्दी हास्य-परिवार पर एक और संकट (कवि सुरेन्द्र शर्मा के परिवार में)




हिन्दी हास्य कविता परिवार पर आसन्न संकटों का क्रम अभी थमा नहीं लगता। ओमप्रकाश आदित्य जी सहित तीन लोगों का प्राणांत, उसी दुर्घटना में घायल इस परिवार के साहित्यिक बंधु , पश्चात् अल्हड़ जी का विदा होना और अब सुरेन्द्र शर्मा जी के परिवार में यह शोक का काल|


अभी अभी आदरणीय कमलकान्त बुधकर जी का संदेश मिला है| जो निस्संदेह दुखद है। मैं दिवंगत आत्मा की शान्ति के लिए विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए आप से बुधकर जी का संदेश बाँट रही हूँ ,जो कुछ यों है -


"हिन्‍दी हास्‍य परिवार पर इन दिनों सचमुच कोई भारी संकट ही है। मेरे पास एक एसएमएस वरिष्‍ठ हास्‍यकवि श्री सुरेन्‍द्र शर्मा की ओर से आया है। उनकी इकतीस वर्षीया पुत्रवधू श्रीमती प्रियता बीते रविवार को अचानक परिवार को बिलखता छोड स्‍वर्ग सिधार गईं। आज हरिद्वार में उनकेपति उनके अंतिम अवशेष गंगा में विसर्जित कर रहे हैं। प्रियता अपने पीछे अपने भरपांच और दो वर्ष की दो बेटियाँ भी बिलखती छोड़ गयी हैं। न्‍दी हास्‍य परिवार पर इन दिनों सचमुच कोई भारी संकट ही है। मेरे पास एक एसएमएस वरिष्‍ठ हास्‍यकवि श्री सुरेन्‍द्र शर्मा की ओर से आया है। उनकी इकतीस वर्षीया पुत्रवधू श्रीमती प्रियता बीते रविवार को अचानक परिवार को बिलखता छोड स्‍वर्ग सिधार गईं। आज हरिद्वार में उनकेपति उनके अंतिम अवशेष गंगा में विसर्जित कर रहे हैं। प्रियता अपने पीछे अपने भरे पूरे परिवार में पांच और दो वर्ष की दो बेटियां भी छोड गई हैं।

भाई सुरेन्‍द्र शर्मा के एसएमएस के अनुसार स्‍वर्गीया प्रियता की आत्‍मशांति के निमित्‍त 26 जून 2009 को शाम 5 से 6 के बीच एक प्रार्थनासभा आईपी कॉलेज और सुश्रुत ट्रोमा सेंटर के पास गुरू जंभेश्‍वर संस्‍थान सिविल लाइंस दिल्‍ली में आयोजित है। "

--


एक गीत `उनके' नाम : जी भर रोया

6 COMMENTS
कुछ दिन की स्तब्ध कर देने वाली घटनाओं के क्रम में आज की सुबह हुई, एक और ऐसा समाचार आया कि सभी अवसन्न रह गएतभी मुझे निम्न संदेश के साथ एक गीत प्राप्त हुआआप भी पढ़ सकते हैं --
कविता वाचक्नवी




प्रिय कविता जी,
यह सप्ताह हिन्दी के हास्य कवियों के लिए बहुत घातक निकला. भोपाल वाली सड़क दुर्घटना के सदमे से उबरा नही था कि आज बड़े भाई श्री उदय प्रताप सिंह जी का sms मिला कि आज अल्हड़ बीकानेरी भी हमसे बिछड़ गए. एक गीत उन सभी दिवंगत कवि मित्रों के नाम , जिनका साथ मुझे 40 वर्षों से मिला था

बुद्धिनाथ



जी भर रोया
*********



रोज एक परिजन को खोया
पाकर लम्बी उमर आज मैं
जी भर रोया।


जिनके साथ उठा-बैठा
पर्वत-शिखरों पर
उनको आया सुला
दहकते अंगारों पर
जो था मुझे जगाता
सारी रात हँसा कर
वह है खुद लहरों पर सोया।


एक-एक कर तजे सभी
सम्मोहन घर का
रहा देखता मैं निरीह
सुग्गा पिंजर का
हुआ अचंभित फूल देखकर
टूट गया वह धागा
जिसमें हार पिरोया।


किसके-किसके नाम
दीप लहरों पर भेजूँ
टूटे-बिखरे शीशे
कितने चित्र सहेजूँ
जिसने चंदा बनने का
एहसास कराया
बादल बनकर वही भिगोया।


- डॉ. बुद्धिनाथ




Related Posts with Thumbnails