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ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (1) (पृथ्वी -केन्द्रित दृष्टि से मुक्ति)

(साप्ताहिक स्तम्भ)



 ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (1) 
(पृथ्वी -केन्द्रित दृष्टि से मुक्ति)
विश्वमोहन तिवारी, पूर्व एयर वाइस मार्शल



विश्व का, कहना चाहिये ब्रह्माण्ड का, सर्वप्रथम तथा सबसे बड़ा आश्चर्य, निस्संदेह स्वयं ब्रह्माण्ड का जन्म है। ब्रह्माण्ड का अन्त चाहे विस्फोट में हो या टाँय टाँय फिस्स में हो उसका जन्म एक विस्फोट से हुआ है। विस्फोट के पूर्व समस्त ब्रह्माण्ड एक बिन्दु में समाया था। वह बिन्दु अकल्पनीय रूप से छोटा था, और ब्रह्माण्ड अकल्पनीय रूप से विराट  है। क्या इससे बड़ा आश्चर्य कुछ हो भी सकता है कि उस सूक्ष्मतम बिन्दु से इस विराटतम ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ है। बिन्दु और उसकी विराटता की कल्पना असंभव ही कहलाएगी किन्तु खगोल वैज्ञानिकों ने उस सब की गणना कर ली है।गणित तो अकल्पनीय को भी अंकों में सीमित कर दे या बाँध दे, अकथनीय को कह दे।



13.7 अरब प्रकाश–वर्षों ( 130 लाख करोड़ अरब किमी गहरे (एक प्रकाश–वर्ष में 9.5 लाख करोड़ किमी होते हैं)) गहरे इस ब्रह्माण्ड के गूढ़तम रहस्यों को क्या यह मात्र तेरह सौ घन से. मी. के आयतन वाला हमारा मन मस्तिष्क खोल सकता है? तब भी मानव ने आदि काल से इन रहस्यों को खोलने का प्रयत्न किया है चाहे उसमें यूनानियों का यह विश्वास हो कि आकाशीय गोल तारे वे छिद्र हैं जिनमें से हमें सृष्टि रचना की जलती आग दिखाई देती है, या भारतीय ऋषियों का विश्वास कि आकाशीय पिंड विभिन्न लोक हैं जहाँ की यात्राएँ की जा सकती हैं। खगोल के नक्षत्रों की कुछ जानकारी, जिसे ज्योतिष ज्ञान कहते हैं, हजारों वर्ष पहिले आदमी ने अवलोकन से प्राप्त कर ली थी जिन्हे उसने 27 नक्षत्र मण्डलों में बाँटा तथा जिसका उपयोग उसने फलित ज्योतिष के लिये किया। नक्षत्रों वाला ज्योतिष ज्ञान विज्ञान है किन्तु ‘फलित ज्योतिष’ विज्ञान नहीं है। तारे छिद्र तो नहीं हैं किन्तु उनमें सृष्टि रचना की आग अवश्य जलती है जिसके अध्ययन के द्वारा हम सृष्टि के रहस्य खोल सकते हैं। और अन्तरिक्ष विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का सबसे मनोहर स्वप्न है अन्तरिक्ष यात्रा।




इन धू धू कर जलते हुए पिण्डों के रहस्य खोलने के लिये अपार धन तथा ऊर्जा खर्च करने में क्या रखा है, जबकि इस सुनील ग्रह की शस्य श्यामला हरित भूमि पर गरीबी का श्राप मानव जाति को दुखी कर रहा है? और वास्तविकता यह है कि ज्यों ज्यों ब्रह्माण्ड के रहस्य खोले गए हैं, मानव ने प्रकृति के नियमों को खोजा है तथा विज्ञान एवं औद्योगिक प्रगति बढ़ती गई है। सोलहवीं शती में कोपर्निकस की खोज (आगे देखें) के बाद ही पश्चिम ने बाइबिल के स्वर्ग का मोह छोड़कर इस जीवन को समुन्नत करना प्रारम्भ किया।



मानव मन स्वयं अत्यन्त रहस्यमय है, और वह स्वयं ही रहस्य खोलने के लिये सदा सहज ही तत्पर रहता है, चाहे वे रहस्य जासूसी उपन्यासों के हों, या ब्रह्माण्ड के। मन तथा ब्रह्माण्ड के रहस्यों को खोलने में प्रबुद्ध तथा रचनाशील व्यक्ति हजारों वर्षों से लगे हुए हैं क्योंकि इन रहस्यों को खोलना हमारे लिये सबसे बड़ी चुनौती है तथा सर्वाधिक आनन्ददायक तथा लाभदायक भी है। ऋषियों तथा चिन्तकों ने ब्रह्माण्ड के रहस्यों को खोलने में अपनी अन्तर्दृष्टि या रचनाशीलता का उपयोग कर अद्भुत मिथक दिये हैं। हो सकता है उनमें विज्ञान हो जिसे सिद्ध करना शेष है, किन्तु उन मिथकों के अद्भुत अर्थ निकलते हैं जो मानव–मन की जानकारी अधिक देते हैं, ब्रह्माण्ड की कम।



पाँचवीं से सत्रहवीं शती तक
पहिले मनुष्य यही मानते थे कि पृथ्वी स्थिर है, केन्द्र में है तथा सूर्य सहित अंतरिक्ष के सभी नक्षत्र उसकी परिक्रमा करते हैं, यही आँखों देखा हाल निर्विवादित सत्य लगता था। ईसा की पाँचवीं शती में विश्व में ब्रह्माण्ड का एक रहस्य सर्वप्रथम भारत में खोजा गया। उस समय बिना किसी दूरदर्शी की सहायता के आर्यभट ने सौर मंडल का उस काल के लिए एक अत्यन्त अविश्वसनीय किन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक रहस्य खोला था। और आश्चर्यजनक था कि कैसे, किन गणनाओं का विवेचन कर यह् अद्भुत खोज की गई थी !! भारत में भी वैज्ञानिकों ने इस पर बहुत वाद-विवाद किये। तथा जिसे स्वीकार करने में शेष मानव जाति को एक हजार वर्ष और लगे, – कि सौरमंडल में सूर्य स्थिर है तथा पृथ्वी अपने अक्ष पर प्रचक्रण करती हुई सूर्य की परिक्रमा करती है; कि ग्रहण छाया पड़ने के कारण पड़ते हैं न कि राक्षसों के कारण। इसे सोलहवीं शती में स्वतंत्र रूप से कोपरनिकस ने पाश्चात्य जगत में स्थापित किया। बारहवीं शती में भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण के तीनों नियम खोज निकाले थे, किन्तु इन्हें वैज्ञानिक पद्धति से सिद्ध नहीं किया था। यह् कुछ उसी तरह था जैसे पाइथागोर का प्रमेय युक्लिड के पहले पाइथागोर को ज्ञात था, और उनके भी पहले शुल्व सूत्र नाम से भारतीय ऋषियों को ज्ञात था, किन्तु प्रमाण तो यूक्लिड ने ही दिया था। इसके साथ भारत में की गई अन्य वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी खोजों तथा आविष्कारों से यह प्रमाणित होता है कि यह आध्यात्मिक भारत बारहवीं शती तक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा आर्थिक समृद्धि में विश्व में सर्वाग्रणी था। गति के नियमों को सत्रहवीं शती में स्वतंत्र रूप से न्यूटन ने वैज्ञानिक रूप से स्थापित किया। और देखा जाए तो इन वैज्ञानिक तथ्यों की स्वीकृति के बाद ही पाश्चात्य संसार में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास का ‘बिग बैंग’ (महाविस्फोट) हुआ।




दूरदर्शी
सत्रहवीं शती के दूरदर्शी के आविष्कार तक, पाश्चात्य जगत सौरमंडल को ही समस्त ब्रह्माण्ड मानता था, 1609 में गालिलेओ ने छोटे से दूरदर्शी की सहायता से बृहस्पति ग्रह के चार चाँद देखे तो मानो दूरदर्शी में ही चार चाँद लग गये। और तब से विशाल से विशालतर दूरदर्शी बने जिनसे हम अब लगभग दस अरब प्रकाश–वर्ष (95 लाख करोड़ अरब किमी.) की दूरी तक के नक्षत्रों, मन्दाकिनियों तथा नीहारिकाओं को देख सकते हैं। फिर हजारों मीटरों तक के क्षेत्र में फैले रेडियो दूरदर्शी बनाए गये और अब तो भारतीय मूल के नोबैल पुरस्कृत खगोलज्ञ एस. चन्द्रशेखर के सम्मान में निर्मित उपग्रह स्थित ‘चन्द्र एक्स–किरण’ वेधशाला है जो पृथ्वी के वायुमंडल के पार से ब्रह्माण्ड के रहस्यों को खोल रही है।गुरुत्वाकर्षण तरंगों पर तथा शून्य (निश्चल अवस्था में) या अल्पतम द्रव्यमान तथा आवेशरहित न्यूट्रिनो कणों पर खोज हो रही है।




मजे की बात है कि दूरदर्शी या अन्य उपकरण या वैज्ञानिक कुछ रहस्यों को खोलते हैं तो कुछ नवीन रहस्यों को उत्पन्न भी करते हैं। जब ब्रह्माण्ड में पिण्ड दिखे तो प्रश्न आया कि ये अतिविशाल जलते हुए पिण्डों का निर्माण किस तरह हुआ, मन्दाकिनियों, मन्दाकिनी–गुच्छों, फिर मन्दाकिनी–मण्डलों और फिर मन्दाकिनी–चादरों का निर्माण कैसे होता है? ब्रह्माण्ड का उद्भव तथा विकास कैसे हुआ?


क्रमशः 




ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (1) (पृथ्वी -केन्द्रित दृष्टि से मुक्ति) ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (1)   (पृथ्वी -केन्द्रित दृष्टि से मुक्ति) Reviewed by Kavita Vachaknavee on Thursday, December 03, 2009 Rating: 5

4 comments:

  1. मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो काबिले तारीफ है!
    मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है!

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  2. अच्छी जानकारी। धन्यवाद।

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  3. टुंइया से दिमाग में दुनिया भर की चीजें कैसे आ जाती हैं यह सच में दिलचस्प है।

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  4. विश्वमोहन तिवारी जी को बहुत बहुत धन्यवाद इस प्रथम स्तर के लेख के लिए.

    - अजय कुलश्रेष्ठ

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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