क्या दिक (अंतरिक्ष) ही वक्र है ?

मौलिक विज्ञान-लेखन 
(साप्ताहिक स्तम्भ) 

गतांक से आगे

क्या दिक (अंतरिक्ष) ही वक्र है ?
विश्व मोहन तिवारी

अंतरिक्ष में चाहे मन्दाकिनियाँ  बहुत दूर दूर हों किन्तु उन में द्रव्य भारी मात्रा में होता है. अत: अंतरिक्ष (space) में प्रकाश किरण बहुत दूर तक सरल रेखा में गमन नहीं कर सकतीं . किन्तु प्रकाश के इस व्यवहार के कारण क्या हम कह सकते हैं कि अंतरिक्ष (space) ही वक्र है ? अंतरिक्ष शब्द से हमेशा वह ध्वनि नहीं निकलती जो space शब्द से यहाँ निकल रही है. space के बिना पदार्थ का अस्तित्व हो ही नहीं सकता, यदि space ही नहीं होगा तब पदार्थ कहाँ रहेगा ! अंतरिक्ष का सामान्य अर्थ है वह space जो हमारी पृथ्वी से लगभग ३०० किलो मीटर बाहर हो। और अंतरिक्ष भी दिक् का ही एक अंश है। अत: space के लिये उपयुक्त शब्द है 'दिक'। तो प्रश्न हुआ, ' क्या दिक ही वक्र है?' किन्तु इसके पहले थोडा और देखें कि क्या है यह 'दिक'।  



ताजे अवलोकनों से सृष्टि के उद्भव का महान विस्फ़ोट सिद्धान्त सिद्ध हो चुका है। इसके अनुसार ब्रह्माण्ड का जन्म लगभग १३.७ अरब वर्ष पहले हुआ था। उसके पूर्व ब्रह्माण्ड का समस्त पदार्थ और ऊर्जा एक अकल्पनीय सूक्ष्म बिन्दु में समाहित था। वह बिन्दु निश्चित ही एक परमाणु से भी छोटा था. फ़िर अचानक विस्फ़ोट हुआ और वह बिन्दु बहुत ही तीव्र वेग से फ़ैलने लगा। ( इस विषय पर उपनिषदों के कथन आश्चर्यचकित करते हैं. कठोपनिषद (१.२.२०) में एक मन्त्र है : “ अणोरणीयान महतो महीयान आत्मस्य जन्तो निहितो गुहायाम. . . “ अर्थात अणु से भी सूक्ष्म अणु और विशालतम से भी विशाल गुहा में आत्मा वास करती है। इसके साथ छान्दोग्य उपनिषद (३.२.३) के इस मन्त्र को रखा जाए : “तपो ब्रह्मेति" तप या ताप ही ब्रह्म है. और भी कि संस्कृत में 'ब्रह्म' शब्द का अर्थ ही विस्तार करना है ! तब लगता है कि ऋषि इसी उद्भव का वर्णन कर रहे हैं !) वह बिन्दु इतने वेग से फ़ैलने लगा कि एक सैकैन्ड के सूक्ष्म अंश में वह हजारों प्रकाश वर्षो लम्बा चौडा हो गया, लगभग एक मंदाकिनी के परिमाण के बराबर !! और उसका तापक्रम जो पहले करोडों करोड शतांश था, अब इतना ठन्डा हो गया कि हजारों करोड़ शतांश हो गया और ऊर्जा पदार्थ के सूक्ष्म कणों में बदलने लगी और वे कण पुन: ऊर्जा में बदलने लगे, और मात्र एक सैकैन्ड के बाद प्रोटान, न्यूट्रान आदि बनने लगे. और तीन मिनिट में और भी विस्तार के कारण तापक्रम ठंडा होकर लगभग एक अरब (सौ  करोड़) शतांश हो गया और तब उन कणों से परमाणु के नाभिक बनने लगे, और थोड़े ही समय अर्थात्  लगभग तीन लाख वर्षों के बाद तापक्रम ठंडा होकर लगभग ३००० शतांश हुआ। अब इलैक्ट्रान हाड्रोजन के नाभिकों की परिक्रमा करने लगे, अर्थात तत्व बनने लगे। ब्रह्माण्ड के दिक का विस्तार तो लगातार चल रहा है। यह समस्त अकल्पनीय विशाल दिक उसी सूक्ष्मातिसूक्ष्म बिन्दु के बराबर दिक का विस्तार है। मजेदार बात यह है कि जब महान विस्फ़ोट हुआ था तब दिक्काल और ऊर्जा ( जिसमें पदार्थ निहित है) एक साथ ही निर्मित हुए थे. अर्थात उस आश्चर्य जनक शून्य के परिमाण वाले मूल बिन्दु का विस्फ़ोट दिक में नहीं हुआ था क्योंकि विस्फ़ोट के पहले उस अद्भुत शून्य परिमाण वाले बिन्दु के बाहर दिक था ही नहीं। उस सूक्ष्मातिसूक्ष्म बिन्दु में समाहित दिक का ही विस्फ़ोट हुआ था।  



आखिर दिक है क्या? आइन्स्टाइन की यह अवधारणा सर्वमान्य है कि बिना दिक के पदार्थ नहीं हो सकता और बिना पदार्थ के दिक भी नहीं रह सकता। पदार्थ और दिक का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। क्या वह अतिविशाल दिक जो मन्दाकिनियों के बीच में है जिसमें पदार्थ नहीं है, शून्य है? नहीं वह दिक शून्य नहीं। क्योंकि दिक में सतत ऊर्जा का प्रसारण होता रहता है, और, शून्यतम दिक में भी पदार्थों के सूक्ष्म कण सदा ही मौजूद रहते हैं चाहे उनका घनत्व बहुत कम ही क्यों न हो । आइन्स्टाइन ने एक और क्रान्तिकारी अवधारणा दी थी. दिक एवं काल का अटूट सम्बन्ध है, इतना कि अब उसे 'spacetime continuum' अर्थात 'दिक्काल सांतत्यक' की संज्ञा दी गई है. न्यूटन तो दिक और काल को निरपेक्ष और एक दूसरे से स्वतंत्र मानते थे। अब वैज्ञानिक दिक्काल को चतुर आयामी मानते हैं, तीन आयाम तो दिक के और एक आयाम काल का, यद्यपि काल का आयाम दिक के आयाम से गुणों में भिन्न है।



क्या दिक (space) की वक्रता की अवधारणा विचित्र नहीं है ? आखिर दिक कोई चादर या कोई पदार्थ तो नहीं जो वक्र हो सके, क्योंकि वक्रता तो पदार्थ का गुण है ? गुरुत्वाकर्षण कणों पर किस तरह कार्य करता है? आइन्स्टाइन के पहले एक व्याख्या के अनुसार गुरुत्वाकर्षण उत्पन्न करने वाला पिण्ड अपने बल का क्षेत्र बनाता है, जिस तरह चुम्बक अपना क्षेत्र बनाता है। यह व्याख्या न्यूट्न की गुरुत्वाकर्षण की अवधारणा की तरह अपर्याप्त है, किस तरह, देखें। यह जो दिक में वक्रता आ रही है गुरुत्वाकर्षण (गुरुत्व बल ) के कारण तो आई है. तब हम थोड़ा गुरुत्वाकर्षण की चर्चा करें. न्यूटन द्वारा गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त की खोज विज्ञान जगत में इतनी क्रान्तिकारी थी कि उस खोज ने न्यूटन को विश्व का श्रेष्ठतम वैज्ञानिक स्थापित कर दिया. किसी भी मूल सिद्धान्त से यह अपेक्षा रहती है कि वह अपने विषय से सम्बन्धित सारी घटनाओं की व्याख्या कर सके. न्यूट्न के सिद्धान्त के द्वारा वेग तथा गुरुत्वाकर्षण के सामान्य मान पर तत्सम्बन्धी घटनाओं की व्याख्या तो तीन सौ वर्षों से सफ़लतापूर्वक हो रही थी. किन्तु उन्नीसवीं सदी के अन्त में बुध ग्रह की स्थिति की वास्तविकता को न्यूटन का सिद्धान्त नहीं समझा पा रहा था, उनके सूत्रों द्वारा बुध ग्रह की जो स्थिति आ रही थी वह वास्तविक स्थिति से भिन्न थी. आइन्स्टाइन के निर्विशेष आपेक्षिकी सिद्धान्त ने जो बुध की स्थिति की प्रागुक्ति की वह वास्तविकता से मेल खा रही थी. अर्थात न्यूट्न का सिद्धान्त गुरुत्व तथा वेग के सामान्य मानों पर ही कार्य करता है. जब कि आइन्स्टाइन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त न केवल वेग तथा गुरुत्व के सामान्य मानों पर कर्य करता हॆ वरन किसी भी वेग पर तथा कितने भी तीव्र गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में सफ़लतापूर्वक कार्य करता है।



न्यूटन तो दिक्काल को निरपेक्ष मानते थे, और आइन्स्टाइन ने दिक्काल को पदार्थ और उसके वेग के सापेक्ष सिद्ध किया. अर्थात दिक एवं काल का पदार्थ से अटूट सम्बन्ध है, अर्थात पदार्थ की उपस्थिति दिक्काल को प्रभावित करती है। देखना यह है कि किस तरह प्रभावित करती है। जिस तरह पृथ्वी का दो आयामों वाला समतल धरातल वक्र होकर लौटकर एक गोलाकार बन जाता है उसी तरह तीन आयामों वाला यह दिक वक्र होकर लौटकर एक 'गोल' बनाता है !

इस वक्रता की बात हम अगले अंक में करेंगे. तब शायद स्थिति कुछ और स्पष्ट हो.

क्रमशः 



2 comments:

  1. बहुत बढिया आलेख ।

    दिक की वक्रता इस बात से भी सिध्‍द होती है कि ब्रहमांड के पिंड एक दूसरे से दूर भाग रहे हैं । अर्थात ब्रहमांड का फैलाव हो रहा है । ऐसा दिक की वक्रता के बिना संभव नहीं ।

    दूसरी बात दिक दिक्‍काल पदार्थ और उसके वेग के सापेक्ष है क्‍योंकि दिक्‍काल स्‍वंय पदार्थ और उसके वेग के सापेक्ष गतिमान है ।


    बिग बैंग के पहले की स्थिति का सबसे बढिया वर्णन ऋग्‍वेद का नासदीय सूक्‍त करता है । यह सब मेरी लालबुझक्‍कडी सूझ है ।

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  2. बहुत ही ज्ञान वर्धक .वैदिक सूक्तियों के साम्य का अद्भुत अवलोकन .हिन्दी में विज्ञानं पर लिखा जाना एक जरूरत है. आप जैसों की बहुत ही.
    बहुत ही धन्यवाद इस आलेख के लिए .

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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