जीवन : ४५ सीखें



जीवन  :  ४५ सीखें 

जीवन के सभी के अपने अपने ढंग होते हैं, अपने-अपने आग्रह और अपनी-अपनी परिस्थितियाँ|  इन सबके बीच जीवन की धार  रस्ता बना  किसी तरह आगे बढ़ती है| अब पता नहीं आगे बढ़ती है या नहीं, किन्तु बढ़ने को शापित  तो होती है | (  इस बढ़ने को यदि चलना कहा जाए तो अधिक सही होगा ) |

कोई सूत्र, कोई मंत्र, कोई उपाय, कोई सीख  यदि इस जीवन को अधिक जीने योग्य बना सके तो सारा क्लेश / क्लेद समाप्त | संसार भागा फिरता है इन सूत्रों की खोज में और ये सूत्र हमारी अपनी मुट्ठी में बंद होते हैं |  मुट्ठी खोल कर देखना चाहेंगे .? .... ( वह गीत याद आ रहा होगा " नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है" | आज यह लिखते हुए उस गीत का एक नया अर्थ ही मानो उद्घाटित हुआ है सम्मुख ) |
   



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