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वेद और विटामिन डी

जीवन और जीवन विज्ञान 




आधुनिक विज्ञान और धारोष्ण गोदुग्ध 
(भारतवर्ष के संदर्भ में ) 
सुबोध कुमार 
(महर्षि दयानन्द गो संवर्धन केन्द्ग, दिल्ली -96) 


कृत्रिम रूप से विटामिन डी बनाने की विधि भी हमारे शाकाहारी समाज के लिए जानने लायक है । बूचड खानों से उपलब्ध गौ की खाल से एक तैलीय पदार्थ प्राप्त किया जाता है, इसे कृत्रिम सूर्य किरणों ( अल्ट्रा वायलेट) से उपचारित करने से विटामिन डी प्राप्त होता है। जितना भी विटामिन डी प्रयोग मे लाया जाता है केवल इसी प्रकार बनाया जाता है। यह एक पेटन्टीड विधि है जिस का उत्पादन विश्व मे केवल दो कम्पनियों द्वारा किया जाता है |









एलोपेथिक डाक्टरों की मानें तो गोदुग्ध का किसी को भी सेवन नहीं करना चाहिये । इस के वसा तत्व के कारण, कोलेस्ट्रोल बढ़ जाने से हृदय और ब्लड प्रेशर का रोग होता है । दूध मे लेक्टोज़ होता है जिसे अधिकांश लोग पचा नहीं सकते, इस से गैस, कब्ज, कोलायटिस, मोटापा रोग होते हैं। इस के कारण माइग्रेन,एस्थमा भी होता है। दाँत मुँह  साफ रखने पर भी श्वास मे दुर्गन्ध रहती है। इन से बचाव के लिये गोदुग्ध का सेवन नहीं करना चाहिए। यदि लेना ही है तो कृत्रिम सोयाबीन के दूध जैसे घोल लीजिए।


आज समाज मे पिछले लगभग एक सौ वर्ष के आधुनिकतम्‌ चिकित्सा विज्ञान के चलते, हृदय रोग, ब्लड प्रेशर, आर्थराइटिस, केंसर, डाइबिटीजक्ष्, मोटापा रोग क्यों लगातार बढ़ रहे हैं यह बात कोई नही पूछता। लगभग सभी माताओं को केल्शियम की कमी रहती है। किसी भी रोग का उपचार सम्भव नहीं बताया जाता। केवल आयु बढ़ाने के लक्ष्य से सब रोगों को संभाल कर ही रखा जाना पड़ता है। शारीरिक कष्ट कम करने के साधन मे आजीवन- एन्ज़ाइम, विटामिन, ब्लड प्रेशर , केल्शियम, थायराइड, ब्रुफेन की गोली खाना ही एक विकल्प बताया जाता है। किसी भी रोग का आमूल उपचार सम्भव नही है। केवल शल्य चिकित्सा से शरीर के विकार ग्रस्त भाग अलग करे जा सकने से उपचार सम्भव होता है। परन्तु कुछ नए रोग भी अब सामने आ रहे हैं जैसे, छोटे बच्चों मे ओटिज़्म, डाइबिटीज़, अस्थमा, मुटापा जो पहले नही थे। वयस्कों मे सोरियासिस त्वचा रोग तथा आर्थरायटिस वे रोग हैं जिन के बारे मे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान किंकर्तव्यविमूढ़ है। यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि यह सब रोग स्वशरीरजन्य रोग हैं। यह रोग किसी रोगाणु, कृमि, इत्यादि के आक्रमण से उत्पन्न नहीं होते। यह रोग तो हमारे शरीर के सुचारु संचालन के न होने से होते हैं। इन का विकल्प केवल नियमित जीवन, योग प्राणायाम और आहार शुद्धि है।



परन्तु पिछले दस वर्षों मे आधुनिक विज्ञान की एक और चोंका देने वाली खोज भी सामने आ रही है। जो पूर्ण रूप से प्राचीन भारतीय वेदिक मान्यताओं के अनुकूल मिलती है। केवल हरे चारे पर वनों मे स्वपोषित गौ दुग्ध मे ही एक नया तत्व पाया गया है। इन्हें कहते हें, सी एल ए (कोन्ज्यूगेटिड लिनोलीइक एसिड) तथा ओमेगा3 (अल्फा लिनोलिनिक एसिड) इन तत्वों के रहते धारोष्ण गोदुग्ध को आधुनिक विज्ञान भी एक अमृत बताता है।सीएलए. ओमेग3 युक्त आहार लेने वालों मे उपर्लिखित शरीर के स्वजन्य रोग उत्पन्न ही नहीं होते । इस गोदुग्ध सेवन से इन सभी रोगों का उपचार भी संम्भव बताया जा रहा है। यह भी पाया गया है कि गोचर मे स्वपोषित गौ के दूध मे ओमेगा थ्री भी प्रचुर मात्रा मे होता है । यह वसा तत्व शरीर मे रक्त की नाडियों को स्वच्छ रखता है । जिस से ब्लड प्रेशर नही बढ़ता। वसा तत्व रक्त वहनियों के अन्दर की परत को साफ करता हॅ, यह ऋग्वेद ४/५८/।८  मन्त्र इतनी स्पष्टता से बताता है कि वेदों मे यह आधुनिक शरीर विज्ञान है, मानना ही पडता है।


“सिन्धोरिव प्राघ्वने शुघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः । घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठी भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः ॥   ऋ ४ /५८ / ८  

यह भी पाया गया है कि सूर्य की किरणों से गौ के शरीर मे एक तत्व उत्पन्न होता है जिसे आज के वैज्ञानिक 125 डाइहाड्रोक्सी डी थ्री- के नाम से, विटामीन डी भी कहते हैं। यह तत्व हमारी त्वचा पर सूर्य (विशेष रूप से प्रातः काल के सूर्य) के सेवन से ही हमें मिलता है। विटामिन डी मानव शरीर मे सैल ग्रोथ रेग्युलेटर का कार्य करता है। शरीर मे उत्पन्न होने वाली सब सैल- कोशिकाओं का उत्पादन इसी सूर्य जन्य पदार्थ से नियन्त्रित होता है।सूर्य का महत्व इन्स्युलीन डायबिटीज में  , केल्शियम अस्थि दुर्बलता, आर्थरायटिस में, सोरियासिस त्वचा में उल्लेखनीय हैं। शरीर के थोडे से भाग, हाथ पैर मुख  इत्यादि के मात्र दस पन्द्गह मिनट के सूर्य दर्शन से शरीर को पर्याप्त मात्रा में यह विटामिन डी मिल जाता है  यहाँ सूर्य नमस्कार के महत्व को देखा जा सकता है। इस सूर्य जन्य तत्व को भी ऋग्वेद के इसी सूक्त का पहला मन्त्र स्पष्ट करता है -


“ समुद्गादूर्मिर्मधुमा उदारदुपांशुना सममृतत्वमानट । घृतस्य नाम गुह्यं यदस्ति जिह्वा देवानाममृतस्य नाभिः ॥ ऋ / ४ / ५८ / १ 


इस वेद मंत्र में सूर्य की उदारता से मानव शरीर में वसा में घुलन शील तत्व को देवताओं द्वारा मानव को अमृत रूपी पदार्थ के बारे में बताया है !

कृत्रिम रूप से विटामिन डी बनाने की विधि भी हमारे शाकाहारी समाज के लिए जानने लायक है । बूचड खानों से उपलब्ध गौ की खाल से एक तैलीय पदार्थ प्राप्त किया जाता है, इसे कृत्रिम सूर्य किरणों ( अल्ट्रा वायलेट) से उपचारित करने से विटामिन डी प्राप्त होता है। जितना भी विटामिन डी प्रयोग मे लाया जाता है केवल इसी प्रकार बनाया जाता है। यह एक पेटन्टीड विधि है जिस का उत्पादन विश्व मे केवल दो कम्पनियों द्वारा किया जाता है। यह भी एक प्रश्न है क्रित्रिम रूप से बना विटामिन डी कितना लाभकारी सिद्ध होता है ।

यह एक सत्य है कि सम्पूर्ण विश्व मे डेरी उद्योग से पहले केवल धारोष्ण दूध ही लिया जाता था।

यही आधुनिक विज्ञान अनुमोदित वैदिक परम्परा के अनुकूल स्वच्छ धारोष्ण गौदुग्ध का महत्व हमारे स्वस्थ शरीर द्वारा देश के लिए हितकर सिद्ध हो सकता है। जहाँ  भी स्वच्छ धारोष्ण गो दुग्ध सम्भव है उस के सम्वर्धन और सेवन में हम सब को अपना योगदान अवश्य करना चाहिए।



वेद और विटामिन डी वेद और विटामिन डी Reviewed by डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee on Wednesday, November 25, 2009 Rating: 5

4 comments:

  1. dharoshn dugdh k bare me jankaree pakar khushu hui. mao ga hatya k viruddh ek upanyas likh raha hoo. ye tathy bhi kahi n kahi kaam aayenge. dhanyvad.

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  2. दवाइयों में न जाने क्या-क्या मिलाया जाता है - सर्प विष, मकडी, झिंगुर, .... जो उपचार के लिए लाभप्रद होते भी हैं। दवाई और भोजन में अंतर है॥

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