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समय लिखेगा इनका भी इतिहास


गर्व का हजारवाँ चरण : प्रत्येक ज्ञात- अज्ञात को बधाई

Author: कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee | Posted at: Tuesday, November 10, 2009 | Filed Under: ,  



funny hindi Orkut scraps

आज का दिन बहुत विशेष है और इसे संयोग ही कहा जाएगा कि इस दिन की चर्चा का दायित्व अनायास ही मुझे करने का सुयोग मिला है | जिन कारणों से आज का दिन ऐतिहासिक है, उनमें से कुछेक का उल्लेख क्रमवार यहाँ किए जाने से पूर्व  इस चर्चा-मंच की परिकल्पना करने वाले संस्थापक, सभी चर्चाकार साथियों, इसकी साज सज्जा और रखरखाव आदि में प्रारंभ से आज तक अपने योगदान से निरंतर सहयोग देने वाले  हितैषी व अभिन्न शुभचिंतकों, मित्रों, सहृदय पाठकों, अपनी राय से अवगत कराने वाले बंधुओं व किसी भी रूप में इस से संबंद्ध प्रत्येक ज्ञात- अज्ञात व्यक्तित्व को आज मैं बधाई और धन्यवाद देना चाहती हूँ क्योंकि चर्चा के इस मंच पर आज मैं उपस्थित हुई हूँ चिट्ठाचर्चा की यह १००० वीं प्रस्तुति लेकर | इसका समस्त श्रेय इसके चर्चा मंडल के श्रम, समर्पण, निरंतरता, दायित्वबोध, पारस्परिकता, समयबद्धता, नूतनता के प्रति उत्साह, निरपेक्षता और निष्पक्षता को जाता है| प्रारंभ से व समय समय पर इसमें जो नए साथी जुड़ते गए, वे आज भी जुड़े हैं| भले ही वे आज नियमित रूप से चर्चा के लेखन से नहीं जुड़े हुए किन्तु वे आज भी इसकी चर्चा मंडली के स्थाई सदस्य हैं और चर्चा के इस मंच का मान हैं| उन सभी के प्रति यह मंच आभारी है, कृतज्ञ है, धन्यवादी है| .... और उस से भी बढ़ कर आभारी है  हिन्दी के नेट लेखन का तथा इस चर्चा मंच को जीवंत बनाए रखने वाले उन स्नेही साथियों का जिन्होंने  नित आकर इसे अपना दुलार, स्नेह सम्मान दिया|


आने वाले समय में कई और ऐसे मंचों की आवश्यकता अनुभव होगी, वे गठित होंगे, हो रहे हैं, स्वाभाविक है; किन्तु चर्चा के इस मंच की उपादेयता, ऐतिहासिकता व कालक्रम में इसकी सर्वांगीणता निस्संदेह है, प्रामाणिक है, सर्वविदित है,  चिरकालिक   और स्थाई है| इसमें कोई दो राय नहीं हो सकतीं| चर्चा के इस मंच के इतिहास को इन  अर्थों में बारम्बार दुहराना प्रासंगिक ही नहीं अवश्यम्भावी भी है कि आने वाले समय में इस नए इलेक्ट्रोनिक माध्यम को जनप्रिय बनाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपनी परम्परा ( भले ही वह चार-छह-आठ-दस वर्ष पुरानी ही क्यों न हो) विदित होनी चाहिए|  इन सन्दर्भों में  उस इतिहास  का खाका कुछ ऐसा है -





http://lh4.ggpht.com/_gonR097kmxE/SWiy93bY55I/AAAAAAAAFME/gjMCrVvhSUc/Anup%20Shukla%20(2)_thumb.jpgभारतीय ब्लाग मेला: सन २००४ के अखिरी दिन थे। उन दिनों हम लोगों को पता चला कि अंग्रेजी भाषा के चिट्ठाकार भारतीय ब्लाग मेला का आयोजन करते हैं। इसमें लोग बारी-बारी से ब्लागर ब्लागर ब्लाग मेला का आयोजन करते थे। जिस ब्लागर को आयोजन करना होता उसके ब्लाग पर लोग अपनी पोस्ट के लिंक दे देते और फ़िर वह उसके बारे में लिखता था। उदाहरण के लिये आप देखिये यजद का आयोजन जिसमें अतुल अरोरा, जीतेंन्द्र चौधरी के साथ-साथ मैंने भी अपनी पोस्ट के लिंक दिये थे। इसके बाद उसकी चर्चा की थी यजद ने अपने ब्लाग पर।

हम बड़े खुश हुये कि अंग्रेजी ब्लागर के मेले में हम भी अपनी दुकान चला रहे हैं। उन दिनों हिंदी के ब्लागर कम थे सो हम लोग भिड़ने के लिये अंगेजी ब्लागरों पर निर्भर थे। कोई न कोई बात हो जाती कि बहस करते रहते।

अंग्रेजी के ब्लागरों के अलावा एक बार (३७ वें संस्करण) ब्लाग मेला का आयोजन देबाशीष ने भी किया था। देबाशीष कुछ व्यक्तिगत चिट्ठे ब्लाग मेला के नियम के अनुसार शामिल नहीं किये थे।

सुनामी मेला और बहसबाजी: जनवरी २००५ का पहला ब्लाग मेला मैडमैन के जिम्मे था। सुनामी तूफ़ान हाल ही में आ के गया था। इसलिये मैडमैन ने सुनामी स्मृति ब्लाग मेला आयोजित किया। पहले की तरह हिंदी ब्लागर्स ने अपनी पोस्ट नामीनेट की। मैडमैन ने निम्नकारण बताते हुये हिंदी ब्लाग की चर्चा करने से मना कर दिया:-

That's it for this week, folks. I know some Hindi blog entries were nominated, but I've left them out of this mela, not because I'm a snobbish bastard, but because:


1) I studied Hindi for 10 years at school, and speak the language fluently, but haven't read any big chunks of Hindi since 1990. So my reading speed has reduced to a crawl.


2) The thin strokes of the text coupled with the low resolution of a PC monitor made it even harder to read the entries.


3) Some of the spelling mistakes (mostly misplaced matras) didn't help either.

करेले पर नीम चढ़ा कमेंट किया किसी सत्यवीर ने। उसने लिखा-
I agree that hindi blogs should have a different blog mela. It is better to keep regional languages at a different forum.

बस फ़िर क्या था। बमचक मच गई। हिंदी-अंग्रेजी बबाल मचा। देबाशीष(Indiblogger) जीतेंन्द्र चौधरी और इंद्र अवस्थी )
ने इसका विरोध किया। अंतत: खिसिया के मैंड्मैन ने अपना कमेंट का बक्सा बन्द कर दिया।

चिट्ठाचर्चा की शुरुआत :इसके बाद अतुल ने गुस्से से फ़नफ़नाती हुई पोस्ट लिखी- तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ? । मैंने मौज ली अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है । लेकिन हमें यह भी लगा कि हर समय हा हा, ही ही करना ठीक नहीं तो हम गम्भीर हो लिये। हमने चिट्ठाचर्चा ब्लाग शुरू किया। स्वागतम पोस्ट में हमने लिखा था-
भारतीय ब्लागमेला के सौजन्य से पता चला कि हिदी एक क्षेत्रीय भाषा है.यह भी सलाह मिली कि हिंदी वालों को अपनी चर्चा के लिये अलग मंच तलाशना चाहिये.इस जानकारी से हमारेमित्र कुछ खिन्न हुये.यह भी सोचा गया कि हम सभी भारतीय भाषाओं से जुड़ने का प्रयास करें.

इसी पोस्ट में हमने हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं के ब्लाग की चर्चा भी करने का मन बनाया था। कुछ दिन अंग्रेजी, सिंधी, गुजराती और मराठी के चिट्ठों की चर्चा करते भी रहे।

शुरुआती प्रतिक्रियायें: शुरुआत चिट्ठाचर्चा की अच्छी ही रही। हिंदी के अलावा अंग्रेजी के ब्लागरों ने इसमें रुचि दिखाई। प्रसेनजित ने अगले भारतीय ब्लाग मेले में इसका जिक्र किया। शायद आलोक ने कहा था कि वे तमिल चिट्ठों की चर्चा का काम देखेंगे।

शुरुआत के दिन: शुरू के दिनों में हम चर्चा एक माह में एक बार करते थे। फ़िर शायद पन्द्रह दिन में करते थे। सब मिलकर चर्चा करते थे। देबाशीष, अतुल, जीतेंद्र और मैं। आप शुरुआत के चिट्ठे देखें तो आपको हिदी ब्लाग जगत के साथ भारतीय ब्लाग जगत की तमाम बेहतरीन पोस्टें देखने को मिल जायेंगी।

मन उचट गया: शुरुआत के दिन अच्छे लगे। फ़िर जब संकलक आ गये तब लगा कि हम चर्चा करके कौन सा तोप चला रहे हैं। लोगों को ब्लागस के बारे में पता तो चल ही जाता है संकलकों से। इसके बाद धीरे-धीरे हमारे आलस्य ने हमारे उत्साह पर विजय पायी और चिट्ठाचर्चा हो गयी धरासायी।

फ़िर उछलकूद लेकिन गुप्त वाली: फ़िर देबाशीष ने कहा कि चिट्ठाविश्व के लिये चर्चा करो। चिट्ठाविश्व हिंदीब्लाग जगत का पहला संकलक है शायद जिसके बाद नारद , ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत आये। हम एक गुप्त ब्लाग में चर्चा करते और वह संक्षिप्त चर्चा चिट्ठाविश्व में पोस्ट हो जाती। अच्छा लगा कुछ दिन। फ़िर धीरे-धीरे वह भी बंद हो गया।

चिट्ठाचर्चा का अपहरण: इन्हीं दिनों शायद सितम्बर ,२००५ में किसी शहजादे ने चिट्ठाचर्चा का अपहरण कर लिया। बाद में मित्रों के प्रयासों से, शायद गूगल को भी लिखा गया था ,चिट्ठाचर्चा की वापसी हुई। लेकिन जब वापसी हुई तब तक........

पूरा वृत्तांत पढने के लिए आप को यहाँ जाना होगा, यहाँ आपको निम्न बिन्दुओं पर जानकारी मिलेगी -
  • दनादन चर्चा, महारथी चर्चाकार
  •  नारद की अनुपस्थिति में चर्चा
  • एक लाइना, आलोक पुराणिक और चिट्ठाचर्चा
  • नये चर्चाकार, विविधता 
  • बदलता समय और चिट्ठाचर्चा का स्वरूप  
  • फ़िलहाल की चिट्ठाचर्चा मेरी नजर में 



आप सभी से निवेदन है कि चर्चा के इस मंच को अपना स्नेह इसी अविचल  भाव से देते रहें व सद्भाव बनाए रहें|


 बधाई और धन्यवाद के क्रम से आगे बढ़ते हैं |





अभी अभी शलाका पुरुष प्रभाष जी हमारे मध्य नहीं रहे हैं| उन पर हिन्दी ब्लॉग जगत ने कई सुचिंतित व मार्मिक लेख लिखे| वह क्रम अभी भी चल रहा है| इसी कड़ी में जनसत्ता में प्रकाशित प्रभाष जी के सुपुत्र का यह आलेख मुझे पिताजी के माध्यम से पढने को मिला|










कल एक इमेल  सन्देश मुझे  वरिष्ठ व प्रख्यात भाषावैज्ञानिक प्रो. सुरेश कुमार जी का प्राप्त हुआ, जिसे पढ़ कर मुझे रोमांच हो आया| उसका अविकल पाठ यहीं दे रही हूँ -

प्रभाष जी नहीं रहे. उनके बिना हिन्दी पत्रकारिता पहले जैसी नहीं रहेगी. ’जनसत्ता’ के (मुख्यतया)7 नवम्बर के अंक में विभिन्न व्यक्तियों और संस्थाओं ने उन्हें जैसे याद किया उसकी रिपोर्टें छपी हैं. उनमें प्रभाष जी के लिए प्रयुक्त विशेष्य विशेषणों की एक सूची नीचे दी जा रही जिससे उनके केन्द्रीय व्यक्तित्व की एक झलक मिलती है. यह झलक उस बॄहत्तर प्रतिमा का अंश है जिसने ’जनसत्ता’ के 8 नवम्बर के अंक में (पृष्ठ 6-7 पर) उनके विषय में प्रकाशित लेखों में (जिन्हें ’विशेषण  डिस्कोर्स’ कहा जा सकता है) आकार ग्रहण किया है. सूची इस प्रकार है :

  • अभिभावक जैसा सम्पादक
  • हिन्दी पत्रकारिता का सूर्य
  • हिन्दी पत्रकारिता का शिखर पुरुष
  • हिन्दी पत्रकारिता का युग पुरुष
  • पत्रकारिता का शलाका पुरुष
  • पत्रकारिता का सशक्त स्तम्भ
  • निर्भीक पत्रकारिता का सशक्त स्तम्भ
  • पत्रकारिता का महान स्तम्भ
  • जनपक्षीय पत्रकारिता का महान और मज़बूत स्तम्भ
  • देश का वरिष्ठ पत्रकार
  • विलक्षण और प्रेरक पत्रकार
  • मूर्धन्य पत्रकार
  • उत्कृष्ट पत्रकार
  • निष्पक्ष पत्रकार
  • निष्पक्ष और बेबाक पत्रकार
  • हिन्दी पत्रकारिता का बडा हस्ताक्षर
  • खेल पत्रकारिता का भीष्म पितामह
  • हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधाओं में से एक
  • उच्च कोटि का लेखक व चिन्तक
  • सुविख्यात, निडर व उत्कृष्ट लेखक
  • अपनी बेजोड लेखन शैली के लिए विख्यात
  • भाषा का जादूगर
  • शब्द और भाषा का जादूगर
  • लोकतन्त्र का सच्चा प्रहरी
  • असाधारण बौद्धिक और पेशेवर निष्ठा वाला
  • असाधारण बौद्धिक साहस का धनी
  • सर्वमान्य बुद्धिजीवी
  • बेलाग बोलने वाला बुद्धिजीवी
  • पत्रकारों की पूरी पीढी के लिए प्रेरणा स्रोत
  • प्रेरणा पुरुष
  • जन-पुरुख
 -     सुरेश कुमार
Prof Suresh Kumar
A-45, Welcome Apartments
Sector 9, रोहिणी
Delhi-110085




व्यक्तिगत रूप से प्रभाष जी पर केन्द्रित  जिन लेखों ने मुझे इन दिनों विशेष प्रभावित किया वे हैं -

प्रभाष जोशी  :  समय का सबसे समर्थ हस्ताक्षर

अभी न होगा मेरा अंत 

प्रभाष जोशी के न होने का अर्थ 

प्रभाष जोशी हिंदी के अंतिम समर्पित सेनानी




आज कवि सुदामा पाण्डेय धूमिल का जन्मदिवस है | रोचक (?) तथ्य यह है कि नेट पर तीन स्रोतों पर जाने से आप को जन्मतिथि को लेकर तीन अलग अलग स्थितियाँ दिखाई देंगी, जिन्हें मैंने नीचे सहेज दिया है | आप इस अवसर पर उनकी कुछ कविताओं की बानगी देखिए और फिर नीचे दी गयी वे प्रतिकृतियाँ भी |






(१)

मेरे सामने
तुम सूर्य - नमस्कार की मुद्रा में
खड़ी हो
और मैं लज्जित-सा तुम्हें
चुप-चाप देख रहा हूँ
(औरत : आँचल है,
जैसा कि लोग कहते हैं - स्नेह है,
किन्तु मुझे लगता है-
इन दोनों से बढ़कर
औरत एक देह है)


(२)

मेरी भुजाओं में कसी हुई
तुम मृत्यु कामना कर रही हो
और मैं हूँ-
कि इस रात के अंधेरे में
देखना चाहता हूँ - धूप का
एक टुकड़ा तुम्हारे चेहरे पर
(3)


रात की प्रतीक्षा में
हमने सारा दिन गुजार दिया है
और अब जब कि रात
आ चुकी है
हम इस गहरे सन्नाटे में
बीमार बिस्तर के सिरहाने बैठकर
किसी स्वस्थ क्षण की
प्रतीक्षा कर रहे हैं
(४)
न मैंने
न तुमने
ये सभी बच्चे
हमारी मुलाकातों ने जने हैं
हम दोनों तो केवल
इन अबोध जन्मों के
माध्यम बने हैं




धूमिल की कुछ कविताओं का अंग्रेजी रूपान्तर पढने का चाव रखने वालों के लिए भी नेट पर सामग्री है|




पुस्तकें खरीदने के लिए सुदूर बैठे पाठक अनुपलब्धता की बात नहीं कह सकते|




नेट पर जन्मतिथियों की स्थिति 



यहाँ (१) ....................................................        ................        .... (२)

जन्म: 09 नवम्बर 1936
निधन: 10 फरवरी 1975
उपनाम
धूमिल
जन्म स्थान
खेवली, जिला वाराणसी, उत्तरप्रदेश
कुछ प्रमुख
कृतियाँ

संसद से सड़क तक (1972), कल सुनना मुझे, सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र (1983)
विविध
कल सुनना मुझे काव्य संग्रह के लिये 1979 का साहित्य अकादमी पुरस्कार
जीवनी
धूमिल / परिच
Sudama Panday 'Dhoomil' (सुदामा पांडेय 'धूमिल') (November 7, 1936February 10, 1975, known mostly as Dhoomil, was a renowned Hindi poet from Varanasi, who is known for his revolutionary writings and his 'protest-poetry' [3][4], along with Muktibodh.
Known as the angry young man of Hindi poetry due to his rebellious writings [5], during his lifetime, he published just one collection of poems, 'Samsad se Sarak Tak', 'संसद से सड़क तक' (From the Parliament to the Street), but another collection of his work, titled "Kal Sunana Mujhe" 'कल सुनना मुझे' was released posthumously, which in 1979, went on to win the Sahitya Akademi Award in Hindi [6][7].




(३)
-   अब यहाँ हिन्दी पृष्ठ पर देखें | यहाँ अभी पृष्ठ बनने की प्रक्रिया में है, सो जन्मतिथि का उल्लेख नहीं है|


 

अस्तु, आगे बढ़ते हैं |







हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए आज का दिन कई अर्थों में महत्वपूर्ण है  क्योंकि आज लक्ष्मीमल्ल सिंघवी का भी जन्म दिवस है |





डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ने हिंदी के वैश्वीकरण और हिंदी के उन्नयन की दिशा में सजग, सक्रिय और ईमानदार प्रयास किए। भारतीय राजदूत के रूप में उन्होंने ब्रिटेन में भारतीयता को पुष्पित करने का प्रयास तो किया ही, अपने देश की भाषा के माध्यम से न केवल प्रवासियों अपितु विदेशियों को भी भारतीयता से जोड़ने की कोशिश की। वे संस्कृतियों के मध्य सेतु की तरह अडिग और सदा सक्रिय रहे। वे भारतीय संस्कृति के राजदूत, ब्रिटेन में हिन्दी के प्रणेता और हिंदी-भाषियों के लिए प्रेरणा स्रोत थे। विश्व भर में फैले भारत वंशियों के लिए प्रवासी भारतीय दिवस मनाने की संकल्पना डॉ. सिंघवी की ही थी। वे साहित्य अमृत के संपादक रहे और अपने संपादन काल में उन्होने श्री विद्यानिवास मिश्र की स्वस्थ साहित्यिक परंपरा को गति प्रदान की। भारतीय ज्ञानपीठ को भी श्री सिंघवी की सेवाएँ सदैव स्मरण रहेंगी।[२]


कल का दिन हिन्दी के नाम पर कलंक लगाने वाले इतिहास का एक अन्यतम दिवस रहा| जब हिन्दी में शपथ लेने पर विधान सभा में हाथापाई और चाँटाबाजी  हो गयी| मन बार बार यही कहने का होता है ( जो बात निराला जी ने मुंशी प्रेमचंद  के अंतिम दिनों में हुई भेंट के संस्मरण लिखते समय कही थी) .... जाने दीजिए, निराला जी के शब्द क्या दुहराऊँ  .... अपने मुँह से क्या कहूँ अब!


  हिन्दी की इस दशा / दुर्दशा का सारा पाप हमारा है | हमने अपने स्वार्थपने, नीचता, आत्मकेंद्रिकता, छल प्रपंच और कलुष से माँ का चीर तार तार कर दिया है | कोई भी भाषा अपने बोलने वालों के चरित्र की वाहक होती है| किसी भी भाषा -समाज का चरित्र देखना हो तो उसकी भाषा की स्थिति को देख लीजिए....... |


यह धिक्कार हम पर है कि हमारी माँ बीच चौरस्ते निर्वस्त्र हुई जाती है और हम अपने अहम् पोसते केवल दूसरों की रेखाएँ छोटी करने की वितंडा में लीन हैं| ईश्वर हमें सद्बुद्धि दे |



इसी दुर्घटना पर आधारित एक लेख पढ़ा जाना चाहिए -


महाराष्ट्र विधानसभा के नये सत्र के पहले दिन मनसे के विधायकों ने मराठी भाषा के नाम पर ,हिन्दी में शपथ लेने वाले सपा विधायक अबू आजमी के साथ जो गुंडागर्दी की है. उसकी जितनी निन्दा की जाय कम है, ये न केवल भारतीय संविधान का अपमान है बल्कि हिन्दी भाषा के लिये यह बहुत बडा खतरा बन गया है.उस भाषा के लिए जो देश के लाखों- करोडो लोगो की अपनी भाषा है. आज जब अंग्रेजी हमारी भाषाओं के लिये खतरा बन गई है, उस समय सभी भारतीय भाषाओं को मिलकर इसके खिलाफ़ लड्ना चाहिये. इस तरह की हरकतें न केवल हमारी अखंडता और एकता में अनेकता को खत्म कर रही है. साथ ही जनसामान्य के बीच खाई भी पैदा कर रही है.



कुछेक पठनीय लेख और देखें -

 स्त्रियों को कु-पाठ पढाने की घिनौनी कोशिश...

एक-दूसरे के साथ जीने-मरने की कसमे क्या केवल कागजी बातें है...? सब मरे यह ज़रूरी नहीं लेकिन कुछ लोग ऐसे करते है तो उसकी आलोचना नहीं की जानी चाहिए. किसी को चिता में जबरन बिठाने का कोई अग्यानी ही समर्थन करेगा.  जोशी जी ने साथ-साथ जीने-मरने की उसी भावना का सम्मान किया था, जो अब लुप्त होती जा रही है. मै भी इस भावना का सम्मान करता हूँ. भविष्य में भी करता रहूँगा. शर्म तो उन नकली लोगो को आनी चाहिए जो समाज को-प्रगतिशील मूल्यों  के नाम पर-दिशाहीन कर रहे है. औरतो को गलत पाठ पढ़ा रहे है. मै ऐसे लोगो के खिलाफ लिखता रहूँगा और शर्मिंदा होता रहूँगा कि समाज का सत्यानाश करने वाले भी जिंदा है. वे लोग अपने स्टार पर मुझे भी गरियाते रहेंगे  कि 'ये पिछडा -गंवार कहाँ से आ गया, जो अनैतिकता के दौर में नैतिकता का कुपाठ पढा  रहा है? छिः...इसे तो मध्य युग में होना था', लेकिन मै हूँ aur अपनी मुहिम में लगा हुआ हूँ.



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सुकृति आर्ट गैलरी में कलाकारों की कृतियां डिस्प्ले की गयी थीं। उदघाटन की रस्म भंवरी देवी ने अदा की। पर ये रस्म अदायगी नहीं थी। पुरुष को समझने की कोशिश करते चित्रों की मुंहदिखाई की रस्म भंवरी से बेहतर कौन निभाता। वैसे भी, उन्होंने पुरुष की सत्ता को जिस क़दर महसूस किया है, शायद ही किसी और ने किया हो पर अफ़सोस… अगले दिन मीडिया ने उनका परिचय कुछ यूं दिया, फ़िल्म बवंडर से चर्चा में आयीं भंवरी…!
+++
इस मौक़े पर चर्चित संस्कृतिकर्मी हरीश करमचंदानी ने 15 साल पुरानी कविता सुनाई, मशाल उसके हाथ में। भंवरी देवी के संघर्ष की शब्द-यात्रा।
+++
 [[और अंत में... एक बड़े अधिकारी की पत्नी ने कहा, भंवरी देवी को प्रदर्शनी की शुरुआत करने के लिए क्यों बुलाया गया? मुझसे कहतीं, मैं किसी भी सेलिब्रिटी को बुला देती! अफ़सोस कि ऐसा कहने वाली खुद को कलाकार भी बताती हैं। (कानों सुनी)]]



कुछ दिन से कई ईमेल द्वारा एक आह्वान की सूचना मिल रही थी आज सोचा जा कर उसे देखा जाए| जो देखा वह यह पाया -





This message from the youth of the community should be read in its letter and spirit that while we want to go home we do not want to sit with the government who trivialises the issue of our return.It isnt as if we had merrily left one day only to return now because they will pay us 7.5 lac rupees.Make no mistake about it.Let the government first show some resolve.Let them fast track cases related to killing of Kashmiri Pandits.Let there atleast be one conviction.Let them de-encroach the land of our shrines.




कवि प्रियंकर की वैवाहिक वर्षगाँठ की सूचना मुझे उन्हीं द्वारा अपनी धर्मपत्नी के लिए जारी इस रोचक और स्नेह पूर्ण सन्देश से मिली

Priyankar PaliwalPriyankar Paliwal सहजीवन के शानदार बीस वर्ष और प्रमिला के लिये एक गीत :

Twenty years of conjugal bliss and a song for Pramila :




आप ने सबसे ऊपर लगा "चल-चित्र" देखा होगा उसका सम्बन्ध भी खोज रहे होंगे तो बात यह है कि वह अनिमेटेड चित्र  मानो इनकी भावना को ही व्यक्त कर रहा है जब ये कहते हैं कि -

अपने तमाम गुस्से के साथ मैं बाहर आया। बाहर आकर मैनें मन ही मन यह इच्छा जाहिर की कि काश यह एक सामान्य फिल्म निकल जाये। इस फिल्म मे वह सब वहो ही नहीं जिसकी इच्छा लिये मैं एक सौ चालीस – पचास किलोमीटर आया था। मैं सोचता रहा कि काश यह डॉक्युमेंट्री फिल्म निकल जाये। काश सीरी फोर्ट मे अजीबोगरीब नियम लगाने वाले का लैपटॉप खो जाये, तमाम।



स्वगत  पर कुछ दिन पूर्व आई प्रविष्टि पर भी एक दृष्टि डालें -



संदेह - दृष्टि
बोर्हेस ने ‘द रिडल ऑफ पोएट्री’ में कहा है- ‘सत्तर साल साहित्य में गुज़ारने के बाद मेरे पास आपको देने के लिए सिवाय संदेहों के और कुछ नहीं।‘ मैं बोर्हेस की इस बात को इस तरह लेता हूं कि संदेह करना कलाकार के बुनियादी गुणों में होना चाहिए। संदेह और उससे उपजे हुए सवालों से ही कथा की कलाकृतियों की रचना होती है। इक्कीसवीं सदी के इन बरसों में जब विश्वास मनुष्य के बजाय बाज़ार के एक मूल्य के रूप में स्थापित है, संदेह की महत्ता कहीं अधिक बढ़ जाती है। एक कलाकार को, निश्चित ही एक कथाकार को भी, अपनी पूरी परंपरा, इतिहास, मिथिहास, वर्तमान, कला के रूपों, औज़ारों और अपनी क्षमताओं को भी संदेह की दृष्टि से देखना चाहिए।





गत दिनों सुशांत सिंहल जी से उनकी साईट के माध्यम से परिचय हुआ| प्रो. योगेश छिब्बर जी की एक कविता ने उनसे परिचय करवाया |  पिछले दिनों  वन्दे मातरम्  को लेकर जिस प्रकार का अवांछनीय वातावरण निर्मित किए जाने की घटनाएँ हुई हैं, उन दिनों माँ, जननी, मातृ-भू, माता आदि  संकल्पनाओं को अनायास ही राष्ट्र व धरती के साथ जोड़ कर देखने वाली परम्परा का स्मरण हो आता रहा| वह परम्परा भले ही वेद की ऋचाओं में "माता भूमि: पुत्रोहम् पृथिव्या: " का आदेश हो अथवा लंका जय के पश्चात राम का लक्ष्मण को लंका के वैभव को धूल समझने का विमर्श देते समय कहा गया -


अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते |
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी || 



या आधुनिक हिन्दी साहित्य में भारतेंदु काल से काव्य में  राष्ट्रभक्ति और भारत माता की प्रतिष्ठा करने की परम्परा| सभी स्थानों पर जननी व जन्मभूमि एक शब्द युग्म की भांति आते हैं| मेरे  मन की डूबती उतराती संवेदनाओं पर जिस कविता ने मरहम रखा, उसे पढ़ कर एक बारगी तो आप भी दंग रह जाएँगे| यहाँ  उसका यथावत् पाठ देखिए -


दुःख थे पर्वत, राई अम्मा
हारी नहीं लड़ाई अम्मा ।

लेती नहीं दवाई अम्मा,
जोड़े पाई-पाई अम्मा ।

इस दुनियां में सब मैले हैं
किस दुनियां से आई अम्मा ।

दुनिया के सब रिश्ते ठंडे
गरमागर्म रजाई अम्मा ।

जब भी कोई रिश्ता उधड़े
करती है तुरपाई अम्मा ।

बाबू जी तनख़ा लाये बस
लेकिन बरक़त लाई अम्मा।

बाबूजी थे छड़ी बेंत की
माखन और मलाई अम्मा।

बाबूजी के पांव दबा कर
सब तीरथ हो आई अम्मा।

नाम सभी हैं गुड़ से मीठे
मां जी, मैया, माई, अम्मा।

सभी साड़ियां छीज गई थीं
मगर नहीं कह पाई अम्मा।

अम्मा में से थोड़ी - थोड़ी
सबने रोज़ चुराई अम्मा ।

अलग हो गये घर में चूल्हे
देती रही दुहाई अम्मा ।

बाबूजी बीमार पड़े जब
साथ-साथ मुरझाई अम्मा ।

रोती है लेकिन छुप-छुप कर
बड़े सब्र की जाई अम्मा ।

लड़ते-सहते, लड़ते-सहते,
रह गई एक तिहाई अम्मा।



अनंतिम
अब उसी  नगर का एक और चेहरा देखें और मुझे विदा दें | हाँ इतना ध्यान अवश्य रखें कि चर्चा की १००० वीं  प्रविष्टि  होने की या अन्य सूचनाओं पर बधाई आदि देने से बढ़कर कुछ अधिक भी कहें| चर्चा पर किए जाने वाले श्रम में किसी चर्चाकार का कोई स्वार्थ नहीं होता है अतः चर्चा के इस मंच पर जब जब आप को किसी भी प्रकार का श्रम और समर्पण दिखाई दे तो अपनी भावनाओं को अवश्य व्यक्त करें , ये भावनाएँ औपचारिक शाबाशी से जितनी इतर होती हैं उतनी सुखदाई होती हैं | आप के लिए सर्वमंगल की कामनाओं  सहित इस चित्र के साथ अब विराम लेती हूँ |








समय लिखेगा इनका भी इतिहास समय लिखेगा इनका भी इतिहास Reviewed by Kavita Vachaknavee on Tuesday, November 10, 2009 Rating: 5

7 comments:

  1. पांच वर्ष की यात्रा . हज़ारों ब्लॉग . दो दर्ज़न से अधिक चर्चाकार . और चिट्ठाकारों के समवेत स्वर चिट्ठाचर्चा की एक हज़ारवीं पोस्ट का ’माइलस्टोन’ . सब आशाजनक है . खास तौर पर इसलिये कि यह वीराने में बस्ती बसाने जैसा काम था . जो इसके शुरुआती सूत्रधार और कार्यकर्त्ता थे उन्हें एक गुलाब का फूल मेरी ओर से और हिंदी चिट्ठा-परिवार के सभी सदस्यों को बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं

    ReplyDelete
  2. एक ऐतिहासिक चर्चा...क्यों न हो...१०००वीं पोस्ट जो ठहरी:) बधाई॥

    ReplyDelete
  3. ईमेल द्वारा प्रेषित सन्देश


    कविता जी ,

    हिदी जगत के प्रति जैसी जागरूकता और आत्मीयता का प्रदर्शन आपने किया है वह असाधारण है । कविता मनुष्यता का पर्याय है ,निश्चय ही आप अपने नाम को सार्थक करेंगी । हजारवीं प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें ।


    अनंत शुभ कामनाएं ,--राधेश्याम शुक्ल

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  4. ईमेल द्वारा प्रेषित सन्देश


    आदरणीय कविता जी,
    एक हज़ारवी प्रस्तुति के लिए बधाई.

    शुक्ला जी का लेख/के लेख आखिरकार हिन्दी भारत तक पहुंच ही गये.वन्देमातरम गीत की सार्थकता पर जितने प्रश्न चिह्न लगे हुए हैं उनसभी का प्रमानपूर्वक समाधान, निश्चित ही सारे देश के लिए नेत्रोन्मीलक है.शुक्लाजी को इस महती कार्य के लिए बधाई और धन्यवाद.
    एम वेंकटेश्वर

    M Venkateshwar

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  5. बधाई...१००० वीं पोस्ट के मुकाम पर आपको चर्चा करता देख अच्छा लगा.

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  6. एक हजारवीं और इतनी सुंदर पोस्ट के लिए बधाई और धन्यवाद। भविष्य के लंबं सफर के लिए शुभकामनाएं।
    रा.

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  7. आपने इसे सचमुछ यादगार और सहेज कर रखने लायक चर्चा बना दिया। आपकि लगन और श्रमशक्ति को सलाम। विद्वता के क्या कहने?

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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