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साड्डा चिड़ियाँ दा चंबा वे, बाबुल असाँ उड्ड जाना

साड्डा चिड़ियाँ दा चंबा वे, बाबुल असाँ उड्ड जाना
स्वर : रेशमाँ



पंजाबी के सबसे दर्दभरे लोक गीतों की कोई सूची बनाई जाए तो उनमें शतक-भर से प्रथम स्थान पर रहने वाले एकमात्र गीत की पंक्तियाँ हैं- " साड्डा चिड़ियाँ दा चंबा वे, बाबुल असाँ उड जाना"। यह बेटियों का गीत है, संभावित विरह का गीत है, पराएपन के दर्द का गीत है, बिदाई को नकारने व पिता द्वारा घर से विदा करने की बाध्यता का गीत है और न जाने क्या क्या तो भरा है इसमें। एक प्रकार से संवादात्मक गीत। भारत विभाजन से पूर्व संयुक्त भारत में गाने वाले आज दो देशों में बँट गए हैं, पर वही गीत आज भी वे दुहराते हैं जो कभी उनकी साझी विरासत हुआ करते थे। पाकिस्तान की वरिष्ठ शास्त्रीय गायिका रेशमाँ जी के स्वर में बरसों पूर्व रेकोर्ड इस गीत का अपना ही आनंद (?, दर्द ) है - इसके पारंपरिक शब्दों वाले रूप को आज सुनते हैं -




साड्डा चिड़ियाँ दा चंबा वे, बाबुल असाँ उड्ड जाना साड्डा चिड़ियाँ दा चंबा वे, बाबुल असाँ उड्ड जाना Reviewed by Kavita Vachaknavee on Thursday, April 16, 2009 Rating: 5

4 comments:

  1. kavita ji is geet ko sun kar ma or beti ....yahan bhi ho ....ek dusre ko yaad karti hai or aankhian nam ho unthti hai....saadi lanbhi udaari we

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  2. शुक्रिया कविता जी इस गाने को सुनाने का ..यह बहुत दिल को छु जाता है गाना

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  3. आदरणीय देवी जी
    बहुत अच्छा लगा आपका लेखन
    आज कल तो लिखने पढने वालो की कमी हो गयी है ,ऐसे समय में ब्लॉग पर लोगों को लिखता-पढता देख बडा सुकून मिलता है लेकिन एक कष्ट है कि ब्लॉगर भी लिखने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं जबकि पढने पर कम .--------
    नई कला, नूतन रचनाएँ ,नई सूझ ,नूतन साधन
    नये भाव ,नूतन उमंग से , वीर बने रहते नूतन
    शुभकामनाये
    जय हिंद

    ReplyDelete
  4. आदरणीय देवी जी
    बहुत अच्छा लगा आपका लेखन
    आज कल तो लिखने पढने वालो की कमी हो गयी है ,ऐसे समय में ब्लॉग पर लोगों को लिखता-पढता देख बडा सुकून मिलता है लेकिन एक कष्ट है कि ब्लॉगर भी लिखने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं जबकि पढने पर कम .--------
    नई कला, नूतन रचनाएँ ,नई सूझ ,नूतन साधन
    नये भाव ,नूतन उमंग से , वीर बने रहते नूतन
    शुभकामनाये
    जय हिंद

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