सच्चे साहित्यकारों की कापियाँ डाक्साबों से चेक कराने के बजाय......




च्चे साहित्यकारों की कापियाँ डाक्साबों से चेक कराने के बजाय




प्रवासी हिन्दी साहित्य पर आरम्भ हुई परिचर्चा में आए विचारों की श्रृंखला में इस बा प्रस्तुत हैं, ललित जी के विचार। इस परिचर्चा के प्रसंग, प्रारम्भ आदि के विषय में पूरी जानकारी के लिए भा - तथा प्राप्त विचारों की प्रस्तुति की श्रृंखला में पहले भाग में व्यक्त विचारों को आप भाग - में पढ़ सकते हैं। आप के विचारों की भी प्रतीक्षा है।


प्रवासी हिन्दी साहित्य





कविता जी ने एक ऐसा विषय सामने ला दिया है कि बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। मैं हिन्दी साहित्य का एक अदना-सा पाठक हूँ। अभी-अभी ईमेल देखा और पहली प्रतिक्रिया लिख रहा हूँ। कविता जी ने "रचनाकार के स्थान के सरोकार" की बात की है। क्यों न प्रवासी की परिभाषा तय करने से पहले हिन्दी पट्टी की ही स्थिति देख ली जाए। महानगरों में रहते हुए अपने सुदूर गाँव, कस्बे, शहर की अतीत की स्मृतियों की सुंदर पैकेजिंग कर और विदेशी साहित्य से कुछ सुंदर चिप्पियाँ लेकर परोसे जाने वाले साहित्य को क्या कहेंगे। 'प्रवासी हिन्दी साहित्य' आदि आदि श्रेणीकरण करते हुए इसे किस श्रेणी में रखेंगे।


साहित्य में "स्थान के सरोकार" रचना में इस ढंग से प्रवेश कर सकते हैं यह नुस्ख़ा यदि तॉल्स्तॉय को पता होता तो उन्हें भेष बदलकर गरीब किसानों के बीच घूमना न पड़ता। या फिर महानगर की साहित्यिक चौपालों में पंचों द्वारा समय-समय पर घोषित प्रेमचंद के उत्तराधिकारियों में से किसी एक का नाम इस समय जेहन में कौंध रहा होता।


भाषा जन-जन की समझ में आने वाली ही हो यह आग्रह समझ से परे है, रचना देश में रची जाए या विदेश में। वह भी हिन्दी भाषा। हिन्दी हो कि हिन्दुस्तानी। उर्दू का प्रयोग। संस्कृत। (वैसे, आंकड़ों के अनुसार आम जन में सुरेन्द्र मोहन पाठक बहुत लोकप्रिय हैं।) निश्चित ही रचना आम जन के सरोकारों, इंसानियत के पक्ष में हो। मैं डाक्साबों, परोफेसरों के हिन्दीवाद का समर्थक नहीं हूँ। लेकिन भाषा की बात हल हो जायेगी। मूलतत्व की तो बात हो।


अब प्रवासी साहित्य पर नजर दौड़ाएँ। दुनिया के महानगरों और कस्बों में फ़र्क करना ही पड़ेगा। अमेरिका, ब्रिटेन आदि और सूरीनाम, फिजी, त्रिनिडाड, गयाना में एक समय ख़ूब चले गीत "चिट्ठी आयी है...वतन से चिट्ठी आयी है..." को एक ही रिस्पॉस मिला होगा, यह कहना कठिन है। बहरहाल...


"सरोकार", जी हाँ सरोकार। यही तय करेगा कि परिभाषा क्या हो। भाषा को निखारने और उसे मानक बनाने का महती कार्य तो हमारा हिन्दी अकादमिक जगत कर ही रहा है। फ़िलवक्त सच्चे साहित्यकारों की कापियाँ डाक्साबों से चेक कराने के बजाय उन्हें छूट दी जाये कि वे इंसानी जीवन की अभिव्यक्ति के लिए हिन्दी के किसी भी रूप को, माध्यम को अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं।

अभी इतना ही
ललित

Friday, 3 April, 2009 1:29 AM


2 comments:

  1. १. साहित्यकार प्रवासी हो या निवासी, देशकाल से बचकर नहीं निकल सकता. देशकाल के सरोकार ही किसी रचना को महत्वपूर्ण बनाते हैं. स्मृति और वर्तमान का द्वन्द्व लेखन को धार देने का काम करता है - प्रवासी भारतीयों का लेखन इसे प्रमाणित कर रहा है.

    २. साहित्यकार को किन्हीं तथाकथित 'डाक्साबों' की नहीं , अपने पाठक की चिंता करनी चाहिए. यहीं यह प्रश्न उठता है कि इस प्रवासी अभिधान से अलंकृत साहित्य का लक्ष्य-पाठक कौन है. [वैसे स्वान्तः सुखाय लेखन से भी इनकार नहीं किया जा सकता!

    ३. अच्छी सामयिक चर्चा चलाने के लिए बधाई! शायद इस बहाने श्रेष्ठ प्रवासी साहित्य की विशिष्ट प्रवृत्तियाँ उभर कर सामने आ सकें.

    >ऋ.

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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